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बिस्तर गीला हो चुका था। कमरा उनकी भारी सांसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था।
राज सविता की पीठ पर लेटा था, उसका चेहरा तकिये में गड़ा था। वह बुरी तरह हांफ रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने एक साथ दो औरतों को भोगा है—हकीकत में सविता को, और ख्यालों में डॉली को।
तूफान थम चुका था, लेकिन उसकी तबाही और खूबसूरती अभी भी कमरे में बिखरी हुई थी।
राज धीरे से सविता के ऊपर से हटा और बगल में लेट गया। उसका शरीर अभी भी कांप रहा था। पसीना चादर पर सोख रहा था।
सविता वैसे ही पड़ी रही, पेट के बल। उसकी टांगें फैली हुई थीं। वह हिल भी नहीं पा रही थी। उसका पूरा शरीर झनझना रहा था।
कुछ मिनटों की खामोशी के बाद, सविता ने धीरे से करवट ली। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को उठाया और अपना पसीना पोंछा। फिर उसने राज की तरफ देखा।
उसका चेहरा खिला हुआ था। एक ऐसी चमक थी जो राज ने शादी के शुरुआती सालों के बाद कभी नहीं देखी थी। यह एक संतुष्ट औरत की चमक थी। उसके गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे।
सविता खिसक कर राज के पास आई और अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। उसने अपनी उंगलियां राज के छाती के बालों में फेरना शुरू किया।
"राज..." सविता ने बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में कहा। "आज... आज तुमने मुझे मार ही डाला था। सच में।"
राज ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसके बालों को सहलाया। उसे एक अजीब सा अपराधबोध हो रहा था, लेकिन साथ ही एक जीत का अहसास भी। उसने अपनी पत्नी को खुश किया था, भले ही जरिया कोई और था।
"सच कहूँ," सविता ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और राज की आंखों में देखा, "आज मुझे लगा ही नहीं कि तुम मेरे पुराने राज हो। आज तुम... 'नये' लग रहे थे। बहुत ताकतवर।"
"नया?" राज ने पूछा।
"हाँ," सविता ने अपना हाथ नीचे ले जाकर राज के शिथिल पड़े लिंग पर रख दिया। उसने उसे प्यार से सहलाया। "तुम्हारा यह... यह भी आज नया लग रहा था।
इतना बड़ा, इतना सख्त तो यह सुहागरात पर भी नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी और का है। और तुमने जितनी देर तक किया... उफ्फ... मेरे पैर अभी भी कांप रहे हैं। तुमने मुझे पूरा खोल दिया।"
सविता ने राज को कसकर गले लगा लिया। उसने अपना पैर राज के पैरों में फंसा लिया।
"मेरी प्यास बुझ गई राज," उसने कहा। "सच में। मुझे नहीं पता था कि सुख ऐसा भी होता है। मुझे लगा था कि शादी के बाद बस बच्चे और जिम्मेदारी होती है। हम तो मशीन बन गए थे। लेकिन आज... आज तुमने मुझे बताया कि मैं अभी भी एक औरत हूँ। एक रसीली औरत।"
राज का दिल पसीज गया। उसने अनजाने में ही सही, लेकिन अपनी पत्नी को वह खुशी दे दी थी जिसकी वह हकदार थी। डॉली ने उसे जो आग दी थी, उस आग से उसने सविता के बुझे हुए दीये को जला दिया था।
"तुम्हें अच्छा लगा?" राज ने पूछा।
"अच्छा?" सविता ने उसकी छाती पर चुंबन लिया। "मुझे इसकी आदत पड़ गई है राज। मुझे ऐसा ही प्यार चाहिए। हर शनिवार। हर रविवार। मुझे वो सीधा-सादा प्यार नहीं चाहिए। मुझे यही जंगलीपन चाहिए। क्या तुम दोगे? क्या तुम हर हफ्ते मुझे ऐसे ही तोड़ोगे?"
राज मुस्कुराया। यह एक खतरनाक खेल था। वह अपनी पत्नी को अपनी प्रेमिका की तरह ट्रीट कर रहा था। लेकिन अगर इससे घर में खुशी आ रही थी, तो हर्ज क्या था?
"दूँगा," राज ने कहा। "हर हफ्ते। जब भी मैं राजगढ़ से आऊंगा... मैं तुम्हारे लिए एक 'नया राज' लाऊंगा। जो सिर्फ तुम्हारा होगा।"
सविता खुश हो गई। उसने राज के गले में बाहें डाल दीं। "और वो लाल कपड़ा?" उसने पूछा। "वो ब्लाउज? क्या तुम सिलोगे?"
