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Guest
पर मैं ये भूल गया था की अभी मेरी हालत ठीक नहीं है , ये तो शुक्र है की ताई ने वक्त पर थाम लिया मुझे वर्ना और चोट लग जानी थी .
“क्या कर रहा है तू, ” ताई ने मुझे डांटा और वापिस बेड पर ला पटका. ताई के तानो से ज्यादा मेरा ध्यान उस आदमी पर था , वो भागा क्यों. रात भर मैं ये ही सोचता रहा .
सुबह नर्स पट्टी बदलने आई तो मुझे मालूम हुआ की सर पर बारह टाँके आये थे और पसलियों को बहुत जायदा नुक्सान हुआ था , जिसकी भरपाई ना जाने कब तक होगी, होगी या नहीं होगी. मैं रीना का इंतज़ार करता रहा पर वो आई नहीं, शाम होने को आई थी , मीता भी नहीं आई. कुछ दिन ऐसे ही बीते , हालत में थोडा सुधार महसूस होने लगा था . इस बीच मैंने नोटिस किया की चाची मुझे देखने नहीं आई थी , सिर्फ ताई ही थी जो दिन रात मेरे पास रहती थी . मैं रीना के बारे में पूछता पर वो ये ही कहती की वो ठीक है , जल्दी ही आयेगी.
मैं बस बरसते सावन को देखता रहता था, मैंने सोचा तो था की इस बार का सावन अनोखा होगा, जिसमे मोहब्बत की बारिश होगी और भेगेंगे मैं और रीना . बेशक मेरी हालत ठीक नहीं थी पर अब मुझे कोफ़्त होने लगी थी इस हॉस्पिटल के कमरे से . और एक ऐसी ही रात, मैंने पाया की ताई गहरी नींद में पड़ी थी, पास की कुर्सी पर चाचा ऊंघ रहा था. मैं हौले से उठा और दोनों को चेक किया. मैंने टेबल से चाचा की गाड़ी की चाबी उठाई और धीरे धीरे कमरे से बाहर खिसक गया. भोर का समय नजदीक था पर बारिश घनघोर थी .
कमजोर कदमो से चलते हुए मैं खुद को बारिश से बचाते हुए मैं चाचा की गाड़ी तक आया और उसे उड़ा ले चला. मैं बस उस चेहरे का दीदार करना चाहता था जिसके बिना मैं कुछ नहीं था . भोर की पहली किरण और चमकती बरसात अपने आप में गजब ढा रही थी . मैंने गाड़ी रोकी , और सर पर हाथ रखते हुए , मनदिर की सीढिया चढ़ने लगा.
बाबा के आगे दिया जलाये , शांत बैठी थी वो. इतनी शांत की दिल किया ये वक्त थम जाये उसके और मेरे लिए. अम्रता प्रीतम ने कहा था की उसे देखा ऐसा जैसे कोई मजदुर के हाथ में उसकी रोज़ी रख दे. मेरा हाल भी कुछ वैसा ही था .
“कैसी है ,मेरी सरकार ” मैंने हौले से उसे पुकारा.
आहिस्ता से उसने अपनी आँखे खोली. नजरो से नजरे मिली. उसकी आँखों से जो आंसू टपके वो धरती पर नहीं सीधा मेरे कलेजे पर आकर गिरे.
“आ गया मैं ” मैंने उस से कहा.
वो मरजानी कुछ नहीं बोली, बस आकार चुपचाप मेरे सीने से लग गई. मेरे माथे पर चुम्बन अंकित किया उसने.
“बस कर, ये आंसू बड़े कीमती है इन्हें मुझ जैसे के लिए बर्बाद मत कर.” मैंने उस से कहा.
रीना- मेरा सब कुछ तुझसे है . तेरे बिना ये दिन कैसे बीते है मुझ पर मैं जानती हूँ या मेरा रब जानता है.
मैं- और मेरा क्या, कितना इंतज़ार किया था तेरा मैंने .
