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Adultery ' गाँव का टेलर '

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कमरे में सिर्फ गीली आवाज़ें, मांस के टकराने की आवाज़ें और औरतों की आहें थीं।

अचानक, राज ने डॉली को रोका।

"उतरो," उसने कहा।

डॉली उतरी।

"खड़ी हो जाओ। दोनों।"

राज बिस्तर से उतरा। वह कमरे के बीच में, कालीन पर खड़ा हो गया।

"दोनों डॉगी स्टाइल में आ जाओ। एक-दूसरे के बगल में। मुझे तुलना करनी है।"

डॉली और विद्या, दोनों आज्ञाकारी रानियों की तरह, कालीन पर घुटनों और हाथों के बल हो गईं।

दो अलग-अलग नज़ारे राज के सामने थे।

डॉली का विशाल, भारी, फैला हुआ और मांसल 42 इंच का पिछवाड़ा। जो हिलने पर लहरें मारता था।

और विद्या का छोटा, कसा हुआ, एथलेटिक और गोल फुटबॉल जैसा पिछवाड़ा। जो पत्थर जैसा सख्त था।

राज ने दोनों को देखा। यह एक पुरुष का सबसे बड़ा सपना था।

उसने पहले डॉली के नितंब पर एक थप्पड़ मारा। चटाक! मांस हिल गया।

"यह मलाई है," राज ने कहा।

फिर विद्या के नितंब पर मारा। चटाक! वह सख्त था, कम हिला।

"और यह पत्थर है।"

"किसे खाओगे?" डॉली ने पीछे मुड़कर अपनी नशीली आंखों से पूछा।

"दोनों को," राज ने कहा। "बारी-बारी से।"

वह विद्या के पीछे गया। उसने प्रवेश किया।

धप्प!

विद्या चिल्लाई। राज ने उसे 10-15 तेज़ धक्के मारे।

फिर बाहर निकाला।

फिर वह डॉली के पीछे गया।

धप्प!

डॉली ने मजे से आह भरी। "आह... बड़ा है..."

राज ने उसे 10-15 धक्के मारे।

वह बारी-बारी से, एक मशीन की तरह, कभी विद्या को, कभी डॉली को पेल रहा था। वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।

"यह मेरा है!" वह विद्या को ठोकते हुए कहता।

"और यह भी मेरा है!" वह डॉली को ठोकते हुए कहता।

दोनों औरतें एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थीं। वे पसीने से लथपथ थीं। उनके बाल बिखर गए थे। काजल फैल गया था।

"राज... तुम जानवर हो..." विद्या सिसक रही थी। "रुकना मत... मेरी जान ले लो..."

"हमें मार डालो राज!" डॉली चिल्ला रही थी। "दोनों को एक साथ मार डालो!"

खेल अब खतरनाक और आदिम मोड़ पर था। राज का शरीर पसीने से नहाया हुआ था, लेकिन उसकी ऊर्जा कम नहीं हो रही थी। उसे इन दोनों को तोड़ना था, इनकी रूह तक पहुँचना था।

"बिस्तर पर चलो," राज ने आदेश दिया।

तीनों बिस्तर पर आ गए। बिस्तर की चादरें मुड़ चुकी थीं।

"विद्या," राज ने कहा, "पीठ के बल लेटो।"

विद्या लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला दीं।

"डॉली," राज ने कहा, "तुम विद्या के चेहरे पर बैठो। अपनी योनि उसके मुंह पर रखो।"

डॉली ने वैसा ही किया। उसने अपनी गीली, टपकती हुई योनि विद्या के मुंह पर रख दी। विद्या उसे चाटने लगी।

"और राज?" डॉली ने पीछे मुड़कर पूछा। "तुम कहाँ?"

"मैं तुम्हारे पीछे," राज ने कहा। "तुम्हारे गुदा में। पिछली बार वाला वादा पूरा करना है।"

डॉली की आंखें फैल गईं। "राज... वहां? अभी? विद्या के सामने?"

