• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) पार्ट -2

रात के लगभग 3 बजे हम उस मोडपर थे जो दूसरे राज्य के लिए जाता था.., वहाँ उसने गाड़ी रोकी और एक होटेल पर बैठकर चाइ मँगवाई…!

चाइ लेने जाकिर खुद गया.., हमने चाइ पी और फ़ौरन बिना एक पल गँवाए गाड़ी में आकर बैठ गये.., अभी गाड़ी वहाँ से कुच्छ ही दूर निकली थी कि मेरी आँखें भारी होने लगी…!

पीछे की सीट पर बैठी शकीला तो कब की सो चुकी थी.., एक दो मिनिट में ही में भी आगे की सीट पर सो गया..,

जाकिर जानता था कि उस ख़तरनाक जगह जो कि शेर सिंग के फार्म हाउस से एक सुरंग के रास्ते से होकर जाना होता था वहाँ से गुज़रते ही मे किसी भी सूरत में उसके ऐसी अंजान जगह जाने का विरोध ज़रूर करता इसलिए उसने हम दोनो को ही चाइ के साथ नींद की गोलियाँ

घोलकर पिला दी थी…!

जब मेरी आँख खुली तो एक बिस्तर पर मे अकेला पड़ा हुआ था.., शकीला का कहीं आता-पता भी नही था…, सुबह के 10 बजे थे जब मे नींद से जगा…!

मेरी आँख खुलते ही मेने अपने पास पलंग पर ही वहीदा की दोनो बहनों को बैठे देख कर मे चोंक गया.., मेने उनसे पुछा – तुम लोग यहाँ,,?

ये कॉन सी जगह है और शकीला कहाँ है..?

मेरे सवाल सुनकर रुखसार जो वहीदा से छोटी थी वो मेरे गाल सहलाते हुए बोली – हाए रे हॅंडसम.., हम लोग कब्से तुम्हारी रह देख रहे हैं

और तुम हो कि जागते ही उस मुई शकीला के बारे में पुच्छने लगे…!

फिकर ना करो मेरे राजा.. वो तो तुम्हें मिल ही जाएगी.., ज़रा हमें भी तो अपने इस मूसल का फिरसे कमाल दिखाओ.., ये कहकर उसने मेरे

सोए पड़े लंड को पॅंट के उपर से ही मसल दिया…!

मेने उसे ज़ोर्से धक्का देकर अपने से दूर कर दिया.. लेकिन तभी उसकी छोटी बेहन शकीरा मेरे गले पड़ते हुए बोली – आईए.. हाई.. संजू भाई जान ऐसे तो ना तरसाओ.., हम भी कोई बेगाने तो नही…!

एक बार मज़ा लेके तो देखो मेरी जान.., पहले से भी ज़्यादा मज़ा ना आए तो कहना.., खैर अभी आप थोड़ा फ्रेश व्रेश हो लो.., खाना वाना

ख़ालो उसके बाद हम लोग मिलते हैं तुमसे…,

बाइ.. ये कहते हुए वो दोनो रंडियाँ अपनी मोटी-मोटी गान्ड मटकाते हुए वहाँ से बाहर चली गयी…!

इतना ही नही साली रंडियाँ जाते जाते कमरे का दरवाजा भी बाहर से बंद कर गयी जिससे मे बाहर आकर इधर उधर का जायज़ा ले पाता…!

कमरा काफ़ी बड़ा हॉल नुमा.. जिसके बीचो-बीच एक डबल बेड पड़ा था.., एक साइड में सिंगल सोफा.., ड्रेसिंग टेबल और एक कोने में

अटॅच्ड बाथरूम..!

कुल मिलाकर एक सिंगल फॅमिली के रहने की सारी सुख सुविधाएँ उपलब्ध थी उस हॉल जैसे कमरे में.., मेने चारों तरफ घूम फिरकर कमरे

का मुआयना किया..,

फिर पीछे की दीवार में स्थित इतने बड़े कमरे की एक मात्र विंडो को खोलकर देखा…!

लेकिन वहाँ भी मुझे कुच्छ नही मिला.., कोई 2-2.5’ की एक संकरी सी गॅलरी के बाद सेमेंट की एक सपाट दीवार दिखाई दी.., जिसका उपर

का छोर मेरी आँखें नही देख पा रही थी…!

थक कर मे बात रूम में घुस गया.., ये देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उस एक छोटे कमरे जैसे बाथ रूम के अंदर मेरे और शकीला के साइज़ के तमाम कपड़ों के साथ साथ हर वो चीज़ मौजूद थी जो एक आदमी और औरत के लिए होनी चाहिए…!

मे उस बाथरूम में फ्रेश हुआ.., अच्छे से नहा धोकर नये कपड़े पहने और बाहर कमरे में आया तो एक और आश्चर्य को वहाँ पाया…!

वहीदा अपनी दोनो बहनों के साथ वहाँ बैठी थी.., मुझे देखते ही अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए बोली – क्यों संजू भाई.., यहाँ कोई तकलीफ़ तो नही हुई तुम्हें.., सब कुच्छ है ना तुम्हारे लिए…?

संजू – मेने चोन्कते हुए कहा – वहीदा बेहन तुम और यहाँ.., भाई ये सब क्या है..? तुम तो वहाँ उस गाओं में थी…?

वहीदा मुस्कराते हुए बोली – क्यों मे अपनी रिस्तेदारि में नही आ सकती..? आख़िर मेरे भाई का निकाह है.., भला नेग लेने तो आना ही था…!

संजू – लेकिन ये है कॉन सी जगह और मुझे यहाँ एक तरह से क़ैद क्यों कर रखा है.., ये रुखसार और शकीरा पहले मुझे इस कमरे में बंद करके क्यों चली गयी थी…?

वहीदा – अरे..रे.. इतने सारे सवाल एक साथ.., थोड़ा हौसला रखो संजू मेरी जान.., सब बताती हूँ..!

अब मेरी बात ध्यान से सुनो, बीच में भड़कना मत… हम एक बहुत ही बड़े और पवरफुल अंडरवर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन का हिस्सा हैं.., जिसकी एक शाखा की कमॅंड युसुफ भाई जान के हाथ में है…!

तुम्हें भी उनके कंधे से कंध मिलकर जिस तरह पहले साथ देते रहे थे वैसे ही आइन्दा भी देना है, कुच्छ ही देर में युसुफ भाई जान भी तुम्हारे पास आने वाले हैं…!

आनन्न..आनन्न… पहले मेरी बात पूरी होने दो.., मुझे थोड़ा उखड़े हुए मूड में आते ही वो मुझे बीच में रोकते हुए बोली – हमने तुम्हारी तमन्ना पूरी कर दी..,

आज शाम को ही तुम्हारी शादी शकीला से करा दी जाएगी… फिर तुम दोनो कुच्छ दिन मिलकर खूब जी भर कर मज़े करना…, तब तक तुम्हें किसी भी काम के लिए कोई नही कहेगा…!

वो आगे मुझे धमकाते हुए बोली – और हां याद रहे.., तुम्हारी जान शकीला एक तरह से यहाँ नज़र बंद रहेगी.., सो भूल कर भी उसके साथ

मिलकर यहाँ से रफू-चक्कर होने के बारे में सोचना भी मत वरना अंजाम तुम अच्छी तरह से जानते हो…!

संजू – तुम मुझे धमका रही हो.., ये जानते हुए कि मेरी मर्ज़ी के खिलाफ मुझे दुनिया की कोई भी ताक़त क़ैद करके नही रख सकती..!

वहीदा – मेने कब कहा कि तुम यहाँ क़ैद में हो.., बस शकीला को यहाँ से नही ले जा सकोगे.., और एक बात – ये ऑर्गनाइज़ेशन पहले वाले

जैसा छोटा मोटा नही है.., इसकी जड़ें देश दुनिया के कोने कोने में है..!

इसके सरमायेदारों के हाथ इतने लंबे हैं कि छुपने के लिए ये दुनिया भी छोटी पड़ जाएगी.., देश/ प्रदेश की सरकारें भी इनके खिलाफ कुच्छ करने से पहले हज़ार बार सोचती हैं…!

