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कोठरी में फर्श पर ताज़ा, सुनहरी भूसा बिछाया गया था। उसके ऊपर एक मोटी, पुरानी दरी और कुछ तकिए रखे थे।
लालटेन की रोशनी दीवारों पर बड़ी-बड़ी परछाइयां बना रही थी। यह किसी सुहागरात का कमरा नहीं, बल्कि एक शिकारी की मांद लग रही थी।
राज वहां खड़े थे। उन्होंने अपनी धोती उतार दी थी। वे सिर्फ एक लंगोट (या छोटा कच्छा) पहने हुए थे। उनका पूरा शरीर तेल में चमक रहा था। वे उस कोठरी में किसी प्राचीन योद्धा या राक्षस जैसे लग रहे थे।
"आ गई," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी मुस्कान में प्यार नहीं, भूख थी। उन्होंने अपना विशाल हाथ बढ़ाया और कामिनी को अंदर खींच लिया।
दरवाजा बंद कर दिया गया और भारी लोहे की सांकल चढ़ा दी गई। अब बाहर की दुनिया खत्म हो चुकी थी।
कामिनी ने अपनी शॉल कसकर पकड़ रखी थी। वह कांप रही थी। ठंड से नहीं, बल्कि उस माहौल से।
"शॉल हटाओ," राज ने हुक्म दिया।
कामिनी ने मना किया। "बाबूजी... मुझे शर्म आ रही है। यहाँ बहुत रोशनी है।"
राज पास आए। उन्होंने एक झटके में शॉल खींच ली और कोने में फेंक दी।
कामिनी सिर्फ घाघरा-चोली में थी। उसकी गोरी कमर, नाभि और पेट का हिस्सा खुला था। लालटेन की रोशनी में उसकी त्वचा सोने जैसी चमक रही थी।
"शर्म तो गहना है बहू," राज ने अपना खुरदरा हाथ उसकी नंगी कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा। "लेकिन बिस्तर पर... या भूसे पर... यह गहना उतार देना चाहिए।"
राज ने कामिनी की चोली की डोरी पीठ के पीछे से खींच दी। एक ही झटके में चोली ढीली हो गई।
"इसे उतारो," राज ने कहा।
कामिनी ने अपने हाथों से चोली को छाती पर पकड़े रखा। "नहीं... बाबूजी..."
"कामिनी!" राज की आवाज़ सख्त हो गई, चाबुक जैसी। "मैंने क्या कहा था? हुक्म मानो। मैं दोबारा नहीं बोलूंगा।"
कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। उसने धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपने हाथ हटाए। चोली नीचे सरक गई और फर्श पर गिर गई।
कामिनी के युवा, कड़े और सुडौल स्तन लालटेन की रोशनी में नंगे हो गए। वे ठंड और डर से अकड़े हुए थे। निप्पल डार्क ब्राउन और नुकीले थे, जो सीधे राज की तरफ देख रहे थे।
"सुंदर..." राज ने एक गहरी सांस ली। "बहुत सुंदर। प्रताप अंधा है।"
उन्होंने अपने दोनों बड़े हाथों से कामिनी के स्तनों को पकड़ लिया। उन्होंने उन्हें वैसे ही तौला जैसे कोई व्यापारी बाज़ार में कीमती फल तौलता है। फिर उन्होंने उन्हें जोर से दबाया, मसला।
"आह!" कामिनी के मुंह से चीख निकल गई। दर्द हुआ, लेकिन साथ ही उसकी योनि में एक बिजली सी दौड़ गई।
"प्रताप ने इन्हें कभी ऐसे नहीं छुआ होगा," राज ने कहा और झुककर कामिनी के बाएं निप्पल को अपने मुंह में भर लिया।
कामिनी ने राज के बालों को पकड़ लिया। राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनकी जीभ और दांतों का खेल कामिनी को पागल कर रहा था। उसकी टांगें कांपने लगीं। उसके जांघों के बीच रस बहने लगा और उसकी टांगों पर रेंगने लगा।
राज ने उसे धक्का दिया। कामिनी भूसे के ढेर पर बिछी दरी पर गिर गई। भूसा दरी के नीचे से चुभ रहा था, लेकिन यह चुभन उसे और उत्तेजित कर रही थी।
राज ने उसका घाघरा पकड़ा और उसे कमर तक ऊपर खींच लिया। कामिनी ने कोई पैंटी नहीं पहनी थी। उसका पूरा 'खजाना'—उसके गोरे जांघों के बीच वह काला त्रिकोण और गुलाबी योनि—राज के सामने था।
"आज तू पूरी तरह मेरी होगी," राज ने अपना लंगोट नीचे कर दिया।
उनका विशाल, काला और तना हुआ लिंग बाहर आ गया। कामिनी ने उसे कल रात देखा था, लेकिन आज... आज वह और भी बड़ा, और भी भूखा लग रहा था। वह हवा में झूल रहा था।
