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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) पार्ट -2

रूचि अब जवानी की दहलीज पर कदम रख चुक्की थी…, घर में किसी चीज़ की कमी नही थी…, हमारे परिवार में रामा दीदी के बाद वो ही इकलौती लड़की थी.., सभी उसे बेहद प्यार करते थे..!

बचपन से ही वो मेरे बहुत ही करीब थी.., मेरी गोद में खेलना…, गाँव में भी स्कूल का कोई काम होता तो भाभी

मुझे ही भेजती.., उसको किसी भी चीज़ की ज़रूरत होती बस मेरी गोद में आकर बैठ जाती…!

फिर मेरी चिन को पकड़ कर जब अपनी डिमॅंड रखती… तो उसके भोलेपन को देखकर मुझे उसकी हर डिमॅंड पूरी करनी पड़ती….!

भाभी काई बार बोल भी चुकी थी…, लल्ला इसे इतना सिर मत चढ़ो वरना बिगड़ जाएगी.., अब ये बड़ी हो रही है.., कब तक इसकी डिमॅंड पूरी करते रहोगे…?

मे गोद में लिए हुए ही भाभी को अपनी तरफ खींचकर उनके गान्ड के उभारों को सहलाते हुए कहता – अभी हमारी बिटिया छोटी ही तो है.., जब बड़ी होकर शादी करके अपने घर चली जाएगी तो किसको प्यार करेंगे…?

भाभी बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहती – बिगाड़ो इसे खूब बिगाड़ो, देखना एक दिन पछ्ताओगे…,

मे हॅस्कर रूचि की आँखों पर हाथ रख देता और भाभी के होठों पर चुंबन जड़ देता…, कभी कभी वो रूचि को भी डाँट देती.., लेकिन मे उनके सामने रूचि को मना कर देता…!

लेकिन उनके वहाँ से चले जाने के बाद रूचि को उसका मनपसंद चोकोबार थमाकर उसके मुलायम गाल पर एक किस कर देता…!

रूचि भोलेपन से जबाब देती – चाचू आप मुझे मम्मी से कम प्यार करते हैं.., मेरे होठों पर उंगली रख कर कहती.., उनको तो यहाँ पर क़िस्सी की आपने और मेरे गाल पर ही क्यों…?

उसकी बात पर मे सकपका जाता.. और बहाना बनाते हुए कहता – बेटा यहाँ की क़िस्सी सिर्फ़ बड़ों के लिए होती है.., आप तो अभी छोटी ही हो ना…, फिर वो ना समझते हुए भी हामी भर देती….!

शहर आने के बाद भी मे जब भी घर में घुसता उसके लिए कुच्छ ना कुच्छ लाता ही था…, सारी सुख सूबिधाओं में पली बढ़ी रूचि के शरीर का विकास भी समय से पहले ही होने लगा था…!

अब जब वो 12थ में पढ़ रही थी तब तक उसके शरीर का पूर्ण विकास हो चुका था…, रूचि अब अपनी मा से भी बढ़कर लगने लगी थी जब वो शादी होकर हमारे घर आई थी…!

सुन्दर गोल-मटोल चेहरा.., सुतवान नाक, कजरारी बड़ी बड़ी आँखें, लंबे बाल.., लंबी सुराइदार गर्दन.., 32-26-32 का शानदार कमसिन फिगर हाइट अभी से वो 5’7” थी…!

जब वो मुझे घर में कसरत करते देखती थी तभी से मेरे साथ साथ कुच्छ ना कुच्छ उच्छल कूद करती रहती…, शहर आकर मेने अपनी कोठी में छोटा सा जिम भी खोल रखा था.. जिसमें जिसकी मर्ज़ी होती अपने हिसाब से एक्सर्साइज़ कर लेता था…!

शहर आकर स्कूल में गर्ल्स स्पोर्ट्स होते थे.. कुच्छ ही दिनो बाद रूचि ने भी एक के बाद एक सभी आउटडोर-इनडोर स्पोर्ट्स में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, जल्दी ही वो टेबल टेन्निस की एक अच्छी खिलाड़ी बन गयी…!

ज़्यादातर तो जब में जिम जाता उस समय तक रूचि स्कूल चली जाती थी.., लेकिन हॉलिडे वाले दिन वो मेरे साथ ही जिम करती.., मे भी उसे अपनी तरह से टिप्स देता था.., लेकिन अब कुच्छ दिनो से सब कुच्छ उल्टा होने लगा…!

 
जब से रूचि के हाथ स्मार्ट फोन लगा साथ में अनलिमिटेड नेट प्लान भी.., वो नेट से सारी चीज़ें देख कर उसी हिसाब से करने लगी.., यहाँ तक कि अब वो मुझे भी बताने लगी कि मे अब तक क्या ग़लत कर रहा था…!