इतना सब कुच्छ मुझे समझा कर या कहो धमका कर वो तीनों वहाँ से चली गयी.. और पीछे छोड़ गयी मेरे अंदर एक तूफान जिसके चलते मे

एक बार तो अपने सोचने समझने की शक्ति ही खो बैठा और मारे गुस्से के मेने अपना घूँसा एक सोफे की चेयर पर दे मारा…!

 


संजू ने अपनी आपबीती आगे बढ़ाते हुए कहा - हाल फिलहाल मेने हालातों से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझी.., शकीला के बिना

अब मेरा रहना मुश्किल लग रहा था.., तसल्ली इस बात की थी कि वो मेरे साथ तो रहेगी…!

भविष्य में कभी मौका मिला तो इस गंदगी से निकालने की कोशिश कर सकता हूँ..,

कुच्छ देर बाद उस कमरे में युसुफ आया.., उसने मुझे देखकर अपने गले से लगाया.., उसके गले लगते हुए मुझे अब वो खुशी नही हुई जो पहले हुआ करती थी.., उल्टा उसके गले लगते हुए मुझे उससे घिंन सी आ रही थी..!

मन तो कर रहा था कि साले हरामी को इसी समय अपनी बाहों में दबाकर मसल डालूं.., जिसने मुझे एक लड़की का सहारा लेकर दोबारा से

इस काली दुनिया में घसीट लिया था…!

लेकिन मे ऐसा कर ना सका.., क्योंकि मुझे अभी तक इस कमरे से बाहर की दुनिया का पता नही था कि आख़िर ये है क्या.., कितने लोग हैं.., कैसे कैसे हथियारों से लेश होंगे…?

लिहाजा मेने भी बेमन से उससे मिलने का नाटक किया.., कुच्छ देर वो यहाँ के बारे में सब कुच्छ बताता रहा जो लगभग वहीदा पहले ही बता चुकी थी…!

उसी शाम एक छोटी मोटी शादी की रस्म के साथ जो हमारे ** रीति रिवाजों से ही मेरी और शकीला की शादी हो गयी.., वहाँ मौजूद लोगों के बीच खाने पीने की पार्टी जैसी हुई..!

तब मुझे पता चला कि यहाँ कितने लोग होंगे.., लगभग 70 से 80 मर्द और 40-50 औरतें जिनमें अधिकतर नवयुवक और नव युवतियाँ ही थी..,

जिनका बाद में पता चला कि उनकी संख्या कम या ज़्यादा भी होती रहती है…!

बहरहाल यहाँ के बारे में ज्यदा सोचने समझने की मुझे अभी कोई जल्दी भी नही थी..!

मे तो बस जल्दी से जल्दी ये चाहता था कि किसी तरह ये सब झमेले ख़तम हों और मे अपनी जानेमन शकीला को लेकर सुहाग सेग पर

पहुँचू.., जो इस समय किसी अप्सरा जैसी मेरे बगल में बैठी पार्टी को एंजाय कर रही थी…!

अंततः वो घड़ी आ ही गयी.., देर रात तक पीते पिलाते लोग एक – एक करके कम होते गये और मे शकीला को लेकर उसी कमरे में आगया जहाँ मुझे सुबह लाकर रखा था…!

मे अपने शादी के भारी भरकम कपड़ों से निजात पाना चाहता था सो बाथरूम में जाकर कपड़े चेंज करने लगा..,

मात्र एक वेस्ट और लूँगी लपेटकर जब मे बाहर आया तो शकीला बेड के एक कोने में सिकुड़ी सिमटी सी लंबा सा घूँघट निकाले बैठी थी…!

उस छुयि मुई सी कमसिन लड़की जो अबतक मेने मामूली से सलवार कमीज़ में देखा करता था उसे आज एक लाल रंग की भारी सी साड़ी में लिपटे देखकर ना जाने क्यों मुझे उसपर तरस सा आया…!

अभी उसकी उम्र ही क्या थी.., युसुफ और उसकी बेहन ने मुझे फँसाने के लिए उसे एक चारे की तरह इस्तेमाल किया था.., वरना तो ये उम्र उसके स्कूल जाने की थी..!

लेकिन अब वो मेरी व्यहता पत्नी थी.., जिसे में अब बेहद प्यार करने लगा था.., जिस हवस ने मुझे उसके करीब पहुँचाया था वो अब मेरे अंदर

उसके प्रति पवित्र प्रेम में परिवर्तित हो चुकी थी…!

वो यहाँ मेरी जमानत के तौर पर एक तरह से बंधक के रूप में यहाँ रहेगी.., ये सोचकर ही मुझे अपने उपर गुस्सा भी आया.., क्यों मेने उसे

पाने की ज़िद की.., ना में उसके लिए पागल होता और ना वो इस समय इस काली दुनिया की चार-दीवारों के बीच पहुँचती…!

संजू अपने प्रथम मिलन यानी सुहागरात के बारे में बताते बताते भावुक हो उठा था…!

ललित के अंदर मौजूद संजू ने आगे कहना शुरू किया - मे अपनी सोचों में जकड़ा उसके करीब जाकर बैठ गया.., मुझे अपने करीब बैठे पाकर वो अपने आप में और ज़्यादा सिमट गयी…!

मेने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – शकीला.. क्या बात है.., तुम्हें मुझसे डर लग रहा है..?

उसने घूँघट के अंदर से ही ना में अपना सिर हिलाया.., तो मेने उसका एक हाथ अपने हाथ में लिया.., मेरे छूते ही वो एकदम से सिहर उठी.., मेने अगला सवाल करते हुए कहा –

 
अगर तुम मेरे साथ शादी करके खुश नही हो तो मे तुम्हारे साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नही करूँगा.., मे तुमसे सच्चा प्रेम करने लगा हूँ इसलिए तुम्हें हर हाल में पाने की मेरी इच्छा ने तुम्हें भी इस नरक में आने पर मजबूर कर दिया इसके लिए मुझे माफ़ कर देना शकीला…!

मेरी ये बात सुनकर उसने झट से अपना चाँद सा मुखड़ा घूघट की क़ैद से आज़ाद किया और मेरे मूह पर हाथ रखते हुए बोली – इसके लिए आप अपने आप को दोष मत दीजिए प्लीज़…!

मे अभागन तो पहले से ही इन ज़ालिमों की क़ैद में ही हूँ.., वो तो भगवान को ना जाने कैसे मुझ पर दया आगयि जो मुझे आप जैसा रहम दिल प्रेम करने वाला पति के रूप में मिल गया…!

आपकी खातिर तो मे ता-उम्र इन लोगों की क़ैद में रह लूँगी.., इस आश् में कि आप कभी ना कभी तो मेरे पास होंगे…!

मे उसकी बात सुनकर एकदम से चोंक पड़ा…, और उसके दोनो हाथों को अपने हाथों में लेकर बोला – ये तुम क्या कह रही हो..? तुम और इनकी क़ैद में..? तुम तो वहीदा की ननद हो ना…?

वो अपने चेहरे को भावशून्य करते हुए सपाट लहजे में बोली – मेरा इन लोगों से कोई रिस्ता नही है.., मे.. तो.. मे.. तो..

संजू – तुम तो क्या..? बोलो शकीला जबाब दो.., तुम वहीदा की ननद नही हो तो फिर कॉन हो..?

मेरा नाम प्रिया है.., नैनीताल के एक गाओं की रहने वाली हूँ में…!

संजू – क्या..? इसका मतलब तुम मुसलमान नही हो..?

जब उसने अपना सिर ना में हिलाया.., तो मेने आगे पूछा – लेकिन यहाँ कैसे..? मतलब इन लोगों के बीच कैसे पहुँची.., मुझे तफ़सील से सब कुच्छ बताओ प्रिया…!

प्रिया – हम नैनीताल के एक छोटे से गाओं में रहते थे.., माँ-बापू.., दो छोटे मेरे भाई बेहन.., माँ-बापू मेहनत मज़दूरी करके किसी तरह से परिवार को चला रहे थे.., लेकिन उतने में भी हम सब खुश रहते थे…!

एक दिन शाम के अंधेरे में हम पाँचों प्राणी बैठे थे.., माँ खाना पका रही थी.., तीनों बच्चों को खाना खिलाने के बाद माँ बापू को खाना खिला रही थी की तभी दरवाजे पर दुस्तक हुई…!

