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Adultery ' गाँव का टेलर '

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दोनों के शरीर पसीने, तेल और वीर्य से लथपथ थे। दुकान में एक अजीब सी गंध थी—हवस की गंध।

काफी देर तक सन्नाटा रहा। सिर्फ एसी की आवाज़ थी।

रिंकी ने अपना सिर उठाया। उसके बाल बिखरे थे, होंठ सूजे हुए थे, और माथे का सिंदूर फैलकर नाक तक आ गया था।

उसने राज को देखा और एक संतुष्ट मुस्कान दी।

"मान गई मास्टर," उसने राज के गाल को चूमा। "तूने तो मेरी चाल ही बदल दी। अब मैं कल कैसे चलूंगी? लंगड़ाकर चलना पड़ेगा।"

राज हंसा। वह भी हांफ रहा था।

"यही तो इम्तिहान था," राज ने कहा। "तुम पास हो गई। अब तुम हमारी टीम में हो।"

रिंकी उठी। उसके पैरों के बीच से राज का प्रसाद बहकर उसकी मोटी जांघों पर आ रहा था। उसने उसे पोंछा नहीं।

"इसे रहने दूंगी," उसने कहा, अपनी जांघों को सहलाते हुए। "यह मेरी ट्रॉफी है। इसे घर लेकर जाऊंगी।"

उसने अपने कपड़े पहने। ब्लाउज के हुक टूटे हुए थे, तो उसने साड़ी के पल्लू से खुद को कसकर लपेट लिया।

वह जाने के लिए मुड़ी।‘

फिर रुकी और राज को देखा।‘

"शनिवार को..." उसने कहा। "शनिवार को जब मेमसाब मुझे बुलाएंगी... तो मैं तैयार रहूँगी। लेकिन याद रखना..." उसने राज के शिथिल लिंग की तरफ इशारा किया, "...उस दिन मुझे इससे कम नहीं चाहिए। मुझे और भी ज्यादा चाहिए। और उस दिन... उस दिन मैं मेमसाब को भी नहीं छोड़ूँगी।"

राज ने फर्श पर लेटे-लेटे ही हाथ हिलाया।

"तुम्हें इतना मिलेगा कि तुम संभाल नहीं पाओगी।"’’

रिंकी चली गई। उसकी चाल में सचमुच लंगड़ाहट थी। वह मटक नहीं रही थी, वह संभलकर चल रही थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।

राज ने शटर उठाया। बाहर धूप अभी भी तेज़ थी, लेकिन अंदर का मौसम बदल चुका था।

उसने दुकान के फर्श को देखा। वहां उनके मिलन के निशान थे।

उसने मुस्कुराते हुए सोचा—"अब टीम पूरी हो गई है। डॉली, विद्या और रिंकी। तीन रानियां और एक दर्जी। और शनिवार की रात... कयामत की रात होगी।"’

उसने अपनी डायरी उठाई और उसमें रिंकी का नाम भी जोड़ दिया। अब यह कहानी सिर्फ कपड़ों की नहीं, बल्कि नंगे जिस्मों की दास्तान बन चुकी थी।

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शनिवार की रात। राजगढ़ की वह विशाल हवेली बाहर से शांत और अंधेरे में डूबी थी, लेकिन उसकी मोटी दीवारों के पीछे एक अलग ही दुनिया जगमगा रही थी। विक्रम (डॉली का पति) और परिवार के अन्य पुरुष सदस्य एक शादी समारोह में दूसरे शहर गए हुए थे।

हवेली आज मर्दों से खाली थी, लेकिन औरतों की हवस से भरी हुई थी। आज की रात वफादारी का नहीं, बल्कि शरीर की भूख का जश्न मनाने की रात थी।

राज ने पिछली बार की तरह चोर दरवाजे का इस्तेमाल नहीं किया। आज वह चोर नहीं, 'दावत' का मुख्य मेहमान था। वह मुख्य द्वार से नहीं, बल्कि साइड के उस वीआईपी रास्ते से आया जहाँ से सिर्फ खास मेहमान आते थे। उसने काले रंग का पठानी सूट पहना था, और उस पर एक महंगा इत्र लगाया था—वही इत्र जो डॉली ने उसे गिफ्ट किया था।

दरवाजा रिंकी ने खोला।

रिंकी ने आज एक नई, भड़कीली लाल रंग की साड़ी पहनी थी। उसकी आंखों में काजल गहरा था और होठों पर एक शरारती मुस्कान।

"आइए सरकार," रिंकी ने झुककर सलाम किया, लेकिन उसकी आंखों में मज़ाक था। "ऊपर जाओ। दोनों शेरनियां पिंजरे में बेताब हैं। आज तो तुम्हारी लॉटरी है मास्टर। हड्डी-पसली बचाकर रखना।"

उसने जाते-जाते राज के पीछे, उसके नितंबों पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा। "और अगर कुछ बच जाए... तो नीचे आ जाना। मैं भी जाग रही हूँ।"

राज सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गया। उसके जूतों की आवाज़ संगमरमर की सीढ़ियों पर गूंज रही थी, बिल्कुल उसके दिल की धड़कनों की तरह। एक तरफ डॉली का अनुभव, भारी बदन और रईसी; दूसरी तरफ विद्या की कच्ची जवानी, कसावट और बेबाकी। और आज... आज वे दोनों एक ही बिस्तर पर थीं।

उसने बेडरूम का भारी, नक्काशीदार सागौन का दरवाजा धक्का दिया।

दरवाजा खुलते ही एसी की ठंडी हवा और महंगे रूह-गुलाब (Rose) और मोगरे के इत्र की मिली-जुली खुशबू ने उसका स्वागत किया। कमरे में बिजली की रोशनी नहीं थी। चारों तरफ दर्जनों मोटी मोमबत्तियां जल रही थीं, जिनकी लपटें एसी की हवा में थरथरा रही थीं। दीवारों पर परछाइयां नाच रही थीं।

और बीच में... वह किंग-साइज बिस्तर था जो आज रणभूमि बनने वाला था।

बिस्तर पर दो रानियां बैठी थीं।

डॉली और विद्या।

डॉली ने आज सोने के रंग की एक बेहद झीनी, टिश्यू सिल्क की साड़ी पहनी थी। साड़ी इतनी पारदर्शी और महीन थी कि उसके बदन का हर तिल, हर मस्सा, नाभि का गहरा भंवर और जांघों का मांसल उभार साफ दिख रहा था।

उसने ब्लाउज नहीं पहना था। साड़ी का पल्लू उसने अपनी गर्दन के चारों ओर एक ढीले हार की तरह लपेट रखा था, जिससे उसके भारी, 36 इंच के स्तन आधे खुले और आधे ढके हुए थे। वे ऐसे लग रहे थे जैसे सोने की थाल में दो बड़े, रसीले फल रखे हों। उसके बाल एक ढीले, कामुक जूड़े में बंधे थे और मांग में राज का दिया हुआ वह गाढ़ा लाल सिंदूर चमक रहा था।

और उसके ठीक बगल में विद्या थी।

विद्या का अंदाज बिल्कुल अलग था, आधुनिक और तीखा। उसने काले रंग का एक साटन का रोब पहना हुआ था। रोब बहुत छोटा था, मुश्किल से उसकी जांघों के ऊपरी हिस्से तक। वह पालथी मारकर बैठी थी, जिससे उसकी गोरी, चिकनी और कसरत से तराशी हुई जांघें पूरी तरह नंगी चमक रही थीं। रोब के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था।

उसका वी-शेप गला उसकी नाभि तक खुला था, जहाँ से उसके छोटे, सख्त और तने हुए स्तन झांक रहे थे।

राज को देखते ही दोनों मुस्कुराईं। डॉली की मुस्कान में एक अनुभवी मालकिन का अधिकार था, और विद्या की मुस्कान में एक बिगड़ैल लड़की की शरारत।

