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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

सिरिशा ने भी सोचा था, की विट्ठल उस बदसूरत राजलक्ष्मी से शादी नहीं करना चाहता था इसलिए उसने फौरन सिरिशा का हाथ थाम लिया था।

राजलक्ष्मी रईस और एक बड़े घराने से जरूर थी पर हर कोई जानता था की वो देखने में सुंदर तो क्या, एक आम लड़की से भी गई गुजरी थी, और ऊपर से कितनी मोटी भी तो थी वो। उसके मुकाबले मासूम सी दिखने वाली सिरिशा तो जैसे आसमान से उतरी एक परी थी। विट्ठल ने जबरदस्ती राजलक्ष्मी से हो रही अपनी शादी से बचने के लिए सिरिशा का सहारा लिया था।

वजह जो भी थी, विठ्ठल शादी के लिए मान गया था और उसने काफी समझदारी से काम लिया था। और उससे कहीं ज्यादा समझदारी दिखाई थी राजलक्ष्मी के घरवालों ने। अंदर से भले ही उन्हें ही इस तरह रिश्ता तोड़ दिए जाने पर बेइज्ज़ती महसूस हुई हो पर ऊपर से उन्होंने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। और तो और, उन्होंने तो विठ्ठल के परिवार के साथ अपनी बोल-चाल भी जारी रखी थी।

राजलक्ष्मी के तीनों भाइयों ने विठ्ठल को अपने नये फार्महाउस पर आने का न्योता तक भेज दिया ताकि दोनों परिवार के बीच जो कुछ भी हुआ था, वो खता किया जा सके और वो लोग बिना दिल में कुछ रखे आगे बढ़। सकें। विठ्ठल भी यही चाहता था की इस सारे कांड में किसी को कोई नुकसान ना पहुँचे इसलिए उसने फौरन हाँ कर दी।

उसी दिन फार्महाउस की तरफ जाते हुए विट्ठल की कार का आक्सिडेंट हो गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। ना तो उस ट्रक का पता चला जिससे विट्ठल की कार की टक्कर हुई थी और ना ही उस ट्रक ड्राइवर का।

3 दिन बाद विठ्ठल का क्रिया-कर्म कर दिया गया। एक बार फिर बातों का बाजार गरम हो चला था। कुछ को भरोसा था की विट्ठल के साथ जो कुछ हुआ उसमें भगवान का हाथ था। एक मासूम लड़की के साथ किए गये उसके सलूक की सजा भगवान ने उसे दी थी। भगवान नाराज थे और यही वजह थी के इस साल इस कदर बरसात हुई थी।

कुछ लोगों का मानना था की विठ्ठल मरा नहीं बल्कि उसे मारा गया है।

राजलक्ष्मी के परिवार वाले इज्ज़त और रोबदार लोग थे। अपनी बेटी की यूँ शादी तोड़ दिए जाने से सरेआम हुई बदनामी को वो कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। 3 भाइयों की वो अकेली बहन थी। अपनी बहन का बदला लिया था भाइयों ने।।

कुछ भी हो भैय्या..” क्रिया कर्म में शामिल होने आए लोगों में से किसी ने कहा था- “हम कौन है बोलने वाला... पोलीस ने तो लड़के का शरीर ठंडा पड़ने से पहले ही आक्सिडेंट बोलकर फाइल बंद कर दी थी। आक्सिडेंट कैसे हुआ, क्यों हुआ ये जानने की कोशिश तक नहीं की गई थी।

हैरत की बात थी की इतने दिन से लगातार हो रही बरसात उस दिन रुकी थी जिस दिन विट्ठल की चिता को आग दी गई।

सबको लगा था की विठ्ठल की मौत का सिरिशा को बहुत सदमा होगा। आखिर वो उसके बच्चे का बाप था और उसका होने वाला पति और शायद ऐसा हुआ भी। सिरिशा पूरी तरह मातम में शामिल थी। लोगों की बात माने। तो ये सदमा था या कुछ और पर इयू डेट आई और निकल गई पर सिरिशा को बच्चा नहीं हुआ। और जब हुआ तब तक ड्यू डेट को एक पूरा महीना निकल चुका था। यानी तब सिरिशा पूरे 10 महीने की प्रेग्नेंट थी। हास्पिटल का पूरा खर्चा विठ्ठल के परिवार ने उठाया।

