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Adultery गुज़ारिश पार्ट 2

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गुज़ारिश पार्ट 2

#१

“मैं जिस दिन भुला दू , तेरा प्यार दिल से वो दिन आखिरी हो मेरी जिन्दगी का ” फूली सांसो के बीच हौले हौले इस गाने को गुनगुनाते हुए मैं तेजी से साइकिल के पेडल मारते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहा था .होंठो पर जीभ फेरी तो पाया की अभी तक बर्फी- जलेबियो की मिठास चिपकी हुई थी . मौसम में वैसे तो कोई ख़ास बात नहीं थी पर मई की गर्म रात में पसीने से भीगी मेरी पीठ से चिपकी शर्ट परेशान करने लगी थी .

“न जाने कितना समय हुआ होगा ” मैंने अपने आप से कहा और दो चार गालिया अपने दोस्तों को दी जो मुझे छोड़ कर न जाने कहाँ गायब हो गए थे . दरसल हम लोग पडोसी गाँव में दावत में आये थे.

“सुबह हरामखोरो को दो चार बाते तो सुना ही दूंगा. ” कहते हुए मैंने गाँव की तरफ जाने वाला दोराहा पार ही किया था की पट की तेज आवाज ने मेरे माथे पर बल डाल दिए.

“इसे भी अभी धोखा देना था. ” मैंने साइकिल से निचे उतरते हुए कहा टायर पंक्चर हो गया था . एक पल में मूड ख़राब हो गया . कहने को तो गाँव की दुरी कोई दो - तीन कोस ही थी पर अचानक से दुरी न जाने कितनी ज्यादा लगने लगी थी . पैदल घसीटते हुए साइकिल को मैं चांदनी रात में गाँव की तरफ चल रहा था .

धीमी चलती हवा में कच्चे सेर के दोनों तरफ लगे सीटे किसी लम्बे कद वाले आदमियों की तरह लहरा रहे थे .दूर कहीं कुत्ते भोंक रहे थे . ऐसे ही चलते चलते मैं नाहर के पुल को पार कर गया था .मेरी खड खड करती साइकिल और गुनगुनाते हुए मैं दोनों चले जा रहे थे की तभी अचानक से मेरे पैर रुक गए .अजीब सी बात थी ये इतनी रात में मेरे कानो में इकतारे की आवाज आ रही थी .इस बियाबान में इकतारे की आवाज , जैसे बिलकुल मेरे पास से आ रही हो . मुझे कोतुहल हुआ .

मैंने कान लगाये और ध्यान से सुनने लगा. ये इकतारे की ही आवाज थी . बेशक मुझे संगीत का इतना ज्ञान नहीं था पर इस गर्म लू वाली रात में किसी शर्बत सी ठंडक मिल जाना ऐसी लगी वो ध्वनी मुझे . जैसे किसी अद्रश्य डोर ने मुझे खींच लिया हो . मेरे पैर अपने आप उस दिशा में ले जाने लगे जो मेरे गाँव से दूर जाती थी . हवाओ ने जैसे मुझ से आँख मिचोली खेलना शुरू कर दिया था . कभी वो आवाज बिलकुल पास लगती , इतनी पास की जैसे मेरे दिल में ही हो और कभी लगता की कहीं दूर कोई इकतारा बजा रहा था .

पथरीला रास्ता कब का पीछे छुट गया था . नर्म घास पर पैर घसीटते हुए मैं पेड़ो के उस गुच्छे के पास पहुँच गया था जिस पर वो बड़ा सा चबूतरा बना था जिसके सहारे से पहाड़ काट कर बनाई सीढिया ऊपर की तरफ जाती थी .साइकिल को वही खड़ी करके मैं सीढिया चढ़ कर ऊपर पहुंचा तो देखा की सब कुछ शांत था ,ख़ामोशी इतनी की मैं अपनी उखड़ी साँसों को खूब सुन पा रहा था . मेरे सामने बुझता धुना था जिसमे शायद ही कोई लौ अब बची थी . सीढिया चढ़ने की वजह से गला सूख गया था तो मैं टंकी के पास पानी पीने गया ही था की मेरे कानो से वो आवाज टकराई जिसे मैं लाखो में भी पहचान सकता था .

“उसमे खारा पानी है , ले मेरी बोतल से पी ले. ”

मैं पलटा हम दोनों की नजरे मिली और होंठो पर गहरी मुस्कान आ गयी .

“तू यहाँ कैसे ” मैंने उसके हाथ से पानी की बोतल लेते हुए कहा .

“आज पूर्णमासी है न तो नानी के साथ कीर्तन में आई थी . अभी ख़तम ही हुआ है , मेरी नजर तुझ पर पड़ी तो इधर आई पर तू इधर कैसे ” उसने कहा

मैंने उसे बताया . मेरी बात सुनकर वो बोली- कीर्तन तो दो- ढाई घंटे से हो रहा पर इकतारा कोई नहीं बजा रहा था .मुझे मालूम है ये तेरा बहाना ही होगा वैसे भी तू तो भटकता ही रहता है इधर उधर

मैं- तुझे जो ठीक लगे तू समझ

“रुक मैं तेरे लिए प्रसाद लाती हूँ , ये बोतल पकड़ तब तक ” उसने कहा और तेजी से मुड गयी . मैंने बोतल का ढक्कन खोला और पानी से गले को तर करने लगा .

आसमान में पूनम का चाँद शोखियो से लहरा रहा था . काली रात और चमकता चाँद कोई शायर होता तो अब तक न जाने क्या लिख चूका होता , ये तो मैं था जो कुछ कह नहीं पाया.

“अब ऊपर क्या ताक रहा है , चलना नहीं है क्या ” उसने एक बार मेरे ख्यालो पर दस्तक दी .

मैं- हाँ चलते है .

उसने एक मुट्टी प्रसाद मेरी हथेली पर रखा और हम सीढियों की तरफ चलने लगे.

मैं- नानी कहा है तेरी .

वो- आ रही है मोहल्ले की औरतो संग , मैंने बोल दिया की तेरे संग जा रही हूँ .

मैं- ठीक किया.

“बैठ ” मैंने साइकिल पर चढ़ते हुए कहा

वो- पैदल ही चलते है न

मैं- जैसा तू कहे

वो मुस्कुरा पड़ी , बोली- कभी तो टाल दिया कर मेरी बात को .

मैं- टाल जो दी तो फिर वो बात, बात कहाँ रहेगी .

“बातो में कोई नहीं जीत सकता तुझसे ” वो बोली.

मैं- ऐसा बस तुझे ही लगता है.

बाते करते करते हम लोग अपनी राह चले जा रहे थे. कच्चे रस्ते पर झूलते पेड़ अब अजीब नहीं लग रहे थे. न ही खामोश हवा में कोई शरारत थी .

“बोल कुछ , कब से चुपचाप चले जा रहा है ” उसने कहा

मैं- क्या बोलू, कुछ है भी तो नहीं

वो- क्लास में तो इतना शोर मचाते रहता है , अभी कोई देखे तो माने ही न की वो तू है .

मैं मुस्कुरा दिया .

“बर्फी खाएगी ” मैंने पूछा उससे

“बर्फी , कहाँ से लाया तू ” उसने कहा

मैं- पड़ोस के गाँव में दावत थी , दो चार टुकड़े जेब में रख लिए थे .

वो- पक्का कमीना है तू . मुझे नहीं खानी कहीं रात में कोई भूत न लग जाये मुझे

मैं- तू खुद भूतनी से कम है क्या

कहके जोर जोर से हंस पड़ा मैं

वो- रुक जरा तुझे बताती हूँ .

मेरी पीठ पर एक धौल जमाई उसने .

मैंने जेब से बर्फी के टुकड़े निकाले और उसकी हथेली पर रख दिए.

“अच्छी है , ” उसने चख कर कहा .

मैं- वो तेरे मामा से बात की तूने

वो- तू खुद ही कर ले न

मैं- मेरी हिम्मत कहाँ उस खूसट के आगे मुह खोलने की

वो- कितनी बार कहा है मामा को खूसट मत बोला कर .

मैं- ठीक है बाबा. पर तू बात कर न .

वो- मैंने तुझसे कहा तो है , बाजार चल मेरे साथ .

मैं- तू जानती है न , वैसे ही तू बहुत करती है मेरे लिए .

वो- तो ये भी करने दे न ,

मैं- इसलिए तो कह रहा हूँ, तेरे मामा से बोल दे , कैंटीन में रेडियो थोडा सस्ता मिल जायेगा. कुछ पैसे है मेरे पास कुछ का जुगाड़ कर लूँगा.

“पर मुझसे पैसे नहीं लेगा. हैं न , कभी तो अपना मानता है और कभी एक पल में इतना पराया कर देता है . जा मैं नहीं करती तुझसे बात ” उसने नाराजगी से कहा .

फिर मैंने कुछ नहीं कहा. जानता था एक बार ये रूस गयी तो फिर सहज नहीं मांगेगी. हालाँकि हम दोनों जानते थे हालात को , ऐसे ही ख़ामोशी में चलते चलते गाँव आ गया. मैंने उसे उसके घर के दरवाजे पर छोड़ा और अपने घर की तरफ साइकिल को मोड़ दिया. घर, अपना घर .............................
 
#2

आँख थोड़ी देर से खुली .सूरज चढ़ आया था. . मैंने कपडे बदले और रसोई की तरफ गया , वहां पर ताला लगा था . मेरी नजर छींके पर गयी जहाँ पर कपडे में तीन रोटिया लिपटी पड़ी थी .

“हम्म,” एक गहरी साँस ली और सूखी रोटी का एक टुकड़ा चबाया. लोगो से सुना था की जब रोज़ कोई चीज़ अपने साथ हो तो उसकी आदत हो जाती है पर फिर ये रोटी के सूखे टुकड़े आसानी से गले के निचे क्यों नहीं उतरते थे . ऐसा नहीं था की मुझे शिकवे नहीं थे पर शिकायत करते भी तो किससे .

कक्षा में आज थोड़ी देर से पहुंचा, मास्टर की दो बात सुनी और फिर अपने काम में लग गया. दोपहर में मालूम हुआ की स्टूडेंट्स का एक टूर करवा रहे है उदयपुर जाने के लिए . मेरे मन में भी चाव सा उठा . एक पल की उस तम्मना को दिल की जिस गहराई में मैंने महसूस किया वो बता नहीं सकता था .

“मास्टर जी, कितना खर्चा आएगा इस टूर का ” मैंने पूछा

मास्टर- 800 रूपये

“आठ सौ. ” मैंने एक गहरी साँस ली .

दिल में एक आस लिए शाम को मैं चाची के पास गया.

“चाची , मुझे कुछ पैसे चाहिए थे . ” मैंने कहा

चाची - किसलिए

मैंने अपना प्रयोजन बताया उसे.

