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वारदात complete novel

शंकर दादा उसके पेट मैं भी हाथ डालकर हैंडबैग निकाल लेगा I वह वहीँ खड़ा उन बदमाशों कै बाहर आने का इन्तजार करने लगा I

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फीनिश

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"दादा....!” बसन्त कमरे में पांव रखते ही सूखै स्वर में बोला-"इसमेँ हमारा कोई कसूर नहीं है ।"

शकर दादा कई पल कहरभरी निगाहों से दोनों क्रो देखता रहा l

"हमने आपको फोन पर भी सब-कुछ बताया था कि.... ।"

"उल्लू कै पट्ठों I" शंकर दादा दहाड़ा"…""तुम दोनों एक मामूली-से पुलिस वाले को नहीं सम्भाल सकै । वह तुमसे बेग छीनकर ले गया और तुम खड़े देखते रहे I"

" उसके पास रिवॉल्वर थी ।"

"मुझें अपनी कमजोरी मत बताओ कि, उसके पास क्या' था और क्या नहीं I" शंकर दादा ने पूर्ववत: लहजे में कहा----"जब उस लडकी ने स्टेशन के क्लाकरूम में चारों बड़े सूटकेस रखै तो उसी समय ही उनकी रसीद तुम्हें उससे छीन लेनी थी I"

"स्टेशन पर यह काम नहीं हो सकता था । वहां बहुत भीड थी । हम पकडे जाते ।"

“मुझे हर हाल में रसीद चाहिए। स्टेशन के सामान-धर' ~ की रसीद चाहिए, जो उस लडकी कै हैंडबैग मेँ थी । उल्लू कै पट्ठों, मेरी बात समझ में आई कि नहीं?" शंकर दादा बहुत क्रोध में था ।

"हमने उस पुलिस वाले को तलाश करने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह हमेँ कहीँ मी नहीं मिला । अंधेरे मेँ उसकी छाती पर लगी नाम की पट्टी नहीं पढ सकै थे, अगर नेम-प्लेट पढ ली होती तो हमने अब तक कहीं न कहीँ से तलाश कर ही लिया होता ।"

"नेमप्लेट की तरफ ध्यान दिया होता तो नाम पढते ना ।"

"उस समय हालात ऐसे थे कि हम इन बातों की तरफ ध्यान ही नहीँ दे पाए थेl”

"भट्टा बिठा दिया तुमने मेरा । लाखों के माल को आसानी से हाथ से निकाल दिया l मैँ तुम दोनों की ऐसी हालत कर दूंगा कि अपने पैदा होने पर भी पछताओगे… ।"

" बाॅस गुस्सा करने से कुछ नहीं होगा । हम अभी वह रसीद तलाश कर सकते हैं l”

"कैसे?" शकर दादा ने भिचे दांतों से दोनों को देखा I

"उस पुलिस चाले को ढूंढेगे। चाहे जैसे भी होगा हम उसे तलाश कर ही लेगे I"

"तो क्या अब तक उसने हैंडबैग सम्भालकर रखा होगा? वह तो उसने लडकी को वापस दे दिया होगा I" शंकर दादा दांत भीचकर बोला…"उसने वह रसीद अपने हैंडबैग में ही डाल ली थी ना?"

"पक्का बात एकदम पक्का’ I”

"ठीक हे, सबकुछ भूलकर उस लडकी को नापो I" शंकर दादा ने कहा-"पुलिस वाले ने वह बेग लडकी को वापस कर दिया होगा। क्या कहा था तुमने वह किसी जबकतरे की लडकी है?"

“हां दादा । बहुत वड़ा उस्ताद था जेब काटने का उसका, चाप । इसी से हिसाब लगा लो कि आज आधे शहर पें उसी कै ही चेले-चपाटे जेब काटने का धन्धा कर रहे हैं ।"

"'मुझे इससे कोई मतलब नहीँ कि उसका चाप क्या करता था । तुम लोग उस लडकी को पकडो और उससे स्टेशन के क्लाकरुम की रसीद वसूलो । आना कानी करे तो उठाकर ले आओ साली को I"

दोनों ने सिर हिलाया I

“इस बार कोई कोताही नहीं होनी चाहिए I”

"नहीं होगी दादा । पक्के से भी पक्का… I"

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फीनिश

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अंजना की हालत बुरी हो रही थी I उसका मन कर रहा था कि अपना सिर दीवार से टकराना शुरु कर दे I लुटी-पुटीं-सी वह अपने घर में बैठी थी I सूनी-सूनी निगाहें सामने खाली पड़े दोनों थैलों और काले रंग कें ट्रंक पर बार-बार जा रही थीं I राजीव को तो भगबान ने पहले ही उससे छीन लिया था I उसके भविष्य कै लिए राजीव जो दौलत छोड गया था वह भी हाथ से निकल गई थी I

बैंक की लूट कै सारे रुपये उसने चारों सूटकेसों में भरकर स्टेशन के क्लाकरूम में जमा करवा दिये थे I उसकी रसीद तो पर्सं में रखी थी जोकि बस में उन बदमाशों ने पर्स छीन लिया था I

बस कुछ देर तो रुको रही थी वह भी बस के अन्य यात्रियों के साथ उस पुलिस वाले का इन्तजार करती रहीँ थी, जो कि वदमाशो के पीछे भागा था ।
 
कुछ देर बीतने पर यात्रियों ने बस को चलने पर मजबूर किया था । क्योंकि रात ,हो रही थी , सब अपने अपने घर पहुंच जाना चाहते थे ।

अब वह भी मजबूर थी । अकेली रात कै अंधेरे में सुनसान जगह पर नहीं खडी रह सकती थी l

उस पुलिस वाले को गए दस मिनट बीत गए थे । जब बस चलने लगी तो दुविधा में फंसी, मज़बूरी में जकड्री वह भी वस में सवार हो गई । उसके जोर देने पर ड्राइवर ने करीब दो मिनट और बस रोकी थी, फिर बस को आगे बढा दिया था ।

उसके सारे सपने.....सारे अरमानं......सारे ख्वाब..... क्लाकरूम की रसीद के रूप में वैग के साथ ही उससे जुदा हो गए थे l रात को बेजान सी घर पहुची ।

भूख तो उड चुकी थी । नींदं का नामोंनिशान नहीं था । रात-भर करवटें ही बदलती रही थी ।

अगले दिन का उजाला उसे रात की कालिमा से भी काला लग रहा. था l खुद को बरबाद-सा महसूस कर रही थी` वह । सपनों का घरोंदा बनकर बिखर गया था ।

सपनों मेँ उसने कई बार शादी का मण्डप देखा था जिसमें आग जल'रही थी । जिसके अगल वगल वह राजीव के संग फेरे ले रही थी, परन्तु सपनों की बातें जेसे सपनों कै साथ ही समाप्त हो गई थीं ।

अब उसके सामने एक ही रास्ता बचा था । पुरानी डगर पर चलने को मजबूर थी वह । जेब काटने का धन्धा जो राजीव ने सुनहरे सपने दिखाकर छुडवा दिया था । आखिर उसे अपना पेट तो पालना ही था । हर जगह राजीव जैसे इन्सान तो भरे नहीं पड़े जो उससे यह बुरा धंधा छूड़वाकर शादी कर लेंगे । जिस्म के शिकारी अवश्य थे, जो कि हर गली हर मोड पर मौजूद थे।

जब दिन चढ आया तो खाली पेट में खलबली मची ।

उसने थोड़ा-सा खाने को बनाया ओंर खाकर चाय पीकर पुन: सोचने लगी । तभी उसके दिमाग में यह बिचार कौंधा कि हो सकता हैं उस पुलिस वाले ने उन बदमाशों से . . उसका हैंडबैग बापस पा लिया हो, इस विचार के साथ ही उसकी आंखों में आशा की चमक जगमगा उठी ।

उस पुलिस वाले को तलाश करना चाहिए, जो बदमाशों के पीछे गया था । उसका चेहरा उसने अच्छी तरह देखा था । अंधेरे में देर्खा चेहरा भी वह भूल नहीं सकी । इस बिचार के साथ ही जल्दी से वह तेयार हुईं और बाहर निकल गई ।

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फीनिश

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दिन-भर अंजना रात वाले पुलिस बाले. की तलाश में भटकती रही I कई पुलिस स्टेशन छान मारे, परन्तु वह कहीँ न मिली I नाम तो वह जानती नहीँ थी । हुलिये कै आधे अधूरे आधार पर पूछा, परन्तु कोई भी आशाजनक जानकारी हासिल नहीँ हुई ।

आशा की जो किरण उसके मन में जगी थी वह वुझने सी लगी । शाम को वह स्टेशन के क्लाकरूम कै सामने जा खडी हुईं जहा कल उसने लाखों रुपये कै भरे सूटकेस रखे थे । क्लाकरूम को हसरतमरी निगाहों से देखने लगी । काश उस हैंडबैग मैं. रखी रसीद उसके पास होती तो वह लाखों रुपयों की मालिक होती । सुनहरी भविष्य उसकें सामने होता l ‘

परन्तु अब तो कुछ 'भी नहीँ बचा था उसके पास । स्टेशन से बुझे मन से बाहर निकली ।

समझ नहीँ पा रहीँ थी कि क्या थके , कैसे उस रसीद को वापस हासिल करे l मालूम भी तो नहीं कि हैंडबैग अब किसके पास हैं । तभी उसने सोचा कि हो सकता है , पुलिस वाला भी हैंडबैग लिये उसे तलाश कर रहा हो और उसके न मिलने पर यह उसे रात वाली बंस पर ही देखै ।

शायद ऐसा हो जाए। बुझे मन से अंजना ने सोचा। शाम तो हो ही रही थी । उसने कल रात वाले रूट पर जाने का मन बना लिया । रात को उसी समय वाली बस पक्रड़ेगी ।

_ बस कंडक्टर से भी पूछेगी । शायद पुलिस वाले कै बारे में कोई जानकारी मिल जाए । आशा तो उसे नजर नहीं आ रही थी । फिर मी कोशिश कर लेने में क्या हर्ज था ।

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फीनिश

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इन्सपेक्टर सूरजभान ।

कानून की इज्जत करने वाला, सच्चा रक्षक ।

उम्र पैंतीस वर्ष । लम्बा-बौड़ा जबान । वर्दी पहनने पर वहुत ही आकर्षक लगता था । चूंकि वह रिश्वत नहीं लेता था। न तो खुद खाता न और किसी को खाने देता था इसलिए वडे अफसरों ने नाराज होकर उसे शहंर के कोने में पडने वाले थाने का चार्ज दे दिया था, जहां जुर्म न कें बराबर होते थे । …