शहर के एक महंगे हास्पिटल में बच्चे को जनम दिया गया और पैदा होने से पहले ही विठ्ठल के पिता इस बात का एलान कर चुके थे की बच्चे को विट्ठल का नाम दिया जाएगा और उसे पालने पोसने का पूरा खर्चा वो खुद उठाएंगे। वो खुद अपने परिवार के साथ बच्चा हो जाने के बाद सिरिशा से मिलने भी आए थे और बच्चे का नामकारण कर गये थे।

पूरा दिन सिरिशा को अकेले रहने का बिल्कुल मौका नहीं मिला। लोगों का आना जाना लगा रहा। कोई ना कोई उससे मिलने आता रहता। तरह तरह के गिफ्ट्स कोई नयी माँ के लिए लाता तो कोई बच्चे के लिए। कोई उसके

घर का था तो कोई विट्ठल के घर का जिन्होंने शायद तकदीर के आगे हार मान ली थी और अपने बेटे की निशानी, उसके बच्चे को अपना लिया था। आने वालों में कोई शकल सूरत से बच्चे को सिरिशा जैसा बताता तो

कोई विठ्ठल जैसा।।

अगले दिन जब उसकी माँ घर से कुछ समान लाने के लिए गई तो सिरिशा को पहली बार बच्चे के साथ अकेले होने का मौका मिला। उसने प्यार से अपने बच्चे को गोद में लिया और उसकी तरफ टकटकी लगाकर देखने । लगी। एक नजर में ही उसे एहसास हो गया था की बच्चा ना तो उसके जैसा दिखता था और ना ही विट्ठल के जैसा।

बच्चे की आँखें भूरे रंग की थी और ब्राउन आँखें ना तो सिरिशा की थी और ना विठ्ठल की। उन दोनों की क्या, पूरे गाव में भूरी आँखें किसी की नहीं थी। सिवाय फादर पीटर के।

***** समाप्त *****

 
मुम्बई लोकल

मुंबई जैसे शहर में किसी लाश का मिलना कोई अजीब बात नहीं है पर जब एक सर कटी लाश मिले तो न्यूसपेपर के पहले नहीं तो दूसरे पेज पर तो खबर आ ही जाती है। ऐसी ही एक सरकटी लाश एक दिन जोगेश्वरी के पास लोकल ट्रेन की रेलवे ट्रैक पर पाई गई। अखबार में खबर छपी, लोगों ने पढ़ी और भूल गये।

फिर भी उस केस ने पोलिसवालों को सोचने और सर खुजाने पर मजबूर कर दिया। पहला ख्याल तो लाश देखकर यही लगा की या तो मरने वाला किसी ट्रेन की चपेट में आकर वक़्त से पहले चल बसा या खुद ज़िंदगी से परेशान आकर रेलवे ट्रैक पर अपना सर रख दिया। पर बहुत जल्दी ही ये ख्याल बदल गया। वजह दो थी।

पहली तो ये की लाश का सिर्फ धड़ हासिल हुआ, सर का दूर दूर तक कोई पता नहीं था। दूसरा ये की शरीर के किसी भी दूसरे हिस्से पर चोट का कोई निशान नहीं था जो की आक्सिडेंट के केस में होना नामुमकिन था। पूरा शरीर सलामत था, सिर्फ सर काट दिया गया था जो की पोलिसवालों को लाख कोशिश करने के बाद भी ट्रैक पर दूर दूर तक कहीं नहीं मिला।

मर्डर हुआ था ये बात तो साफ थी पर लाश के साथ ऐसा सलूक क्यों किया गया ये बात साफ नहीं हो पाई। आम तौर पर सर काटकर कहीं और इसलिए छुपा दिया जाता है की मरने वाले की शिनाख्त ना हो सके पर इस केस में ऐसा नहीं था। लाश पर कपड़े सही सलामत था और कोई भी चीज जैसे की पर्स या घड़ी चुराई नहीं गई। थी। पर्स से ड्राइवरस लाइसेन्स मिला और लाश की शिनाख्त हो गई। मरने वाले की बीवी ने भी धड़ देखकर अपने पति को पहचान लिया।