लड़की जब बड़ी होने लगती है.., और जब उसे अपने शरीर में बदलाव दिखने लगते हैं तो उसे खुद के ही बदलाव अजीब लगने लगते हैं और वो उनकी तरफ आकर्षित होने लगती है..,

उन्हें छूकर देखती है.., सहलाती है.., और फिर उसी कच्ची उमर में जो भी मर्द उसके सबसे करीब होता है उसका झुकाव उसकी तरफ होने लगता है.., भले ही वो रिस्ते में कोई भी क्यों ना हो…!

रूचि मेरे शुरू से ही बहुत करीब थी.., मे उसे सारे घर में सबसे ज़्यादा प्यार करता था.., वो 7-8थ स्ट्ड. तक मेरी गोद में आकर बैठ जाती थी, मेरे गले में झूल जाती थी जबकि उस समय तक भी उसके नाज़ुक अंग दिखना शुरू हो गये थे…!

एक्सर्साइज़ करते हुए या फिर जिम में टिप्स देते समय हमारे शरीर आपस में खूब टच होते.. लेकिन इन सब के बावजूद कभी भी मेरे मन में उसके प्रति ग़लत भाबना नही आई…,

जब से भाभी और रूचि के साथ वो किडनप वाला हादसा हुआ था उसके बाद से रूच कुच्छ ज़्यादा ही डरी सहमी सी रहने लगी थी…,

उसका ये डर निकालने के लिए मे उसे एक्सर्साइज़ के साथ साथ अपने सेल्फ़ डिफेन्स के लिए कुच्छ फाइटिंग टिप्स भी देने लगा जिन्हें वो दिल लगा कर सीखने लगी..,

लेकिन दाँव पेंच सीखने के दौरान जब में उसके शरीर के किसी हिस्से को पकड़कर सामने वाले को किस तरह से मात देना है वो सिखाता था तो जाने अंजाने में मेरे हाथ उसके विकसित हो रहे उभारों से भी टच हो जाते थे…,

क्षण भर के लिए ही सही.., मेरा शरीर उत्तेजित हो उठता.., फिर जब कभी कभार में उसके पीछे आकर उसकी कमर में हाथ डालकर सिखाता तो उसके गोल-गोल उभरे हुए नितंब मेरे लंड को दबा देते जिससे च्द्भार के लिए मेरे अंदर भी एक अजीब सी हलचल होने लगती थी…

मे जब रूचि की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी तरफ ध्यान देता तो वो मुझे नॉर्मल ही दिखाई देती.., और मुझे बड़ी राहत सी महसूस होने लगती की चलो इन सबसे उसपर कोई नेगेटिव एफेक्ट नही हो रहा…………………….!

रूचि के स्कूल की संस्था का डिग्री कॉलेज भी है जो उसके साथ ही लगा हुआ है, बस बिल्डिंग ही सेपरेट है…! जब भी कोई स्पोर्ट्स या वार्षिक फंक्षन होता है तो स्कूल और कॉलेज दोनो के स्टूडेंट्स मिलकर एंजाय करते हैं…!

रूचि की सुंदरता पर उसके अपने स्कूल के लड़के ही नही.., कॉलेज में ग्रॅजुयेशन कर रहे लड़के भी उसकी तरफ आकर्षित थे.., और जैसा की कुच्छ मनचले लड़कों का ग्रूप भी हरेक स्कूल या कॉलेज में होता ही है जो निकलते करते लड़कियों को छेड़ना उनपर छींटा कसी करना ये सब ट्रेंड सा बन गया है…!

लोग कितने ही विमन एमपवरमेंट की बात करें, लेकिन सच्चाई यही है कि अब भी ज़्यादातर लोग गर्ल्स ओर विमन को मनोरंजन की चीज़ ही समझते हैं…!

एक दिन टीटी की प्रॅक्टीस के बाद जब रूचि चेंजिंग रूम में चेंज कर रही थी की तभी वहाँ कॉलेज का एक लड़का जिसका नाम विक्की था वो ना जाने कब से रूचि की कमसिन चड़ती लावनी पर अपनी गिद्ध दृष्टि लगाए हुए था और गाहे बगाए वो उसको लेकर कॉमेंट्स भी पास कर देता था, मौका देखकर अपने एक खास चम्चे के साथ चेंजिंग रूम में घुस आया…!