"हाँ," राज ने साइड टेबल से तेल की शीशी उठाई। "आज हवेली का हर दरवाज़ा खुलेगा। और सबके सामने खुलेगा।"

उसने तेल डॉली के नितंबों के बीच डाला।

विद्या नीचे से डॉली की योनि को चाट रही थी। डॉली को दोहरा मज़ा मिल रहा था—आगे से जीभ, पीछे से लिंग।

राज ने अपना लिंग डॉली के तंग गुदा द्वार पर सेट किया।

"सांस लो डॉली," उसने कहा और दबाव बनाया।

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली चीख पड़ी। उसने विद्या के बालों को नोच लिया। "फट गया! राज! बहुत मोटा है! उफ्फ... जान निकल रही है!"

विद्या नीचे दबी हुई थी, लेकिन वह डॉली का रस पी रही थी और उसकी चीखों का मज़ा ले रही थी।
 
राज ने एक झटका मारा। वह अंदर चला गया।

डॉली का शरीर अकड़ गया। गुदा की जकड़न ने राज को पागल कर दिया।

"ओह गॉड... डॉली..." राज ने पेलना शुरू किया। "तेरी पिछली गुफा तो कमाल है... जन्नत है..."

वह डॉली के गुदा को ठोक रहा था, और डॉली नीचे विद्या के मुंह को रगड़ रही थी।

यह एक मानव मूर्तिकला थी—हवस की मूरत।

स्लप-स्लप... पच-पच... आवाज़ें कमरे में गूंज रही थीं।

"विद्या! चाट मुझे! और जोर से!" डॉली दर्द और मजे में चिल्ला रही थी। "राज मुझे पीछे से फाड़ रहा है! आह! मजा आ गया! मेरी आंतें हिल रही हैं!"

राज ने डॉली की कमर पकड़ ली। वह उसे मशीन की तरह रगड़ रहा था।

कुछ देर बाद, राज ने निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

डॉली गिर पड़ी। वह पूरी तरह टूट चुकी थी।

"अब तुम," राज ने विद्या को खींचा।

विद्या डर गई। वह पीछे खिसकी। "नहीं राज... पीछे नहीं... मैं छोटी हूँ... मैं फट जाऊंगी..."

"शहर की लड़कियां सब कर सकती हैं," राज ने उसे पेट के बल लिटा दिया। "तुम्हें भाभी से कम रहना है क्या?"

यह बात विद्या को लग गई। "नहीं... डालो... जो करना है करो..."

राज ने तेल डाला और विद्या के छोटे, तंग, कुंवारे छेद में प्रवेश कर गया।

विद्या की चीख ने कमरे के कांच हिला दिए।

"माँ! मर गई! निकालो! खून निकल जाएगा! राज... प्लीज..."

"कुछ नहीं होगा," राज ने उसे दबाया। "सांस छोड़ो। मज़ा आएगा।"

राज ने उसे भी नहीं बख्शा। उसने विद्या को भी वही दर्द और मज़ा दिया जो उसने डॉली को दिया था। विद्या रो रही थी, लेकिन वह राज को छोड़ नहीं रही थी।

अब तीनों अपनी सीमा पर थे। राज का शरीर फटने वाला था।

राज ने विद्या को छोड़ दिया।

"अब साथ में," राज ने कहा। "फाइनल।"

उसने दोनों को बिस्तर के किनारे पर लिटा दिया। टांगें फैलाकर।

राज बिस्तर के नीचे, फर्श पर खड़ा हो गया।

वह पहले विद्या के पास गया। दो धक्के मारे।

फिर डॉली के पास। दो धक्के मारे।

वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।

"मैं आ रहा हूँ!" राज चिल्लाया। उसकी नसों में आग लग गई थी। "मैं फट रहा हूँ! संभालो मुझे!"

"कहाँ?" दोनों ने एक साथ पूछा, अपनी बाहें फैलाकर। "किसके अंदर?"

राज ने एक पल सोचा।

उसने डॉली को चुना। वह 'बड़ी रानी' थी, उसकी पहली खोज थी।

"डॉली..."