अगले कुछ दिन तक सर की तलाश होती रही। रेलवे ट्रैक और आस पास के इस्टबिन्स को छान लिया गया पर सर नहीं मिला। हमारे देश में जहाँ इंसानी जिंदगी की वैसे ही कोई कीमत नहीं और जहाँ आलरेडी इतने केसस पेंडिंग पड़े हों ये बात भी बस एक दिन के अखबार की सुख बनकर रह गई। ये मर्डर केस भी पेंडिंग केसेस की एक लंबी लिस्ट में शामिल हो गया और शायद मरने वाले के रिश्तेदारों के अलावा सब इस बात को भूल गये।

पर दो महीने बाद ही सबकी याद तब ताजा हो गई जब ऐसी ही एक और लाश फिर जोगेश्वरी में ही रेलवे ट्रैक पर पाई गई। पहले केस की तरह ही इस बार फिर बड़ी सफाई के साथ सर काट दिया गया था जो की ढूँढ़ने से भी नहीं मिला। लाश पर कपड़े, पर्स, घड़ी, रिंग सब कुछ था। पोलिसवालों ने लाश की पहचान की और किसी रिश्तेदार ने फिर आकर शिनाख्त पक्की कर दी।

“अब इन रिपोर्टर्स को क्या बताऊं?" मैंने नाश्ता करते हुए अपनी बीवी से कहा- “इन्हें तो हर चीज का जवाब । चाहिए। और अब तो रिपोर्टर्स ही नहीं बल्कि ऊपर से भी प्रेशर आने लगा है। हर कोई मेरी जान खा रहा है की मैं जल्दी ही इस केस की जड़ तक जाऊं और पता लगाऊं की क्या हो रहा है। जैसे ये कोई बहुत ही आसान और मामूली काम हो..."

अगर ये काम आसान और मामूली होता तो उन लोगों को आपकी कोई जरूरत ही नहीं थी..” मेरी बीवी प्रिया ने कहा- “और वैसे भी, आपसे बेहतर पोलिसवला इस शहर में है ही कौन... जीतने केसेस आपने साल्व किए हैं उतने इस शहर में तो क्या, पूरे देश में किसी पोलिसवाले ने नहीं किए होंगे...” उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर मुश्कुराहट फैल गई। मैंने चश्मा उतार कर प्यार से उसकी तरफ देखा।

जब भी वो इस तरह की बातें करती थी, मुझे अपने ऊपर गर्व महसूस होने लगता था।

पर इस केस में तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है की कहाँ से शुरू करूं.” मैंने खड़े होते हुए कहा “दोनों मरने वालों की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, दोनों कहीं भी इन्वाल्व्ड नहीं थे, अपनी अपनी जिंदगी में खुश थे और सबसे बड़ी बात, दोनों का आपस में कोई लेना देना नहीं था। वो दोनों तो क्या, उनके दूर दूर के रिश्तेदार और दोस्तों तक एक दूसरे से कोई कनेक्सन नहीं था। पर फिर भी वो दोनों एक ही तरीके से मार दिए गये। और एक ही इलाके में मारे गये...”

तुम्हें यकीन है की इन दोनों को एक ही आदमी ने मारा है...”

लगता तो है...” मैंने उठकर दरवाजे की तरफ चला- “यकीनन तौर पर पता करने में थोड़ा वक़्त लगेगा...”

पर मैं गलत था, वक्त लगा नहीं।

उसी रात दो बजे मेरा फोन बजा तो मेरी आँख खुल गई- “एक और लाश मिली है सिर.." दूसरी तरफ से कान्स्टेबल की आवाज आई।

“कहाँ?”

जोगेश्वरी.. रेलवे ट्रैक पर ही। सर गायब है.”

ये 3 महीने में तीसरी लाश थी। मैं मर्डर साइट पर जाने की सोच ही रहा था की मेरी बीवी भी उठकर बेडरूम से बाहर आ गई।

चाय या काफी कुछ बना दें?” उसने पूछा।

नहीं मुझे फौरन निकलना पड़ेगा..."

