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Guest
मेने उसे अपने से अलग करके देखा.., उसकी आँखें बंद हो चुकी थी.., मेने आश्चर्य के साथ मंजरी की सास की तरफ देखा –
उसने मुझे हौसला देते हुए कहा – इसका डर बहुत अंदर तक बैठ गया है बेटा.., चिंता मत करो.., जल्दी ही फिरसे होश में आ जाएगी.., तुम बाहर जाकर दिशा मैदान होलो.., मे इसकी देखभाल रखूँगी…!
मे बेमन से झोंपड़ी से बाहर आगया.., मेरे पीछे पीच्चे मंजरी भी आगयि.., मुझे एक पानी से भरा लोटा पकड़ाते हुए बोली – जाओ बाबू यहीं खेतों में दिशा मैदान हो आओ…!
अब आप चिंता मत करो.., मेरी सास देशी नुश्कों की बहुत अच्छी जानकार हैं.., दूर दूर से लोग इनसे इलाज कराने आते हैं.., आपकी भतीजी अब एकदम सही हो जाएगी…!
मंजरी की बात से अब मे कुच्छ आस्वस्त होने लगा था.., लोटा हाथ में लेकर मे पास के खेतों में ही दिशा मैदान के लिए चल पड़ा.., ललित भी उस तालाब की तरफ जा चुका था…!
कल से हमने कुच्छ खाया पीआ भी नही था.., लेकिन फिर भी फ्रेश होना भी ज़रूरी था…, शौच करते समय मुझे रूचि के कहे हुए शब्द याद आगये…!
रूचि ने संजू के बारे में क्यों कहा…, क्या संजू भी इन बदमाशों की क़ैद में है..? क्या उसकी जान को कोई ख़तरा है..? कहीं ऐसा तो नही कि उसने ही रूचि को किसी तरह वहाँ से निकाला हो और खुद फिरसे उनके चंगुल में फँस गया हो…!
इन्ही सब विचारों के चलते मुझे लेटरीन भी नही आई.., किसी अनिष्ठ की आशंका ने मेरे दिमाग़ पर कब्जा कर लिया था…!
ना जाने कितनी देर में वहीं खेत में बैठा सोचता रहा.., फिर जब बैठे बैठे मेरे पैर अकड़ने लगे तो मे वहाँ से उठकर अपना पॅंट पहनते हुए मंजरी के घर की तरफ आने लगा…!
उसके घर के नज़दीक तक आते आते मुझे झोंपड़ी के अंदर से रूचि के सुबकने की आवाज़ सुनाई दी.. मे लपक कर उस झोंपड़ी की तरफ बढ़ा.., लेकिन तभी मंजरी ने मुझे रोक कर कहा…!
उससे अब अच्छे से होश आ चुका है.., थोड़ी देर रो लेने दो उसे.., मगज हल्का हो जाएगा.., तब तक आप हाथ मूह धो लो.., मे आपके लिए चाय का इंतेज़ां करती हूँ.., ये कहकर उसने वही बाजू में बाल्टी से पानी लाकर मेरे गंदे हाथ साफ करवाए एक लोटे में पानी लेकर मेने अपना मूह अंदर बाहर से सॉफ किया..!
तभी उसने अपनी कॉटन साड़ी का पल्लू मेरी तरफ कर दिया.., मेरी इतनी फिकर करते देख मेरा दिल मंजरी के लिए प्यार से उमड़ पड़ा.., उसके आँचल से अपने गीले हाथ पोन्छ्कर मेने उसे अपनी बाहों में समेट लिया और उसके पतले-पतले लेकिन खुश्क होठों पर एक चुंबन लेकर कहा…!
शायद भगवान ने मुझे तुम लोगों के पास आने के लिए ही प्रेरित किया होगा.., तभी तो मेरी गाड़ी का डीजल यहीं आकर ख़तम हुआ.., और तुम्हारी सास तो मेरे लिए फरिश्ता ही साबित हुई…!
मंजरी ने मेरी बाहों में कसमसाते हुए कहा – जब दिलों में मिलने की लौ लगी हो तो उपरवाला किसी भी तरह मिला ही देता है.., अब छोड़िए मुझे..और जाकर अपनी बिटिया को संभालिए.., मे वहीं आप लोगों के लिए चाइ बनाकर लाती हूँ…!
नेकदिल मंजरी इस समय मुझे दुनिया की तमाम औरतों से कहीं बढ़कर नज़र आ रही थी.., मेने उसे अपनी बाहों से आज़ाद करते हुए उसके चूतड़ के उभार को सहलाया..!
वो मुस्कराती हुई एक नीचे छप्पर वाली झोंपड़ी की तरफ बढ़ गयी.., जहाँ उसका रसोईघर था.., और मे मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ अपनी बिटिया की तरफ बढ़ गया..!