"आ गए हमारे सुल्तान," डॉली ने अपने दोनों हाथ फैलाए। उसके हाथों में कांच की चूड़ियां खनकीं। "हम कब से इंतज़ार कर रही थीं। हमारे जिस्म की बर्फ पिघल रही है।"

"और मेरा सब्र टूट रहा है," विद्या ने अपनी जीभ से अपने ऊपरी होंठ को चाटा। "तुम बहुत लेट हो शर्मा जी। इसकी सजा मिलेगी।"

राज ने दरवाजा लॉक किया। कुंडी की 'खट' आवाज़ ने कमरे को दुनिया से काट दिया।

उसने अपनी पठानी सूट का कुर्ता वहीं दरवाजे पर ही उतार फेंका। उसका सांवला, चौड़ा सीना, जिस पर बालों की लकीर थी, और बांहों की फड़कती हुई नसें मोमबत्ती की रोशनी में तांबे की तरह चमक रही थीं।

"बर्फ पिघलने दो," राज ने भारी कदमों से बिस्तर की तरफ बढ़ते हुए कहा। "आज मैं इतनी आग लगाऊँगा कि पानी भी जल जाएगा। और सजा... सजा तो मुझे मंजूर है।"

वह बिस्तर के पास पहुँचा।

विद्या तुरंत घुटनों के बल खड़ी हो गई। बिस्तर गद्देदार था, इसलिए उसका संतुलन बना रहा। उसका काला रोब खुल गया और उसका नंगा, गोरा बदन राज के सामने आ गया।

"दिखाओ," विद्या ने राज की पतलून के नाड़े पर हाथ रखा। "मुझे देखना है कि क्या भाभी ने सच कहा था। क्या तुम सच में हम दोनों को एक साथ संभाल पाओगे? या फुस्स हो जाओगे?"

राज ने विद्या के बालों को मुट्ठी में पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया।

"संभालूँगा नहीं विद्या," राज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा। "तुम दोनों को तोड़ दूँगा। आज रात कोई रहम नहीं होगा।"

उसने अपनी पतलून नीचे गिरा दी।

उसका 8 इंच का, काला, मोटा और नसों से तना हुआ लिंग एक झटके के साथ बाहर आया। वह पूरी ताकत से खड़ा था, विद्या के चेहरे के ठीक सामने।

विद्या की आंखें फैल गईं।

"वोह..." विद्या ने उसे अपनी उंगली से छुआ। वह गर्म था और धड़क रहा था। "यह तो... यह तो सच में राक्षस है। भाभी... आपने सही कहा था।"

डॉली, जो पीछे बैठी थी, खिसक कर आगे आई। उसने अपना चेहरा राज के लिंग के दूसरी तरफ कर लिया।

अब राज का पौरुष उन दोनों के चेहरों के बीच में था। एक तरफ डॉली का परिपक्व चेहरा, दूसरी तरफ विद्या का युवा चेहरा।

डॉली ने उसे सूंघा। "मेरी खुशबू..." उसने कहा, अपनी नाक को लिंग की नसों पर रगड़ते हुए। "इस पर अभी भी मेरे मंडे वाली गंध है।"

"आज इस पर हम दोनों की गंध होगी," विद्या ने कहा और अपनी जीभ निकालकर लिंग के टोपे को चाट लिया।

"टेस्टी..." विद्या ने डॉली को देखकर आंख मारी। "नमकीन है।"

यह राज के लिए एक सपना था। दो खूबसूरत औरतें—एक भाभी, एक ननद—उसके लिंग की पूजा कर रही थीं।

डॉली ने पहल की। "यह मेरा है," उसने कहा और राज के लिंग को जड़ से पकड़कर अपने मुंह में भर लिया। उसका मुंह गर्म, बड़ा और अनुभवी था। वह जानती थी कि गले का इस्तेमाल कैसे करना है। वह उसे गहराई तक ले गई।

विद्या ने देखा कि डॉली कैसे कर रही है। उसे जलन हुई।

"हटो भाभी," विद्या ने डॉली को धक्का दिया। "आधा मेरा है। मुझे भी चाहिए।"

डॉली ने मुंह हटाया, एक 'पॉप' की आवाज़ के साथ।

अब विद्या ने उसे मुंह में लिया। उसका तरीका अलग था। उसका मुंह छोटा था, लेकिन उसकी जीभ बहुत तेज़ थी। वह टोपे पर अपनी जीभ को गोल-गोल घुमा रही थी और साथ ही हाथ से उसे हिला रही थी।

"आह्ह्ह..." राज ने दोनों के सिरों को पकड़ लिया। उसकी उंगलियां उनके बालों में धंस गईं।
 
कभी डॉली, कभी विद्या। वे बारी-बारी से उसे चूस रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन राज को ज्यादा मज़ा दे सकती है।

डॉली उसके अंडकोषों को अपने मखमली हाथों से सहला रही थी, और विद्या उसके लिंग के तने को चाट रही थी।

"राज... तुम बहुत सख्त हो..." डॉली ने बीच में कहा, अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिराते हुए। अब उसके भारी स्तन पूरी तरह नंगे थे। "मेरा सब्र टूट रहा है। मुझे यह अंदर चाहिए।"

डॉली नंगी हो गई। उसने अपनी साड़ी और पेटीकोट एक लात मारकर उतार दिए। उसका भारी, गोरा और मांसल बदन बिस्तर पर बिखर गया। जांघें चौड़ी हो गईं।

"मुझे ले लो," डॉली ने अपनी टांगें फैला दीं। उसकी योनि से रस बह रहा था। "विद्या बाद में... पहले मैं... मैं बड़ी हूँ... मेरा हक़ पहले है।"

विद्या ने अपना काला रोब उतार फेंका। उसका कसा हुआ, एथलेटिक शरीर, सपाट पेट और छोटी-छोटी खूबसूरत छातियां सामने आ गईं।

"नहीं," विद्या ने राज की पीठ पर छलांग लगा दी। उसने राज को पीछे से जकड़ लिया। "पहले मैं... मैं मेहमान हूँ। और मैं जवान हूँ।"

राज ने दोनों को देखा। एक तरफ मांसल, भरी-पूरी डॉली जो किसी रसीले आम जैसी थी। दूसरी तरफ छरहरी, तीखी विद्या जो कच्ची कैरी जैसी थी।

"लड़ो मत," राज ने कहा। "मेरे पास दोनों के लिए इंतज़ाम है। और आज रात बहुत लंबी है।"

उसने विद्या को बिस्तर पर लिटाया और डॉली को उसके ऊपर।

वे 69 की पोज़िशन में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के ऊपर में लेट गईं।

राज ने उन दोनों को एक साथ अपनी बांहों में समेटा।

"आज मैं सैंडविच खाऊँगा," उसने कहा। "मलाई और मक्खन का सैंडविच।"

बिस्तर पर जिस्मों का एक पहाड़ बन गया था। राज ने विद्या को नीचे लिटाया था और डॉली को उसके ऊपर।

डॉली का भारी शरीर विद्या को दबा रहा था। विद्या को डॉली के भारी स्तनों के नीचे दबने में और उनके मांसल बदन की रगड़ में मज़ा आ रहा था।

"भाभी... आप बहुत भारी हो..." विद्या हंसी, डॉली के लटकते हुए निप्पल को अपने मुंह में लेते हुए। "दूध है क्या इसमें?"

"चुप कर," डॉली ने विद्या की योनि को अपनी उंगलियों से टटोला। "तू तो बह रही है। पूरी बाढ़ आई है तेरे अंदर।"

राज ने उन दोनों के बीच जगह बनाई। वह घुटनों के बल बैठा था।

"टांगें खोलो," उसने आदेश दिया।

विद्या ने अपनी पतली, सुडौल टांगें राज के कंधों पर रख दीं। डॉली ने अपनी भारी जांघें चौड़ी कर लीं और साइड में हो गई।

राज विद्या के सामने था।

"पहले छोटी रानी," राज ने कहा। "इसका रास्ता तंग है, इसे खोलना पड़ेगा।"

उसने अपने लिंग को विद्या की तंग, गुलाबी और बाल रहित (Clean shaved) योनि पर सेट किया।

"तैयार?"