बड़े बाप की बिगड़ी औलाद जिसके लिए हर लड़की या औरत सिर्फ़ भोग विलास की वास्चू थी.., कुच्छ देर वो छुप्कर रूचि को कपड़े चेंज करते हुए देखता रहा…,

रूचि ने अपनी काली लेंग्री के उपर स्कूल की स्कर्ट पहन ली, और फिर उसने स्पोर्ट्स टीशर्ट उतार दी… उसके गोरे संगेमरमरी बदन पर काली ब्रा और उसके अंदर क़ैद उसके 32 साइज़ के कसे हुए बूब्स जो ब्रा की साइड से निकले पड़ रहे थे उन्हें देखकर वो दोनो लड़के साँस लेना ही भूल गये…!

फिर जैसे ही रूचि ने अपनी स्कूल यूनिफॉर्म की सफेद शर्ट हॅंगर से उतारकर पहनने ही जा रही थी कि तभी विक्की ने पीछे से उसे अपनी बाहों में भर लिया…!

दूसरा लड़का चौकीदारी करने के लिए बाहर ही खड़ा रहा…!

विक्की एक 6 फूटा जवान था.., उसकी मजबूत बाहूं के घेरे में रूचि किसी शिकारी के पंजे में क़ैद कबुतरि की तरह फडफडा कर रह गयी…!

पहले तो उसने कसमसा कर अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन जब वो सफल नही हुई तो वो उसे छोड़ने के लिए मिन्नतें करने लगी, गिडगिडाने लगी…,

 
लेकिन विक्की जैसे हवस के अंधे बिगड़े बाप की औलाद पर किसी लड़की की मिन्नतों का क्या असर होने वाला था…!

उसने रूचि को अपनी मजबूत बाहों में और ज़ोर्से कस लिया और उसके मुलायम सुर्ख गाल पर अपनी दाढ़ी को रगड़ने लगा.., दाढ़ी के बालों की रगड़ से रूचि का गोरा गाल लाल सुर्ख हो गया…!

रूचि को पक्का यकीन हो गया कि अब वो इस तरह से ई नीच के चंगुल से नही छूट पाएगी.., इधर एक जवान कुँवारी कमसिन लड़की के मादक बदन की गर्मी पाकर विक्की की हवस और बढ़ने लगी..,

उसने अपने हाथों को उसकी पतली सी कमर से ढीला छोड़कर अपने हाथों को रूचि के कोमल मक्खन जैसे कच्चे अनारों पर जमा दिया और उन्हें ज़ोर्से से मसल डाला…!

रूचि के वक्षों पर पहली बार किसी मर्द के हाथ पड़े थे.., वो भी इतनी ज़ोर्से किसी ने उन्हें पहली बार मसला था.., दर्द की एक तेज लहर उसके सीने में दौड़ गयी…!

लेकिन अपनी चुचियों के दर्द की परवाह किए बिना उसने मौके का . उठाया, अपने को विक्की के बदन से थोड़ा दूर किया.., और पूरी ताक़त से अपनी टाँग पीछे की तरफ घुमा दी…!

उसकी मोटी जाँघ विक्की की दोनो टाँगों के बीच से होती हुई उसका उपरी सिरा ज़ोर्से उसके गुप्ताँग से टकराया…, अपने आंडों में उसे इतनी जोर्का दर्द उठा की उसने रूचि की चुचियों को छोड़कर अपने आंडों को पकड़कर, अपनी दोनो टाँगें जोड़कर दर्द से बिल-बीलाता हुआ ज़मीन पर बैठता चला गया….!

बाहर खड़े उसके चंचे ने जब ये मंज़र अपनी आँखों से देखा तो वो दौड़ता हुआ कमरे के अंदर आया और उसने रूचि को सामने से दबोचना चाहा…!

लेकिन उसकी गिरफ़्त में आने से पहले ही रूचि ने अपना बाजू मॉड्कर अपनी एल्बो को घूमा कर उसकी नाक पर दे मारा..,

चोट एकदम सही जगह पर पड़ी और वो लड़का अपनी नाक को दोनो हाथों से दबाता हुआ पीच्चे को उलट गया.., उसकी नाक से खून बहने लगा था…!

रूचि तबतक अपनी शर्ट को अपनी दोनो बाजुओं में डाल चुकी थी, तभी विक्की भी अपने आपको संभाल चुका था…, और गालियाँ बकता हुआ फिरसे रूचि की तरफ झपटा…!

रूचि ने शर्ट के बटन बंद करने का विचार त्याग दिया और पूरी तरह से उससे दो-दो हाथ करने को तैयार हो गयी.., झपट कर उसने अपना टीटी का रॅकेट नेट की तरफ से पकड़कर उठाया और जबतक विक्की उसके पास पहुँचता..,

रूचि का रॅकेट वाला हाथ हवा में घूमा और भड़ाक से रॅकेट का मजबूत कठोर हॅंडल वाला सिरा उसकी कनपटी से जा टकराया…!