चाची- आठ सौ, जानता भी है कितने होते है .और बड़ा आया लाट साहब जायेगा घुमने, मैं तो दिन रात काम करके टूटी पड़ी हूँ, और इसे पैसे बर्बाद करना है . कोई जरुरत नहीं है कही जाने की अगले माह गाँव में मेला लगेगा उसमे चक्कर लगा आना. वैसे भी फिर खेत कौन देखेगा.घर के काम तो होते नहीं परसों तुझसे कहा था की गेहू चक्की पर दे आ पर वो तो हुआ नहीं तुझसे.

मैं- अभी कट्टा दे आता हूँ चाची .

मैंने गेहूं का कट्टा साइकिल पर लादा और दरवाजे के पास पहुंचा ही था की पीछे से मैंने चाची की आवाज सुनी जो मुझे ही कोस रही थी . एक नजर ऊपर आसमान पर डाली और मैं आगे बढ़ गया .ऐसा नहीं था की मुझे कोफ़्त नहीं होती थी चाची के इस रवैये से पर पिछले कुछ महीनो से तो जैसे हद्द हो गयी थी . मुझे सुनाने का कोई मौका नहीं छोडती थी वो .

“आठ सौ रुपैया , ” मैंने एक गहरी सांस ली और अपना हिसाब लगाने लगा. सब कुछ जोड़ कर मेरे पास 127 रूपये थे. तालाब किनारे बैठे बैठे मेरी गुना भाग जारी थी .

“ओ क्या सोच रहा है ”

मैंने पलट कर देखा. पानी का मटका लिए वो मेरी ही तरफ आ रही थी .

“कुछ नहीं सरकार ” मैंने कहा .

“तू क्या सोचता है , मुझसे छुपा लेगा अपने मन की बात , तुझे तुझसे ज्यादा जानती हूँ ” उसने मेरे पास बैठते हुए कहा.

मैं- तो तू ही बता मैं क्या करू. मेरे हालात तुझसे छुपे तो नहीं , चाची से पैसे मांगे थे उदयपुर जाने के लिए उसने झट से मना कर दिया.

“गलती तेरी भी तो है , कब तक चुप रहेगा. कभी न कभी अपने हक़ की बात करनी ही होगी न तुझे,जो व्यवहार तेरे साथ करती है वो मैं होती तो उसका मुह तोड़ देती ” उसने कहा .

मैं- जानती है सुख की सबसे बेकार बात क्या होती है , सुख के दिन ख़त्म हो जाते है , पर दुःख की भी एक अच्छाई होती है दुःख के दिन भी बीत जाते है.

वो- सुन तू फ़िक्र मत कर तू उदयपुर जरुर जायेगा, पैसे का इंतजाम हो जायेगा.

मैं- कैसे

उसने अपनी चांदी की पायल उतारी और मेरे हाथ में रख दी.

“इसे बेच देते है ” बोली वो .

एक नजर मैंने उसकी हथेली पर रखी पायल को देखा और एक नजर मैंने मेरी मजबूरियों को देखा.ना जाने कब आँख से गिरे पानी के कतरे उसकी हथेली को भिगो गए. उसने कस के मेरे हाथ को थाम लिया. और मेरे काँधे पर अपना सर टिका दिया.

“बहुत याद आती है माँ-बाप की मुझे , बापू कहता था चाचा चाची का उतना ही मान रखना जितना हमारा करता, कभी भी इनका कहा टालना मत , बस वही तो कर रहा हूँ, तू नहीं जानती , मैं हर रोज़ मरता हूँ अपने ही घर में. चाची अपने बच्चो को इतना लाड करती है , उनकी हर फरमाइश पूरी करती है . मुझे कभी गले नहीं लगाती, गले लगाना तो दूर, कभी सर पर हाथ भी नहीं फेरा. बापू कहता था थोडा बड़ा होजा मेरे पूत फिर तुझे फौज में ले चलूँगा. 9 साल हो गए देखते देखते बापू ही नहीं आया फौज से वापिस . क्या करू मैं तू बता. गर्म रोटी मेरे भाग में उस दिन होती है जब किसी और के घर मैं जीमने जाता हु तू कहती है की मैं कहता नहीं , किस से कहूँ चाचा से , उसे नहीं पता क्या उसके घर में क्या हालात है मेरे ” मेरी रुलाई छुट पड़ी .

“मैं जानती हूँ तेरे हालात , देखना एक दिन आयेगा. ये सब झुक कर सलाम करेंगे तुझे , ये रब्ब सब देख रहा है ” उसने कहा .

“छोड़ इन बातो को , देर हो रही है तू जा घर ” मैंने कहा

वो- तू भी चल

मैं- आता हूँ थोड़ी देर बाद.

रात जब गहराने लगी तो मैं भी थके कदमो से घर की तरफ चल दिया. मोहल्ले में जाके देखा अलग ही तमाशा चल रहा था . पडोसी जो नाते में मेरा ताऊ लगता था , अपनी घर वाली को दारू पीकर पीट रहा था . गालिया दे रहा था . मोहल्ले वाले बजाय उनको अलग करने के खड़े होकर तमाशे का मजा ले रहे थे .

“ओ ताया , बहुत हुआ अब बस करो छोड़ दे ताई को ” मैंने कहा

ताऊ- न, आज न छोडू इस कुतिया ने मेरी इज्जत तार तार कर दी है .

मैं-कोई न अन्दर चल के बात कर ,

मैंने ताऊ को अन्दर की तरफ खिसकाया और कमरे में ले आया.

मैं- ताया, दुनिया तमाशा देख रही है . तेरी ही तो तोर हलकी होती है न ताऊ- तोर बची ही नहीं इस रंडी ने सब बर्बाद कर दिया .

मैं- सो जा ताऊ, सुबह आराम से बात करना ताई से जो भी बात है .

ताऊ- तू कहता है तो सुबह देखूंगा इसे .

ताऊ ने जेब से दारू का पव्वा निकाला और खींच गया उसे, थोड़ी देर बाद बडबडाते हुए ताऊ पलंग पर लुढक गया .मैंने कमरे की कुण्डी लगाई और फिर ताई को आँगन में ले आया. उसे पानी पिलाया .

मैं- न रो ताई.

ताई- मेरे तो नसीब में ही रोना लिखा है .

मैं- हुआ क्या .

ताई- ये तो सारा दिन दारू पीकर पड़ा रहता है . घर कैसे चले . तुझे तो मालूम है ही हमारा हाल. मजदूरी से आते आज देर हो गयी तो उल्टा सीधा बोलने लगा.

मैं- कोई न तू हाथ मुह धो ले. खाना खा और आराम कर . सब ठीक होगा.

मैंने उसे छोड़ा और अपने घर आ गया. पुरे घर में अँधेरा था बस चाची के कमरे में रौशनी थी . प्यास के मारे गला सूख रहा था . मैं मटके के पास गया गिलास अपने हलक में उडेला ही था की मेरी नजर खिड़की जो की थोड़ी सी खुली हुई थी उस से अन्दर की तरफ गयी और जो मैंने देखा देखता ही रह गया.
 
#3

चाची के बदन पर लहंगा ही था , ऊपर से पूरी नंगी वो . सर के खुल्ले बाल जो बार बार उसके वक्ष स्थल पर आ रहे थे . चाची के चेहरे पर दुनिया भर की शिकायते थी. पर मेरी नजर उन उन्नत छातियो पर थी जिन्हें मैं इतना पास से देख रहा था . बेशक मैंने अभी पानी पीया था पर होंठो पर खुरदुरापन महसूस किया मैंने. वो चाचा से झगड़ रही थी .

“खुद तो दो मिनट में ही ठन्डे हो जाते हो , मैं हमेशा की तरह रह जाती हूँ ,” चाची ने कहा

चाचा- हो जाता है कभी कभी जल्दी . इस बात का क्या बतंगड़ बनाना.

चाची- हाँ, सारा दोष मेरा ही तो है .

“जो जा अब कल और जोर से रगड़ दूंगा तुझे. ” चाचा ने जवाब दिया और पीठ दिवार की दूसरी तरफ मोड़ ली. चाची ने भी ब्लाउज पहन लिया और चाची के पास आकर लेट गयी.

“सुनो , एक बात करनी थी ” चाची ने कहा

चाचा- हाँ बोल.

चाची- वो भतीजा उदयपुर घुमने जाना चाहता है .

चाचा- तूने क्या कहा

मैं- टाल दिया . पर अब वो बड़ा हो रहा है , उसकी आँखों में शिकायते देखती हूँ मैं.

चाचा- हम्म

“क्या हम्म, तुम तो सुबह निकल जाते हो .इस घर में मैं रहती हूँ, ये जो दुश्वारिया उसके साथ करती हूँ मैं, वो मुह से कभी नहीं बोलता पर उसकी आँखे जो सवाल करती है मैं नजरे मिला नहीं पाती उस से ” चाची ने कहा

चाचा- सो जा, कल हम इस बारे में तसल्ल्ली से बात करेंगे. जिंदगी में वैसे ही कुछ ठीक नहीं चल रहा है , वो जब्बर ने अपनी दो एकड़ जमीन दबा ली है . पंच-सरपंचो की भी नहीं मानता वो.

चाची- पुलिस की मदद क्यों नही लेते

चाचा- पुलिस के साथ बैठ के तो दारू पीता है वो . दौर था जब हमारी मर्जी के बिना गाँव में पत्ता तक नहीं हिलता था और आज देखो .

चाची- कमी तो तुम्हारी ही है , जो इस विरासत इस घर के रुतबे को थाम नहीं पाए.

चाचा- इतने साल हो गए तू आज तक समझ नहीं पायी . मेरी जगह कोई और होता तो न जाने...........खैर , रात बहुत हुई सो जा .

चाचा ने बात अधूरी छोड़ दी . वो दोनों तो सो गए थे पर मेरे दिल में एक हूक जगा गए , पहली बार ऐसा लगा की जिंदगी ऐसी भी नहीं थी जैसा मैं सोचता था . पर मेरी और इस घर की जिन्दगी ऐसी क्यों थी अब मुझे ये देखना था . जब्बर ने हमारी जमीन दबा ली थी ये बात भी मुझे मालूम हुई और मैंने सोच लिया की जमीन पर मैं वापिस कब्ज़ा कर लूँगा.

अलसाई भोर से पहले ही मैं उठ गया था . हाथ मुह धोकर मैं सीधा मंदिर की तरफ निकल गया . ऐसा नहीं था की पूजा-पाठ में मेरी बहुत दिलचस्पी थी पर मेरे दिल में हसरत रहती थी , रीना से मिलने की . हर सुबह - शाम वो मंदिर आती, दर्शन करती , तालाब से पानी भरती . और मैं बस उसे देखता. सुबह की लाली में उसे देखना किसी तीर्थ से कम नहीं था मेरे लिए.

