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वारदात complete novel

" वह पहले भी जिन्दा था । अब भी जिन्दा हे । तुम्हारे घूंसे से वह मरा नहीं था, वल्कि लम्बी बेहोशी में डूब गया था I कुल मिलाकर अब तुम लोग यह बात अच्छी तरह समझ सकतें हो कि कैसे खतरे में घिरे बेठे.हो तुम लोग I अपने बाप को समझा देना । देवराज चौहान का मुह बन्द रहेगा तो सब ठीक रहेगा । कल आऊंगा मैं । मेरी बात का जवाब मिल जाना चाहिए । नाम याद रखना-देवराज चौहान ।" कहने कै साथ ही देवराज चौहान पलटा ओर तेज-तेज कदम उठाता हुआ बाहर निकलता चला गया ।"

दिवाकर बुत क्रो मानिन्द हक्का-बकाका-सा वहीं…का-वहीं खड़ा रहा था I

बाहर अपनी कार कै समीप पहुचते ही, देवराज चौहान ठिठक्रा । उसकी आखें सिकुड़कर छोटी होती चली गयीं I चेहरे -पर अजीब-से भाव फैलते चले गए ।

महादेव कार से टेक लगाये, सिगरेट कै कश लेता हुआ, लापरवाही से खडा था I कदमों की आहट-पाकर उसने सिर घुमाया । देवराज चौहान को वहा पाकर बरबस ही मुस्कराया और सीधा खड़े होते हुए बोला ।

“कार को देखकर मै सोच ही रहा था कि यह कार तो अपने देवराज चौहान की हे I मेरा ख्याल ठीक ही निकला I जब मैंने बन्द कार में, तुम्हारा ब्रीफकेस पड़ा देखा I"

देवराज ने महादेव की आखों में झांका I

“नोटों से भरा ब्रीफकेस तुम्हें इस तरह कार में छोड़कर नहीं जाना चाहिए । "

“इस ब्रीफकेस को तो सिर्फ तुमसे ही खतरा हो सकत्ता है, और किसी से नहीं ।" .

"मेरी तरफ से निश्चित रहो । मैँ दोस्तों के माल पर हाथ ,नहीं फेरता I" महादेव हौले से हंसा-"वैसे तुम्हारी इतनी ही मेहरबानी काफी रही कि तुमने मेरे हारे बीस हजार व्याज कै सरथ-साथ बापस दिलवा दिए ।"

"तुमने मेरा पीछा क्यों किया?" देवराज चौहान मतलब की बात पर आया ।

“कौन कहता है?"

"तुम्हारे यहां होने का यहीँ मतलब निकलता है I अगर मुझ पर निगाह रखनी थी तो स्पष्ट कह देते, मैँ तुम्हें साथ ही ले आता या जो भी मुझसे पूछना चाहते हो, स्पष्ट पूछ लेते ।"

महादेब ने सिगरेट का कश लिया और बंगले पर निगाह मारी ।

"इस बंगले में तुम्हारा कौंन सा पहचान वाला रहता हैं?"

देवराज चौहान की आखो में हल्की -सी कठोरता' उभरती चली गई ।

"मैंने तुमसे कुछ पूछा था महादेव । जो मैं पूछु इस समय सिर्फ उसी का जवाब दो ।"

"भई नाराज क्यों होते हो" महादेव मुस्करा रहा था----"खामखाह गुस्सा मत करो और क्रोध में मुझे भी किसी की आती गाडी आगे मत फेंक देना । वैसे मैंने तुम्हारा पीछा नहीं किया ।”

“तो फिर यहां कैसे आए? आधे घण्टे में ही यहा कैसे आ गए, जहां मै आया हू ।"

"संयोग ही समझो । मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता, लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि अब बताना ही पडेगा । वह साथ वाला बंगला देख रहे हो न, जहा से तुम निकले हो, उसकी दायी तरफ वाला I"

"हा !"

. “मै वही पर रहता हू।" महादेब ने सिर हिलाकर कहते हुए सिगरेट का कश लिया ।

“तुम इस वंगले में रहते हो ।" देवराज चौहान कै चेहरे पर अजीब-से भाव फैल गए ।

“क्यों ? क्या मैं बंगले में नहीं रह सकता?" महादेव ने उसी भाव में जवाब दिया ।

"तुम्हारी शक्ल बगले में रहने लायक नहीं है ।" देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़े । .

“पैंतालीस साल का खूबसूरत चेहरा है मेरा ।" महादेव ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा ।

"अपने कपडे देखे हैं?"

"कपडे क्या बुराई है मेरे कपडों में? पन्द्रह दिन पहले ही तो नया सूट खरीदा है । ”

"इन कपडों का पहनने वाला ऐसे बंगले का मालिक नहीं ही सकता । महादेव बेहतर यहीँ होगा कि मुझसे झूठ बोलने की चेष्टा मत करो !"

देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा-"नहीँ तो… ...।"

" देवराज चौहान साहव । मैंने यह कहा है, मैं इस बगले में रहता हू I मैं इस बंगले का मालिक नहीं हूं। बंगला तो दूर मेरी हैसियत ही क्या' जो बंगले की बाहरी चारदीवारी भी खऱीदने का दम जेब में रखता होऊं।"

देवराज चौहान कै चेहरे का तनाव कुछ कम हुआ ।

उसने सिगरेट सुलगाई I

"तेरे पिता का बंगला तो नहीं हो सकता यह?"

" नहीँ I"

तेरे मामे चाचे का भी नहीं होगा । "

"नहीं हे ।"

"तेरे सगे माई का भी नहीं होगा?"

"नहीं I" महादेव ने शराफत से सिर हिलाया ।

"और तेरे में इतना दम भी नहीं कि तू इतने बडे वगले का किराया दे सके?"

" किराया देने की औकात तो वास्तव में मेरी नहीं हैं !!" महादेव ने कबूल किया ।

"यह बंगला तुझे दहेज में भी नहीं मिला होगा?" देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लिया ।

"शादी ही नहीं की तो फिर दहेज कहां से आएगा I” महादेव हसा।

"फिर तू किस बलबूते पर यहां रहता है? किसका बंगला यह?”

. "इस बंगले की मालकिन एक बूढ़ी औरत हैं । उसका कोई होता-सोता नहीं है I" महादेव ने गहरी सांस लेकर कहा-"मैं उसका होता- सोता बनने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मरने से पहले यह बंगला और जेब में जो कुछ भी हो, मेरे हवाले कर जाए I दो महीने हो गए यहां रहते-रहते I”

"रहने का मामला कैसे पटा?"

“ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी । चेहरे पर कपडा बाँधकर 'बंगले के पीछे से भीतर घुसा और दो नौकरों और बुढिया-को बाँधकर सवा लाख का माल लेकर चंपत हो गया । घंटे -भर बादं असली भेष में माल कै साथ वापस लौटा । बेचारे तव भी वंघे हुए थे ।

बुढिया की हालत तो बुरी हो रही थी I उन्हें खोला और सवा लाख का माल बुढिया कै सामने रख दिया I उसे बताया कि मैँ बंगले कै सामने से गुजर रहा था कि चोर को मुंह ढांपे बाहर निकलते देखा । मै तभी समझ गया कि मामला गडबड़ हे I मैंने उसे पकडा और ठोक-पीटकर भगा दिया । मार खाते समय उसने बताया कि वह बंगले में चोरी करके आ रहा है । तो माल वापस करने आ गया । बुढिया मुझसे वहुत अच्छी तरह पेश आई I उसने ~ खाना वगैरह भी खिलाया I उसे मालूम हुआ कि शहर में नया हूं और रहने के लिए ठिकाना ढूंढ रहा हुं, बीवी कै बारे में पूछा तो बता दिया कि पांचं साल पहले ही वह किसी के साथ तीनों बच्चों क्रो लेकर, भाग गई थी । वहुत ढूंढा लेकिन वह नहीँ मिली, वरहाल कुल मिलाकर उसे मुझ पर तरस आया, जो कि में चाहता था । उसने मुझे छोटा भाई बनाकर अपने पास ही रख लिया । यानी कि रहना, खाना फ्री । कपड़े भी बुढिया ने सिलवा दिए l कभी कभार खर्चा-पानी भी मिल जाता । बुढिया को वहुत अच्छी तरह शीशे में उतार रखा डै मैंने । किसी बात की फिक्र नहीं ।"

देवराज चौहान के होठों पर मीठी मुस्कान उभरती चली गई I

"काफी होशियार हो ।"

"दोस्तों की मेहरबानी है । वरना वन्दा तो किसी काम का नहीं हे I” महादेव ने सिर हिलाया I

“अगर बुढिया का कोई होता-सोता निकल आया तो तुम खाली हाय रह जाओगे l”

"क्या फर्क पडता हैं । सब चलता है I फिलहाल तो सब-कूछ मजे में चल हीँरम रहा है।" . .

"मै तुम्हारी बात की सत्यता जांचना चाहता हूं ।" देवराज ~ चौहान बोला I

“जरुर-जरुर I आओ भीतर आओ । बतौर दोस्त में तुम्हें बुढिया से मिलाता हूं। खाना भी तैयार होगा । रात हो ही चूकी है । एक साथ खायेंगे । बातों-बातों में मेरी बात की सत्यता की जांच कर लेना ।"

"आज नहीं । कल आऊंगा I”
 
“तुम्हारी मर्जी ।" महादेव ने दोबारा इन्वाइंट नहीं किया I देवराज चौहान कार का दरवाजा खोलने लगा तो महादेव कह उठा I

" तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया देवराज चौहान ।"

" कौन-सी बात?" देवराज चौहान ठिठका ।

"जहां से तुम आ रहे हों । यानी कि इस बंगले मे कौन रहता है?" . . .

"तुम्हें इस बात से क्या लेना देना?" देवराज चौहान ने उसकी आँखों में झांका I

"कोई खास नहीं । दरअसल पहले यह बंगला खाली रहता था । कुछ दिन से अब बंगले में हलचल तो महसूस होने लगी हैं, परन्तु घर कै मालिक बाहर नहीं निकलते, जोकि मुझे खटक रहा है । जाहिर है, जब कोई नया बंगला खरीदता हैं तो गर्दन बाहर निकालकर दायें-बायेँ देखता हे कि आसपास कौन रहता है । परन्तु इस बंगले में रहने वालों ने ऐसी कोई चेष्टा नहीं की, हेरत की बात है कि इस बंगले में आने वाले लोग, शाम को भी बाहर नहीं बैठते । देखा हे तो सिर्फ दो नौकरों को । इसलिए पूछ रहा था कि यहां कौन रहता है और तुम्हारा इन लोगों से वया वास्ता?"

“इस बंगले में जो भी रहता हैं, उसका तुम्हारे से कोई वास्ता नहीं ।” देवराज चौहान सख्त स्वर पें बोला ।

"ज़रा भी वास्ता नहीं?" महादेव ने आंखें फाडी ।

"जरा भी नहीं I”

"पडोसी हैँ । जान-पहचान् होते ही धीरे-धीरे वास्ता पडना भी आरम्भ हो जाएगा I”

"ज्यादा चालाकी मत करौ महादेव । तुम्हारा इन लोगों से वास्ता नहीं पडना चाहिए । यह मेरी पहचान के लोग हैं । अगर तुमने अपने काम से वास्ता न रखा तो इस बंगले में रहने वाली बुढिया के सामने तुम्हारी पोल खोल दूंगा ।"

"तुम तो नाहक ही परेशान हो रहे हो देवराज़ चौहान में… I”

"मेरे परेशान होने की चिन्ता मत करो । मैं तो तुम्हें आने वाली परेशानी से बचाना चाहता हूं।" देवराज चौहान ने अपने शब्दों को चबाकर कहा-"सिर्फ अपने काम से मतलब रखो, समझे मेरी बात?"

"समझ गया । तुम तो यू हीँ बात को बढाये जा रहे हो I" महादेव ने खीं-खीं की ।

" मै आऊंगा, तुम्हारे बंगले, यानी कि तुम्हारी उत बुढिया कै पास ।"

"जरूर आना ।" महादेव ने गर्दन हिलाई ।

"अपने आप से मतलब रखना I"

" वार-बार एक बात को क्यों दोहराते हो?"

"तुम्हारा भला चाहता हूँ इसलिए बार-बार कह रहा हू।" देवराज चौहान ने महादेव की आंखों में झांका फिर कार का दरबाजा खोलकर भीतर बैठा और कार स्टार्ट करकै, आगे बढा दी ।

महादेव ने दिवाकर वाले बंगले पर निगाह मारी फिर बगल, वाले बंगले की तरफ बढ़ गया ।

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फीनिश

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" क्या कह रहे हो?” खेडा का मुंह खुला-का खुला रह गया ।

“असम्भव सवाल ही नहीं पैदा होता ।" हेगड़े ने एकएक शब्द चबाकर कहा ।

"यह मैँ नहीं, वह आने वाला देवराज चौहान कह रहा था l" दिवाकर ने हाथ मसल कर कहा ।

"औंर तुमने विश्वास कर लिया?" खेडा ने पागलों की तरह आंखें फाड़कर देखा ।

"वह जिस ढंग से कह रहा था, वह ढंग विश्वास करने कै ही काबिल था । दिवाकर ने परेशान भाव से कहा-"मेरी तो कुछ भी समझ में नहीँ आ रहा कि यह सब क्या हो रहा है? देवराज चौहान कौन हे?"