"फाड़ दो..." विद्या ने डॉली का हाथ कसकर पकड़ लिया। "भाभी... हाथ पकड़ो..."

राज ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।

धप्प!

राज का मोटा लिंग विद्या की तंग गुफा में समा गया।

"आह्ह्ह्ह्ह!" विद्या चिल्लाई। उसका शरीर धनुष की तरह तन गया। उसकी एड़ियां राज की पीठ में गड़ गईं। "भाभी! मर गई! बहुत मोटा है!"

डॉली ने विद्या के होंठों को चूम लिया। उसने अपनी जीभ विद्या के मुंह में डाल दी ताकि उसकी चीख दब जाए।

"सह ले..." डॉली ने विद्या के स्तनों को दबाते हुए कहा। "मज़ा अब आएगा। इसे महसूस कर।"

राज ने पेलना शुरू किया।

थप-थप-थप!

विद्या का शरीर बिस्तर पर उछल रहा था। राज उसे बेरहमी से ठोक रहा था। विद्या की योनि बहुत टाइट थी, जो राज को पागल कर रही थी।

"और जोर से राज!" विद्या डॉली को चूमते हुए बोल रही थी। "मुझे भाभी से ज्यादा मज़ा दो! बताओ कि मेरी जवानी ज्यादा गर्म है!"

राज ने विद्या के छोटे स्तनों को मरोड़ा।

"तेरी ये जवानी..." राज गुर्राया, "आज मैं इसे निचोड़ लूँगा। तेरी गर्मी निकाल दूंगा।"

करीब 10 मिनट तक राज ने विद्या को रोंदा। विद्या की हालत खराब हो गई। वह हांफ रही थी, उसकी आंखों से पानी निकल रहा था, लेकिन चेहरे पर परमानंद था।

राज ने बाहर निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

विद्या निढाल होकर बिस्तर पर पसर गई। "उफ्फ... मेरी कमर..."

"अब मेरी बारी," डॉली ने कहा। वह एक शेरनी की तरह उठी और राज को धक्का देकर पीठ के बल लिटा दिया।

वह राज के ऊपर चढ़ गई।

"तुमने उसे तो बहुत मज़ा दिया," डॉली ने राज के गीले लिंग को (जो विद्या के रस से सना था) पकड़कर अपनी योनि पर रखा। "अब असली औरत को संभालो। अब वजन उठाओ।"

डॉली ने धीरे-धीरे खुद को नीचे किया।

"ओह्ह्ह्ह..." डॉली ने अपनी गर्दन पीछे फेंक दी। "भरा हुआ... पूरा भरा हुआ... विद्या तो बच्ची है, असली गहराई तो यहाँ है।"

वह राज के ऊपर सवारी करने लगी।

उसका भारी शरीर ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके विशाल, 36 इंच के स्तन हवा में उछल रहे थे और राज के चेहरे पर थप्पड़ मार रहे थे। थप-थप!

"पियो इन्हें," डॉली ने अपना भारी स्तन राज के मुंह में ठूंस दिया। "मेरा दूध पियो। मुझे खाली कर दो।"

राज उसके स्तनों को चूस रहा था, काट रहा था, और नीचे से अपनी कमर को ऊपर उछाल रहा था।

विद्या, जो बगल में लेटी थी, यह देख रही थी। उसे रहा नहीं गया।

वह उठी और राज के चेहरे के पास आई।

"मेरा भी..." विद्या ने कहा और अपने छोटे, सख्त स्तनों को राज के दूसरे गाल पर रगड़ने लगी।

राज अब दोनों के स्तनों के बीच घिर गया था। एक तरफ डॉली का भारी, नरम मांस, दूसरी तरफ विद्या का सख्त, युवा मांस। वह जन्नत में था।

वह कभी डॉली को चूसता, कभी विद्या को।

"आह! राज!" डॉली ऊपर पागलों की तरह उछल रही थी। "तुम बहुत गहरे हो! मेरी बच्चेदानी को छू रहे हो! मुझे घोड़ी बना लो!"

राज ने डॉली की कमर को पकड़ लिया और उसे और जोर से अपनी तरफ खींचा।

पच-पच-पच...
 
कमरे में सिर्फ गीली आवाज़ें, मांस के टकराने की आवाज़ें और औरतों की आहें थीं।

अचानक, राज ने डॉली को रोका।

"उतरो," उसने कहा।

डॉली उतरी।

"खड़ी हो जाओ। दोनों।"

राज बिस्तर से उतरा। वह कमरे के बीच में, कालीन पर खड़ा हो गया।

"दोनों डॉगी स्टाइल में आ जाओ। एक-दूसरे के बगल में। मुझे तुलना करनी है।"

डॉली और विद्या, दोनों आज्ञाकारी रानियों की तरह, कालीन पर घुटनों और हाथों के बल हो गईं।

दो अलग-अलग नज़ारे राज के सामने थे।

डॉली का विशाल, भारी, फैला हुआ और मांसल 42 इंच का पिछवाड़ा। जो हिलने पर लहरें मारता था।

और विद्या का छोटा, कसा हुआ, एथलेटिक और गोल फुटबॉल जैसा पिछवाड़ा। जो पत्थर जैसा सख्त था।

राज ने दोनों को देखा। यह एक पुरुष का सबसे बड़ा सपना था।

उसने पहले डॉली के नितंब पर एक थप्पड़ मारा। चटाक! मांस हिल गया।

"यह मलाई है," राज ने कहा।

फिर विद्या के नितंब पर मारा। चटाक! वह सख्त था, कम हिला।

"और यह पत्थर है।"

"किसे खाओगे?" डॉली ने पीछे मुड़कर अपनी नशीली आंखों से पूछा।

"दोनों को," राज ने कहा। "बारी-बारी से।"

वह विद्या के पीछे गया। उसने प्रवेश किया।

धप्प!

विद्या चिल्लाई। राज ने उसे 10-15 तेज़ धक्के मारे।

फिर बाहर निकाला।

फिर वह डॉली के पीछे गया।

धप्प!

डॉली ने मजे से आह भरी। "आह... बड़ा है..."

राज ने उसे 10-15 धक्के मारे।

वह बारी-बारी से, एक मशीन की तरह, कभी विद्या को, कभी डॉली को पेल रहा था। वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।

"यह मेरा है!" वह विद्या को ठोकते हुए कहता।

"और यह भी मेरा है!" वह डॉली को ठोकते हुए कहता।

दोनों औरतें एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थीं। वे पसीने से लथपथ थीं। उनके बाल बिखर गए थे। काजल फैल गया था।

"राज... तुम जानवर हो..." विद्या सिसक रही थी। "रुकना मत... मेरी जान ले लो..."

"हमें मार डालो राज!" डॉली चिल्ला रही थी। "दोनों को एक साथ मार डालो!"

खेल अब खतरनाक और आदिम मोड़ पर था। राज का शरीर पसीने से नहाया हुआ था, लेकिन उसकी ऊर्जा कम नहीं हो रही थी। उसे इन दोनों को तोड़ना था, इनकी रूह तक पहुँचना था।

"बिस्तर पर चलो," राज ने आदेश दिया।

तीनों बिस्तर पर आ गए। बिस्तर की चादरें मुड़ चुकी थीं।

"विद्या," राज ने कहा, "पीठ के बल लेटो।"

विद्या लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला दीं।

"डॉली," राज ने कहा, "तुम विद्या के चेहरे पर बैठो। अपनी योनि उसके मुंह पर रखो।"

डॉली ने वैसा ही किया। उसने अपनी गीली, टपकती हुई योनि विद्या के मुंह पर रख दी। विद्या उसे चाटने लगी।

"और राज?" डॉली ने पीछे मुड़कर पूछा। "तुम कहाँ?"