थोड़ी देर हम सीढियों पर बैठते और फिर हमारा दिन शुरू हो जाता. पर मेरी जिन्दगी में वो दिन ही क्या जो बिना किसी परेशानी के बीत जाए. मुझे कुछ भी करके आठ सौ रूपये का जुगाड़ करना था . मैं सोच रहा था की कोई छोटा मोटा काम मिल जाये तो पैसे मिल जाये. पर इतने पैसे भला दे कौन.

नहर की पुलिया पर बैठे बैठे मैं इसी गहन सोच में डूबा था की मैंने सामने से ताई को आते देखा. मुझे देख कर वो मेरे पास आ गयी .

ताई- इधर क्यों बैठा है

मैं- वैसे ही तुम बताओ

ताई- क्या बताऊ, तुझे तो सब मालूम है ही, दिहाड़ी पीट कर आई हूँ. अब जाकर आदमी की गालिया सुनूंगी , न जाने कब सुख मिलेगा, मिलेगा भी या नहीं इस जन्म में

मैं- आखिर किस चीज की लड़ाई है तुम दोनों की

ताई- ग्रहस्थी में टोटे की लड़ाई है , तेरा ताऊ कमाता नहीं , कभी कुछ करता भी है तो उसकी दारू पी जाता है , अब उसके पीछे मरू मैं, खैर तू बता कुछ परेशान सा लगता है

मैं- मेरा हाल भी तेरे जैसा ही है ताई. कुछ पैसो की जरुरत आन पड़ी है . जुगाड़ हो नहीं रहा है

ताई- तेरी चाची से मांग, दुनिया को तो ब्याज में पैसे देती है

मैं- पर मुझे नहीं देती .

ताई- बुरा मत मानियो पर तू ही है जो उस से दबके रहता है पुरे गाँव को मालूम है की ये सब तेरा ही है.

मैं- वो भी मेरे ही है , उनके सिवा और कौन है मेरा तू ही बता

ताई- इतना सरल कैसे है तू

मैं- बस ऐसे ही .

ताई- सुन एक काम है जिस से हम दोनों की मुश्किलें थोड़ी आसान हो सकती है , पैसे का जुगाड़ हो सकता है , थोड़े तू रख लेना थोड़े मुझे दे दियो .

मैं- कैसे.

ताई- मैं जहाँ मजदूरी करती हूँ, वहां सड़क बनाने का काम है , तो तारकोल बनाने के लिए न ट्रको में कोयला आता है. अगर हम ट्रक से थोडा कोयला गायब कर ले तो उसे बेच कर पैसे आ सकते है .

मैं- तू पागल हुई है क्या. चोरी करना गलत है और फिर किसी ने पकड़ लिया तो वैसे ही परेशानी हो जाएगी.

ताई- इस दुनिया में आसानी से कुछ नहीं मिलता, मेरे मन में ये बिचार इसलिए आया है की मैंने कुछ मजदूरो की बाते सुनी थी वो कई बार कोयला बेच चुके है , सहर में एक सेठ है जो ये कोयला खरीदता है . देख ले अगर कर पाये तो .

मैं- मन नहीं मानता

ताई-तेरे मन की तू जाने, चल ठीक है मैं चलती हूँ देर से पहुंचूंगी तो दो गाली और बकेगा आदमी.

ताई चली गयी पर मेरे मन में हलचल मचा गयी .. मेरा मन दो हिस्सों में बंट गया एक तरफ मेरा जमीर कहता की गलत काम गलत ही होता है , तो दूसरा हिस्सा कहे की उदयपुर घुमने जाना ही है , जिन्दगी में ये मौका फिर मिले न मिले. कशमकश जब ज्यादा हुई तो मैं गाँव की तरफ चल निकला . कुछ दूर चला ही था की मेरी चप्पल में काँटा फंस गया . किस्मत को कोसते हुए मैं काँटा निकाल ही रहा था की पास के झुरमुट में मुझे हलचल सी महसूस हुई. लगा की कोई हैं वहां पर मैंने तुरंत चप्पल पहनी और झुरमुट में जाकर देखा. ...........................

तो वहां पर ...........................................
 
#4

वहां पर गाँव का सुनार था . उसके हाथ में एक छोटा बक्सा था जिसे वो बार बार खोल बंद कर रहा था .लालाजी का इस समय यहाँ पर इस जंगल में होना कुछ तो ठीक नहीं था . मैं थोडा सा छिप गया और देखने लगा की सुनार आखिर कर क्या रहा है . लाला के हाथ सख्ती से उस पुराने बक्से पर जमे हुए थे, और उसकी आँखे बार बार रस्ते की तरफ देख रही थी जैसे की उसे किसी का इंतज़ार हो . पर किसका हिलते झुरमुट की आड़ में शाम अब रात में बदलने लगी थी.

कुछ देर बाद दूसरी तरफ से कदमो की आहट हुई तो मैं थोडा सा और छिप गया . लाला ने आने वाले दोनों आदमियों को देख कर एक गहरी सांस ली और बोला- कितनी देर की आने में .

आदमी जिन्होंने अपना मुह तौलिये से ढका हुआ था वो बोला- ऐसे मामलो में देर तो हो ही जाती है लाला. सामान लाया .

लाला- हाँ, पर आज पुरे 16 साल बाद ऐसी क्या बात हुई जो इस दबी बात को उखाड़नी पड़ी .

आदमी- गुजरा हुआ वक्त , कभी कभी आज बन कर आँखों के सामने आ जाता है और जब ऐसा होता है तो उस आज का सामना करना मुश्किल हो जाता है ,

लाला- तो इस राज को भी दबे रहने देते जैसे की और कितने ही राज दबा दिए हमने.

आदमी-वो दौर अलग था लाला, ये दौर अलग है . खैर, छोड़ इन बातो को तुझे तेरा हिस्सा तो मिल ही जायेगा. ला बक्सा मुझे दे.

वो कहते है न सबकी जिन्दगी में एक ऐसा लम्हा आता है जो पूरी जिन्दगी को एक झटके में बदल देता है . उस छोटे से लम्हे में मुझे न जाने क्या सोचा, मैंने वो करने का सोच लिया जिस से मेरा दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था . मैंने झोली में रेत भरी और उन लोगो की आँखों में झोंक दी. इस से पहले की वो कुछ समझ पाते मैंने बक्सा लाला के हाथ से उड़ा लिया.

पीठ पीछे वो तीनो चीख रहे थे, और मैं दौड़ लगाये जा रहा था . कभी इधर कभी उधर, मेरे फेफड़े जैसे फट ही गए थे पर मैं रुका नहीं . मैं जंगल में और अन्दर भागे जा रहा था . अँधेरा घना और घना होते जा रहा था . इतना घना की जैसे रात ने सब कुछ अपने आगोश में ले लिया था. जब मुझे पूरी तस्सली हो गयी की मैं अकेला हूँ तो मैंने एक पेड़ का सहारा लिया और सांसो को दुरुस्त करने लगा.

मैं इतना तो जान गया था की इस बक्से में कुछ बेहद खास था . कोई दो-तीन किलो का वो बक्सा अपने अन्दर कुछ ऐसा समेटा हुआ था जो 16 साल पुराणी बात का गवाह था . दिल जोर से धडक रहा था ,

जानता था की लाला और उसके साथी पूरा जोर लगा देंगे इस बक्से को हासिल करने के लिए मुझे जंगल से निकल कर सुरक्षित स्थान पर जाना था . अगले कुछ घंटे मेरे लिए बड़े मुश्किल थे हर पेड़, हर लहराती शाख मुझे लाला ही लगी. जैसे तैसे करके मैं गाँव की दहलीज पर पहुंचा. और किस्मत देखिए एक तो रात का समय ऊपर से बिजली गुल.

उस पूरी रात मैं अपने कमरे में बैठा रहा , उस बक्से को घूरता रहा. चिमनी की रौशनी में बक्सा जैसे चमक रहा था . मेरे हाथ कांप रहे थे दिल चीख रहा था की खोल कर देख इसमें क्या है .पर हिम्मत नहीं हो रही थी . घबराहट इतनी की कहीं बुखार न हो जाये. जैसे तैसे सुबह हुई. मैंने बक्से को छुपा दिया. वैसे भी मेरे कमरे में कोई आता जाता तो नहीं था .

सुबह मैं पढने निकल गया . मन कर रहा था की बक्से वाली बात रीना को बता दू, पर फिर खुद को रोक लिया. उसे क्यों उलझाना बेवजह . दोपहर को मैंने साईकिल सुनार की दुकान की तरफ घुमाई मैं देखना चाहता था उसके हाव भाव पर वो बेखबर अपने काम में लगा था जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं हो. तब मुझे समझ आया वो कितना घाघ था इतने सालो से बक्से को छुपाये हुआ था तो रात की बात की क्या ही औकात थी उसके सामने.

उदयपुर जाने के अब कुछ ही दिन बचे थे . दो दिन के भीतर पैसे जमा करवाने थे . और पैसे ही तो नहीं थे मेरे पास. मेरे दिमाग में ताई की कही बात बिजली की तरह कौंध रही थी . कुछ सोच कर मैं उस तरफ चल दिया जहाँ ताई काम करती थी .उस समय मुझे कहाँ मालूम था ये मेरी किस्मत थी तो मेरे करम लिख रही थी.

मुझे देखते ही ताई की आँखों में चमक आ गयी . वो मेरे पास आ गयी .

ताई- तो सोच लिया तूने.

मैं- हाँ सोच लिया.

“देख उस तरफ वो दो ट्रक खड़े है , आज ही आये है . दो कट्टे गायब हु तो भी कुछ मालूम नहीं होना किसी को .” ताई ने आँखों से इशारा करते हुए कहा.

मैं- आज रात ही करूँगा ये काम.

ताई- ठीक है , मैं तुझे सेठ की दूकान बताती हूँ, वहां बस कट्टे रख देना वो समझ जायेगा.

मैं- ठीक है . चलता हूँ फिर .

ताई- थोड़ी देर रुक , अब कहाँ पैदल जाउंगी, तेरे साथ ही चल दूंगी मैं भी.

मैं- हाँ,

आधे घंटे बाद मैं और ताई गाँव की तरफ आ रहे थे बाते करते हुए.

मैं-किसी को मालूम हो गया तो

ताई- नहीं होगा. सब ठीक रहेगा. वैसे अगर तू चाहे तो मैं आ जाती हूँ तेरे साथ रात को , मैं चोकिदारी कर लुंगी, तू कोयला उठा लेना.

मैं- ताऊ को क्या कहेगी.

ताई- कहना क्या है , दारू पी कर लुढक जायेगा.एक बार सोया तो फिर होश कहाँ रहता है उसे.

मैं- बड़ी दिलेर है तू

ताई- जरूरते सब कुछ करवा देती है .

मैं- सो तो है तो फिर ठीक रहा , रात को दस बजे तू मुझे फिरनी पर मिलना

ताई-पक्का.