"जो भी हो ।" हेगडे के होंठों से गुर्राहट निकली-"लेकिन यह बात तो हजार प्रतिशत सच है कि राजीव मर चुका है । मरा हुआ इंसान कभी भी जिन्दा नहीं हो सकता, वह साला देवराज चौहान बकवास करता है I”

"हो सकता है वह न मरा हो I वास्तव में तगड्री बेहोशी में जा डूबा हो, मेरा धूसा खाकर ।"

"नहीं I वह मर चुका था । मुझे पूरा बिश्वास है वह मर चुका था l” हेगडे बोला ।

"हेगडे ठीक कहता है कि राजीव की मौत हो चुकी है , अब तो उसका शरीर भी मिट्टी मे मे मिल चुका होगा I" खेड़ा ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा-"तुम्हारा वह घूंसा ऐसा नहीं था कि जिसे खाने कै बाद, राजीव आधी रात से अगले दिन अंधेरा होने तक वेहोश रहता, और फिर तुम्हारे उस डॉक्टर मनोहरलाल कालरा ने भी उसे आकर चैक किया था । उसके दिल की धडकन बिल्कुल वन्द थी I”

दिवाकर की खोपडी मैं यह बात जंची I

"तो फिर उसने क्यों कहा कि राजीव जिन्दा हे । ब्लैकमेल तो वह हमें बैसे भी कर सकता था।"

"अब यह बात तो वहीँ जाने I" खेडा ने कहा ।

“हम लोगों को डराने के लिए ऐसा कह दिया होगा ।" हेगडे ने कहा ।

"यह बात तो मेरे गले के नीचे नहीं उतरती कि… !"

"राजीव के जिन्दा होने की बात छोडो । सरासर बकवास है यह ।" खेड़ा ने उसकी बात काटकर कहा-"सवाल अब यह खड़ा होता है कि देवराज चौहान को हमारे बारे में सबकुछ मालूम हे । अपनी जुबान बन्द रखने के लिए वह किश्तों में दो करोड लेगा ओर अगर एक हीँ बार में मामला निपटना है तो एक करोड एक ही वार में । अब इतना पैसा कौन देगा उसे? मेरे ख्याल मेँ हमें फौरन यह जगह छोडकर देवराज चौहान की निगाहों से ओझल हो जाना चाहिए ।"

"फालतू बात मत करो ।” दिवाकर झल्लाया-"जो इन्सान ब्लेकमेलिंग करके इतनी मोटी रकम मांग रहा हे, वह इतना बेवकूफ नहीं होगा कि हम पर बात करने कै बाद निगाह ना रखे । अब उसकी या उसके आदमियों की निगाह बराबर हम पर होगीं । कहीं ऐसा ना हो कि हम यहां से भागने की चेष्टा करें और खामखाह किसी नई मुसीबत में फंस जायें । हमेँ ब्लैकमेल करने की रकम भी उसने मेरे बाप की हैसियत देखकर मांगी है, यूं ही उसने मुंह नहीं फाड दिया । वह राह चलता आम इन्सान नहीं हो सकता I”

"शायद तुम ठीक कहते हो ।" खेड़ा ने सिर हिलाया ।

" तो क्या तुम्हारा बाप उसे रकम दे देगा?" हेगडे ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी ।

“मैं अब इस बारे में क्या कह सकता हू । वेसे मेरे बाप के पास है तो वहुत । करोड दे देने से उसे कोई खास फ़र्क तो नहीं पड़ने वाला । पैसा तो उसके हाथ की मैल है ।" दिवाकर ने बेचैनी से कहा ।

" अपने बाप से बात कब करोगे?"

"कव क्या अमी फौन करता हूं। देवराज चौहान कल आने को कह गया है I साला हरामी जाने कौन है और उसे कैसे मालूम होगया कि हम दिल्ली मे क्या करके आए है ।" दिवाकर ने दांत भीचकर कहा और क्रोध भरे कदम बढ़ा दिए ।

"तुम किसी देवराज चौहान को जानते हो?" अरुण खेडा ने हेगडे से पूछा ।

“नहीं । मैने तो यह नाम भी पहली बार सुना है ।" हेगडे ने कडवे स्वर में कहा ।।

दिवाकर ने दो मिट फोन पर बात की फिर रिसीवर रखकर पलटा ।

"मेरा बाप कहता है कि कल तारासिह आयेगा?" दिवाकर ने दोनों की देखा l

"तारासिंह ? वही जिसने हमें पुलिस वेन से आजाद कराया था । "

"हां । बहुत खतरनाक आदमी है वह । मेरे ख्याल से वह हमें देवराज नाम की मुसीबत से निकाल देगा ।"

"तो क्या देवराज चौहान को पैसा नहीं दिया जाएगा या दिया जायेगा ?"

"मुझे क्या मालूम । यह फैसला तो मेरा बाप ही करेगा, जिसने अपनी जेब ढीली करनी है ।" चिन्तित्त-से दिवाकर ने कहा और नशे से भरे सिगरेट को सुलगाकर गहरा कश लिया ।

सबके चेहरो पर गहरी सोच कै भावं उभरे पडे था । मस्तिष्क से एक ही सवाल बार-वार टकरा रहा था कि अब क्या होगा?

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फीनिश

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देवराज चौहान ने कार को सडक के किनारे रोका और ब्रीफकेस लेकर उतरते हुए गली में प्रवेश कर गया ।

दो-तीन गलियां पार करने के पश्चात् वह एक घटिया-से इलाके में पहुचा जहा कच्चे-पक्कै मकान वने हुए थे । उन्ही मकानों की एक गली में उसने प्रवेश किया और एक मकान के सामने जाकर ठिठका ।

फिर आगे बढ़कर मकान का दरवाजा खटखटाया ।

कुछ ही पलों में दरवाजा खुला । दरवाजा खोलने वाला साठ वर्षीय बूढा था ।

"आओं बेटा देवराज चौहान?" बूढा उसे देखतें ही बोला-"मैं सोच ही रहा था कि वहुत दिन हो गए तुम्हें आये I” कहते हुए वह पीछे हटा तो देवराज चौहान भीतर प्रवेश करते हुए बोला ।

"चचा I तुम तो जानते ही हो कि मेरा काम केसा । मालिक के साथ पन्द्रह-पन्द्रह दिन टूर पर रहना पडता है । खुद नहीं पता होता कि आने वाले दिन में मैंने कौंन से शहर होना हे I"

"सो तो है बेटा । पेट पालने की खातिर सबकुछ करना पढ़ता हे I" बूढा सिर हिलाकर बोला ।

"चचा, आज चाय नहीं पिलाओगे ।"

"तो क्या अभी फिर जाओगे ?" बूढ़ा ने हैरानी से उसे देखा I

"हां चचा I मालिक के साथ काम हे । मैं तो समझो तुमसे सिर्फ मिलने आया हूं।"

"ठीक है । मैँ चाय बनाकर लाता हूं।" बूढा सिर हिलाता हुआ किचन की तरफ बढ़ गया ।

देवराज चौहान आगे बढा और वन्द कमरे के सामनै ठिठका । दरवाजे पर ताला लटक रहा था । जेब से चाबी निकालकर ताला खोला और भीतर प्रवेश कर गया ।

कमरे में एक तरफ चारपाई बिछी थी । दूसरी तरफ लकडी की बहुत पुरानी आलमारी थी जोकि उसी बूढे की थी । डैढ़ साल से देवराज चौहान ने यह कमरा किराये पर ले रखा था । बूढे से यह कहकर कि वह टूर का काम करता हे । महीने में पच्चीस दिन तो उसे टूर पर शहर से बाहर ही रहना होता है । हर महीने वह बूढे को वक्त पर किराया दे दिया करता था ।

देवराज चौहान ने आलमारी खोलकर ब्रीफकेस उसमें रखा I जेबों में रखे नोट निकालकर आलमारी में रखै । तत्पश्चात् कपडे उतारकर नये कपडे पहने । फिर आलमारी से कुछ नोट निकालकर जेब में ठूंसे और बाहर आकर हाथ-मुंह धोकर बालों में कंघा किया । अब वह खुद क्रो फ्रेश महसूस कर रहा था ।

तभी बूढा चाय बना लाया ।

"लाओ चचा ।" देवराज चौहान उसके हाथ से चाय का गिलास थामता हुआ बोला-" तुम्हारे हाथ की बनी चाय तो मुझे हमेशा ही अच्छी लगती है । जब टूर पर रहता हूं तो तुम्हारी चाय मुझे कई बार याद आती हे ।"

बूढा हौले से हंसकर रह गया ।

देवराज चौहान ने चाय का घूंट भरा फिर जेब से रुपये निकालकर उसको को थमाए ।

"इस महीने का किराया I"

"तुम रहते तो हो नहीं । कमरा वन्द ही पड़ा रहता हे I किराया देकर ....।"

" चाचा अब मैँ भी क्या करूं , मेरा काम ही ऐसा है कि मुझे शहर से बाहर रहना पड़ता है ।"

बहरहाल चाय समाप्त करने कै पश्चात् देवराज चौहान ने बूढे चचा से चन्द और ऐसी ही बातें कीं । फिर जल्दी आने क्रो कहकर बाहर निकल गया I अपने कमरे पर ताला लगा दिया था l यह कमरा उसने मुसीबत के समय के लिए

किराए पर ले रखा था कि कभी भागने छिपने की ज़रूरत पड गई तो कोई तो जगह हो । वेसे भी उसे कोई तो जगह चाहिए ही थी कि जहां वह अपना माल-पानी रख सकै । इतनी देर लगातार वह कभी भी किसी जगह पर नहीँ रहा था । परन्तु रंजीत श्रीवास्तव को सबक सिखाने ओर उसे कंगाल बनाने के लिए उसने जो योजना बनाईं थी वह जरा लम्बी और धीरे-धीरे काम करने वाली थी, इसी कारण पिछले छ: महीने से वह बिशालगढ़ में रुका पड़ा था ।

देवराज चौहान वापस अपनी कार में बैठा और कार आगे बढा दी । होंठों के बीच सुलगती सिगरेट र्फसी हुई थी ।

चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभरे पड़े थे |

उसने कलाई पर बंधी घडी में समय देखा रात कै ग्यारह बज रहे थे । पौन घंटा कार ड्राइवर के पश्चात् उसने कार को महलनुमा खूबसूरत बंगले के ऊंचे चौड़े फाटक कै सामने-रोका और हॉर्न बजाया । कार की हेडलाईट से फाटक पूरी तरह रोशन था । उसके हॉर्न बजाते ही वर्दीधारी दो नेपाली दरबान फौरन प्रकट हुए । उन्होंने कार को देखा और अगले ही पल आनन-फानन फाटक खोल दिया और सलाम की मुद्रा में उनके हाथ माथे तक पहुच गए ।

देवराज चौहान ने कार को विशाल बंगले कै पोर्च में ले जा रोका । इंजन बन्द करके वह कार से उतरा ही था कि सदर द्धार से वर्दीधारी नोकर प्रकट हुआ ।

"सलाम साहब ।" नौकर बोला l

"सलाम ।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया-"कैसे हो रामलाल ? "

"अच्छा हूं साहब जी !! मालिक आपको सैकडों बार याद कर चुके हैं l” रामलाल ने बताया ।

देवराज चौहान ने सिर हिलाया फिर भीतर प्रवेश करता चला गया I

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फीनिश

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देवराज चौहान ने कमरे के वन्द खूबसूस्त दरवाजे को थपथपाया I

"कम इन ।।" भीतर से आता भारी रवर उसके कानों में पड़ा I

देवराज चौहान ने दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश कर गया I

सामने ही रंजीत श्रीवास्तव टहल रहा था । शरीर पर सिल्क का कीमती गाऊन था । पांवों में कीमती स्लीपर थे । उसका खूबसूरत चेहरा इस समय निचुड़ा हुआ लग रहा था । सिर के बाल बिखर का माथे पर झूल रहे थे l वह स्पष्ट ही बहुत परेशान नजर आ रहा था । चेहरे पर व्याकुलता और सख्ती के भाव नाच रहे थे I परेशानी मेँ वह कभी कभी दांत किटकिटा उठता था, जैसे उसे समझ ना आ रहा हो कि उसे क्या करना चाहिए ।

देवराज चौहान को देखकर वह ठिठका I कुछ कहने ही वाला था कि एकाएक फोन की घंटी बज उठी ।

उसका खुला मुंह बन्द हो गया और त्तेजी से फोन की तरफ झपटा । जल्दी से रिसीवर

उठाकर कान से लगाया I

"हैलो"

"मालिका मैं शेरसिंह.... I"

"काम हुआ कि नही?" उसकी बात काटकर रंजीत श्रीवास्तव ने अधीर स्वर में कहा ।

"नहीं मालिक !"

