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रज़िया और शाहिद आराम से बैठ कर बियर का मज़ा ले रहे थे।
रज़िया- यार शाहिद अब कितना तड़पाएगा.. बता भी दे क्या बात है कौन है ये शबनम?
शाहिद- देख रज़िया मैं तुझपे भरोसा करता हूँ इसलिए बता रहा हूँ.. मगर उन कमीनों को मत बताना समझी!
रज़िया- अरे यार तू जानता है.. मैं तेरी दीवानी हूँ। वो सब को तो तेरी वजह से झेलती हूँ.. तेरी कसम मैं किसी को नहीं बताऊंगी।
शाहिद- अच्छा तो सुन तू तो जानती है मैं अपने मॉम डैड का एक ही बेटा हूँ।
रज़िया- हाँ यार मुझे पता है।
शाहिद- सुन तो ले यार.. मेरे चाचा की बेटी फिरोजा को भी तू जानती है ना!
रज़िया- हाँ जानती हूँ.. तू क्या अपनी फैमिली के बारे में बता रहा है? यार शबनम के बारे में बता ना मुझे।
शाहिद- अबे साली.. वही बता रहा हूँ ये बातें बताऊंगा तब तेरे भेजे में सब बात घुसेंगी.. अब चुपचाप आगे सुन।
शाहिद के गुस्सा होने से रज़िया सहम गई उसने बस ‘हाँ’ में गर्दन हिलाई और अपने दोनों हाथ गाल पर रख कर बैठ गई।
शाहिद- गुड ऐसे ही सुन तू.. अब देख मेरी कोई बहन तो थी नहीं.. तो मैं बचपन से फिरोजा को अपनी बहन मानता था.. उसे मैं सग़ी से भी ज़्यादा मानता था।
‘ओके..’
‘फिरोजा मुझसे 10 साल बड़ी थी वो एकदम छोटे भाई की तरह मेरा ख्याल रखती थी। यहाँ तक की जब उसकी शादी हुई, मैं इतना रोया कि क्या बताऊं तुझे!’
रज़िया- हूँउऊ.. ये बातें नहीं पता थी मुझे.. फिर आगे क्या हुआ?
शाहिद- होना क्या था.. उसकी शादी एक अच्छे लड़के से हुई, वो यहीं बंबई में ही एक बैंक में जॉब करता था। धीमे-धीमे टाइम गुज़रता रहा। फिरोजा अम्मी बनी.. उसको एक लड़की हुई। छोटी गुड़िया के आने से मैं बहुत खुश था। जैसे-जैसे वो बड़ी हुई.. मैं उसके साथ खूब खेलता था। फिर आपा को एक बेटा हुआ.. मेरी ख़ुशी और बढ़ गई। अब तो सारा दिन आपा के घर आना-जाना लगा रहता था। दोनों बच्चे मुझसे इतने घुल गए कि क्या बताऊं, सारा दिन ‘मामू मामू..’ कहते मुझसे चिपके रहते थे।
रज़िया- वाउ यार तू तो किसी फिल्म की कहानी जैसे बता रहा है.. फिर क्या हुआ?
शाहिद- फिर जीजू की बैंक ने उनका ट्रान्सफर बंगलोर कर दिया.. पूरे 5 साल बाद आपा और जीजू वापस बंबई आए हैं क्योंकि आपा की तबीयत ठीक नहीं रहती इसलिए जीजू ने वापस अपना ट्रान्सफर बंबई करवा लिया। इत्तफ़ाक़ की बात ये है हमारे घर के सामने ही दोनों को घर मिल गया है।
रज़िया- इट्स गुड यार.. ये तो बहुत ख़ुशी की बात है.. मुझे भी आपा से मिलवाना, आज तक उनके बारे में बस सुना है.. उन्हें देखा नहीं है।
शाहिद- हाँ ज़रूर मिलवा दूँगा तुझे..
रज़िया- यार बुरा मत मानना.. कहानी का हैप्पी एंड हो गया मगर शबनम नहीं आई, ये कन्फ्यूजन दूर करो.. मेरा इस कहानी का शबनम से क्या सम्बन्ध है?
शाहिद- अबे साली तेरी समझ में नहीं आया क्या शबनम मेरी आपा की बेटी है और सुजान उसका छोटा भाई है?
रज़िया- ओ माय गॉड… मगर कन्फ्यूजन फिर भी वैसा का वैसा है.. शबनम तो बच्ची है और तेरी हालत तो ऐसी थी जैसे कोई गजब का माल देखा हो।
शाहिद- यार रज़िया तू समझ नहीं रही है वो लोग जब बंगलोर गए थे शबनम बच्ची ही थी.. आज जब उसको देखा तब भी मेरी नजर में बच्ची ही लगी, लेकिन वो अब बड़ी हो चुकी है, पूरे 18 की! और दोपहर से शाम तक जो हुआ, पूछ मत यार मेरी क्या हालत हुई है!