“5 मिनट लेगेंगे बस। तुम तैयार हो जाओ, मैं बना देती हूँ...” कहकर वो बिना मेरे जवाब का इंतेजार किए किचन की तरफ बढ़ गई।

मेरी बीवी प्रिया 46 साल की एक सीधी सादी औरत थी। कोई उसे एक झलक देखकर ही बता सकता था की जवानी में वो बेहद खूबसूरत रही होगी। इस उमर में भी तीखे नैन नक्श, साफ रंग, लंबा कद और मजबूत काठी की वो औरत मुझे आज भी जी जान से प्यार करती थी, और राह देखती थी उस दिन की जब मैं रिटायर हो जाऊँगा और हम दोनों कहीं किसी हिल स्टेशन में छोटा सा घर लेकर रिटायर हो जाएंगे। उस बेचारी को क्या पता था की मैं अपनी जिंदगी का हर दिन ये सोचते हुए बिता रहा था की कैसे उससे छुटकारा पाऊँ। कैसे कोई ऐसा करिश्मा हो जाए की वो बिना कुछ कहे सुने मुझे छोड़कर चली जाए। उसे क्या पता था की उसका पति । शादी के 25 साल बाद अब इस उमर में उसको धोखा दे रहा था।

निशा को देखते ही मुझे उससे प्यार हो गया था।

“और आई लोव यू यू..” पलटकर निशा ने मुझसे एक दिन कहा था।

उसकी उमर तकरीबन 20-21 के आस पास थी। एक टिपिकल बंगाली ब्यूटी पर उसके चेहरे से ज्यादा आकर्षक था उसका शरीर। अगर माडर्न वर्ल्ड की टर्मिनालोजी में कहूँ तो सर से पैर तक पूरी की पूरी आइटम बाम्ब थी और बिस्तर पर तो जैसे आग लगा देती थी।

हाँ, मैं 50 साल की उमर में 20 साल की एक लड़की के साथ सो रहा था, अपनी बीवी को धोखा दे रहा था। पर जब मैं निशा के साथ होता था तो मुझे फिर से जैसे जवानी का एहसास होता था। लगता था की मैं अब भी वो सब कर सकता हूँ जो आज से 30 साल पहले कर सकता था। जबकि अपनी बीवी प्रिया के साथ मुझे हर पल यही महसूस होता था की मैं बुड्ढा हो रहा हूँ, जिंदगी के आखिरी पड़ाव की तरफ बढ़ रहा हूँ।

निशा के साथ मैं एक आजाद पंछी की तरह होता था, एक हिरण की तरह जो पूरे जंगल में उछलता हुआ भाग सकता था जबकि अपनी बीवी के साथ मैं अपने आपको एक कोल्हू में लगे हुए बुड्ढे बैल की तरह महसूस करता था।

“मुझे अपनी पूरी जिंदगी में ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ यार..” मैंने एक दिन अपने दोस्त सुशील से कहा था“मेरा दिल बँध सा गया है इस लड़की के साथ। 25 साल की अपनी शादी में मैंने कभी प्रिया को धोखा नहीं । दिया। मेरे लिए मेरी जिंदगी बस मेरा काम, मेरे बच्चे और मेरी बीवी थे। पर जब मैं निशा से मिला तो कुछ हो सा गया यार। उसने मुझे जैसे फिर से जीना सीखा दिया। मेरे से आधी उमर की इस लड़की ने मुझे सिखाया की वासना और प्रेम का असली मतलब क्या है। अच्छा तू ही बता, क्या तुझे उसे देखके नहीं लगता की भगवान ने उसे सिर्फ इसलिए बनाया है की उसके साथ प्यार किया जाए... और हैरत की बात पता है क्या है... की वो भी मुझसे उतना ही प्यार करती है। क्यों? ये मैं भी नहीं जानता। आई मीन क्या देखा उसने मुझमें... मैं उमर में उसके बाप से भी बड़ा हूँ, मेरा पेट निकला हुआ है, मैं गंजा हूँ, शादीशुदा हूँ, जवान बच्चों का बाप हूँ...”