बापू ने मेरे से दो साल छोटे भाई को दरवाजा खोलने को कहा.., जब उसने दरवाजा खोला तो अपने सामने 5 अजनबीयों को खड़े देखकर

उसने पुछा- कॉन हैं आप लोग ?

उनमें से एक ने पुछा – तुम्हारे पिता जी कहाँ हैं.., हमें उनसे बात करनी है.., उनकी बात खाना खाते हुए बापू ने भी सुनी.., वो खाना

छोड़ कर दरवाजे पर पहुँचे..!

5 अजनबीयों को जिनमें से दो मुसलमान लग रहे थे दाढ़ी और पहनाबे से जिनमें एक ये युसुफ भी था बोला – भाई हम यहाँ पास में ही बिज़्नेस के सिलसिले में आए थे.., अब पहाड़ों में रास्ता भटक गये हैं…!

आप हमें आज रात के लिए अपने घर में पनाह दे सकते हैं..? खुदा आपको बरकत देगा…!

ग़रीब आदमी की यही सबसे बड़ी कमज़ोरी होती है.., वो अपने हालातों को भूलकर बिना सोचे समझे किसी की भी मदद करने को तैयार हो

जाता है.., सो बापू ने भी उन्हें रात गुजारने के लिए हां बोल दिया..!

क्या पता था कि जिस काम को वो नेकी समझ रहे थे वो दरअसल हमारे लिए मुसीबतों से भरा निकलेगा…!

बातचीत के दौरान उन्होने हमारे घर की परिस्थितियों के बारे में जान लिया.., इसी का फ़ायदा उठाकर युसुफ ने मेरे बापू को अपने धंधे में काम करने के लिए उकसाया…!

जब उन्होने काम जानने की कोशिश की तो उसने ये कहकर टाल दिया.., तुम इसकी चिंता क्यों करते हो.., काम बड़ा सीधा साधा है..,

हमारे लोग आकर तुम्हें कुच्छ समान दे जाया करेंगे जिसे तुम्हें अपने आस पास के इलाक़े में जो पते दिए जायें उन तक पहुँचाते रहना है

बस.., उसके लिए तुम्हें महीने के महीने अच्छा पैसा वेतन के तौर पर मिलेगा…!

पहली नज़र में देखने पर ये काम कुच्छ मुश्किल नज़र भी नही आया था सो उन्होने झट से हां बोल दिया..,

एक आसान और अच्छा काम मिलने की खुशी में माँ ने उन सबके लिए खाना बनाया.., खाना खाकर युसुफ ने अपनी जेब से ढेर सारे रुपये

निकाल कर बापू के हाथ में रखे… और कहा –

ये रुपये फिलहाल पेशगी समझो.., इनसे तुम अपने घर के हालात ठीक कर सकते हो.., काम के साथ साथ हर महीने एक मोटी रकम तुम तक पहुँच जाया करेगी..,

लेकिन इसकी जमानत के तौर तुम्हें हमारी एक बात माननी पड़ेगी…,

फिर जैसे ही युसुफ ने बापू को वो जमानत वाली शर्त बताई.., उसे सुनकर हम सबके होश ही उड़ गये…!

 
Sanju ne apni aapbeeti aage badhate huye kaha - Haal filhal mene halaton se samjhauta karne mein hi apni bhalayi samjhi.., shakeela ke bina ab mera rahna mushkil lag raha tha.., tasalli iss baat ki thi ki wo mere sath to rahegi…!

Bhavishya mein kabhi mauka mila to iss gandagi se nikalne ki koshish kar sakta hoon..,

Kuchh der baad uss kamre mein Yusuf aaya.., usne mujhe dekhkar apne gale se lagaya.., uske gale lagte huye mujhe ab wo Khushi nahi huyi jo pahle hua karti thi.., ulta uske gale lagte huye mujhe usase ghinn si aa rahi thi..!

Mann to kar raha tha ki saale harami ko issi samay apni bahon mein dabakar masal daalun.., jisne mujhe ek ladki ka sahara lekar dobara se iss kaali duniya mein ghasit liya tha…!

Lekin me aisa kar na saka.., kyonki mujhe abhi tak iss kamre se bahar ki duniya ka pata nahi tha ki aakhir ye hai kya.., kitne log hain.., kaise kaise hathiyaaron se lesh honge…?

Lihaja mene bhi beman se usase milne ka natak kiya.., kuchh der wo yahaan ke baare mein sab kuchh batata raha jo lagbhag wahida pahle hi bata chuki thi…!

Usi shaam ek chhoti moti saadi ki rasm ke sath jo hamaare ** reeti riwajon se hi meri aur shakeela ki saadi ho gayi.., wahaan maujud logon ke beech khane peene ki party jaisi huyi..!

tab mujhe pata chala ki yahaan kitne log honge.., lagbhag 70 se 80 mard aur 40-50 auratein jinmein adhiktar navyuvak aur nav yuvatiyaan hi thi.., jinka baad mein pata chala ki unki sankhya kam ya jyada bhi hoti rahti hai…!

Baharhaal yahaan ke baare mein jyda sochne samjhne ki mujhe abhi koi jaldi bhi nahi thi..!

Me to bas jaldi se jaldi ye chahta tha ki kisi tarah ye sab jhamele khatam hon aur me apni jaaneman shakeela ko lekar Suhag seg par pahunchu.., jo iss samay kisi apsra jaisi mere bagal mein baithi party ko enjoy kar rahi thi…!

Antatah wo ghadi aa hi gayi.., der raat tak peete pilaate log ek – ek karke kam hote gaye aur me shakeela ko lekar usi kamre mein aagaya jahaan mujhe subah laakar rakha tha…!

Me apne shadi ke bhari bharkam kapdon se nijaat paana chahta tha so bhathroom mein jaakar kapde change karne laga..,

matr ek vest aur lungi lapetkar jab me bahar aaya to Shakela bed ke ek kone mein sikudi simti si lamba sa ghoonghat nikaale baithi thi…!

Uss chhuyi muyi si kamsin ladki jo abtak mene mamuli se salwar kamij mein dekha karta tha use aaj ek laal rang ki bhari si saari mein lipte dekhkar na jaane kyon mujhe uspar taras sa aaya…!

Abhi uski umra hi kya thi.., yusuf aur uski behan ne mujhe fansaane ke liye use ek chare ki tarah istemaal kiya tha.., varna to ye umra uske school jaane ki thi..!

Lekin ab wo meri vyahta patni thi.., jise mein ab behad pyar karne laga tha.., jis hawas ne mujhe uske karib pahunchaya tha wo ab mere ander uske prati Pavitra prem mein parivartit ho chuki thi…!

Wo yahaan meri jamanat ke taur par ek tarah se bandhak ke roop mein yahaan rahegi.., ye sochkar hi mujhe apne upar gussa bhi aaya.., kyon mene use paane ki jid ki.., na mein uske liye pagal hota aur na wo iss samay iss kaali duniya ki char-deewaron ke beech pahunchti…!

Sanju apne Pratham milan yaani suhagraat ke baare mein batate batate bhavuk ho utha tha…!

Lalit ke ander maujud Sanju ne aage kahna shuru kiya - Me apni sochon mein jakda uske karib jaakar baith gaya.., mujhe apne karib baithey paakar wo apne aap mein aur jyada simat gayi…!

Mene uske kandhey par hath rakhte huye kaha – Shakeela.. kya baat hai.., tumhein mujhse darr lag raha hai..?

Usne ghoonghat ke ander se hi na mein apna sir hilaaya.., to mene uska ek hath apne hath mein liya.., mere chhoote hi wo ekdum se sihar uthi.., mene agla sawal karte huye kaha –

Agar tum mere sath saadi karke khush nahi ho to me tumhare saath koi jor jabardusti nahi karunga.., me tumse saccha prem karne laga hoon isliye tumhein har haal mein paane ki meri icchha ne tumhein bhi iss narak mein aane par majboor kar diya iske liye mujhe maaf kar dena shakeela…!

Meri ye baat sunkar usne jhat se apna chand sa mukhda ghooghat ki qaid se azad kiya aur mere muh par hath rakhte huye boli – iske liye aap apne aap ko dosh mat deejiye please…!

