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Guest
शंकर दादा उसके पेट मैं भी हाथ डालकर हैंडबैग निकाल लेगा I वह वहीँ खड़ा उन बदमाशों कै बाहर आने का इन्तजार करने लगा I
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फीनिश
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"दादा....!” बसन्त कमरे में पांव रखते ही सूखै स्वर में बोला-"इसमेँ हमारा कोई कसूर नहीं है ।"
शकर दादा कई पल कहरभरी निगाहों से दोनों क्रो देखता रहा l
"हमने आपको फोन पर भी सब-कुछ बताया था कि.... ।"
"उल्लू कै पट्ठों I" शंकर दादा दहाड़ा"…""तुम दोनों एक मामूली-से पुलिस वाले को नहीं सम्भाल सकै । वह तुमसे बेग छीनकर ले गया और तुम खड़े देखते रहे I"
" उसके पास रिवॉल्वर थी ।"
"मुझें अपनी कमजोरी मत बताओ कि, उसके पास क्या' था और क्या नहीं I" शंकर दादा ने पूर्ववत: लहजे में कहा----"जब उस लडकी ने स्टेशन के क्लाकरूम में चारों बड़े सूटकेस रखै तो उसी समय ही उनकी रसीद तुम्हें उससे छीन लेनी थी I"
"स्टेशन पर यह काम नहीं हो सकता था । वहां बहुत भीड थी । हम पकडे जाते ।"
“मुझे हर हाल में रसीद चाहिए। स्टेशन के सामान-धर' ~ की रसीद चाहिए, जो उस लडकी कै हैंडबैग मेँ थी । उल्लू कै पट्ठों, मेरी बात समझ में आई कि नहीं?" शंकर दादा बहुत क्रोध में था ।
"हमने उस पुलिस वाले को तलाश करने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह हमेँ कहीँ मी नहीं मिला । अंधेरे मेँ उसकी छाती पर लगी नाम की पट्टी नहीं पढ सकै थे, अगर नेम-प्लेट पढ ली होती तो हमने अब तक कहीं न कहीँ से तलाश कर ही लिया होता ।"
"नेमप्लेट की तरफ ध्यान दिया होता तो नाम पढते ना ।"
"उस समय हालात ऐसे थे कि हम इन बातों की तरफ ध्यान ही नहीँ दे पाए थेl”
"भट्टा बिठा दिया तुमने मेरा । लाखों के माल को आसानी से हाथ से निकाल दिया l मैँ तुम दोनों की ऐसी हालत कर दूंगा कि अपने पैदा होने पर भी पछताओगे… ।"
" बाॅस गुस्सा करने से कुछ नहीं होगा । हम अभी वह रसीद तलाश कर सकते हैं l”
"कैसे?" शकर दादा ने भिचे दांतों से दोनों को देखा I
"उस पुलिस चाले को ढूंढेगे। चाहे जैसे भी होगा हम उसे तलाश कर ही लेगे I"
"तो क्या अब तक उसने हैंडबैग सम्भालकर रखा होगा? वह तो उसने लडकी को वापस दे दिया होगा I" शंकर दादा दांत भीचकर बोला…"उसने वह रसीद अपने हैंडबैग में ही डाल ली थी ना?"
"पक्का बात एकदम पक्का’ I”
"ठीक हे, सबकुछ भूलकर उस लडकी को नापो I" शंकर दादा ने कहा-"पुलिस वाले ने वह बेग लडकी को वापस कर दिया होगा। क्या कहा था तुमने वह किसी जबकतरे की लडकी है?"
“हां दादा । बहुत वड़ा उस्ताद था जेब काटने का उसका, चाप । इसी से हिसाब लगा लो कि आज आधे शहर पें उसी कै ही चेले-चपाटे जेब काटने का धन्धा कर रहे हैं ।"
"'मुझे इससे कोई मतलब नहीँ कि उसका चाप क्या करता था । तुम लोग उस लडकी को पकडो और उससे स्टेशन के क्लाकरुम की रसीद वसूलो । आना कानी करे तो उठाकर ले आओ साली को I"
दोनों ने सिर हिलाया I
“इस बार कोई कोताही नहीं होनी चाहिए I”
"नहीं होगी दादा । पक्के से भी पक्का… I"
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फीनिश
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अंजना की हालत बुरी हो रही थी I उसका मन कर रहा था कि अपना सिर दीवार से टकराना शुरु कर दे I लुटी-पुटीं-सी वह अपने घर में बैठी थी I सूनी-सूनी निगाहें सामने खाली पड़े दोनों थैलों और काले रंग कें ट्रंक पर बार-बार जा रही थीं I राजीव को तो भगबान ने पहले ही उससे छीन लिया था I उसके भविष्य कै लिए राजीव जो दौलत छोड गया था वह भी हाथ से निकल गई थी I
बैंक की लूट कै सारे रुपये उसने चारों सूटकेसों में भरकर स्टेशन के क्लाकरूम में जमा करवा दिये थे I उसकी रसीद तो पर्सं में रखी थी जोकि बस में उन बदमाशों ने पर्स छीन लिया था I
