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अज़ानगढ़ की विला में आज सुबह से ही एक अजीब सी हलचल मची हुई थी।
सुबह के 10 बज रहे थे, लेकिन सूरज ने अभी से अपना कड़ा रुख अपना लिया था। विला के बड़े आंगन में एक काले रंग की भारी-भरकम स्कॉर्पियो खड़ी थी, जिसका इंजन चालू था और उसकी गड़गड़ाहट विला की दीवारों से टकरा रही थी।
राज सिंह को किसी ज़रूरी ज़मीन के विवाद को सुलझाने के लिए अचानक शहर जाना पड़ रहा था। यह दौरा दो-तीन दिनों का हो सकता था। मुनीम जी फाइलें लेकर कार की डिक्की में रख रहे थे।
कामिनी ऊपर पहली मंजिल की गैलरी में खड़ी, छिपकर नीचे देख रही थी। उसका दिल डूब रहा था। पिछले एक हफ्ते में उसे राज की ऐसी लत लग गई थी कि उनके बिना एक रात बिताना भी उसे मुश्किल लग रहा था।
राज सिर्फ उसके जेठ नहीं, उसके जिस्म के मालिक बन चुके थे। उनकी मालिश, उनका पसीना और उनका वो सख्त लिंग... कामिनी की रातें अब उन्हीं के दम पर रोशन थीं। प्रताप तो वैसे भी घर पर कम ही रहता था, और जब रहता भी था तो किसी काम का नहीं था।
राज ने अपना चमड़े का ब्रीफकेस मुनीम जी को दिया और फिर ड्राइवर की सीट की तरफ देखा।
वहां रमन खड़ा था।
रमन। 25 साल का एक गठीला, सांवला और बेहद वफादार नौकर। वह विला का ड्राइवर भी था और ज़रूरत पड़ने पर राज का बॉडीगार्ड भी। उसका शरीर जिम का नहीं, बल्कि खेत की मेहनत और अखाड़े की मिट्टी का बना हुआ था। वह खेतों में हल चलाता था, भारी बोरे उठाता था।
उसके कंधे चौड़े थे, बांहें मोटी और सख्त थीं, और गर्दन बैल जैसी मज़बूत थी। वह हमेशा एक खाकी रंग की वर्दी (या कुर्ता-पायजामा) पहनता था, जिसके बटन अक्सर उसकी चौड़ी, बालों वाली छाती पर तन जाते थे।
रमन की आंखों में हमेशा एक झुकाव रहता था—मालिक के सामने वफादारी का। लेकिन उस झुकाव में, उस सांवलेपन में एक दबी हुई आग भी थी। वह जानता था कि विला में क्या चल रहा है। वह राज का साया था। उसने राज की आंखों में कामिनी के लिए भूख देखी थी, और कहीं न कहीं... वह भूख रमन के अंदर भी सुलग रही थी।
"रमन," राज ने उसे पास बुलाया। उनकी आवाज़ में हुक्म था।
रमन दौड़कर आया। "जी मालिक।"
राज ने रमन के मज़बूत कंधे पर अपना भारी हाथ रखा। उन्होंने ऊपर गैलरी की तरफ देखा, जहाँ कामिनी खड़ी थी। कामिनी की धड़कन रुक गई। उसे लगा राज उसे ही देख रहे हैं।
"मैं दो दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ,"
राज ने कहा, उनकी आवाज़ धीमी थी लेकिन उसमें एक गहरा अर्थ छिपा था। "पीछे विला की, और खासकर 'छोटी बहू' की सुरक्षा तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। प्रताप तो नाकारा है।"
"जी मालिक, जान दे दूंगा," रमन ने सिर झुकाया।
"जान देने की ज़रूरत नहीं है," राज ने रमन के कान के पास झुककर कहा, ताकि मुनीम जी या कोई और न सुन सके।
"बस ज़रूरत का खयाल रखना। अगर 'बहू रानी' को किसी चीज़ की प्यास लगे... चाहे वो पानी हो, बाज़ार जाना हो, या... 'कुछ और'... तो उसे प्यासा मत रहने देना। समझ गए?"