आंफिसरों की इस हरकत पर इन्सपेक्टर सूरजभान को क्रोध तो बहुत आया, परन्तु कुछ कर भी तो नहीं सकता था। खामोशी से जाकर उसने उस थाने का चार्ज सम्भाल लिया ।

. चार्ज सम्भाले महीना हीँ हुआ था कि उसकै थाने कै अंदर में पड़ने वाले बैंक मेँ डकैती पड़ गंई I उसे सूचना मिली फौरन वह सब-इन्सपेक्टर और चार पुलिस वालों क्रो साथ लेकर बैंक में जा पहुंचा ।

वहां तीन लाशो को देखते ही उसका चेहरा कठोर-होउठा ।

तफ्तीश की ।

मालूम हुआ कि डकैती करने वाले चार युवक थे । और चारों पढ़े लिखे और अच्छे घराने के लग रहे थे ।

उनमे किसी ने एक को दूसरे ने हेगड़े कहकर पुकारा था ।

बैंक से उंगलियों कै निशान उठाए गए।

दोपहर तक़ इंस्पेक्टरं सूरजभान बैक मैं हीं व्यस्त रहा ।

जब वह वहाँ से निकलने की सोच रहा था तो वह गश्ती पुलिस-जीप बहा आ पहुची जों लुटेरों कै पीछे गई थी । उसमें सब इंस्पेक्टर, दो अन्य पुलिस वाले और एक ड्राइवर था ।।

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फीनिश

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सब-इन्सपेक्टर सूरजभान से मिला और पीछा करने का सारा वृतात बताया ।

"बहुत शर्म की बात है कि तुम उन्हें पकड़ नहीं सकै ।" इन्सपेक्टर सूरजभान उखड़े स्वर में बोला ।

“हमारी जीप भीढ़ में फस गई थी सर, नहीं तो अवश्य पकड़े जाते ।" सब इन्सपेक्टर ने कहा ।

"कार का नम्बर क्या था?"

"सर I" सब-इन्सपेक्टर ने कार का नम्बर बताकर कहा… …"सब जगह कार के नम्बर कै बारे मेँ खबर कर दी गई हे, जल्दी ही वह कार हमें मिल जाएगी ।"

"अब यह तुम्हारी डूयूटी है कि कार के मिलते ही मुझे पुलिस स्टेशन में खबर करो ।”

"ओ०के० सर I"

"तुमने बैंक लूटने बालों कै चेहरे देखै?” इन्सपेक्टर सूरजभान ने पूछा ।

"वह कार में थे सर । कुछ भी स्पष्ट नहीं देख सका । परन्तु यह ज़रूर देखा कि जो कार की पिछली सीट पर था, उसके चौडे कंधे थे और वह घुघराले बालों वाला था ।"

इन्सपेक्टर सूरजभान बैक वालों के बयान ले चुका था । चारों के हुलिए उसकै-पास थे ।

"वह जो भी थे, बडे घरानों के बिगडे हुए नौजवान थे । उनके हुलिए और डकैती करने वाले अन्दाज से ऐसा स्पष्ट महसूस होता हे । ऐसों को पकढ़ना जरा कठिन हो जाता हे । क्योंकि यह प्रोफेशनल क्रिमनल तो होते नहीं l” इन्सपेक्टर. सूरजभान ने सोचभरे स्वर में कहा l

"राइट सर I"

"तुम कार के बारे में मुझे खबर करना जब वह मिल जाए । मेरे इलाके मेँ बैक-डैकेती हुई हैं, उन लोगों क्रो पकडना मेरा काम है । इसलिए कार मिलने पर सिर्फ उसकी निगरानी की जाए । कार से छेडछाड न की जाए। वायरलेस सेट पर यह सूचना मी सबको दे दो i"

"यस सर मैं अभी हेडक्वार्टर कंट्रोलरूम में यह मेसेज भिजवाता हूं।” . . इन्सपेक्टर सूरजभान पुलिस स्टेशन चला गया ।

दो घन्टे बाद ही सब-इन्सपेक्टर कोहली फिगरप्रिट की रिपोर्ट लेकर आ गया कि यह फिगरप्रिट नए हैं, किसी पुराने अपराधी के नहीं हैं l"

“सब-इन्सपेक्टर-कोहली l" उन फिगरप्रिट को घूरते हुए इन्सपेक्टर सूरजभान ने कहा…"डकैती करने वाले नए रंगरूट थे, तभी तो उन्होने हाथों में दस्ताने नहीं पहने थे, तभी तो उन्होंने, अपने चेहरे नहीं ढके थे । अगर पुराने चावल होते तो वह इन सब बातों का ध्यान अवश्य रखते ।”

" ऐसे मेँ तो इन लोगों को ढूँढना बहुत ही कठिन है सर… i"

"वास्तव में कठिन है ।” इन्सपेक्टर सूरजभान होंठ भीचकर गुर्राया-"परंतु मेरी निगाहों से वह चारों बच नहीं सकेंगे। सिर्फ डकैती का ही मामला होता तो शायद मैं इसे गम्भीरता से नहीं लेता, परन्तु डकैती के साथ उन लोगों ने तीन हत्याएं भी की हैं । बैंक मैनेजर की चौकीदार की और एक ग्राहकं की । हत्यारों को छोडना तो मैंने कभी सीखा ही नहीँ । मैं इन्हें हर हाल में पकडकर रहूंगा l”

सब-इन्सपेक्टर कोहली खामोश रहा I

"कोहली मैं तुम्हें जो काम सोंप रहा हू वह कठिन अवश्य है पर बहुत जरूरी है । इसी कै दम पर ही हम उन चारों तक पहुच सकते हैँ I" इन्सपेक्टर सूरजभान ने कहा ।

"हुक्म कीजिए सर ।"

"शहर के रईसों की औलादों को टटोलो । देखो कौन कहां कहां बिगड़ा हुआ हैं? क्या-क्या करता हे? सबसे पहले तो हेगड़े नाम के लोगों को चेक करो जो अपने नाम के साथ हेगड़े लगाते हैं, क्योंक्रि डकैतों ने आपस में एक को हेगडे कहकर पुकार था । मैँ फिर कहता हूं काम कठिन है, परन्तु यही एक रास्ता है जिसके दम पर हम रावरी करने बालों तक पहुंच सकते हैँ ।"

"ओ०कै० सर । मैं अभी से यह काम शुरू कर देता हू। सबसे पहले हेगड़े वालों को ही चेक करता हूं।” सबइन्सपेक्टर कोहली ने सैल्यूट मारकर कहा ।

"फोन डायरेक्टरी से मालूम हो जाएगा कि शहर में कितने रईस-अमीर हेगड़े हे । उनकै पते भी पिल जायेंगे । हरिअप । शुरू हो जाओ । हमें देर नहीँ करनी चाहिए l"

"राइट सर ।" सब-इन्सपेक्टर कोहली बाहर निकल गया ।

तभी फोन की घंटी बजी । इन्सपेक्टर सूरजभान ने रिसीवर उठाया ।

फोन हेडक्वार्टर से कमिश्नर राममूर्ति का था राममूर्ति ने ही खुन्दक में उसका ट्रांसफर शहर के आखिरी कोने में वने इस थाने में करां था, क्योंकि वह रिश्वत नहीं लेता था । न ही लेने देता था । उसकी इस बारे मेँ कई शिकायतें रिश्वतें लेने और देने दालों ने कमिश्नर राममूर्ति से की थीं । इस्री कारण राममूर्ति को भी उसकी ट्रांसफ़र करनी ही पडी थी । राममूर्ति ने इन्सपेक्टर सूरजभान को बुलाकर एक बार समझाया भी था कि अपने काम से मतलब रखे, परन्तु सूरजभान भला यह बात कहां मानने वाला था I

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फीनिश

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""हेलों !" इन्सपेक्टर सूरजभान माउथपीस में बोला ।

"इन्सपेक्टर सूरजभान बहुत अफसोस की बात हे कि तुम्हारे इलाके में बैंक-डकैती हो गईं।"

"बैंक डकैती तो किसी भी जगह पर हो सकती है।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने स्थिर लहजे में कहा ।

"प्रोग्रेस रिपोर्ट क्या है?”

"अभी तो बैंक से पूछताछ करके लौटा हू। मुझे पूरा विस्वास हे कि जल्द ही बैक लुटेरों के बोरे में कोई क्लू हासिल कर लूंगा ।"

इन्सपेक्टर सूरजभानं ने विश्वासभरे स्वर में कहा ।

"मुझे तुम पर मूरा बिश्वास हे, तुम वास्तव में काबिल पुलिस वाले हो ।"

"इसी कारण आपने मुझे शहर कै कौने में पड़ने वाता थाना दे दिया" l" सूरजभान ने शिकायती लहजे में कहा… "यह थाना तो उसे देना चाहिए, जिसे आराम से बैठकर खाने की आदत हो ।"

"मैं जानता हूं तुम मुझसे नाराज हो I खैर, चिन्ता मत करो । तुम यह केस साल्व करो । इस कैस कै साल्व होते ही मैं तुम्हें किसी अच्छे. थाने का चार्ज दे दूंगा I”

"थैक्यू ......सर I" सूरजभान ने मन ही मन तसल्ली से भरी गहरी सांस ली ।

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फीनिश

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शाम चार बजे इन्सपेक्टर सूरजभान को डकैती में इस्तेमाल की गई कार के हासिल होने की सूचना मिली I वह पुलिस वालों को साथ लेकर वहा पहुचा जहां कार खडी थी । वहां पर पहले से ही दो गश्ती कारें मौजूद थीं और फिगरप्रिट

वाले कार से उंगलियों के निशान उठा रहे थे । सूरजभान गंश्ती कारों के पास खड़े पुलिस बालों कै पास पहुचा I वहां मौजूद इन्सपेक्टर उसकी पुरानी पहचान वाला था । दोनों खुलकर मिले ।

"सूरजभान यह कार चोरी की हे । आज सुबह ही कार चुराई गई हे । कार के मालिक ने फोन पर करीब कै थाने में कार चोरी हो जाने कीं रिपोर्ट दर्ज कंरवा दी थी I"

" ओह ।"

"’कुछ मालूम हुआ, डकैती करने वाले कौन थे ?"