राज कामिनी के ऊपर आ गए। उनका भारी शरीर कामिनी को भूसे में दबा रहा था। उन्होंने अपने घुटनों से कामिनी की टांगों को जबरदस्ती चौड़ा कर दिया।
लालटेन की रोशनी दीवारों पर बड़ी-बड़ी परछाइयां बना रही थी। यह किसी सुहागरात का कमरा नहीं, बल्कि एक शिकारी की मांद लग रही थी।
राज वहां खड़े थे। उन्होंने अपनी धोती उतार दी थी। वे सिर्फ एक लंगोट (या छोटा कच्छा) पहने हुए थे। उनका पूरा शरीर तेल में चमक रहा था। वे उस कोठरी में किसी प्राचीन योद्धा या राक्षस जैसे लग रहे थे।
"आ गई," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी मुस्कान में प्यार नहीं, भूख थी। उन्होंने अपना विशाल हाथ बढ़ाया और कामिनी को अंदर खींच लिया।
दरवाजा बंद कर दिया गया और भारी लोहे की सांकल चढ़ा दी गई। अब बाहर की दुनिया खत्म हो चुकी थी।
कामिनी ने अपनी शॉल कसकर पकड़ रखी थी। वह कांप रही थी। ठंड से नहीं, बल्कि उस माहौल से।
"शॉल हटाओ," राज ने हुक्म दिया।
कामिनी ने मना किया। "बाबूजी... मुझे शर्म आ रही है। यहाँ बहुत रोशनी है।"
राज पास आए। उन्होंने एक झटके में शॉल खींच ली और कोने में फेंक दी।
कामिनी सिर्फ घाघरा-चोली में थी। उसकी गोरी कमर, नाभि और पेट का हिस्सा खुला था। लालटेन की रोशनी में उसकी त्वचा सोने जैसी चमक रही थी।
"शर्म तो गहना है बहू," राज ने अपना खुरदरा हाथ उसकी नंगी कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा। "लेकिन बिस्तर पर... या भूसे पर... यह गहना उतार देना चाहिए।"
राज ने कामिनी की चोली की डोरी पीठ के पीछे से खींच दी। एक ही झटके में चोली ढीली हो गई।
"इसे उतारो," राज ने कहा।
कामिनी ने अपने हाथों से चोली को छाती पर पकड़े रखा। "नहीं... बाबूजी..."
"कामिनी!" राज की आवाज़ सख्त हो गई, चाबुक जैसी। "मैंने क्या कहा था? हुक्म मानो। मैं दोबारा नहीं बोलूंगा।"
कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। उसने धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपने हाथ हटाए। चोली नीचे सरक गई और फर्श पर गिर गई।
कामिनी के युवा, कड़े और सुडौल स्तन लालटेन की रोशनी में नंगे हो गए। वे ठंड और डर से अकड़े हुए थे। निप्पल डार्क ब्राउन और नुकीले थे, जो सीधे राज की तरफ देख रहे थे।
"सुंदर..." राज ने एक गहरी सांस ली। "बहुत सुंदर। प्रताप अंधा है।"
उन्होंने अपने दोनों बड़े हाथों से कामिनी के स्तनों को पकड़ लिया। उन्होंने उन्हें वैसे ही तौला जैसे कोई व्यापारी बाज़ार में कीमती फल तौलता है। फिर उन्होंने उन्हें जोर से दबाया, मसला।
"आह!" कामिनी के मुंह से चीख निकल गई। दर्द हुआ, लेकिन साथ ही उसकी योनि में एक बिजली सी दौड़ गई।
"प्रताप ने इन्हें कभी ऐसे नहीं छुआ होगा," राज ने कहा और झुककर कामिनी के बाएं निप्पल को अपने मुंह में भर लिया।
कामिनी ने राज के बालों को पकड़ लिया। राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनकी जीभ और दांतों का खेल कामिनी को पागल कर रहा था। उसकी टांगें कांपने लगीं। उसके जांघों के बीच रस बहने लगा और उसकी टांगों पर रेंगने लगा।
राज ने उसे धक्का दिया। कामिनी भूसे के ढेर पर बिछी दरी पर गिर गई। भूसा दरी के नीचे से चुभ रहा था, लेकिन यह चुभन उसे और उत्तेजित कर रही थी।
राज ने उसका घाघरा पकड़ा और उसे कमर तक ऊपर खींच लिया। कामिनी ने कोई पैंटी नहीं पहनी थी। उसका पूरा 'खजाना'—उसके गोरे जांघों के बीच वह काला त्रिकोण और गुलाबी योनि—राज के सामने था।
"आज तू पूरी तरह मेरी होगी," राज ने अपना लंगोट नीचे कर दिया।
उनका विशाल, काला और तना हुआ लिंग बाहर आ गया। कामिनी ने उसे कल रात देखा था, लेकिन आज... आज वह और भी बड़ा, और भी भूखा लग रहा था। वह हवा में झूल रहा था।
राज कामिनी के ऊपर आ गए। उनका भारी शरीर कामिनी को भूसे में दबा रहा था। उन्होंने अपने घुटनों से कामिनी की टांगों को जबरदस्ती चौड़ा कर दिया।