झोंपड़ी में घुसते ही रूचि अपनी जगह से खड़ी हुई और दौड़कर मेरे सीने में समाते हुए फिरसे फुट फुट कर रोने लगी..!
उसने मुझे हौसला देते हुए कहा – इसका डर बहुत अंदर तक बैठ गया है बेटा.., चिंता मत करो.., जल्दी ही फिरसे होश में आ जाएगी.., तुम बाहर जाकर दिशा मैदान होलो.., मे इसकी देखभाल रखूँगी…!
मे बेमन से झोंपड़ी से बाहर आगया.., मेरे पीछे पीच्चे मंजरी भी आगयि.., मुझे एक पानी से भरा लोटा पकड़ाते हुए बोली – जाओ बाबू यहीं खेतों में दिशा मैदान हो आओ…!
अब आप चिंता मत करो.., मेरी सास देशी नुश्कों की बहुत अच्छी जानकार हैं.., दूर दूर से लोग इनसे इलाज कराने आते हैं.., आपकी भतीजी अब एकदम सही हो जाएगी…!
मंजरी की बात से अब मे कुच्छ आस्वस्त होने लगा था.., लोटा हाथ में लेकर मे पास के खेतों में ही दिशा मैदान के लिए चल पड़ा.., ललित भी उस तालाब की तरफ जा चुका था…!
कल से हमने कुच्छ खाया पीआ भी नही था.., लेकिन फिर भी फ्रेश होना भी ज़रूरी था…, शौच करते समय मुझे रूचि के कहे हुए शब्द याद आगये…!
रूचि ने संजू के बारे में क्यों कहा…, क्या संजू भी इन बदमाशों की क़ैद में है..? क्या उसकी जान को कोई ख़तरा है..? कहीं ऐसा तो नही कि उसने ही रूचि को किसी तरह वहाँ से निकाला हो और खुद फिरसे उनके चंगुल में फँस गया हो…!
इन्ही सब विचारों के चलते मुझे लेटरीन भी नही आई.., किसी अनिष्ठ की आशंका ने मेरे दिमाग़ पर कब्जा कर लिया था…!
ना जाने कितनी देर में वहीं खेत में बैठा सोचता रहा.., फिर जब बैठे बैठे मेरे पैर अकड़ने लगे तो मे वहाँ से उठकर अपना पॅंट पहनते हुए मंजरी के घर की तरफ आने लगा…!
उसके घर के नज़दीक तक आते आते मुझे झोंपड़ी के अंदर से रूचि के सुबकने की आवाज़ सुनाई दी.. मे लपक कर उस झोंपड़ी की तरफ बढ़ा.., लेकिन तभी मंजरी ने मुझे रोक कर कहा…!
उससे अब अच्छे से होश आ चुका है.., थोड़ी देर रो लेने दो उसे.., मगज हल्का हो जाएगा.., तब तक आप हाथ मूह धो लो.., मे आपके लिए चाय का इंतेज़ां करती हूँ.., ये कहकर उसने वही बाजू में बाल्टी से पानी लाकर मेरे गंदे हाथ साफ करवाए एक लोटे में पानी लेकर मेने अपना मूह अंदर बाहर से सॉफ किया..!
तभी उसने अपनी कॉटन साड़ी का पल्लू मेरी तरफ कर दिया.., मेरी इतनी फिकर करते देख मेरा दिल मंजरी के लिए प्यार से उमड़ पड़ा.., उसके आँचल से अपने गीले हाथ पोन्छ्कर मेने उसे अपनी बाहों में समेट लिया और उसके पतले-पतले लेकिन खुश्क होठों पर एक चुंबन लेकर कहा…!
शायद भगवान ने मुझे तुम लोगों के पास आने के लिए ही प्रेरित किया होगा.., तभी तो मेरी गाड़ी का डीजल यहीं आकर ख़तम हुआ.., और तुम्हारी सास तो मेरे लिए फरिश्ता ही साबित हुई…!
मंजरी ने मेरी बाहों में कसमसाते हुए कहा – जब दिलों में मिलने की लौ लगी हो तो उपरवाला किसी भी तरह मिला ही देता है.., अब छोड़िए मुझे..और जाकर अपनी बिटिया को संभालिए.., मे वहीं आप लोगों के लिए चाइ बनाकर लाती हूँ…!
नेकदिल मंजरी इस समय मुझे दुनिया की तमाम औरतों से कहीं बढ़कर नज़र आ रही थी.., मेने उसे अपनी बाहों से आज़ाद करते हुए उसके चूतड़ के उभार को सहलाया..!
वो मुस्कराती हुई एक नीचे छप्पर वाली झोंपड़ी की तरफ बढ़ गयी.., जहाँ उसका रसोईघर था.., और मे मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ अपनी बिटिया की तरफ बढ़ गया..!
झोंपड़ी में घुसते ही रूचि अपनी जगह से खड़ी हुई और दौड़कर मेरे सीने में समाते हुए फिरसे फुट फुट कर रोने लगी..!