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" वह पहले भी जिन्दा था । अब भी जिन्दा हे । तुम्हारे घूंसे से वह मरा नहीं था, वल्कि लम्बी बेहोशी में डूब गया था I कुल मिलाकर अब तुम लोग यह बात अच्छी तरह समझ सकतें हो कि कैसे खतरे में घिरे बेठे.हो तुम लोग I अपने बाप को समझा देना । देवराज चौहान का मुह बन्द रहेगा तो सब ठीक रहेगा । कल आऊंगा मैं । मेरी बात का जवाब मिल जाना चाहिए । नाम याद रखना-देवराज चौहान ।" कहने कै साथ ही देवराज चौहान पलटा ओर तेज-तेज कदम उठाता हुआ बाहर निकलता चला गया ।"
दिवाकर बुत क्रो मानिन्द हक्का-बकाका-सा वहीं…का-वहीं खड़ा रहा था I
बाहर अपनी कार कै समीप पहुचते ही, देवराज चौहान ठिठक्रा । उसकी आखें सिकुड़कर छोटी होती चली गयीं I चेहरे -पर अजीब-से भाव फैलते चले गए ।
महादेव कार से टेक लगाये, सिगरेट कै कश लेता हुआ, लापरवाही से खडा था I कदमों की आहट-पाकर उसने सिर घुमाया । देवराज चौहान को वहा पाकर बरबस ही मुस्कराया और सीधा खड़े होते हुए बोला ।
“कार को देखकर मै सोच ही रहा था कि यह कार तो अपने देवराज चौहान की हे I मेरा ख्याल ठीक ही निकला I जब मैंने बन्द कार में, तुम्हारा ब्रीफकेस पड़ा देखा I"
देवराज ने महादेव की आखों में झांका I
“नोटों से भरा ब्रीफकेस तुम्हें इस तरह कार में छोड़कर नहीं जाना चाहिए । "
“इस ब्रीफकेस को तो सिर्फ तुमसे ही खतरा हो सकत्ता है, और किसी से नहीं ।" .
"मेरी तरफ से निश्चित रहो । मैँ दोस्तों के माल पर हाथ ,नहीं फेरता I" महादेव हौले से हंसा-"वैसे तुम्हारी इतनी ही मेहरबानी काफी रही कि तुमने मेरे हारे बीस हजार व्याज कै सरथ-साथ बापस दिलवा दिए ।"
"तुमने मेरा पीछा क्यों किया?" देवराज चौहान मतलब की बात पर आया ।
“कौन कहता है?"
"तुम्हारे यहां होने का यहीँ मतलब निकलता है I अगर मुझ पर निगाह रखनी थी तो स्पष्ट कह देते, मैँ तुम्हें साथ ही ले आता या जो भी मुझसे पूछना चाहते हो, स्पष्ट पूछ लेते ।"
महादेब ने सिगरेट का कश लिया और बंगले पर निगाह मारी ।
"इस बंगले में तुम्हारा कौंन सा पहचान वाला रहता हैं?"
देवराज चौहान की आखो में हल्की -सी कठोरता' उभरती चली गई ।
"मैंने तुमसे कुछ पूछा था महादेव । जो मैं पूछु इस समय सिर्फ उसी का जवाब दो ।"
"भई नाराज क्यों होते हो" महादेव मुस्करा रहा था----"खामखाह गुस्सा मत करो और क्रोध में मुझे भी किसी की आती गाडी आगे मत फेंक देना । वैसे मैंने तुम्हारा पीछा नहीं किया ।”
“तो फिर यहां कैसे आए? आधे घण्टे में ही यहा कैसे आ गए, जहां मै आया हू ।"
"संयोग ही समझो । मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता, लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि अब बताना ही पडेगा । वह साथ वाला बंगला देख रहे हो न, जहा से तुम निकले हो, उसकी दायी तरफ वाला I"
"हा !"
. “मै वही पर रहता हू।" महादेब ने सिर हिलाकर कहते हुए सिगरेट का कश लिया ।
“तुम इस वंगले में रहते हो ।" देवराज चौहान कै चेहरे पर अजीब-से भाव फैल गए ।
“क्यों ? क्या मैं बंगले में नहीं रह सकता?" महादेव ने उसी भाव में जवाब दिया ।
"तुम्हारी शक्ल बगले में रहने लायक नहीं है ।" देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़े । .
“पैंतालीस साल का खूबसूरत चेहरा है मेरा ।" महादेव ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा ।
"अपने कपडे देखे हैं?"