"अभी तो खास कुछ नहीं पता चला, कोशिश जारी है।” सूरजभान ने सिर हिलाकर कहा-"परसु यह बात-तो में दावे के साथ कह सकता हूं कि डकैती करने वाले नए रगरुट थे I"

तभी फिगरप्रिंट एक्सपर्ट बहा आया और सूरजभान से बोला ।

कार से चार व्यक्तियों की ऊंगलियों कै निशान मिले हैँ । यह निशान हू-ब हू वही हैं जो सुबह बेंक के कई हिस्सों से उठाए गए' हैं ।।"

"हू । अब जाप लोगों का काम खत्म हो गया?"

“हां !"

"ठीक है l इन निशानों की आप फाइल तैयार कीजिए । दो घंटे तक किसी को भेजकर मैं हैढक्वार्टर से मंगवा लूगा ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने कार को देखते हुएं कहा ।

इन्सपेक्टर सूरजभान ने कार की बारीकी से तलाशी ली l

स्टेयरिंग के नीचे पायदान के करीब सीट के नीचे से उसे नया लेदर का पर्स मिला l उसने पर्स खोलकर देखा । चैक किया l पर्स में साठ-सत्तर रुपए के अलावा जो काम की वस्तु थी, वह था ड्राइविंग लाइसेंस । किसी राजीव मल्होत्रा कै नाम था । ऊपर उसकी तस्वीर लगी हुईं थी । नीचे नाम पता था । इंस्पैक्टर सूरजभान की आंखों में तीव्र चमक लहरा उठी ।

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फीनिश

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इन्सपेक्टर सूरजभान ने किसी तरह बैंक कै चन्द कर्मचारियों कै घर का पता मालूम किया ओर उनके घर पर जा पहुचा । उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मेँ लगी हुई तस्वीर दिखाई । तस्वीर देखते ही चार में से तीन ने पहचाना कि आज सुबह हुई बेंक-डकैंती में यह युवक शामिल था I इन्सपेक्टर सूरजभान के जबड़े सख्ती से बन्द होते चले गए ।

अब बैक-डकैती और तीन हत्याओं कै मुजरिम उससे ज्यादा दूर नहीं थे l , , .

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फीनिश

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दो पुलिस वालों के साथ इन्सपेक्टर सूरजभान जब राजीब मल्होत्रा के फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजा बन्द पाया ।।

पूछने पर पता चला कि फ्लैट सुबह से ही बन्द हे । मालूम हुआ कि राजीव पढा…लिखा बेरोजगार युवक है ।

इन्सपेक्टर सूरजभान दोनों पुलिस बालों के साथ साइड में खड़ा होकर फ्लैट की निगरानी करने लगा, ताकि राजीव आए तो उसे कानून के शिकजे में र्फसा सकै । आधी रात बीत गई, परन्तु राजीव नहीं आया । इन्सपेक्टर सूरजभान समझ गया कि राजीव मल्होत्रा अब तीनों डकैतों और लूट की दौलत कै साथ कहीँ और जगह पर होगा । आखिर कभी तो आयेगा वहां दोनों पुलिस वालों को हिदायत दी…कि इस फ्लैट का मालिक जब भी आये फौरन उसे सूचना दी जाए। इसके बाद वह पुलिस स्टेशन चला गया । वहां चन्द घंटे सोया और एक अन्य पुलिस वाले को राजीव के फ्लैट की निगरानी पर भेज दिया, ताकि रात वाले दोनों कांस्टेबिल भी आराम कर सकें ।

पुलिस वाले ने दोनों पुलिस बालों की छुट्टी देकर उनकी डूयूटी सम्भाल ली: परन्तु व पुलिस वाला कुछ लापरवाह किस्म का था और कुछ उसकी बीवी की तबियत खराब थी । धर पास ही था, वह घर पर चला गया । दिन-भर अपनी बीवी के संग रहा । डॉक्टर से दवा लाकर भी उसे दी ।

दोपहर का खाना खाकर दौ घन्टे स्रोया भी अच्छे पति कै सारे फर्ज निपटाकर जब वह वापस अपनी डूयूटी पर राजीव के फ्लैट पर पहुंचा तो अंधेरा घिरना आरम्भ हो गया था । राजीव कै फ्लेट का दरवाजा उसने खुला देखा। मालूम करने पर उसे पता चला कि इस फ्लेट में रहने वाले राजीव की मौत दिल का दोरा पडने से हो गई है और उसके दोस्त अन्तिम संस्कार के लिए उसे लेकर गये हैं ।

उस कांस्टेबिल की हालत खराब हो गई 1 वह मालूम कर चुका था कि सुबह से ही राजीव के. फ्लेट का दरवाजा खुला पड़ा था ।

अच्छा खासा हंगामा मचा रहा। अगर अब उसने अपने इन्सपेक्टर को इस बारे में खबर दी तो उसकी नौकरी गई, क्योंकि अपनी ड्यूटी उसने ठीक तरह से पूरी नहीं की दी ।

आखिरकार उसने यहीं फैसला किया कि इस बारे में अपनी जुबान बन्द रखेगा । उसने देखा दो घन्टे के बाद कुंछ लोग आए और उस फ्लैट कै दरवाजे पर ताला लगाकर चले गये । कुछ ही देर में वहां पर कोई भी नहीं थी । आधे घन्टे के बाद उसकीं जगह लेने दूसरा पुलिस वाला आ गया । उसने एक लम्बी सांस ली और वहां से सीधा पुलिस स्टेशन पहुंचकर सूरजभान को रिपोर्ट दीं कि फ्लैट पर सारा दिन कोई भी नहीं आया।

तभी इन्सपेक्टर कोहली ने भीतर प्रवेश किया ।

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फीनिश

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"आओ कोहली बैठो ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने उसे देखते ही कहा ।

“सर ....." सब-इन्सपेक्टर कोहली बैठता हुआ बोला-----"मैंने आज दिन भर में पन्द्रह हेगडों को चैक किया है । उनका पता मैने फोन डायरेकट्री से हासिल कर लिया था ।"

"कोई सफलता?" इन्सपेक्टर सूरजभान की प्रश्चभरी निगाह उस कै, चेहरे पर जा टिकी I

"मिली भी, नहीं भी… l" सब इन्सपेक्टर कोहली ने सिर हिलाया-"पन्द्रह में से छः के तो कोई लडका ही नहीं है l चार के लडकै फॉरेन मेँ रहते हैँ । बाकी पांच के लडकों कै बारे में पूछताछ की । पाच में से चार के लडके ठीक निकले, परन्तु ......!"

"परन्तु क्या कोहली‘ ?"
 
"परन्तु पांचवें का बेटा नशेडी हैं सर, स्मैक, अफीम, चरस का नशा करता है I कभी घर में रहता है तो कभी बाहर आवारा दोस्तों कै साथ ।" कोहली ने बताया !!

"तो इसमें परन्तु कहकर रुकने वाली कौन-सी बात हो गई थी?”

"सर, वह नशेडी जज का लडका है I"

"जज का?"

"हा सर । बहुत बड़ा और इज्जतदार जज है । शायद आपने भी उनका नाम सुन रखा हो । जज कृष्णलाल हेगडे । अपनी शराफत को लेकर वह बहुत ही मशहूर हे सर ।"

"कृष्णलाल हेगड़े ।" इन्सपेक्टर सूरजभान की आखे सिंकुड़ गईं-"यह वहीँ कृष्णलाल हेगड्रै जज तो नहीं जिसने महीना-भर पहले नेता के खिलाफ फैसाल दिया था और उसे फासी की

सजा हुईं थी !"

. "यस सर ! मैं उसी कृष्णलाल हेगड़े की बात कर रहा हू।"

"उसका लडका नशेडी है?" इन्सपेक्टर सूरजभान ने हैरानी से कहा ।

"यस सर । सुना है वह अपने बेटे से बहुत दुखी हैँ । इकलौता लड़का है । वह भी बिगडा हुआ I दो लडकियां हैं l एक की शादी वह कर चुका हे । दूसरी पढ़ रही है ।" कोहली ने बताया ।

इन्सपेक्टर सूरजभान काफी देर तक गहरी सोच में डूबा रहा ।

"और इसके बारे में क्या मालूम किया?"

"अभी तो खास कुछ नहीँ सर I”

" मालूम करो! जज साहब कै लड़र्के का नाम क्या हैं?”

" सूरज सूरज हेगडे !”

“उसका हुलिया क्यहै ?"

"अभी मालूम नहीँ किया सर ।"

"मालूम करो l देखना कहीँ वह चौडे कंधे और घूंघराले बालों वाला तो नहीं हे । अगर वहीँ हे तो इसका कोई दोस्त इस हुलिए वाला हो ओर यह पता करो कि कल डकैती वाले दिन, खासतौर से सुबह के समय वह कहा था पक्की जानकारी हासिंल करना l"

"यस सर ।"

इन्सपेक्टर सूरजभान ने फिर राजीव मल्होत्रा कै बारे में बताया ।

"आपने उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया?” पूरी बात सुनते ही कोहली चौका . . ।।

"वह अमी तक अपने फ्लैट पर नहीं लौटा l निगरानी बराबर चल रही हे l" इन्सपेक्टर सूरजभान ने विचारपूर्ण स्वर में कहा-"अब मुझे लगता हैं कि वहीं जाकर मालूम कंरना पड़ेगा कि राजीव की जान-पहचान वाले कौन कौन लोग थे । उसे कहा से पकड़ा जा सकता है । तुम जाओ, सूरज हेगडे कै बारे में मालूम करो । मैं राजीव के बारे में कोई कदम उठाता हू। कमिश्नर साहब का फोन आया था । वह दबाव डाल रहे ये कि केस को जल्दी सॉल्व किया जाये।"

"जी !" कहने कै साथ ही कोहली उठा ओर इजाजत लेकर बाहर निकल गया ।

इन्सपेक्टर सूरजभान कुछ देर बेठा सोचता रहा फिर उठकल बाहर निकला । दो पुलिस वालों को साथ लेकर जीप में बैठा और राजीव मल्होत्रा कं फ्लैट की तरफ रवाना हो गया । वहा पहुंचकर उसे राजीव कै बारें में जो जानकारी मिली वह हैरान कर देने वाली थी कि राजीव की हार्टऔक से मौत हो चुकी हैं और कल ही यहां से उसकी अर्थी उठाई गई है । इन्सपेक्टर सूरजभान क्रो यह सुनकर बड़ा अटपटा लगा, क्योकिं उसके आदमी बराबर फ्लैट की निगरानी पर थे, परन्तु उसे इस बारे में उसके आदमियों ने कोई रिपोर्ट नहीं दी ।

वह समझ गया कि कल दिन में निगरानी करने बाला कांस्टेबिल गड़बड़ कर गया है । अपनी डूयूटी में उसने लापरवाही बरती हैं । बहरहाल अपना क्रोध दबाते हुए उसने पूछताछ जारी रखी । सबसे पहले उसने राजीव मल्होत्रा के पडौसी को पकडा ।

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"राजीव मल्होत्रा को क्या हुआ था ?" इन्सपेक्टर सूरजभान ने पूछा ।

“दिल का दौरा पड़ा था ।" पडोसी किशनलाल ने बताया I

"कब ? "

"परसों रात को !" किशनलाल कहे जा रहा था-----'रात को वह फ्तैट पर सोया, परन्तु सुबह दिल के दौरे कै कारण मरा हुआ पाया गया t मुझें तो अभी भी बिश्वास नहीं आता कि… l"

इन्सपेक्टर सूरजभान मन ही मन चौंका । परसों रात-भर तों दो पुलिस वाले फ्लैट की निगरानी करते रहे थे । वह बन्द था । परसों तो आधी रात तक उसने मी उन दोनों पुलिस वालों कै साथ मिलकर निगरानी की थी, तब तो फ्लैट बाहर से बन्द था। यानी कि राजीव भीतर था ही नहीं। भीतर नहीं था, सोया नहीं तो सुबह फ्लैट में दिल कै दोरे से मरा कैसे पाया गया? यानी कि भारी गडबड है । यह झूठ किसने स्टेज किया है कि वह फ्लैट पर सोया और सुबह दिल के दोरे से मरा पाया गया । बहरहाल इस झूठ कै पीछे किसी का कुछ तो मकसद होगा ही!