रमन ने धीरे से सिर उठाया। उसकी काली आंखें सीधे राज की आंखों में गड़ गईं। वह समझ गया। यह एक कोड था। उसे 'परमिशन' मिल गई थी। उसे अपनी मालकिन को संभालने का, उसे खुश रखने का परोक्ष आदेश मिल गया था। क्योंकि राज जानते थे कि कामिनी की आग अब बुझने वाली नहीं है, और अगर राज नहीं हैं, तो उसे कोई तो चाहिए जो उसे ठंडा रख सके। और रमन से ज्यादा वफादार और ताकतवर 'जानवर' कौन हो सकता था?
"समझ गया मालिक," रमन ने एक बारीक, धूर्त मुस्कान के साथ कहा। "विला की इज़्ज़त और ज़रूरत... दोनों का ध्यान रखूँगा। कोई कमी नहीं आने दूंगा।"
राज ने उसकी पीठ थपथपाई, गाड़ी में बैठे और चले गए। धूल का गुबार उड़ता रह गया।
कामिनी वहीं खड़ी रही। उसे राज के जाने का गम था, लेकिन रमन की वो आखिरी नज़र... जब उसने ऊपर गैलरी की तरफ देखा था... उसमें एक अजीब सी भूख थी। एक नौकर की भूख, जो अपनी मालकिन को खाने के लिए तैयार था। उस नज़र ने कामिनी के पेट में एक सिहरन पैदा कर दी।
दोपहर के 12 बजे। गर्मी अपने शबाब पर थी। कामिनी अपने कमरे में बैठी थी। उसे बेचैनी हो रही थी। राज नहीं थे, तो उसे खालीपन महसूस हो रहा था।
तभी दरवाजे पर नॉक हुआ।
"कौन?"
"बहू रानी, मैं रमन," बाहर से भारी, मर्दाना आवाज़ आई।
कामिनी ने अपना दुपट्टा ठीक किया, सीने को ढका और दरवाजा खोला।
रमन बाहर खड़ा था। वह पसीने में तर था। शायद बगीचे में काम कर रहा था। उसकी खाकी शर्ट पसीने से चिपकी थी, जिससे उसके शरीर के मसल्स, उसकी छाती के बाल और उसके एब्स की लकीरें साफ दिख रही थीं। उसे राज की तरह महंगे इत्र की नहीं, बल्कि बीड़ी, पसीने और धूप की कच्ची गंध आ रही थी।
कामिनी ने अपनी नाक सिकोड़ी, लेकिन अंदर ही अंदर उसे वह गंध खींच रही थी। यह एक 'असली मर्द' की गंध थी।
"क्या है?" कामिनी ने थोड़ा अकड़कर पूछा। आखिर वह मालकिन थी।
"मालकिन, शहर से राशन और आपका कुछ सामान लाना है," रमन ने नज़रें झुकाए हुए कहा, लेकिन उसकी आंखें चोरी से कामिनी के भीगे हुए होठों और उसकी कमर के कर्व को देख रही थीं।
"बड़े ठाकुर कह गए थे कि आपको बाज़ार ले जाऊं। आपका मन भी बहल जाएगा और हवा-पानी बदल जाएगा।"
कामिनी का मन हुआ मना कर दे। नौकर के साथ अकेले जाना ठीक नहीं था। लेकिन विला का सन्नाटा उसे काट रहा था। और रमन... रमन के खड़े होने के अंदाज़ में, उसके पसीने से भीगे गले में कुछ ऐसा था जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। उसे देखना था कि राज ने उसे क्या कहकर छोड़ा है।
"ठीक है," कामिनी ने कहा। "गाड़ी निकालो। मैं आती हूँ।"
रमन ने विला की पुरानी सफेद एम्बेसडर कार निकाली। यह कार राज की पसंदीदा थी—मज़बूत, भारी और पीछे से बहुत चौड़ी, जैसे कोई छोटा कमरा हो। इसके शीशे काले थे और पर्दे लगे थे।
कामिनी पिछली सीट पर बैठी। रमन ड्राइविंग सीट पर।
गाड़ी गांव के कच्चे रास्तों से होकर शहर की तरफ बढ़ी। रास्ता सुनसान था। दोनों तरफ सिर्फ खेत, बबूल के पेड़ और राजस्थान की सूखी ज़मीन थी। कार के एसी की ठंडक और बाहर की लू का मुकाबला चल रहा था।