, कल बक्से की वजह से धडकने बढ़ ह गयी थी आज कोयला चुराने का सोच कर. घर आया तो चाची आँगन में नलके पर हाथ मुह धो रही थी , झुक कर वो अपने चेहरे पर पानी के छींटे मार रही थी मेरी नजरे उसके ब्लाउज से झांकती चुचियो पर पड़ी. कल रात वाला सीन आँखों के सामने घूम गया. आधी दिखती गोरी चुचिया मेरे दिल में हलचल मचाने लगी. कनपटी के पास गर्मी महसूस की मैंने. तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो मैं आगे बढ़ गया. इंतज़ार था रात होने का.
 
#5

बहुत देर तक मैं ताई की राह देखता रहा पर वो आई ही नहीं, हार कर मैं खुद ही चल दिया.ताई आये न आये फर्क नहीं पड़ता था मेरी अपनी मजबूरियां थी , पैसे की जरुरत थी बेशक गलत काम था पर जिंदगी में कभी कभी वो भी करना पड़ता है जो गलत हो.

तक़रीबन ग्यारह बजे मैं उधर पहुंचा तो सब कुछ शांत था , घुप्प अँधेरा था मैंने साइकिल थोड़ी दूर खड़ी की और दबी आवाज में ट्रक के पास पहुँच गया . दिल की धड़कने बढ़ी हुई थी , माथे पर पसीना था. मैं ट्रक पर चढ़ा और कोयले को बोरी में भरने लगा. एक बोरी भरने के बाद मैंने उसे साइकिल पर लाद दिया. सब कुछ आसानी से हो गया. पर वो कहते है न की हर चीज की कीमत होती है,

इसी आसानी ने मेरे दिमाग में फितूर भर दिया. मैंने सोचा एक बोरी और मचका देता हूँ, मैं फिर से ट्रक पर चढ़ गया . बोरी आधी भरी ही थी की मेरी आँखे तेज रौशनी से चोंध गयी. चोकीदार की टोर्च मुझ पर तनी हुई थी .

“हरामखोर, तेरी ही तलाश में था, आज हाथ लगा है .साले तेरे बाप का माल है क्या जो चुरा रहा था, चुपचाप निचे आ जा. ”उसने अपना लट्ठ हिलाते हुए कहा.

मैं फंस चूका था , लालच भारी पड़ने वाला था.

“चल, निचे आ ” उसने कहा.

तभी मुझे न जाने क्या सुझा मैंने बोरी चोकीदार पर दे मारी. अचानक हमले से वो गिर गया और मैं उसके ऊपर कूद पड़ा. मैंने पास में पड़ा उसका लट्ठ उठाया और उसे मारने को ही था की वो बोला- नहीं नहीं मारना मत.

मैं- जाने दे मुझे,

वो- बोरी इधर ही छोड़ जा

मैं- बोरी तो लेके ही जाऊंगा, मज़बूरी समझ मेरी

चोकीदार- एक शर्त पर जाने दूंगा, आधा हिस्सा मेरा होगा.

मैं- ठीक है , कल दे जाऊंगा

चोकीदार- कल नहीं अभी

मैं- चूतिये, कोयला बिकेगा तभी तो हिस्सा मिलेगा

चोकीदार- मैं कैसे भरोसा करू तेरा.

मैं- मत कर. तेरा नुकसान , जैसा मैंने कहा मज़बूरी है और मज़बूरी आदमी क्या ही धोखा करेगा किसी से.

चोकीदार- ठीक है भरोसा किया .

मैं- कल दोपहर को मिलता तुझे,

वो- शाम ढले आना , आयेगा न

मैं- जुबान देता हु,

उस रात मुझे एक सीख मिली थी की आदमी ईमानदार तब तक ही होता है जब तक की उसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिलता. खैर, कोयला तो मैंने पार कर लिया था पर अभी इसे रखु कहा और शहर कैसे ले जाऊ ये भी समस्या थी. मुझे ताई पर भी गुस्सा आ रहा था , मैंने दो चार गालिया दी उसे. दो बोरी कोयला लादे मैं अँधेरी रात में चुतियो के जैसा खड़ा था . बहुत सोच कर मैंने कोयले को अपने खेतो में बने कमरे की छत पर रख दिया और विचार करने करने लगा की कैसे इसे शहर ले जाऊ, उस रात मुझे एक पल भी नींद नहीं आई. खेत में बैठे बैठे ही सुबह हो गयी.

मैं सीधा ताई के घर गया , वो चाय बना रही थी .

“ले,चा ” उसने मुझे कप दिया.

मैं- चाय गयी तेल लेने ये बता तू कल आई क्यों नहीं .

ताई- बस नहीं आ पाई. आज करेंगे वो काम

मैं- काम तो मैंने कर दिया , ये बता बोरी को शहर कैसे ले जायेंगे.

ताई की आँखों में चमक सी आ गयी .

ताई- तू चिंता कर. ये बता माल कहाँ है

मैं- हिफाजत से है

मैंने ताई को बता दिया.

ताई- तू घर जा , बाकि मैं देख लूंगी .

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था . मैं चाहता था की जल्दी से पैसा मेरे हाथ में आ जाये. दोपहर को एक कबाड़ी अपनी टूटी सी गाड़ी लेकर मेरे पास आया और बोला- भैया, आपके पास कबाड़ बताया.

मैं- कहीं और जा भाई, कोई कबाड़ नहीं है मेरे पास.

वो- मुझे तो यही सुचना मिली थी खैर तेरी मर्ज़ी

उसने इशारा किया तो मैं समझा और उसे साथ ले लिया.बोरी उसकी गाड़ी में लदवा दी. उसने तुरंत ही पैसे गिन दिए और बोला- कबाड़ और आये तो बताना. मेरे हाथ में सौ और पचास के कुछ नोट थे. जिन्हें गिन कर बड़ी ख़ुशी मिली पर बस एक पल की ताई और चोकीदार को उनका हिस्सा देने के बाद मेरे पास इतने पैसे बचते ही नहीं की मैं उदयपुर जाने के पैसे भर सकता.

खैर अब जो थे यहीं थे . ताई को उसके पैसे देने के बाद मैं चोकीदार के पास गया . उसको भी दिए.

चोकीदार- क्या बात है लड़के, खुश नहीं लगता तू

मैं- यार, जितने चाहिए थे उतने बन नहीं पाए.

चोकीदार- जो मिला उतने भी कहाँ थे तेरे पास. जितना है उसमे खुश रह .

मैं वहां से चल तो दिया पर जैसे मेरे कदमो को बेडियो ने जकड लिया था . कल का दिन ही बचा था पैसे जमा करने के लिए. कभी मैं आसमान की तरफ देखता तो कभी अपने पैर की तरफ. मुझे अपनी मजबूरियों पर गुस्सा आ रहा था. दिल पर जब काबू नहीं रहा तो मैं पुलिया पर बैठ गया और जोर जोर से रोने लगा. रोते ही रहा जब तक की मेरा दर्द आंसू बन कर बह नहीं गया.

घर पहुंचा तो देखा रीना बैठी थी .

मैं- तू कब आयी

वो-मैं तो कब से आई, तू न जाने कहाँ था . और ये कैसी शक्ल बनाई है कुछ हुआ है क्या.

मैं- कुछ, कुछ भी तो नहीं

रीना- मुझसे झूठ बोलता है

मैं- कहाँ न कुछ नहीं हुआ वो थोड़ी गर्मी ज्यादा है न तो पसीना पसीना हुआ पड़ा है

रीना-क मेरे साथ आ जरा.

मैं उसके साथ छत पर आया.

वो- पैसे का जुगाड़ नहीं हुआ न .

न जाने वो मेरे मन की बात कैसे जान लेती थी .

मैं- हो जायेगा, उसमे क्या है

रीना- मैं जानती हु, बात नहीं बनी.

मैं- क्या हुआ फिर, तू जब आएगी वहां से तो वहां क्या है कैसा है बता ही देगी फिर क्याफ फर्क पड़ा.

रीना- फर्क पड़ता है .

उसने जिस अंदाज से मेरी आँखों में देखा, मैं कुछ बोल ही नहीं पाया.

रीना- दाल चूरमा लायी थी तेरे लिए डिब्बा रखा है खा लेना गर्म ही .

मैं- हाँ,

एक कल रात नींद नहीं आई थी, एक आज की रात थी जो ख्यालो में कट रही थी .एक बार फिर मैं चाची के पास गया .

चाची- क्या है

मैं- वो पैसे चाहिए थे उदयपुर जाना है

चाची- एक बार समझ नहीं आता क्या तुझे ,कह दिया न नहीं जाना

मैं- मैं जाऊंगा

जिन्दगी में पहली बार था जब मैंने चाची को उल्टा जवाब दिया था. चाची को भी खली ये बात

“क्या कहा तूने फिर कहियो ” उसने कहा

मैं- मैंने कहा मैं उदयपुर जाऊँगा.

चाची ने पास पड़ी थापी उठा कर मेरी बाह पर मारी और बोली- जुबान लडाता है मुझसे,

जब तक उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ, वो मुझे पीटती रही . मैं चाहता तो उसका हाथ पकड़ सकता था , रोक सकता था पर मैं चाची के मुह नहीं लगना चाहता था. दर्द भरे बदन को सहलाते हुए मैं घर से निकल गया . मुझे गुस्सा चाची पर नहीं था बल्कि उस ऊपर वाले पर था , जिसने मुझे मेरे माँ-बाप से दूर कर दिया था आज वो होते तो मेरा ये हाल नहीं होता. घूमते घूमते मैं जंगल की तरफ जा ही रहा था की एक बहुत तेज , जैसे कोई धमाका हुआ हो ऐसी आवाज मेरे कानो में आई, आवाज इतनी तेज थी आस पास सब हिल सा गया हो . मैं उस तरफ दौड़ चला. और जब मैं वहा पंहुचा तो मैंने देखा ........... मैंने देखा की.......................
 
#6

मैंने देखा की नाहर की पुलिया से एक गाड़ी टकरा गयी थी. मैं दौड़ कर उसके पास गया . गाड़ी में एक औरत थी जिसका चेहरा खून से लथपथ था . मैंने दरवाजे के कांच को थपथपाया . झूलती आँखों से उसने मुझे देखा ,

“घबराओ नहीं मैं निकालता हूँ तुम्हे बाहर. ” मैंने कहा पर शीशे की वजह से उसे सुना नहीं होगा.

मैंने दरवाजा खोलने की कोशिश की पर वो जाम था . एक पत्थर से मैंने शीशा तोडा और फिर अन्दर हाथ डाल कर दरवाजा खोला और उस औरत को बाहर निकाला. वो खांसने लगी.

“पानी , पानी दो ” वो खांसते हुए बोली.

