S
StoryPublisher
Guest
रमन का लिंग बहुत मोटा था। वह अंदर नहीं जा पा रहा था। कामिनी रोने लगी।
"रुक जा," राज ने कहा। उन्हें अपनी बहू की तकलीफ देखी नहीं गई (या शायद उन्हें लगा कि वह सचमुच फट जाएगी)। "जबरदस्ती नहीं। आज नहीं। इसे बाद के लिए रखते हैं।"
उन्होंने प्लान बदला।
"रमन, तू लेट जा," राज ने कहा। "बिस्तर पर।"
रमन बिस्तर पर लेट गया।
"कामिनी, इसके ऊपर बैठ जा," राज ने कहा।
कामिनी रमन के लिंग पर बैठ गई। रमन का लिंग उसके अंदर था।
"अब पीछे झुक," राज ने कहा। "मेरी तरफ।"
कामिनी पीछे झुकी। रमन ने उसे संभाल लिया, उसकी कमर पकड़ ली। अब कामिनी का चेहरा और छाती ऊपर की तरफ थी, राज की तरफ।
राज ने बिस्तर पर चढ़कर कामिनी के चेहरे के पास पोज़िशन ली।
"अब हम इसे 'नहलाएंगे'," राज ने कहा। "रमन, तैयार है? मैं छूटने वाला हूँ।"
"जी मालिक... मैं भी फटने वाला हूँ," रमन ने नीचे से कामिनी के नितंबों को भींचते हुए कहा। "यह बहुत टाइट है।"
राज ने अपने लिंग को कामिनी के चेहरे, आंखों और होंठों पर रगड़ना शुरू किया, जबकि रमन नीचे से तेज़, छोटे धक्के मार रहा था।
"कामिनी... खोल अपनी ज़ुबान!" राज चिल्लाए। "प्रसाद ले!"
कामिनी ने अपनी जीभ बाहर निकाली। वह इंतज़ार कर रही थी।
"मैं आ रहा हूँ!" रमन नीचे से चिल्लाया। उसने अपनी कमर को हवा में उठा दिया, कामिनी को भी साथ उठाते हुए।
रमन ने अपना सारा, ढेर सारा वीर्य कामिनी की योनि के अंदर, बहुत गहराई में, बच्चेदानी के मुंह पर छोड़ दिया। कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर गर्म पानी का गुब्बारा फूट गया हो। वह भर गई।
उसी वक्त, ठीक उसी पल, राज ने कामिनी के चेहरे पर अपना वीर्य छोड़ना शुरू किया। उनकी गर्म, गाढ़ी धार कामिनी की आंखों, गालों, नाक और होंठों पर गिरी। कामिनी ने अपनी जीभ से उसे चाटने की कोशिश की, उसे पीने की कोशिश की।
वह पूरी तरह सन गई थी। नीचे से भरी हुई, ऊपर से ढकी हुई। वीर्य, पसीना और रंग... सब एक हो गया था।
तीनों एक साथ ढेर हो गए। रमन नीचे, कामिनी उसके ऊपर, और राज बगल में।
कमरे में सिर्फ भारी सांसों, एसी की हमिंग और धड़कनों की आवाज़ थी।
काफी देर तक वे वैसे ही पड़े रहे। भांग का नशा अब उतर रहा था, लेकिन हकीकत का नशा और गहरा हो गया था। कामिनी के ऊपर और अंदर, दोनों जगह उसके 'मालिकों' का निशान था।
राज उठे। उन्होंने एक गीला तौलिया लिया और कामिनी का चेहरा पोंछा। बहुत प्यार से।
"खुश है?" राज ने पूछा।
कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह थकी हुई थी, उसका शरीर टूट रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। एक औरत की शांति।
"जी..." उसने फुसफुसाया।