रमन बार-बार रियर-व्यू मिरर में देख रहा था। उसकी नज़रें सड़क पर कम और पिछली सीट पर बैठी कामिनी पर ज्यादा थीं। वह कामिनी के चेहरे को, उसकी गर्दन को और साड़ी के पल्लू के नीचे छिपे उभारों को घूर रहा था।
कामिनी ने देखा कि रमन उसे घूर रहा है। एक मालकिन के तौर पर उसे उसे डांटना चाहिए था, अपनी मर्यादा दिखानी चाहिए थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। राज के साथ बिताई रातों ने उसे बदल दिया था। उसे अब मर्दों की भूखी नज़रों में मज़ा आता था। उसे अच्छा लग रहा था कि एक गठीला नौजवान उसे पाने के लिए ललचा रहा है।
उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा गिरा दिया, जैसे गर्मी लग रही हो।
रमन की आंखों में चमक आ गई। उसने मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया ताकि उसे कामिनी की छाती का पूरा नज़ारा मिल सके।
"गर्मी बहुत है आज," रमन ने कहा। उसकी आवाज़ में एक कशिश थी, एक न्यौता था।
"हाँ," कामिनी ने अपनी गर्दन से पसीना पोंछा। उसकी साड़ी थोड़ी पारदर्शी हो रही थी। "एसी तेज़ करो।"
"यह पुरानी गाड़ी है मालकिन," रमन ने मिरर में उसकी आंखों में सीधे देखते हुए कहा। "इसमें एसी ज्यादा काम नहीं करता। इसमें तो... खिड़की खोलकर ही हवा खानी पड़ती है। या फिर..."
"या फिर?" कामिनी ने पूछा।
"या फिर कपड़े कम करने पड़ते हैं," रमन ने बहुत धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो, लेकिन इतना तेज़ कि कामिनी सुन सके।
कामिनी का दिल तेज़ हो गया। एक नौकर उससे ऐसी बात कर रहा था? इतनी हिम्मत?
"जुबान संभालो रमन," कामिनी ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में सख्ती नहीं, बल्कि एक कमज़ोर विरोध था। "तुम भूल रहे हो कि तुम किससे बात कर रहे हो।"
"माफ़ करना मालकिन," रमन ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी। "वो क्या है ना... बड़े ठाकुर ने कहा था कि आपका खयाल रखूं। आपको गर्मी न लगने दूं। आपकी हर तकलीफ दूर करूँ। मैं तो बस हुक्म का गुलाम हूँ।"
रमन ने गाड़ी को मुख्य सड़क से उतारकर एक कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डाल दिया।
कामिनी सतर्क हो गई। "यह कहाँ ले जा रहे हो? बाज़ार तो सीधा है।"
"शॉर्टकट है मालकिन," रमन ने इत्मीनान से कहा। "मुख्य सड़क पर जाम लगा है। यहाँ से जल्दी पहुँच जाएंगे। यह जंगल का रास्ता है।"
गाड़ी अब घने जंगल के बीच से गुज़र रही थी। पेड़ इतने घने थे कि दोपहर में भी शाम जैसा अंधेरा लग रहा था। रास्ता पथरीला था, जिससे गाड़ी हिचकोले खा रही थी। सन्नाटा इतना था कि सिर्फ टायरों की आवाज़ और सूखी पत्तियों की सरसराहट आ रही थी।
अचानक, रमन ने गाड़ी रोक दी। एक बिल्कुल सुनसान जगह पर। चारों तरफ सिर्फ झाड़ियां और पुराने पेड़ थे। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं।
"क्या हुआ?" कामिनी ने घबराकर पूछा।
"गाड़ी क्यों रोकी?"