मेरी नजर गाड़ी में पड़ी बोतल पर पड़ी मैंने उसे दी. दो घूँट पिने के बाद उसने अपना मुह साफ क्या तो मुझे मालूम हुआ ये जब्बर की घरवाली थी . चूँकि जब्बर से हमारी कम बनती थी तो बोल-चाल कम ही थी पर इस हालत में मेरा इसकी मदद करना बनता था .

“ठीक हो काकी ” मैंने कहा

काकी- सर फुट गया है , उस लड़की को बचाने के चक्कर में गाड़ी ठुक गयी . जरा उधर देख तो सही वो लड़की तो ठीक है न

मैं- कौन लड़की काकी, इधर हम दोनों के आलावा कोई और नहीं है .

काकी- ठीक से देख बेटा, वो भी गाड़ी से टकरा ही गयी थी . हे राम कही नहर में तो नहीं गिर गयी .

मैं- नहर में पानी है ही कहा काकी, कितने दिनों से नहर आई तो नहीं है .

मेरी बात सुनकर काकी को जैसे झटका सा लगा. उसके होंठ जैसे सुन्न हो गए थे .

“वो लड़की , यही तो खड़ी थी ” काकी अपनी चोट भूलकर और कहीं ध्यान देने लगी थी .

मैं- काकी, सर से खून बह रहा है, तुम्हे गाँव चलना चाहिए मरहम पट्टी करवा लो पहले कोई होगी भी तो मालूम हो ही जायेगा. चलो मैं तुमको ले चलता हूँ .

मैंने काकी को वैध जी घर छोड़ा और अपनी राह पकड़ ली. मेरे दिमाग में भी अब उस लड़की वाली बात ही घूम रही थी , कौन होगी, उसे कितनी चोट लगी होगी. पर जब हमें कोई मिला ही नहीं तो कोई क्या करे.

रात भी घिर आई थी . घर जाने का मन नहीं था तो मैं ऐसे ही ताई के घर चला गया . ताई चूल्हे पर खाना बना रही थी .

“सही टाइम पर आया तू, जा अन्दर से थाली ले आ खाना परोस दू तुझे ” ताई ने कहा.

वैसे भूख तो लगी थी पर मैंने कहा- नहीं ताई, चाची को मालूम होगा तो कलेश करेगी.

ताई- उसके कलेश से तुझे कब से फर्क पड़ने लगा.

मैं-तुझे तो सब पता है ही . खैर, ताऊ नहीं दिख रहा .

ताई- बोल रहा था की शहर में नौकरी मिल गयी है सिनेमाहाल में चोकिदारी करने की , वही जाने कह बोल के गया. अब राम ही जाने , सच कहता है या झूठ,

मैं- तुझे तो खुश होना चाहिए , अब वो कमा के लायेगा.

ताई- ऐसा मेरा भाग कहा, तू बता क्या नयी ताजा

मैं- बस वही रोज के ड्रामे.

मैंने ताई को बताया की जब्बर की घरवाली का सर फुट गया

ताई- बढ़िया होता जो मर ही जाती, कमीने जब्बर ने गाँव के लोगो का जीना हराम किया हुआ है .

मैं- गलती तो गाँव वालो की ही हैं, उसे जवाब नहीं देते. सामना करे तो उसकी क्या औकात.

ताई- कौन करे उसका सामना, जाने कहा कहाँ तक उसकी पैठ है .

मैं - छोड़ अपने को क्या मतलब उस से .

ताई- सही कहाँ और बता तेरे वो पैसे पुरे हुए क्या

मैं- कहाँ, अभी भी कसर है

ताई- अब तो कोयले पर भी हाथ नहीं मार पाएंगे, कल से काम बंद , सब सामान वापिस जा रहा है

मैं -क्यों

ताई- आज कुछ अफसर आये थे,उन्होंने ही काम बंद कर वाया है .

मैं- ये तो बुरा हुआ

ताई- अब क्या करे, कल से कहीं और मजदूरी देखूंगी

मैं- ठीक है अब चलता हूँ

इस दुनिया में हर कोई अपनी अपनी परेशानियों से घिरा था , यही सोचते सोचते मेरी वो रात कटी . मेरी जिन्दगी न जाने किस दिशा में जाने वाली थी .बिस्तर पर करवट बदलते बदलते मेरी नजर उस बक्से पर पड़ी जो मैंने सुनार से चुराया था . मैंने उसे खोला और मैं हैरान हो गया उसके अन्दर कुछ भी ऐसा नहीं था जो उसे महत्वपूर्ण बनाता हो. बक्सा बाहर से जितना सुन्दर था ,अन्दर से उतना ही काला . उसके अन्दर सिर्फ एक धागा था, लाल रंग का नाल जिसे गूंध कर माला के जैसा बनाया हो.

पर जैसा हम कहते है किसी भी चीज को बस देख कर उसका अनुमान नहीं लगाना चाहिए. मैंने नाल को हल्का सा छुआ ही था की मेरी ऊँगली जल गयी , इतना गर्म था वो . एक पल में मैं समझ गया की कोई तो बात थी जो सुनार ने सोलह साल इसकी हिफाजत की थी . और अब मुझे वो बात मालूम करनी थी . सोचते सोचते कब मेरी आँख लग गई पता ही नहीं चला.

सुबह चाचा ने मुझे बुलाया और बोले- बेटे, अब तुम बड़े हो रहे हो तो तुम्हे अब कुछ बाते समझनी चाहिए

मैं- जी

चाचा- तुम तो जानते ही हो की हमारी जमीने अलग अलग जगह फैली हुई है , जितना हो सके मैंने संभालने की कोशिश की है पर अब लगता है की मैं अकेला काफी नहीं हूँ, तो मैंने सोचा है की तुम मेरा थोडा हाथ बंटाओ , समझो हम कैसे काम करते है , इस कुल की परम्परा रही हैइस धरती को माँ समान मानने की हमारे पुरखो ने , तुम्हारे पिता ने और फिर मैंने इसे बढाया ही है पर ना जाने किसकी नजर लग गयी हमारी जंगल पार वाली जमीन बंजर होते जा रही है एक तरफ नहर है , अपना कुवा है फिर भी जाने क्यों जमीन की हरियाली सूख रही है . खैर, मेरी कुछ चिंताए और है जो तुम जान जाओगे पर मैं चाहता हूँ की सुबह शाम तुम जमीनों का चक्कर लगाओ . खेत में काम करने वालो से जान- पहचान बढाओ .

मैं- जी .

हम बात कर ही रहे थे की चाची आ गयी तो चाचा ने बात बदल दी और मैं घर से निकल गया . क्योंकि मेरे पास मेरी खुद की चिंताए थी, आज हार हाल में मुझे ट्रिप के पैसे जमा करवाने थे पर जुगाड़ नहीं हो रहा था तो मैं गया नहीं . मैं ऐसे ही भटकते भटकते उधर पहुँच गया जहाँ नयी सड़क बन रही थी , मेरे दिल में था की थोडा कोयला मिल जाये तो उसे बेच दू, पर वहां कुछ नहीं था सिवाय रेत, रोड़ी के, सब जा चुके थे, हताशा में मैं भी वापिस मुड ही गया था की मैंने सोचा उस बंद कमरे में ही देख लू क्या मालूम कुछ मिल जाये. और जब मैंने कमरे के दरवाजे को धक्का दिया तो .....................
 
और जब मैंने दरवाजे को धक्का दिया तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी. कमरे में चारपाई पर ताई और ठेकेदार एक दुसरे पर चढ़े हुए थे, अचानक से उनका मजा टूट गया. ताई की नजर मुझ पर पड़ी तो जैसे वो सुन्न हो गयी.

“तू, तू यहाँ कैसे ” अपना लहंगा ठीक करते हुए ताई ने कहा.

मेरा दिमाग जैसे जाम हो गया था पर मैंने ताई से एक शब्द भी नहीं कहा. मैं चुपचाप कमरे से बाहर आया और सीधा जंगल की तरफ चल पड़ा. उसी जगह जहाँ पर मेरी तन्हाई और मैं होते थे.

ताई बहन की लौड़ी, ठेकेदार से चुदवा रही थी. मेरे कानो में ताऊ की कही एक एक बात आ रही थी , जो गालिया वो उसे दारू पीकर बकता था एक एक गाली सच लग रही थी . और न जाने ये सब कबसे चल रहा होगा. बेशक वो मेरी सगी ताई नहीं थी पर फिर भी मुझे बुरा लग रहा था और अगर वो सगी ताई होती तो भी मैं क्या ही कर लेता.

दिल में अजीब सी बेचैनी थी , इस से पहले की मैं और कुछ करता मेरे कानो में वो ही इकतारे की आवाज आई, ठीक ये आवाज ही उस रात मैंने सुनी थी . ऐसा लग रहा था की आवाज बिलकुल मेरे पास से ही आ रही थी पर कहाँ से ये मालूम नहीं हो रहा था . मई की गर्मी में चलती गर्म लू अचानक से ठंडी बयार सी बहने लगी थी .

“कौन चुतिया, भरी दोपहर में संगीतकार बना हुआ है ” मैंने अपने आप से कहा .

कुछ दूर मैं इधर उधर भटका, भेड़ चराने वालो से पूछा पर उन्होंने मना किया. इकतारे की आवाज ने जैसे मुझसे डोर बाँध दी थी मैं बस दौड़ जाना था उस तरफ. भटकते भटकते मैं जंगल में न जाने कितनी दूर पहुँच गया था . और फिर मेरे पैर थम गए. आँखों जो जैसे करार सा आ गया. दिल को अजीब सी ख़ुशी हुई

“तुम्हे देखे मेरी आँखे इसमें क्या मेरी खता है ” मेरे होंठ बस इतना ही कह पाए.

सामने पीपल के निचे बने चबूतरे पर बैठी वो लड़की आँखे मूंदे इकतारा बजा रही थी . केसरिया कपड़ो में सूरज सा दमकता वो सांवला चेहरा जिस पर नजर ठहरे तो फिर नजर कुछ और न देखे. उसकी कलाई पर सफ़ेद कलवा जैसा कुछ बंधा था . इस दुनिया से बेखबर अपनी धुन में मगन वो लड़की जिस शांति , जिस शिद्दत से उस इकतारे की धुन में खोयी थी . उसे देखना जैसे सर्दियों की धुप.

दबे पाँव मैं बस उसके सामने निचे धरती पर जाकर बैठ गया. अजीब सा सम्मोहन , मैं क्या ही कहूँ उन लम्हों के बारे में , उस तपती दुपहरी में जैसे ठंडा शरबत मिल जाना कुछ ऐसा हाल था मेरा. दस-पन्द्रह मिनट, आधा घंटा , न जाने कितना समय बीता वो इकतारा बजाती रही और मैं एकटक बस उसे ही देखता रहा . फिर उसने अपनी तान रोकी और आँखे खोली, पहली बार हमारी नजरे मिली, उसने मुझे, मैंने उसे देखा. वो बड़ी बड़ी कजरारी आँखे बस एक पल ही मिली . वो झटके से उठ खड़ी हुई. उसके चेहरे पर घबराहट सी आई.

