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उस पायल की झंकार को मैं हजारो में भी पहचान सकता था , मेरे सामने मेरे बचपन की दोस्त खड़ी थी, अगर चाचा वहां पर नहीं होता तो कब का उसे अपने आगोश में भर लिया होता मैंने.
“कब आई तुम ” उसके पास जाकर मैंने कहा
वो- कल रात को , आ जरा बैठते है
मैं- चोबारे में चले क्या
वो- नहीं बाहर
मैं- चल फिर .
बाहर आकर हम लोग नीम के निचे बैठ गए. वो मुझे देख रही थी मैं उसे.
“अब बोल भी कुछ , कब तक ऐसे पागलो जैसे हंसती रहेगी. ” मैंने कहा
वो- तेरे साथ हूँ, अब भला क्या कहने की जरुरत है
मैं- कैसा रहा टूर.
वो- बस ठीक ही था
मैं- ऐसे मायूसी से क्यों बोल रही है
मैं- ठीक तो तब होता न जब तू साथ होता,क्या पता ऐसा मौका फिर कभी मिले न मिले.
मैं- तू साथ है न मेरे, हर पल जिसमे तू मेरे साथ है वो पल खास है
रीना- बाते बड़ी बड़ी करने लगा है आजकल , क्या हो जाता अगर तू भी चलता
मैं- छोड़ अब उस बात को , तू कहे तो तुझे शहर घुमाने ले चलू
वो- वाह क्या बात है
मैं- चलेगी क्या बोल
वो- अभी नहीं, पर मैं तेरे साथ मेले में चलूंगी रुद्रपुर , कल घर पे बात हो रही थी की बड़े दिनों बाद मेला लगने वाला है , मैंने तो कभी मेला देखा नहीं बड़ी हसरत है , तू मेला घुमा देना मुझे.
मैं- ये भी कोई कहने की बात है , सिर्फ घुमा ही नहीं दूंगा तू कहे तो पूरा मेला खरीद दू तेरे लिए.
रीना ने कजरारी आँखों को घुमाते हुए कहा - मैं दो चार दिन क्या बाहर गयी , जनाब के तेवर देखो. ये वादे करने की कहाँ से हिम्मत आई, बचपन से जानती हूँ तुझे मैं मुझे मत बहला
मैं - न तू लैला है न मैं मजनू जो मैं तुझे वादों से बहला दूंगा. तू मेरा ऐतबार रख , मेले में तू एक चीज़ पर हाथ रखना मैं दूकान न खरीद तू तो कहना .
रीना- ठीक है बाबा, तू बस साथ चल पड़ना मेरे यही बहुत है मेरे लिए और सुन कुल्फिया मैं चाहे कितनी भी खा लू , पैसे तू ही देगा.
मैं- हाँ पक्का
रीना- तेरे लिए कुछ लायी थी देख जरा
उसने एक पैकेट मेरे हाथ में रखा
मैं- क्या है ये
वो- देख खोल कर
मैंने पैकेट खोला, उसमे एक शर्ट थी
“इसकी क्या जरुरत थी भला ” मैंने कहा
वो- इतना तो हक़ है न मेरा
मैं- सब तेरा ही है
हम और बाते करते पर तभी उसकी मामी उसे बुलाने आ गयी , वो उसके साथ चली गयी मैं वापिस घर आ गया . मैंने शर्ट अलमारी में रखी ये सोचते हुए की मेले वाले दिन ये ही पहन कर रीना के साथ जाऊंगा. करने को कुछ खास था नहीं तो बस मैंने खाना खाया और बिस्तर पर पड़े पड़े मैं रीना के बारे में ही सोच रहा था , सोचते सोचते मेरी नजर एक बार उस बक्से पर पड़ी, मैंने फिर खोला उसे.
जैसे ही उसके धागे को मैंने छुआ , वो गरम होने लगा. तभी मुझे कुछ ध्यान आया मैंने जेब से वो धागा निकाला जिसमे हीरा लगा था . ये दोनों धागे एक जैसे ही थे बस एक काला था एक लाल . मैंने दोनों धागों को आपस में मिलाया और आश्चर्य देखिए काला धागा इतना शीतल हो गया जैसे लू में रखा कोरा मटका. कुछ तो समानता थी दोनों धागों में . मैंने अब उसे गले में पहनने का सोचा , पर गले में डालते ही मुझे ऐसे लगा की मेरी सांसे जैसे रुक रही हो.