रीना- संध्या मामी ने मना किया था हॉस्पिटल आने को, बोली की तुझे उस हालत में देख नहीं पाउंगी. और मेरे दिल पर भी बोझ था
मैं-कैसा बोझ
रीना- सब मेरी गलती है , मैं वहां नहीं जाती तो ये सब होता ही नहीं
मैं- तेरी कोई गलती नहीं थी उसमे, तू मेरा मान है , मेरे होते किसकी मजाल जो आँख भी उठा सके मेरी सरकार की तरफ
रीना- तुझे कुछ हो जाता तो.
मैं- कुछ हुआ तो नहीं न . थोड़ी बहुत चोट है देर सबेर ठीक हो ही जानी है . और अब से तू अकेले कहीं नहीं आयेगी-जाएगी तेरी सुरक्षा की व्यवस्था मैं जल्दी ही करूँगा.
रीना- उस दिन के बाद से हमेशा कोई न कोई होता है मेरे साथ .
मैं- पर अभी तू अकेली ही थी न यहाँ पर
रीना- अभी नहीं हूँ अकेली.
मैंने देखा दिन निकल आया था बारिश थोड़ी मंद पड़ने लगी थी . मैंने रीना को साथ लिया और घर आ गए. चाची ने मुझे देखा और खूब गुस्सा किया, उसके अनुसार मुझे हॉस्पिटल से ऐसे ही नहीं आना चाहिए था . मैं सुनता रहा उसकी .
“चाची तुमने कभी बताया नहीं तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो ” मैंने कहा
चाची- हर कोई किसी न किसी की बेटी होती ही हैं ये कोई विशेष बात नहीं
मैं- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है
चाची ने एक नजर रीना की तरफ डाली और बोली- अभी नहीं , तुम लोग बैठो, मैं मिलती हूँ बाद में .
उसका यूँ जाना मुझे ठीक नहीं लगा. मैं बिस्तर पर लेट गया . रीना मेरे पास बैठ गयी .
मैं- बोल कुछ ऐसे खामोश क्यों है.
रीना- आजकल ख़ामोशी से दोस्ती सी हो गई है मेरी .
मैं- कहा न तुझसे, उस बात का मलाल मत रख , तुझसे किसी ने कुछ कहा क्या
रीना- नहीं, पर लोगो की नजरे सवाल करती है मुझ से
मैं- लोगो को मैं देख लूँगा.
रीना- मुझे बस तुम्हारी फ़िक्र है .
मैं- और मुझे तेरी . प्यास सी लगी है थोडा पानी पिला जरा
रीना उठी और झुक कर मटके से पानी भरने लगी तभी मेरी नजर उसके गले पर पड़ी, और मैं हैरान रह गया . उसके गले में वो ही हीरे वाला थागा था . हीरे का रंग उसके गेहुंगे रंग में जैसे घुल सा गया था . लाल-काले डोरे में गूंथा हुआ हीरा रीना के गले में बड़ा प्यारा लग रहा था.
“पानी ” उसने कहा .
मैंने उसके हाथ से गिलास लिया और घूँट भरे.
रीना- ऐसे क्या देख रहा है .
मैं- ये डोरा अच्छा लग रहा है तुझ पर
रीना- तेरी निशानी, उस दिन बेहोश होने से पहले तूने ही तो इसे मेरे हाथ पर रखा था . रुक अभी उतार कर देती हूँ तुझे
मैं- नहीं रे, पहने रख जंच रहा है तुझ पर .
तभी रीना को किसी ने बाहर से आवाज दी और वो चली गयी . पर मेरे लिए सवाल छोड़ गयी. जिस डोरे को मैं नहीं पहन पाया. उसे बड़ी आसानी से अपने गले में सजा रखा था रीना ने, मेरी आँखों के सामने उस कागज़ पर लिखे शब्द घूम रहे थे जिस पर लिखा था , इसका बोझ उठाना बड़ा मुश्किल है .