वार इतना भरपूर था.., विक्की ये चोट सहन नही कर सका और त्यौराकर कमरे के फर्श पर जा गिरा.., उसके गिरते ही रूचि के स्पोर्ट शू की भरपूर ठोकर उसकी पसलियों पर पड़ी…, जिसके पड़ते ही वो अपनी रही सही शक्ति भी गँवा बैठा…!

रूचि ने फ़ौरन अपना स्कूल बॅग उठाया, कमरे से निकालने से पहले एक भरपूर किक उसके चम्चे को भी लगाई और बिना अपनी शर्ट के बटन लगाए ही लगभग दौड़ती हुई वो कमरे से बाहर निकल गयी….!

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संजू ने जैसे तैसे करवट बदल बदल कर वो रात गुजारी.., सुबह होते ही वो खेतों की तरफ निकल गया.., क्योंकि वो सारे नित्यकर्म शौच आदि खेतों पर ही जाकर करता था.., फिर ट्यूब वेल से नहा धोकर ही घर आकर नाश्ता पानी करता फिर कुच्छ देर जानवरों को चारा पानी देकर फिरसे खेतों में निकल जाता था…!

लेकिन आज नित्यकर्म के बाद भी वो घर नही लौटा.., उसका मन रात वाले सपने में ही उलझा हुआ था.., उसे शकीला से मिलने की बहुत जल्दी थी सो बिना नहाए धोए ही वो नहर की तरफ चल दिया….!

वो ये बात अच्छी तरह से जानता था कि बकरियों को चराने सुबह ही सुबह कोई नही आएगा, ये काम दिन के दूसरे पहर में ही होता है घर के सारे काम काज निपटाने के बाद…, लेकिन वो इस मन का क्या करे जिसकी सुई सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही जगह अटकी हुई थी…!

कुच्छ देर तक वो नहर की पटरियों पर इधर से उधर चक्कर लगाता रहा, नज़र हर समय वहीदा के गाँव की तरफ ही टिकी हुई थी, शायद कोई इधर को आए…, अब आए.., ऐसे ही दो घंटे गुजर गये लेकिन ना बाबा आया ना घंटा बजा वाली बात हो गयी…!

धूप तेज होती जा रही थी, और अब उसे भूख भी लगने लगी थी, सो मन मारकर वो वहाँ से ट्यूब वेल पर लौट आया और नहा धोकर गाँव की तरफ चल दिया…!

चाचा स्कूल जा चुके थे.., चाची ने संजू का इंतेजार करते करते जानवरों को चारा पानी भी डाल दिया था…, संजू के घर में घुसते ही उन्होने यही सवाल उससे किया.., जिसका उसने माकूल सा बहाना बना दिया…!

खा-पीकर वो फिरसे खेतों की तरफ चल दिया.., तबतक दिन काफ़ी चढ़ आया था.., दोपहर होने लगी थी..,

कुच्छ देर वो ट्यूब वेल के कमरे में पड़ी चारपाई पर पड़ा शकीला के बारे में ही सोचता रहा.., रह रहकर उसका वो मासूम भोला चेहरा, हिरनी जैसी चंचल आँखें उसके जेहन में घूम जाती थी.

जब उससे रहा नही गया तो वो फिरसे मे- जून की भरी दोपहरी में उसके गाँव की तरफ चल दिया…!

कुच्छ देर संजू नहर पर एक पेड़ की छाँव में बैठा उसके गाँव की तरफ देखता रहा…, सोचता रहा जाउ की नही जाउ…, वैसे कल वहीदा ने तो अपना घर दिखा ही दिया है तो जाने में कोई दिक्कत भी नही…, सो पक्का इरादा करके वो वहाँ से उसके घर की तरफ चल दिया…!

गाँव के बाहर पहुँच कर वहीदा के बताए घर को वो देखने लगा, ये एक बहुत ही साधारण सा गाँव के ग़रीब लोग जैसे रहते हैं वैसा ही घर था..,

कच्ची मिट्टी की दीवार लगभग 10 फीट उँची उठा कर पार्कोटा बनाया गया था, जिसके सामने की दीवार के बीचो बीच एक जर्जर सा झिर्रिदार किवाड़ का दरवाजा था…,

पार्कोटे के पीछे की तरफ एक या दो कमरे से थे, जिनकी दीवार तो एंटों की थी लेकिन उनपर प्लास्टर नही था.., और शायद उनकी छत कच्ची मिट्टी की ही थी.., दोनो कमरों के सामने घस्स फूंस का छप्पर पड़ा हुआ था…!

घर की हालत से संजू ने अंदाज़ा लगा लिया कि अगर ये वाक्यी वहीदा का ही घर है तो ये लोग सच में कुरबत की जिंदगी जी रहे हैं…!