"सबसे पहले किसे पता चला कि राजीव की मृत्यु दिल कै दौरे से हुई पड्री है?”

"राजीव के दोस्तों को पता चला, जब वह अगले दिन आए तो ।"

"राजीव के दोस्त?"

~ “हां, तीन उसके खास दोस्त थे । वे आते रहते थे । क्रियाकर्म भी उन्होंने ही किया था ।"

तीन दोस्त । इन्सपेक्टर सूरजभान मन ही मन सतर्क हो गया ।

"उलकै तीन दोस्तों का जरा नाम तो बताइये।"

किशनलाल ने हुलिया बताया इन्सपेक्टर सूरजभान ने चैन की सांस ली। यह हुलिया बेक-डकेतों का हुलिया था। उनमें से एक चोड़े कंघे और धुघराले वालों वाता भी था l

"राजीव के तीनों दोस्त कहां रहते हैं?"

"यह तो मुझे नहीं मालूम l"

अन्य पडोसी से इन्सपेक्टर सूरजभान की बात हुई ।

"राजीव का कोई और जानने वाता?"

"वह ज्यादातर खुद ही में मस्त रहता था । वेसे उससे मिलने वालों में तीन दोस्त और एक खूबसूरत सी लडकी थी । वह अक्सर आया करते थे ।"

"लड़की ?"

"हां I" कहने के साथ ही उसने तसल्ली से अंजना की खूबसूरती का वर्णन किया ।

“यह लइकी इन तीनों कै साथ आती थी या अकेली आती थी?"

"अकेली । लडकी का उन तीनों दोस्तों से कोई वास्ता नहीं था ।"

" उन तीनों कै बारे में आप जानते हैं? कहां रहते हैं या उनके नाम?"

"नहीँ, मेरी उनसे कभी कोई बात नहीं हुई?"

"और लडकी के बारे में?" उसका नाम, उसका अता-पता ।"

"नहीं । वेसे बात क्या है इन्सपेक्टर? आप इतनी बारीकी से क्यों पूछताछ कर रहे हैं?” …

"परसों राजीव ने अपने दोस्तों कै साथ मिलकर पैंतीस ताख की बैंक-डकैती की हे ।"

"बैंक-डकैती !" वह जोरों से चौंका…"राजीव ने की है?"

"हां ।" इन्सपेक्टर. सूरजभान ने दृढतापूर्वक अपना सिर हिलाया I

"विश्वास नहीं आता l”

इन्सपेक्टर सूरजभान ने चार पडोसियों को इकट्ठा करके राजीव कै फ्लैट के दरवाजे पर लटकता ताता त्तोड़ा और भीतर प्रवेश कस्कैं लाइट जला ली । पडोसियों को उसने गवाह कै तोर पर साथ लिया था कि अगर फ्लैट से कोई खास वस्तु हासिल होती हे, तो पडोसियों के तौर पर उसके पास ठोस गवाही मोजूद रहे ।

डकैती कै अगले दिन ही राजीव को हार्टअटैक से मरा दिखाया जाना ओर उन्हीं दोस्तों द्वारा उसका अन्तिम संस्कार किया जाना भी इन्सपेक्टर सूरजभान को गडबड वाला मामला लग रहा था । क्योंकि रात राजीव अपने फ्लैट पर नहीं था, जबकि उसके तीनों दोस्तों ने यह दर्शाया कि राजीव रात अपने फ्लैट पर सोया था ।।

मतलब साफ था कि दोस्तों में कोई बात हुईं, जिस वजह के कारण राजीव मरा । परन्तु उनकी मजबूरी थी यह दर्शाना कि राजीव अपने फ्लैट पर मरा था और दिल के दोरे से मरा था ।

यानी कि अपनी मौत मरा-था ओर अपनी निगाहों के सामने ही । कुछ हीँ घंटों में उसका क्रियाक्रम भी कर डाला था । साफ जाहिर था कि वह नहीं चाहते थे कि राजीव की मौत के बारे में कोई छानबीन हो । परन्तु एक बात इन्सपेक्टर सूरजभान को अखर रही थी कि राजीव कहीँ और मरा तो उसकी लाश वह तीनों किस प्रकार लोगों की निगाहों से बचाकर फ्लैट में ले आए?

इन्सपेक्टर सूरजभान ने खुद राजीव कै एक कमरे वाले फ्लैट की तलाशी ली ।

चारों पडोसी और दोनों पुलिस वाले खामोशी से खडे रहे ।

जल्द ही इन्सपेक्टरं सूरजभान इस उलझन में से बाहर निकल आया कि लाश को किस प्रकार यहां लाया गया l वेड के नीचे नया चमकता हुआ लोहे का नया ट्रक पडा था ।

उसे देखकर ही अन्दाजा लगाया जा सक्ता था कि उसे हाल में ही दुकान से खरीदा गया है । इन्सपेक्टर सूरजभान ने ट्रक क्रो हाथ नहीं लगाया ।

वहां ख़ड़े कांस्टेबिल को हेडक्वार्टर फोन करने भेज दिया; ताकि फिंगरप्रिंट सेक्शन वाले आकर निशान उठायें ।

विना तलाशी लिए वह पडोसियों के साथ बाहर आ गया । बह नहीं चाहता था कि डकैतों की कोई निशान उसकी गलती से मिट जाए ।

धटे-मर में ही फिगरप्रिंट वाले वहां पहुंच गए ।

उन्होंने कमरे की हर जरूरी जगह से उंगलियों के निशानों को उठाया । बेड कै नीचे पड़े ट्रक्र के भीतर और बाहर से भी निशानों कै प्रिंट उठाए । उन्होंने जब अपना काम समाप्त किया तो इम्सपेक्टऱ सूरजभान ने फिगरप्रिंट इंचार्ज से कहा------“मैं कांस्टेबिल को आपके साथ ही हेडक्वार्टर भेज देता हूं। प्रिंट तैयार करके फाइल इसे दीजिएगा । मुझे नतीजा जल्दी चाहिए I”

"श्योर, हमें कोई एतराज नहीं ।"फिंगरप्रिंट वाले ने कहा ।

" तुम i” इन्सपेक्टर सूरजभान ने कांस्टेबिल से कहा----"इनके साथ जाओ ओर जो फाइल यह दें, उसे लेकर सीधे पुलिस स्टेशन पहुचो ! में वहीँ आ रहा हूं। फिगरप्रिंट विभाग में हमारे थाने के लिए एक और फाइल पडी होगी, शाम को डकैतों की कार से जो उंगलियों कै निशान उठाए गए ये वह फाइल, उसे भी लेते आना l"
 
कांस्टेबिल फिंगरप्रिंट वालों के साथ चला गया । इन्सपेंक्टर सूरजभान ने राजीव के कमरे की तलाशी ली । सबसे पहले उस बड़े, नये ट्रक क्रो खोलकर देखा से वह भीतर से खाली था l ध्यान से देखने पर उसे ट्रक के भीतर हल्की-सी मिट्टी बिखरी दिखाई दी और अठन्नी का सिक्का l

इन्सपेक्टेर सूरजभान को पूरा विश्वास हो गया कि राजीव के मृत शरीर को इसी ट्रंक में डालकर लाया गया हे l यह मिट्टी राजीव के जूतों के नीचे लगी मिट्टी की होगी ।

और जब राजीव के शरीर को ट्रंक में ठूंसा गया तो उसकी जेब में से अठन्नी का सिक्का ट्रक में जा गिरा होगा ।

अवश्य ही राजीव की हत्या हुई थी । अगर राजीव की हत्या ना होती तो उसके मृत शरीर को इस -प्रकार छिपाकर लाने का कोई मतलब नहीं था । उसे खुलेआम भी यहां लाया जा सकता था।

डकैती की दौलत वहां से नहीं मिली ।

जिक्र करने लायक वहां से सिर्फ तस्वीरें मिलीं । कुछ तस्वीरों मे राजीव अपनी ही उम्र कें तीन अन्य युवकों के साथ था और चंद तस्वीरों में राजीव अंजना कै साथ था ।

सूरजभान ने वह तस्वीरें वहां खड़े राजीव कै पड्रोसियों को दिखाई, तव उसे मालूम हुआ कि राजीव के साथ खडे तीनों युवक उसके खास दोस्त हैं । उनमें से एक युवक चौडे कंघे और घुघराले चालों वाला था ।

सूरजभान की आंखें चमक उठी I डकैतों की तस्वीरें उसके हाथ आ गई थीं, अब वह कानून के शिकंजे से ज्यादा दूर नहीं थे । कल या परसों तक उन्हें ढूंढकर हथकांड़ियां तो वह पहना ही सकता था ।

इन्सपेक्टर सूरजभान को विश्वास नहीं आ रहा था कि इतनी जल्दी उसने बैंक-डकैतों को ढूंढ निकाला है । अन्य तस्वीरों में राजीव जिस युवती के साथ था, उसके बारे में सिर्फ इतना ही पता चला कि यह युवती अक्सर राजीव

के पास आया करती थी ।

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फीनिश

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पुलिस स्टेशन की टेबल पर कार से उठाए गए निशान और राजीव कै फ्लैट से उठाए गए निशानों की छाप मौजूद थी ! दाईं तरफ बैंक से डकैतों कै उठाये निशानों की छाप पडी थी । इन्हें सूरजभान मिला रहा था l उंगलियों के सारे निशान मिल रहे थे । यानी कि राजीव के वह तीनों दोस्त ही डकैती में शामिल थे । सूरजभान ने घडी में समय देखा, रात कै नौ

बज रहे थै । तभी सब इंस्पेक्टर कोहली ने भीतर प्रदेश किया ।

"आओ कोहली ।"

"सर ।" कोहली बैठता हुआ बोला-“मैंने सूरज हेगडे कै बारे में जानकारी हासिल की हे । पहली खास बात तो यह हैं कि उसका हुलिया डकैतों में से एक कै हुलिए से मिलता है । दूसरी बात यह हैं कि डकैती वाली सुबह वह कहां था, इस बात की उसके घरवाले भी नहीं जानते थे । मैं उसकै घर वालों से बात कर चुका हूं। जज साहब और उनकी पत्नी बैसे ही अपने बेटे के नशेडी होने के कारण परेशान हैं ।"

"हूं !' इन्सेपक्टर सूरजमान ने सिर हिलाया ----" तुमने सूरज हेगडे को देखा है?"