Me abhagan to pahle se hi in jaalimon ki qaid mein hi hoon.., wo to bhagwaan ko na jaane kaise mujh par daya aagayi jo mujhe aap jaisa raham dil prem karne wala pati ke roop mein mil gaya…!

Aapki khatir to me ta-umra in logon ki qaid mein rah lungi.., iss aash mein ki aap kabhi na kabhi to mere pass honge…!

Me uski baat sunkar ekdum se chonk pada…, aur uske dono hathon ko apne hathon mein lekar bola – ye tum kya kah rahi ho..? tum aur inki qaid mein..? tum to wahida ki nanad ho na…?

Wo apne chehre ko bhavshunya karte huye sapat lahje mein boli – mera inn logon se koi rista nahi hai.., me.. to.. me.. to..

Sanju – tum to kya..? bolo Shakeela jabab do.., tum wahida ki nanad nahi ho to fir kon ho..?

Mera naam Priya hai.., Nainital ke ek gaon ki rahne waali hoon mein…!

Sanju – kya..? iska matalab tum musalmaan nahi ho..?

Jab usne apna sir na mein hilaya.., to mene aage pucha – lekin yahaan kaise..? matalab in logon ke beech kaise pahunchi.., mujhe tafseel se sab kuchh bataao Priya…!

Priya – hum nainital ke ek chhote se gaon mein rahte they.., maa-baapu.., do chhote mere bhai behan.., maa-baapu mehanat majduri karke kisi tarah se pariwaar ko chala rahe they.., lekin utne mein bhi hum sab khush rahte they…!

Ek din sham ke andhere mein hum paanchon prani baithey they.., maa khana paka rahi thi.., teenon bacchon ko khana khilane ke baad maa bapu ko khana khila rahi thi ki tabhi darwaje par dustak huyi…!

Bapu ne mere se do saal chhote bhai ko Darwaja kholne ko kaha.., jab usne Darwaja khola to apne saamne 5 ajanabiyon ko khade dekhkar usne puchha- kon hain aap log ?

Unmein se ek ne puchha – tumhare pita ji kahaan hain.., hamein unse baat karni hai.., unki baat khana khate huye bapu ne bhi suni.., wo khana chhodkar darwaje par pahunche..!

5 ajanabiyon ko jinmein se do musalmaan lag rahe they dadi aur pehnaabe se jinmein ek ye Yusuf bhi tha bola – bhai hum yahaan pass mein hi business ke silsile mein aaye they.., ab pahadon mein rasta bhatak gaye hain…!

Aap hamein aaj raat ke liye apne ghar mein panah de sakte hain..? khuda aapko barkat dega…!

Garib aadmi ki yahi sabse badi kamjori hoti hai.., wo apne halaton ko bhulakar bina soche samjhe kisi ki bhi madad karne ko taiyar ho jaata hai.., so bapu ne bhi unhein raat gujaarne ke liye haan bol diya..!

Kya pata tha ki jis kaam ko wo neki samajh rahe they wo darasal hamaare liye mushibaton se bhara nikalega…!

Baatcheet ke daruan unhone hamaare ghar ki paristhitiyon ke baare mein jaan liya.., isi ka fayda uthakar yusuf ne mere baapu ko apne dhandhe mein kaam karne ke liye uksaya…!

Jab unhone kaam janane ki koshish ki to usne ye kahkar taal diya.., tum iski chinta kyon karte ho.., kaam bada seedha sadha hai..,

hamaare log aakar tumhein kuchh saman de jaaya kareinge jise tumhein apne aas pass ke ilake mein jo pate diye jaayein un tak pahunchate rahna hai bas.., uske liye tumhein mahine ke mahine acchha paisa vetan ke taur par milega…!

Pahli nazar mein dekhne par ye kaam kuchh mushkil nazar bhi nahi aaya tha so unhone jhat se haan bol diya..,

Ek asan aur acchha Kaam milne ki kushi mein maa ne un sabke liye khana banaya.., khana khakar yusuf ne apni jeb se dher saare rupye naikaal kar baapu ke hath mein rakhe… aur kaha –

Ye rupye filhaal peshgi samjho.., inse tum apne ghar ke halat theek kar sakte ho.., kaam ke sath sath har mahine ek moti rakam tum tak pahunch jaaya karegi..,

lekin iski jamanat ke taur tumhein hamaari ek baat manani padegi…,

Fir jaise hi yusuf ne baapu ko wo jamanat waali shart batayi.., use sunkar hum sabke hosh hi ud gaye…!
 
Yusuf apni shart batate huye bola – dekho bhai.., rakam ka mamla hai.., daulat dekhkar kisi ka bhi mann dol sakta hai.., isliye jamanat ke taur par hum tumhari iss ladki ko apne sath le jaayenge usne meri taraf ishara karte huye kaha…!

Yusuf ki baat sunkar mere baapu ko gussa aagaya.., bhale hi hum kitne hi garib sahi lekin koi bhi maa-baap apni jawan hoti ladki ko kisi ajanabi ko kaise saunp sakta tha so wo gusse se bole –

Ye kya bakwas kar rahe ho.., aap log hamein kaam do ya na do.., ham jaise jee rahe hain aur jee lenge lekin hum apni beti ko aapke sath hargij nahi bhej

sakte…!

Baapu ki ye baat sunte hi jaise yusuf ke ander ka shaitan bahar aagaya…, usne apni jeb se revolver nikalkar baapu ke upar tante huye kaha – ab ismein tumhari marji nahi chalegi mere dost…!

Hum jo than lete hain use haasil karke hi rahte hain.., haan itna vada jarur karte hain tumse ki tumhari beti hamare yahaan kisi takleef mein nahi rahegi.., aur jab tak ye khud nahi chahegi koi isse hath bhi nahi lagaayega…!

Ye kahkar usne apne ek sathi ki taraf ishara kiya.., usne majbooti se meri kalaayi thami aur ghar se bahar ki taraf kheench kar le chala..,

Maa-baapu hatprabh dekhne ke alawa kuchh nahi kar paaye.., wo log bahar khadi unki gaadi mein mujhe bithakar raat mein hi wahaan se nikal aaye…!

Uss din se lekar aaj tak mene apne maa-baapu aur bhai behan ko dekhna to door unse baat tak nahi ki hai..,

itna kahte kahte Priya Sanju ki chaudi chhati mein samakar foot-footkar ro padi…!

Sanju – Priya ki dukhbhari kahani sunkar mere jaise aadmi ki aankhein bhi bhar aayi.., Yusuf aur uske pure pariwar par mujhe itna gussa aa raha tha.., mann kar raha tha ki abhi uske pass jaaun aur uss madarchod ko wahin cheer faadkar sukha doon…!

Lekin fir mere baad Priya ka kya hoga..? ye sochkar mene mann hi mann ek faisla liya aur Priya ko apne se alag kar uske sunder aansuon se tar chehre ko apne hathon ke beech lekar kaha –

Ab meri baat dhyan se suno priye…, ab hum tabhi ek honge jab tumhare maa baapu se Ashirwad nahi le lete.., tab tak me tumhein ab hath bhi nahi lagaunga..,

Me nahi chahta ki tumhari icchha ke virudh jaakar me tumhare upar ye jabardusti ki saadi thopun.., ye sach hai ki me tumhein jee jaan se chahne laga hoon..,

lekin iska ye katayi matalab nahi ki me apne ek tarfa pyar ki khatir tumhare sath jor jabdusti karun…!

Meri baat sunkar Priya apni palkein kholkar meri aankhon mein jhankte huye boli – ye aapse kisne kaha ki aapka pyar ek tarfa hai…? Me bhi aapse bahut pyar karti hoon…!

Yaad keejiye wo pal agar wahida naam ki wo chudail hamaare beech rukabat nahi daalti to kai maukon par hum pahle hi ek ho chuke hote…!

Me nahi chahti ki aap meri vajah se koi mushibat mol lein.., Eshwar shayad hamein bina unke Ashirwad ke hi milana chahte hain to hum kon hote hain unki icchha ke virudh jaane waale..!

Jo mauka hum pahle ganwa chuke hain use ab paa lene mein hi bhalaayi hai.., isliye please aap ye apne dil se nikaal fenkiye ki aap mere sath koi jor jabardusti kar rahe hain..!