"क्यों नहीँ हुआ?" रंजीत कै होठों से गुर्राहटभरा स्वर निकला-“बारह घण्टों में तुम उसे तलाश नहीं कर सके । काम करना भूल गए या में सिखाऊं तुम्हें काम करना I हराम का माल खाने क्री आदत पढ़ गयी है तुम्हें I"

"मालिक हम पूरी कोशिश कर रहे हैँ कि डॉक्टर बैनर्जी को कैसे भी हो, कहीँ से भी तलाश करें ।"

"शेरसिंह ! मुझे नहीं सुनना कि तुम कोशिश कर रहे हो या नहीं । मुझे काम चाहिए । डॉक्टर बैनर्जी को हर हाल में मैं अपनी पकड में देखना चाहता हू। यह बहुत नाजुक मामला हैं l”

“मैँ समझ रहा हू मालिक ।"

“समझ रहे हो तो काम की गति तेज करों । शहर में चारों तरफ अपने आदमी फैला दो I उस हरामी डॉक्टर को हर हाल में मैं वापस उसी जगह देखना चाहता हूं I" रंजीत श्रीवास्तव एक-एक शब्द चबाकर बोला…"और फोन पर मुझे बराबर रिपोर्ट देते रहो कि तुम क्या गुल खिला रहे हो I"

"जीं मालिक I"

“जल्दी करो! जल्दी तलाश करो उसे ।" रंजीत श्रीवास्तव ने क्रोध से रिसीवर वापस रखा ओर कांपते हाथों से सिगरेट सुलगाकर बेचैनी से चहलकदमी करने लगा । होंठ सख्ती से भिंचे हुए थे ।

देवराज चौहान ने फोन पर हुई सारी बात सुनी । डेढ साल से वह रंजीत श्रीवास्तव के साथ था, परन्तु इस दौरान में उसने कभी शेरसिंह या डॉक्टर बैनर्जी का नाम नहीं सुना था I जबकि वह यहीँ सोचता था कि रंजीत श्रीवास्तव की कोई बात उससे छिपी नहीं हुई डै । लेकिन अब उसे मालूम हो गया था कि उसका ख्याल कितना गलत हे । रजीत श्रीवास्तव की कई बातें उसे नहीं मालूम l

साथ ही वह मन ही मन हैरान था कि रंजीत श्रीवास्तव को क्या हो गया हे । इतना परेशान और चिंतित तो उसने उसे कभी भी नहीँ देखा था । दो तीन दिन पहले तो वह उसे ठीक-ठाक छोडकर गया था परन्तु इस समय वह अपने हाव-भाव से आधा पागल नजर आ रहा था ।

“नमस्कार मालिक !"

देवराज चौहान की आवाज सुनकर रंजीत श्रीवास्तव ने ठिठकंकर उसे देखा । सोचों में वह इतना व्यस्त था कि कमरे में खड़े देवराज चौहान कै बारे में मी भूल सा ही गया था l

"ओह तुम !! तुम कहां चले गये थेदेवराज चौहान?" रजीत श्रीवास्तव ने तीखे स्वर में कहा l

“आपसे तीन दिन की छुटूटी लेकर गया था । गांव में अपने घरवालों से मिलने ।"

"तुम्हें तुम्हें अभी जाना या गांव ।" रंजीत श्रीवास्तव ने दांत भींचकर कहा ।

देवराज चौहान मन ही मन हैरान हुआ । रंजीत ने आज तक उससे इस लहजे में बात नहीं की थी । बहरहाल इतना तो स्पष्ट ही जाहिर हो गया था कि रंजीत किसी वडी मुसीबत में फसा बैठा था ।
 
"क्या हो गया मालिका बात क्या है?" देवराज चौहान ने सामान्य स्वर मेँ पूछा ।

"बात! बात वहुत ही गम्भीर है?" रंजीत श्रीवास्तव कहते कहते ठिठका ।

देवराज चौहाँन कै चेहरे पर निगाह मारकर पुन: बेचैनी से चहलकदमी करने लगा I वह समझ नहीँ पा रहा था कि देवराज चौहान को कैसे बताए कि वह असलं में रंजीत नहीं अशोक हे । चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी द्वारा उसने अपना चेहरा रंजीत जैसा वना रखा है । देवराज चौहान को बताने का मतलब था अपनी कमजोरी उसके हाथ में देना और यह ऐसी बात थी कि जो उसके खिलाफ कभी भी इस्तेमाल की जा सकती थी । वह फैसला नहीं कर पाया कि देवराज चौहान को वह कुछ बताये या नहीं । अगर बता दे तो शायद यह असली रंजीत और डॉक्टर बैनर्जी को ढूंढ निकाले ।

रंजीत इस प्रकार खामोश होते देखकर देवराज चौहान मन ही मन बहुत हैरान हुआ ।

"मालिक । बात क्या है" देवराज चौहान ने सामान्य लहजे में कहा-"आज पहली बार है कि आप मुझे कुछ बताते-बताते रुक गये और फिर यह शेरसिंह और डॉक्टर बैनर्जी कौन हैं? मैने तो आज तक इनका नाम नहीं सुना । क्यों ढूंढा जा रहा है र्डोंक्टर बैनर्जी क्रो । फोन पर आप कह रहे थे कि बहुत नाजुक मामला है । मेरी तो समझ में कुछ भी नहीं आ रहा । आप मुझे कुछ नहीं बता रहे । इसका मतलब आपका मुझ पर से विश्वास उठ गया है ।"

रंजीत उर्फ अशोक ने फोरन ही फैसला कर लिया था कि अभी वह इस बारे में देवराज चौहान को कुछ नहीं बताएगा । उसकै आदमी तलाश तो कर हो रहे हैं डॉक्टर बैनर्जी को I

“ऐसी कोई बात नहीं देवराज चौहान, जैसा कि तुम सोच रहे हो । कोई खास बात; खास वजह नहीं है । मामूली-सा मामला हे । मै तुम्हें बताने की जरूरत नहीं समझता l तुम्हें मै वही काम देता हू जो किसी दूसरे के वस का नहीँ हो । जाओ तुम आराम करो । कल सुबह हम इस बारे में बात करेंगे ।"

"जैसी आपकी इच्छा ।" देवराज चौहान बाहर निकला और उस कमरे की तरफ बढ़ गया जो उसे रहने के लिए मिला हुआ था । चेहरे पर सोच के गहरे भाव विद्यमान थे ।

देवराज चौहान कै जाते ही रंजीत पुन: बेचैनी से चहलकदमी करने लगा । वह खुद को बेहद खतरे में महसूस कर रहा था । डाँक्टर बैनर्जी उसकी कैद से भाग निक्ला है । अगर वह असली रंजीत क्रो लेकर पुलिस के पास पहुच गया तो वह सीधा जेल मे पहुँच जाऐगा ।

डॉक्टर बैनर्जी ने उसके चेहरे पर की प्लास्टिक

सर्जरी साफ कर दी तो तब भी वह फंस जायेगा । उसका नकली होना सबके सामने आ जाएगा। तो वह क्या करे?

कई घण्टे सोचते रहने के पश्चात् रंजीत उर्फ अशोक ने फैसला किया कि अब उसका खेल खत्म होने को है । देर सवेर में, जल्दी ही वह कानून के फंदे में र्फसने वाला है । इससे पहले कि ऐसा वक्त आए? उसे हमेशा के लिए यहां दूरे खिसक जाना चाहिए । जो हाथ लगे उसे लेकर भाग जाना चाहिए । वरना एक बार भी जेल में पहुंच गया-पुलिस के चक्कर में फ़ंस गया तो फिर उसे कोई भी बचा नहीं पायेगा ।

आखिरकार उसने यही निश्चय कि कल वह बैंकों वगेरह से या जहा भी माल पड़ा है, लेकर सव-कुछ समेटकर ज्यादा से ज्यादा जितना भी हो सकै लेकर हमेशा के लिए यहां से खिसक जायेगा ।

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फिनिश

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हमेशा क्री भांति देवराज चौहान सुबह सात बजे तैयार होकर हटा ही था कि नोकर ने आकर कहा मालिक ने फोरन याद किया हे ।

देवराज चौहान रंजीत श्रीवास्तव कै कमरे में पहुचा ।

"गुड मॉर्निंग सर । आपने मुझें याद किया ?" देवराज चौहान बोला ।

रंजीत उर्फ अशोक ने गर्दन घुमाकर देवराज चौहान को देखा ।

“आओ देवराज चौहाना आज हमें वहुत ही खास काम करना है I” उसने कहा ।

" क्या मालिक? "

“पार्टी को आज कैश पेमेंट देनी हे । दो-तीन् बैंकों में जाकर पैसे को इकट्ठा करना हे । तुम मेरे साथ रहोगे !"

"यह काम तो आपका सैकेट्री भी कर सकता हे I” देवराज चौहान बोला ।

"नहीं । कैश रकम का मामला है । रकम बहुम मोटी है इस बार । यह काम मैं खुद करना चाहता हूं।"

"जैसी आपकी इच्छा ।"

"ठीक साढे नौ बजे हम यहां से निकलेंगे I" रंजीत ने सिर हिलाकर कहा ।

"ठीक है । मुझे थोडा-सा काम हे । उसे निपटाकर मैं नो बजे तक वापस आ जाऊंगा ।"

"मुझे तुम्हारे किसी काम से कोई मतलब नहीं ।" रंजीत श्रीवास्तव शुष्क स्वर में बोला-"ठीक साढे नौ बजे जब मैँ बाहर निकलूं तो तुम्हें अपनी कार के पास खड़े पाऊ । ड्राइवर हमारे साथ नहीं चलेगा I तुम ड्राइव करोगे I”

"जी ।" इजाजत लेकर देवराज चौहान बाहर निकल गया ।

उसकी आंखों में तीव्र चमक लहरा रही थी I

देवराज चौहान के जाते ही रंजीत श्रीवास्तव ने उठकर दरवाजा वन्द किया ओर आगे बढकर एक तरफ़ रखी तिजोरी का लॉक खोला । तिजोरी नोटों की -गड्डियों और जवाहरतों से भरी पडी थी । रजीत ने दरवाजा बन्द कर दिया । आज उसे यह जगह हमेशा के लिए छोड देनी थी । जो माल भी हाथ लगना था उसके साथ । सबकुछ ठीक-ठाक कट रहा था, वह रंजीत बना ऐश कर रहा था परन्तु डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी कैद से भागकर सारे मामले का सत्यानाश कर दिया था । इससे पहले कि हेराफेरी का मामला बनाकर पुलिस उसे पक्रड़े, उसे फोरन यहां से खिसक जाना चाहिए था । जोकि आज वह करने जा रहा था ।

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फिनिश

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देवराज चौहान ने कार रोकी और उतरकर खूबसूरत अपार्टमेंट की इमारत में प्रवेश कर गया । लिफ्ट से वह पहली मजिल पर पहुचा और एक फ्लैट की बैल बजाई ।

दरवाजा खोलने वाला राजीव मल्होत्रा था ।

उसने प्रश्नभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा ।

देवराज चौहान मुस्कराया !

"कौन हैं आप ?” राजीव की खोजपूर्ण निगाह उस पर ही टिकीं थी ।

"देवराज चौहान !"

"किसने भेजा हे आपको ?" राजीव ने अपना शक दूर करना चाहा ।

"नकाबपोश ने ।"

राजीव ने उसे भीतर आने दिया । फिर दरवाजा वन्द कर लिया । भीतर आकर देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और फ्लैट में निगाह मारता हुआ बोला I

“उसने तुम्हें दो दिन जो समझाया वह तुम ठीक तरह समझ चूकै हो?”

"हां !"

" भूल तो नहीँ जाओगे?" देवराज चौहान ने उसकी आखों में झांका I

“नहीं I"

"गुड I काम कं लिए तैयार हो?"

"तैयार ही समझो I” राजीव मल्होत्रा ने गहरी सांस ली ।

"रंजीत श्रीवास्तव के साईन की काॅपी कर लेते होए. I" देवराज चौहान ने पूछा ।

"हां । लगातार इसी काम का अभ्यास करता रहा हू। हू-ब-हू साईन कर लेता हू।"

"समझदार आदमी हो ।" देवराज चौहान मुस्कराया l राजीव मल्होत्रा कुछ नहीँ बोला I "आज तुम्हें काम शुरु करना है ।"

"मुझें जो कहोगे, कर दूंगा ।"

“दिन में मैं किसी भी समय आ सकता हू I हरदम तैयार रहना ।" देवराज चौहान ने कहा I

राजीव ने सिर हिलाया I

" तुम्हें वहा पहुंचकर वहां की सारी दौलत मेरी तरफ सरकानी हे । याद है ना?"

“हा, याद है । अब क्या वह नकाबपोश मेरै पास नहीं आयेगा?"

"उसे भूल जाओ I सिर्फ मुझे याद रखो । उसका काम समाप्त हो चुका है । अब तुम्हें वहीँ करना है जो मैँ कहूंगा II उसने मेरे कहने पर तुम्हें जिन्दा करवाया था । जिसने जिन्दा किया वह तांत्रिक मेरी जान-पहचान का था । मेरे कहने पर ही उसने तुम्हें जिन्दा किया था I समझे । तुम पर किए गए इतने बड़े अहसान का असली हकदार में हूं । वरना अब तक तो तुम्हारा शरीर कब का मिट्टी में मिल चुका होता । तुम्हारा वजूद ही इस दुनिया में नहीं होता । अच्छी तरह समझ लो कि मैँ तुम्हारा ज़न्मदाता हू I "

राजीव मुस्कराया ।

"तुम्हारे इसी अहसान को उतारने के लिए तो में यह सव करने जा रहा हू I "

"तभी तो कहत्ता हूँ कि समझदार हो । कोई बात समझानी नहीं पडी तुम्हें !" देवराज ने कश लेकर सिर हिलाया----" आशा हे दोपहर तक आ जाऊंगा, तुम चलने के लिए तैयार रहना ।"

"चिन्ता मत कसे। मैं चलने कें लिए हर समय तैयार रहूँगा I"

देवराज चौहान बिना कुछ कहे बाहर निकल गया ।

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फिनिश

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ठीक साढे नौ बजे रंजीत श्रीवास्तव देवराज चौहान के साथ कार में बैठकर बंगले से बाहर निकला । देवराज चौहान कार ड्राइव कर रहा था । रंजीत कुछ बैचेन-सा था । दरअसल वह जल्द से जल्द इस शहर से, विशालगढ़ से निकल जाना चाहता था । तिजोरी में रखा सारा माल, इस समय सूटकेस से भरा कार की पिछली सीट पर मोजूद था । देवराज चौहान ने रंजीत की बेचैनी भांप ली थी 1 परन्तु वह समझ नहीं पा रहा था कि रंजीत की व्याकुलता के पीछे असल कारण क्या है? आज से पहले उसने रंजीत को इतना परेशान और व्याकुल नहीं देखा या । इतना तो वह जान ही चुका था कि कोई खास गम्भीर मसला हे, जिसके बारे में उसे रत्ती भर भी आभास नहीं । रंजीत भी इस बारे में बताने से उसे गुरेज कर रहा है ।