 
एक बात तो पक्की है दोस्त..." सुशील ने मेरी लंबी बात का जवाब दिया- “ये ज्यादा दिन ऐसे नहीं चल सकता। किसी ना किसी तरह से इस सबका कोई ना कोई अंजाम तो होगा ही। पर हाँ तेरी बात से इनकार नहीं है मुझे, निशा है तो कमाल की पर कमाल की चीजें कभी कभी खतरनाक भी होती हैं..."

“तू ऐसा कैसे कह सकता है यार। तूने कभी उससे बात भी करके देखा है."

सब औरतें एक जैसी ही होती हैं दोस्त...” सुशील ने सिगरेट का लंबा काश लेते हुए कहा- “और इनमें उनका कोई दोष भी नहीं है। भगवान ने बनाया ही ऐसा है उनको, एक जैसा। तिरिया चरित्र के बारे में तो सुना है ना...”

मैं गुस्से से घूरकर देखा तो सुशील समझ गया की वो हद के बाहर जा रहा था।

देख यार...” वो आगे होकर मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला- “मैं सिर्फ ये कह रहा हूँ की तू जो कर रहा है खतरनाक है। तेरी पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकता है। जो इज्ज़त, आन इन सारे सालों में कमाई है एक पल में खतम हो सकती है..."

वो सही कह रहा था। मेरी बीवी, मेरा परिवार, मेरे दोस्तों, और सोसाइटी की नजर में मेरी बहुत इज्ज़त थी जो की एक पल में खतम हो जाती अगर लोगों को ये खबर हो जाती की मैं बुढ़ापे में ऐसे गुल खिला रहा हूँ।

देख तू इस वक़्त दो औरतों के साथ भिड़ा हुआ है...” सुशील ने अपनी बात जारी रखी- “और औरतें हमारी तरह नहीं होती..” तुझे लगता है की तेरी बीवी बेवकूफ है.. आई आम श्योर की शक तो उसको अब तक आलरेडी हो ही चुका होगा.”

उसने कुछ कहा तो नहीं अब तक..” मैंने जवाब दिया।

“आफ कोर्स नहीं कहा होगा। वो तुझसे ज्यादा समझदार है। वो इस उमर में अपनी शादी थोड़े ही खतम करेगी..."

वैसे आजकल कहती है की उसको अजीब अजीब ख्वाब आते हैं। कहती है की उसके सपनों में मैं किसी दूसरी औरत के साथ होता हैं। पर फिर खुद ही हँसकर बात टाल देती है...”

“मुझे तो लगता है की वो तुझे इशारा कर रही है की उसको सब पता है...”

कभी कभी तो यार सोचता हूँ की खुद ही उसे सब बता दें.”

सुशील के हाथ से जैसे विस्की का ग्लास गिरते गिरते बचा।

“तेरा ना साले सही में दिमाग खराब हो गया है..." उसने मुझे घूरते हुए कहा- “ये गलती कभी मत करना। अट लीस्ट उस दिन तक तो नहीं जब की तूने प्रिया को छोड़ने का अपना मन बना लिया हो...”

सरकटी लाशों का केस जैसे खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। इस बार मीडीया वाले ने बात को हद से ज्यादा तूल दे दिया था। रोजाना अखबार में कोई ना कोई हेडलाइन होती थी। कोई इनको स्टोनमैन मर्डर्स के साथ जोड़ रहा था तो कोई कहता था की अभी और लोग मरेंगे, और लाशें मिलेंगी।

हम अपनी कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ रहे। जो भी इस सबके पीछे है वो कानून से नहीं बचेगा...” मैंने एक प्रेस कान्फरेन्स में कहा।

क्या उन लाशों के सर मिले अब तक?” एक रिपोर्टर ने सवाल किया।

“नहीं उनकी तलाश भी अब तक जारी है..” मैंने जवाब में कहा।

और इस सबका असर पब्लिक पर पड़ता हुआ भी दिखाई देने लगा था। जोगेश्वरी तो क्या, आस पास के सारे रेलवे स्टेशन्स के करीब लोग देर रात अकेले नहीं घूमते थे। लेट नाइट लोकल ट्रेन्स में लोग अब कम ही नजर

आते थे और अकेले तो बिल्कुल भी नहीं। जहाँ लाशें मिली थी उस इलाके में लोग 10:00 बजे के बाद अकेले तो दिखाई देते ही नहीं थे। एक अंजान सा खौफ जैसे पूरे जोगेश्वरी में फैल गया था। हर कोई उम्मीड कर रहा था