मैं- माफ़, कीजिये आप को परेशां नहीं करना चाहता था पर इकतारे को सुनने से खुद को रोक नहीं पाया. मैं चलता हूँ,

“”नहीं कोई बात नहीं “ उसने हौले से कहा

मैं हलके से मुस्कुराया और शायद वो भी .हम दोनों एक दुसरे को बस देख रहे थे न वो कुछ कह पा रही थी ना मैं.

“मेरा नाम मनीष है ” मैंने कहा

“मुझे जाना होगा , ” उसने बस इतना कहा और मेरे पास से सरसराते हुए आगे को बढ़ गयी . पीछे मुड कर उसने एक बार भी नहीं देखा. मैं बस उसे जाते देखता रहा .

“सुनो, क्या हम फिर मिलेंगे.” पता नहीं क्यों मैं अचानक से चिल्ला पड़ा

पर शायद उसने नहीं सुना. मैं भी अब वहां क्या करता. पर मेरे पास जाने को जहाँ भी कहाँ था.

घर आया तो चाची मेरी ही राह देख रही थी .

“सुन ये चावल का कट्टा ताई को दे आ. और उस से कहना की पैसे नहीं पहुंचाए उसने , दे तो ले अइयो ” चाची ने कहा.

मैं- तुम खुद ही दे आओ न

मैं दरअसल ताई का सामना नहीं करना चाहता था.

चाची- देख रही हूँ, आजकल कुछ ज्यादा उड़ रहा है तू, काम चोर हो गया है , ऐसे नहीं चलेगा.

मैं- ऐसे चलाना भी नहीं चाहता मैं. मैं बस इंतजार कर रहा हूँ

चाची की त्योरिया चढ़ आई.

“किस चीज का इंतजार कर रहा है तू, मुझसे जबान तो लड़ाने लगा है अब क्या हाथ सामने करेगा मेरे ” चाची ने ताना मारा.

मैं- बस मेरी पढाई पूरी हो जाये, फिर मैं ये घर छोड़ दूंगा. हमेशा के लिए. हमेशा हमेशा के लिए.

जैसे ही मैने ये बात कही चाची के हाथ से परात छूट गयी . अविश्वास से उसका मुह खुला रह गया

“माना की इस घर में मेरी कोई जरुरत, कोई हसियत नहीं है , और न मैंने कभी कोई हसरत की सिवाय की तुम्हारी झोली से थोड़ी ममता मेरे भाग में भी आएगी. पर लगता है की मुझ बदनसीब का क्या भाग. पर एक दिन आयेगा जब मेरा भाग भी बदलेगा. मैं छोड़ जाऊंगा इस घर को ” मैंने कहा और कट्टा सर पर उठा लिया और ताई के घर की तरफ चल दिया.

दरवाजा खुला था , मैं सीधा अन्दर चले गया. ताई आँगन में ही बैठी थी. मुझे देख कर वो असहज हो गयी .

“चाची ने चावल भेजे है ” मैंने कहा और वापिस जाने को हुआ की ताई ने मुझे रोका.

“रुक जरा, मेरे पास आ. ”ताई ने कहा .

मैं उसके पास गया .

ताई-मुझे कुछ कहना है तुझसे.

मैं- कोई जरुरत नहीं , पर ये जो तू कर रही है न गलत है , जिस दिन ताऊ को मालूम होगा तुझे मार ही देगा वो और गाँव में तेरी क्या हसियत रहेगी.

ताई चुप रही .

मैं- मुझे नहीं पता तेरी मज़बूरी रही या फिर जो भी था, पर गलत था . मैं चाहता तो उसी समय ठेकेदार से उलझ सकता था पर हम दुनिया को क्या कहे जब अपने लोगो में ही कमी. मुझे देख ताई, तू लाख परेशां होगी पर मुझसे ज्यादा तो नहीं . मुझसे जायदा दुनिया देखि है तूने मैं इतना कहूँगा आज के बाद तू मजदूरी नहीं जाएगी. और उस ठेकेदार या तेरे ऐसे रिश्ते किसी और से भी है तो वो तोड़ देगी. तेरी जरुरत का हर सामान तू बनिए की दूकान से ले आ, पैसे मैं चुकाऊंगा चाहे कही से भी लाना पड़े मुझे. ये बात बस हम दोनों के बीच ही रहेगी .

ताई शायद कुछ कहना चाहती थी पर उसका गला रुंध गया था , वो मेरे पास आई और चुपचाप मेरे गले लग गयी.
 
मैं नहीं जानता वो कैसी घडी थी जब ताई मेरे गले लगी, पर उस घडी ने आने वाले कल को बदलने की शुरुआत शायद कर दी थी, ताई की भरी हुई छातिया मेरे सीने में जैसे धंस ही जा रही थी . ताई की गर्म साँस मैंने अपने सीने में उतरते महसूस की. वो कमजोर लम्हा था भावुकता में मैंने भी ताई की पीठ को सहलाना शुरू कर दिया. ताई के पसीने की गंध में अजब कशिश थी . कुछ देर हम दोनों एक दुसरे से लिपटे रहे . मेरे हाथो ने हलके से ताई की कमर को छुआ और वो अलग हो गयी .

एक तो पैसे का इंतजाम नहीं हुआ दूसरा ताई को चुदते देख लिया जब वो मेरे गले लगी थी तो मेरे मन में हलचल मच गयी थी. रात को मुझे मालूम हुआ की गाँव में किसी के घर वीसीआर लाये थे. तो मैं भी अपने दोस्त के साथ वीसीआर पर फिल्म देखने चला गया. तबियत से मै फिल्म देख रहा था की तभी बिजली चली गयी . सब लोगो का मजा किरकिरा हो गया. कुछ लोगो ने इंतजार किया पर बिजली नहीं आई तो लोग उठ कर अपने अपने घर जाने लगे.

मेरा मन घर जाने का नहीं था तो मैं पैदल ही खेतो की तरफ चल पड़ा. चारो तरफ गहरा अँधेरा छाया हुआ था , कच्चा रास्ता शुरू होते ही अँधेरा और घना लगने लगा. गीत गुनगुनाते हुए मैं अपने रस्ते चला जा रहा था की मेरी नजर धू धू कर जलती लपटों पर पड़ी, हाँ मैंने ठीक कहा वो लपटे ही थी गर्मी के इस मौसम में आग लगना अपने आप में अनोखा सा था क्योंकि इस मौसम में खेत खाली पड़े थे.

बेशक मुझे अपने खेत में जाना था पर मैं उन लपटों की तरफ बढ़ गया. जल्दी ही मैं उस आग के पास था , कुल जमा चार लकडियो को जोड़ कर वो आग जलाई गयी थी , किसी छोटे अलाव के जैसे पर उसकी लपटे ऐसी जैसे की न जाने कितने ही पेड़ जल रहे हो, हैरत की बात थी . आंच की तपत इतनी तेज जैसे पल भर में मुझे पिघला ही दे, और जबकि मैं आंच से निश्चित दुरी पर खड़ा था .

लपटे हवा से थोड़ी इधर उधर हुई तो मेरी नजर अलाव के दूसरी तरफ पड़ी. और वो , हाँ वो ही इस दीन दुनिया से बेखबर , चेहरे पर जहाँ भर का सकून लिए आँखे मूंदे बैठी थी, आखिर कोई इतना शांत कैसे हो सकता था मैंने अपने आप से सवाल किया. कायदे से मेरा सवाल ये होना चाहिए था की ये लड़की जो मुझे बियाबानो में मिलती है ये कौन है , कहाँ की है और ऐसे भटकने का क्या मकसद है इसका.

पर उसे देखते ही , बस उसे देखते रहने को ही दिल करता था मेरा. बेशक ये दूसरी मुलाकात थी , मैं भी वहीँ रेत पर बैठ गया.

“यूँ इन स्याह रातो में भटकना नहीं चाहिए , ” उसने बिना आँखे खोले ही कहा मुझसे

“तुम भी तो भटक ही रही हो, ” मैंने कहा

उसने हौले से आँखे खोली और लगभग मुझे घूरते हुए बोली- मेरे पास मेरा प्रयोजन है और दूसरी बात ये की तहजीब ये कहती है हमें अपने काम से काम रखना चाहिए दुसरो , खासकर अजनबियों के मामले में नहीं पड़ना चाहिए, न उन्हें परेशां करना चाहिए .

मैं- ये हमारी दूसरी मुलाकात है , हम अजनबी कहाँ रहे

मेरी बात सुनकर उसके होंठो पर मुस्कान आई जिसे उसने छिपाने की जरा भी कोशिश नहीं की.

वो- हम एक दुसरे को जानते भी तो नहीं न ,

मैं- उसमे कौन सी बड़ी बात है , मेरा नाम मैंने बताया न तुम्हे, अब तुम बता दो अपना नाम , ऐसे ही जान पहचान हो जाएगी.

वो- नाम में क्या रखा है , नाम का क्या वजूद , वक्त की धार में न जाने किस किस को भुला दिया गया , हमारा नाम हो न हो क्या फर्क पड़े.

मैं- तो चलो तुम्हे गुमनाम ही समझ लेता हु. वैसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है , क्या मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूँ , गाँव में सब जानते है मुझे .

वो- फर्क इस बात से नहीं पड़ता की तुम्हे कौन जानता है , महत्वपूर्ण ये है की तुम किसको जानते हो .

उसकी बात मुझे समझ नहीं आई , पर सुनकर अच्छा लगा.

“मैं खगोल शास्त्र की विद्यार्थी हूँ, ” उसने धीरे से कहा .

भंचो, ये कौन सा शाश्त्र था , मैंने तो सुना ही पहली बार था.

“ये क्या होता है ” मैंने पूछा

वो- मैं तारो की पढाई करती हूँ,हथेली की रेखाओ को तारो से मिला कर तक़दीर देखती हूँ

मैं- अरे बढ़िया, बताओ न मेरी तक़दीर में क्या लिखा है

मैंने हथेली उसकी तरफ बढाई. वो मेरे पास आई और मेरे हाथ को अपने हाथ में थामा, ऐसे लगा की जैसे बर्फ ने छू लिया हो मुझे, पास आंच जल रही थी पर मैं कंपकंपा गया. उसने एक पल मेरी हथेली थामी और फिर छोड़ दी.

“तेरे पास दौलत है बहुत, ” उसने कहा

मैं- तेरी पहली ही बात गलत साबित हो गयी . क्या तक़दीर देखेगी तू.

मैंने हँसते हुए कहा.

वो- मुझे जो दिखा मैंने बताया तू मान या ना मान तेरी मर्जी

मैं- और क्या देखा

वो- तमाम जहाँ का दुःख

उसने बस इतना कहा और उठ खड़ी हुई.