"गाड़ी गर्म हो गई है," रमन ने डैशबोर्ड पर लगे मीटर को देखे बिना कहा। "इंजन ठंडा करना पड़ेगा। पानी डालना पड़ेगा।"
रमन उतरा। उसने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और बोनट खोला। भाप निकली (या शायद उसने निकाली)।
कामिनी कार के अंदर बैठी थी। एसी बंद हो चुका था। गर्मी बढ़ने लगी थी। उसे डर लग रहा था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा रोमांच भी हो रहा था। जंगल... एकांत... और एक गठीला नौजवान जो अब बोनट के पास खड़ा होकर उसे ही देख रहा था।
रमन वापस आया। लेकिन उसने ड्राइविंग सीट का दरवाजा नहीं खोला। वह पीछे आया और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला—कामिनी की तरफ वाला।
वह अंदर आ गया।
सुबह के 10 बज रहे थे, लेकिन सूरज ने अभी से अपना कड़ा रुख अपना लिया था। विला के बड़े आंगन में एक काले रंग की भारी-भरकम स्कॉर्पियो खड़ी थी, जिसका इंजन चालू था और उसकी गड़गड़ाहट विला की दीवारों से टकरा रही थी।
राज सिंह को किसी ज़रूरी ज़मीन के विवाद को सुलझाने के लिए अचानक शहर जाना पड़ रहा था। यह दौरा दो-तीन दिनों का हो सकता था। मुनीम जी फाइलें लेकर कार की डिक्की में रख रहे थे।
कामिनी ऊपर पहली मंजिल की गैलरी में खड़ी, छिपकर नीचे देख रही थी। उसका दिल डूब रहा था। पिछले एक हफ्ते में उसे राज की ऐसी लत लग गई थी कि उनके बिना एक रात बिताना भी उसे मुश्किल लग रहा था।
राज सिर्फ उसके जेठ नहीं, उसके जिस्म के मालिक बन चुके थे। उनकी मालिश, उनका पसीना और उनका वो सख्त लिंग... कामिनी की रातें अब उन्हीं के दम पर रोशन थीं। प्रताप तो वैसे भी घर पर कम ही रहता था, और जब रहता भी था तो किसी काम का नहीं था।
राज ने अपना चमड़े का ब्रीफकेस मुनीम जी को दिया और फिर ड्राइवर की सीट की तरफ देखा।
वहां रमन खड़ा था।
रमन। 25 साल का एक गठीला, सांवला और बेहद वफादार नौकर। वह विला का ड्राइवर भी था और ज़रूरत पड़ने पर राज का बॉडीगार्ड भी। उसका शरीर जिम का नहीं, बल्कि खेत की मेहनत और अखाड़े की मिट्टी का बना हुआ था। वह खेतों में हल चलाता था, भारी बोरे उठाता था।
उसके कंधे चौड़े थे, बांहें मोटी और सख्त थीं, और गर्दन बैल जैसी मज़बूत थी। वह हमेशा एक खाकी रंग की वर्दी (या कुर्ता-पायजामा) पहनता था, जिसके बटन अक्सर उसकी चौड़ी, बालों वाली छाती पर तन जाते थे।
रमन की आंखों में हमेशा एक झुकाव रहता था—मालिक के सामने वफादारी का। लेकिन उस झुकाव में, उस सांवलेपन में एक दबी हुई आग भी थी। वह जानता था कि विला में क्या चल रहा है। वह राज का साया था। उसने राज की आंखों में कामिनी के लिए भूख देखी थी, और कहीं न कहीं... वह भूख रमन के अंदर भी सुलग रही थी।
"रमन," राज ने उसे पास बुलाया। उनकी आवाज़ में हुक्म था।
रमन दौड़कर आया। "जी मालिक।"
राज ने रमन के मज़बूत कंधे पर अपना भारी हाथ रखा। उन्होंने ऊपर गैलरी की तरफ देखा, जहाँ कामिनी खड़ी थी। कामिनी की धड़कन रुक गई। उसे लगा राज उसे ही देख रहे हैं।
"मैं दो दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ,"
राज ने कहा, उनकी आवाज़ धीमी थी लेकिन उसमें एक गहरा अर्थ छिपा था। "पीछे विला की, और खासकर 'छोटी बहू' की सुरक्षा तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। प्रताप तो नाकारा है।"
"जी मालिक, जान दे दूंगा," रमन ने सिर झुकाया।
"जान देने की ज़रूरत नहीं है," राज ने रमन के कान के पास झुककर कहा, ताकि मुनीम जी या कोई और न सुन सके।
"बस ज़रूरत का खयाल रखना। अगर 'बहू रानी' को किसी चीज़ की प्यास लगे... चाहे वो पानी हो, बाज़ार जाना हो, या... 'कुछ और'... तो उसे प्यासा मत रहने देना। समझ गए?"