जैसे कोई मेरा गला घोंट रहा था . घबरा कर मैंने वो धागा गले से निकाला और अपनी जेब में रख लिया. मैंने रेडियो चलाया ही था की तभी निचे से कुछ आवाजे आने लगी तो मैंने खिड़की से झाँक कर देखा निचे . ताई और चाची में कुछ बहस हो रही थी .
चाची- तू क्या सोचती है मुझे कुछ मालूम नहीं है , मुझे सब कुछ पता है
ताई- पता है तो अच्छी बात हैं न
चाची- जबसे वो तेरी संगत में आया है न तब से ये सब शुरू हुआ है , मैं उसे पाल रही थी न बचपन से मेरे सामने उसकी चूं भी नहीं निकलती थी
ताई- उसे पालना कहती है तू, अरे दो रोटी तो गली में बैठे कुत्ते को भी कोई न कोई दे देता है , तू अगर सही होती तो सीने से लगाती , वो इस घर की पहली औलाद है, तूने उसे कभी बेटा नहीं समझा पर वो तेरा मान सगी माँ से भी ज्यादा रखता है और क्या कहती है तू की मेरी संगत में बिगड़ गया है वो , आज तक कभी तुम दोनों की बात मेरे आगे नहीं की , इस डर से की तुझे बुरा लगेगा मेरे घर रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं खाता वो . तू क्या जानेगी उसको बात करती है .
चाची- मेरे घर में रहता है वो मैं चाहे उसे कैसे भी रखु तुझे क्या है तू कौन होती है
ताई - वो तेरे घर में नहीं तू उसके घर में रहती है , ये सब जिसकी तू मालकिन बनी बैठी है ये सब उसका ही है जिस दिन वो अपना हक़ मांगेगा तेरे पैरो तले ये धरती खिसक जाएगी, तू कब तक छिपा कर रखेगी आज नहीं तो कल उसे मालूम होगा ही.
चाची- होने दे, मैं किसी से डरती हूँ क्या, आजतक उसका सब कुछ मैंने ही तो किया है और आधे की हक़दार तो मैं भी हूँ ही
ताई- वाहजी वाह, ये मुह और मसूर की दाल. तेरा हिस्सा , अरे कुछ तो शर्म कर .
दोनों का झगड़ा सुन कर मुझे बड़ा दुःख हुआ, मैं निचे आया . दोनों मुझे देख कर थोडा चौंक गयी , शायद उन्हें लगा था की मैं घर पर नहीं हूँ
“आप दोनों लड़ना बंद करो , ये बाते सुनकर मुझे बड़ा दुःख होता है , मुझे एक पैसा भी नहीं चाहिए आप लोगो का . जो मेरी हसरत थी वो था परिवार का एक रहना और वो मुमकिन नहीं , आपस में जैसे भी हो कम से कम दुनिया के सामने तो तमाशा मत करो, दुनिया तो तैयार बैठी रहती है कब किसी के घर कलेश हो कब वो तमाशा देखे. ताई जी तुम मेरे साथ आओ यहाँ रहोगी तो फिर कलेश होगा ” मैंने ताई का हाथ पकड़ा और उसे ताई के घर ले आया.
मैंने उसे पानी का गिलास दिया भर कर .
“तुमको तो मालूम है न उसका स्वाभाव फिर क्यों छेडती हो उसे ” मैंने कहा
ताई- किसी ने किसी दिन सर फोड़ दूंगी उसका, मालूम नहीं खुद को क्या समझती है .
मैं- जाने भी दो अब . आओ बैठो मेरे पास
मैंने ताई को मेरे पास बिठा लिया. मेरी नजरे ताई की ऊपर निचे होती छातियो पर पड़ी . गुस्से के मारे ताई का चेहरा लाल हुआ पड़ा था .
मैं- गुस्से बड़ी प्यारी दिखती हो तुम .