"मैं तुम्हारे पीछे," राज ने कहा। "तुम्हारे गुदा में। पिछली बार वाला वादा पूरा करना है।"

डॉली की आंखें फैल गईं। "राज... वहां? अभी? विद्या के सामने?"

"हाँ," राज ने साइड टेबल से तेल की शीशी उठाई। "आज हवेली का हर दरवाज़ा खुलेगा। और सबके सामने खुलेगा।"

उसने तेल डॉली के नितंबों के बीच डाला।

विद्या नीचे से डॉली की योनि को चाट रही थी। डॉली को दोहरा मज़ा मिल रहा था—आगे से जीभ, पीछे से लिंग।

राज ने अपना लिंग डॉली के तंग गुदा द्वार पर सेट किया।

"सांस लो डॉली," उसने कहा और दबाव बनाया।

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली चीख पड़ी। उसने विद्या के बालों को नोच लिया। "फट गया! राज! बहुत मोटा है! उफ्फ... जान निकल रही है!"

विद्या नीचे दबी हुई थी, लेकिन वह डॉली का रस पी रही थी और उसकी चीखों का मज़ा ले रही थी।
 
राज ने एक झटका मारा। वह अंदर चला गया।

डॉली का शरीर अकड़ गया। गुदा की जकड़न ने राज को पागल कर दिया।

"ओह गॉड... डॉली..." राज ने पेलना शुरू किया। "तेरी पिछली गुफा तो कमाल है... जन्नत है..."

वह डॉली के गुदा को ठोक रहा था, और डॉली नीचे विद्या के मुंह को रगड़ रही थी।

यह एक मानव मूर्तिकला थी—हवस की मूरत।

स्लप-स्लप... पच-पच... आवाज़ें कमरे में गूंज रही थीं।

"विद्या! चाट मुझे! और जोर से!" डॉली दर्द और मजे में चिल्ला रही थी। "राज मुझे पीछे से फाड़ रहा है! आह! मजा आ गया! मेरी आंतें हिल रही हैं!"

राज ने डॉली की कमर पकड़ ली। वह उसे मशीन की तरह रगड़ रहा था।

कुछ देर बाद, राज ने निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

डॉली गिर पड़ी। वह पूरी तरह टूट चुकी थी।

"अब तुम," राज ने विद्या को खींचा।

विद्या डर गई। वह पीछे खिसकी। "नहीं राज... पीछे नहीं... मैं छोटी हूँ... मैं फट जाऊंगी..."

"शहर की लड़कियां सब कर सकती हैं," राज ने उसे पेट के बल लिटा दिया। "तुम्हें भाभी से कम रहना है क्या?"

यह बात विद्या को लग गई। "नहीं... डालो... जो करना है करो..."

राज ने तेल डाला और विद्या के छोटे, तंग, कुंवारे छेद में प्रवेश कर गया।

विद्या की चीख ने कमरे के कांच हिला दिए।

"माँ! मर गई! निकालो! खून निकल जाएगा! राज... प्लीज..."

"कुछ नहीं होगा," राज ने उसे दबाया। "सांस छोड़ो। मज़ा आएगा।"

राज ने उसे भी नहीं बख्शा। उसने विद्या को भी वही दर्द और मज़ा दिया जो उसने डॉली को दिया था। विद्या रो रही थी, लेकिन वह राज को छोड़ नहीं रही थी।

अब तीनों अपनी सीमा पर थे। राज का शरीर फटने वाला था।

राज ने विद्या को छोड़ दिया।

"अब साथ में," राज ने कहा। "फाइनल।"

उसने दोनों को बिस्तर के किनारे पर लिटा दिया। टांगें फैलाकर।

राज बिस्तर के नीचे, फर्श पर खड़ा हो गया।

वह पहले विद्या के पास गया। दो धक्के मारे।

फिर डॉली के पास। दो धक्के मारे।

वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।

"मैं आ रहा हूँ!" राज चिल्लाया। उसकी नसों में आग लग गई थी। "मैं फट रहा हूँ! संभालो मुझे!"

"कहाँ?" दोनों ने एक साथ पूछा, अपनी बाहें फैलाकर। "किसके अंदर?"

राज ने एक पल सोचा।

उसने डॉली को चुना। वह 'बड़ी रानी' थी, उसकी पहली खोज थी।

"डॉली..."

राज ने डॉली की टांगों को अपने कंधों पर रखा। उसने खुद को उसके अंदर (योनि में) गहराई तक धंसा दिया। विद्या ने अपना हाथ राज के लिंग पर रखा और उसे अंदर धकेलने में मदद की।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!"

राज ने एक लंबी, विजयी दहाड़ मारी।

उसने अपना सारा, ढेर सारा, तीन लोगों की हवस से जमा हुआ वीर्य डॉली के अंदर उड़ेल दिया।

एक... दो... तीन... चार... पांच...

डॉली ने उस बाढ़ को महसूस किया। उसकी कोख भर गई। उसे लगा जैसे ज्वालामुखी उसके अंदर फट गया हो।

"गर्म है... जला दिया... राज..." डॉली सिसकी।

राज ने बाहर निकाला।

उसने अपने लिंग को दबाया और बचे हुए कतरे विद्या के पेट, चेहरे और स्तनों पर छिड़क दिए।

"यह तुम्हारे लिए," राज ने कहा। "प्रसाद।"

विद्या ने अपनी उंगली से वीर्य उठाया और चाट लिया। "स्वादिष्ट..."

तीनों एक ढेर की तरह बिस्तर पर गिर पड़े।

कमरा पसीने, वीर्य, तेल और इत्र की गंध से भरा हुआ था। एसी की ठंडक भी उनकी गर्मी को कम नहीं कर पा रही थी।

डॉली राज के एक तरफ थी, विद्या दूसरी तरफ। दोनों ने राज को अपनी बांहों और टांगों में जकड़ रखा था।

राज ने दोनों को अपनी बांहों में भर लिया।

"आज..." राज ने हांफते हुए कहा, "आज मेरा जीवन सफल हो गया।"

डॉली ने राज के पसीने से भीगे सीने को चूमा। "तुम हमारे सुल्तान हो राज। आज तुमने हमें जीत लिया।"

विद्या ने राज की गर्दन पर काट लिया। "और हम तुम्हारी रखैलें। हमेशा के लिए।"

सुबह के 4 बज रहे थे।

राज ने करवट ली। उसने देखा कि उसकी दोनों रानियां सो रही थीं। उनके नंगे बदन चादर में लिपटे थे। डॉली का हाथ विद्या के स्तन पर था, और विद्या का पैर राज के पैर पर।

उसने अपनी काली डायरी उठाई जो साइड टेबल पर थी।

उसने कलम निकाली और कांपते हाथों से लिखा:

"आज की रात... रेशम और खादी का मिलन। एक बिस्तर, तीन जिस्म, और अनगिनत आहें। आज मैंने दो रानियों को एक साथ नापा है। और यह नाप... जिंदगी भर याद रहेगा।"

उसने डायरी बंद की और मुस्कुराया।

उसकी प्यास बुझ गई थी, लेकिन उसे पता था कि यह प्यास कल फिर जागेगी। और अब उसके पास इसे बुझाने के लिए पूरा एक 'हरम' था। राजगढ़ का दर्जी अब राजगढ़ का राजा बन चुका था।