रमन ने धीरे से सिर उठाया। उसकी काली आंखें सीधे राज की आंखों में गड़ गईं। वह समझ गया। यह एक कोड था। उसे 'परमिशन' मिल गई थी। उसे अपनी मालकिन को संभालने का, उसे खुश रखने का परोक्ष आदेश मिल गया था। क्योंकि राज जानते थे कि कामिनी की आग अब बुझने वाली नहीं है, और अगर राज नहीं हैं, तो उसे कोई तो चाहिए जो उसे ठंडा रख सके। और रमन से ज्यादा वफादार और ताकतवर 'जानवर' कौन हो सकता था?
"समझ गया मालिक," रमन ने एक बारीक, धूर्त मुस्कान के साथ कहा। "विला की इज़्ज़त और ज़रूरत... दोनों का ध्यान रखूँगा। कोई कमी नहीं आने दूंगा।"
राज ने उसकी पीठ थपथपाई, गाड़ी में बैठे और चले गए। धूल का गुबार उड़ता रह गया।
कामिनी वहीं खड़ी रही। उसे राज के जाने का गम था, लेकिन रमन की वो आखिरी नज़र... जब उसने ऊपर गैलरी की तरफ देखा था... उसमें एक अजीब सी भूख थी। एक नौकर की भूख, जो अपनी मालकिन को खाने के लिए तैयार था। उस नज़र ने कामिनी के पेट में एक सिहरन पैदा कर दी।
दोपहर के 12 बजे। गर्मी अपने शबाब पर थी। कामिनी अपने कमरे में बैठी थी। उसे बेचैनी हो रही थी। राज नहीं थे, तो उसे खालीपन महसूस हो रहा था।
तभी दरवाजे पर नॉक हुआ।
"कौन?"
"बहू रानी, मैं रमन," बाहर से भारी, मर्दाना आवाज़ आई।
कामिनी ने अपना दुपट्टा ठीक किया, सीने को ढका और दरवाजा खोला।
रमन बाहर खड़ा था। वह पसीने में तर था। शायद बगीचे में काम कर रहा था। उसकी खाकी शर्ट पसीने से चिपकी थी, जिससे उसके शरीर के मसल्स, उसकी छाती के बाल और उसके एब्स की लकीरें साफ दिख रही थीं। उसे राज की तरह महंगे इत्र की नहीं, बल्कि बीड़ी, पसीने और धूप की कच्ची गंध आ रही थी।
कामिनी ने अपनी नाक सिकोड़ी, लेकिन अंदर ही अंदर उसे वह गंध खींच रही थी। यह एक 'असली मर्द' की गंध थी।
"क्या है?" कामिनी ने थोड़ा अकड़कर पूछा। आखिर वह मालकिन थी।
"मालकिन, शहर से राशन और आपका कुछ सामान लाना है," रमन ने नज़रें झुकाए हुए कहा, लेकिन उसकी आंखें चोरी से कामिनी के भीगे हुए होठों और उसकी कमर के कर्व को देख रही थीं।
"बड़े ठाकुर कह गए थे कि आपको बाज़ार ले जाऊं। आपका मन भी बहल जाएगा और हवा-पानी बदल जाएगा।"
कामिनी का मन हुआ मना कर दे। नौकर के साथ अकेले जाना ठीक नहीं था। लेकिन विला का सन्नाटा उसे काट रहा था। और रमन... रमन के खड़े होने के अंदाज़ में, उसके पसीने से भीगे गले में कुछ ऐसा था जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। उसे देखना था कि राज ने उसे क्या कहकर छोड़ा है।
"ठीक है," कामिनी ने कहा। "गाड़ी निकालो। मैं आती हूँ।"
रमन ने विला की पुरानी सफेद एम्बेसडर कार निकाली। यह कार राज की पसंदीदा थी—मज़बूत, भारी और पीछे से बहुत चौड़ी, जैसे कोई छोटा कमरा हो। इसके शीशे काले थे और पर्दे लगे थे।
कामिनी पिछली सीट पर बैठी। रमन ड्राइविंग सीट पर।
गाड़ी गांव के कच्चे रास्तों से होकर शहर की तरफ बढ़ी। रास्ता सुनसान था। दोनों तरफ सिर्फ खेत, बबूल के पेड़ और राजस्थान की सूखी ज़मीन थी। कार के एसी की ठंडक और बाहर की लू का मुकाबला चल रहा था।
रमन बार-बार रियर-व्यू मिरर में देख रहा था। उसकी नज़रें सड़क पर कम और पिछली सीट पर बैठी कामिनी पर ज्यादा थीं। वह कामिनी के चेहरे को, उसकी गर्दन को और साड़ी के पल्लू के नीचे छिपे उभारों को घूर रहा था।