की मैं जल्दी ही खूनी को पकड़कर इस सारे तमाशे को खतम कर दूंगा।

पर मेरे लिए खूनी को पकड़ने के साथ साथ एक और परेशानी वाली बात उठ खड़ी हुई थी। निशा ने एक दिन अचानक मेरे सर पर बाम्ब गिरा दिया था की वो प्रेग्नेंट थी और बच्चा गिरना नहीं चाहती थी।

“मुझे लगा की हम शादी करने वाले थे..” रोते रोते उसने फोन पर मुझे कहा।

पर मैं आलरेडी शादीशुदा हूँ..” मैंने जवाब दिया।

“मैं सोच रही थी के तुम अपनी बीवी को छोड़कर मेरे पास आ जाओगे। मैं अपना सब कुछ तुम्हारे साथ बाँटना चाहती हूँ, तुम्हें पूरी तरह अपनी जिंदगी में लाना चाहती हूँ...” वो सिसकते हुए बोली।

पर हम ऐसे भी तो साथ ही हैं ना..” मैंने कहा।

“नहीं.. ऐसे नहीं... ऐसे तो समाज के सामने ये बहुत बड़ा पाप है.” उसने जवाब दिया और फोन रख दिया।

मेरा ध्यान मेरे काम से हट गया। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था की मैं क्या कर रहा हूँ। दिन रात मैं बस निशा के बारे में ही सोचता रहता था। काश ऐसा हो जाता की प्रिया मुझे खुद ही छोड़कर चली जाती... काश ऐसा हो जाता के निशा उतने में ही खुश रहती जितना की मैं उसे दे रहा था... औरतों के साथ क्यों ऐसा होता है की उन्हें जितना भी दिया जाए कम है... ऐसा लगता है की जितना तुम दो उतने ज्यादा की उन्हें जरूरत रहती है। उस दिन तक जबके तुम्हारे पास देने को और कुछ बाकी ना रह जाए।

मर्डर इन्वेस्टिगेशन जैसे चींटी की चाल चल रही थी। मेरे पास ना कोई मोटिव था, ना कोई शक के घेरे में था।

और ना ही केस में कोई लीड्स मिली थी। मेरे ऊपर वाले मुझपर दबाव डाल रहे थे, प्रेस मेरा मजाक उड़ा रही थी और मेरे नीचेवाले मेरा मजाक उड़ा रहे थे। किसी को शायद ये समझ नहीं आ रहा था की मुंबई पोलीस का डेडिकेटेड आफिसर अचानक इतना ढीला कैसे पड़ गया।

एक दिन मैं केस के सिलसिले में जोगेश्वरी रेलवे श्टेसन पर गया। पर आधे घंटे की झक झक के बाद जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो मैं और मेरे साथ का कान्स्टेबल वापिस पिलीसे जीप की तरफ बढ़े। रेलवे स्टेशन के अंदर बने एक पुल की सीढ़ियों के पास खड़ा एक आदमी कुछ पेपर्स बाँट रहा था, किसी चीज का इश्तहार।

प्रोफेसर नोफरत..." एक कागज का टुकड़ा उसने मेरे हाथ में भी थमा दिया- “ज़िंदगी के हर मामले में आपकी मदद कर सकते हैं। अपना हाथ एक बार जरूर दिखाएं.”

“क्या बकवास है ये?” मैंने कागज एक तरफ उछाल दिया।

 
*आपके लिए बकवास हो सकता है सर...” मेरे साथ चल रहे कान्स्टेबल ने कागज फिर उठाया- “पर बहुत सारे लोग यकीन रखते हैं इसमें और अब तो अस्ट्रोलजी एक साइन्स भी बन गई है। मैं तो कहता हूँ की 90% लोग रोज अखबार में अपना हारोस्कोप जरूर पढ़ते होंगे.."