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डॉक्टर का इलाज

शनिवार की रात। राजगढ़ के मुख्य बाज़ार में एक गहरा, भारी सन्नाटा पसर चुका था। दिन भर की धूल, गर्मी और शोरगुल के बाद, अब दुकानें अपनी पलकें मूंद चुकी थीं। शटर गिरने की धड़ाम-धड़ाम आवाज़ें अब थम गई थीं। आवारा कुत्ते सड़कों पर राज कर रहे थे और स्ट्रीट लाइट्स की पीली, बीमार सी रोशनी वीरान सड़कों पर लंबी, डरावनी परछाइयां बना रही थी।

राज आज शहर उसके घर नहीं गया था, वह अपनी दुकान 'अप्सरा लेडीज बुटीक' का शटर गिराकर ताला लगा रहा था। उसके शरीर में एक मीठा दर्द था। डॉली और विद्या के साथ बिताई रातों, और रिंकी के साथ हुए जंगलीपन ने उसे शारीरिक रूप से निचोड़ दिया था, लेकिन मानसिक रूप से वह एक विजेता महसूस कर रहा था।

उसका प्लान था कि वह दुकान के ऊपर बने अपने छोटे से कमरे में जाएगा, ठंडी बीयर पिएगा और अपनी डायरी में आज का हिसाब लिखकर सो जाएगा।

उसने शटर का ताला चेक किया, उसे खींचकर देखा और पलटने ही वाला था।

तभी... अंधेरे में एक परछाई उसकी तरफ बढ़ी।

सन्नाटे में ऊँची हील्स की खट-खट-खट की आवाज़ गूंजी। यह आवाज़ किसी साधारण गाँव की औरत की चप्पलों की नहीं थी, यह शहर की सैंडल की आवाज़ थी।

"शर्मा जी? दुकान बंद कर दी? इतनी जल्दी?"

एक भारी, रौबदार लेकिन बेहद नशीली और गहरी आवाज़ ने राज को चौंका दिया। उसने मुड़कर देखा।

सामने डॉ. शाजिया खड़ी थीं।

शाजिया। राजगढ़ के सरकारी अस्पताल की सीनियर लेडी डॉक्टर और कस्बे की सबसे प्रतिष्ठित महिला। उम्र करीब 36-37 साल। वह गाँव की आम औरतों जैसी घूंघट वाली या शरमाने वाली नहीं थी।

वह शहर से पढ़कर आई थी, तलाकशुदा थी और अकेले सरकारी क्वार्टर में रहती थी। उसका व्यक्तित्व ऐसा था कि अच्छे-अच्छे मर्द उसके सामने नज़रें झुका लेते थे। लेकिन आज... आज वह एक अलग ही रूप में थी। आज वह डॉक्टर नहीं, एक औरत थी।

उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन नहीं पहना था। उसने एक बेहद टाइट, मरून रंग का स्लीवलेस टॉप और काली फॉर्मल पैंट पहनी थी। यह कपड़े गाँव के हिसाब से बहुत बोल्ड और आधुनिक थे, लेकिन रात के अंधेरे में उसे देखने वाला कोई नहीं था—सिवाय राज के।

राज की नज़रें शाजिया पर जम गईं। और जमतीं भी क्यों न?

शाजिया का शरीर... वह किसी भरी-पूरी, उफनती हुई नदी जैसा था जो किनारों को तोड़ने के लिए बेताब हो। वह डॉली से भी ज्यादा भारी, मांसल और 'ठोस' थी।

उसके स्तन... वे विशाल थे। कम से कम 40 या 42 इंच के। वे इतने भारी, बड़े और भरे हुए थे कि उसका टाइट मरून टॉप उन्हें संभाल नहीं पा रहा था। वे गुरुत्वाकर्षण की वजह से लटके हुए नहीं, बल्कि एक भारी दबाव के साथ आगे की तरफ निकले हुए थे, जैसे दो बड़े तोप के गोले हों। टॉप का कपड़ा उनके ऊपर तना हुआ था।

और उसका पिछवाड़ा... राज की नज़रें नीचे फिसलीं। काली पैंट में उसके नितंब किसी पहाड़ की तरह उभरे हुए थे। वे इतने चौड़े और मांसल थे कि पैंट का कपड़ा वहां तनकर फटने को तैयार था। उसकी जांघें किसी खंभे जैसी मज़बूत थीं।

"डॉक्टर साहिबा?" राज ने चाबी मुट्ठी में भींच ली। "आप इस वक़्त? सब ठीक तो है? कोई एमरजेंसी?"

शाजिया ने अपने भारी स्तनों के नीचे अपने दोनों हाथ बांध लिए। इस हरकत से उसके स्तनों का उभार और भी ज्यादा ऊपर उठ गया और वे एक-दूसरे से सट गए, जिससे बीच में एक गहरी खाई बन गई। वह राज के करीब आई। इतनी करीब कि राज को उसके महंगे क्लिनिकल इत्र, सैनिटाइज़र और एक दबी हुई, गरम औरत की गंध आने लगी।

"ठीक कुछ नहीं है राज," शाजिया ने कहा। उसकी आवाज़ में एक शिकायत थी। "तुम्हारी दुकान से एक टॉप लिया था। यह वाला..." उसने अपने मरून टॉप की छाती की तरफ इशारा किया। "फिटिंग बहुत बेकार है। मेरा दम घुट रहा है। साँस नहीं ली जा रही।"’

राज ने देखा। टॉप सचमुच बहुत टाइट था। उसके स्तनों के मांस को कपड़ा बुरी तरह काट रहा था, खासकर बगलों के पास मांस बाहर छलक रहा था।

"यह तो रेडीमेड था मैम," राज ने अपनी नज़रें उसके क्लीवेज से हटाने की कोशिश करते हुए कहा। "इसमें सिलाई की गुंजाइश कम है। और आपका... आपका नाप थोड़ा..."

"बड़ा है?" शाजिया ने उसकी बात पूरी की। उसने राज की आँखों में सीधे देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो मरीज को नहीं, बल्कि एक 'शिकार' को देखती है। "हाँ, मेरा साइज़ बड़ा है। बहुत बड़ा। और मुझे अभी तक कोई ऐसा दर्जी नहीं मिला जो मेरे 'साइज़' को संभाल सके। सब छोटे पड़ जाते हैं।"

बात करते-करते शाजिया की नज़रें नीचे फिसलीं। राज ने एक टाइट नीली जींस और टी-शर्ट पहनी थी।

और वहां... राज की जींस के बीचो-बीच, एक विशाल उभार साफ दिखाई दे रहा था। डॉली, विद्या और रिंकी की यादों, और अब शाजिया के इस भारी शरीर को देखकर उसका 'हथियार' अपनी म्यान में तड़प रहा था। वह उभार इतना बड़ा, लंबा और स्पष्ट था कि उसे अनदेखा करना नामुमकिन था। जींस का कपड़ा वहां तंबू की तरह तना हुआ था।

शाजिया की नज़रें उस उभार पर चिपक गईं। उसकी पुतलियां फैल गईं। एक डॉक्टर होने के नाते उसे मानव शरीर रचना का ज्ञान था, लेकिन जींस के ऊपर से दिखने वाला वह आकार किसी सामान्य भारतीय मर्द का नहीं लग रहा था। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ।

"ओह..." शाजिया के मुँह से अनजाने में, एक लंबी साँस के साथ निकल गया। उसने अपनी जीभ से अपने सूखे होंठों को गीला किया। "लगता है तुम्हारे पास... 'औजार' बहुत बड़े हैं। सिलाई के लिए। काफी... हैवी मशीनरी है।"

राज ने उसकी नज़रों का पीछा किया और समझ गया कि डॉक्टर साहिबा कहाँ देख रही हैं। उसने शर्माने के बजाय अपनी कमर को थोड़ा आगे कर दिया।

"औजार तो बड़े हैं डॉक्टर साहिबा," राज ने भारी आवाज़ में कहा, "लेकिन इस्तेमाल तभी करता हूँ जब मरीज को सचमुच ज़रूरत हो। और जब मैं नाप लेता हूँ, तो इंच-इंच का हिसाब रखता हूँ।"

शाजिया ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके बीच सिर्फ इंच भर की दूरी थी।

"मरीज बहुत सीरियस हालत में है राज," उसने फुसफुसाया। उसकी गर्म साँसें राज के चेहरे पर लग रही थीं। "साँस नहीं आ रही। घुटन हो रही है। और मुझे इलाज... अभी चाहिए। इसी वक्त।"

सड़क सुनसान थी। राज ने एक पल सोचा। फिर उसने ताला खोला और शटर को आधा ऊपर उठाया।

"अंदर आ जाइए," राज ने कहा। "देखते हैं क्या ढीला करना है और क्या कसना है।"

शाजिया शटर के नीचे से झुककर अंदर गई। झुकते वक़्त उसका विशाल पिछवाड़ा राज की आँखों के सामने तन गया। पैंट का कपड़ा उसकी दरार में फंस गया था। वह नज़ारा इतना कामुक था कि राज का लिंग जींस के अंदर एक झटके के साथ और सख्त हो गया।‘

राज ने अंदर जाकर शटर गिरा दिया।

धड़ाम!