कुच्छ देर तक संजू उसके उस जर्जर दरवाजे के सामने खड़ा रहा, इश्स आशा में की शायद कोई आदमी या औरत उसे दिखाई दे जिससे वो वहीदा के बारे में कन्फर्म कर सके की वो यही घर है या नही…!

लेकिन मे-जून की दोफ़री में गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था, गर्मी की तपीस से बचने के लिए सभी लोग अपने अपने घरों में डुबके पड़े थे..,

तक कर उसने उसी दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला.., सौभाग्य से वो अंदर को छररर…मररर..करता हुआ खुलता चला गया…!

संजू ने जैसे ही अंदर कदम रखा.., एक साइड को एक बादे जैसे में बंद सारी बकरियाँ मिमिया कर उठ बैठी…!

अंदर काफ़ी जगह थी लेकिन कुच्छ बना हुआ नही था.., किवाड़ की छर्राहट और बकरियों की मिमियाने की आवाज़ सुनकर किसी औरत की आवाज़ आई…!

अरी शकीला ज़रा देख तो कॉन है बाहर…, कुच्छ देर बाद एक सुरीली सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी…, जी अम्मी अभी देखती हूँ…!

 
फिर कुच्छ देर बाद छप्पर से बाहर झाँकती हुई शकीला उसे नज़र आ गयी…, संजू ने राहत की साँस ली.., कि चलो भाग्यबस सही घर में ही आ गया हूँ…!

संजू को देखते ही शकीला के चेहरे की रौनक एकदम से बदल गयी.., वो अभी कुच्छ बोलना ही चाह रही थी कि तभी संजू ने दूर से ही अपनी उंगली होठों पर रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया…!

शकीला ने भी वहीं से अपना हाथ नचाकर पुच्छने वाले अंदाज में इशारा किया… क्यों चुप रहूं…?

संजू तेज़ी से उसके पास जा पहुँचा और छप्पर की छान्व में शकीला का हाथ पकड़कर एक कोने में ले गया जहाँ से किसी भी तरह की आवाज़ कमरों के अंदर तक ना पहुँच पाए…!

संजू ठीक उसके बगल में खड़ा था, उसके कान के पास अपना मूह करके धीरे से बोला – वहीदा बेहन हैं घर पर…?

शकीला ने भी फुसफुसाती आवाज़ में कहा – हां…हैं.., लेकिन ऐसे कानाफुसी करके क्यों पूछ रहे हो…?

इस समय संजू का मूह उसके सुर्ख गोरे गाल के इतना करीब था कि उसके नथुनो की गरम-गरम हवा उसके सुंदर चेहरे पर पड़ रही थी.., मर्दानी जिस्म की खुश्बू अपने जिस्म के इतने करीब से महसूस करके शकीला के बदन में एक अजीब सी फीलिंग…कुच्छ डर…कुच्छ उत्तेजना… जैसी दौड़ने लगी…! उसके होंठ खुसक होने लगे थे..,

संजू ने उसके और नज़दीक खिसकते हुए कहा – और कॉन कॉन हैं घर पर…?

संजू का मूह उसके गाल के इतना करीब था कि अगर वो अपनी ज़ुबान बाहर निकालकर चाटना चाहे तो चाट सकता था..,

शकीला इस समय उसकी एक-एक साँस को गिन सकती थी.., अपने इतने करीब संजू को पाकर उसकी साँसें भी तेज तेज चलने लगी.., बड़ी मुश्किल से अपने होठों को तार करके वो बोली – अम्मी अब्बू भी हैं उधर वाले कोठे में, इधर वाले कोठे में भाभी सो रही हैं…!

शकीला की हालत से संजू भी अन्भिग्य नही था.., वो समझ चुका था की ये मुझे अपने इतने करीब पाकर नर्वस हो रही है.., संजू ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर उसके दूसरे कंधे पर रखा और उसका सुंदर मुखड़ा अपनी तरफ करके बोला – और तुम कहाँ थीं..?

उसने काँपते होठों से अपनी नज़र नीची रखते हुए छप्पर में एक साइड को पड़ी चारपाई की तरफ इशारा कर दिया….!

संजू ने उसके चाँद से मुखड़े को जो अब थोड़ा उत्तेजना बस लाल भी हो गया था अपने हाथों में लेकर उसकी झील सी गहरी आँखों में झाँकते हुए कहा… तुम्हें मुझसे डर लग रहा है शायद…?

शकीला के मूह से कोई बोल नही फूटा.., उसने अपनी नज़रें झुका कर बड़ी मुश्किल से ना में अपनी गर्दन हिला दी…!