"आज होली पूरी हुई," राज ने कहा। "रमन, जा। अपने कपड़े पहन। और सुन... यह बात इसी कमरे में रहनी चाहिए। बाहर तू सिर्फ नौकर है।"
"मालिक, मेरी जुबान कटी समझो," रमन ने उठते हुए कहा। उसने अपना लंगोट उठाया। उसने जाते-जाते कामिनी को एक आखिरी, कामुक नज़र से देखा, जो अभी भी नंगी पड़ी थी। उसकी आंखों में एक चमक थी—उसने अपनी मालकिन को गर्व कर दिया था। वह बाथरूम में चला गया।
राज ने कामिनी को अपनी बांहों में ले लिया।
"आज जो हुआ," राज ने उसके पेट पर, उसकी नाभि पर अपना बड़ा हाथ फेरते हुए कहा, "उसका नतीजा बहुत जल्द मिलेगा। मुझे यकीन है। रमन और मैंने मिलकर तुझे जो दिया है, वो खाली नहीं जाएगा।"
"नतीजा?" कामिनी ने पूछा, उनकी छाती पर सिर रखकर।
"हाँ," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "वारिस। इस विला का चिराग। जो प्रताप नहीं दे सका, वो आज हमने तुझे दे दिया है। अब तेरे अंदर हमारा अंश है। एक असली ठाकुर का खून।"
कामिनी ने अपने पेट पर राज का हाथ दबाया। उसे वहां एक नई गर्मी महसूस हुई। उसे लगा कि वह अब खाली नहीं है। वह पूरी हो गई है।
"अब सो जा," राज ने उसे माथे पर चूमा। "कल से तू सिर्फ मेरी नहीं, हम सबकी रानी है। इस विला की असली रानी।"
उस रात, जब पूरी दुनिया रंगों से खेलकर थक चुकी थी, विला के उस बंद कमरे में तीन जिस्मों ने मिलकर एक नए रिश्ते, एक नए राज़ और शायद... एक नए जीवन की शुरुआत कर दी थी।
दिनी अब जानती थी कि उसकी ज़िंदगी अब कभी भी साधारण नहीं होगी। वह एक पत्नी से ज्यादा, एक प्रेमिका से ज्यादा, एक 'साझा देवी' बन चुकी थी। और उसे यह रूप... सबसे ज्यादा पसंद था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
"रुक जा," राज ने कहा। उन्हें अपनी बहू की तकलीफ देखी नहीं गई (या शायद उन्हें लगा कि वह सचमुच फट जाएगी)। "जबरदस्ती नहीं। आज नहीं। इसे बाद के लिए रखते हैं।"
उन्होंने प्लान बदला।
"रमन, तू लेट जा," राज ने कहा। "बिस्तर पर।"
रमन बिस्तर पर लेट गया।
"कामिनी, इसके ऊपर बैठ जा," राज ने कहा।
कामिनी रमन के लिंग पर बैठ गई। रमन का लिंग उसके अंदर था।
"अब पीछे झुक," राज ने कहा। "मेरी तरफ।"
कामिनी पीछे झुकी। रमन ने उसे संभाल लिया, उसकी कमर पकड़ ली। अब कामिनी का चेहरा और छाती ऊपर की तरफ थी, राज की तरफ।
राज ने बिस्तर पर चढ़कर कामिनी के चेहरे के पास पोज़िशन ली।
"अब हम इसे 'नहलाएंगे'," राज ने कहा। "रमन, तैयार है? मैं छूटने वाला हूँ।"
"जी मालिक... मैं भी फटने वाला हूँ," रमन ने नीचे से कामिनी के नितंबों को भींचते हुए कहा। "यह बहुत टाइट है।"
राज ने अपने लिंग को कामिनी के चेहरे, आंखों और होंठों पर रगड़ना शुरू किया, जबकि रमन नीचे से तेज़, छोटे धक्के मार रहा था।
"कामिनी... खोल अपनी ज़ुबान!" राज चिल्लाए। "प्रसाद ले!"
कामिनी ने अपनी जीभ बाहर निकाली। वह इंतज़ार कर रही थी।
"मैं आ रहा हूँ!" रमन नीचे से चिल्लाया। उसने अपनी कमर को हवा में उठा दिया, कामिनी को भी साथ उठाते हुए।
रमन ने अपना सारा, ढेर सारा वीर्य कामिनी की योनि के अंदर, बहुत गहराई में, बच्चेदानी के मुंह पर छोड़ दिया। कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर गर्म पानी का गुब्बारा फूट गया हो। वह भर गई।
उसी वक्त, ठीक उसी पल, राज ने कामिनी के चेहरे पर अपना वीर्य छोड़ना शुरू किया। उनकी गर्म, गाढ़ी धार कामिनी की आंखों, गालों, नाक और होंठों पर गिरी। कामिनी ने अपनी जीभ से उसे चाटने की कोशिश की, उसे पीने की कोशिश की।
वह पूरी तरह सन गई थी। नीचे से भरी हुई, ऊपर से ढकी हुई। वीर्य, पसीना और रंग... सब एक हो गया था।
तीनों एक साथ ढेर हो गए। रमन नीचे, कामिनी उसके ऊपर, और राज बगल में।
कमरे में सिर्फ भारी सांसों, एसी की हमिंग और धड़कनों की आवाज़ थी।
काफी देर तक वे वैसे ही पड़े रहे। भांग का नशा अब उतर रहा था, लेकिन हकीकत का नशा और गहरा हो गया था। कामिनी के ऊपर और अंदर, दोनों जगह उसके 'मालिकों' का निशान था।
राज उठे। उन्होंने एक गीला तौलिया लिया और कामिनी का चेहरा पोंछा। बहुत प्यार से।
"खुश है?" राज ने पूछा।
कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह थकी हुई थी, उसका शरीर टूट रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। एक औरत की शांति।
"जी..." उसने फुसफुसाया।
"आज होली पूरी हुई," राज ने कहा। "रमन, जा। अपने कपड़े पहन। और सुन... यह बात इसी कमरे में रहनी चाहिए। बाहर तू सिर्फ नौकर है।"
"मालिक, मेरी जुबान कटी समझो," रमन ने उठते हुए कहा। उसने अपना लंगोट उठाया। उसने जाते-जाते कामिनी को एक आखिरी, कामुक नज़र से देखा, जो अभी भी नंगी पड़ी थी। उसकी आंखों में एक चमक थी—उसने अपनी मालकिन को गर्व कर दिया था। वह बाथरूम में चला गया।
राज ने कामिनी को अपनी बांहों में ले लिया।
"आज जो हुआ," राज ने उसके पेट पर, उसकी नाभि पर अपना बड़ा हाथ फेरते हुए कहा, "उसका नतीजा बहुत जल्द मिलेगा। मुझे यकीन है। रमन और मैंने मिलकर तुझे जो दिया है, वो खाली नहीं जाएगा।"
"नतीजा?" कामिनी ने पूछा, उनकी छाती पर सिर रखकर।
"हाँ," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "वारिस। इस विला का चिराग। जो प्रताप नहीं दे सका, वो आज हमने तुझे दे दिया है। अब तेरे अंदर हमारा अंश है। एक असली ठाकुर का खून।"
कामिनी ने अपने पेट पर राज का हाथ दबाया। उसे वहां एक नई गर्मी महसूस हुई। उसे लगा कि वह अब खाली नहीं है। वह पूरी हो गई है।
"अब सो जा," राज ने उसे माथे पर चूमा। "कल से तू सिर्फ मेरी नहीं, हम सबकी रानी है। इस विला की असली रानी।"
उस रात, जब पूरी दुनिया रंगों से खेलकर थक चुकी थी, विला के उस बंद कमरे में तीन जिस्मों ने मिलकर एक नए रिश्ते, एक नए राज़ और शायद... एक नए जीवन की शुरुआत कर दी थी।
दिनी अब जानती थी कि उसकी ज़िंदगी अब कभी भी साधारण नहीं होगी। वह एक पत्नी से ज्यादा, एक प्रेमिका से ज्यादा, एक 'साझा देवी' बन चुकी थी। और उसे यह रूप... सबसे ज्यादा पसंद था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,