ताई- तुझे प्यार आ रहा है क्या
मैं- अगर मैं कहूँ हाँ तो क्या कहोगी
ताई- प्यार करने वाले कहाँ कुछ कहते है वो तो कर लेते है जो उन्हें करना होता है
मैं- और मैं क्या करना चाहता हूँ
ताई - मैं भला क्या जानू .
मैंने ताई के हलके गुलाबी होंठो पर ऊँगली फेरी और बोला- मैं जानना चाहता हूँ की प्यार में लोग क्या क्या करते है .
ताई के कांपते होंठो का नाजुक अहसास मेरे तन बदन में आग लगा गया था . पर इस से पहले की मैं आगे बढ़ पाता बाहर से कोई मेरा नाम पुकारने लगा तो मैं झल्लाते हुए बाहर गया . ............
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जितना मैं ताई के करीब जाने की कोशिश करता तभी कोई न कोई आकर बीच में पंगा कर देता . झल्लाते हुए मैं बाहर गया तो देखा की बैंक का चपरासी खड़ा है
मैं- क्या हुआ तुझे
चपरासी- भाई, तुमको न मनेजर साहब बुला रहे है
मैं - तू चल मैं आता हूँ
वो- मेरे साथ ही चलो भाई उन्होंने कहा है की साथ लेकर ही आना
मैं- ठीक है चल फिर
कुछ ही देर में हम लोग बैंक पहुँच गए . मैं सीधा मनेजर के कमरे में गया .
मेनेजर- मैं आपकी ही राह देख रहा था.
मैं- पर किसलिए
उसने दराज से एक लिफाफा खोला और बोला- ये वो सारा लेखा जोखा है जो आपने मुझसे माँगा था .
मैं- - मेरी समझ में कहाँ ये सब , मोटा मोटा समझाओ मुझे जरा
मेनेजर ने मुझे हिसाब किताब समझाया .
“और इस पैसे को मैं कब खर्च कर सकता हूँ ” मैंने पूछा
मेनेजर- वैसे तो नियम ये है की जब तक आपकी सरपरस्ती ख़त्म नहीं हो जाती आपके चाचा के साइन की जरुरत है पर चूँकि मेरे सम्बन्ध पुराने है आप से तो आप कभी भी ले सकते है पैसे कोई दिक्कत नहीं है .
मैं- और चाचा ने इनमे से कितने रूपये निकाले है
मेनेजर- एक भी नहीं, बल्कि वो तो कभी बैंक में आये भी नहीं है
ये मेरे लिए और अचम्भा था क्योंकि चाचा ने आज तक कभी भी पैसे नहीं निकाले तो घर खर्चे , हमारे लिए जो भी वो कर रहा था वो पैसे कहाँ से आ रहे थे, फिर मैंने सोचा की उसके धंधे से आते होंगे.
मैं- और कुछ जो आप मुझे बताना चाहते है .
मेनेजर- बस यही की अब आप अपनी विरासत संभाले
मैं- कौन सी विरासत , कहाँ महल खड़े है मेरे.
मेनेजर बस मुस्कुरा दिया. मैं बैंक से निकल कर हलवाई की दुकान की तरफ आया ही था की मैंने वहां नीम के चबूतरे पर मीता को बैठे देखा, दीं दुनिया से बेगानी वो आलू-समोसे खा रही थी . हलके आसमानी कपड़ो में बड़ी सोहनी लग रही थी वो . मैंने हलवाई को जलेबी के लिए कहा और चबूतरे की तरफ बढ़ गयी. उसने मुझे देखा , मैंने उसे देखा . वो मुस्कुराई मैं हंसा.
“बस इधर उधर ही घूमते रहते हो क्या तुम ” उसने मुझसे कहा
मैं- मेरा गाँव है यहाँ नहीं मिलूँगा तो कहाँ मिलूँगा.
वो- सो तो है
मैं- और कैसी हो .बड़े दिनों बाद मिली हो
वो- परसों तो मिले ही थे हम.
मैं- तेरी जुदाई में दिन भी साल लगते है .
मीता- बाते बनाना कोई तुझसे सीखे
तभी जलेबी आ गयी मैंने दोना उसकी तरफ किया .
“मीठा कम पसंद है मुझे ” उसने कहा
मैं- अब आदत डाल ले
वो- किस चीज़ की
मैं- हर उस चीज़ की जो अब तुम्हे पसंद करनी होगी.