“जाने का समय हुआ मेरा ” उसने कहा

मैं- फिर कब मिलोगी

वो- मुसाफिरों के पते ठिकाने नहीं होते, तक़दीर में मुलाकात होगी तो मिल लेंगे वर्ना अपने अपने रस्ते तो हैं ही

इतना कह कर वो चल पड़ी मैं बस उसे देखता रहा . जो आंच जल रही थी वो न जाने कब बुझ गयी पता ही न चला.

सुबह जब मैं गाँव में गया तो चौपाल पर बहुत जायदा भीड़ इकठ्ठा हुई थी . अमूमन सुबह सुबह इतने लोग कम ही देखने को मिलते थे.

“क्या हुआ भाई, इतनी भीड़ क्यों है ” मैंने एक गाँव वाले से पूछा.

“वो कल, कल रात ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,” उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.
 
अधूरी बात छोड़ गाँव वाले ने पीछे नीम के पेड़ की तरफ इशारा किया और मेरी आँखों ने जो देखा,एक पल के लिए कलेजा जैसे शरीर से बाहर ही आ गया मेरा. पेड़ पर एक लाश , हाँ अब उसे लाश कहना ही ठीक होगा टंगी थी, आधी सही सलामत आधी जली हुई,

मैं- ये तो . ये तो.

“ये चरनसिंह है, लालाजी का मुनीम ” गाँव वाले ने मेरी बात पूरी की. पर मेरी दिलचश्पी उसकी बात में नहीं थी , मेरी उत्सुकता जिस बात ने बढाई थी वो थी चरण सिंह के शरीर का आधा जलना,

“कैसे मारा होगा कातिल ने इसे ” मैं बुदबुदाया.

आस पास सारा गाँव जमा था पर किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी की लाश को पेड़ से उतार दे. वैसे भी इस देश की जनता तमाशबीन के सिवा और कुछ भी तो नहीं . ऐसी बाते मैंने उपन्यासों में ही पढ़ी थी , कभी देखा -सुना नहीं था असली जीवन में पर आज की बात कुछ और थी. पेड़ या उसके आस पास ऐसे कुछ भी नहीं था , मतलब की कातिल ने उसे कही और मारा था और यहाँ लाकर टांग दिया था.

मैंने देखा एक कोने में लाला बैठा था अकेला. , आज उसने अपना सुनहरा चश्मा नहीं पहना था, चेहरे पर शिकन थी . कुछ देर बाद पुलिस आई , लाश को उतार कर गाड़ी में रखा गया, लालाजी और कुछ गाँव वालो से पूछताछ की और चली गयी. मैं भी अपने घर को चल दिया. रस्ते में मुझे रीना मिली.

“कहाँ है तू आजकल,तुझे मालूम है क्या हुआ गाँव में ” उसने कहा.

मैं- गाँव की छोड़, अपनी बात कर

वो- अपनी क्या बात करू, दो दिन हो गए तू मिला ही नहीं .

मैं- कहीं तुझे आदत न हो जाये मेरी इसलिए नहीं मिला.

रीना- ये ख्याल आते आते कुछ देर नहीं हो गयी.

हम दोनों मुस्कुरा पड़े.

रीना-मैंने सोचा है मैं भी उदयपुर नहीं जा रही

मैं-क्यों भला

वो- तू , जो नहीं होगा साथ .

मैं- जिन्दगी में न जाने ऐसे कितने दिन आयेंगे जब मैं साथ नहीं रहूँगा ,

रीना- तब की तब देखूंगी.

मैं- तुझसे बातो में कोई नहीं जीत सकता , आज मेरा न जाना मेरी किस्मत है , आज मैं पैसे से परेशां हूँ, पैसे के पीछे भाग रहा हूँ पर रीना तू देखना एक दिन आएगा जब मैं झुका दूंगा इस जहाँ को

रीना- उसके लिए मेहनत जरुरी है , तभी तो कहती हूँ, पढाई पर हद से ज्यादा ध्यान दे, अगली बार कालेज शुरू हो जायेगा. कोई नौकरी मिल गई तो फिर सुख ही सुख होगा.

मैं- तूने मेरी बदनसीबी देखि है , मेरा वादा है , मेरी बदली किस्मत भी देखेगी तू.

रीना- तू भी न , मैं ये कह रही थी की तेरे लिए रेडियो मंगवा दिया है अभी अभी तेरे चोबारे में रख के ही आई हूँ.

मैं- सच में, झूठ तो नहीं बोल रही तू

वो- जाकर देख लेना . चल मिलती हूँ बाद में थोडा काम है मुझे.

मैं- आजकल कुछ ज्यादा ही काम रहने लगा है तुझे.

वो- ये सही है , मशरूफ तुम रहते हो. कितनी सुबह बीत जाती है आजकल मैं मंदिर पर तेरा इंतज़ार करती रह जाती हूँ, और सितम देखिये दोष भी हमारा.

मैं- दोष तो समय का है , चल आज दोपहर कुवे पर चलते है

वो- देखती हूँ , कोई काम न निकला तू चलेंगे पर अभी चलती हूँ .

रीना के जाने के बाद मैं भी अपने चोबारे में चढ़ गया और उसका लाया तोहफा देखा, फिलिप्स का रेडियो जिसमे एफएम भी था, काश मैं बता सकता की कितनी ख़ुशी हुई थी मुझे उसे देख कर. मैं लगभग दौड़ ही पड़ा था रेडियो के सेल लाने को पर तभी मेरे कदम रुक गए, मेरी नजर उस बक्से पर पड़ी,

“इसे किसने बाहर निकाला ” मैंने अपने आप से पूछा क्योंकि मैंने इसे छिपा कर रखा था पर अभी ये मेरी टेबल पर पड़ा था . कहीं चाची को तो इसके बारे में मालूम नहीं पड़ गया . मैंने फिर खुद से सवाल किया.

कांपते हाथो से मैंने बक्से को फिर खोला. हमेशा के जैसे उसमे कुछ नहीं था सिवाय उस धागे के जिसका रंग थोडा सा बदला बदला लग रहा था . मैंने एक बार फिर उसे हाथ में लिया और एक बार फिर उसने मेरी उंगलियों को झुलसना शुरू कर दिया.

“क्या बवाल है इस धागे का ” मैंने कहा.

मन में एक साथ बहुत से सवाल थे , जिसका जवाब या तो सुनार दे सकता था या फिर जब्बर क्योंकि बक्से की असलियत वो दोनों ही जानते थे, और दोनों ही मेरी पहुँच से दूर थे. मैं अपने ख्यालो में गुम था की मेरे कानो में कुछ आवाजे आने लगी , मैंने निचे आँगन में झाँक कर देखा तो चाचा किसी अजनबी के साथ बैठे थे. मैंने बक्से को छुपा कर रखा और फिर निचे चला गया .

सीढिया उतरते हुए उन दोनों की नजर मुझ पर पड़ी.

“मनीष, खेतो पर चले जाओ, नहर आई हुई है , पम्प लगा कर खेतो में पानी छोड़ देना. ” चाचा ने मुझसे कहा

मै ये सुनकर हैरान हो गया, गर्मी के इस मौसम में जब खेत खाली पड़े थे तो सिंचाई की भला क्या जरुरत भला.

“पर चाचा,” इस से पहले की मैं कुछ कह पाता चाचा ने मेरी बात काटी और बोले- मैंने कहा न अभी के अभी खेतो पर चले जाओ .

न जाने मुझे ये क्यों लगा की वो थोड़े झुंझलाए हुए थे. मैंने साइकिल उठाई और खेतो की तरफ चल दिया , वो अजनबी लगातार मुझे ही घूरे जा रहा था .

बेशक चाचा ने मुझे खेत पर जाने को कहा था पर इस गर्म दोपहर में खेतो पर जाना खुदखुशी करने जैसा था, बिनाकाम भला कौन तपेगा , इस धुप में तो मैं ताई के घर चला गया. दरवाजे को को खोला और मैं सीधा अन्दर चला गया. और जब मैं अन्दर ताई के कमरे में गया तो .....................................

मैंने देखा ताई पूरी नंगी अपने बदन को तौलिये से पोंछ रही थी , मेरे तो होश ही उड़ गए. ताई की पीठ, सुडोल नितम्ब , बदन को पोंछते हुए वो एक पल को थोडा सा आगे को झुकी और मेरी नजर कुलहो से थोड़ी निचे होते हुए उस जगह पर पहुँच गयी जिसे गहरे काले बालो ने ढक रखा था . मेरे कानो के पास गर्मी थोड़ी बढ़ सी गयी थी, बदन का सारा खून एक जगह इकठ्ठा हो गया हो ऐसा लगने लगा था मुझे.

इस से पहले मैं पकड़ा जाता मैं बाहर आ गया और आवाज लगाई- ताई, है क्या घर पर.

“हाँ, अभी आई दो मिनट रुक जरा.” उसने अन्दर से ही कहा.

कुछ देर बाद वो बाहर आई मेरी नजर ताई के ब्लाउज पर पड़ी जो उसकी छातियो से चिपका हुआ था , ताई ने ब्रा नहीं पहनी थी , गीले बदन ने ब्लाउज को अपने आप से चिपका लिया था, ताई ने भी समझ लिया था की मैं उसकी चुचियो को घुर रहा हु पर उसने कुछ नहीं कहा.

ताई- तुझे मालूम है आज गाँव में काण्ड हो गया .

मैं- हाँ देखा मैंने ,

ताई- देखने की नहीं सोचने की बात है , मेरा कलेजा तो अभी तक कांप रहा है .

मैं- पर चरण सिंह को भला कोई क्यों मारेगा

ताई - तुझे नहीं मालूम, चरण सिंह कोई भोला इन्सान नहीं था , सुनार का खास गुर्गा था वो .

मैं- हर कोई किसी न किसी के लिए काम तो करता ही है, और फिर सुनार तो सबकी मदद करता है .

ताई- मदद करता है , उसे मदद नहीं कहते

मैं- जानता हूँ, पैसे ब्याज पर देकर वो लोगो की जमीने हड़प लेता है .

ताई- नीच है वो एक नंबर का जितनी गाली तो उसे उतनी ही कम, काश कोई उसे भी मार दे .

मैं- उसकी आयेगी तो वो भी जायेगा. मैं तुझसे कुछ और बात करने आया हूँ

ताई- हाँ बता.

मैं- चाचा किसी को हमारी जंगल पार वाली जमीन बेचने की बात कर रहा था ,

ताई- क्या कहा तूने, जंगल पार वाली जमीन , उसे भला कोई क्यों खरीदेगा.

मैं- क्यों क्या हुआ.

ताई- तुझे नहीं मालूम क्या, कितने दिन हुए तुझे उधर गए हुए.

मैं- याद नहीं, बचपन में कभी गया होऊंगा उधर.