कामिनी ने देखा कि रमन उसे घूर रहा है। एक मालकिन के तौर पर उसे उसे डांटना चाहिए था, अपनी मर्यादा दिखानी चाहिए थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। राज के साथ बिताई रातों ने उसे बदल दिया था। उसे अब मर्दों की भूखी नज़रों में मज़ा आता था। उसे अच्छा लग रहा था कि एक गठीला नौजवान उसे पाने के लिए ललचा रहा है।
उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा गिरा दिया, जैसे गर्मी लग रही हो।
रमन की आंखों में चमक आ गई। उसने मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया ताकि उसे कामिनी की छाती का पूरा नज़ारा मिल सके।
"गर्मी बहुत है आज," रमन ने कहा। उसकी आवाज़ में एक कशिश थी, एक न्यौता था।
"हाँ," कामिनी ने अपनी गर्दन से पसीना पोंछा। उसकी साड़ी थोड़ी पारदर्शी हो रही थी। "एसी तेज़ करो।"
"यह पुरानी गाड़ी है मालकिन," रमन ने मिरर में उसकी आंखों में सीधे देखते हुए कहा। "इसमें एसी ज्यादा काम नहीं करता। इसमें तो... खिड़की खोलकर ही हवा खानी पड़ती है। या फिर..."
"या फिर?" कामिनी ने पूछा।
"या फिर कपड़े कम करने पड़ते हैं," रमन ने बहुत धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो, लेकिन इतना तेज़ कि कामिनी सुन सके।
कामिनी का दिल तेज़ हो गया। एक नौकर उससे ऐसी बात कर रहा था? इतनी हिम्मत?
"जुबान संभालो रमन," कामिनी ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में सख्ती नहीं, बल्कि एक कमज़ोर विरोध था। "तुम भूल रहे हो कि तुम किससे बात कर रहे हो।"
"माफ़ करना मालकिन," रमन ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी। "वो क्या है ना... बड़े ठाकुर ने कहा था कि आपका खयाल रखूं। आपको गर्मी न लगने दूं। आपकी हर तकलीफ दूर करूँ। मैं तो बस हुक्म का गुलाम हूँ।"
रमन ने गाड़ी को मुख्य सड़क से उतारकर एक कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डाल दिया।
कामिनी सतर्क हो गई। "यह कहाँ ले जा रहे हो? बाज़ार तो सीधा है।"
"शॉर्टकट है मालकिन," रमन ने इत्मीनान से कहा। "मुख्य सड़क पर जाम लगा है। यहाँ से जल्दी पहुँच जाएंगे। यह जंगल का रास्ता है।"
गाड़ी अब घने जंगल के बीच से गुज़र रही थी। पेड़ इतने घने थे कि दोपहर में भी शाम जैसा अंधेरा लग रहा था। रास्ता पथरीला था, जिससे गाड़ी हिचकोले खा रही थी। सन्नाटा इतना था कि सिर्फ टायरों की आवाज़ और सूखी पत्तियों की सरसराहट आ रही थी।
अचानक, रमन ने गाड़ी रोक दी। एक बिल्कुल सुनसान जगह पर। चारों तरफ सिर्फ झाड़ियां और पुराने पेड़ थे। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं।
"क्या हुआ?" कामिनी ने घबराकर पूछा।
"गाड़ी क्यों रोकी?"
"गाड़ी गर्म हो गई है," रमन ने डैशबोर्ड पर लगे मीटर को देखे बिना कहा। "इंजन ठंडा करना पड़ेगा। पानी डालना पड़ेगा।"
रमन उतरा। उसने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और बोनट खोला। भाप निकली (या शायद उसने निकाली)।
कामिनी कार के अंदर बैठी थी। एसी बंद हो चुका था। गर्मी बढ़ने लगी थी। उसे डर लग रहा था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा रोमांच भी हो रहा था। जंगल... एकांत... और एक गठीला नौजवान जो अब बोनट के पास खड़ा होकर उसे ही देख रहा था।
रमन वापस आया। लेकिन उसने ड्राइविंग सीट का दरवाजा नहीं खोला। वह पीछे आया और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला—कामिनी की तरफ वाला।
वह अंदर आ गया।