वो- कौन सी फिल्मे देखता है तू, तेरी ये हरकते बेशक कइयो को दीवाना बना दे पर मैं उनमे से नहीं हूँ
मैं- इसमें दीवानगी की बात कहाँ आई, बात तो जलेबी की है
वो - ठीक है , ठीक है .
हम लोग अपनी मस्ती में थे, एक आधे लोग आते जाते हमें देख रहे थे पर किसे परवाह थी . मीता का साथ होना वो अहसास था जिसे मैं बार बार महसूस करना चाहता था .
“चल ठीक है , मेरे जाने का समय हुआ चलती हूँ ” उसने कहा
मैं- क्या अभी तो मिली अभी जा रही है
वो- जाना तो होगा जिस काम के लिए आई थी वो पूरा हुआ अब घर न जाऊ क्या
मैं- मैं छोड़ देता हु तुझे
वो- रहने दे
मैं- छोड़ ने ये नखरे तू दो मिनट रुक मैं अभी साईकिल लेकर आया .
उसके जवाब की परवाह किये बिना मैं दौड़ कर गया और साइकिल ले आया. वो बैठी और हम चल दिए. मैंने जान बुझ कर वो रास्ता लिया जो मेरी बंजर जमीं की तरफ से होकर जाता था . इधर उधर की बाते करते हुए हम मेरे खेतो पर पहुंचे.
“कुछ देर रुक जरा , फिर चली जाना ” मैंने उस से कहा
वो- जाना तो है ही फिर क्या थोड़ी देर क्या ज्यादा देर.
मैंने जवाब नहीं दिया. हम चलते चलते उस बावड़ी की तरफ आ गए .
मैं- इस जमीन को पता नहीं क्या हुआ है , कुवो में पानी भी है फिर भी बंजर है .
मीता- तू मेहनत करना यहाँ , क्या मालूम हरी भरी हो जाये.
मैं- मैंने भी यही सोचा है .
मीता- जमीन को पानी से नहीं बल्कि पसीने से सींचा जाता है , तू इसका मान करेगा ये पेट भरेगी तेरा. ये हमारी माँ है और माँ औलाद के लिए सब कुछ करती है
मैं- नेक विचार है
वो- तो कब से शुरू करेगा तू यहाँ काम करना
मैं- जिस दिन तू भरी दोपहर मिलने आया करेगी , इन्ही खेतो में अपनी प्रेम कहानी की फसल पकेगी.
मीता - इसीलिए मैं तुझसे दोस्ती नहीं करना चाहती थी न दो ही दिन में मोहब्बत की बाते करने लगा. मैं कहती हूँ तुझे ये मोहब्बत की बीमारी न ही लगे तो बढ़िया हो . इश्क का रोग जो लगा न तो फिर उम्र भर इलाज नहीं मिलता .
मैं- और जो अगर तेरा मेरा संजोग हुआ तो
वो- मैं जानती हूँ अपनी हदे.
मैं- पूछना तेरे सितारों से , उन्हें तो सब मालूम है न
मीता मुस्कुराई और बोली- सितारे झूठे होते है .
मैं- तो फिर सच्चा कौन हुआ
मीता-मेरे भाग के दुःख है सच्चे जो हर पल मेरे साथ है , मेरा साथ छोड़ते ही नहीं .
मैं- क्या पता वो भी इंतजार कर रहे हो की कब कोई आये तुझे थामने और वो तेरा साथ छोड़े
मीता- बस बहुत हुई बाते. जाने दे मुझे .
मैं- मेला देखेगी न मेरे साथ
मीता- नहीं बिलकुल नहीं
मैं- क्यों भला , मेरा हाथ दुनिया के आगे थामने से घबरा गयी क्या तू
मीता मेरे पास आई इतना पास की उसकी सांसे मेरी सांसो से टकराने लगी .
“इस दुनिया को इस ज़माने को अपनी जुती की नोक पर रखती हूँ मैं, अर्जुन सिंह के बेटे, अलख के पार रहूंगी मैं .मेरा हाथ थामने की हसरत है न तुम्हे , अगर तुम उस काबिल हुए तो थाम लेना मेरा हाथ किसने रोका है तुम्हे ” उसने कहा और अपने रस्ते मुड गयी .
मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा .
“कब आई तुम ” उसके पास जाकर मैंने कहा
वो- कल रात को , आ जरा बैठते है
मैं- चोबारे में चले क्या
वो- नहीं बाहर
मैं- चल फिर .
बाहर आकर हम लोग नीम के निचे बैठ गए. वो मुझे देख रही थी मैं उसे.
“अब बोल भी कुछ , कब तक ऐसे पागलो जैसे हंसती रहेगी. ” मैंने कहा
वो- तेरे साथ हूँ, अब भला क्या कहने की जरुरत है
मैं- कैसा रहा टूर.
वो- बस ठीक ही था
मैं- ऐसे मायूसी से क्यों बोल रही है
मैं- ठीक तो तब होता न जब तू साथ होता,क्या पता ऐसा मौका फिर कभी मिले न मिले.
मैं- तू साथ है न मेरे, हर पल जिसमे तू मेरे साथ है वो पल खास है
रीना- बाते बड़ी बड़ी करने लगा है आजकल , क्या हो जाता अगर तू भी चलता
मैं- छोड़ अब उस बात को , तू कहे तो तुझे शहर घुमाने ले चलू
वो- वाह क्या बात है
मैं- चलेगी क्या बोल
वो- अभी नहीं, पर मैं तेरे साथ मेले में चलूंगी रुद्रपुर , कल घर पे बात हो रही थी की बड़े दिनों बाद मेला लगने वाला है , मैंने तो कभी मेला देखा नहीं बड़ी हसरत है , तू मेला घुमा देना मुझे.
मैं- ये भी कोई कहने की बात है , सिर्फ घुमा ही नहीं दूंगा तू कहे तो पूरा मेला खरीद दू तेरे लिए.
रीना ने कजरारी आँखों को घुमाते हुए कहा - मैं दो चार दिन क्या बाहर गयी , जनाब के तेवर देखो. ये वादे करने की कहाँ से हिम्मत आई, बचपन से जानती हूँ तुझे मैं मुझे मत बहला
मैं - न तू लैला है न मैं मजनू जो मैं तुझे वादों से बहला दूंगा. तू मेरा ऐतबार रख , मेले में तू एक चीज़ पर हाथ रखना मैं दूकान न खरीद तू तो कहना .
रीना- ठीक है बाबा, तू बस साथ चल पड़ना मेरे यही बहुत है मेरे लिए और सुन कुल्फिया मैं चाहे कितनी भी खा लू , पैसे तू ही देगा.
मैं- हाँ पक्का
रीना- तेरे लिए कुछ लायी थी देख जरा
उसने एक पैकेट मेरे हाथ में रखा
मैं- क्या है ये
वो- देख खोल कर
मैंने पैकेट खोला, उसमे एक शर्ट थी
“इसकी क्या जरुरत थी भला ” मैंने कहा
वो- इतना तो हक़ है न मेरा
मैं- सब तेरा ही है
हम और बाते करते पर तभी उसकी मामी उसे बुलाने आ गयी , वो उसके साथ चली गयी मैं वापिस घर आ गया . मैंने शर्ट अलमारी में रखी ये सोचते हुए की मेले वाले दिन ये ही पहन कर रीना के साथ जाऊंगा. करने को कुछ खास था नहीं तो बस मैंने खाना खाया और बिस्तर पर पड़े पड़े मैं रीना के बारे में ही सोच रहा था , सोचते सोचते मेरी नजर एक बार उस बक्से पर पड़ी, मैंने फिर खोला उसे.
जैसे ही उसके धागे को मैंने छुआ , वो गरम होने लगा. तभी मुझे कुछ ध्यान आया मैंने जेब से वो धागा निकाला जिसमे हीरा लगा था . ये दोनों धागे एक जैसे ही थे बस एक काला था एक लाल . मैंने दोनों धागों को आपस में मिलाया और आश्चर्य देखिए काला धागा इतना शीतल हो गया जैसे लू में रखा कोरा मटका. कुछ तो समानता थी दोनों धागों में . मैंने अब उसे गले में पहनने का सोचा , पर गले में डालते ही मुझे ऐसे लगा की मेरी सांसे जैसे रुक रही हो.