शायद..” मैंने वो कागज का टुकड़ा उससे वापिस लिया और उसपर नजर डाली। किसी हाथ देखने वाले का इश्तहार था जो अपने आपको प्रोफेसर कहलवाना पसंद करता था, ना की बाबा।

प्रोफेसर नफरत क्या आप जिंदगी से मायूस हैं... क्या आपकी बीवी आपसे खुश नहीं... क्या आप काम में तरक्की नहीं कर पा । रहे... क्या आपको बच्चा नहीं हो पा रहा... क्या आपकी माशूका आपसे अब प्यार नहीं करती... क्या आप अपने प्यार का इजहार अपने दिल में बसने वाली से नहीं कर पा रहे... तो ना हों उदास क्योंकी उपाय है हमारे पास। एक बार आवश्य मिले या नीचे दिए नंबर पर फोन करें। पैसे काम पूरा होने के बाद।

022... +9199...

निशा ने अब मुझसे मिलना या बात करना बिल्कुल बंद कर दिया था और मैं उसके इश्क़ में दीवाना हुआ जा रहा था। प्रिया के साथ मेरी सेक्स लाइफ कबकी खतम हो चुकी थी इसलिए बिस्तर पर मुझे निशा की जरूरत हद से ज्यादा महसूस हो रही थी। किसी कालेज में पढ़ने वाले लड़के की तरह मैं अक्सर निशा के घर के सामने बने पार्क में बैठा रहता, उसकी एक झलक पाने को।

ये देखने को की क्या वो किसी और के साथ है... कई बार मैंने सोचा की उठकर खुद उसके घर पहुँच जाऊं पर फिर निशा की वो बात याद आ जाती की अगर मैंने उससे मिलने की कोशिश की तो वो अपनी जान दे देगी। नहीं, ऐसा तो मैं बिल्कुल नहीं चाहता था। उस पार्क में बैठे वो अक्सर मुझे दिखाई देती थी। उसने सिगरेट पीनी फिर से शुरू कर दी थी जो मैंने बड़ी कोशिश और वादों के बाद छुड़वाई थी। केस के बारे में सोचना तो मैंने कबका बंद कर दिया था।

और मेरा यही जुनून था की एक दिन मैंने दिल के हाथों हार कर प्रोफेसर नोफरत को फोन कर दिया, इस उम्मीद के साथ की शायद वो मेरी कोई मदद कर दे। शायद वो कुछ ऐसा कर दे की निशा का दिल बदल जाए

और वो फिर मेरी जिंदगी में आ जाए।

आइए अंदर आइए..." प्रोफेसर नोफरत ने दरवाजा खोलते हुए कहा।

फोन पर उसने मुझे आकर मिलने को कहा और मैं उसी शाम उसके बताए अड्रेस पर पहुँच गया था। रंग रूप में वो बिल्कल काला था। देखकर कहा नहीं जा सकता था की देश के किस हिस्से का वो रहने वाला है पर घर और उसको देखकर कहा जा सकता था की अपने धंधे में वो पैसे अच्छे कमा रहा था।

आपने अपना नाम अब तक नहीं बताया..” उसने मुझे एक चेयर पर बैठने का इशारा किया और मेरे सामने बैठते हुए मुझसे पूछा।

मेरा नाम इस वक़्त उतना जरूरी नहीं जितना की आपका मुझे ये बताना की आप मेरी कोई मदद कर सकते हैं। या नहीं?” मैंने पोलिसिया अंदाज में जवाब दिया।

जहाँ तकलीफ होती है वहाँ इलाज भी होता है। एवरी प्राब्लम हैज आ सल्यूशन...” उसने मुश्कुराते हुए मेरी बात का जवाब दिया। उसने काले रंग का एक सूट पहना हुआ था जो देखने से ही काफी महंगा मालूम हो रहा था। जबकि मैं तो लाल या भगुवे रंग में किसी बाबा की उम्मीद कर रहा था। हाथ पर महंगी घड़ी, सोने की अंगूठियां, गोल्डेन फ्रेम का चश्मा, लक्ष्मी उसपर मेहरबान थी।