Hum yahaan kitne din surachhit hain kahna bada mushkil hoga.., isase pahle ki aur koi mushibat hamaare beech aaye, me dil se yahi chahti hoon ki mere jivan ki wo Suhani raat aaj hi ho jiske khwaab har ladki dekha karti hai…!

Sanju – me muh baaye uski baatein sun raha tha, kitna sahi kaha tha usne.., apne chhote se jivan ki badi badi mushibaton ko jhelte jhelte shayad ye kamsin kali samay se pahle samjhdaar ho gayi thi…!

Mene bhavna mein bahte huye ohhh…priyaaa…meri jaan.. kahkar use apne kaleje se laga liya.., wo bhi kisi abodh bacchi ki tarah mere chaude seene mein sama gayi…!

Isase pahle ki Lalit ke ander baitha Sanju apni aage ki kahani sunata.., ssamne usi chaurahe ko dekhkar mene kaha – Lalit ab hum tumhare ussi dhabbe par pahunch rahe hain…!

Agar bhookh lagi ho to khana ho jaaye…?

Lalit ko achanak se ek chakkar sa aaya.., usne apna sir jorse peechhe seat ki back par rakha aur apni aankhein band karke shant ho gaya…!

Mene dhabbe ke saamne apni gaadi roki.., gaadi ke rukne ke jhatke se Lalit ne apni aakhein khol di aur meri taraf dekh kar bola – isi dhabbe par kyon roka chachu…?

Wo dhaabbe wala chacha khamkha mujhe dekh kar gaali galauj karne laga to.?

Me – isliye yahaan rukna aur jaruri tha bete.., use aaj clear to kar denge ki tum ab uske yahaan kabhi kaam karne waale nahi ho.., khamkha wo Bechara abhi bhi tumhara intejaar kar raha ho to…?

Huumm.. so to hai.., chaliye dekhte hain fir kya kahta hai chacha.. itna kahte huye lalit ke chehre par ek pyari si Muskaan aa gayi aur hum dono bahar padi ek charpaayi par aamne saamne khane ke liye baith gaye…!

Khana acchha tha.., lunch ka samay tha to bhookh bhi joron ki lagi thi…, lalit ko dekh kar dhaabbe ke maalik ne bas itna kaha – abbey lalit ke bacche kidhar gayab ho gaya tha tu...?

युसुफ अपनी शर्त बताते हुए बोला – देखो भाई.., रकम का मामला है.., दौलत देखकर किसी का भी मंन डोल सकता है.., इसलिए जमानत के तौर पर हम तुम्हारी इस लड़की को अपने साथ ले जाएँगे उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा…!

युसुफ की बात सुनकर मेरे बापू को गुस्सा आगया.., भले ही हम कितने ही ग़रीब सही लेकिन कोई भी माँ-बाप अपनी जवान होती लड़की को किसी अजनबी को कैसे सौंप सकता था सो वो गुस्से से बोले –

ये क्या बकवास कर रहे हो.., आप लोग हमें काम दो या ना दो.., हम जैसे जी रहे हैं और जी लेंगे लेकिन हम अपनी बेटी को आपके साथ हरगिज़ नही भेज सकते…!

बापू की ये बात सुनते ही जैसे युसुफ के अंदर का शैतान बाहर आगया…, उसने अपनी जेब से रेवोल्वेर निकालकर बापू के उपर तानते हुए कहा – अब इसमें तुम्हारी मर्ज़ी नही चलेगी मेरे दोस्त…!

हम जो ठान लेते हैं उसे हासिल करके ही रहते हैं.., हां इतना वादा ज़रूर करते हैं तुमसे कि तुम्हारी बेटी हमारे यहाँ किसी तकलीफ़ में नही

रहेगी.., और जब तक ये खुद नही चाहेगी कोई इसे हाथ भी नही लगाएगा…!

ये कहकर उसने अपने एक साथी की तरफ इशारा किया.., उसने मजबूती से मेरी कलाई थामी और घर से बाहर की तरफ खींच कर ले चला..,

माँ-बापू हतप्रभ देखने के अलावा कुच्छ नही कर पाए.., वो लोग बाहर खड़ी उनकी गाड़ी में मुझे बिठाकर रात में ही वहाँ से निकल आए…!

उस दिन से लेकर आज तक मेने अपने माँ-बापू और भाई बेहन को देखना तो दूर उनसे बात तक नही की है..,

इतना कहते कहते प्रिया संजू की चौड़ी छाती में समाकर फुट-फूटकर रो पड़ी…!

संजू – प्रिया की दुखभरी कहानी सुनकर मेरे जैसे आदमी की आँखें भी भर आई.., युसुफ और उसके पूरे परिवार पर मुझे इतना गुस्सा आ रहा

था.., मन कर रहा था कि अभी उसके पास जाउ और उस मादरचोद को वहीं चीर फाड़कर सूखा दूं…!

लेकिन फिर मेरे बाद प्रिया का क्या होगा..? ये सोचकर मेने मन ही मन एक फ़ैसला लिया और प्रिया को अपने से अलग कर उसके सुंदर

आँसुओं से तर चेहरे को अपने हाथों के बीच लेकर कहा –

अब मेरी बात ध्यान से सुनो प्रिये…, अब हम तभी एक होंगे जब तुम्हारे माँ बापू से आशीर्वाद नही ले लेते.., तब तक मे तुम्हें अब हाथ भी नही लगाउन्गा..,

मे नही चाहता कि तुम्हारी इच्छा के विरुढ़ जाकर मे तुम्हारे उपर ये ज़बरदस्ती की शादी थोपूं.., ये सच है कि मे तुम्हें जी जान से चाहने लगा हूँ..,

लेकिन इसका ये कतयि मतलब नही कि मे अपने एक तरफ़ा प्यार की खातिर तुम्हारे साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करूँ…!

मेरी बात सुनकर प्रिया अपनी पलकें खोलकर मेरी आँखों में झाँकते हुए बोली – ये आपसे किसने कहा कि आपका प्यार एक तरफ़ा है…? मे भी आपसे बहुत प्यार करती हूँ…!

याद कीजिए वो पल अगर वहीदा नाम की वो चुड़ैल हमारे बीच रुकावट नही डालती तो कई मौकों पर हम पहले ही एक हो चुके होते…!

मे नही चाहती कि आप मेरी वजह से कोई मुशिबत मोल लें.., एश्वर शायद हमें बिना उनके आशीर्वाद के ही मिलाना चाहते हैं तो हम कॉन

होते हैं उनकी इच्छा के विरुद्ध जाने वाले..!

जो मौका हम पहले गँवा चुके हैं उसे अब पा लेने में ही भलाई है.., इसलिए प्लीज़ आप ये अपने दिल से निकाल फेंकिए कि आप मेरे साथ

कोई ज़ोर ज़बरदस्ती कर रहे हैं..!

हम यहाँ कितने दिन सुरक्षित हैं कहना बड़ा मुश्किल होगा.., इससे पहले कि और कोई मुशिबत हमारे बीच आए, मे दिल से यही चाहती हूँ

कि मेरे जीवन की वो सुहानी रात आज ही हो जिसके ख्वाब हर लड़की देखा करती है…!

संजू – मे मूह बाए उसकी बातें सुन रहा था, कितना सही कहा था उसने.., अपने छोटे से जीवन की बड़ी बड़ी मुशिबतो को झेलते झेलते शायद ये कमसिन कली समय से पहले समझदार हो गयी थी…!

मेने भावना में बहते हुए ओह्ह्ह…प्रियाअ…मेरी जान.. कहकर उसे अपने कलेजे से लगा लिया.., वो भी किसी अबोध बच्ची की तरह मेरे चौड़े सीने में समा गयी…!

इससे पहले कि ललित के अंदर बैठा संजू अपनी आगे की कहानी सुनाता.., सामने उसी चौराहे को देखकर मेने कहा – ललित अब हम तुम्हारे उसी ढाबे पर पहुँच रहे हैं…!

अगर भूख लगी हो तो खाना हो जाए…?

ललित को अचानक से एक चक्कर सा आया.., उसने अपना सिर ज़ोर्से पीछे सीट की बॅक पर रखा और अपनी आँखें बंद करके शांत हो गया…!