‘रंजीत की यह बात भी उसे फिजूल ही लग रहीँ थि कि किसी पार्टी को पेमेंट करने के लिए बैंक से पैसा निकालना है । आज से पहले तो मैंने एक बार भी रंजीत को बैंक का रुख करते नहीं देखा था । चाहे कितनी बडी पेमेंट ही पार्टी को क्यों ना करनी हो I

"पहले कहाँ चलना है ?" देवराज चौहान ने कार ड्राइव करते हुए पूछा ।

"माल रोड वाले बैंक चलो ।"

उसकै बाद वह लोग तीन बैंकों में गए । रास्ते में उन्होंनै एक बड़ा सूटकेस और खरीदा। देवराज चौहान क्रो बाहर कार मैं ही बिठाकर रंजीत बैंक में जाता, सूटकेस साथ ले जाता । "बैंक से निकाले गए नोटों को सूटकेस में डाल लाता । दूसरा सूटकेस कार की पिछली सीट पर ही पड़ा रहता था ।

फिर देवराज चौहान ने कार को आँफिस के मोर्च में रोका आँफिस की तिजोरी में भी काफी माल पडा था । रंजीत उस पर हाथ फेरना चाहता था ।

वह ज्यादा से ज्यादा कैश हासिल कर लेना चाहता था । कार से उतरते हुए वह देवराज चौहान से बोला----“तुम नया वाला सूटकेस लेकर मेरे साथ आओ ।"

देवराज चौहान फौरन कार से उतरा और पिछली सीट पर पडा नोटों से भरा सूटकेस निकाला ।

"दूसरा वाला कार में ही रहने दूं?" देवराज चौहान ने रंजीत को देखा ।।

"हां सूटकेस ऊपर छोडकर तुम नीचे आ जाना । यहीँ कार के पास, मैं आधे घण्टे में आ जाऊंगा । फिर यहाँ से चलेंगे। ज़ल्दी करो।.मेरे पास समय कम हे ।"

देवराज चौहान सूटकेस उठाए रंजीत के साथ आगे वढ़ गया । दस मिनट में ही रंजीत को छोडकर पार्किग में खडी कार में वापस आ-बैठा I फिर जेब से छोटी सी मास्टर की' निकाली और पिछली सीट पर पड़े सूटकेस को खोलकर भीतर झांका । सूटकेस में सोना-जेवरात और नोटों की गड्डियां भरे पड़े थे ।

देवराज ,चौहान के होंठ अजीब-सी मुद्रा में सिकुड गए । आंखों में सोच के भाव नजर आने लगे । उसने सूटकेस बन्द करके उसे पुन: लॉक कर दिया । देवराज चौहान को समझते देर ना लगी कि इस सूटकेस का `माल बंगले में पडी तिजोरी वाला हैं ।

रंजीत ने बंगले की तिजोरी का माल भी सूटकेस में भर रखा हे l बैंकों से भी वह माल इकट्ठा करता फिर रहा है । बात क्या है? उसकी हरकतें तो ऐसी हैं, जैसे वह कहीँ भाग जाने का इरादा रखता हो, लेकिन भागेगा क्यों, अपनी जायदाद छोडकर कौन खामखाह भागेगा ।

जो भी हो, रंजीत कीं हरकत सहीं दिशा की तरफ इशारा नहीँ कर रही थी ।

देवराज चौहान ने मुस्कराकर सूटकेस पर हाथ फेरा फिर सिगरेट सुलगा ली । आंखों में तीव्र चमक विद्यमान…हुई पडी थी I वह बेहद निश्चित था ।

आधे घण्टे के बाद रंजीत की वापसी हुई । साथ ने चपरासी था जिसने सूटकेस को उठा रखा था । उसका उठाने का अन्दाजा ही बता रहा था सूटकेस काफी भारी है । कार की

पिछली सीट पर हीँ सूटकेस को रखा गया ।

चपरासी चला गया ।

रंजीत, देवराज चौहान की बगल में आ बैठा; देवराज चौहान ने कार आगे बढा दी । रंजीत क्रो चेहरा अब काफी हद तक तनाव रहित लग रहा था

“कहा चलना हे मालिक?" देवराज चौहान का लहजा हमेशा की भांति सामान्य था ।

“चलते रहो । अभी बताता हूं।" रंजीत ने सिर हिलाकर कहा और सिगरेट सुलगा ली ।

" यहां पास में ही मैने फ्लैट खरीदा है !" एकाएक देवराज चौहान ने कहा-"छोटा-सा फ्लैट है । आप चहा चलेंगे तो मुझे खुशी होगी । वैसे भी आप कुछ थके-से लग रहे हैं । एक कप चाय मेरे हाथ की पी लीजियेगा ।"

“ मुझे कही पहुचना हे देवराज चौहान !" रंजीत ने कहा ।

"ज्यादा देर नहीं लगेगी सर ।"

" ठीक है ! अब तुम्हारा दिल नहीं तोडना चाहता । चाय पीने तक ही वहां ठहरूंगा ।"

"मेरे लिए इतना ही बहुत हे मालिक ।" देवराज चौहान के होंठों के बीच जहरीली मुस्कराहट उभरी ।

लगभग पन्द्रढ मिनट के बाद देवराज चौहान ने अपार्टमेंट के कम्पाउण्ड मे कार रोकी ।

"इन सूटकेसों की तो यहां नहीं छोडा जा सकता ।” एकाएक रंजीत बोला… . … इनमें पैसा है ।"

"कोई बात नहीं । इन्हें साथ लिए चंलते हैं । पैसा इस प्रकार कार में छोडना ठीक नहीं ।" देवराज चौहान ने काऱ में से दोनों सूटकेस निकालक्रंर दोनों हाथों में पकड लिए ।

"आइए ।"' देवराज चौहान रंजीत श्रीवास्तव को साथ लिए अपार्टमेंट में प्रवेश कर गया । लिफ्ट से वह पहली मजिल पर पहुचा फिर फ्लैट के दरवाजे कै समीप पहुंच ठिठका । कालबेल दबाकर बोला ।

"कुछ दिन पहले ही मैँने यह फ्लैट खरीद।।”

रंजीत श्रीवास्तव ने सिर हिलाया । जितना पैसा उसने इकट्ठा करना था वह कर चुका था । अब कुछ देर के लिए वह भी शान्ति से सोचना चाहता था कि इस दौलत कै साथ देश के किस हिस्से रूख करे ।

इसी कारण वह फ्लैट पर चला आया था ।।

देवराज चौहान ने पुन: वैल बजाई ।

"भीतर कौन है?" रंजीत ने पूछा

“दोस्त ।। दोस्त हे मेरा ।" देवराज चौहान मुस्कराया ।

तभी दरवाजा खुला ।

राजीव मल्होत्रा ने दरवाजा खोला था ।

अपने चहेरे वाले को देखते ही एकाएक रजीत श्रीवास्तव की आंखें फेल गई ।

वह हड़बड़ाया । इससे पहले कि वह कुछ कर पाता देवराज चौहान ने उसके चेहरे के भावों को पहचाना । हाथों में पकडे सूटकेस छोड़े । रंजीत श्रीवास्तव को कन्धे से थामकर भीतर धकेला । सूटकेस से लडखडाने के बाद रंजीत छाती कै बल कमरे कै फर्श पर जा गिरां ।

राजीव तो फौरन ही पीछे हट गया था । नीचे गिरते ही रंजीत श्रीवास्तव ने फुर्ती के साथ उठना चाहा कि एक ही छलांग में देवराज चौहान उसके सिर पर था, अपना जूता उसने नीचे पड़े रंजीत की पीठ पर रखा और राजीव से बोला ।

"दोनों सूटकेस भीतर करके दरवाजा बन्द करो । जल्दी ।" राजीव ने फौरन दोनों सूटकेस भीतर किए और दरवाजा बन्द कर दिया ।।

“छोडी मुझे !" नीचे पड़ा अशोक उर्फ रंजीत त्तड़फा ।

देवराज चौहान का चेहरा सख्त हुआ पडा था ! उसने जूते का दबाव और बढा दिया !!

रंजीत के होंठों से पीड़ाभरी कराह निकली ।

"तुम्हारी यह हिम्मत !" रंजीत दहाड़ा-"मैँ तुम्हें नौकरी से निकाल दूंगा ! तुम्हारा ऐसा बुरा हाल करूंगा कि तुम दोबारा जन्म लेने से भी इन्कार कर दोगे । मैं… 'मै' !"

"चुप !" देवराज चौहान के होंठों से गुर्राहट निकली-" बहुत हो गया मालिक-मालिक । तेरे को र्फसाने और अपना जाल बुनने में मैंने अपने छ: महीने खराब कर दिए । अब उन छ: महीनों की कींमत वसूलने का समय आ गया है ।"

"क्या मतलब?" रजीत के होंठों से पीडा और डैरानी वाली आवाज निकली-“ओर यह कौन है तुम्हारे साथ, मेरी शक्ल वाला ? तुम क्या करने जा रहे हो?"

"अभी मेरै पास वक्त नहीं है ज्यदा बात करने का ।" देवराज चौहान नै दांत किटकिटाकर कहा-“ कुछ घण्टे के बाद फिर आऊंगा तव तुझे तेरे हर प्रश्व का उत्तर दूंगा I” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने उसकी पीठ से अपना जूता हटाया और अगले ही पल जूते की एड्री 'ठक' के साथ उसकी कनपटी पर दे मारी I

रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से कराह निकली और वह बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया ।

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई 'और कश लेकर राजीव ,से बोला ।

_ _ "इसके कपडे उतारो और पहन लो ।"

~ राजीव आगे बढकर बेहोश पड़े रंजीत के कपड़े उतारने लगा ।

' "इसका चेहरा तो बिल्कुल हीँ मुझसे मिलता है ।" क्रपड्रे उतारता हुआ राजीव बोला ।

"तभी तो तुम्हें जिन्दा कराया था । तमी तो इस काम तुम्हारा इस्तेमाल किया जा रहा है l" देवराज चौहान बोला ।

राजींव ने रंजीत के शरीर पर से कपड़े उतारकर, खुद पहन लिए। देवराज चौहान ने अण्डरवियर पहने बेहोश पड़े रंजीत के हाथ-पांब कसकर बांधे । फिर मुंह में कपड़ा ठूंसा, ताकि होश मे आने पर वह चीख न सके ।
 
तत्पश्चात सुटकेसो को कमरे मे ले जाकर रखा औंर उस कमरे पर ताला लगगा कर पलटा ।

राजीव को देखा ।

राजीव ने सहमति मे सिर हिला दिया -I

"ध्यान रखना, अब तुम राजीव मल्होत्रा नहीं । रंजीत श्रीवास्तव हो I शहर की जानी मानी हस्ती ।"

राजीव ने पुन: सिर हिला दिया ।

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फीनिश

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देवराज चौहान ने कार बंगले कै फाटक के मास रोकी और उसकी निगाहें वहां खडी पुलिस जीप पर जा टिकीं जोकि बैक होने जा रही थी I परन्तु उन्हें देखते हीं ठिठक गई ‘I

जीप रुकते ही उसमें से इन्सपेवटर सूरजभान नीचे उतरा और ड्राइविंग सीट` पर बेठे, देवराज चौहान के समीप जा पहुंचा ।

" मिस्टर देवराज चौहान, कल ट्रक नीचे कुचले आदमी के सिलसिले में मैँ आपके बयान लेने आया हू I”

"श्योर आइये! कार कै पीछे भीतर आ जाइये l” कहने कँ साथ ही देवराज चौहान ने दरवान को इशारा किया और खुल चूकै फाटक सै कार ले जाते हुए, उसे पोर्च में ले जाकर रोका I

उसी पल पीछे पीछे जीप आकर रुकी ।

सूरज़भान बाहर आया ।

देवराज चौहान कार से उतंरा और अवब-भरी मुद्रा मे कार का पिछला दरवाजा खोलते हुए सिर झुकाकर कह उठा

" आइये मालिक! "

अगले क्षण राजीव मल्होत्रा , रंजीत श्रीवास्तव बना…उतरा ।

इन्सपेवटर सूरजभान के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा ।

" इन्सपेक्टर I आप भीतर ड्राइंगरूम मे वेठिए । मै अभी आता हूं।" देवराज चौहान कहने के साथ ही राजीव मल्होत्रा कै साथ आगे बढा कि तभी इन्सपेक्टर सूरजभान ने टोका I

"एक मिनट मिस्टर देवराज चौहान I"

देवराज चौहान के साथ, राजीव मल्होत्रा भी ठिठका I सूरजभान आखों मे आश्चर्य मरे, राजीव मल्होत्रा कौ देखे जा रहा था I

"तुम ?" सूरजभान दो कदम उठाकर उसके पास पहुचा… “तुम कौन हो ?"

राजीव मल्होत्रा के कुछ कहने से पहले ही देवराज चौहान तीखे स्वर में कह उठा I

"तमीज से बात करो इन्सपेक्टर I तुम नहीँ आप कहो । यह हमारे मालिक रंजीत श्रीवास्तव जी हैं ।”

“नहीं । य....... यह रंजीत श्रीवास्तव नही हो सकता I” सूरजभान कै होंठों से निकला I

"क्या मतलब?" देवराज चौहान की आंखें सिकुड़कर छोटी होती चली गयीं ।

"यह इन्सान राजीव मल्होत्रा 'है । बैंक-डकैत्ती और हत्याओं का मुजरिम ।” '

राजीव मल्होत्रा के बदन मे ठण्डी सिरहन दौडती चली गई । देवराज चौहान जोरों से चौंका I

“क्या बकवास कर रहे हो इन्सपेक्टर ।" देवराज चौहान की आवाज में सख्ती भर आई I

"मैं सही कह रहा हूं। यह दिल्सी का रहने वाला, राजीव मल्होत्रा 'हे ।"

“देवराज चौहान ।" राजीव मल्होत्रा ने फौरन खुद को सम्भाला और सिगरेट सुलगाकर शांत लहजे में बोला---लगता है ? इस इन्सपेक्टर का मन अपनी नौकरी से भर चुका है, अब यह आराम करना चाहता है !"