जैसे कोई मेरा गला घोंट रहा था . घबरा कर मैंने वो धागा गले से निकाला और अपनी जेब में रख लिया. मैंने रेडियो चलाया ही था की तभी निचे से कुछ आवाजे आने लगी तो मैंने खिड़की से झाँक कर देखा निचे . ताई और चाची में कुछ बहस हो रही थी .
चाची- तू क्या सोचती है मुझे कुछ मालूम नहीं है , मुझे सब कुछ पता है
ताई- पता है तो अच्छी बात हैं न
चाची- जबसे वो तेरी संगत में आया है न तब से ये सब शुरू हुआ है , मैं उसे पाल रही थी न बचपन से मेरे सामने उसकी चूं भी नहीं निकलती थी
ताई- उसे पालना कहती है तू, अरे दो रोटी तो गली में बैठे कुत्ते को भी कोई न कोई दे देता है , तू अगर सही होती तो सीने से लगाती , वो इस घर की पहली औलाद है, तूने उसे कभी बेटा नहीं समझा पर वो तेरा मान सगी माँ से भी ज्यादा रखता है और क्या कहती है तू की मेरी संगत में बिगड़ गया है वो , आज तक कभी तुम दोनों की बात मेरे आगे नहीं की , इस डर से की तुझे बुरा लगेगा मेरे घर रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं खाता वो . तू क्या जानेगी उसको बात करती है .
चाची- मेरे घर में रहता है वो मैं चाहे उसे कैसे भी रखु तुझे क्या है तू कौन होती है
ताई - वो तेरे घर में नहीं तू उसके घर में रहती है , ये सब जिसकी तू मालकिन बनी बैठी है ये सब उसका ही है जिस दिन वो अपना हक़ मांगेगा तेरे पैरो तले ये धरती खिसक जाएगी, तू कब तक छिपा कर रखेगी आज नहीं तो कल उसे मालूम होगा ही.
चाची- होने दे, मैं किसी से डरती हूँ क्या, आजतक उसका सब कुछ मैंने ही तो किया है और आधे की हक़दार तो मैं भी हूँ ही
ताई- वाहजी वाह, ये मुह और मसूर की दाल. तेरा हिस्सा , अरे कुछ तो शर्म कर .
दोनों का झगड़ा सुन कर मुझे बड़ा दुःख हुआ, मैं निचे आया . दोनों मुझे देख कर थोडा चौंक गयी , शायद उन्हें लगा था की मैं घर पर नहीं हूँ
“आप दोनों लड़ना बंद करो , ये बाते सुनकर मुझे बड़ा दुःख होता है , मुझे एक पैसा भी नहीं चाहिए आप लोगो का . जो मेरी हसरत थी वो था परिवार का एक रहना और वो मुमकिन नहीं , आपस में जैसे भी हो कम से कम दुनिया के सामने तो तमाशा मत करो, दुनिया तो तैयार बैठी रहती है कब किसी के घर कलेश हो कब वो तमाशा देखे. ताई जी तुम मेरे साथ आओ यहाँ रहोगी तो फिर कलेश होगा ” मैंने ताई का हाथ पकड़ा और उसे ताई के घर ले आया.
मैंने उसे पानी का गिलास दिया भर कर .
“तुमको तो मालूम है न उसका स्वाभाव फिर क्यों छेडती हो उसे ” मैंने कहा
ताई- किसी ने किसी दिन सर फोड़ दूंगी उसका, मालूम नहीं खुद को क्या समझती है .
मैं- जाने भी दो अब . आओ बैठो मेरे पास
मैंने ताई को मेरे पास बिठा लिया. मेरी नजरे ताई की ऊपर निचे होती छातियो पर पड़ी . गुस्से के मारे ताई का चेहरा लाल हुआ पड़ा था .
मैं- गुस्से बड़ी प्यारी दिखती हो तुम .
ताई- तुझे प्यार आ रहा है क्या
मैं- अगर मैं कहूँ हाँ तो क्या कहोगी
ताई- प्यार करने वाले कहाँ कुछ कहते है वो तो कर लेते है जो उन्हें करना होता है
मैं- और मैं क्या करना चाहता हूँ
ताई - मैं भला क्या जानू .