राज ने डॉली की टांगों को अपने कंधों पर रखा। उसने खुद को उसके अंदर (योनि में) गहराई तक धंसा दिया। विद्या ने अपना हाथ राज के लिंग पर रखा और उसे अंदर धकेलने में मदद की।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!"

राज ने एक लंबी, विजयी दहाड़ मारी।

उसने अपना सारा, ढेर सारा, तीन लोगों की हवस से जमा हुआ वीर्य डॉली के अंदर उड़ेल दिया।

एक... दो... तीन... चार... पांच...

डॉली ने उस बाढ़ को महसूस किया। उसकी कोख भर गई। उसे लगा जैसे ज्वालामुखी उसके अंदर फट गया हो।

"गर्म है... जला दिया... राज..." डॉली सिसकी।

राज ने बाहर निकाला।

उसने अपने लिंग को दबाया और बचे हुए कतरे विद्या के पेट, चेहरे और स्तनों पर छिड़क दिए।

"यह तुम्हारे लिए," राज ने कहा। "प्रसाद।"

विद्या ने अपनी उंगली से वीर्य उठाया और चाट लिया। "स्वादिष्ट..."

तीनों एक ढेर की तरह बिस्तर पर गिर पड़े।

कमरा पसीने, वीर्य, तेल और इत्र की गंध से भरा हुआ था। एसी की ठंडक भी उनकी गर्मी को कम नहीं कर पा रही थी।

डॉली राज के एक तरफ थी, विद्या दूसरी तरफ। दोनों ने राज को अपनी बांहों और टांगों में जकड़ रखा था।

राज ने दोनों को अपनी बांहों में भर लिया।

"आज..." राज ने हांफते हुए कहा, "आज मेरा जीवन सफल हो गया।"

डॉली ने राज के पसीने से भीगे सीने को चूमा। "तुम हमारे सुल्तान हो राज। आज तुमने हमें जीत लिया।"

विद्या ने राज की गर्दन पर काट लिया। "और हम तुम्हारी रखैलें। हमेशा के लिए।"

सुबह के 4 बज रहे थे।

राज ने करवट ली। उसने देखा कि उसकी दोनों रानियां सो रही थीं। उनके नंगे बदन चादर में लिपटे थे। डॉली का हाथ विद्या के स्तन पर था, और विद्या का पैर राज के पैर पर।

उसने अपनी काली डायरी उठाई जो साइड टेबल पर थी।

उसने कलम निकाली और कांपते हाथों से लिखा:

"आज की रात... रेशम और खादी का मिलन। एक बिस्तर, तीन जिस्म, और अनगिनत आहें। आज मैंने दो रानियों को एक साथ नापा है। और यह नाप... जिंदगी भर याद रहेगा।"

उसने डायरी बंद की और मुस्कुराया।

उसकी प्यास बुझ गई थी, लेकिन उसे पता था कि यह प्यास कल फिर जागेगी। और अब उसके पास इसे बुझाने के लिए पूरा एक 'हरम' था। राजगढ़ का दर्जी अब राजगढ़ का राजा बन चुका था।

◆◆◆
 
डॉक्टर का इलाज

शनिवार की रात। राजगढ़ के मुख्य बाज़ार में एक गहरा, भारी सन्नाटा पसर चुका था। दिन भर की धूल, गर्मी और शोरगुल के बाद, अब दुकानें अपनी पलकें मूंद चुकी थीं। शटर गिरने की धड़ाम-धड़ाम आवाज़ें अब थम गई थीं। आवारा कुत्ते सड़कों पर राज कर रहे थे और स्ट्रीट लाइट्स की पीली, बीमार सी रोशनी वीरान सड़कों पर लंबी, डरावनी परछाइयां बना रही थी।

राज आज शहर उसके घर नहीं गया था, वह अपनी दुकान 'अप्सरा लेडीज बुटीक' का शटर गिराकर ताला लगा रहा था। उसके शरीर में एक मीठा दर्द था। डॉली और विद्या के साथ बिताई रातों, और रिंकी के साथ हुए जंगलीपन ने उसे शारीरिक रूप से निचोड़ दिया था, लेकिन मानसिक रूप से वह एक विजेता महसूस कर रहा था।