, "मुझे भी यहीँ लग रहा है मालिक ।” देवराज चौहान सख्त निगाहों से सूरजभान को देख रहा था----“इसका कुछ इन्तजाम तो करना ही पडेगा, यह आपके बारे में बहुत खतरनाक बात कर रहा हैं ।"

सूरजभान की व्याकुलताभरी एकटक निगंरह, राजीव मल्होत्रा पर थी।

“अब तुम्हें भीतर आने की जरूरत नहीं इन्सेपेक्टर !" देवराज चौहान से कठोर स्वर में कहा-"मैं दस मिनट में लौटता हूं इसके बाद तुमने जो बयान लेना हो ले लेना । रही बात मालिक की तरफ उंगली उठाने की, सो इस बात का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पडेगा विशालगढ़ का बच्चा-बच्चा मालिक को बचपन से जानता है ।”

सूरजभान को वहीँ स्तब्ध ख़ड़े छोडकर देवराज चौहान राजीव मल्होत्रा कं साथ बंगले में प्रवेश कर गया।

"यह इन्सपेक्टर कौन हैं?” देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश करते ही राजीव से पूछा ।

“न मैं नहीं जानता ।" राजीव कुछ नर्वस सा दिखाई दे रहा था ।

"यह कैसे हो सकता है कि तुम नहीं जानते । वह तुम्हारे बारे में सब-कुछ जानता मालूम होता हे । तुम्हारा नाम भी जानता है । तुम दिल्ली के रहने वाले हो, यह भी जानता है ।" देवराज चौहान ने अपने शब्दों पर जोर दिया ।

" व ह कुछ भी जानता हो, परन्तु में इस बारे में कुछ भी नहीं जानता । " 'देवराज चौहान ने इस पर फिर कोई बात नहीं की ।

"यहा की हर वस्तु, हर चीज, बगले का नक्शा, तुम वीडियो फिल्म मे देख बुर्के हो ।" देवराज चौहान ने कहा-"अब आंखों से हर चीज को पहचानते जाओ । यहा पर तुम ऐसे चलो जेसे चलने के अभ्यस्त हो । अपनी चाल से नयापन जाहिर मत करौ ।"

राजीव मल्होत्रा की निगाहे तो पहले ही चारों तरफ दौढ़ रही थीं ।

"यहां पर नौकरों के अलावा, और तो कोई नहीं है । मेरा रिश्तेदार वगैरह?"

. , . "नहीं l तुम यहां कै एकमात्र स्वामी हो। जव मी किसी से ’बात करो । अपनी आवाज में विश्वास रखकर बात करो ।” देवराज चौहान चलते हुए धीरे धीरे कहे जा रहा था-“किसी को शक नहीं होना चाहिए I"

"निश्चित रही । यहा का मामला तो में सम्भाल ही लूंगा । तुम असती रजींत श्रीवास्तव को सम्भाल कर रखना कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी कैद से निकलकर; वह यहां आ पहुंचे l”

"उसकी फिक्र मत करो- !"

" उसकी मुकम्मल इन्तजाम काके नहीं आए ! ह्मध-पाव बांध से इन्सान बेबस नहीं हो जाता । वह किती-न किसी तरह अपने वन्धनों को खौल मी सकता हे । वहां से फरार भी हो सकता है I"

"जानता हुँ। अभी यहां से जाकर उसका ठीक इन्तजाम करूंगा ?!" देवराज चौहान ने कहा ।

"और यह इन्सपेक्टर, मुझे तो वहुत तेज मालूम होता है ।” राजीव ने कहा----"इसका क्या किया जाए ।। यह गडबड कर सकता है । हमारे प्लान को फेल करके , हमें फंसवा सकता है ।"

" इसे तो मैँ अभी सम्भाल लूंगा ।'" देवराज चौहान ने विश्वास-भरे स्वर मे कहा ।

दोनों जीना पार करके ऊपर पहुंचे ।

एक कमरे का दरवाजा खोलकर उन्होने भीतर प्रवेश किया । यह खूबसूरत बेडरुम. का सीर्टिंग रुम था ।

"यह तुम्हारा कमरा है । आराम करो । नौकर तभी तुम्हारे पास आएगा, जब तुम उस बटन को दबाकर उसे यहा बुलाओगे I फोन तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करेंगे । सिर्फ वही फोन, आप्रेटर तुम तक पहुँचाएगा, जो तुम्हारे लिए जरूरी होगा । मुझें बिश्वास हैं कि तुम सव-कुछ आसानी से सम्भाल लोगे !"

" तुम कहा जा रहे हो?"

"रंजीत श्रीवास्तव का पक्का इन्तजाम करने I आज दिन-भर तुम आराम करोगे । कल सुबह मैँ तुम्हें आँफिस ले जाऊंगा । कल तुम्हें अपना काम शुरु करना होगा l कैसे? यह रात को बताऊंगा ।"

राजीव मल्होत्रा ने सिर हिलाया ।

"अब में जाऊं?”

"जाओ I" राजीव मल्होत्रा ने बिश्यास -भरे स्वर में कहा----“रंजीत श्रीवास्तव को कैद से मत निकलने देना ! वह कैद में रहेगा तो में यहा आरामं से अपना काम करता रहूंगा I”

देवराज चौहान सिर हिलाकर पलटा और बाहर निकल गया !!

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फीनिश

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देवराज चौहान बाहर आया तो उसके होंठों पर सिगरेट लटक रही थी । सूरजभान; अन्य पुलिस वालों से बात कर रहा था ।

देवराज चौहान को देखते' ही सीधा उसके पास आया l

मिस्टर देवराज चौहान आप मेरी बात का विश्वास कीजिए I वह आदमी रंजीत श्रीवास्तव नहीं, राजीव मल्होत्रा है ।"

देवराज चौहान अपने चेहरे पर नाराजगी और क्रोध कै भाव ले आया I

"इन्सपेक्टर सूरजभान आप अपनी हद से ज्यादा बढ़ रहे हैँ I" देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा ।

"में अपनी हद में हूं मिस्टर देवराज चौहान । में साबित कर सकता हूं किं जो कह रहा हुं । किसो आधार पर ही कह रहा हू। मेरी बात गलत नहीं ही I" सूरजभान अपने शब्दों पर जोर देकर बोला ।

देवराज चौहान व्यंग्यात्मक हंसी हंसा ।

"तो साबित कीजिए कि जो आप कह रहे हैं, सही कहैं रहे है !"

"इस समय तो मै इतना ही कह सकता कि तीन महीने , पहले दिल्सी कै एक वैंक में चार युवकों ने डकैती डाली थी । तीन हत्याएं की थीं । यह जिसे आप रंजीत श्रीवास्तव कह रहे है । उन्हीं चारों डकैतों और हत्यारों में से एक है । दिल्ली में इसका एक कमरे का फ्लैट हे ।" सूरजभान ने तीव्र स्वर में कहा ।

"आप यह बातें किस बिनाह पर कह रहे हैं इन्सपेक्टर सूरजभान?" देवराज चौहान बोला ।

'इस बिनाह पर कि डकैती और उन हत्याओं की त्तपलीश तव मैंने ही की थी । मेरे ही इलाके में यह हादसा हुआ था । चंद रोज पहले ही पैं यहा पर ट्रांसफर होकर आया हूं… तब...!"

"बाकी के तीन कहां हैँ ?"

“वह फरार हो गए थे, लेकिन कानून की निगाहों से ज्यादा देर बंचे नहीँ रह सकते।"

"यानी कि तुम इस केस में असफल हो गए, इसी कारणं तुम्हारा ट्रांसफार्मर दिल्ली से बिशालगढ कर दिया गया और अब अपनी खीज को मिटाने कै लिए खामखाह नई बात पैदा करंने की चेष्टा कर रहे हो ।"

"ऐसा नहीँ हे , मै.....!"

"कैसा है, में सुनना नहीं चाहता !” एकाएक देवराज चौहान , , ने दांत भीचकर कहा-"बस बंहुत हो चुका । मैं तुम्हें जितना समझाना चाहता था, समझा दिया । लेकिन बात तुम्हारी समझ में नहीं आ रही । अगर अपनी बात पर इतना ही विश्वास हैं तो जाओ भीतर, गिरफ्तार करो रंजीत श्रीवास्तव को ।"
 
इंसपेक्टर सूरजभान अपनी जगह से हिला भी नहीँ l

“अब खडे क्यों हो? भीतर जाते क्यों नहीं मालिक को गिरफ्तार करने?”

"ऐसे नहीं I” सूरजभान ने सिर हिलाया I

"तो फिर कैसे करोगे?"

" पुख्ता सबुतों के साथ !"

“वह कहा से लाओगे?" देवराज चौहान ने जहरीले स्वर मेँ कहा ।

"दिल्ली के उस पुलिस स्टेशन से, जहां पर पैं तैनात था । वहा पर अभी भी इस केस की फाइल मौजूद है और फाइल में रंजीत श्रीवास्तव की उंगलियों कै निशानों की छाप मौजूद है I"

देवराज चौहान के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा । इन्सपेक्टर सूरजभान वहुत खतरनाक बात कह गया था ।।

"जो जी में आए करो, लेकिन इतना याद रखना, रंजीत श्रीवास्तव की तरफ ऊंगली उठाना तुम्हें वहुत ही मंहगा पड सकता है ! तुम किसी मामूली आदमी के बारे में बात नहीं कर रहे जो......!"

"कोई बात नहीं, अगर मेरी बात गलत निकली तो में रंजीत साहव के पावों में पडकर माफी मांग लूगा l" सुरजभान ने एकएक शब्द चबाकर कहा-"लेकिन मै अपने इरादे से पीछे हटने चाला नहीं !"

"भुगतोगे ।" देवराज चौहान ने सिगरेट एक तरफ़ उछाली !

"कल के हादसे के बारे में मेरा बयान नोट करो, मेरे पास इतना समय नहीं है कि तुम्हारे साथ सिर खपाता रहूं।”

सूरजभान ने, चौहान का बयान नोट किया I

जब वह लोग जीप में वेठकर जाने लगे तो देवराज चौहान स्थिर लहजे में कह उठा--- "आशा है, अब हमारी मुलाकात नहीं होगी !"

सूरजभान ने कुछ नहीं कहा । पुलिस जीप बाहर निकलती चली गई ।।

देवराज चौहान के होंठ र्भिच गए l मस्तिष्क में खतरे की आंधी चलने लगी।

आज ही उसने अपनी योजना पर असली कार्य करने क्री शुरुआत की थी । रंजीत्त श्रीवास्तव के बदले, राजीव मल्होत्रा क्रो उसकी जगह पर पहुंचाया था और आज ही इन्सपेक्टर सूरजभान के रूप में बहुत बड़ा खतरा उसके सामने आ गया था । वह दिल्ली से राजीव मल्होत्रा कै उंगलियों कै निशान लाने को कह रहा था ।

जाहिर है, वह उंगलियों के निशान तो राजीव मल्होत्रा कै ही होंगे ओर वह मिलेंगे भी । तब मुसीबत का नया दौर शुरू हो जाएगा ।

राजीव मल्होत्रा देर सवेर पुलिस कै जाल में र्फसेगा ही । तब उसे बताना ही पडेगा कि कैसे वह रंजीन श्रीवास्तव बनकर वहां तक पहुंचा । उसके बारे में भी वह मुंह खोलेगा l

यानी कि खेत शुरू होने से पहले ही खत्म l छ: महीने की मेहनत, छः महीने भी काम नहीं आई ।

देवराज चौहान ने मन-ही-मन फैसला किया कि अभी वह खिसकेगा नहीं। जब तक पानी सिर से ऊपर नहीं होगा तब तक वह यहीं रहेगा और ना ही राजीव मल्होत्रा से अभी वह इस बारे में बात करेगा ।

कहीँ राजीव ऊंगलियों के निशानों की बात को सुनकर भयभीत हो गया तो वह आगे कुछ भी ठीक नहीँ कर पाएगा I

हो सकता है वह उसका साथ देने से सरासर इन्कार कर दे । अभी वक्त है देवराज चौहान ने हिसाब लगाया कि इंस्पेक्टर सूरजभान को उंगलियों के निशान लाने क्रो कम से कम दो दिन का समय तो लगेगा ही ।

देवराज चौहान नै नंई सिगरेट सुलगाई और कार में बैठकर वंगले से निकल गया ।

मन ही-मन देवराज चौहान इस बात की तसल्ली थी कि आज रंर्जीत श्रीबास्तव ने जितनी दौलत इकट्ठी की थी , कम से कम वह तो उसके कब्जे में है । बहरहाल इन्सपेक्टर सूरजभान के बारे में सोचकर देवराज चौहान खा दिमाग गर्म होता जा रहा था कि वह उसके किए कराए पर पानी फेरने जा रहा है और वह इस बिगडते हुए मामले को सम्भाल भी नहीं सकता था I

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फीनिश

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देवराज चौहान को गए आधा घंटा ही हुआ था कि फोन की घण्टी बज उठी I

राजीव मल्होत्रा ने पर बैठे ही बैठे फोन को देखा। यह सोचकर थोडा-सा घबराया अवश्य कि किसका फोन होगा । उसे फोन करने वाले को वया कहना होगा I खैर यह नौबत तो देर-सवेर आनी ही थी I

आगे बढ कर राजीव मल्होत्रा ने रिसीवर उठाया I

“सर !" आप्रेटर की आवाज आई-"मिस रजनी शाह आपसे बात करना चाहती हैं ।"

रजनी शाहा रंजीत श्रीवास्तव की मंगेतर वी०सी०आर० में देखा उसका खूबसूरत चेहरा आखो कै सामने साकार हो उठा I

अगले ही पल वह सम्भला I

"लाइन दो ।"

"ओ०के० सर ।"

अगले ही पलों में रजनी शाह लाइन पर थी I

"हेलो रंजीत !" रजनी शाह का शोख स्वर उसके कानों से टकराया I

"हेलो रजनी! कैसी हो?" राजीव ने स्थिर लहजे मे कहा ।

"मुझे क्या होना है I एकदम फर्स्ट क्लास हूं I" रजनी की हंसी से भरी आवाज आई-"तुम अपने बारे मे बताओ आज ग्यारह बजे तुमने फोन करना था, मैँ इन्तजार करती रही?"