मैंने ताई के हलके गुलाबी होंठो पर ऊँगली फेरी और बोला- मैं जानना चाहता हूँ की प्यार में लोग क्या क्या करते है .
ताई के कांपते होंठो का नाजुक अहसास मेरे तन बदन में आग लगा गया था . पर इस से पहले की मैं आगे बढ़ पाता बाहर से कोई मेरा नाम पुकारने लगा तो मैं झल्लाते हुए बाहर गया . ............
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जितना मैं ताई के करीब जाने की कोशिश करता तभी कोई न कोई आकर बीच में पंगा कर देता . झल्लाते हुए मैं बाहर गया तो देखा की बैंक का चपरासी खड़ा है
मैं- क्या हुआ तुझे
चपरासी- भाई, तुमको न मनेजर साहब बुला रहे है
मैं - तू चल मैं आता हूँ
वो- मेरे साथ ही चलो भाई उन्होंने कहा है की साथ लेकर ही आना
मैं- ठीक है चल फिर
कुछ ही देर में हम लोग बैंक पहुँच गए . मैं सीधा मनेजर के कमरे में गया .
मेनेजर- मैं आपकी ही राह देख रहा था.
मैं- पर किसलिए
उसने दराज से एक लिफाफा खोला और बोला- ये वो सारा लेखा जोखा है जो आपने मुझसे माँगा था .
मैं- - मेरी समझ में कहाँ ये सब , मोटा मोटा समझाओ मुझे जरा
मेनेजर ने मुझे हिसाब किताब समझाया .
“और इस पैसे को मैं कब खर्च कर सकता हूँ ” मैंने पूछा
मेनेजर- वैसे तो नियम ये है की जब तक आपकी सरपरस्ती ख़त्म नहीं हो जाती आपके चाचा के साइन की जरुरत है पर चूँकि मेरे सम्बन्ध पुराने है आप से तो आप कभी भी ले सकते है पैसे कोई दिक्कत नहीं है .
मैं- और चाचा ने इनमे से कितने रूपये निकाले है
मेनेजर- एक भी नहीं, बल्कि वो तो कभी बैंक में आये भी नहीं है
ये मेरे लिए और अचम्भा था क्योंकि चाचा ने आज तक कभी भी पैसे नहीं निकाले तो घर खर्चे , हमारे लिए जो भी वो कर रहा था वो पैसे कहाँ से आ रहे थे, फिर मैंने सोचा की उसके धंधे से आते होंगे.
मैं- और कुछ जो आप मुझे बताना चाहते है .
मेनेजर- बस यही की अब आप अपनी विरासत संभाले
मैं- कौन सी विरासत , कहाँ महल खड़े है मेरे.
मेनेजर बस मुस्कुरा दिया. मैं बैंक से निकल कर हलवाई की दुकान की तरफ आया ही था की मैंने वहां नीम के चबूतरे पर मीता को बैठे देखा, दीं दुनिया से बेगानी वो आलू-समोसे खा रही थी . हलके आसमानी कपड़ो में बड़ी सोहनी लग रही थी वो . मैंने हलवाई को जलेबी के लिए कहा और चबूतरे की तरफ बढ़ गयी. उसने मुझे देखा , मैंने उसे देखा . वो मुस्कुराई मैं हंसा.
“बस इधर उधर ही घूमते रहते हो क्या तुम ” उसने मुझसे कहा
मैं- मेरा गाँव है यहाँ नहीं मिलूँगा तो कहाँ मिलूँगा.
वो- सो तो है
मैं- और कैसी हो .बड़े दिनों बाद मिली हो
वो- परसों तो मिले ही थे हम.
मैं- तेरी जुदाई में दिन भी साल लगते है .
मीता- बाते बनाना कोई तुझसे सीखे
तभी जलेबी आ गयी मैंने दोना उसकी तरफ किया .
“मीठा कम पसंद है मुझे ” उसने कहा
मैं- अब आदत डाल ले
वो- किस चीज़ की
मैं- हर उस चीज़ की जो अब तुम्हे पसंद करनी होगी.