संजू – तो फिर इतना काँप क्यों रही हो…?

शकीला ने संजू की कलाईिओं को पकड़ते हुए कहा – ह.हा..हमें नही पता…च.च..छोड़िए हमें.., मे भाभी को जगा देती हूँ…!

संजू का मन तो कर रहा था कि इसके रसीले पतले-पतले सुर्ख होठों का रस पिया जाए.., लेकिन पहली मुलाकात है, कहीं लौंडिया अगर बिदक गयी तो खेल शुरू होने से पहले ही बिगड़ जाएगा…!

सो उसने अपने हाथ हटाते हुए कहा – नही.. तुम रहने दो.., मे खुद ही जाकर उन्हें सर्प्राइज़ देता हूँ…!

इतना कहकर वो उस कमरे की तरफ बढ़ गया जिसमें वहीदा सोई हुई थी.., दरवाजा बस ढालका हुआ ही था.., सो उसके हाथ रखते ही खुल गया.., कोठे के अंदर, बाहर की तुलना में कुच्छ अंधेरा सा था…!

लेकिन जैसे ही उसने कमरे के अंदर कदम रखा.., और जब उसकी आँखें कमरे के अंदर की रोशनी में देखने लायक हुई.., सामने ज़मीन पर बिस्तेर लगाए बेसूध सोई पड़ी वहीदा को देख कर उसका मूह खुला का खुला रह गया….!!!

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वहीदा कमरे के कच्चे फर्श पर बिस्तर लगाए औंधे मूह पड़ी थी.., ढीले ढाले कुर्ते के नीचे एक पुराना सा पेटिकोट पहने वो भी उसकी मोटी मोटी खंबे जैसी जांघों तक चढ़ा हुआ…!

उपर का कुर्ता भी पीठ तक चढ़ा हुआ था.., शायद गर्मी के कारण उसने खुद ही उपर कर लिया होगा..!

दोनो टाँगों को चौड़ाए खंबे जैसी चिकनी गोरी जांघों के उपर उसके पहाड़ की चोटियों जैसे दोनो चूतड़…, देखते ही संजू का लंड तुनकने लगा…!

चोद तो वो उसे पहले भी चुका था.., पूरी रांड़ थी साली.., लेकिन कुच्छ अच्छे खाने की चाह में कभी कभार खराब खाना भी टेस्ट करना पड़ जाता है..,

और संजू ये भली भाँति जानता था कि अगर शकीला जैसी कमसिन काली को भोगना है तो उसका रास्ता इसी भोस्डे से होकर ही गुजरेगा….!

उसने एक बार पीछे मुड़कर खुले हुए दरवाजे को देखा…, कहीं शकीला उसके पीछे पीछे अंदर तो नही आ रही है…,

लेकिन वो शायद फिरसे अपनी छप्पर में पड़ी चारपाई पर लेट गयी थी…,

संजू चुप चाप घुटने मोड़ कर उसके बगल में बैठ गया…, अपने लंड को पूचकार कर उसने अपना एक हाथ धीरे से वहीदा के एक पर्वत शिखर पर रख दिया….!

वहीदा के ख़र्राटों में कोई कमी नही आई.., उसने धीरे से उसके गान्ड के उभार को पंजे में भरकर मसल दिया.., वहीदा के बदन में हल्की सी हलचल हुई…!

संजू ने अपना हाथ हटा लिया.., और उसके जागने का इंतजार करने लगा.., लेकिन वो जब नही उठी तो उसने फिरसे अपना एक हाथ दूसरे उभार पर रखा और उसे और ज़ोर्से मसला..,

वहीदा की गान्ड में हल्का सा कंपन हुआ.., थल्थलाकर उसकी गान्ड के उभार इस तरह से हिले मानो समंदर में लहरें उठी हों…, और जल्दी ही शांत भी हो गयी…!

उसने उसी हाथ को उसकी चौड़ी पीठ की तरफ बढ़ाया.., थोड़ा कुर्ता उपर और उठा.., लेकिन ढीला ढाला होने की बजह से उसके हाथ को उपर तक जाने में कोई अड़चन नही आई..,

संजू ये जानकार हैरान हो गया कि साली ने ब्रा भी नही पहनी थी…, कुच्छ देर वो उसकी पूरी पीठ पर हाथ फिराता रहा.., मादा बदन के स्पर्श से उसका लंड भी टाइट होने लगा…!

जब वहीदा फिर भी कुन्मुनाई तक नही तो फिर उसने खुला खेल फरक्खाबादी खेलने की ठान ली.., और उसके लहंगे को कमर तक उठाकर उसकी गान्ड को पूरी तरह से नंगा कर दिया…!