बाहर की दुनिया, नैतिकता, अस्पताल और समाज... सब शटर के उस पार रह गए।

अंदर सिर्फ एक भूखा दर्जी और एक प्यासी, भरी-पूरी डॉक्टर थी।

दुकान के अंदर एसी बंद था, लेकिन राज ने उसे तुरंत चालू नहीं किया। माहौल में गर्मी थी, और वह चाहता था कि यह गर्मी पसीने में बदल जाए। उसने सिर्फ़ एक मद्धम पीली लाइट जलाई, जिससे दुकान में एक सुनहरी, रहस्यमयी चमक आ गई।
 
शाजिया ट्रायल रूम के पास खड़ी थी। पीली रोशनी में उसका मरून टॉप और गोरी, भरी हुई बांहें चमक रही थीं। वह हाँफ रही थी—शायद टॉप के कसाव से, या शायद उस उत्तेजना से जो राज के 'उभार' को देखकर जागी थी।

राज उसके पास गया।

"दिखाइए," राज ने कहा। "कहाँ दिक्कत है?"’

"यहाँ..." शाजिया ने अपने दोनों हाथों से अपने भारी स्तनों को नीचे से पकड़ा और ऊपर उठाया। यह हरकत इतनी कामुक थी कि राज का गला सूख गया। "यह हिस्सा... यहाँ कपड़ा बहुत चुभ रहा है। मेरे साइज़ के कपड़े मिलते ही नहीं। सब छोटे पड़ जाते हैं।"

राज ने अपना हाथ बढ़ाया। उसने पेशेवर तरीके से छूने का नाटक किया, लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने शाजिया के स्तनों के साइड में, जहाँ सिलाई थी, वहां हाथ रखा।

स्पर्श होते ही शाजिया के मुँह से एक 'सी...' की आवाज़ निकली।

राज का हाथ उसके स्तन के मांसल हिस्से को छू रहा था। वह मांस बहुत गर्म, नरम और लचीला था। डॉक्टर होते हुए भी उसका शरीर मक्खन जैसा था।

"बहुत टाइट है," राज ने कहा। "साँस लीजिए।"

शाजिया ने गहरी साँस ली। उसका सीना और फूल गया। टॉप की सिलाई चरचराने लगी।

राज अब उसके बिल्कुल करीब था। उसका लिंग उसकी जींस में तंबू बनाकर खड़ा था और वह शाजिया के पेट को लगभग छू रहा था।

शाजिया ने नीचे देखा। वह 8 इंच का राक्षस अब और भी गुस्से में लग रहा था। वह हिल रहा था।

"राज..." शाजिया ने अपना डॉक्टर वाला सख्त लहज़ा छोड़ दिया। उसकी आवाज़ में एक औरत की तड़प आ गई। "सच बताना... यह असली है?"

उसने राज के क्रॉच की तरफ इशारा किया। "या तुमने अंदर कुछ रखा है?"

राज ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने शाजिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने लिंग पर रख दिया।

शाजिया की हथेली उस पत्थर जैसे सख्त उभार पर पड़ी।

"हे भगवान..." शाजिया की आँखें फट गईं। उसने उसे मुट्ठी में भरने की कोशिश की, लेकिन जींस के कपड़े के बावजूद वह उसकी मुट्ठी से बाहर था। उसकी मोटाई ने उसकी हथेली को भर दिया।

"यह तो... यह तो लोहे जैसा है। और इतना लंबा?" उसने दबाकर देखा। "मैंने अपनी मेडिकल बुक्स में भी ऐसा साइज़ रेयर ही देखा है। यह तो... यह तो अबनॉर्मल है।"

"किताबों में सब सच नहीं होता डॉक्टर," राज ने उसके कान के पास झुककर कहा। "हकीकत ज्यादा भयानक होती है। और यह सिर्फ देखने के लिए नहीं है।"

शाजिया ने राज के लिंग को जींस के ऊपर से ही रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी साँसें बेकाबू हो रही थीं। उसका हाथ ऊपर-नीचे चल रहा था।

"मैं तलाकशुदा हूँ राज," उसने अचानक कबूल किया, उसकी आवाज़ भर्रा गई। "पाँच साल हो गए। कोई मर्द मेरी ज़िंदगी में नहीं आया। मैं बस मरीजों को देखती हूँ, घर आती हूँ और सो जाती हूँ। कॉलेज के दिनों में... मैंने ब्लू फिल्म्स में ऐसे साइज़ देखे थे। काले, मोटे, लंबे। मेरी फंतासी थी कि कभी कोई ऐसा मर्द मिले जो मुझे पूरा भर दे। जो मेरी आंतों तक पहुँच जाए। लेकिन मेरे पति..." उसने एक कड़वी हँसी हंसी, "...वो तो बच्चे थे। कुछ महसूस ही नहीं होता था।"

उसने राज की आँखों में देखा। उसकी आँखों में आंसू और हवस दोनों थे।

"क्या तुम मुझे भर सकते हो? क्या तुम मेरा वो कॉलेज वाला सपना पूरा कर सकते हो? क्या यह..." उसने लिंग को दबाया, "...मेरी प्यास बुझा पाएगा?"

राज ने उसे ट्रायल रूम के अंदर धकेल दिया।

"सपना नहीं," राज ने कहा। "आज हकीकत दिखाऊँगा। और ऐसी हकीकत जो तुम्हें हमेशा याद रहेगी।"

उसने शाजिया को आईने के सामने खड़ा कर दिया।

"टॉप उतारो," राज ने आदेश दिया। "मुझे बाधा नहीं चाहिए।"

शाजिया ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपने हाथ ऊपर किए और उस तंग टॉप को खींचकर उतार दिया।

अंदर उसने एक काले रंग की, बहुत बड़ी और मज़बूत ब्रा पहनी थी। उसके स्तन ब्रा के कप्स से बाहर छलक रहे थे। वे इतने बड़े थे कि राज को लगा वह उनमें डूब जाएगा।

राज ने ब्रा के हुक खोले।

खट!

ब्रा हट गई।

शाजिया के विशाल, भारी और गोरे स्तन आज़ाद होकर नीचे झूल गए। वे बिल्कुल वैसे ही थे जैसे उसने सोचा था—भारी, रसीले और पके हुए। उनके निप्पल बहुत बड़े और चॉकलेटी रंग के थे, जो उत्तेजना से सख्त हो गए थे।

"माई गॉड..." राज घुटनों के बल बैठ गया। वह उस नज़ारे को पी रहा था। "यह तो खजाना है। डॉक्टर... तुम तो पूरी की पूरी कामसूत्र हो।"

उसने अपने दोनों हाथों से उन स्तनों को पकड़ा। वे इतने भारी थे कि राज को उन्हें उठाने के लिए ताकत लगानी पड़ी। उसने अपना चेहरा उनके बीच गड़ा दिया।

शाजिया ने राज का सिर पकड़ लिया और उसे अपनी छाती में भींच दिया।

"खा जाओ इन्हें..." शाजिया सिसकी। "काट लो। नोच लो। ये बहुत दिनों से तरस रहे हैं। किसी ने इन्हें छुआ तक नहीं है।"

राज ने पागलों की तरह उसे चूसना शुरू किया। वह उसके पसीने को चाट रहा था, उसके मांस को दांतों से हल्का-हल्का काट रहा था।

शाजिया मज़े से चिल्ला रही थी। दुकान बंद थी, इसलिए उसे अपनी आवाज़ दबाने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

"आह! राज! और जोर से! जानवर बन जाओ! भूल जाओ कि मैं डॉक्टर हूँ!"

राज ने उसकी पैंट का बटन खोला और उसे नीचे खींच दिया। पैंटी भी साथ में उतर गई।
 
Adultery उड़ान सीमा पार की

फ्रेंड्स इस थ्रेड मे छोटी छोटी सेक्सी कहानियाँ होंगी जो आपको बेहद पसंद आएँगी

1- उड़ान सीमा पार की

2- वर्जित सुख '

3- गाँव का टेलर Running

4-दबी हुई हसरतें coming soon'

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उड़ान सीमा पार की

मरीन लाइन से सटा हुआ तारापुर एक्वेरियम बहुतों के आकर्षण का केंद्र है। अनेक प्रकार और रंग-बिरंगी मछलियों का पानी के जार में तैरना बहुत ही मनमोहक नज़र आता है।

पूरा एक्वेरियम घूमते-घूमते डैनी थक भी चुका था और उसे अब कुछ आराम की इच्छा भी हो रही थी। वह सीधा रोड क्रॉस करके समंदर की ओर आ गया, वहाँ थोड़ी-थोड़ी दूर पर आगे-पीछे करके बेंचें रखी हुई थीं, जहाँ कुछ लोग रोड साइड की ओर बैठकर आती-जाती कारों का नज़ारा लेना पसंद करते थे तो कुछ लोग उसी से सटी दूसरी तरफ़ की बेंच पर बैठकर सामने अरब सागर की लहराती लहरों का आनंद ले रहे थे।

चर्च गेट के किनारे से लेकर बाबुलनाथ तक का पूरा समुद्री किनारा लवर्स पॉइंट के नाम से भी जाना जाता है। बाबुलनाथ से ही रास्ता ऊपर की ओर हैंगिंग गार्डन और बूट हाउस तक भी पहुँचता है, शाम होते-होते तमाम नए जोड़े प्रेमी प्रेमिकाएँ यहाँ मन बहलाने आ जाते हैं और घंटों बैठे-बैठे अपने दिल के जज़्बात आपस में बाँटते रहते हैं, कुछ बच्चे खेलते, भागते-दौड़ते नज़र आते हैं तो कुछ बच्चे रेत की मूर्तियाँ, मंदिर, गुफा आदि बनाने में तोड़ने में मशगूल नज़र आते हैं।

डैनी, जिसका असली नाम दिनेश था लेकिन ख़ुद को डैनी कहलाए जाना ही उसे पसंद था और सभी उसे पहचानते भी डैनी के नाम से ही थे। वह सीधा एक बेंच की ओर बढ़ गया, थोड़ी दूर से ही सागर की ओर की बेंच पर बैठा उसे अल्ताफ़ दिखाई दे गया उसे वह पर्सनली मिला तो नहीं था लेकिन जानता पहचानता था। उसे मालूम था कि वह पक्का इश्क़बाज़ है लड़कियों का रसिया है वह, अभी भी कहीं खोया हुआ था शायद कोई लड़की उसकी गोद में लेटी थी और वह उसके चेहरे की और झुका हुआ था।

डैनी समझ गया कि आज भी कोई लड़की उसकी जाल में है। बिना आहट किए वह भी सड़क की ओर मुँह करके थोड़ा झुककर इस क़दर बैठ गया कि अल्ताफ़ उसको पूरा ना देख सके।

बेंच के पीछे से परफ्यूम की महक और साँसों के गर्माहट भी डैनी तक पहुँच रही थी, वह भी उन्हीं में खो जाना चाहता था। नसों में ख़ून तेज़ी से दौड़ने लगा, बैठा हुआ एक्वेरियम की तरफ़ मुँह करके था लेकिन अब वह अल्ताफ़ और उसे लड़की के बीच में ही ख़ुद को महसूस करने लगा था।

उनकी कुछ फुफुसाहट भी बीच-बीच में सुनाई दे जा रही थी लेकिन स्पष्ट नहीं थी, एक बार तो जैसे आकाश उर्फ़ अल्ताफ़ ने जरा ज़ोर से कह दिया ‘ओके, बेबी, संडे को, अक्शा बीच, गोल्डन नेस्ट कॉटेज, दोपहर तक।’

और... शायद लड़की ने सिर हिला दिया होगा, लेकिन वह जान गया था कि उनका प्रोग्राम संडे को गोल्डन नेस्ट कॉटेज में था।

धीरे-धीरे वह धीरे से उठा और ख़ुद के मुँह को छुपाए आगे बढ़ गया, कोई उसे पहचान नहीं पाया। थोड़ा आगे जाकर उसने पैंट की जेब से फ़ोन निकाला और किसी का नंबर लगाकर धीरे-धीरे उसे कुछ समझने लगा।

डैनी के पिता कमल किशोर, जिसे लोग केके नाम से ही जानते-पहचानते थे, का बहुत सारा काम फैला हुआ था। मामूली से परिवार से ताल्लुक़ रखते हुए आज उनकी बराबरी का उनकी बिरादरी में कोई नहीं था। मुंबई से नासिक तक के बीच में तीन पेट्रोल पंप, कई बड़ी होटलों में भागीदारी और शेयर मार्केट के किंग कहे जाने वालों में से एक थे। लाखों से फैला कारोबार करोड़ों में फैल चुका था। दादर के पास ही वर्ली-सी लिंक के पास और रुस्तम अपार्टमेंट की सत्रहवीं मंज़िल पर उनका थ्री बीएचके फ्लैट था। एकदम-सी व्यू की तरफ़, इसे इन्होंने अपनी पसंद से अधिक पैसा देकर ख़रीदा था। उनकी दूसरी और कमसिन पत्नी, ट्रिल्बो, जिसे वे प्यार से तितली ही कहा करते थे, की पसंद पर।

केके, पहली पत्नी जिसे एक लड़का भी था चार साल का तभी गुज़र चुकी थी। केके को अपना बिजनेस सँभालना और लड़के को भी देखना बहुत मुश्किल हो रहा था। ऐसे में एक छोटी-सी डोमेस्टिक पार्टी में उनकी मुलाक़ात ट्रिल्बो से हो गई। ट्रिल्बो खुले ख़यालात की महिला थी, बहुत जल्द ही जाम से जाम टकराए और ट्रिल्बो केके के गोद में मचलने लगी।

केके की चाहत भी जवान थी और ज़रूरत भी बहुत थी, इसीलिए अपना ध्यान भी ट्रिल्बो की ओर घुमा दिए। वह विधवा थी, दो साल की बच्ची की माँ, लेकिन उसके नयन नक्श और शारीरिक गठन को देखते हुए उसके बाँकपन में रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं आया था। वह बच्ची को आया के पास छोड़कर अपने ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए ही किटी पार्टी और दोस्तों के संगत में कुछ देर के लिए आ जाया करती थी, विधवा थी तो क्या हुआ हसरतें तो अभी जवानी के चरम पर थी।

केके से दो-चार मुलाक़ात के बाद ही वह बच्चे को लेकर केके घर आ गई और दोनों की रातें रंगीन होने लगीं।