"हाँ," राज ने कहा। "मैं खुद सिलूँगा। एकदम टाइट। जैसा मुझे पसंद है। अगली बार तुम वही पहनोगी। और मैं उसे फाड़ूँगा।"
शाम हो गई। बच्चे घर आ गए। घर का माहौल फिर से सामान्य हो गया। लेकिन बेडरूम की हवा बदल चुकी थी। सविता अब गुनगुना रही थी। वह रसोई में काम करते हुए भी बीच-बीच में रुककर मुस्कुरा रही थी और अपनी कमर को सहला रही थी जहाँ राज ने उसे पकड़ा था।
लेकिन राज... राज का मन फिर से अशांत होने लगा था।
उसने अपनी पत्नी को खुश तो कर दिया था, लेकिन उसकी अपनी प्यास अभी भी बाकी थी। सविता के शरीर ने उसे राहत तो दी थी, लेकिन डॉली की वह रईसी और विद्या की वह बेबाकी... वह उसे यहाँ नहीं मिल सकती थी। सविता एक आदत थी, डॉली एक नशा।
रात को जब सब सो गए, तो राज बालकनी में गया। उसने राजगढ़ की दिशा में देखा।
उसने अपना फोन निकाला और अपना सीक्रेट सिम कार्ड डाला।
एक मैसेज आया हुआ था। डॉली का।
"सांस नहीं आ रही। जल्दी आ जाओ। सिंदूर ले आना। पिछला दरवाज़ा खुला रहेगा।"
राज ने फोन बंद कर दिया।
उसका शरीर अभी भी सविता की गंध से भरा था, लेकिन उसका दिमाग सोमवार की सुबह का प्लान बना रहा था।
"बस एक दिन और," उसने खुद से कहा। "सोमवार को हवेली का पिछला दरवाज़ा खुलेगा। और तब... तब असली प्यास बुझेगी।"
उसने अपनी जेब में हाथ डाला और सिंदूर की उस छोटी डिब्बी को टटोला जो उसने बाज़ार से खरीदी थी। वह जानता था कि यह डिब्बी उसकी ज़िंदगी में आग लगाने वाली है। और वह उस आग में जलने के लिए तैयार था।
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राज सविता की पीठ पर लेटा था, उसका चेहरा तकिये में गड़ा था। वह बुरी तरह हांफ रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने एक साथ दो औरतों को भोगा है—हकीकत में सविता को, और ख्यालों में डॉली को।
तूफान थम चुका था, लेकिन उसकी तबाही और खूबसूरती अभी भी कमरे में बिखरी हुई थी।
राज धीरे से सविता के ऊपर से हटा और बगल में लेट गया। उसका शरीर अभी भी कांप रहा था। पसीना चादर पर सोख रहा था।
सविता वैसे ही पड़ी रही, पेट के बल। उसकी टांगें फैली हुई थीं। वह हिल भी नहीं पा रही थी। उसका पूरा शरीर झनझना रहा था।
कुछ मिनटों की खामोशी के बाद, सविता ने धीरे से करवट ली। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को उठाया और अपना पसीना पोंछा। फिर उसने राज की तरफ देखा।
उसका चेहरा खिला हुआ था। एक ऐसी चमक थी जो राज ने शादी के शुरुआती सालों के बाद कभी नहीं देखी थी। यह एक संतुष्ट औरत की चमक थी। उसके गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे।
सविता खिसक कर राज के पास आई और अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। उसने अपनी उंगलियां राज के छाती के बालों में फेरना शुरू किया।
"राज..." सविता ने बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में कहा। "आज... आज तुमने मुझे मार ही डाला था। सच में।"
राज ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसके बालों को सहलाया। उसे एक अजीब सा अपराधबोध हो रहा था, लेकिन साथ ही एक जीत का अहसास भी। उसने अपनी पत्नी को खुश किया था, भले ही जरिया कोई और था।
"सच कहूँ," सविता ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और राज की आंखों में देखा, "आज मुझे लगा ही नहीं कि तुम मेरे पुराने राज हो। आज तुम... 'नये' लग रहे थे। बहुत ताकतवर।"