 
अब उसे ये देख कर कोई हैरानी नही हुई की उसने नीचे कच्छी भी नही पहनी थी.., शायद गर्मी इसका मुख्या कारण रहा होगा.., क्योंकि घर में कोई पंखा तो था नही.., लेकिन फर्श कच्चा था.., छत भी मिट्टी की थी, इसलिए गर्मी ज़्यादा नही थी कमरे के अंदर…!

गोरी गान्ड के भारी-भारी पाट जो उपर को कुच्छ ज़्यादा ही उठे हुए थे, देख कर संजू का लंड कच्छे के अंदर उच्छलने लगा.., उसने एक बार उसे अपने ही हाथ से मसलकर शांति बनाए रखने को कहा और अपने दोनो हाथ उसकी मक्खन जैसी गान्ड पर रख दिए…!

वो उन्हें उपर से नीचे को हिलाने लगा.., हिलती हुई गान्ड क्या जलवे बिखेर रही थी.., एक दो बार ऐसे ही गान्ड से खेलने के बाद संजू ने अपना एक हाथ उसकी गान्ड की चौड़ी सी दरार में डाल दिया…!

गान्ड की दरार में उंगली डालते ही संजू ने फील किया की वहीदा ने अपनी टाँगों को और खोल दिया है…,

वो मन ही मन बुद्बुदाया…, अच्छा तो साली सोने का नाटक कर रही है.., कोई ना.., करने दो हमें क्या…?

वो एक हाथ से उसकी मोटी गान्ड के उभार को दबाने लगा और दूसरे हाथ की उंगली को उसकी दरार में घुमाते हुए पहले उसकी गान्ड के छेद को सहलाया और फिर और नीचे की तरफ ले जाने लगा…!

जैसे जैसे उसका हाथ वहीदा की मालपुए जैसी मोटी चूत के करीब बढ़ रहा था वैसे वैसे उसकी जांघों के बीच का फासला भी बढ़ता जा रहा था…!

आख़िरकार संजू की दो उंगलियाँ वहीदा के ताजमहल के गेट पर पहुँच ही गयी.., जहाँ लग रहा था कि छिद्काव होने लगा है…!

संजू की उंगलियों को चूत के मुहाने पर गीलेपन का एहसास हुआ.., उसे समझते देर नही लगी कि ये साली रंडी सोने का बहाने बनाए हुए ही पूरा मज़ा ले रही है…!

उसने भी मज़ा लेने की गर्ज से ही अपनी दोनो उंगलियाँ उसकी मज़ार में पेबस्त कर दी.., जो कुच्छ तो गीलेपन की बजह से और कुच्छ उसका भोसड़ा था भी चौड़ा.., दोनो उंगलियाँ जड़ तक उसके कुए में गडप्प हो गयी…!

एक बार ज़ोर्से वहीदा की गान्ड हिली.., लेकिन उंगलियों के अंदर पहुँचते ही फिर थम गयी…, संजू ने जान बूझकर अपनी उंगलियाँ बाहर निकाल ली.., और अपने मूह में लेकर उन्हें चचोर्ता हुआ उठ खड़ा हुआ…!

 
धीमी आवाज़ में बुद-बुदाता हुआ – वहीदा बेहन गहरी नींद में है.., सोने दो उसे.., चलता हूँ, फिर कभी आउन्गा.., ऐसे कहते हुए वो वहाँ से जाने के लिए पलट गया….!

इससे पहले कि वो बाहर जाने के लिए अपने कदम बढ़ाता.., पीछे से वहीदा ने उसकी कलाई थाम ली..,

संजू ने पलटकर उसकी तरफ देखा..,

वहीदा अपनी चूत मसल्ते हुए बोली – अब इसकी ठुकाइ क्या तेरा बाप करेगा भडुये.., चूत की गहराई हाथ से नही.., ये तेरी टाँगों के बीच झूल रहा है इस मूसल से नापी जाती है चूत मारी के…!

संजू ने मुस्कराते हुए कहा – वो तो मुझे भी पता है मेरी जान, लेकिन तुम तो ऐसे मक्कड़ बनाए पड़ी थी.., मेने सोचा ऐसे नही जागेगी.. सो…

बहुत बड़ा वाला हरामी है तू मदर्चोद.., ये कहते हुए वहीदा ने संजू का पाजामा उसके कच्छे समेत नीचे सरका दिया…, और उसके लंड को मूह में लेकर चूसने लगी…!

संजू का लंड उसके मूह में पहुँच कर बल्ले-बल्ले करने लगा.., उसकी कमर स्वतः ही आगे पीछे होकर उसके मूह को चोदने लगी…!