मेने ढाबे के सामने अपनी गाड़ी रोकी.., गाड़ी के रुकने के झटके से ललित ने अपनी आखें खोल दी और मेरी तरफ देख कर बोला – इसी

ढाबे पर क्यों रोका चाचू…?

वो ढाबे वाला चाचा खंखा मुझे देख कर गाली गलौज करने लगा तो.?

मे – इसलिए यहाँ रुकना और ज़रूरी था बेटे.., उसे आज क्लियर तो कर देंगे कि तुम अब उसके यहाँ कभी काम करने वाले नही हो.., ख़मखा वो बेचारा अभी भी तुम्हारा इंतेजार कर रहा हो तो…?

हुउंम.. सो तो है.., चलिए देखते हैं फिर क्या कहता है चाचा.. इतना कहते हुए ललित के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी और हम दोनो बाहर पड़ी एक चारपाई पर आमने सामने खाने के लिए बैठ गये…!

खाना अच्छा था.., लंच का समय था तो भूख भी जोरों की लगी थी…, ललित को देख कर ढाबे के मालिक ने बस इतना कहा – अबे ललित के

बच्चे किधर गायब हो गया था तू...?

 


Mene use sab samjha diya.., jise sunkar usne mujhe bahut bahut dhanywad diya.. ki mene kaise ek acche ghar ke ladke ki jindagi sanwar di varna wo isi dhaabe ki duniya mein rahkar in truck waalon ki sohbat mein na jaane kya kya seekh jaata…!

Dhaabbe wala chacha mere iss nek kaam se bahut prabhavit hua.., usne apne dhabbe ki best dishes hamein khane mein di..,

ek-do ghante aur bitha ke rakha, ant mein ek-ek badhiya si malaai marka chai pilaane ke baad iss shart par wahaan se hamein nikalne diya ki lautate mein hum fir usase milte huye jaayenge…!

Rasta abhi bhi kaafi lamba tha.., Lalit par kab Sanju ka saya hota tha iska koi seemit samay to hota nahi tha.., khane ke asar se hamari aankhein bojhil hone lagi thi..,

Side ki seat par baitha Lalit uonghne laga to mene usase baat karte huye kaha – lagta hai dhabbe wale chacha ne kuchh jyada hi khatirdaari kar di…!

Lalit ne apni aankhein kholkar meri taraf dekha aur muskaraakar bola – haan chachu aankhein apne aap hi band ho rahi hain.., upar se aapne gaadi ka AC chala rakha hai…!

Me – AC band kar doon..?

Lalit – aapki marji.., mujhe to glass kholkar bahar ki hawa se bhi koi farak nahi padta…!

Me – lekin fir itna tej gaadi nahi chala paayenge.., rasta kaafi lamba hai.., mujhe nahi lagta sham tak hum apni manzil tak pahunch paayenge bhi ya nahi…!

Lalit – ab aap manzil ki chinta chhod hi do, aaram se glass neeche karke chalte hain.., agar aap kahein to ek sujhav doon..?

Me – haan bolo…!

Lalit – kyon na aaj raat Manjri kaki ke yahaan ruka jaaye.., bade acche log hain wo….!

Mene uske baalon par hath ghumate huye kaha – sujhav bura nahi hai.., yahi theek rahega.., chalo aaj raat wahin rukte hain..,

itna kahkar mene gaadi ke glass neeche kar diye aur gaadi ki speed kam karke aaram se sham ke waqt ki natural hawa ka anand lete huye apne gantavya ki taraf badh chale…!

Suraj Paschim ki taraf jhukne laga tha.., aur aasman mein laalima failne lagi thi.., jis gati se hum chal rahe they uss hisaab se abhi hum Manjri ke ghar se lagbhag ek ghante ki doori par aur they..!

Lalit ke lambe baal bahar ki hawa se lahra rahe they hawa se apni aankhein band karke Mausam ka pura lutf le raha tha pattha..,

uska masum chehra dekh kar nahi lagta tha ki koi aatma is par hawi ho jaati hogi aur ye apne aap se niyantran khokar kisi aur ke niyantran mein chala jaata hoga…!

Suraj ab Paschim mein doobne ki taiyari mein tha pashu pakshi apne gharon ki taraf chal pade they..,

dhoop dharti maa ka daman chodkar lalami se naha chuki thi jo ass-pass mein genhu ke lahlahate khet jo ab sunhari abha le chuke they iss sham ki lalima se nahakar aur jyada sunder dikhayi de rahe they..,

Maano dharti maa apne pure shrigaar mein aakar prakat huyi ho…!

Iss prakrutik sunderta ka lutf lete huye hum abhi kuchh KMS hi chale honge ki achanak se road par apne theek saamne aaye vyavdhan ko dekhkar mujhe apni gaadi ko ekdum se emergency brake lagane pade…..!!!!

मेने उसे सब समझा दिया.., जिसे सुनकर उसने मुझे बहुत बहुत धन्यवाद दिया.. कि मेने कैसे एक अच्छे घर के लड़के की जिंदगी संवार दी वरना वो इसी ढाबे की दुनिया में रहकर इन ट्रक वालों की सोहबत में ना जाने क्या क्या सीख जाता…!

ढाबे वाला चाचा मेरे इस नेक काम से बहुत प्रभावित हुआ.., उसने अपने ढाबे की बेस्ट डिशस हमें खाने में दी..,

एक-दो घंटे और बिठा के रखा, अंत में एक-एक बढ़िया सी मलाई मार्का चाइ पिलाने के बाद इस शर्त पर वहाँ से हमें निकलने दिया कि लौटते में हम फिर उससे मिलते हुए जाएँगे…!

रास्ता अभी भी काफ़ी लंबा था.., ललित पर कब संजू का साया होता था इसका कोई सीमित समय तो होता नही था.., खाने के असर से हमारी आँखें बोझिल होने लगी थी..,

साइड की सीट पर बैठा ललित उंघने लगा तो मेने उससे बात करते हुए कहा – लगता है ढाबे वाले चाचा ने कुच्छ ज़्यादा ही खातिरदारी कर दी…!

ललित ने अपनी आँखें खोलकर मेरी तरफ देखा और मुस्कराकर बोला – हां चाचू आँखें अपने आप ही बंद हो रही हैं.., उपर से आपने गाड़ी का एसी चला रखा है…!

मे – एसी बंद कर दूँ..?

ललित – आपकी मर्ज़ी.., मुझे तो ग्लास खोलकर बाहर की हवा से भी कोई फरक नही पड़ता…!

मे – लेकिन फिर इतना तेज गाड़ी नही चला पाएँगे.., रास्ता काफ़ी लंबा है.., मुझे नही लगता शाम तक हम अपनी मंज़िल तक पहुँच पाएँगे भी या नही…!

ललित – अब आप मंज़िल की चिंता छोड़ ही दो, आराम से ग्लास नीचे करके चलते हैं.., अगर आप कहें तो एक सुझाव दूं..?

मे – हां बोलो…!

ललित – क्यों ना आज रात मंजरी काकी के यहाँ रुका जाए.., बड़े अच्छे लोग हैं वो….!

मेने उसके बालों पर हाथ घूमाते हुए कहा – सुझाव बुरा नही है.., यही ठीक रहेगा.., चलो आज रात वहीं रुकते हैं..,

इतना कहकर मेने गाड़ी के ग्लास नीचे कर दिए और गाड़ी की स्पीड कम करके आराम से शाम के वक़्त की नॅचुरल हवा का आनंद लेते हुए

अपने गन्तव्य की तरफ बढ़ चले…!

सूरज पश्चिम की तरफ झुकने लगा था.., और आसमान में लालिमा फैलने लगी थी.., जिस गति से हम चल रहे थे उस हिसाब से अभी हम मंजरी के घर से लगभग एक घंटे की दूरी पर और थे..!

ललित के लंबे बाल बाहर की हवा से लहरा रहे थे हवा से अपनी आँखें बंद करके मौसम का पूरा लुत्फ़ ले रहा था पट्ठा..,

उसका मासूम चेहरा देख कर नही लगता था कि कोई आत्मा इस पर हावी हो जाती होगी और ये अपने आप से नियंत्रण खोकर किसी और के नियंत्रण में चला जाता होगा…!