"नो सर! "

"उनकी तस्वीर देखी हो उसके घर पर?"

"नहीं देखी l"

"खैर ।।" अब मेरी बात सुनो-“बैंक से मिले डकैतों की उंगलियों कै निशान, डकैती की कार से मिले उंगलियों के निशान और राजीव के फ्लैट से'मिले राजीव कै तीन दोस्तों की उंगलियों कै निशान आपस में हू-बू-हू मिलते हैं ।"

"ओह ।" कोहली ने सिर हिलाया ।

"यह देखो ।।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने द्राज से तस्वीरें निकालकर उसके सामने रख दीं-"इन तस्वीरों में राजीव ओर उसके तीन दोस्त हैं ।"

कोहली ने तस्वीरें देखीं ।

"अब हमेँ राजीव के तीनों दोस्तों को तलाश करना है । यह बात तो साबित हो ही चुकी हे कि डकैती राजीव ओर उसके तीनों दोस्तों ने की हे । राजीव के तीनों दोस्त कौन हैं, कहां रहते हैं, हमें अब सिर्फ इस बात की तलाश करनी है । उगलियों के निशानों से हमने डकैतों कै बारे में तसल्ली कर ली है, परन्तु मै चेहरों से भी तसल्ली करना चाहता हू।”

"कैसे सर?”

"बैंक के कर्मचारियों का यह तस्वीरें दिखाकर । वह चश्चदीद गवाह हैं । उन्होने डकैतों को अपनी आंखों से देखा हे । राजीव के लाइसेंस पर लगी तस्वीर देखकर वह उसकी . निशानदेही पहले ही कर चुके हैं । बाकी तीनों के बारे में भी पक्की जानकारी कर लें । उसके बाद जज साहब के यहां चलेगे । उनसे पूछेंगे कि इन तस्वीरों में आपका लड़का कौन-सा है । अगर इनमे से कोई उनका लडका हे तो उनसे ही बाकी दोनों कै बारे में पता चल जाएगा कि बाकी दोनों कौन हैं l”

"राइट सर ।" कोहली ने टेबल पर साइड में पड़े कागज की तरफ इशारा किया जिस पर उंगलियों की स्पष्ट छाप थी-"यह निशान किसके हैं?"

"यह राजीव के फ्लैट से मिले किसी युवती की उंगलियों के निशान हैँ । जो अक्सर राजीव कै फ्लैट पर उससे मिलने आया करती थी । युवती खूबसूरत है, परन्तु उसका नाम-पता 'नहीं मालूम हो सका कि यह कौन हे । किसी क्रो उसके बारे में जानकारी नहीं I"

" क्या उस युवती का डकैती से सम्बन्ध हो सकता है !'

“इस बात का अन्दाजा तुम यह तस्वीर देखकर बताओं !" कहने के साथ ही इन्सपेवटर सूरजभान ने टेबल की ड्राज में से निकालकर तस्वीरों का दूसरा लिफाफा कोहली की तरफ बढाया ।

कोहली ने तस्वीरें देखीं, जिसमेँ राजीव और अंजना एक साथ थे ।

“तस्वीरें देखकर तो लगता हे कि यह आपस में प्रेमी प्रेमिका थे I"

"मेरा भी यही ख्याल है । डकैती में इस लडकी का कोई हाथ नहीं हो सकता। फिर भी तुम सावधानी कै तौर पर युवती का चेहरा अच्छी तरह देख लो l"

कोहली ने अंजना का चेहरा अपने मस्तिष्क में बिठा ,लिया l

उसके बाद इन्सपेक्टर सूरजभान ने सब-इन्सपेक्टर कोहली और दो पुलिस वालों को साथ लिया और बेक के कर्मचारियों के घर जा पहुंचा, जिन्होंने पहले राजीव का चेहरा पहचाना था । तस्वीरों को देखकर सबने कहा कि यही चारों डकैत हैं-इन्होंने ही बैंक लूटा हे ।

इन्सपेक्टर सूरजभान ने अपनी पूरी तसल्ली कर लेने के पश्चात् जीप का रुख जज कृष्णलाल हेगडे के घर की तरफ कर दिया I उसके होंठ. सख्ती से भिंच चूकै थे ।

"सर । हमें काफी जल्दी सफलता मिल गई ।" सब-इन्सपेक्टर कोहली बोला !!!!!

जबाव में सूरजभान ने कुछ नहीं कहा।

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फिनिश

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कृष्णपाल हेगडे और उसको पत्नी शाम क्रो सब-इन्सपेक्टर कोहली कै आने और सूरज के बारे में पूछताछ करने क्रो लेकर आशका से घिरे पड़े थे l

"सूरज की मां?" जज साहब ने कहा-----"मुझें तों डर लग रहा हे कि सूरज ने कोई उल्टा-सीधा काम ना कर दिया हो । कहीँ हमारी इज्जत वह मिट्टी में न मिला दे l"

"उस पुलिस वाले के आने कै बाद ही से मेरा दिल घबरा' रहा है l" सावित्री देवी ने सूखे होठों पर जीभ फेरकर कहा--- “पैसे की खातिर सूरज ने अवश्य कोई उल्टा-सीधा काम किया होगा । नशे को वह छोड़ नहीँ सकता । नशे को पूरा करने कै लिए उसे कहीँ से तो पैसा लेना ही पडेगा । ऐसे लागों को तो कोई उधार देता भी नहीँ I आखिर कोई कब तक देगा ।"

"तुम ठीक कहती हो ।। घर में हीँ वह चौंरी करते पकडा जा चुका है I" जज साहब ने गम्भीर और चिन्तित लहजे में कहा---“मुझे तो लगता हे कि पैसे के लिए ही उसने कुछ किया था । कब आया था सूरज आखिरी बार घर पर? कितने दिन हो गए?”

"दो रातों से वह घर पर नहीं आया l” सावित्री देबी ने घबराए स्वर में कहा…“घर तो वह कई कईं दिन नहीं आता उसका क्या है, नशे में कहीँ भी पड़ा रहता होगा l" इससे पहले कि जज साहब कुछ कहते, वेल बज उठी ।

दोनों की घबराहट से भरी निगाहें आपस में टकराईं । आखिरकार सावित्री देवी आगे बढी ओर दरवाजा खोल दिया ।
 
आने वाले इन्सपेक्टर सूरजभान और कोहली थे । उन्हें देखते ही सावित्री देवी का रंग फक्क पढ़ गया । जज साहब ने सूखे होठों पर जीम फेरी ।

इन्सपेवर्टर सूरजभान और कोहली भीतर आ गए l

“माफ कीजिएगा, हम आपको फिर तकलीफ देने आ गए l” सब इन्सपेक्टर कोहली ने मुस्कराकर जज साहब को देखा-"दरअसल हम आपसे कुछ पूछने आए थे l”

जज साहब और सवित्री देबी खामोशी से'खड्रै उन्हें देखते रहे ।

इन्सपेक्टर सूरजभान ने जेब से एक तस्वीर निकालकर जज साहब की तरफ बढाई ।

"जज साहब । इस तस्वीर में 'आप किसी को जानते है ?"

जज साहब ने तस्वीर थामी उसे देखा l पलभर के लिए हाथ कांपा फिर स्थिर हो गया I

"आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?" इन्सपेक्टर सूरजभान पुन: बोला |

"में तस्वीर में दिखाई दे रहे चारों को जानता हू I जज साहब ने धीमे स्वर में कहा।

"कौन हैं यह ।" ~ "इनमें से एक मेरा बेटा है सूरज और अन्य तीन उसके दोस्त हैँ ।"

सूरजभान और कोहली की निगाहें आपस में टकराई I सूरजभान के चेहरे पर प्रसन्नता की हल्की-सी चमक उभर आई I

"इन तीन कै नाम क्या हैँ, कहां रहते हैं यह?"

"इनमें से एक राजीव मल्होत्रा हे ।'" जज साहब ने कहा तो सूरजभान पास आ गया । जज साहब तस्वीर पर उंगली रख-रखकर थके स्वर में कहने लगे-"यह सुरेश दिवाकर I शाही खानदान की औलाद हे । चन्द्रप्रकाश दिवाकर का तीसरा और छोटा बेटा ।'" “

" आगे ?”

"चौथा अरुण I शहर के बहुत बड़े उद्योगपति सोहन लाल खेडा का बेटा I"

सूरजभान और कोहली ने चन्द्रप्रकाश का नाम भी सुन रखा था और सोहन लाल खेडा का भी I

दोनों हस्तिया थीं शहर की… "इन्सपेक्टर I”

जज साहब ने भारी स्वर में पूछा-"क्या किया है इन लोगों ने?"

" बैंक डकैती की और साथ मे तीन हत्याएं भी की I"

इन्सपेक्टर सूरजभान की बात सुनकर जज साहब और सावित्री देवी के शरीरों में से जेसे जान ही निकल गई । वह फक्क चेहरे से खड़े रह गए ।

अपने बेटे से जो आखिरी आशा थी कि कभी वह ठीक होगा, उनकी वह आशा भी अब मिट्टी में जा मिली थी ।

"कब की?" जब साहब कै होंठों से निकला ।

"परसों सुबह I”

“तुमसे कोई गलती तो नहीँ हुईं इन्सपेक्टर ?” जज साहब का स्वर बेहद धीमा था । "

"नहीँ, कोई गलती नहीं हुईं । इन लोगों ने ही डकैती की हे l” सूरजभान बोला I

"राजीव मल्होत्रा नशा नहीं करता था I पढा-लिखा वह शरीफ युवक था । मैं उसे बहुत अच्छी तरह-जानता हूं I बाकी तीनों तो नशे कै गुलाम थे । उन्हें अपने नशों के लिए पैसों की ' जरूरत थी । परन्तु राजीवं को इनका साथ देने की भला क्या जरूरत थी?"