ताई- ठीक है शाम को चलेंगे उधर, मैं भी खाली ही हूँ, तेरा ताई तो दो दिन घर आने वाला नहीं, वैसे तूने पक्का जंगल पार वाली जमीन ही सुना था न .

मैं- हाँ , पर ऐसा क्या है उस जमीन में

ताई- तू खुद देख लेना शाम को . ...........
 
ताई की बातो ने मुझे उत्सुक कर दिया था , दिल कर रहा था की अभी के अभी साइकिल उठाऊ और सीधा उधर पहुँच जाऊं , पर फिर सोचा शाम होने में भला देर ही कितनी बची है, ताई के घर से जब मैं बाहर निकल रहा था तो गली में उसी अजनबी से टकरा गया मैं.

मैं- देख कर चल भाई

वो- गुजरा हुआ कल देखा है , आने वाला कल भी देख रहा हूँ, और कितना देख कर चलू

मैं- क्या मतलब इस बात का .

वो- मतलब तो वो जाने जिसने हम सब के लेख लिखे है ,हम तो कठपुतली है उसकी जिसने ये तमाशा रचा है .

मैं- पागल है क्या तू

वो- काश, पागल होता , खैर अब तूने पूछ ही लिया है तो सुन, अगली पूर्णिमा को रुद्रपुर में निमन्त्रण है तेरा, सोलह साल बाद मेला लगेगा,

मैं- मेरा निमन्त्रण क्यों भला

वो- ये मुझसे क्यों पूछता है , ये तब सोचना था न जब कपाट खोल आया तू, अब जब धूना सिलगा ही दिया है तो सींचना भी तो पड़ेगा

उसकी बाते मेरे सर के ऊपर से गुजर रही थी,

मैं- चुतिया है क्या तू, क्या बकवास कर रहा है, किसके कपाट, कौन सा धुना, मैं अब क्या कर आया रुद्रपुर में .

उस अजनबी ने अपनी छोटी छोटी से आँखों से घुर मुझे और फिर सीधा मेरा कालर पकड़ लिया.

“इतना मासूम भी नहीं है तू ,जितना बनने का नाटक कर रहा है , तेरे सिवा और कौन होता जो बरसो से बंद पड़े मंदिर के दरवाजे खोल आता, अब ये मत पूछना कौन सा मंदिर ” उसने गुर्राते हुए कहा और मुझे धक्का देकर परे धकेल दिया.

“पूनम का इंतज़ार है सब को ” जाते जाते उसने मुड कर कहा

मैं अपना गला सँभालने लगा. घर गया तो देखा की चाचा आँगन में कुर्सी पर बैठा था , चाचा का चेहरा इतना पीला पड़ा हुआ था की देख कर लगे जाने कितने सालो से बीमार हो. मुझे देखते ही वो झटके से खड़ा हुआ और बोला- बेटे, तुम्हे घुमने जाना था न , अपनी तयारी कर लो.

चाचा ने जेब से नोटों की गड्डी निकाली और मेरे हाथ में रख दी.

“तुम घूम आओ , बाहर की दुनिया देखो वैसे भी इस बार मैं तुम्हारा दाखिला बड़े शहर में करवा रहा हूँ, बढ़िया पढाई बहुत जरुरी है भविष्य में काम आएगी, इधर गाँव में क्या रखा है . ” चाचा ने कहा.

मैं- क्या हुआ है चाचा, कोई बात है क्या

चाचा- क्या बात होगी , कुछ भी तो नहीं अपनी औलाद के बारे में हम नहीं सोचेंगे तो भला कौन सोचेगा. तू जा खेल कूद ऐश कर .

चाचा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर अन्दर कमरे में चले गए. मेरा दिमाग पूरी तरह घूम गया था . ये क्या हो रहा था . मैंने नोटों की गड्डी को उधर कुर्सी पर ही रखा और घर से बाहर चल दिया. दोस्तों के साथ इधर उधर घुमा, बेर खाने गया पर मन बिचलित था, काबू में नहीं आ रहा था जैसे तैसे करके शाम हुई और मैं ताई के साथ जंगल पार वाली जमीन की तरफ चल दिया.

ये जंगल भी बड़ा अजीब था , दुनिया भर के पेड़, कुछ बिलकुल सूखे कुछ गहरे, कुछ फलो से लदे, चूँकि पास में नहर थी तो येहमेशा हरा भरा ही रहता था , कभी मिटटी का रस्ता सही मिलता तो कभी कांटो भरा, या लकडियो ने रास्ता रोका हुआ, मैं और ताई चले जा रहे थे की मेरी नजर आम के पेड़ पर पड़ी.मैंने साइकिल रोकी.

ताई- क्या हुआ

मैं -आम

ताई- रहने दे हाथ नहीं पहुंचेगा उधर

मैं- तू देख, अभी तोड़ता हूँ.

मैंने इधर उधर देखा पर पत्थर नहीं मिले मेरे को, न ही कोई ऐसी छड़ी जिसे हिला कर मैं आम तोड़ सकू,

ताई- छोड़ न ,

मैं- रुक जरा, अभी करता हु जुगाड़.

मैंने पेड़ पर चढने की कोशिश भी की पर बात बनी नहीं . उछल कर भी देखा फिर मैंने कुछ सोचा

मैं- ताई , मैं तुझे उठाता हूँ, ये इस तरफ वाली डाली पर तेरा हाथ पहुँच जायेगा.

ताई- न बाबा न, गिर वीर गयी तो कौन करेगा मेरा , हाथ पैर न टूट जाये.

मैं- क्यों घबराती है कुछ नहीं होगा.

मैंने ताई ओ पकड़ा और ऊपर की तरफ उठाना शुरू क्या मेरे हाथ ताई की चिकनी कमर से होते हुए ताई के कुल्हो पर रेंगने लगे थे, मैंने ताई के कुल्हे मजबूती से थामे और ताई को ऊपर उठा दिया.

जब मेरा ध्यान उस बात पर गया तो न जाने क्यों मुझे बड़ा अच्छा लगा. मैंने कुछ जोर से दबाया उन्हें.

ताई- हाथ नहीं पहुंचा थोड़ी कसर है .

मैं- रुक जरा

मैंने ताई को और ऊपर किया अब मेरे हाथ ताई की जांघो पर पहुँच गए थे, और ताई की चूत वाला हिस्सा मेरे मुह के सामने मेरे इतने पास की मेरे होंठ उस पर रगड़ खा जाते अगर ताई का लहंगा बीच में ना आ रहा होता तो . सर चकराने लगा मेरा. आँखों आगे अँधेरा सा आने लगा. ताई के बदन की खुसबू छाने लगी मुझ पर .

“क्या कर रहा है ठीक सा पकड़. गिराएगा क्या , बस तोड़ ही दिया मैंने ” ताई ने कहा और दो आम तोड़ लिए.

ताई- अब उतार भी दे.

मैंने हौले हौले ताई को निचे उतार दिया , जब उसकी चुचिया मेरे सीने पर रगड़ी तो मैंने अपने कच्छे में कुछ जोर मारती चीज़ को महसूस किया.

“क्या देख रहा है ऐसे ” ताई ने मुझे अपनी छाती ताड़ते हुए कहा

मैं- तुझे देख रहा हु,

मैंने बिलकुल भी झूठ नहीं बोला.

ताई- मेरे को तो रोज ही देखता है तू

मैं- आम दे मुझे.

हम वही बैठ कर आम खाने लगे. चीनी से भी मीठा आम . बिलकुल ताजा अभी अभी पेड़ से तोडा हुआ इस से बढ़िया भला क्या होता. मैंने देखा ताई का होंठ थोडा सा आम क रस से सना है

ताई- क्या देख रहा है.

मैं- रस लगा है

ताई किधर

मैं थोडा सा आगे हुआ और ताई के होंठो पर अपनी ऊँगली फेर दी.

उफ़ कितने मुलायम थे उसके होंठ, कितने नर्म होंगे जब मैं चुसुंगा इन्हें. सोचा मैंने

ताई- हो गया साफ

मैं- हा बस

मैंने एक बार और ऊँगली फेरी तो ताई ने हल्का सा मुह खोला और मेरी ऊँगली थोड़ी सी ताई के मुह में चली गयी, गर्म जीभ का स्पर्श मेरे तन बदन को हिला गया. न जाने क्यों मुझे लगा की ताई ने मेरी ऊँगली को चूमा हो . .........................

“चल अब, देर मत कर ” ताई ने कहा तो मेरी तन्द्रा टूटी

हम फिर चल पड़े. करीब आधे घंटे में हम लोग उस जगह पर पहुँच गए जहाँ जंगल खत्म होता था और हमारी जमीन शुरू होती थी . दूर कहीं सूरज लाल हुआ पड़ा था , ढलने को बेताब. मैंने दूर दूर तक नजर डाली एक तरफ घना जंगल था जिसे पार करके हम आये थे दूसरी तरफ सूखी जमीन दूर दूर तक

मैं- क्या है ये ताई.

ताई- ये ही है वो जमीन

ताई- झटका लगा न, इस बंजर को देख कर . यहाँ से रुद्रपुर तक तेरी ही जमीन है .

रुद्रपुर यहाँ सेकोई दो ढाई कोस दूर था . इस हिसाब से तो काफी क्या बहुत ज्यादा जमीन थी ये .

मैं- ये तो बहुत बड़ा इलाका हुआ

ताई- ये मत पूछ की ये कितना इलाका है ये देख की ये जमीन बंजर क्यों है .

ताई ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने साथ ले चली.

देख- यहाँ से रुदपुर तक पुरे ११ कुवे है , और एक बावड़ी. ताई ने कहा

ताई मुझे एक कुवे पर ले आई और बोली निचे देख. मैंने झाँक कर देखा कुवा पानी से लबालब भर था पानी इतना था की बस बाल्टी डालो और पानी खींच लो.

मैं- जब पानी है तो फिर जमीन प्यासी क्यों.

ताई ने पास पड़ी एक पुराणी सी बाल्टी की तरफ इशारा करते हुए कहा तू खुद ही देख ले

मैंने बाल्टी कुवे में डाली और खींचा , बाल्टी मैंने जमीन पर खाली की .पर जमीन जरा भी गीली नहीं हुई. अब मैं हुआ हैरान

ताई- हैरानी हुई न, दुनिया कहती है की ये प्यासी जमीन है जिसकी प्यास न कोई कुवा बुझा सकता है न कोई बारिश, बारिस के मौसम में जब आस पास की सारी धरती नया जीवन प्राप्त करती है ये धरा ऐसी की ऐसी ही रहती है .

मैं- क्यों भला

ताई- आ मेरे साथ तुझे कुछ और दिखाती हु,

मैं ताई के पीछे पीछे हो लिया. ताई की मटकती गांड एक बार फिर मेरी परीक्षा लेने लगी.
 
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