रज़िया- ओह गॉड अब समझी कुछ ना कुछ गड़बड़ तो हुई है.. यार बता जल्दी नहीं तो मेरा दिमाग़ सोच-सोच कर फट जाएगा।
शाहिद- यार तेरा क्या मेरा खुद का दिमाग़ घूमा हुआ है।
रज़िया- प्लीज़ यार बता ना?
शाहिद- अच्छा सुन.. वैसे तो वो लोग रात को शिफ्ट हो गए थे, मगर मेरी मुलाकात उनसे सुबह हुई।
रज़िया को अभी भी शाहिद की बात समझ नहीं आ रही थी मगर उसने सोचा दोबारा पूछेगी तो शाहिद गुस्सा होगा इसलिए वो चुपचाप बैठी थी।
शाहिद- सुबह हमने साथ नाश्ता किया फिर गप्पें लड़ाईं और दोपहर लंच तक सब कुछ ठीक था। उसके बाद मैं अपने कमरे में आराम करने चला गया बाकी सब नीचे बैठे बातें कर रहे थे।
रज़िया- अच्छा फिर क्या हुआ?
शाहिद- फिर क्या होना था.. रोज की तरह मैंने अपने सारे कपड़े निकाले सिर्फ़ एक पतला सा बरमूडा पहना और लेट गया।
रज़िया- सारे कपड़े मतलब.. अंडरवियर भी छी कितने गंदे हो तुम.. सिर्फ़ बरमूडा में सोते हो हा हा हा हा हा..
शाहिद- अबे साली, लड़के ऐसे ही सोते हैं.. अंडरवियर सारा दिन पहने रहेंगे, तो लंड को आराम कैसे मिलेगा?
रज़िया- पता है मेरे जानू.. मैं तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रही थी।
शाहिद- तुझे मज़ाक सूझ रहा है मेरी टेंशन से हालत खराब है।
रज़िया- यार तू बुरा मत मानना मगर तेरी कहानी मेरे समझ के बाहर है। शबनम से तू मिला, बातें की, फिर सो गया तो शाम को ऐसा क्या हुआ जो तू इतना पागल हो गया?
शाहिद- ऐसे तेरी समझ में कुछ नहीं आएगा.. मैं तुझे पूरी बात बताता हूँ, जिसकी वजह से ये सब हुआ ओके!
शाहिद रज़िया को बताने लगा
रज़िया- यार शाहिद अब कितना तड़पाएगा.. बता भी दे क्या बात है कौन है ये शबनम?
शाहिद- देख रज़िया मैं तुझपे भरोसा करता हूँ इसलिए बता रहा हूँ.. मगर उन कमीनों को मत बताना समझी!
रज़िया- अरे यार तू जानता है.. मैं तेरी दीवानी हूँ। वो सब को तो तेरी वजह से झेलती हूँ.. तेरी कसम मैं किसी को नहीं बताऊंगी।
शाहिद- अच्छा तो सुन तू तो जानती है मैं अपने मॉम डैड का एक ही बेटा हूँ।
रज़िया- हाँ यार मुझे पता है।
शाहिद- सुन तो ले यार.. मेरे चाचा की बेटी फिरोजा को भी तू जानती है ना!
रज़िया- हाँ जानती हूँ.. तू क्या अपनी फैमिली के बारे में बता रहा है? यार शबनम के बारे में बता ना मुझे।
शाहिद- अबे साली.. वही बता रहा हूँ ये बातें बताऊंगा तब तेरे भेजे में सब बात घुसेंगी.. अब चुपचाप आगे सुन।
शाहिद के गुस्सा होने से रज़िया सहम गई उसने बस ‘हाँ’ में गर्दन हिलाई और अपने दोनों हाथ गाल पर रख कर बैठ गई।
शाहिद- गुड ऐसे ही सुन तू.. अब देख मेरी कोई बहन तो थी नहीं.. तो मैं बचपन से फिरोजा को अपनी बहन मानता था.. उसे मैं सग़ी से भी ज़्यादा मानता था।
‘ओके..’
‘फिरोजा मुझसे 10 साल बड़ी थी वो एकदम छोटे भाई की तरह मेरा ख्याल रखती थी। यहाँ तक की जब उसकी शादी हुई, मैं इतना रोया कि क्या बताऊं तुझे!’
रज़िया- हूँउऊ.. ये बातें नहीं पता थी मुझे.. फिर आगे क्या हुआ?