"अभी तो मैं यह बात नहीं जानता । परन्तु इतना जाहिर है कि उसकी कोई मजबूरी रही होगी । आपकी जानकारी के लिए आपको बता दूं कि राजीव मल्होत्रा मर चुका हे और पुलिस को शकं है राजीव को उसके तीनों दोस्तों ने मारा हे I”

जजे साहब ने कुछ नहीं कहा । मुह फेर लिया l

"आपका बेटा सूरज कहां हे?”

"दो रातों से वह धर नहीं आया I” 'सावित्री देवी ने थरथराते स्वर मेँ कहा ।

इन्सपेक्टर सूरजभान और कोहली की निगाहें आपस मे मिलीं ।

"मैँ आपके घर की तलाशी ले सकता हूं जज साहब? ~शायद सुरज घर पर ही हो I"

"ले लो ।"

सुंज़भान और कोहली ने पूरा घंर छान मारा I एक कमरे में सूरज की छोटी बहन बैठी पढ रही थी।

पुलिसवालों को देखकर उसने पढना छोड दिया । सूरज तो धर में था ही नही ।

दोनों वापस ड्राइंगरूम में चले आए ।

सावित्री देवी निढाल-सी होकर सोफे पर अधमरी -सी बैठी थी ।

"जज साहब आपके बेटे की पुलिस क्रो तलाश हे’। मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर आप कानून जानते हैं । मैं आशा करुंगा कि अगर सूरज घर आता हे तो फौरन पुलिस को उसकै आने की खबर कीजाए ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने ठोस स्वर मे कहा ।

जवाब मे जज साहब ने सहमति के अंदाज सिर हिला दिया । इन्सपेक्टर सूरजभान सब इंस्पेक्टर कोहली के साथ बाहर निकल गया ।

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फीनिश

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इन्सपेक्टर सूरजभान और सब-इन्सपेक्टर कोहली दो कांस्टेबिलों कं साथ चंद्रप्रकाश दिवाकर के महलनुमा बंगले पर पहुंचे । कई कठिनाइयों का सामना करने कै पश्चात् चन्द्रप्रकाश दिवाकर से उनकी मुलाकात हुई ।।

"हमसे मुलाकात करने की पुलिस वालों को क्या जरूरत पढ़ गई ।" चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने दोनों को अप्रसन्नता भरी निगाहों से देखते हुए पूछा ।

"दिवाकर साहब हमेँ आपके छोटे बेटे की तलाश' है ।”

"क्यों ? " दिवाकर जी के माथे पर बल पड़ गए ।

“बैंक…डकैती की हे आपके बेटे ने i"

"होश में रहकर बात करो इन्सपेक्टर l क्या तुम जानते नहीं हम शाही खानदान से सम्बन्ध रखते हे दौलत की हमारे पास क्या कर्मी हे जो हमारे बेटे को ऐसो गिरा हुआ काम करना पडे ।"

"आपको बेटा ड्रग्स लेता है, जाहिर है आपने उसे पैसे देने बन्द कर दिए होंगे । तभी तो उसने बैंकडकैती की… !" इन्सपेक्टर सूरजभान ने एकं-एक शब्द पर जोर देकर कहा !

चन्द्रप्रकाश दिवाकर सब समझ रहे थे ।

उनके दिमाग में एक ही बात खटक रही थी कि शायद यह पुलिस वाला ठीक कह रहा है I सुरेश ने वास्तव में डकैती की होगी, क्योकि उसे नशे के लिए पैसे की जरूरत रही होगी । परन्तु अपने मुंह से यह बात वह कैसे कबूल करते । उनकी शाही खानदान की इज्जत का सवाल था । I

“आपका बेटा सुरेश कहां है?"

"हमेँ नहीं मालूम l" चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने हाथ हिलाकर कहा-“लेकिन इन्सपेक्टर सोच लेना कि हमारे बेटे की तरफ उंगली उठाना तुम्हारे हक में ठीक न होगा । हमारी पहुच ऊपर तक है । हमारा एक ही इशारा तुम्हारी वर्दी उतरवा सकता है l”

इन्सपेक्टर सूरजभान के चेहरे पर कडवी मुस्कान फैलती चली गई ।

"दिवाकर साहब । मेरे पास ऐसे सबूत हैं जिन्हें दुनिया का कोई भी कानून झुठला नहीं सकता। आपकी कोई भी पहुंच मेरी वर्दी नहीँ उतरवा सकतीं । आपके बेटे ने डकैती की हे, इसकै मेरे पास कईं गवाह हैं । डकैती करते हुए उसे कईयों ने देखा हे । आपकी दौलत भी आपके बेटे को नहीँ बचा सकतीं, क्योंकि डकैती कै साथ उसने तीन हत्याएं भी की हैं I”
 
दिवाकर साहब सूरजभान क्रो घूरते… रहे, बोले कुछ भी नहीं l

"सुरेश इसं समय घर पर हैं?”

"नहीं I” दिवाकर साहब कै होठों से व्याकुलता से भरा स्वर निकला I

, "बहरहाल आप अपने बेटे को ज्यादा देर नहीँ छिपाकर रख सकते और न ही वह कानून की निगाहों से ज्यादा देर छिपा रह सकता है, उसने जो भी किया है, उसकी उसे सख्त से सख्त सजा मिलकर रहेगी ।" इन्सपेक्टर सूरजभान ने कठोर स्वर में चन्द्रप्रकाश दिवाकर को चेतावनी दी और कोहली कै साथ बाहर निकलता चला गया I

चन्द्रप्रकाश दिवाकर बुत की तरह काफी देर तक वहीं खडे रहे I मस्तिष्क में तीव्रता कै साथ दुख से भरी आंधी चल रही थी ।

उन्हें इस बात का पूरा विश्वास था कि सुरेश ने अवश्य बैंक-डकेती जैसा काम कर डाला होगा ।

ड्रग्स की पूर्ति कै लिए उसे पैसा तो चाहिए ही था और नशा करने वाला जरूरत पड़ने पर कुछ भी कर सकता है जैसे कि अब सुरेश ने बैंक-डकैती कर डाली थी ।

उनकी शाही खानदान की इज्जत को मिट्टी मे मिला दिया था I सुरेश से ज्यादा अब उन्हें खानदान की इज्जत का ख्याल आने लगा था l

बात खुलते ही जब लोगों को मालूम होगा कि चन्द्रकाश दिवाकर कै छोटे बेटे ने बैंक-डकैती की हे । तीन हत्याएं भी की हैँ, तो लोग थू थू करेंगे । किसी न किसी प्रकार उन्हे इस मामले को दबवाना ही होगा । अपने रसूख का इस्तेमाल करना ही होगा । आखिर खानदान की इज्जत का सवाल था । शाही खानदान की इज्जत का l

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फीनिश

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सोहन लाल खेड़ा । शहर का नामी उद्योगपति। उसकी लम्बी विदेशी कार बंगले मे पहुची तो उसी समय ही पुलिस जीप फाटक पर पहुंची । दो मे से एक दरबान भागकर उनके पास आ पहुचा-तब वह मोर्च जा रुकी कार से उतरे ही थे ।

"मालिक आपसे पुलिस वाले मिलने आए I”

सोहन लाल खेड़ा ने शांत मुद्रा मे सिर हिलाकर दरबान को देखा ।

" उन्हें भीतर भेज दो।" कहने कै साथ ही सोहन लाल जो मोर्च पास करकै सदर द्धार से भीतर प्रवेश करते चले गए ।

उनके चेहरे पर किसी तरह का कोई भाव नहीं था । वह सफल बिजनेसमैन थे । हर बात की गहराई तक पहुचना उनकी आदत थी । पुलिस वाले आए थे तो अवश्य ही काम बोगा, चरना खामखाह तो वह आने से ही रहे ।

कुछ ही पलों उपरान्त इन्सपेक्टर सूरजभान त्तब-इन्सपेक्टर कोहली के साथ भीतर प्रवेश ।

सोहन लाल खेड़ा । शहर का नामी उद्योगपति। उसकी लम्बी विदेशी कार बंगले मे पहुची तो उसी समय ही पुलिस जीप फाटक पर पहुंची । दो मे से एक दरबान भागकर उनके पास आ पहुचा-तब वह मोर्च जा रुकी कार से उतरे ही थे ।

"मालिक आपसे पुलिस वाले मिलने आए I”

सोहन लाल खेड़ा ने शांत मुद्रा मे सिर हिलाकर दरबान को देखा ।

" उन्हें भीतर भेज दो।" कहने कै साथ ही सोहन लाल जो मोर्च पास करकै सदर द्धार से भीतर प्रवेश करते चले गए ।

उनके चेहरे पर किसी तरह का कोई भाव नहीं था । वह सफल बिजनेसमैन थे । हर बात की गहराई तक पहुचना उनकी आदत थी । पुलिस वाले आए थे तो अवश्य ही काम बोगा, चरना खामखाह तो वह आने से ही रहे ।

कुछ ही पलों उपरान्त इन्सपेक्टर सूरजभान त्तब-इन्सपेक्टर कोहली के साथ भीतर प्रवेश ।

"आओ इन्सपेक्टर !" सोहन लाल खेड़ा ने सामान्य स्वर में कहा-“ कबो कैसे आना हुआ?"