"कपडे क्या बुराई है मेरे कपडों में? पन्द्रह दिन पहले ही तो नया सूट खरीदा है । ”
"इन कपडों का पहनने वाला ऐसे बंगले का मालिक नहीं ही सकता । महादेव बेहतर यहीँ होगा कि मुझसे झूठ बोलने की चेष्टा मत करो !"
देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा-"नहीँ तो… ...।"
" देवराज चौहान साहव । मैंने यह कहा है, मैं इस बगले में रहता हू I मैं इस बंगले का मालिक नहीं हूं। बंगला तो दूर मेरी हैसियत ही क्या' जो बंगले की बाहरी चारदीवारी भी खऱीदने का दम जेब में रखता होऊं।"
देवराज चौहान कै चेहरे का तनाव कुछ कम हुआ ।
उसने सिगरेट सुलगाई I
"तेरे पिता का बंगला तो नहीं हो सकता यह?"
" नहीँ I"
तेरे मामे चाचे का भी नहीं होगा । "
"नहीं हे ।"
"तेरे सगे माई का भी नहीं होगा?"
"नहीं I" महादेव ने शराफत से सिर हिलाया ।
"और तेरे में इतना दम भी नहीं कि तू इतने बडे वगले का किराया दे सके?"
" किराया देने की औकात तो वास्तव में मेरी नहीं हैं !!" महादेव ने कबूल किया ।
"यह बंगला तुझे दहेज में भी नहीं मिला होगा?" देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लिया ।
"शादी ही नहीं की तो फिर दहेज कहां से आएगा I” महादेव हसा।
"फिर तू किस बलबूते पर यहां रहता है? किसका बंगला यह?”
. "इस बंगले की मालकिन एक बूढ़ी औरत हैं । उसका कोई होता-सोता नहीं है I" महादेव ने गहरी सांस लेकर कहा-"मैं उसका होता- सोता बनने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मरने से पहले यह बंगला और जेब में जो कुछ भी हो, मेरे हवाले कर जाए I दो महीने हो गए यहां रहते-रहते I”
"रहने का मामला कैसे पटा?"
“ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी । चेहरे पर कपडा बाँधकर 'बंगले के पीछे से भीतर घुसा और दो नौकरों और बुढिया-को बाँधकर सवा लाख का माल लेकर चंपत हो गया । घंटे -भर बादं असली भेष में माल कै साथ वापस लौटा । बेचारे तव भी वंघे हुए थे ।
बुढिया की हालत तो बुरी हो रही थी I उन्हें खोला और सवा लाख का माल बुढिया कै सामने रख दिया I उसे बताया कि मैँ बंगले कै सामने से गुजर रहा था कि चोर को मुंह ढांपे बाहर निकलते देखा । मै तभी समझ गया कि मामला गडबड़ हे I मैंने उसे पकडा और ठोक-पीटकर भगा दिया । मार खाते समय उसने बताया कि वह बंगले में चोरी करके आ रहा है । तो माल वापस करने आ गया । बुढिया मुझसे वहुत अच्छी तरह पेश आई I उसने ~ खाना वगैरह भी खिलाया I उसे मालूम हुआ कि शहर में नया हूं और रहने के लिए ठिकाना ढूंढ रहा हुं, बीवी कै बारे में पूछा तो बता दिया कि पांचं साल पहले ही वह किसी के साथ तीनों बच्चों क्रो लेकर, भाग गई थी । वहुत ढूंढा लेकिन वह नहीँ मिली, वरहाल कुल मिलाकर उसे मुझ पर तरस आया, जो कि में चाहता था । उसने मुझे छोटा भाई बनाकर अपने पास ही रख लिया । यानी कि रहना, खाना फ्री । कपड़े भी बुढिया ने सिलवा दिए l कभी कभार खर्चा-पानी भी मिल जाता । बुढिया को वहुत अच्छी तरह शीशे में उतार रखा डै मैंने । किसी बात की फिक्र नहीं ।"
देवराज चौहान के होठों पर मीठी मुस्कान उभरती चली गई I
"काफी होशियार हो ।"
"दोस्तों की मेहरबानी है । वरना वन्दा तो किसी काम का नहीं हे I” महादेव ने सिर हिलाया I
“अगर बुढिया का कोई होता-सोता निकल आया तो तुम खाली हाय रह जाओगे l”
"क्या फर्क पडता हैं । सब चलता है I फिलहाल तो सब-कूछ मजे में चल हीँरम रहा है।" . .