बस कुछ देर तो रुको रही थी वह भी बस के अन्य यात्रियों के साथ उस पुलिस वाले का इन्तजार करती रहीँ थी, जो कि वदमाशो के पीछे भागा था ।
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फीनिश
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"दादा....!” बसन्त कमरे में पांव रखते ही सूखै स्वर में बोला-"इसमेँ हमारा कोई कसूर नहीं है ।"
शकर दादा कई पल कहरभरी निगाहों से दोनों क्रो देखता रहा l
"हमने आपको फोन पर भी सब-कुछ बताया था कि.... ।"
"उल्लू कै पट्ठों I" शंकर दादा दहाड़ा"…""तुम दोनों एक मामूली-से पुलिस वाले को नहीं सम्भाल सकै । वह तुमसे बेग छीनकर ले गया और तुम खड़े देखते रहे I"
" उसके पास रिवॉल्वर थी ।"
"मुझें अपनी कमजोरी मत बताओ कि, उसके पास क्या' था और क्या नहीं I" शंकर दादा ने पूर्ववत: लहजे में कहा----"जब उस लडकी ने स्टेशन के क्लाकरूम में चारों बड़े सूटकेस रखै तो उसी समय ही उनकी रसीद तुम्हें उससे छीन लेनी थी I"
"स्टेशन पर यह काम नहीं हो सकता था । वहां बहुत भीड थी । हम पकडे जाते ।"
“मुझे हर हाल में रसीद चाहिए। स्टेशन के सामान-धर' ~ की रसीद चाहिए, जो उस लडकी कै हैंडबैग मेँ थी । उल्लू कै पट्ठों, मेरी बात समझ में आई कि नहीं?" शंकर दादा बहुत क्रोध में था ।
"हमने उस पुलिस वाले को तलाश करने की बहुत चेष्टा की, परन्तु वह हमेँ कहीँ मी नहीं मिला । अंधेरे मेँ उसकी छाती पर लगी नाम की पट्टी नहीं पढ सकै थे, अगर नेम-प्लेट पढ ली होती तो हमने अब तक कहीं न कहीँ से तलाश कर ही लिया होता ।"
"नेमप्लेट की तरफ ध्यान दिया होता तो नाम पढते ना ।"
"उस समय हालात ऐसे थे कि हम इन बातों की तरफ ध्यान ही नहीँ दे पाए थेl”
"भट्टा बिठा दिया तुमने मेरा । लाखों के माल को आसानी से हाथ से निकाल दिया l मैँ तुम दोनों की ऐसी हालत कर दूंगा कि अपने पैदा होने पर भी पछताओगे… ।"
" बाॅस गुस्सा करने से कुछ नहीं होगा । हम अभी वह रसीद तलाश कर सकते हैं l”
"कैसे?" शकर दादा ने भिचे दांतों से दोनों को देखा I
"उस पुलिस चाले को ढूंढेगे। चाहे जैसे भी होगा हम उसे तलाश कर ही लेगे I"
"तो क्या अब तक उसने हैंडबैग सम्भालकर रखा होगा? वह तो उसने लडकी को वापस दे दिया होगा I" शंकर दादा दांत भीचकर बोला…"उसने वह रसीद अपने हैंडबैग में ही डाल ली थी ना?"
"पक्का बात एकदम पक्का’ I”
"ठीक हे, सबकुछ भूलकर उस लडकी को नापो I" शंकर दादा ने कहा-"पुलिस वाले ने वह बेग लडकी को वापस कर दिया होगा। क्या कहा था तुमने वह किसी जबकतरे की लडकी है?"
“हां दादा । बहुत वड़ा उस्ताद था जेब काटने का उसका, चाप । इसी से हिसाब लगा लो कि आज आधे शहर पें उसी कै ही चेले-चपाटे जेब काटने का धन्धा कर रहे हैं ।"
"'मुझे इससे कोई मतलब नहीँ कि उसका चाप क्या करता था । तुम लोग उस लडकी को पकडो और उससे स्टेशन के क्लाकरुम की रसीद वसूलो । आना कानी करे तो उठाकर ले आओ साली को I"
दोनों ने सिर हिलाया I
“इस बार कोई कोताही नहीं होनी चाहिए I”
"नहीं होगी दादा । पक्के से भी पक्का… I"
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फीनिश
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अंजना की हालत बुरी हो रही थी I उसका मन कर रहा था कि अपना सिर दीवार से टकराना शुरु कर दे I लुटी-पुटीं-सी वह अपने घर में बैठी थी I सूनी-सूनी निगाहें सामने खाली पड़े दोनों थैलों और काले रंग कें ट्रंक पर बार-बार जा रही थीं I राजीव को तो भगबान ने पहले ही उससे छीन लिया था I उसके भविष्य कै लिए राजीव जो दौलत छोड गया था वह भी हाथ से निकल गई थी I
बैंक की लूट कै सारे रुपये उसने चारों सूटकेसों में भरकर स्टेशन के क्लाकरूम में जमा करवा दिये थे I उसकी रसीद तो पर्सं में रखी थी जोकि बस में उन बदमाशों ने पर्स छीन लिया था I
बस कुछ देर तो रुको रही थी वह भी बस के अन्य यात्रियों के साथ उस पुलिस वाले का इन्तजार करती रहीँ थी, जो कि वदमाशो के पीछे भागा था ।