इन्सपेक्टर सूरजभान ने गम्भीरता-भरे शब्दों में खैड्रा साहब को सारी बात बता दी ।

पूरी बात सुनने के बाद सोहन लाल ने वेहद गम्भीरता से सिर हिलाया l

"हो सकता हैं, में इन्कार नहीं करता I” सोहन लाल खेडा ने गहरी सांस लेकर दुखी स्वर में कहा…"अरुण को नशे की बुरी लत पढ़ चुकी हे । वह ड्रग्स एडिक्ट ही चुका है । उसकी इस आदत से तंग आकर मैंने उसे पैसा देना बन्द कर दिया । वह पाई…पाई के लिए मोहताज था । नशेडी की हर समय पैसे की सख्त ज़रूरत रहती है । कोई बडी बात नहीं उसने बैक डकैती जैसा काम कर भी डाला हो ।"

“सुनकर आपको हेरानी नहीं हुई कि आपके बेटे ने ऐसा किया. ? ”

"नहीँ, कोई हैरानी नहीं हुई ।" खेड़ा साहब ने सिर हिलाया-"दरअसल मैं बहुत बड़ा बिजनेसमैन हूं I मेरी सफलता का रहस्य ही यही है कि चाहे कैसो भी बात-हो, मैं कभी भी हैरान नहीँ होता बल्कि जो भी बात' होती हे, शांत मन से उस पर गौर करता हूं। वेसे मेरी जाति राय यह है कि अरुण को ऐसा नहीं करना चाहिए था l उसे खानदान की इज्जत का ख्याल होना चाहिए था । मैंने उसे बहुत समझाया था कि जिस रास्ते पर वह चल रहा हैं वह रास्ता उसे बुरे अन्जाम तक से जाएगा, लेकिन मेरी बात सुनने-सोचने और समझने की शक्ति ही कहां रह गई थी उसमें । उसे तो सिर्फ नशा ही चाहिए । मेरी समझ में नहीं आता कि वे जेल जाने कै बाद वह कहां से नशा करेगा । बैंक का पैसा लूटकर उसने अपनी बची खुची जिन्दगी भी समाप्त कर डाली है । खैर, कहो मैँ तुम्हारे किस काम आ सकता हू? उसने डकैती की है तो जाकर उसे पकडो ।"

"मै अरुण को ही तलाश करने आया हूं। क्या वह बंगले पर हे?" सूरजभान ने पूछा ।

सोहन लाल जी ने नौकर को बुलाकर अरुण के बारे मैं पूछा, फिर बोले ।

“पिछले दो-तीन दिन से अरुण बंगले पर र्नहीँ आया ।"

"पक्का बता कर रहे हैँ आप ।"

"हां, झूठ बोलने क्री क्या जरूरत हे मुझे उसने जुर्म हैं किया हे तो वह बचने से रहा । देर सवेर में कानून के फंदे में तो र्फसेगा ही l यह काम उसने अकेले ही किया हे?"

“नहीं उसके तीन दोस्त भी इस काम में शामिल हैं ।"

"तीन दोस्त?" खेड़ा साहब ने आराम से सिर हिलाया ।।

"और वह तीन दोस्त दिवाकर, सूरज और राजीव ही होंगे ।"

“हां, डकैती के साथ इन चारों ने तीन कत्ल भी किए हैं।"

"तीन तीन कत्ल… ।" खैड़ा साहब हक्के बक्के रह गए… .""हे भगवान ।। मैं तो सोच भी नहीँ सकता था कि नशा करने वाले एक दिन इतने वुरे रास्ते पेर भी पहुंच जाते हें । इन्सपेक्टर तुम गिरफ्तार करो अरुण को । मैं तुम्हारी राह में बिल्कुल भी रोड़ा न बनूंगा । ऐसे अपराधियों को कभी भी नहीँ छोडना चाहिए ।”

"शुक्रिया । वेसे आपका बेटा जब आएगा तो आप क्या करेंगें?"

"चिन्ता मत करो । उसे पकडकर मैँ तुरन्त पुलिस की इत्तला दूंगा ।" खेडा साहब से तसल्ली बख्स बात होने के पश्चात् इन्सपेक्टर सूरजभान और कोहली विदा लेकर बाहर निकल गए । उनके बाहर जाते ही खेडा साहब फोन की तरफ बढे और रिसीवर उठाकर नम्बर डायल करने तगे l अगले ही पल लाइन मिल गई ।

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फीनिश

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"हैलो ।" खेडा ने सम्बन्ध मिलते ही कहा… "मुझे जिन्दल से बात करनी है ।"

"वह तो इस समय आपको घर पर मिलेंगे I आँफिस में नहीँ हैं I" खेडा साहब ने बोलने वाले से जिन्दल के घर का नंम्बर लिया और लाइन काटकर उसके धर का नम्बर मिलाया l

.... फोन उठाने वाला जिन्दल ही था ।

"मैँ सोहन लाल खेडा बोल रहा हू जिन्दल I"

"ओह । सेठजी आप" I"

"मैंने तुम्हें मुंहमांगी फीस देकर, अरुण कै पीछे लगाया था, ताकि मुझे उसकी हरकत की सूचना मिलती रहे, परन्तु तुमने मुझे कोई रिपोर्ट नेहीँ दी ।"

. . “दरअसल सेठजी, इन दिनों मैं इतना व्यस्त रहा कि रिपोर्ट देना ध्यान ही नहीं रहा l”

"कोई बात नहीं, अब दे दो I” सोहन लाल खेडा के स्वर में व्यंग्य था I

"खेड़ा साहब आपके बेटे ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर वेंक-डकैती की हे।"

" बहुत खूब ।।" खेडा साहब ने एक-एक शब्द चबाकर कहा… "मैंने तुम्हें अरुण की निगरानी पर लगाया था । जो बात मुझे तुम्हारे मुह से मालूम हो जानी चाहिए थी, वह मुझे दुसरों कै मुंह से मालूम हो चुकी हे I"

"किससे?"

"पुलिस वालों से, जो अरुण क्रो डकैती. कै सिलसिले में तलाश कर रहे हैँ I तुमने अपने काम क्रो ठीक तरह से अन्जाम नहीं दिया । अगर अपनी जासूसी की दुकान को खुली देखना चाहते हो तो सुबह तक मेरी फीस मुझे लौटा देना I नहीँ तो मैं तुम्हारा लाइसेस केंसिल करवाकर रख दूगा ।"

" फीस की तो कोई बात नहीं I वह तो मैँ वापस कर दूगा, आपका कहा सिर आँखों पर I" जिन्दल का स्वर मुस्कराहट से भरा था-"एक बात और भी है जो आप नहीं जानते।" .

* क्या ?”

"आपके बेटे ने दिवाकर और सूरज हेगड़े के साथ मिलकर राजीव मल्होत्रा की हत्या की है l"

"वया मतलब? ऐसा नहीं हो सकता ।"

"ऐसा ही हुआ है l मेरी आंखों के सामने उन्होंने राजीव की लाश को ट्रंक में बन्द करके लाश को राजीव के फ्लैट पर रखा I बाद में चुपचाप उसका अन्तिम संस्कार भी कर दिया ।"

"इस बात का कोई सबूत?"

"सबूत में हू । वह तीनों पकडे जाने वाले हैं । पुलिस को अगर मैंने राजीव की हत्या वाली बात बता दी तो, पुलिस वाले उनका मुंह अपने आप खुलवा लेंगे । बैंक-डकैती और वहां हुए तीन कत्लों कै साथ राजीव की हत्या का जुर्म भी , उनके सिर पर लग जाएगा, जो कि खतरनाक होगा । अपने ही साथी की हत्या को अदालत गम्भीरता से लेगी , बैंक-डकैती में हुई हत्याओं को तो अदालत हालात की मजबूरी भी मान सकती हे , अब कहिए-सुबह आऊं फीस वापस करनें… ।"

"कहाँ पर हत्या की उन्होने राजीव की?"

जिन्दल ने उनके किराये के कमरे का पता बता दिया I

"अब वह तीनों कहां हैं?”

" उसी कमरे में । उन्हें नहीं मालूम कि पुलिस उनकी तलाश में हैं I सही बात तो यह है कि मुझे भी नहीं मालूम था I पुलिस वाले अगर उन्हें तलाश कर रहे हैं तो इसका मतलब अब कानून से बच निकलना उनके लिए आसान नहीं I उनके पास इस बात कै पूरे सबूत होगे कि वैक डकैती उन्होंनै ही की है यूंहीँ तो वह लोग उन्हें ढूंढने से रहे।"

"हूं ।" सोहन लाल खेडा जी ने रिसीवर वापस रख दिया I उनके चेहरे पर सोच और चिन्ता के गहरे भाव छा चुके थे । कमर पर हाथ बांधे वह बेचैनी से टहलने लगे ।।

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फीनिश

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जिन्दल ने रिसीवर रखा और सिगरेट सुलगाकर कश लिया ।

वह प्राईवेट जासूस था । पिछले पांर्च सालों से वह जासूसी का धन्धा कर रहा था, चूंकि हिन्दुस्तान में इस धन्धे का चलन ज्यादा नहीं था, इसलिए आदमनी ना के बराबर ही होती थी ।।

महीने में एक आध केस ही अटकता था । जिससे कि उसका अपना खर्चा ही पूरा हो पाना कठिन था । काम कै शुरूआती दोर में उसने रिसेप्शनिष्ट कम टेलीफोन अटेडैंट के तौर पर सपना गुलाठी नाम की खूबसूरत युवती को रखा था ।

केस ज्यादा न होने की वजंह कै कारण जिन्दल का ज्यादातर समय सपना गुलाठी और जिन्ना से बातें करते ही बीतता था । दो सालों मेँ ही सपना गुलाठी की आपस में गहरी छनने लगी । आखिरकार दोनों वे शादी कर ली । सपना I गुलाठी महातेज थी । अक्सर जिन्दल जैसे तेज दिमाग के इन्सान को भी वह अवसर आने पर सलाह-मशवरा दिया करती थी l

उसके बाद जिन्दल ने आँफिस कै लिए दूसरी लडकी रख ली थी l काम पहले जैसा ही चल रहा था । कोई खास बढोतरी नहीँ हुई ।

अक्सर जिन्दल परेशान रहता था दौलत कै हाथों । वह जासूसी जेसे घटिया काम से छुटकारा पाना चाहंता था और यह काम तभी हो सकता था जबकि किसी और काम के लिए जेब में मुनासिब पैसा हो ।

फोन रखकर जब वह पलटा तो पास बैठी सपना ने मूछा ।

"फोन पर तुम क्या बातें कर रहे थे? हत्याओं और बैंक-डकैती का क्या चक्कर है?”

कश लेकर जिन्दल ने पूर्ण गम्भीरता भरे स्वर में कहा ।

"तुमसे बात करने का मोका नहीं मिला । एक बहुत ही टेढा मामला आ फंसा है ।"

"खुलकर बताओ ।"

"सोहनलाल खेडा शहर का नामी बिजनसमैन हे l सप्ताहभर पहले उसने मुझे फोन करके अपने शानदार आँफिस में बुलाया । उस वक्त शाम के पांच बज रहे थे ।

सोहनलाल जो ने जिन्दल को देखकर होले से सिर को हिलाया ।

"आओ बैठो ।"

जिन्दल आगे बढकर कुर्सी पर बैठ गया ।

सोहन लाल जी ने सिगरेट सुलगाई और चन्द पलों की खम्पोशी के उपरान्त बोला----" मुझे खास मामले में किसी विश्वसनीय व्यक्ति की जरूरत थी । आशा है कि हममें जो बात होगी, वह बाहर नहीं निकलेगी !!"