वो- कौन सी फिल्मे देखता है तू, तेरी ये हरकते बेशक कइयो को दीवाना बना दे पर मैं उनमे से नहीं हूँ
मैं- इसमें दीवानगी की बात कहाँ आई, बात तो जलेबी की है
वो - ठीक है , ठीक है .
हम लोग अपनी मस्ती में थे, एक आधे लोग आते जाते हमें देख रहे थे पर किसे परवाह थी . मीता का साथ होना वो अहसास था जिसे मैं बार बार महसूस करना चाहता था .
“चल ठीक है , मेरे जाने का समय हुआ चलती हूँ ” उसने कहा
मैं- क्या अभी तो मिली अभी जा रही है
वो- जाना तो होगा जिस काम के लिए आई थी वो पूरा हुआ अब घर न जाऊ क्या
मैं- मैं छोड़ देता हु तुझे
वो- रहने दे
मैं- छोड़ ने ये नखरे तू दो मिनट रुक मैं अभी साईकिल लेकर आया .
उसके जवाब की परवाह किये बिना मैं दौड़ कर गया और साइकिल ले आया. वो बैठी और हम चल दिए. मैंने जान बुझ कर वो रास्ता लिया जो मेरी बंजर जमीं की तरफ से होकर जाता था . इधर उधर की बाते करते हुए हम मेरे खेतो पर पहुंचे.
“कुछ देर रुक जरा , फिर चली जाना ” मैंने उस से कहा
वो- जाना तो है ही फिर क्या थोड़ी देर क्या ज्यादा देर.
मैंने जवाब नहीं दिया. हम चलते चलते उस बावड़ी की तरफ आ गए .
मैं- इस जमीन को पता नहीं क्या हुआ है , कुवो में पानी भी है फिर भी बंजर है .
मीता- तू मेहनत करना यहाँ , क्या मालूम हरी भरी हो जाये.
मैं- मैंने भी यही सोचा है .
मीता- जमीन को पानी से नहीं बल्कि पसीने से सींचा जाता है , तू इसका मान करेगा ये पेट भरेगी तेरा. ये हमारी माँ है और माँ औलाद के लिए सब कुछ करती है
मैं- नेक विचार है
वो- तो कब से शुरू करेगा तू यहाँ काम करना
मैं- जिस दिन तू भरी दोपहर मिलने आया करेगी , इन्ही खेतो में अपनी प्रेम कहानी की फसल पकेगी.
मीता - इसीलिए मैं तुझसे दोस्ती नहीं करना चाहती थी न दो ही दिन में मोहब्बत की बाते करने लगा. मैं कहती हूँ तुझे ये मोहब्बत की बीमारी न ही लगे तो बढ़िया हो . इश्क का रोग जो लगा न तो फिर उम्र भर इलाज नहीं मिलता .
मैं- और जो अगर तेरा मेरा संजोग हुआ तो
वो- मैं जानती हूँ अपनी हदे.
मैं- पूछना तेरे सितारों से , उन्हें तो सब मालूम है न
मीता मुस्कुराई और बोली- सितारे झूठे होते है .
मैं- तो फिर सच्चा कौन हुआ
मीता-मेरे भाग के दुःख है सच्चे जो हर पल मेरे साथ है , मेरा साथ छोड़ते ही नहीं .
मैं- क्या पता वो भी इंतजार कर रहे हो की कब कोई आये तुझे थामने और वो तेरा साथ छोड़े
मीता- बस बहुत हुई बाते. जाने दे मुझे .
मैं- मेला देखेगी न मेरे साथ
मीता- नहीं बिलकुल नहीं
मैं- क्यों भला , मेरा हाथ दुनिया के आगे थामने से घबरा गयी क्या तू
मीता मेरे पास आई इतना पास की उसकी सांसे मेरी सांसो से टकराने लगी .
“इस दुनिया को इस ज़माने को अपनी जुती की नोक पर रखती हूँ मैं, अर्जुन सिंह के बेटे, अलख के पार रहूंगी मैं .मेरा हाथ थामने की हसरत है न तुम्हे , अगर तुम उस काबिल हुए तो थाम लेना मेरा हाथ किसने रोका है तुम्हे ” उसने कहा और अपने रस्ते मुड गयी .
मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा .