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Adultery ' गाँव का टेलर '

दोनों के शरीर पसीने, तेल और वीर्य से लथपथ थे। दुकान में एक अजीब सी गंध थी—हवस की गंध।

काफी देर तक सन्नाटा रहा। सिर्फ एसी की आवाज़ थी।

रिंकी ने अपना सिर उठाया। उसके बाल बिखरे थे, होंठ सूजे हुए थे, और माथे का सिंदूर फैलकर नाक तक आ गया था।

उसने राज को देखा और एक संतुष्ट मुस्कान दी।

"मान गई मास्टर," उसने राज के गाल को चूमा। "तूने तो मेरी चाल ही बदल दी। अब मैं कल कैसे चलूंगी? लंगड़ाकर चलना पड़ेगा।"

राज हंसा। वह भी हांफ रहा था।

"यही तो इम्तिहान था," राज ने कहा। "तुम पास हो गई। अब तुम हमारी टीम में हो।"

रिंकी उठी। उसके पैरों के बीच से राज का प्रसाद बहकर उसकी मोटी जांघों पर आ रहा था। उसने उसे पोंछा नहीं।

"इसे रहने दूंगी," उसने कहा, अपनी जांघों को सहलाते हुए। "यह मेरी ट्रॉफी है। इसे घर लेकर जाऊंगी।"

उसने अपने कपड़े पहने। ब्लाउज के हुक टूटे हुए थे, तो उसने साड़ी के पल्लू से खुद को कसकर लपेट लिया।

वह जाने के लिए मुड़ी।‘

फिर रुकी और राज को देखा।‘

"शनिवार को..." उसने कहा। "शनिवार को जब मेमसाब मुझे बुलाएंगी... तो मैं तैयार रहूँगी। लेकिन याद रखना..." उसने राज के शिथिल लिंग की तरफ इशारा किया, "...उस दिन मुझे इससे कम नहीं चाहिए। मुझे और भी ज्यादा चाहिए। और उस दिन... उस दिन मैं मेमसाब को भी नहीं छोड़ूँगी।"

राज ने फर्श पर लेटे-लेटे ही हाथ हिलाया।

"तुम्हें इतना मिलेगा कि तुम संभाल नहीं पाओगी।"’’

रिंकी चली गई। उसकी चाल में सचमुच लंगड़ाहट थी। वह मटक नहीं रही थी, वह संभलकर चल रही थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।

राज ने शटर उठाया। बाहर धूप अभी भी तेज़ थी, लेकिन अंदर का मौसम बदल चुका था।

उसने दुकान के फर्श को देखा। वहां उनके मिलन के निशान थे।

उसने मुस्कुराते हुए सोचा—"अब टीम पूरी हो गई है। डॉली, विद्या और रिंकी। तीन रानियां और एक दर्जी। और शनिवार की रात... कयामत की रात होगी।"’

उसने अपनी डायरी उठाई और उसमें रिंकी का नाम भी जोड़ दिया। अब यह कहानी सिर्फ कपड़ों की नहीं, बल्कि नंगे जिस्मों की दास्तान बन चुकी थी।

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