"आप मुझ पर पूरा विश्वास का सकते हैं सेठजी ।" जिन्दल ने कहा ।

"दरअसल बात यह है कि मेरा बीच वाला बेटा अरुण ड्रग्स एडिक्ट हो गया है । नशे ने उसकी जिन्दगी खराब कर डाली हे ।" सोहनलाल जी ने भारी स्वर में कहा।

जिन्दल खामोशी से बैठा खेड़ा साहब को देखता रहां ।

"में उसे नशे कै रास्ते-से हटाना चाहता हू, परन्तु हटा नहीं पा रहा हूं आखिस्कार तंग आकर मैंने उसे खर्चा-पानी देना बंद कर दिया । पैसे ना होने कै कारण उसे नशा करने में दिक्कत आने लगी । कई बार मैंने या घर वालों ने अरुण क्रो घर में चोरी करते पकडा । यानी कि उसे पैसे की सख्त जरूरत हे और मैं चाहता हू वह नशे कै रास्ते ओ छोड दे ।"

खेड़ा साहब ने पल-भर ठिठकर पुन: कहा ।

…"जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि दौलत हासिल करने कै लिए वह कोई गलत काम भी करेगा । हो सकता है, मेरा बिचार गलत हो, फिर भी मैं सावधानी कें तौर पर चाहता हूं किं तुम हर समय उसकी निगरानी करो । वह क्या हरकतें कर रहा हे? मालूम करो ओर मुझे रिपोर्ट दो । मैं नहीं. चाहता कि खामखाह वह कोई मुसीबत अपने गले में डाल ले ।"

"ठीक हे । आप मुझे उसकी कोई तस्वीर दे दीजिए ।" जिन्दल बोला ।

"अरुण की तस्वीर तुम रात को बंगले पर आकर ले लेना । मैँ वहीं मिलूंगा ।" खेड़ा साहब बोले…"मुझे तसल्लीबख्स काम चाहिए । फीस तुम जो भी चाहते हो; वहीँ मिलेगी ।"

"मेरे जॉब से आपको पूरी तसल्ली मिलेगी सेठ साहब । ---- रही बात फीस की तो एवन काम करने कें लिए इस काम के पन्द्रह हजार रुपये और खर्चा अलग से लगेगा । किसी पर चौबीसों घंटे निगाह रखने का काम बहुत मेहनत वाला होगा । इसमें मुझे अपने आदमी हरदम अरुण के पीछे लगाने हौंगे ।"

सोहनलाल जी ने टेबल की ड्राज में से बीस हजार निकालकर जिन्दल के सामने रख दिए ---

"यह बीस हजार-हैं l पन्द्रह फीस के और पांच खर्चे कै ।"

"शुक्रिया ।" जिन्दल ने दोनों गड्डियां उठाकर जेब में डाल लीं ।

इतना बताकर जिन्दल ने सपना को देखा I

"फिर क्या हुआ?"

"रातको मैंने अरुण की तस्वीर हासिल कीं और अरुण क्री तलाश में लग गया । दो दिन बाद वह मुझे तब नजर आया, जब रात मेँ अपने बंगले पर रहने कै लिए आया । मैंने तुरन्त राहुल को बुलाकर अरुण की निगरानी पर लगा दिया । रात को वह बंगले पर ही रहा और सुबह निकलकर मध्यमवर्गीय इलाके में किराये पर हासिल कर, रखे कमरे में पहुचा । अब मैं तुम्हें बता दूं कि अरुण कै तीन दोस्त हैँ । सुरेश दिवाकर, सूरज हेगडे और राजीव मंल्होत्रा । राजीव को छोडकर अन्य तीनों बडे खानदानों से हैं । राहुल और अशोक बारी-बारी उन चारों की निगरानी करते रहे । सोमवार सुबह मैं खुद उनकी निगरानी पर पहुचा तो देखा दिवाकर कहीं से कार चुरा लाया और तीनों ने कार मेँ बैठका शहर के कोने में स्थित बेंक में जाकर डकैती की । मैँ बाहर खड़ा सब देख रहा था l मेरे पास इतना समय नहीं था कि मैं सोहन लाल खेड़ा की बता पाता कि उसका बेटा क्या… करने जा रहा हे । डकैती के बाद मैं उसके पीछे लग गया । कहीं से पुलिस-जीप भी आकर उनकी कार कै पीछे पड गईं ।"

जिन्दल ने सब-कुछ बताकर कहा ।

"उन तीनों को कार से उतारकर, पुलिस से अपना पीछा छुड़ाकर राजीव एक अन्य जगह पहुंचा जहां बहुत ही खूबसूरत लडकी रहती थी । उसने बैंक डकैती की सारी दौलत उसके पास रख दी और खुद भी सारा दिन वहीं रहा मालूम करने पर पता चला कि उस लड़की का नाम अंजना हैं और जेब काटने का धंधा करती. हे । सावधानी कै तोर पर मैंने फोन करके राहुल को वहां बुला लिया l सारा दिन बीत गया, परन्तु राजीव बाहर नहीं निकला I मैं और राहुल खड़े रहे । फिर वह रात के साढे दस-ग्यारह बजे बाहर निकला । राहुल को सब

समझाकर मैंने उसे अंजना क्री निगरानी कै लिए वहीं छोडा और खुद राजीव कै पीछे लग गया । राजीव उसी किराए के कमरे में गया, जहां उसके तीनों दोस्त थे । रात बीत गई । राजीव वहां से बाहर नहीँ निकला और मैं वहीँ खडा रहा । अगले दिन सुबह नो बजे दिवाकर बाहर निकला । मैं वहीँ खड़ा था । आधे घंटे में ही दिवाकर एक कार चोरी करके लाया । साथ में लोहे का बड़ा ट्रक मी था । मेरी सभझ में कुछ न आया I आधे घटे बाद वह तीनों बाहर निकले । दरवाजे पर ताला लगा दिया और बडे ट्रक को डिग्गी में रखकर वहां से चल पड़े । उनके साथ राजीव नहीं था । और वह तीनों स्पष्ट घबराए हुए थे I मैं उनके पीछे लग गया I”

जिन्दल ने सपना को बताया कि किस प्रकार लोहे के ट्रक को लेकर उनु लोगों ने राजीव के फ्लेट में. प्रवेश किया और बाद में उसे पता चला कि राजीव की लाश थी ट्रंक में ।

जाहिर है कि उन तीनों ने ही किसी वजह से राजीव को मार डाला होगा । आगे का सारा हाल उसे बताया ।

"राजीव का अन्तिम संस्कार करने के बाद वह तीनों तापस कमरे में आये । फिर रात को निकलकर तीनों शंकर दादा जैसे नामी बदमाश से मिले । मुझे नहीं मालूम उससे क्यों मिले । तत्पश्वात् वह पुन: कमरे में वन्द हो गए । उधर राहुल अंजना की निगरानी कर रहा था ।"

फिर जिन्दल ने अंजना के बारे में बताया कि किस प्रकार अंजना ने सारी दौलत स्टेशन के क्लाकरूम में रख दी । कैसे उसका पर्स बदमाशों ने छीना l

"राहुल बदमाशों और पुलिस बालों के पीछे नहीं जा सका । मालूम नहीं कि उस पुलिस वाले ने उन बदमाशों से पर्स हासिल कियाकि नहीं । उसके पर्स में क्लाकरूम की रसीद थी, उस रसीद के दम पर सूटकेसों में भरी, क्लाकरूम में रखी बैंक-डकैती की लाखों की दोलत हासिल की जा सकती थी । मेरे मन में भी रसीद तलाश करने का लालच आ गया । अगले दिन मैंने पुलिस वाले को तलाश किया लगभग आधे शहर के पुलिस स्टेशनों में उस पुलिस वाले को ढूंढा । ना तो वह मिला और ना ही उसके हुलिए का कोई पुलिस वाला । मुझे कुछ भी समझ नहीं आया कि वह पुलिस वाला आखिर था कौन बहरहाल मैंने अशोक और राहुल क्रो अंजना की निगरानी पर लगा रखा हे । बारी-बारी वह उस पंर निगाह रख रहे हैँ । इस बीचं एक बार मैं शंकर दादा के बार में भी गया कि उससे इस बारे में कुछ बात करूं । शंकर दादा से मुलाकात भी हुई, परन्तु जाने क्या सोचकर मैंने उससे बात करने का इरादा त्याग दिया ।"

इतना कहकर जिन्दल खामोश हो गया ।।

उसके चुप होते ही सपना फौरन बोली ।

"अगर वह रसीद हमें मिल जाए तो लाखों रुपया हमारे पास आ जाएगा । कोईं इस बारे में जान भी नहीँ सकेगा कि डकैती का लाखो रुपया हमारे पास है ।"

"सही पूछो तो मेरा विचार भी यहीँ हे । इसी क्रांरण खामोशी से में क्लाकरूम की रसीद तलाश करने में लगा हुआ हूं।" जिन्दल ने कहा-"लेकिन जब तक उस पुलिस वाले या फिर उन दोनों बदमाशों कै बारे , जिन्होंने अंजना से बेग छीना था, पता नहीं चलता, तब तक कुछ नहीँ हो सकता । रसीद हासिल करने के लिए बहुत मेहनत की जरूरत है । दिवाकर, सूरज हेगडे और अरुण खेडा बैंक-डकैत्ती करके भी इस समय खाली हाथ हैं । उधर अजना कै हाथ मेँ दौलत आकर भी निकल गई । यानी कि रसीद कहां है, हम क्या, कोई भी नहीँ जानता ।"

“जिन्दल । प्लीज, कोशिश करो । रसीद को किसी तरह दूढ निकालो I” सपना आगे बढी और जिन्दल से लिपटती हुई बोली…"वह रसीद मिल जाए तो हमेँ कभी भी दौलत की कमी नहीँ होगी ।"

जिन्दल ने सपना को बाहों के घेरे में ले लिया ।

~ "अंजना की निगरानी तो की ही जा रही हे । देखते हें कि अब आगे क्या होगा । अजना जेबों को काटने का घन्धा करती है l बेवकूफ तो वह हे नहीं । वह पूरी कोशिश करेगी कि अपना हैंडबैग, क्लाकरूम की रसीद की ढूंढ निकाले। अगर उसने रसीद तलाश कर ली तो समझो बैंक-डकैती की दौलत हमारी मुट्ठी में हे ।

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फीनिश

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