सूरज अब पश्चिम में डूबने की तैयारी में था पशु पक्षी अपने घरों की तरफ चल पड़े थे..,

धूप धरती माँ का दामन छोड़कर लालमी से नहा चुकी थी जो आस-पास में गेंहू के लहलहाते खेत जो अब सुनहरी आभा ले चुके थे इस शाम

की लालिमा से नहा कर और ज़्यादा सुंदर दिखाई दे रहे थे..,

मानो धरती माँ अपने पूरे श्रीगार में आकर प्रकट हुई हो…!

इस प्राकृतिक सुंदरता का लुफ्त लेते हुए हम अभी कुच्छ किमी ही चले होंगे कि अचानक से रोड पर अपने ठीक सामने आए व्यवधान को

देखकर मुझे अपनी गाड़ी को एकदम से एमर्जेन्सी ब्रेक लगाने पड़े…..!!!!

 
सामने रोड पर एक 120 डेग का मोड़ था.., दोनो तरफ घने लंबे और उँचे पेड़ खड़े थे.., मोड़ लेते ही अचानक से हमें बड़े-बड़े पत्थर रोड पर पड़े दिखाई दिए…!

समय रहते मेने गाड़ी को ब्रेक लगाए.., इंपोर्टेड गाड़ी टाइयरो की चरमराहट के साथ पत्थरों से ठीक पहले रुक गयी..,

मुझे ब्रेक इमरजेंसी में लगाने पड़े थे.., गाड़ी के टॉप गियर में होने के कारण एंजिन अपने आप बंद हो गया..,

अभी हम इस अचानक से आई मुशिबत को ठीक से समझ ही रहे थे कि पेड़ों और झाड़ियों से निकल कर 4-5 लोग मूह पर कपड़ा बाँधे हमारी गाड़ी की तरफ लपके…!

उनमें से एक के हाथ में 315 बोर राइफल थी.., एक-दो पर देसी तमन्चे तो दो लोहे की रोड लिए हुए थे…, इनका साफ इरादा था.., राहगीरों को लूटना…!

मेरे सामने उनके आगे सरेंडर करने के सिवाय और कोई चारा नही था.., क्योंकि गाड़ी के खड़े होते ही जिंन्न की तरह प्रकट होकर उन लोगों ने गाड़ी को दोनो तरफ से घेर लिया…!

गाड़ी मोड़ कर वापस भी नही ले जा सकता था.., बॅक जाने में ख़तरा ये था कि वो सामने से गोली चला सकते थे…!

उनमें से राइफल वाले ने मेरी साइड में खड़े होकर मुझे गाड़ी से बाहर आने की हिदायत दी.., उनकी बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई चारा भी नही बचा था..,

दूसरी तरफ से एक तमन्चे वाले ने ललित को भी बाहर आने के लिए इशारा किया.., वो उसके एक बार कहने पर बाहर नही आया तो उसने उसे धमकाते हुए कहा –

ओये पिद्दी तेरे लिए कोर्ट से ऑर्डर लाने पड़ेंगे क्या बाहर आने के लिए.., चल मादरचोद बाहर आ वरना यहीं ठोक दूँगा भेन्चोद…, जल्दी कर.

तब तक दूसरा तमन्चे वाला जो राइफल वाले के साथ ही मेरी तरफ खड़ा था.., उससे उस राइफल वाले ने कहा – इसकी जेब खाली कर.., और तू ये अपने गले की चैन और घड़ी भी निकाल फटाफट…!

वो तमन्चे वाला एक हाथ में तमन्चा पकड़े दूसरे हाथ से मेरी जेबें खाली करने लगा.., जिसमें मेरा वॉलेट रखा हुआ था.., मेने उससे कहा – भाई जो भी लेना है ले लो.., बस मेरे कार्ड मुझे वापस करदो…!

क्यों.. भेन्चोद मेरे लौन्डे की बारात में आया है क्या भोसड़ी के.., चल एक कागज पर अपने कार्ड्स के डीटेल लिख.., वरना यही टपका दूँगा

साले…!

/color]
 
तभी दूसरी तरफ मामला उलट होता दिखाई देने लगा.., जब एक दो बार की चेतावनी के बाद भी ललित बाहर आने को तैयार नही हुआ तो उसकी तरफ वाले एक बदमाश ने गाड़ी का दरवाजा खोला..,

और ललित के गिरेबान को पकड़कर उसे ज़बरदस्ती गाड़ी से बाहर खींचने लगा…!

मेने उसे समझाते हुए कहा – उसके पास कुच्छ भी नही है.., तुम खम्खा उस लड़के को क्यों परेशान कर रहे हो..,

राइफल वाला अभी भी कुच्छ दूरी बनाकर मुझे निशाने पर लिए खड़ा था.., मेरी बात सुनकर उस तमनचे वाले ने मेरा वॉलेट अपनी जेब में डाला और एक तमाचा मेरे गाल पर जड़ते हुए कहा…!

भेन्चोद एक बार में समझ नही आता क्या तुझे.., उधर ध्यान देने की बजाय तू अपना काम कर.., चल जल्दी से अपने कार्ड के पासवर्ड बता…, वरना तेरी आँखों के सामने उस लड़के को ठोक देगा वो…!

तभी वो हुआ जिसकी मुझे भी उम्मीद नही थी.., ना जाने कब संजू की आत्मा ललित में समा गयी.., उसने गाड़ी से बाहर आते ही झटके से

उसका तमन्चा उसके हाथ से छीना..,

पलक झपकते ही तमन्चे का भारी दस्ता उसकी कनपटी पर भी दे मारा…, वो चीख भी नही पाया कि उसने उसके शरीर को हवा में उठाकर

उस राइफल वाले के उपर ही उछाल दिया…!

राइफल उसके हाथ से दूर जा गिरी.., मौका देख कर मेने एक नारा लगाया.., जय हो संजू प्यारे.. कहते हुए उस अपनी तरफ वाले पर जंप लगा दी…!

जंप के साथ ही उसका तमंचा मेरे हाथ में था.., जिसे मेने उसके सिर पर दे मारा.., मे उसके सीने पर सवार हो चुका था.. इससे पहले कि वो

कुच्छ करता, दो बार के तमन्चे की मूठ के प्रहार ने उसका थोबड़ा लहू लुहान कर दिया..!

उधर संजू के द्वारा फेंके जाने पर उस तरफ के तमन्चे वाला सीधा राइफल वाले के उपर गिरा था.., राइफल उसके हाथ से छूट कर दूर जा

गिरी और वो दोनो आपस में उलझकर ज़मीन पर जा गिरे…!

एक 15-16 साल के लड़के से इतने की उम्मीद उनमें से किसी को नही थी लेकिन जब उसने सारा ही पासा पलट दिया तो उसकी तरफ खड़े लोहे की रोड वाले ने संजू के उपर रोड से बार किया.., जिसे उसने एक ही हाथ से रोक लिया.,

एक तेज झटके के साथ रोड ललित के हाथ में थी.., जिसे उसने उस आदमी के पेट में भोंक दिया.., लोहे की 3-4सेमी की रोड उसके पेट को चीरती हुई पीठ से बाहर निकल गयी..,

वो बुरी तरह से डकार मारते हुए वहीं पीछे की तरफ जा गिरा.., बस एक पल के लिए उसका जिस्म ज़मीन पर तडपा और फिर शांत हो गया…!

अब ललित की तरफ कोई नही था.., एक को मे मारते मारते बेहोशी की हालत में पहुँचा चुका था.., तभी मेरी तरफ वाले जिसके हाथ में एक

और रोड थी उसने अपनी रोड का भरपूर बार मेरी पीठ पर किया जब में उस आदमी को पीट ही रहा था…!

तभी संजू की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी.., वकील भैया.. बचो.., सेकेंड के सौवे हिस्से में ही मे उस आदमी के उपर से दूसरी साइड को पलट गया…!

[
 
रोड का भरपूर वार उस मेरे नीचे पिट रहे आदमी के सिर पर पड़ा और उसकी खोपड़ी खुल गयी.., अगर मे एक माइक्रो सेकेंड भी देर करता तो वो रोड मेरी रीड की हड्डी के कयि टुकड़े कर चुकी होती…!