आअहह…साली कुतिया…, दरवाजा खुला है.., तेरी वो छम्मकछल्लो आ गयी तो…, ? वहीदा के तेंटुए तक अपना मूसल पेलते हुए संजू बोला.

संजू की इस बात का वहीदा पर कोई असर नही हुआ.., लार से लिथड़ा हुआ उसका लंड उसने अपने मूह से बाहर निकाला और अपनी चक्ले जैसी गान्ड संजू के मूसल के आगे औंधी कर दी…

अब जल्दी से डाल इसमें और अपनी और मेरी दोनो की गर्मी शांत कर दे मेरे राज्जाअ…..,

संजू को भला क्या एतराज हो सकता था.., उसने अपना मूसल वहीदा की ओखली में सरका दिया और उसकी मक्खमली गान्ड पर थप्पड़ जड़ते हुए उसकी कुटाई करने लगा…!

एक बार पलटकर उसने दरवाजे की तरफ देखा.., उसे शकीला की दो आँखें नज़र आई.., जो जल्दी ही गायब हो गयी…, वो समझ गया कि हमारा ये खेल वो कमसिन लौंडिया भी देख रही है.., जो उसके लिए ही अच्छा है…

ये सोचकर वो और तेज तेज उसकी चुदाई करने लगा…,

वहीदा की मोटी गान्ड पर जब संजू के पहलवानी वाले जांघों के पाट टकराते तो एक ठप्प ठप्प जैसी मधुर धुन पैदा हो जाती जो कमरे के शांत वातावरण में संगीत उत्पन्न कर देती….!

एक बार पीछे से चोदने के बाद संजू दरवाजे की तरफ मूह करके बिस्तर पर लेट गया और वहीदा अपनी भारी भरकम गान्ड लेकर संजू के लौडे पर चढ़ गयी…,

 
शकीला छुप्कर उनकी चुदाई देख रही थी.., संजू का बलिष्ठ मोटे डंडे जैसा लंड वहीदा की रसीली चूत में किसी पिस्टन की तरह एक लयबद्ध तरीक़ा से अंदर बाहर हो रहा था..,

जिसे देख कर शायद शकीला भी अपने गुप्तांगों को मसले बिना नही रह पाई होगी…!

आख़िरकार संजू के झड़ते झड़ते वहीदा ने भी अपने हथियार डाल दिए और वो उसके उपर ही पसर गयी……!

अपनी साँसों को थमने की कोशिश करते हुए बोली – बहुत दमदार चुदाई करते हो तुम.., इतना मज़ा मुझे और किसी के साथ नही आता है…,

अच्छा हुआ तुम पड़ौस में ही आ गये…, अब प्लीज़ जल्दी जल्दी आकर चक्कर मार जाया करना…….!

संजू ने उसे अपने उपर से पलटे हुए कहा – हां ठीक है.., अच्छा एक बात बताओ.., ये बकरियाँ चराने तुम ही क्यों जाती हो.., तुम्हारी ननद क्या स्कूल जाती है…?

वहीदा – नही.. नही.. वो तो मे कल ऐसे ही चली गयी थी.., ज़्यादातर तो वोही जाती है.., फिर मुस्कराते हुए बोली- पर अब लगता है उसका उधर जाना ठीक नही है…

संजू ने एकदम चोन्क्ते हुए कहा – क्यों…, अब क्यों ठीक नही है…?

वहीदा ने उसके ढीले पढ़ते जा रहे लंड पर थप्पड़ मारते हुए कहा – इसकी बुरी नज़र जो पड़ गयी है उसकी कुँवारी मुनिया पर…ये कहकर वो हँसने लगी… है ना…?

संजू ने झेंप मिटाने की कोशिश करते हुए कहा… नही ऐसा कुच्छ नही है.., मेने तो बस ऐसे ही पुच्छ लिया था…!

वहीदा अपने लहंगे से संजू के लंड को साफ करते हुए बोली – फिर कोई बात नही..., वैसे अगर शाम को और चोदने का मन हो तो आज भी मे बकरियाँ लेकर उधर आउ..?

संजू समझ गया कि शकीला आज उधर आने वाली है.., इसलिए उठते हुए बोला…, नही अब आज के लिए इतना बहुत है.., और वैसे भी मुझे आज खेतों के लिए बीज़ लेने कस्बे में जाना है…,चलता हूँ… फिर मिलेंगे..

इतना कहकर उसने अपना पाजामा चढ़ाते हुए एक थप्पड़ वहीदा की मोटी गान्ड पर मारा और कमरे से बाहर निकल गया….!

बाहर आकर उसने इधर उधर नज़र दौड़ाई.., लेकिन शकीला उसे कहीं नज़र नही आई.. तो वो अपना सिर झटक कर उसके घर से निकल गया………..!!!!!!!!!!!

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