"मै तुम्हारी बात की सत्यता जांचना चाहता हूं ।" देवराज ~ चौहान बोला I
“जरुर-जरुर I आओ भीतर आओ । बतौर दोस्त में तुम्हें बुढिया से मिलाता हूं। खाना भी तैयार होगा । रात हो ही चूकी है । एक साथ खायेंगे । बातों-बातों में मेरी बात की सत्यता की जांच कर लेना ।"
"आज नहीं । कल आऊंगा I”
दिवाकर बुत क्रो मानिन्द हक्का-बकाका-सा वहीं…का-वहीं खड़ा रहा था I
बाहर अपनी कार कै समीप पहुचते ही, देवराज चौहान ठिठक्रा । उसकी आखें सिकुड़कर छोटी होती चली गयीं I चेहरे -पर अजीब-से भाव फैलते चले गए ।
महादेव कार से टेक लगाये, सिगरेट कै कश लेता हुआ, लापरवाही से खडा था I कदमों की आहट-पाकर उसने सिर घुमाया । देवराज चौहान को वहा पाकर बरबस ही मुस्कराया और सीधा खड़े होते हुए बोला ।
“कार को देखकर मै सोच ही रहा था कि यह कार तो अपने देवराज चौहान की हे I मेरा ख्याल ठीक ही निकला I जब मैंने बन्द कार में, तुम्हारा ब्रीफकेस पड़ा देखा I"
देवराज ने महादेव की आखों में झांका I
“नोटों से भरा ब्रीफकेस तुम्हें इस तरह कार में छोड़कर नहीं जाना चाहिए । "
“इस ब्रीफकेस को तो सिर्फ तुमसे ही खतरा हो सकत्ता है, और किसी से नहीं ।" .
"मेरी तरफ से निश्चित रहो । मैँ दोस्तों के माल पर हाथ ,नहीं फेरता I" महादेव हौले से हंसा-"वैसे तुम्हारी इतनी ही मेहरबानी काफी रही कि तुमने मेरे हारे बीस हजार व्याज कै सरथ-साथ बापस दिलवा दिए ।"
"तुमने मेरा पीछा क्यों किया?" देवराज चौहान मतलब की बात पर आया ।
“कौन कहता है?"
"तुम्हारे यहां होने का यहीँ मतलब निकलता है I अगर मुझ पर निगाह रखनी थी तो स्पष्ट कह देते, मैँ तुम्हें साथ ही ले आता या जो भी मुझसे पूछना चाहते हो, स्पष्ट पूछ लेते ।"
महादेब ने सिगरेट का कश लिया और बंगले पर निगाह मारी ।
"इस बंगले में तुम्हारा कौंन सा पहचान वाला रहता हैं?"
देवराज चौहान की आखो में हल्की -सी कठोरता' उभरती चली गई ।
"मैंने तुमसे कुछ पूछा था महादेव । जो मैं पूछु इस समय सिर्फ उसी का जवाब दो ।"
"भई नाराज क्यों होते हो" महादेव मुस्करा रहा था----"खामखाह गुस्सा मत करो और क्रोध में मुझे भी किसी की आती गाडी आगे मत फेंक देना । वैसे मैंने तुम्हारा पीछा नहीं किया ।”
“तो फिर यहां कैसे आए? आधे घण्टे में ही यहा कैसे आ गए, जहां मै आया हू ।"
"संयोग ही समझो । मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता, लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि अब बताना ही पडेगा । वह साथ वाला बंगला देख रहे हो न, जहा से तुम निकले हो, उसकी दायी तरफ वाला I"
"हा !"
. “मै वही पर रहता हू।" महादेब ने सिर हिलाकर कहते हुए सिगरेट का कश लिया ।
“तुम इस वंगले में रहते हो ।" देवराज चौहान कै चेहरे पर अजीब-से भाव फैल गए ।
“क्यों ? क्या मैं बंगले में नहीं रह सकता?" महादेव ने उसी भाव में जवाब दिया ।
"तुम्हारी शक्ल बगले में रहने लायक नहीं है ।" देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़े । .
“पैंतालीस साल का खूबसूरत चेहरा है मेरा ।" महादेव ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा ।
"अपने कपडे देखे हैं?"
"कपडे क्या बुराई है मेरे कपडों में? पन्द्रह दिन पहले ही तो नया सूट खरीदा है । ”
"इन कपडों का पहनने वाला ऐसे बंगले का मालिक नहीं ही सकता । महादेव बेहतर यहीँ होगा कि मुझसे झूठ बोलने की चेष्टा मत करो !"
देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा-"नहीँ तो… ...।"
" देवराज चौहान साहव । मैंने यह कहा है, मैं इस बगले में रहता हू I मैं इस बंगले का मालिक नहीं हूं। बंगला तो दूर मेरी हैसियत ही क्या' जो बंगले की बाहरी चारदीवारी भी खऱीदने का दम जेब में रखता होऊं।"
देवराज चौहान कै चेहरे का तनाव कुछ कम हुआ ।
उसने सिगरेट सुलगाई I
"तेरे पिता का बंगला तो नहीं हो सकता यह?"
" नहीँ I"
तेरे मामे चाचे का भी नहीं होगा । "
"नहीं हे ।"
"तेरे सगे माई का भी नहीं होगा?"
"नहीं I" महादेव ने शराफत से सिर हिलाया ।
"और तेरे में इतना दम भी नहीं कि तू इतने बडे वगले का किराया दे सके?"
" किराया देने की औकात तो वास्तव में मेरी नहीं हैं !!" महादेव ने कबूल किया ।
"यह बंगला तुझे दहेज में भी नहीं मिला होगा?" देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लिया ।
"शादी ही नहीं की तो फिर दहेज कहां से आएगा I” महादेव हसा।
"फिर तू किस बलबूते पर यहां रहता है? किसका बंगला यह?”
. "इस बंगले की मालकिन एक बूढ़ी औरत हैं । उसका कोई होता-सोता नहीं है I" महादेव ने गहरी सांस लेकर कहा-"मैं उसका होता- सोता बनने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मरने से पहले यह बंगला और जेब में जो कुछ भी हो, मेरे हवाले कर जाए I दो महीने हो गए यहां रहते-रहते I”
"रहने का मामला कैसे पटा?"
“ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी । चेहरे पर कपडा बाँधकर 'बंगले के पीछे से भीतर घुसा और दो नौकरों और बुढिया-को बाँधकर सवा लाख का माल लेकर चंपत हो गया । घंटे -भर बादं असली भेष में माल कै साथ वापस लौटा । बेचारे तव भी वंघे हुए थे ।
बुढिया की हालत तो बुरी हो रही थी I उन्हें खोला और सवा लाख का माल बुढिया कै सामने रख दिया I उसे बताया कि मैँ बंगले कै सामने से गुजर रहा था कि चोर को मुंह ढांपे बाहर निकलते देखा । मै तभी समझ गया कि मामला गडबड़ हे I मैंने उसे पकडा और ठोक-पीटकर भगा दिया । मार खाते समय उसने बताया कि वह बंगले में चोरी करके आ रहा है । तो माल वापस करने आ गया । बुढिया मुझसे वहुत अच्छी तरह पेश आई I उसने ~ खाना वगैरह भी खिलाया I उसे मालूम हुआ कि शहर में नया हूं और रहने के लिए ठिकाना ढूंढ रहा हुं, बीवी कै बारे में पूछा तो बता दिया कि पांचं साल पहले ही वह किसी के साथ तीनों बच्चों क्रो लेकर, भाग गई थी । वहुत ढूंढा लेकिन वह नहीँ मिली, वरहाल कुल मिलाकर उसे मुझ पर तरस आया, जो कि में चाहता था । उसने मुझे छोटा भाई बनाकर अपने पास ही रख लिया । यानी कि रहना, खाना फ्री । कपड़े भी बुढिया ने सिलवा दिए l कभी कभार खर्चा-पानी भी मिल जाता । बुढिया को वहुत अच्छी तरह शीशे में उतार रखा डै मैंने । किसी बात की फिक्र नहीं ।"
देवराज चौहान के होठों पर मीठी मुस्कान उभरती चली गई I
"काफी होशियार हो ।"
"दोस्तों की मेहरबानी है । वरना वन्दा तो किसी काम का नहीं हे I” महादेव ने सिर हिलाया I
“अगर बुढिया का कोई होता-सोता निकल आया तो तुम खाली हाय रह जाओगे l”
"क्या फर्क पडता हैं । सब चलता है I फिलहाल तो सब-कूछ मजे में चल हीँरम रहा है।" . .
"मै तुम्हारी बात की सत्यता जांचना चाहता हूं ।" देवराज ~ चौहान बोला I
“जरुर-जरुर I आओ भीतर आओ । बतौर दोस्त में तुम्हें बुढिया से मिलाता हूं। खाना भी तैयार होगा । रात हो ही चूकी है । एक साथ खायेंगे । बातों-बातों में मेरी बात की सत्यता की जांच कर लेना ।"
"आज नहीं । कल आऊंगा I”