देखते देखते दो बदमाश ईश्वरपुरी को जा चुके थे.., वो दोनो जो आपस में उलझकर ज़मीन पर जा गिरे थे अब उठ चुके थे.., सामने अपने दो दो आदमियों की लाश देख कर उनके हौसले पस्त होते दिखे..!

फिर भी उन्होने एक साथ मेरे उपर छलान्ग लगाने की कोशिश की.., इससे पहले कि वो दोनो मेरे उपर आकर गिरते.., गाड़ी के दूसरी तरफ से ललित का जिस्म हवा में कालाबाज़ियाँ ख़ाता हुआ मेरे सामने अपने पैरों पर खड़ा दिखा…!

और उसने उन दोनो को गले से हवा में ही लपक लिया.., तभी उस रॉड वाले ने एक और वार लोहे की रॉड को घूमाते हुए मेरे उपर करना चाहा जो ललित की विपरीत दिशा में मेरे पास ही था…!

तभी दो काम एक साथ हुए.., एक- ललित ने फ़ौरन उन दोनो को हवा में उछाल्ते हुए दूर फेंका और खुद मुझे अपनी जगह से धक्का देते हुए

मेरी जगह पर आगया…!

मुझे तो कोई ज़्यादा आश्चर्य नही हुआ लेकिन उन तीनों बदमाशों के ख़ौफ़ से मूह खुले के खुले रह गये ये देख कर कि रॉड के भरपूर वार से ललित का शरीर एक इंच भी अपनी जगह से नही हिला.., उल्टा वो 10-12एमएम मोटी लोहे की रोड ललित के शरीर से टकराने के बाद बॅंड

हो गयी.., उसे ऐसा लगा कि मानो उसकी रोड किसी इंसानी जिश्म से ना टकराकर किसी लोहे की दीवार पर पड़ी हो…,

झटका सहन ना होने के कारण वो रॉड उस बदमाश के हाथों से छिटक कर ज़मीन पर जा गिरी…!

अभी वो अपने होश ठिकाने भी नही कर पाया था कि ललित ने उसके दोनो बाजुओं को पकड़कर उसे गोल-गोल घुमाया और पूरे वेग से उसे

अपने से दूर उछाल दिया..,

वो हवा में गोल-गोल कालाबाज़ियाँ ख़ाता हुआ रोड से दूर खड़े पेड़ों में से एक मोटे से तने वाले पेड़ से जा टकराया.., और फिर कभी ना उठने के लिए एक लंबी सी चीख मारकर वहीं ज़मीन पर ढेर हो गया……!

उन दो बचे हुए बदमाशों के सामने ललित के रूप में, हाड़ मास का लड़का ना होकर कोई रोबाटिक लड़का खड़ा हो..,

वो दोनो जैसे तैसे अपनी जगह से खड़े हुए और फिर सिर पर पैर रख कर जंगल की दिशा को दौड़ लिए.., मानो उनके पीछे भूतों की फौज पड़ी हो..,

ललित ने उनके पीछे लपकना चाहा तो मेने फ़ौरन उसकी कलाई थाम ली और अपना सिर ना में हिलाकर उन्हें जिंदा निकल जाने दिया…!

मेरी तरफ देख कर ललित के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गयी.., आँखें अभी भी उसकी शोलों की तरह दहक रहीं थी.., मेने उसे अपने गले से लगाया और उसके सिर पर प्यार भरा हाथ फिराया..!

उसने भी मुझे अपने आप में कस लिया…, ललित का शरीर मेरी बाहों में एक पल के लिए अकडा, उसके मूह से एक हिचकी सी निकली और इसके साथ ही उसका शरीर ढीला पड़ता चला गया…!

मेने उसे सहारा देकर गाड़ी में बिठाया.., अपनी सीट पर आकर मेने गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी और पीछे छोड़ दी तीन मानव लाशें,

जो खम्खा अपने नीच कर्मों के कारण ललित रूपी संजू के हाथों अपनी जान गँवा बैठे थे.........!!!!
 
Samne road par ek 120 deg ka mod tha.., dono taraf ghane lambe aur unche ped khade they.., mod lete hi achanak se hamein bade-bade patthar road par pade dikhayi diye…!

Samay rahte mene gaadi ko brake lagaye.., imported gaadi tyron ki charmarahat ke sath patthron se theek pahle ruk gayi..,

Mujhe brake imergency mein lagaane pade they.., gaadi ke top gear mein hone ke karan engine apne aap band ho gaya..,

abhi hum iss achanak se aayi mushibat ko theek se samajh hi rahe they ki pedon aur jhadiyon se nikal kar 4-5 log muh par kapda bandhe hamaari gaadi ki taraf lapke…!

Unmein se ek ke hath mein 315 bore rifle thi.., ek-do par desi tamanche to do lohe ki rod liye huye they…, inka saf irada tha.., rahgeeron ko lootna…!

Mere saamne unke aage surrender karne ke aur koi chara nahi tha.., kyonki gaadi ke khade hote hi jinnon ki tarah prakat hokar un logon ne gaadi ko dono taraf se gher liya…!

Gaadi modkar vapas bhi nahi le jaa sakta tha.., back jaane mein khatra ye tha ki wo saamne se goli chala sakte they…!

Unmein se rifle waale ne meri side mein khade hokar mujhe gaadi se bahar aane ki hidayat di.., unki baat manane ke alawa mere pass aur koi chara bhi nahi bacha tha..,

Dusri taraf se ek tamanche waale ne lalit ko bhi bahar aane ke liye ishara kiya.., wo uske ek baar kahne par bahar nahi aaya to usne use dhamkaate huye kaha –

Oye piddi tere liye court se order lane padenge kya bahar aane ke liye.., chal madarchod bahar aa varna yahin thok doonga bhenchod…, jaldi kar.

Tab tak dusra tamanche wala jo rifle waale ke sath hi meri taraf khada tha.., usase us rifle waale ne kaha – iski jeb khali kar.., aur tu ye apne gale ki chain aur ghadi bhi nikaal fatafat…!

Wo tamanche wala ek hath mein tamacha pakde dusre hath se meri jebein khali karne laga.., jismein mera wallet rakha hua tha.., mene usase kaha – bhai jo bhi lena hai le lo.., bas mere card mujhe vapas kardo…!

Kyon.. bhenchod mere launde ki barat mein aaya hai kya bhosdi ke.., chal ek kagaj par apne cards ke detail likh.., varna yahi tapka doonga saale…!

Tabhi dusri taraf mamla ulat hota dikhayi dene laga.., jab ek do baar ki chetawani ke baad bhi lalit bahar aane ko taiyar nahi hua to uski taraf waale ek badmash ne gaadi ka Darwaja khola..,

aur lalit ke girebaan ko pakadkar use jabardusti gaadi se bahar kheenchne laga…!

Mene use samjhate huye kaha – uske pass kuchh bhi nahi hai.., tum khamkha uss ladke ko kyon pareshan kar rahe ho..,

Rifle wala abhi bhi kuchh duri banakar mujhe nishane par liye khada tha.., meri baat sunkar uss tamanche waale ne mera wallet apni jeb mein daala aur ek tamacha mere gaal par jadte huye kaha…!

Bhenchod ek baar mein samajh nahi aata kya tujhe.., udhar dhyan dene ki bajay tu apna kaam kar.., chal jaldi se apne card ke password bata…, varna teri aankhon ke saamne uss ladke ko thok dega wo…!

Tabhi wo hua jiski mujhe bhi ummid nahi thi.., na jaane kab Sanju ki aatma Lalit mein sama gayi.., usne gaadi se bahar aate hi jhatke se uska tamancha uske hath se chheena..,

Palak jhapkte hi tamanche ka bhari dusta uski kanpati par bhi de maara…, wo cheekh bhi nahi paaya ki usne uske sharir ko hawa mein uthakar uss rifle waale ke upar hi uchhal diya…!

Rifle uske hath se door jaa giri.., mauka dekh kar mene ek naara lagaya.., jai ho sanju pyare.. kahte huye uss apni taraf waale par jump laga di…!

Jump ke sath hi uska tamancha mere hath mein tha.., jise mene uske sir par de maara.., me uske seene par sawar ho chuka tha.. isase pahle ki wo kuchh karta, do baar ke tamanche ki mooth ke prahar ne uska thobda lahu luhaan kar diya..!

/size]
 
Back
Top