“सॉरी I मै कुछ बिजी था । फोन करना तो याद था परन्तु कर नहीं सका I"

"अब तो फुर्सत मिल गई?" रजनी की हंसी से भरी आबाज आई I

"हाँ I” राजीव कै होंठों पर मुस्कान कौ रेखा उभरी I

"तो आओ ना, एक-एक कप कॉफी पीते हैं । मैं बोर हो रही हूं।"

"कहां ?" राजीव मल्होत्रा ने मन ही मन में गहरी, सांस ली ।

"बहीँ । साईमन के कैफे में । जहां हमें कोई नहीं पहचानता l”

"साईमन के कैफे !. यह कहा है ? " राजीव के होंठों से निकला ।

"कमाल हे! साईमन के कैफे के बारे में तुम मुझसे पूछ रहे हो । कहीँ और सोच रहे हो क्या?" रजनी हंसी ।

" तुम्हें देने में क्या हर्ज है?" राजीव मल्होत्रा ज़ानबूझकर हंसा ।

"शकर रोड पर । कहो तो लेने आ जाऊं ?" रजनी की आवाज में चंचलता थी ।

“नहीँ, मैं आ जाऊंगा ।"

"कब तक ।।"

"जब तुम कहो ।"

"अभी ।"

"ठीक हे । आधे घण्टे में मैँ यहां से रवाना होता हू I” राजीव ने गहरी सांस लेकर कहा ।

“जरा तैयार होकर आना बातों के लिए l आज मैं. शादी कै लिए बात करूंगी ।” रजनी पुन: हंसी ।

राजीव मल्होत्रा ने हंसकर रिसीवर रखा और रिसीवर रखते ही चेहरे पर गम्भीरता की परत छाती चली गई ।

उसके विचारों . , का केन्द्र रजनी शाह थी ।

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फीनिश

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देवराज चौहान ने एक छोटे-से मकान के सामने कार रोकी ।

सिगरेट सुलगाई फिर कार से बाहर निकलकर आगे बढा और मकान का गेट खोलकर, भीतर प्रवेश करके सदर द्धार कें करीब लगी बेल के बटन पर अनूठा रख दिया।

भीतर घण्टी बजने का स्वर सुनाई दिया l देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लिया ।

दरवाजा खुला ।

दरवाजा खोलने वाली अंजना थी । उसने प्रश्नभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा ।

"नमस्कार !" देवराज चौहान ने दोनों हाथ जोडकर बेहद शरीफाना ढंग से नमस्कार किया

जबाव में असमजसता-भरी निगाहों से अंजना ने भी हाथ जोडे ।

"किससे मिलना है, आपको ?"

“अजय साहब तो भीतर ही होंगे?”

"हां l” अंजना ने खोजपूर्ण निगाह देवराज चौहान पर डाली~ “आपको उनसे मिलना है?” देवराज चौहान कें सहमति में सिर हिलाने पर, अंजना ने उसे भीतर ले जाकर बिठाया ।।

“मैं अभी उन्हें भेजती हूँ !"

तभी अजय को कमरे में प्रवेश करते देखकर अंजना ठिठक गई ।।

“यह तुमसे मिलने आए हैं r" अंजना ने अजय से कहा ।

"कहिये I” अजय ने देवराज चौहान को देखा-“मैंने आपको पहचाना नहीं I”

"अवश्य पहचान लेते अगर हम पहले भी कमी मिले होते ।" उसी तरह बैठे बेठे देवराज चौहान मुस्कराया-"वेसे मुझे देवराज चौहान कहते हैं ।"

अजय और अजना की निगाहें आपस में मिलीं । दोनों सतर्क हो गए। देवराज चौहान की बातों से उन्हें खतरे का आभास मिलने लगा था ।

"क्या बात है? आप लोग एकाएक ही खामौश क्यों हो गए?" देवराज चौहान ने दोनों पर निगाह मारी ।

“तो आपका नाम देवराज चौहान है?” अजय खुद पर काबू पात्ता हुआ बोला I

"हूँ ।" . .

"मैं आपकी वया सेवा कर सकता हूं! जबकि हम पहले कभी नहीं मिले I”

" मिले हम अवश्य नहीं । परन्तु मैँ आप लोगों कै बारे में मिलने से ज्यादा जानता हू I"

देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लेकर कहा-" बैसे मुझे खुशी है कि आप दोनों ने शादी कर ली हे और अब शराफत से जिन्दमी बिताने का फैसला कर लिया है !" देवराज चौहान अंजना को देखकर मुस्कराया-"जेब काटने का धन्धा ज्यादा देर नहीं चलना था । शादी करके तुमने अच्छा कदम उठाया ।”

अंजना चौंकी । अजय के चेहरे का रंग फक्क पड गया ।

“तुम तुम कौन हो?" अजय के होंठों से निकला ।

"देवराज चौहान ।”

" यह तो तम्हारा नाम हुआ । वास्तव में तुम कौन हो?" अजय की आबाज में कम्पन आ गया था ।

"मरा नाम ही तुम लोगों के लिए बहुत है । दिल्ली में तुम लोग जो करके आए हो, उसके बारे में मैं सब जानता हू । बैंक-डकैती कै पैतीस लाख रुपये इस समय तुम लोगों के पास हैं ।"

" तु....तुम यह सब कैसे जानते हो?” अंजना हक्की बक्की रह गई ।

“मैं पहले भी कह चुका हुं मेरा नाम देवराज चौहान है । मेरी निगाह हर तरफ रहती है ।"

अजय और अंजना के होंठों से कोई बोल ना फूटा l

" क्या चाहते हो?" अंजना के होंठ खुले l

देवराज चाहान ने सिर हिलाया फिर शांत लहजे में कह उठा ।

" तुम लोगों ने कोई जुर्म नहीं किया था, ना तो बैंक डकैतो की । ना ही किसी की जान ली । परन्तु बैंक-डकैती का पैसा, तुम लोग पूरे होशोहवास में दिल्ली से बिशालगढ़ ले आऐ । अगर पुलिस तुम लोगों को मौजूदा डकैती क्री दौलत के साथ गिरफ्तार कर ले तो जानते हो क्या होगा?"

दोनों चुप । कहते भी तो क्या? उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो चुकी थी ।
 
"तुम लोगों की हालत उस स्थिति में बहुत बुरी हो जाएगी । सीधे जेल जाओगे I पुलिस वाले दो चार इलजाम और भी तुम पर थोप देंगे । चंद दफा लगाकर अदालत में पेश किया जाएगा I उसके बाद जेल और अदालन कै चक्करों में ही सारो उम्र बीत जाएगी । यानी कि दौलत भी गई और जिन्दगी के मजे भी ।"

अजय और अंजना के होंठों से कोई आवाज ना निकली ।

“मैं तुम लोगों पर मेहरबानी करने आया हूँ। मेरे सिवाय तुम लोगों के बारे में आर काई नहीँ जानता I”

अजना के होंठों से कठिनता से निकला ।

"तुम्हें हमार बारे में कैसे पता चला?"

"दिवाकर, हेगडे, खेडा आर राजीव मल्होत्रा ने जव वेक-डकेती डाली तो में तब उन पर ही निगाह रख रहा था । उसके बाद भी उन पर मेरी बराबर निगाह रही I यानी कि बाद में जो भी हूआ, मेरी निगाहों कै सामने हुआ । शादी करन के बाद तुम लोग जब विशालगढ़ जाने बाती ट्रेन पर बेठे तव में कुछ दूर खडा तुम लोगों को देख रहा था । फिर उसी ट्रेन से मैं भी बिशालमढ पहुंचा I तुम लोगों के रहने का ठिकाना देखकर वापस दिल्ली चला गया । उसके ~ बाद दो दिन पहले ही विशालगढ़ लौटा हू। अब वक्त मिला तो आप लोगों के दर्शन करने आ गया ।"

“तुम-तुम हमारे पास क्यों आये हो? क्या चाहते हो हमसे?” अजय ने सूखे होंठों पर जीम फेरकर कहा ।

" तुम --तुम लोगों का भला करने आया हू।"

" कैसा भला ?"

"दिल्ली से भागकर गलत जगह आ गये हो ।‘"

“क्या मतलब?" अंजना कै होंठों से निकला ।

"दिबाकर हेगडे ओर खेड़ा यहीं विशालगढ़ में हैँ ।" अंजना बुरी तरह चौंकी I

“वया कह रहे हो?"

"ठीक कह रहा हूं। ओर यह केस जिस पुलिस इन्सपेवटर कै हाथ में था, उसका ट्रांसफर भी इसी शहर में हो गया हे । तुम दोनों कभी भी आसमानी मार में दब सकत्ते हो l जो खामखाह ही सिर पर आ गिरती है !"

देवराज चौहान का स्वर गम्भीर था-" तुम दोनों के लिये अच्छा यहीँ होगा कि पैंतीस लाख के साथ, विशालगढ़ से कहीँ दूर निकल जाओ । फंस गये तो बाकी की जिन्दगी खामखाह ही जैल में बीत जायेगी । क्योकि बैंक-डकैती ... का पैसा तुम लोगों कै पास हे I”

कहने के साथ ही देवराज चौहान उठा और बाहर को निकलता चला गया ।

अजना और अजय हक्के-वक्के से रह गये। कुछ पलों बाद उन्हें होश आया तो एक-दूसरे क्रो देखा l

"मैँ नहीं जानती, देवराज 'चौहान ठीक कह रहा है या गलत । लेकिन हमें किसी तरह का खतरा नहीं लेना चाहिए । तैयारी करो अजय ._ हमें अभी विशालगढ से निकल जाना होगा I"

अजय फोरन उठ खडा हुआ ।

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नौकर, देवराज चौहान को वंगले कै ड्राइंगरूम मे छोड गया। वहा का माहौल-देखते हीँ देवराज चौहान के ज़वड़े सख्ती से भिंचते चले गये ।।

दिवाकर, हेगड़ और खेडा कै साथ महादेव बैठा हंस-हंस कर बातें कर रहा था ।

सामने ही टेबल पर अघपिए चाय के प्याले रखै थे । वह तीनों बेशक महादेव का साथ दे रहे हों परन्तु महादेव बेबाकी से बातें किए और हंसे जा रहा था ।

देवराज चौहान को देखते ही वह तीनों कुर्सियों से फौरन खडे हो गये ।

"लगता हे आपकै अजीज पहचान बाले हैं ।” महादेव भी उठता हुआ बोला---" अब मैं चलूँगा फिर आऊंगा, फुर्सत में । तब बातें कोंगे ! थोड्री मौज-मस्ती करेंगे । ओं०कै० ।” कहकर महादेव आगे बढा और रास्ते में खडे देवराज चौहान कै समीप ठिठका---"नमस्कार जी, मैँ साथ वाले बगले में रहता हू। नया-नया पडौसी आया सोचा जान-ण्डचान कर लूं । खेर, आपसे मिलकर वहुत खुशी हुई । चलता हूं ।" महादेव ने वेहद शराफत के साथ देवराज चौहान को कहा और बाहर निकलता चला गया ।

देवराज चौहान आगे बढा और तीनों कै करीब पहुचा ।

"कौन था यह?" देवराज चौहान की निगाहें दिवाकर के चेहरे पर टिकती चली गई ।

"पडौसी था ।"

"यहां क्या करने आया था?"

"मेल-मिलाप करने । यूं ही इधर-उधर की बातें हांकै जा रहा था ।" दिवाकर न अनमने मन से कहा ।

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और कश लेकर बोला… "अपने बाप से बात की?”

" हां , तुमसे वह बात करेगा ।" दिवाकर ने एक तरफ इशारा किया ।

देवराज चौहान की निगाह घूमी । कुछ दूर खिडकी पर कोई खडा था । उसकी पीठ उनकी तरफ थी । देवराज चौहान की निगाह पहले उस पर नहीं पडी थी। कई क्षण वह उसकी पीठ को देखता रहा ।

"कौन है वह?"