पर जो मेरे लिए मुश्किल था वो रीना के लिए आसान कैसे . सोचते सोचते कुछ देर के लिए मेरी आँखे बंद हो गयी.
“क्या कर रहा है तू, ” ताई ने मुझे डांटा और वापिस बेड पर ला पटका. ताई के तानो से ज्यादा मेरा ध्यान उस आदमी पर था , वो भागा क्यों. रात भर मैं ये ही सोचता रहा .
सुबह नर्स पट्टी बदलने आई तो मुझे मालूम हुआ की सर पर बारह टाँके आये थे और पसलियों को बहुत जायदा नुक्सान हुआ था , जिसकी भरपाई ना जाने कब तक होगी, होगी या नहीं होगी. मैं रीना का इंतज़ार करता रहा पर वो आई नहीं, शाम होने को आई थी , मीता भी नहीं आई. कुछ दिन ऐसे ही बीते , हालत में थोडा सुधार महसूस होने लगा था . इस बीच मैंने नोटिस किया की चाची मुझे देखने नहीं आई थी , सिर्फ ताई ही थी जो दिन रात मेरे पास रहती थी . मैं रीना के बारे में पूछता पर वो ये ही कहती की वो ठीक है , जल्दी ही आयेगी.
मैं बस बरसते सावन को देखता रहता था, मैंने सोचा तो था की इस बार का सावन अनोखा होगा, जिसमे मोहब्बत की बारिश होगी और भेगेंगे मैं और रीना . बेशक मेरी हालत ठीक नहीं थी पर अब मुझे कोफ़्त होने लगी थी इस हॉस्पिटल के कमरे से . और एक ऐसी ही रात, मैंने पाया की ताई गहरी नींद में पड़ी थी, पास की कुर्सी पर चाचा ऊंघ रहा था. मैं हौले से उठा और दोनों को चेक किया. मैंने टेबल से चाचा की गाड़ी की चाबी उठाई और धीरे धीरे कमरे से बाहर खिसक गया. भोर का समय नजदीक था पर बारिश घनघोर थी .
कमजोर कदमो से चलते हुए मैं खुद को बारिश से बचाते हुए मैं चाचा की गाड़ी तक आया और उसे उड़ा ले चला. मैं बस उस चेहरे का दीदार करना चाहता था जिसके बिना मैं कुछ नहीं था . भोर की पहली किरण और चमकती बरसात अपने आप में गजब ढा रही थी . मैंने गाड़ी रोकी , और सर पर हाथ रखते हुए , मनदिर की सीढिया चढ़ने लगा.
बाबा के आगे दिया जलाये , शांत बैठी थी वो. इतनी शांत की दिल किया ये वक्त थम जाये उसके और मेरे लिए. अम्रता प्रीतम ने कहा था की उसे देखा ऐसा जैसे कोई मजदुर के हाथ में उसकी रोज़ी रख दे. मेरा हाल भी कुछ वैसा ही था .
“कैसी है ,मेरी सरकार ” मैंने हौले से उसे पुकारा.
आहिस्ता से उसने अपनी आँखे खोली. नजरो से नजरे मिली. उसकी आँखों से जो आंसू टपके वो धरती पर नहीं सीधा मेरे कलेजे पर आकर गिरे.
“आ गया मैं ” मैंने उस से कहा.
वो मरजानी कुछ नहीं बोली, बस आकार चुपचाप मेरे सीने से लग गई. मेरे माथे पर चुम्बन अंकित किया उसने.
“बस कर, ये आंसू बड़े कीमती है इन्हें मुझ जैसे के लिए बर्बाद मत कर.” मैंने उस से कहा.
रीना- मेरा सब कुछ तुझसे है . तेरे बिना ये दिन कैसे बीते है मुझ पर मैं जानती हूँ या मेरा रब जानता है.
मैं- और मेरा क्या, कितना इंतज़ार किया था तेरा मैंने .