उसका प्लान था कि वह दुकान के ऊपर बने अपने छोटे से कमरे में जाएगा, ठंडी बीयर पिएगा और अपनी डायरी में आज का हिसाब लिखकर सो जाएगा।

उसने शटर का ताला चेक किया, उसे खींचकर देखा और पलटने ही वाला था।

तभी... अंधेरे में एक परछाई उसकी तरफ बढ़ी।

सन्नाटे में ऊँची हील्स की खट-खट-खट की आवाज़ गूंजी। यह आवाज़ किसी साधारण गाँव की औरत की चप्पलों की नहीं थी, यह शहर की सैंडल की आवाज़ थी।

"शर्मा जी? दुकान बंद कर दी? इतनी जल्दी?"

एक भारी, रौबदार लेकिन बेहद नशीली और गहरी आवाज़ ने राज को चौंका दिया। उसने मुड़कर देखा।

सामने डॉ. शाजिया खड़ी थीं।

शाजिया। राजगढ़ के सरकारी अस्पताल की सीनियर लेडी डॉक्टर और कस्बे की सबसे प्रतिष्ठित महिला। उम्र करीब 36-37 साल। वह गाँव की आम औरतों जैसी घूंघट वाली या शरमाने वाली नहीं थी।

वह शहर से पढ़कर आई थी, तलाकशुदा थी और अकेले सरकारी क्वार्टर में रहती थी। उसका व्यक्तित्व ऐसा था कि अच्छे-अच्छे मर्द उसके सामने नज़रें झुका लेते थे। लेकिन आज... आज वह एक अलग ही रूप में थी। आज वह डॉक्टर नहीं, एक औरत थी।

उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन नहीं पहना था। उसने एक बेहद टाइट, मरून रंग का स्लीवलेस टॉप और काली फॉर्मल पैंट पहनी थी। यह कपड़े गाँव के हिसाब से बहुत बोल्ड और आधुनिक थे, लेकिन रात के अंधेरे में उसे देखने वाला कोई नहीं था—सिवाय राज के।

राज की नज़रें शाजिया पर जम गईं। और जमतीं भी क्यों न?

शाजिया का शरीर... वह किसी भरी-पूरी, उफनती हुई नदी जैसा था जो किनारों को तोड़ने के लिए बेताब हो। वह डॉली से भी ज्यादा भारी, मांसल और 'ठोस' थी।

उसके स्तन... वे विशाल थे। कम से कम 40 या 42 इंच के। वे इतने भारी, बड़े और भरे हुए थे कि उसका टाइट मरून टॉप उन्हें संभाल नहीं पा रहा था। वे गुरुत्वाकर्षण की वजह से लटके हुए नहीं, बल्कि एक भारी दबाव के साथ आगे की तरफ निकले हुए थे, जैसे दो बड़े तोप के गोले हों। टॉप का कपड़ा उनके ऊपर तना हुआ था।

और उसका पिछवाड़ा... राज की नज़रें नीचे फिसलीं। काली पैंट में उसके नितंब किसी पहाड़ की तरह उभरे हुए थे। वे इतने चौड़े और मांसल थे कि पैंट का कपड़ा वहां तनकर फटने को तैयार था। उसकी जांघें किसी खंभे जैसी मज़बूत थीं।

"डॉक्टर साहिबा?" राज ने चाबी मुट्ठी में भींच ली। "आप इस वक़्त? सब ठीक तो है? कोई एमरजेंसी?"