"तारासिंह ।। पिताजी का खास आदमी । तुम्हें जो भी बात करनी हो, उइससे कर लो ।"

तभी खिडकी पर खडा तारासिह पलटा । उसकी निगाहें देवराज चौहान पर जा टिकीं ।

तारासिह पचास-पचपन की उम्र का-दरमाने कद का, सेहतमंद व्यक्ति था । वदन पर कीमती सूट पहन था ।

देखने में वह कोई धन्ना सेठ लगता था I परन्तु उसकी आंखें चुगली कर जाती थीं I उसकी आंखों से क्रूरता की ऐसी झलक मिलती थी, कि जेसे जन्मपत्री से किसी इन्सान के बारे में मालूम हो जाना I उनकी आंखों में झांकते ही देवराज चौहान सतर्क हो उठा ।

समझने में उसे एक पल की भी देर न लगी कि सामने खडा इन्सान खेला खाया और खतरनाक है ।।

चन्द्रप्रकाश दिवाकर का ऐसे ईन्सान को बात करने कै लिए भेजना उसकी समझ मेँ नहीं आया । दिवाकर मामला बढाना चाहता है या निपटाना?

तारासिह हौंले हौले चलता हुआ उसके पास आया और मुस्कराकर बोला… ~"मुझे तारासिंह कहते हैं । तुम शायद देवराज चौहान हो I"

“शायद नहीं, पक्का देवराज चौहान हूं।" देवराज चौहान ने सपाट लहजे में कहा I

"मुझे चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने तुमसे बात करने के लिए भेजा हैं I” तारासिह ने कहा ।

"मेंरे पास इतना समय नहीं है कि तरह तरह कै लोगों से बात करता......!”

"मै तरह-तरह मेँ नहीं आता l" तारासिंह उसकी बात काटकर मुस्कराया-"दरअसल मैंने ही फैसला करना हैं कि तुम जो कह रहे हो, सही कह रहे हो I तुम्हें रकम दी जाये कि नहीं I”

"पुलिस को किया गया मेरा एक फोन मेरी बात की सच्चाई साबित कर देगा I दिल्ली में जिस इन्सपेक्टर ने इन तीनों को गिरफ्तार करके अदालत में पेश किया था । वह आजकल विशालगढ़ में माल रोड के थाने में तैनात है । मैं इन्सपेक्टर सूरजभान कीं बात कर रहा हू । इत्तफाक से आज सुबह मेरी उससे मुलाकात हुई थी I” देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबाकर कहा-“अपनी बात को साबित करने कै लिए मै फालतू के किसी बन्दे से बात नहीँ करना चाहता । कल तक रकम यहां पहुच जानी चाहिए; नहीं तो यह तीनों सदा के लिए जेल में होंगें I"

"तुम तो खत्मखाह ही क्रोध किये जा रहे हो। मैं तुमसे बात करना चाहता हूं l” तारासिहे सिर और हाथ हिलाकर कह उठा----"पैसा मे अपने साथ लाया हूं। लेकिन देने से पहले तसल्ली तो कर लू कि तुम जो भी कह रहे हो, सहीं कह रहे हो? यूं ही हमे बेवकूफ नहीँ वना रहे?"

"पैसा लाये हो?" देवराज चौहान की आंखें सिकुडी ।

“हा ।”

"कितना ।"

"एक मुश्त ।"

"पूरा करोड है?”

"हां ।” तारासिंह ने सिर हिलाया-"चंद्रप्रकाश दिवाकर अपने बेटे पर किसी भी प्रकार की आंच आते नहीं देखना चाहता । वेसे भी करोड रुपये की रकम अपने बेटे के आगे कोई अहमियत नहीं रखती I"

"पैसा कहाँ है?"

" ऊमर क्यो में'। आआं वहीं चलते हैं ! बाकी बात वहीँ करेंगे ! बच्चों के सामने मैं ज्यादा बात करना भी नहीं चाहता । वैसे तुम्हें इस बात का विश्यास दिलाना होगा कि पैसा लेने के बाद भी अपना मुंह बन्द रखोगे। आओ ।" कहने के साथ ही तारासिंह ने तीनों से कहा-"'हम ऊपर कमरे र्में हैँ, जब तक बुलाया ना जाये, कोई भी हमें डिस्टर्ब न करे ।"

इसके बाद तारासिह देवराज चौहान के साथ वहां से चला गया ।

देवराज चौहान ने चलने में कोई आनाकानी नहीं की । जो ऐसे मामलों में पैसे देगा वह अपनी तसल्ली तो करना ही चाहेगा l

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फिनिश

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दोनों कमरे में जा बैठे I दरवाजा बन्द कर लिया । दोनों ने सिगरेट सुलगाई ।

"सबसे पहले तो यह बताओं कि जिस जानकारी की तुम कीमत मांग रहे हो, उसे तुम्हारे सिवाय और कौन-कौन जानता है? यानी कि कुल मिलाकर तुम कितने आदमी हो जो यह सब जानते हैं?" तारासिंह ने शांत भाव में पूछा l उसकी कटुताभरी निगाह देवराज चौहान कं चेहरे पर घूम रही थी ।

.बाकीं तो सब ठीक था परन्तु तारासिंह की आंखों में जो भाव थे वह देवराज चौहान को शुरू से ही ठीक नहीं लग रहे थे ।

कोई बात उसे चुभ रही थी । वह क्या बात थी, खुद उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

"यहां मुझे तुम्हारा लाया पैसा नजर नहीँ आ रहा ।” देवराज चौहान बोला ।

“वहम में मत पडो ।" तारासिह गम्भीर स्वर में कह उठा "पैसा यहीं है, लेकिन जब तक मुझे मेरे प्रश्नों का सही ज़वाब नहीं मिल जाता, तब तक मैं न तो पैसा तुम्हें दिखाऊगां , न ही तुम्हारे हवाले करूंगा । मेरी तसल्ली होते ही करोड की पूरी दौलत तुम्हारे पास पडी होगी । यह कोई छोटी रकम नहीं है जो तुम्हारी जेबी में भर र्दू।"

देवराज चौहान समझ गया कि सामने बैठा इन्सान बहुत ही घिसा हुआ हे ।

"जवाब दो मेरी बात का । यह बात और कौन-कौन जानता है कि... ?"

"कोई नहीं जानता ।" देवराज चौहान ने सपाट लहजे में जवाब दिया ।

"अकेले हो?" तारासिंदृ की आंखों में अजीब से भाव उभर आये ।

“हां । पैं अकेले ही काम करता हूं।” देवराज चौहान ने उसकी आंखों में झांका ।

"फिर तो बहुत बहादुर हो I" तारासिंह एकाएक खुलकर हंसा------"ऐसे काम अकेले करते हुए तम्हें डर नहीं लगता कि काई तुम्हारा गला काट देगा । खास तौर पर तब जब तुम किसी से वसूली करने जाओ । जैसे कि अब यहां पर आये हुए हो । अकेले l बाहर तुम्हारा कोई साथी भी नहीं मौजूद ।।"

"मेरा साथी बाहर नहीं भीतर है ।"

“क्या मतलब ?" तारासिंह कै माथे पर बल उभर आए ।।

अगले ही पल देवराज चौहान कें हाथ में रिवॉल्वर चमकी लगी । देवराज चौहान का चेहरा कठोर हो चुका था । आंखों में जहान भर की सख्ती सिमट आई थी, होंठ भिंच चुके थे ।

तारासिंह फौरन सतर्क हो गया l

"यह क्या कर रहे हो ? रिवॉल्वर जेब में रखो ।" तारासिंह ने हाथ हिलाकर कहा ।

“अब कुछ मैं कहू?” देवराज चौहान कै होंठों से गुर्राहट निकली l

"कहो ।" रिवॉल्वर देखकर तारासिंह कुछ खास चतित नहीं हुआ था I

"अब तक जो बातें तमने की हैं ,उससे स्पष्ट झलकता हैं कि तुम जो भी कह रहे हो, वकबास कर रहे हो, तम दिल्ली से

से अपने साथ कोई पैसा नहीं लाये I" देवराज चौहान एक-एक शब्द चबाकर बोला !

"तुम्हारा ख्याल गलत भी हो सकता हैं ।" तारासिंह कीं आंखें सिकुड गयीं ।

"मेरा ख्याल सही हे । इससे वडी और क्या बात कहूंकि अगर तुम मुझे पैसे झलक दिखा दो तो सारी दौलत तुम्हारे हवाले करके चला जाऊंगा । दोबारा कभी पीछे मुडकर भी नहीं देखूंगा ।"

त्तारासिंह ने होंठ भोंच लिये I

"मेरा नाम देवराज चौहान है । मेरा गला काटना इतना आसान नहीं जितना कि तुमने सोच लिया था…बल्कि यह काम तो मुझे करना अच्छा लगता हे ।" देवराज चौहान ने उसकी आखों में झांका+--“मेरे हाथ में नजर आ रहीँ रिवॉल्वर का ख्याल हर दम अपने दिमाग में रखना l कोई गलत हरकत मत कर बैठना । साथ ही मुझें इस बात का जबाव दो कि तुम अब मेरे साथ क्या करने वाले थे?”

“कुछ खास करने का इरादा नहीं था मेरा ।" तारासिंह ने हाथ हिलाया ।

"ओर वह बे--खास इरादा क्या था?"

“बाह! !" एकाएक तारासिंह हंसा-“तुम तो मेरे ऊपर हावी होने की चेष्टा कर रहे हो l”

"जो मैंने पूछा है, मुझे सिर्फ उसका जवाब दो ।" देवराज चौहान गुर्राया ।

उसी पल देवराज चौहान को अपनी गर्दन पर ठण्डे लोहे का आभास मिला । उसके जिस्म को तीव्र झटका लगा, वह सीधा होकर बैठ गया । होंठ र्भिच गये । आंखों में वहशीपन आगया । उसने एक बार भी पीछे मुडकर देखने की चेष्टा नहीं की । वह समझ चुका था कि गर्दन पर रिवॉल्वर लग चुकी हे ।

तारासिह कै होंठों के बीच क्रुरताभरी मुस्कान नाच रही थी I

"तुम पूछ रहे थे कि मैंने तुम्हरि साथ क्या करना था ।" तारार्सिंह हंसा ।

देवराज चौहान उसी मुद्रा में बैठा उसे देखता रहा I

“तुम्हारे सबाल का जबाब अभी तुम्हें खुद- ब -खुद ही मिल जायेगा l" पूर्ववत: लहजे में कहते हूए त्तारामिह अपना जगह से उठा और आगे बढकर देवराज चौहान कै हाथ से रिवॉल्वर ले ली ।

" तुम ।" देवराज चौहान ने सर्द लहजे मैं कहा-"वहुत महंगा सौदा कर रहे हो तारासिंह ।”

… “यह तो अच्छी बात है । क्योंकि सस्ते सौदे का तो मुझे कभी शौक भी नहीं रहा ।" कहकर वह इंसा । देवराज चौहान ने सिर धुमाका पीछे देखा तो चेहरा मौत कै भार्वो-से भरता चला गया ।

पीछे तीन आदमी खड़े थे । एक की रिवॉल्वर उसकी गर्दन से सटी थी । अन्य दो, रिवाॅल्बरों को थामे वेहद सावधानी से उसे निशाना बनाए खड़े थे । तीनों के चेहरों पर खतरनाक भाव छाए हुए थे ।

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फीनिश

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राजीव मल्होत्रा पोर्च में खडी कार 'में बैठा तो ड्राइवर दरबाजा वन्द करके ड्राइविंग सीट पर बैठने कै पश्चात् कार स्टार्ट करते हुए बोला ।

"कहा चलना हे मालिक ।"

"शंकर रोड । साईमन के कैफे ।" ड्राइवर ने कार बंगले से बाहर निकाली और सडक पर ले आया । "

राजीव मल्होत्रा पिछली सीट पर बैठा खिडकी से बाहर कै नजारे देख रहा था और सोचने लगा कि वह कहां से कहाँ आ पहुंचा ।

सीथा-सादा शरीफ इन्सान एक गलत काम क्या किया की दलदल मे धंसत्ता ही चला गया । बाहर निकलने का जरा मौका नहीं मिला उसे

आज रंजीत श्रीवास्तव के रुप में उसका पहला दिन था । अभी छ: महीने और उसे इसी रूप में बिताने थे ।

इस दरम्यान जाने कितने मोड, कितने खतरे बीच में आने थे । एकाएक उसका ध्यान नकाबपोश की तरफ अटक गया कि कौन है वह?

जाहिर है देवराज चौहान का साथी होगा । परन्तु एक बात उसे चुभ रही थी कि जब तक नकाबपोश उसके पास रहा l देवराज चौहान वहां नहीँ आया । अब देवराज चौहान आया तो नकाबपोश का आना बन्द हो गया ।

जाने क्यों उसे लग रहा या कि नकाबपोश और देवराज चौहान एक ही शख्स हे ।

अगर दो होते तो आज रंजीत श्रीवास्तव को इस वक्त देवराज चौहान अकेला बांधकर नहीं आता-बल्कि वहां पर पहरेदारी के तौर पर नकाबपोश मौजूद हाता ।

आप समझ गये होंगे नाकाबपोश कौन । मै जान गई ।

राजीव मल्होत्रा का दिमाग इन्हीं तानो-बानों में लगा हुआ था । तभी कार लाल बत्ती पर रुकी । व्यस्ततम चौराहा था । राजीव की बिचारतन्द्रा टूटी ।

उसी पल कार का दरवाजा खुला और डॉक्टर बैनर्जी ने कार में प्रवेश किया । उसकी दाढी बढी हुई थी ।

परन्तु वह नहाया धोया अच्छे कपडे पहने था । भीतर प्रवेश करते ही जेब से रिवॉल्वर निकलकर के हाथ में आयी और राजीव मल्होत्रा के वदन से जा सटी ।

साथ हीं वह गुर्राया । "हिलना मत कुत्ते की औलाद ।'" राजीव मल्होत्रा ठगा सा रह गया । कई पलो तक वह कुछ भी ना समझा I

“कार ते नीचे उतरो! बैनर्जी पुन: गुर्राया-“सीधी तरह शराफत के साथ । किसी वहम में मत रहना । आर तुमने किसी प्रकार की कोई चालाकी करने की कोशिश की तो सारी गोलियां तेरे शरीर में उतार दूगा।"

"क कौन हो तुम?" राजीव मल्होत्रा कै होंठों से हक्का ~ बक्का-सा स्वर निकला ।

"साले-हरामी ! मेरा परिचय पूछता हे । उतर नीचे ।" बैनर्जी ने रिवॉल्वर की नाल उसकी कमर मे घूसेड़ दी-“याद रख, कार से बाहर निकलते ही रिवॉल्वर मैँ जेब में अवश्य डाल लूगा, परन्तु जरूरत पड़ने पर आधे सेकण्ड में ही बाहर निकाल लूंगा l बहुत दिनों से में इस मौके की तलाश में था कि तू मुझे कहीँ अकेला मिले I आज का सुनहरी मौका में किसी कीमत पर नहीं गंवाऊंगा । जो मैँ कहता हूं खामोशी से वही करता जा, वरना तेरी लाश यहीँ इस कार मे अभी छोडकर जाऊंगा ।" कहने के साथ हीँ बैनर्जी ने भयभीत बैठे ड्राइवर से कहा-"कार को लाल बत्ती पार करके साईड में रोक लेना । तेरा मालिक सिर्फ पांच मिनट में वापस आ जाएगा अगर यह मेरी बात मानता रहा ।" डॉक्टर बैनर्जी कै दृढ निश्चय से भरे खतरनाक भावों को देखकर राजीव मल्होत्रा कुछ भी पूछने का हौंसला ना कर सका । वह डॉक्टर बैनर्जी कै साथ कार से नीचे उतरा । उसी समय हरी बत्ती हो गई । वाहन आगे बढने लगे । बैनर्जी उसके साथ फुटपाथ पर आया I राजीव के प्रति वह बेहद सावधान था । उसे लेकर वह पास ही में खडी कार तक पहुचा ।

कार के भीतर असली रंजीत श्रीवास्तव अपने असली चेहरे कै साथ मौजूद था ।

“तुम जाओ । चौराहे कै पार वह कार खडी है । निश्चित रहना । अब कोई भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड सकेगा I मुझे हर समय अपने करीब समझना ।" कहने के साथ ही बैनर्जी कार

का अगला दरवाजा खोला और राजीव को भीतर धकेलकर खुद भी भीतर बैठ गया ।

रंजीत श्रीवास्तव ड्राईविंग सीट पर मौजूद था ।उसने अपने हमशक्ल को देखा उधर राजीव मल्होत्रा ने अपने हमशक्ल को ।

"अशोक ।।" रंजीत श्रीवास्तव ने भारी स्वर में कहा-"मुझे तुमसे इतने ज्यादा कमीनेपन की उम्मीद नहीं थी । मैं तुम्हें आधी जायदाद देने को तैयार था, लेकिन तुमने मेरी बात नहीं मानी l लालच तुम्हारे सिर पर चढकर बोल रहा था । अब देखा लालच का नतीजा ।'" राजीव मल्होत्रा ने गहरी सांस ली और गम्भीर स्वर में बोला l
 
"मैं नहीं जानता, तुम अशोक किसे कह रहे हो । बहरहाल मैं अशोक नहीं हूं । मेरा नाम राजीव है । राजीव मल्होत्रा । अगर मुझे 'मालूम होता कि देवराज चौहान तुम्हें सम्भाल नहीं पाएगा तो मै कभी भी इस काम को हाथ में नहीं लेता । तुम्हारी जगह कभी ना लेता l'

“देवराज चौहान?" रंजीत श्रीवास्तव के माथे पर वल पड़ गए-"यह कौन है? तुम क्या कह रहे हो?"

"देवराज चौहान वही है, जिसकी कैद से तुम निकल भागे आ रहे हो ।"

"मैं-मै तो किसी की कैद में नहीं था I” रंजीत श्रीबास्त के होंठों से निकला ।

राजीव मल्होत्रा के कहने से पहले ही डॉक्टर बैनर्जी गुर्राकर कह उठा ।

"तुम जाओ रंजीत I चौराहे कै पार खडी अपनीं कार में जाओ । जैसा मैँने समझाया है, वैसा ही करना । सब ठीक हो जायेगा । यह अब कभी भी तुम्हें तंग नहीं कर सकेगा I इसका तो में वह हाल करूंगा । कि यह ना जिंदो में रहेगा ना मरों मे I इससे तो अभी मुझें वहुत हिसाब चुकता करने हैं ।"

रंजीत श्रीवास्तव बिना कुछ कहे नीचे उतरा और पैदल ही आगे वढ़ गया ।

" 'चलो ।" डॉक्टर बैनर्जी राजीव मल्होत्रा पर गुर्राया-“ड्राइविंग सीट संभालो ।"

राजीव ने खामोशी से ड्राइविंग सीट सम्भाल ली ।

"कार स्टार्ट करके आगे बढाओ ।"’ कहने कै साथ ही डॉक्टर बैनर्जी ने रिवॉल्वर कमर से लगा दी…“एक दिन तुम मेरे कन्धे पर बन्दूक रखकर ही बाजीं जीते थे अशोक और आज तुम्हें हराने के लिए भी मेरा कंधा आया हे । कार आगे बढा ~ मेरा मुंह मत देख । बातें करने के लिए हमारे पास अब वक्त ही वक्त होगा । बहुत बाते करेंगें हम ।” बैनर्जी कढ़वे स्वर में कुह उठा।

राजीव मल्होत्रा ने कार आगे बढा दी । उसके दिमाग में उथल-पुथल मच चुकी थी । वह रंजीत श्रीवास्तव और डाँक्टर बैनर्जी की बातें और व्यवहार को समझने की चेष्टा कर रहा था

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फीनिश

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रंजीत श्रीवास्तव ने कार का दरवाजा खोला और भीतर बैउठते ही बोला । "चलो l ” ड्राइवर ने अपने मालिक को सही सलेमत देखकर चैन की सांस ली । उसने कार आगे बढा दी । अगले ही पल उसके होंठों से निकला ।

“मालिक ।। आपके कपडे? आपने तो. दूसरे कपडे पहने हुए थे?"

ड्राइवर को बात सुनकर रंजीत श्रीवास्तव मुस्कराकर बोला ।

“जो मुझे ले गया था उसने मेरे कपड़े उत्तार लिए और यह पहनाकर वापस भेज दिया ।"

"हैरानी है मालिक । वह पागल तो नहीं था?" ड्राइवर वास्तव में `हैरान हो उठा था ।

"शायद । मुझे तो वह पागल ही लगा था ।" रंजीत बोला---" कहा जा रहे थे ?"

"शकर रोड पर आपने साईमन के कैफे चलने को कहा था ।" ड्राइवर बोला ।

“वापस बंगले पर चलो । अब मेस कही भी जाने का मन नहीं है ।” रंजीत ने कहा ।

“जो हुक्म मालिक ।" ड्राइवर ने फौरन सिर हिलाकर क्रहा ।

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फीनिश

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देवराज चौहान ने क्रुरता भरी निगाहों से तारासिंह को देखा । देवराज चौहान कै हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे । पिछले तीन घण्टों से वह इसी मुद्रा में पड़ा था । शाम हो रहीँ थी ।

वह चल फिर सकता था परन्तु कमरे से बाहर नहीं निकल सक्ता था, क्योंकि वह तीनों खतरनाक आदमी कमरे में ही डटे रहे थे l इन तीन घण्टों कै दरम्यान न तो वह तीनों कुछ बोले थे और ना ही देवराज चौहान ने कहा था । अलबत्ता खा जाने वाली निगाहों से एक-दूसरे को देखते रहे थे I

फिर शाम होने पर तारासिंह वहां पहुचा ।

देवराज चौहान क्रो बेबस देखंकर वह हंसा ।

"माफ करना । खाना खाने के बाद जरा आंख लग गई थी । अब खुली तो सीधा चला आया ।"

"तुम्हारी आंख तो मैं ऐसी बन्द करूंगा कि फिर कभी नहीं खुलेगी I" देवराज चौहान गुर्राया ।

"सपने देखना छोडो। तुम नहीं जानते अब तुम्हारा क्या हाल होने जा रहा है I" '

"तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड सकते I”

"बहुत हौंसला हे तुममें I" तारासिंइ ने उसकी आंखों में झाका ।

"बहुत ही ज्यादा । तुम जैसे ना जाने कितने आये और कितने चले गए I”

"उन आने वालों में तारासिंह नहीं होगा बेटे ।" त्तारासिह कटुता से कह उठा ।

“कई तारासिंह थे उनमें I" देवराज चौहान ने होंठ भीचकर कहा ।

तारासिंह हंसा फिर आदत के मुताबिक हाथ को हवा में हिलाकर कह उठा ।

‘ "छोडो इन बातों को । बाद में करेगे I मैं फिर तुमसे वही पूछता हू जो दिन में पूछा था । जिस बिनाह पर तुम दौलत ही डिमान्ड कर रहे ये, उस बात को सिर्फ तुम ही जानते हो I और कोई नहीं जानता?"

"तुम क्या समझते हो अपनी जान बचाने की खातिर में अपनी बात से पीछे हट जाऊंगा?"

"इसका मतलब इस बात के राजदार तुम अकेले ही हो !!" तारासिह ने सिर हिलाया ।

"हा I "

“तुम्हारा कोई साथी नहीं?"

“नहीं । मेरा ऐसा कोई साथी नहीं, जो बाहर खडा हो और मेरे बाहर आने का इन्तजार कर रहा हो I”

" गुड !" त्तारासिंह ने सिर हिलाया-"अगर तुम मर जाओ तो?"

" तो यह बात हमेशा के लिए यहीँ पर ही खत्म हो जायेगी ।" एकाएक देवराज चौहान हंसा कड़वी हंसी ।।

तारासिंह ने देवराज चौहान की आखो में झाका फिर हाथ हिलाकर बोला ।

"मुझे हेरानी है कि तुम अपनी मौत से भी नहीं डर रहे ।”

"मेरी मौत आईं ही कहां हे जो मैँ डरू । वेसे भी देवराज चौहान ने कभी डरना नहीं सीखा ।"

तारासिंह ने वहां मौजूद तीनों आदमियों को देखा ।

“सुना , तुम लोगों ने । अच्छी तरह सुन लिया होगा कि यह कहता इसको मौत नहीं आई और यह कभी डरता भी नहीं हे । ऐसे बहादुर लोगों को तो इस धरती पर रहना ही नहीँ चाहिए, जो डरते ना हों I”

" हुक्म मालिक !" एक ने खतरनाक लहजे में कहा ।

"आज रात इसे डरा दो ।" तारासिंह ने सर्द लहजे में कहा ।

"'जो हुक्म। "

"इसे बता दो क्रि मौत क्या होती है और लोग उससे क्यों डरते हैं ।" तारासिंह गुरांया ।

“ठीक है मालिक !"

“दिन का उजाला निकलने से पहले ही इसकी लाश शहर कै किसी चौराहे पर फेंक देना और एक कागज पर यह लिखकर इसकी छाती से चिपका देना कि यह मौत से नहीं डरता था, . लेकिन जव मौत आई तो यह रोया-त्तड़पा, हाथ जोडकर गिड़गिड़ाया परन्तु मौत ने इसे फिर भी नहीं बख्शा ।"

“रोने -गिड़गिड़ाने वाली बात तुम कैसे कह सकते हो तारासिंह I" देवराज चौहान ने व्यग्यभरे स्वर में कहा ।

“इसलिए कि ऐसा होगा: जब तुम मरोगे तो तडपोगे भी . अवश्य ।"

"तुम्हें वंहम हे । मैं नहीं मरने वाला !"

तारासिंह हसा । ठहाका मारकर हंस पड़ा ।

पहली बार इतनी जोर से हसा था वह ।

"बेटे !" तारासिंह ने अपनी हंसी रोककर, देवराज चौहान को देखा…"मैं तुम्हें इस बात का बिश्वास दिलाकर कि तुम मरने जा रहे हो तभी मारूगा । जब तुमं खुद कहोगे कि मुझे मत मारो । तुमने बहुत बडी गलती यह कर दी किं खतरनाक खेल अकेले खेलते हो ।अगर तुम्हारे दो-चार साथी होते उन्हें भी इस मामले . की सारी जानकारी होती वह बंगले कै बाहर खड्रे तुम्हारी वापसी की राह देख रहे होते तो शायद मैं कुछ सोचता । तुमसे सौदेबाजी करके रकम कम करवाता । लेकिन तुम तो हो ही अकेले । इसीलिए तुम्हारा पत्ता तो मैं ही साफ कर दूंगा ।" '

देवराज चौहान मुस्कराता हुआ तारासिंह को देखता रहां । बोला कुछ भी नहीं ।

तारासिंह ने अपने आदमियों को… देखा ।।

"रात को इसको भरपेट खाना खिलाना i भूखे पेट मैं इसकी जान लेकर, इसकी आत्मा को भटकाना नहीं चाहता-ओर खाना खिलाते समय इसके हाथ मत खोलना अपने हाथों से इसे खाना खिलाना । "

"ऐसा ही होगा मालिक ।"

"रात को हमारी आखिरी मुलाकात होगी देवराज चौहान तब तक के लिए बिदा ।" त्तारासिंह ने अपना हाथ हवा मे लहराया और पलटकर कमरे से बाहर निकल गया ।

देवराज चौहान ने तारासिंह कै जाने के बादं तीनों पर तसल्ली भरी निगाह मारी फिर आगे बढकर कुर्सी पर जा बैठा और बोला

"सिगरेट तो पिला दो !"

एक ने सिगरेट सुलगाकर देवराज चौहान के होंठों में र्फसा दी ।

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फिनिश

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