रीना- संध्या मामी ने मना किया था हॉस्पिटल आने को, बोली की तुझे उस हालत में देख नहीं पाउंगी. और मेरे दिल पर भी बोझ था
मैं-कैसा बोझ
रीना- सब मेरी गलती है , मैं वहां नहीं जाती तो ये सब होता ही नहीं
मैं- तेरी कोई गलती नहीं थी उसमे, तू मेरा मान है , मेरे होते किसकी मजाल जो आँख भी उठा सके मेरी सरकार की तरफ
रीना- तुझे कुछ हो जाता तो.
मैं- कुछ हुआ तो नहीं न . थोड़ी बहुत चोट है देर सबेर ठीक हो ही जानी है . और अब से तू अकेले कहीं नहीं आयेगी-जाएगी तेरी सुरक्षा की व्यवस्था मैं जल्दी ही करूँगा.
रीना- उस दिन के बाद से हमेशा कोई न कोई होता है मेरे साथ .
मैं- पर अभी तू अकेली ही थी न यहाँ पर
रीना- अभी नहीं हूँ अकेली.
मैंने देखा दिन निकल आया था बारिश थोड़ी मंद पड़ने लगी थी . मैंने रीना को साथ लिया और घर आ गए. चाची ने मुझे देखा और खूब गुस्सा किया, उसके अनुसार मुझे हॉस्पिटल से ऐसे ही नहीं आना चाहिए था . मैं सुनता रहा उसकी .
“चाची तुमने कभी बताया नहीं तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो ” मैंने कहा
चाची- हर कोई किसी न किसी की बेटी होती ही हैं ये कोई विशेष बात नहीं
मैं- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है
चाची ने एक नजर रीना की तरफ डाली और बोली- अभी नहीं , तुम लोग बैठो, मैं मिलती हूँ बाद में .
उसका यूँ जाना मुझे ठीक नहीं लगा. मैं बिस्तर पर लेट गया . रीना मेरे पास बैठ गयी .
मैं- बोल कुछ ऐसे खामोश क्यों है.
रीना- आजकल ख़ामोशी से दोस्ती सी हो गई है मेरी .
मैं- कहा न तुझसे, उस बात का मलाल मत रख , तुझसे किसी ने कुछ कहा क्या
रीना- नहीं, पर लोगो की नजरे सवाल करती है मुझ से
मैं- लोगो को मैं देख लूँगा.
रीना- मुझे बस तुम्हारी फ़िक्र है .
मैं- और मुझे तेरी . प्यास सी लगी है थोडा पानी पिला जरा
रीना उठी और झुक कर मटके से पानी भरने लगी तभी मेरी नजर उसके गले पर पड़ी, और मैं हैरान रह गया . उसके गले में वो ही हीरे वाला थागा था . हीरे का रंग उसके गेहुंगे रंग में जैसे घुल सा गया था . लाल-काले डोरे में गूंथा हुआ हीरा रीना के गले में बड़ा प्यारा लग रहा था.
“पानी ” उसने कहा .
मैंने उसके हाथ से गिलास लिया और घूँट भरे.
रीना- ऐसे क्या देख रहा है .
मैं- ये डोरा अच्छा लग रहा है तुझ पर
रीना- तेरी निशानी, उस दिन बेहोश होने से पहले तूने ही तो इसे मेरे हाथ पर रखा था . रुक अभी उतार कर देती हूँ तुझे
मैं- नहीं रे, पहने रख जंच रहा है तुझ पर .
तभी रीना को किसी ने बाहर से आवाज दी और वो चली गयी . पर मेरे लिए सवाल छोड़ गयी. जिस डोरे को मैं नहीं पहन पाया. उसे बड़ी आसानी से अपने गले में सजा रखा था रीना ने, मेरी आँखों के सामने उस कागज़ पर लिखे शब्द घूम रहे थे जिस पर लिखा था , इसका बोझ उठाना बड़ा मुश्किल है .
पर जो मेरे लिए मुश्किल था वो रीना के लिए आसान कैसे . सोचते सोचते कुछ देर के लिए मेरी आँखे बंद हो गयी.