शाजिया ने अपने भारी स्तनों के नीचे अपने दोनों हाथ बांध लिए। इस हरकत से उसके स्तनों का उभार और भी ज्यादा ऊपर उठ गया और वे एक-दूसरे से सट गए, जिससे बीच में एक गहरी खाई बन गई। वह राज के करीब आई। इतनी करीब कि राज को उसके महंगे क्लिनिकल इत्र, सैनिटाइज़र और एक दबी हुई, गरम औरत की गंध आने लगी।

"ठीक कुछ नहीं है राज," शाजिया ने कहा। उसकी आवाज़ में एक शिकायत थी। "तुम्हारी दुकान से एक टॉप लिया था। यह वाला..." उसने अपने मरून टॉप की छाती की तरफ इशारा किया। "फिटिंग बहुत बेकार है। मेरा दम घुट रहा है। साँस नहीं ली जा रही।"’

राज ने देखा। टॉप सचमुच बहुत टाइट था। उसके स्तनों के मांस को कपड़ा बुरी तरह काट रहा था, खासकर बगलों के पास मांस बाहर छलक रहा था।

"यह तो रेडीमेड था मैम," राज ने अपनी नज़रें उसके क्लीवेज से हटाने की कोशिश करते हुए कहा। "इसमें सिलाई की गुंजाइश कम है। और आपका... आपका नाप थोड़ा..."

"बड़ा है?" शाजिया ने उसकी बात पूरी की। उसने राज की आँखों में सीधे देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो मरीज को नहीं, बल्कि एक 'शिकार' को देखती है। "हाँ, मेरा साइज़ बड़ा है। बहुत बड़ा। और मुझे अभी तक कोई ऐसा दर्जी नहीं मिला जो मेरे 'साइज़' को संभाल सके। सब छोटे पड़ जाते हैं।"

बात करते-करते शाजिया की नज़रें नीचे फिसलीं। राज ने एक टाइट नीली जींस और टी-शर्ट पहनी थी।

और वहां... राज की जींस के बीचो-बीच, एक विशाल उभार साफ दिखाई दे रहा था। डॉली, विद्या और रिंकी की यादों, और अब शाजिया के इस भारी शरीर को देखकर उसका 'हथियार' अपनी म्यान में तड़प रहा था। वह उभार इतना बड़ा, लंबा और स्पष्ट था कि उसे अनदेखा करना नामुमकिन था। जींस का कपड़ा वहां तंबू की तरह तना हुआ था।

शाजिया की नज़रें उस उभार पर चिपक गईं। उसकी पुतलियां फैल गईं। एक डॉक्टर होने के नाते उसे मानव शरीर रचना का ज्ञान था, लेकिन जींस के ऊपर से दिखने वाला वह आकार किसी सामान्य भारतीय मर्द का नहीं लग रहा था। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ।

"ओह..." शाजिया के मुँह से अनजाने में, एक लंबी साँस के साथ निकल गया। उसने अपनी जीभ से अपने सूखे होंठों को गीला किया। "लगता है तुम्हारे पास... 'औजार' बहुत बड़े हैं। सिलाई के लिए। काफी... हैवी मशीनरी है।"

राज ने उसकी नज़रों का पीछा किया और समझ गया कि डॉक्टर साहिबा कहाँ देख रही हैं। उसने शर्माने के बजाय अपनी कमर को थोड़ा आगे कर दिया।

"औजार तो बड़े हैं डॉक्टर साहिबा," राज ने भारी आवाज़ में कहा, "लेकिन इस्तेमाल तभी करता हूँ जब मरीज को सचमुच ज़रूरत हो। और जब मैं नाप लेता हूँ, तो इंच-इंच का हिसाब रखता हूँ।"

शाजिया ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके बीच सिर्फ इंच भर की दूरी थी।

"मरीज बहुत सीरियस हालत में है राज," उसने फुसफुसाया। उसकी गर्म साँसें राज के चेहरे पर लग रही थीं। "साँस नहीं आ रही। घुटन हो रही है। और मुझे इलाज... अभी चाहिए। इसी वक्त।"

सड़क सुनसान थी। राज ने एक पल सोचा। फिर उसने ताला खोला और शटर को आधा ऊपर उठाया।

"अंदर आ जाइए," राज ने कहा। "देखते हैं क्या ढीला करना है और क्या कसना है।"

शाजिया शटर के नीचे से झुककर अंदर गई। झुकते वक़्त उसका विशाल पिछवाड़ा राज की आँखों के सामने तन गया। पैंट का कपड़ा उसकी दरार में फंस गया था। वह नज़ारा इतना कामुक था कि राज का लिंग जींस के अंदर एक झटके के साथ और सख्त हो गया।‘

राज ने अंदर जाकर शटर गिरा दिया।

धड़ाम!

बाहर की दुनिया, नैतिकता, अस्पताल और समाज... सब शटर के उस पार रह गए।

अंदर सिर्फ एक भूखा दर्जी और एक प्यासी, भरी-पूरी डॉक्टर थी।

दुकान के अंदर एसी बंद था, लेकिन राज ने उसे तुरंत चालू नहीं किया। माहौल में गर्मी थी, और वह चाहता था कि यह गर्मी पसीने में बदल जाए। उसने सिर्फ़ एक मद्धम पीली लाइट जलाई, जिससे दुकान में एक सुनहरी, रहस्यमयी चमक आ गई।
 
शाजिया ट्रायल रूम के पास खड़ी थी। पीली रोशनी में उसका मरून टॉप और गोरी, भरी हुई बांहें चमक रही थीं। वह हाँफ रही थी—शायद टॉप के कसाव से, या शायद उस उत्तेजना से जो राज के 'उभार' को देखकर जागी थी।

राज उसके पास गया।

"दिखाइए," राज ने कहा। "कहाँ दिक्कत है?"’

"यहाँ..." शाजिया ने अपने दोनों हाथों से अपने भारी स्तनों को नीचे से पकड़ा और ऊपर उठाया। यह हरकत इतनी कामुक थी कि राज का गला सूख गया। "यह हिस्सा... यहाँ कपड़ा बहुत चुभ रहा है। मेरे साइज़ के कपड़े मिलते ही नहीं। सब छोटे पड़ जाते हैं।"

राज ने अपना हाथ बढ़ाया। उसने पेशेवर तरीके से छूने का नाटक किया, लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने शाजिया के स्तनों के साइड में, जहाँ सिलाई थी, वहां हाथ रखा।

स्पर्श होते ही शाजिया के मुँह से एक 'सी...' की आवाज़ निकली।

राज का हाथ उसके स्तन के मांसल हिस्से को छू रहा था। वह मांस बहुत गर्म, नरम और लचीला था। डॉक्टर होते हुए भी उसका शरीर मक्खन जैसा था।

"बहुत टाइट है," राज ने कहा। "साँस लीजिए।"

शाजिया ने गहरी साँस ली। उसका सीना और फूल गया। टॉप की सिलाई चरचराने लगी।

राज अब उसके बिल्कुल करीब था। उसका लिंग उसकी जींस में तंबू बनाकर खड़ा था और वह शाजिया के पेट को लगभग छू रहा था।

शाजिया ने नीचे देखा। वह 8 इंच का राक्षस अब और भी गुस्से में लग रहा था। वह हिल रहा था।

"राज..." शाजिया ने अपना डॉक्टर वाला सख्त लहज़ा छोड़ दिया। उसकी आवाज़ में एक औरत की तड़प आ गई। "सच बताना... यह असली है?"

उसने राज के क्रॉच की तरफ इशारा किया। "या तुमने अंदर कुछ रखा है?"

राज ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने शाजिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने लिंग पर रख दिया।

शाजिया की हथेली उस पत्थर जैसे सख्त उभार पर पड़ी।

"हे भगवान..." शाजिया की आँखें फट गईं। उसने उसे मुट्ठी में भरने की कोशिश की, लेकिन जींस के कपड़े के बावजूद वह उसकी मुट्ठी से बाहर था। उसकी मोटाई ने उसकी हथेली को भर दिया।

"यह तो... यह तो लोहे जैसा है। और इतना लंबा?" उसने दबाकर देखा। "मैंने अपनी मेडिकल बुक्स में भी ऐसा साइज़ रेयर ही देखा है। यह तो... यह तो अबनॉर्मल है।"

"किताबों में सब सच नहीं होता डॉक्टर," राज ने उसके कान के पास झुककर कहा। "हकीकत ज्यादा भयानक होती है। और यह सिर्फ देखने के लिए नहीं है।"

शाजिया ने राज के लिंग को जींस के ऊपर से ही रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी साँसें बेकाबू हो रही थीं। उसका हाथ ऊपर-नीचे चल रहा था।

"मैं तलाकशुदा हूँ राज," उसने अचानक कबूल किया, उसकी आवाज़ भर्रा गई। "पाँच साल हो गए। कोई मर्द मेरी ज़िंदगी में नहीं आया। मैं बस मरीजों को देखती हूँ, घर आती हूँ और सो जाती हूँ। कॉलेज के दिनों में... मैंने ब्लू फिल्म्स में ऐसे साइज़ देखे थे। काले, मोटे, लंबे। मेरी फंतासी थी कि कभी कोई ऐसा मर्द मिले जो मुझे पूरा भर दे। जो मेरी आंतों तक पहुँच जाए। लेकिन मेरे पति..." उसने एक कड़वी हँसी हंसी, "...वो तो बच्चे थे। कुछ महसूस ही नहीं होता था।"

उसने राज की आँखों में देखा। उसकी आँखों में आंसू और हवस दोनों थे।

"क्या तुम मुझे भर सकते हो? क्या तुम मेरा वो कॉलेज वाला सपना पूरा कर सकते हो? क्या यह..." उसने लिंग को दबाया, "...मेरी प्यास बुझा पाएगा?"

राज ने उसे ट्रायल रूम के अंदर धकेल दिया।

"सपना नहीं," राज ने कहा। "आज हकीकत दिखाऊँगा। और ऐसी हकीकत जो तुम्हें हमेशा याद रहेगी।"

उसने शाजिया को आईने के सामने खड़ा कर दिया।

"टॉप उतारो," राज ने आदेश दिया। "मुझे बाधा नहीं चाहिए।"

शाजिया ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपने हाथ ऊपर किए और उस तंग टॉप को खींचकर उतार दिया।

अंदर उसने एक काले रंग की, बहुत बड़ी और मज़बूत ब्रा पहनी थी। उसके स्तन ब्रा के कप्स से बाहर छलक रहे थे। वे इतने बड़े थे कि राज को लगा वह उनमें डूब जाएगा।

राज ने ब्रा के हुक खोले।

खट!

ब्रा हट गई।

शाजिया के विशाल, भारी और गोरे स्तन आज़ाद होकर नीचे झूल गए। वे बिल्कुल वैसे ही थे जैसे उसने सोचा था—भारी, रसीले और पके हुए। उनके निप्पल बहुत बड़े और चॉकलेटी रंग के थे, जो उत्तेजना से सख्त हो गए थे।

"माई गॉड..." राज घुटनों के बल बैठ गया। वह उस नज़ारे को पी रहा था। "यह तो खजाना है। डॉक्टर... तुम तो पूरी की पूरी कामसूत्र हो।"

उसने अपने दोनों हाथों से उन स्तनों को पकड़ा। वे इतने भारी थे कि राज को उन्हें उठाने के लिए ताकत लगानी पड़ी। उसने अपना चेहरा उनके बीच गड़ा दिया।

शाजिया ने राज का सिर पकड़ लिया और उसे अपनी छाती में भींच दिया।

"खा जाओ इन्हें..." शाजिया सिसकी। "काट लो। नोच लो। ये बहुत दिनों से तरस रहे हैं। किसी ने इन्हें छुआ तक नहीं है।"

राज ने पागलों की तरह उसे चूसना शुरू किया। वह उसके पसीने को चाट रहा था, उसके मांस को दांतों से हल्का-हल्का काट रहा था।

शाजिया मज़े से चिल्ला रही थी। दुकान बंद थी, इसलिए उसे अपनी आवाज़ दबाने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

"आह! राज! और जोर से! जानवर बन जाओ! भूल जाओ कि मैं डॉक्टर हूँ!"

राज ने उसकी पैंट का बटन खोला और उसे नीचे खींच दिया। पैंटी भी साथ में उतर गई।
 
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