"नया?" राज ने पूछा।
"हाँ," सविता ने अपना हाथ नीचे ले जाकर राज के शिथिल पड़े लिंग पर रख दिया। उसने उसे प्यार से सहलाया। "तुम्हारा यह... यह भी आज नया लग रहा था।
इतना बड़ा, इतना सख्त तो यह सुहागरात पर भी नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी और का है। और तुमने जितनी देर तक किया... उफ्फ... मेरे पैर अभी भी कांप रहे हैं। तुमने मुझे पूरा खोल दिया।"
सविता ने राज को कसकर गले लगा लिया। उसने अपना पैर राज के पैरों में फंसा लिया।
"मेरी प्यास बुझ गई राज," उसने कहा। "सच में। मुझे नहीं पता था कि सुख ऐसा भी होता है। मुझे लगा था कि शादी के बाद बस बच्चे और जिम्मेदारी होती है। हम तो मशीन बन गए थे। लेकिन आज... आज तुमने मुझे बताया कि मैं अभी भी एक औरत हूँ। एक रसीली औरत।"
राज का दिल पसीज गया। उसने अनजाने में ही सही, लेकिन अपनी पत्नी को वह खुशी दे दी थी जिसकी वह हकदार थी। डॉली ने उसे जो आग दी थी, उस आग से उसने सविता के बुझे हुए दीये को जला दिया था।
"तुम्हें अच्छा लगा?" राज ने पूछा।
"अच्छा?" सविता ने उसकी छाती पर चुंबन लिया। "मुझे इसकी आदत पड़ गई है राज। मुझे ऐसा ही प्यार चाहिए। हर शनिवार। हर रविवार। मुझे वो सीधा-सादा प्यार नहीं चाहिए। मुझे यही जंगलीपन चाहिए। क्या तुम दोगे? क्या तुम हर हफ्ते मुझे ऐसे ही तोड़ोगे?"
राज मुस्कुराया। यह एक खतरनाक खेल था। वह अपनी पत्नी को अपनी प्रेमिका की तरह ट्रीट कर रहा था। लेकिन अगर इससे घर में खुशी आ रही थी, तो हर्ज क्या था?
"दूँगा," राज ने कहा। "हर हफ्ते। जब भी मैं राजगढ़ से आऊंगा... मैं तुम्हारे लिए एक 'नया राज' लाऊंगा। जो सिर्फ तुम्हारा होगा।"
सविता खुश हो गई। उसने राज के गले में बाहें डाल दीं। "और वो लाल कपड़ा?" उसने पूछा। "वो ब्लाउज? क्या तुम सिलोगे?"
"हाँ," राज ने कहा। "मैं खुद सिलूँगा। एकदम टाइट। जैसा मुझे पसंद है। अगली बार तुम वही पहनोगी। और मैं उसे फाड़ूँगा।"
शाम हो गई। बच्चे घर आ गए। घर का माहौल फिर से सामान्य हो गया। लेकिन बेडरूम की हवा बदल चुकी थी। सविता अब गुनगुना रही थी। वह रसोई में काम करते हुए भी बीच-बीच में रुककर मुस्कुरा रही थी और अपनी कमर को सहला रही थी जहाँ राज ने उसे पकड़ा था।
लेकिन राज... राज का मन फिर से अशांत होने लगा था।
उसने अपनी पत्नी को खुश तो कर दिया था, लेकिन उसकी अपनी प्यास अभी भी बाकी थी। सविता के शरीर ने उसे राहत तो दी थी, लेकिन डॉली की वह रईसी और विद्या की वह बेबाकी... वह उसे यहाँ नहीं मिल सकती थी। सविता एक आदत थी, डॉली एक नशा।
रात को जब सब सो गए, तो राज बालकनी में गया। उसने राजगढ़ की दिशा में देखा।
उसने अपना फोन निकाला और अपना सीक्रेट सिम कार्ड डाला।
एक मैसेज आया हुआ था। डॉली का।
"सांस नहीं आ रही। जल्दी आ जाओ। सिंदूर ले आना। पिछला दरवाज़ा खुला रहेगा।"
राज ने फोन बंद कर दिया।
उसका शरीर अभी भी सविता की गंध से भरा था, लेकिन उसका दिमाग सोमवार की सुबह का प्लान बना रहा था।
"बस एक दिन और," उसने खुद से कहा। "सोमवार को हवेली का पिछला दरवाज़ा खुलेगा। और तब... तब असली प्यास बुझेगी।"
उसने अपनी जेब में हाथ डाला और सिंदूर की उस छोटी डिब्बी को टटोला जो उसने बाज़ार से खरीदी थी। वह जानता था कि यह डिब्बी उसकी ज़िंदगी में आग लगाने वाली है। और वह उस आग में जलने के लिए तैयार था।
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