शाहिद- होना क्या था.. उसकी शादी एक अच्छे लड़के से हुई, वो यहीं बंबई में ही एक बैंक में जॉब करता था। धीमे-धीमे टाइम गुज़रता रहा। फिरोजा अम्मी बनी.. उसको एक लड़की हुई। छोटी गुड़िया के आने से मैं बहुत खुश था। जैसे-जैसे वो बड़ी हुई.. मैं उसके साथ खूब खेलता था। फिर आपा को एक बेटा हुआ.. मेरी ख़ुशी और बढ़ गई। अब तो सारा दिन आपा के घर आना-जाना लगा रहता था। दोनों बच्चे मुझसे इतने घुल गए कि क्या बताऊं, सारा दिन ‘मामू मामू..’ कहते मुझसे चिपके रहते थे।
रज़िया- वाउ यार तू तो किसी फिल्म की कहानी जैसे बता रहा है.. फिर क्या हुआ?
शाहिद- फिर जीजू की बैंक ने उनका ट्रान्सफर बंगलोर कर दिया.. पूरे 5 साल बाद आपा और जीजू वापस बंबई आए हैं क्योंकि आपा की तबीयत ठीक नहीं रहती इसलिए जीजू ने वापस अपना ट्रान्सफर बंबई करवा लिया। इत्तफ़ाक़ की बात ये है हमारे घर के सामने ही दोनों को घर मिल गया है।
रज़िया- इट्स गुड यार.. ये तो बहुत ख़ुशी की बात है.. मुझे भी आपा से मिलवाना, आज तक उनके बारे में बस सुना है.. उन्हें देखा नहीं है।
शाहिद- हाँ ज़रूर मिलवा दूँगा तुझे..
रज़िया- यार बुरा मत मानना.. कहानी का हैप्पी एंड हो गया मगर शबनम नहीं आई, ये कन्फ्यूजन दूर करो.. मेरा इस कहानी का शबनम से क्या सम्बन्ध है?
शाहिद- अबे साली तेरी समझ में नहीं आया क्या शबनम मेरी आपा की बेटी है और सुजान उसका छोटा भाई है?
रज़िया- ओ माय गॉड… मगर कन्फ्यूजन फिर भी वैसा का वैसा है.. शबनम तो बच्ची है और तेरी हालत तो ऐसी थी जैसे कोई गजब का माल देखा हो।
शाहिद- यार रज़िया तू समझ नहीं रही है वो लोग जब बंगलोर गए थे शबनम बच्ची ही थी.. आज जब उसको देखा तब भी मेरी नजर में बच्ची ही लगी, लेकिन वो अब बड़ी हो चुकी है, पूरे 18 की! और दोपहर से शाम तक जो हुआ, पूछ मत यार मेरी क्या हालत हुई है!
रज़िया- ओह गॉड अब समझी कुछ ना कुछ गड़बड़ तो हुई है.. यार बता जल्दी नहीं तो मेरा दिमाग़ सोच-सोच कर फट जाएगा।
शाहिद- यार तेरा क्या मेरा खुद का दिमाग़ घूमा हुआ है।
रज़िया- प्लीज़ यार बता ना?
शाहिद- अच्छा सुन.. वैसे तो वो लोग रात को शिफ्ट हो गए थे, मगर मेरी मुलाकात उनसे सुबह हुई।
रज़िया को अभी भी शाहिद की बात समझ नहीं आ रही थी मगर उसने सोचा दोबारा पूछेगी तो शाहिद गुस्सा होगा इसलिए वो चुपचाप बैठी थी।
शाहिद- सुबह हमने साथ नाश्ता किया फिर गप्पें लड़ाईं और दोपहर लंच तक सब कुछ ठीक था। उसके बाद मैं अपने कमरे में आराम करने चला गया बाकी सब नीचे बैठे बातें कर रहे थे।
रज़िया- अच्छा फिर क्या हुआ?
शाहिद- फिर क्या होना था.. रोज की तरह मैंने अपने सारे कपड़े निकाले सिर्फ़ एक पतला सा बरमूडा पहना और लेट गया।
रज़िया- सारे कपड़े मतलब.. अंडरवियर भी छी कितने गंदे हो तुम.. सिर्फ़ बरमूडा में सोते हो हा हा हा हा हा..
शाहिद- अबे साली, लड़के ऐसे ही सोते हैं.. अंडरवियर सारा दिन पहने रहेंगे, तो लंड को आराम कैसे मिलेगा?
रज़िया- पता है मेरे जानू.. मैं तो बस ऐसे ही मज़ाक कर रही थी।
शाहिद- तुझे मज़ाक सूझ रहा है मेरी टेंशन से हालत खराब है।
रज़िया- यार तू बुरा मत मानना मगर तेरी कहानी मेरे समझ के बाहर है। शबनम से तू मिला, बातें की, फिर सो गया तो शाम को ऐसा क्या हुआ जो तू इतना पागल हो गया?
शाहिद- ऐसे तेरी समझ में कुछ नहीं आएगा.. मैं तुझे पूरी बात बताता हूँ, जिसकी वजह से ये सब हुआ ओके!
शाहिद रज़िया को बताने लगा