हालाँकि सुशी का शालिनी बुलाया जाना ट्रिल्बो को पसंद नहीं था, फिर भी केके की पसंद पर ख़ुद को तितली कहा जाना जब मान लिया था, तो उसी तरह सुशी को भी शालिनी मान लिया था। शालिनी को सभी शालू बुलाते थे।
 
शालू अच्छे क़द-काठी, छरहरे बदन की और तीखे नैन-नक्श की युवती थी। तेइस चौबीस साल की शालिनी, जिस किसी की भी नज़रों के सामने से गुज़रती, वो वहीं एक पल ठिठककर उसको देखता ही रह जाता था। ग़ज़ब की ख़ूबसूरती लिए उसका पूरा बदन मानो कुदरत ने विशेष साँचे में ढलकर बनाया था। मद माता यौवन, चाल में मादकता, थोड़े हल्के घुँघराले बाल कुछ भूरापन लिए हुए, होंठ रसीले, मानो अभी छलक उठेंगे, आँखें शराब के जाम की तरह छलकती हुई थीं। अगर किसी को देखकर हल्के से मुस्कुरा दे तो हृदय के धमनियों की गतिविधि तेज़ हो जाए। लोग तो सोचते थे कि कोई मरा हुआ व्यक्ति भी देख ले तो उसके शरीर में हलचल की तरंगे दौड़ जाएँ। ऐसी थी शालिनी उर्फ़ शालू की बेमिसाल सुंदरता, आवाज़ में भी वह मिठास की मानो कोयल की कुहुक उठी हो। गदराये बदन की शालू कइयों के जीने की उम्मीद थी, कईयों के मर जाने का मयखाना भी।

अचानक से ही यह बदलाव उसके बचपन से ही उसमें आने लगे थे, घर का माहौल भी मदभरा ही था।

केके पैसे वाले तो थे ही और ट्रिल्बो भी अपने बदन की कामुकता से भरी मालामाल ही थी। उस के नशीली आँखों में भी ग़ज़ब की शोखी थी, वह जब भी केके को पलकें उठा कर देखती और हल्के से मुस्कुराकर इशारा भर कर देती तो केके पिघलकर पानी-पानी हो जाते और फिर समय कोई भी हो कुछ देर के लिए कमरे के भीतर से हल्की-हल्की सिसकारी की आवाज़ आने लगती।

घर में कोई ज़्यादा लोग थे नहीं, केवल डैनी, शालू और मम्मी डैडी, चार लोग ही। डैनी बाहर गया होता तो शालू को अकेला किसी काम में उलझाकर दिन में भी केके और तितली जम जाते दोनों।

शालू भी लगभग तेरह चौदह साल की हो चुकी थी, थोड़ी-बहुत तो दुनियादारी से भी वाक़िफ़ हो ही चुकी थी। अधिकतर टीवी के चैनलों ने ही उसे बहुत कुछ बता दिया था और अब तो वह धीरे-धीरे अपनी मम्मी-डैडी के प्रेम प्रसंग से भी और समझदार होती जा रही थी। सामने बेटी है या बेटा इससे उन्हे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था, बस मामूली से झिझक का ही परदा था, वरना तो केके पैंसठ के आस-पास और उनकी तितली भी पचास की सीमा रेखा के बीच थी, लेकिन उन दोनों के हाव-भाव पैंतीस-चालीस की उम्र वालों को भी मात दे रहे थे। घर का वातावरण पारिवारिक कम, कामुक ज़्यादा नज़र आता था और इसका असर सीधा शालू और डैनी पर भी पढ़ रहा था।

समय को पंख लगाकर उड़ते देर नहीं लगती। शालू ने मम्मी डैडी के रूम में एक छोटा-सा खुफिया छेंद ढूँढ लिया था, जिस पर किसी और की नज़र नहीं पड़ी थी, जैसे ही केके और उनकी प्यारी तितली कमरे के भीतर जाते, वह झट से छुपकर उस छेंद पर नज़र गड़ा देती। देखकर तब उसे बड़ा आनंद आता, अब तक वह कई काम कलाओं को मन-ही-मन सीख चुकी थी।

पंद्रह वर्ष की होते-होते उसने अपना एक बॉयफ्रेंड भी बना लिया था जो उम्र में इक्कीस साल का था, दूसरा उसका साथी बना जब अट्ठारह साल की हुई और बाइस की होते-होते तो वह कईयों के साथ बिस्तर पर सलवटें डाल चुकी थी। अब यह सब उसके लिए आसान हो चुका था और इसमें उसकी ख़ूबसूरती और गदराए ये बदन की मादकता और भी जवानी में चार चाँद लगा रहे थे।

आज केके और तितली कहीं बाहर गए हुए थे देर रात तक आने के संभावना थी। अक्सर जब वे कहकर जाते कि देर से आना होगा तो रात के दो तीन का बज जाना आम बात थी। उनके जाने से घर में केवल डैनी और शालू ही बचे थे। डैनी तो कहीं जाने के मूड में नहीं था लेकिन शालू अपने मेकअप में तैयार हो रही थी, किसी का अपॉइंटमेंट होगा, डैनी इस बात को समझ रहा था लेकिन अभी ख़ामोश था और सोफ़े पर बैठा बेवजह की टीवी ऑन करके समय बिता रहा था। बीच-बीच में उसके होठों पर मंद मंद मुस्कान भी तैर जाती थी, उसे शायद इंतज़ार था शालू के तैयार होकर हाॅल में आने का।

धीरे से कमरे का दरवाज़ा खुला, शालू के हाल में क़दम रखते ही परफ्यूम का हल्का-सा झोंका फैल गया। मुस्कुराती हुई डैनी के पास आई, ग़ज़ब की लग रही थी, आज हाफ़ स्कर्ट और टॉप में उसके मदभरे यौवन से होठों की मधुर मुस्कान और एक हाथ में छोटा-सा लटकता हुआ पर्श, ऊँचे हिल की सैंडल, बिजलियाँ गिरा रहे थे। बड़े गौर से उसे नीचे से ऊपर तक डैनी ने देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोला– “कम ऑन शालू, बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो आज तो तुम!”

“कब नहीं लगती!” उसने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया।

“आओ बैठो, कहाँ गिरेगी यह ख़ूबसूरती!” कहते हुए डैनी ने शालू की कलाई पकड़कर अपने बगल ही सोफ़े की ओर खींच लिया।

“क्या बात है आज भाई भी किसी मूड में है शायद।”

“अब ऐसी अदा सामने हो तो मूड बन ही जाता है, सच, बहुत दिनों से उतर चुकी हो दिल में शालू, लेकिन कभी कह नहीं पाया। आज शाम भी है मौक़ा भी है, क्यों नहीं यहीं ठहर जाओ, मेरे पास!”

“व्हॉट? क्या बोल रहा है? तेरी नियत ठीक नहीं लग रही, किससे बात कर रहा है! कहाँ है तू?”

“यही हूँ डार्लिंग, तेरे बगल, अपने हाल में और तेरी जवानी के साथ। देख नहीं रही क्या तू?”

“क्या बोल रहा है, मैं तेरी बहन हूँ!”

“अमाँ छोड़ न बहन-वहन की बातें, आज तो अपनी ही है रातें। आजा मेरी बाहों में आज, फिर देख तुझे कैसा एहसास दिलाता हूँ, भूल जाएगी सभी को। जानता हूँ तेरे दोस्तों को और किसके साथ कहाँ टाइम पास करती है।” कहता हुआ डैनी शालू के और क़रीब हो गया, साँसों की गर्मी उसकी बढ़ने लगी थी, अब तो शालू भी ख़ुद के भीतर की गर्मी को महसूस करने लगी थी, फिर भी पीछा छुड़ाने के लिए बोली– “चुप बैठ, आज तू होश में नहीं है, कुछ भी बक रहा है।”

डैनी समझ चुका था कि शालू अब ज़्यादा दूर नहीं है।
 
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