चलिए नाम अभी मत बताइए। अपनी प्राब्लम बताइए..." उसने मुझसे कहा।

अगले आधे घंटे तक मैं किसी तोते की तरह अपनी कहानी उस अंजान आदमी को बताने लगा। बातों बातों में मैं उसे अपना, प्रिया और निशा का नाम भी बता गया। इसको कहानी बताकर आखिर जाएगा भी क्या, मैंने दिल ही दिल में सोचा था। इस बहाने से कम से कम मेरे कंधो से एक बोझ हट गया था क्योंकी मुझपर क्या गुजर रही थी मैं बहुत दिन से किसी को बताना चाह रहा था। किसी ऐसे को जो सुने मगर मेरे बारे में कोई फैसला ना करे, मुझे जज ना करे। मुझे लगने लगा था की अगर यही पागलपन चलता रहा तो मैं या तो अपने आपको खतम कर लूंगा या किसी और को नुकसान पहुँचा दूंगा। प्रिया और निशा के बीच मैं ऐसा हँसा हुआ था की नोफरत से बात करने में मुझे कोई नुकसान दिखाई नहीं दिया।

हम्म्म्म ...” मेरी बात खतम होने पर वो बोला- “आप पहले नहीं हैं जो मेरे पास इस तरीके की परेशानी लेकर आए हैं और शर्तिया तौर पर मैं आपकी मदद कर सकता हूँ। पर ये मेरे लिए आसान नहीं है। इन सबके लिए एक स्पेशल प्रोसेस होता है, एक सेरेमनी की जाती है जिसे हम आम भाषा में तंत्र या पूजा कहते हैं। आप शादीशुदा हैं और आप चाहते हैं की मैं एक नहीं बल्कि दो औरतों का मन बदल दें। आपकी बीवी का मन ऐसा बनाऊँ की वो आपको छोड़कर चली जाए, बिना कुछ कहे सुने और आपकी प्रेमिका का मन ऐसा बनाऊँ की उसे आपके सिवा दुनिया में कुछ दिखाई ना दे। और ऐसी चीजों के लिए कई बार अजीब अजीब रास्ते लेने पड़ते हैं। कुर्बानी देनी पड़ती है। सैक्रिफाइस जिसे हम कहते हैं.”

किस तरह का सैक्रिफाइस?” मैंने पूछा।

वो आप मुझ पर छोड़ दीजिए। अब बिना अंडा फोड़े तो ओमलेट बन नहीं सकता। पर इस सब में खर्चा बहुत आएगा..”

कितना..” मैंने पूछा और जितना पैसा उसने बताया, वो सुनकर मेरी आँखें फैल गई।

"जानता हूँ की आपको बहुत ज्यादा लग रहा है पर बेफिकर रहिए। पैसा मैं आपसे काम होने के बाद लँगा क्योंकी मुझे यकीन है की काम हो जाने के बाद आप खुशी खुशी पैसा देने खुद आएंगे। और वैसे भी, अगर मैं आपके लिए कुछ कर सकता हैं तो आपके खिलाफ भी कर ही सकता हूँ..."

उसका अंदाज ऐसा था की मैं सिहर उठा।

तो ठीक रहा फिर। तो मैं आपसे दो हफ्ते बाद मिलूंगा। आप मेरे पास आ जाइएगा इस महीने की 15 तारीख को। तब तक मैं उन चीजों का इंतेजाम कर लँगा जो हमें सेरेमनी के लिए चाहिए होंगी...”

 
“आप मुझे बता दीजिए, मैं आपको चीजें लाकर दे दूंगा..” मैंने कहा।

तो वो हँस पड़ा- “अरें नहीं नहीं... ये मेरा काम है आप मुझपर ही छोड़ दीजिए। इस तरह की पूजा में जो चीजें चाहिए होती हैं वो आपकी सोच से परे हैं। ये एक तंत्र आहुति है, यहाँ बलि देनी पड़ती है ऐसी चीजों की जो हम अक्सर अपने कलेजे से लगाए घूमते हैं...”

मुझे समझ नहीं आया की उसकी बात का क्या जवाब दें?

आपके पास आपकी बीवी और आपकी प्रेमिका की कोई तस्वीर है?” उसने मुझसे पूछा।

प्रिया की तस्वीर मेरे पर्स में थी जो मैंने उसे दे दी पर निशा की कोई तस्वीर मेरे पास नहीं थी।

चलिए कोई नहीं, मुझे बताइए के वो दिखती कैसी है और बहुत बारीकी से बताईएगा...” उसने कहा तो मैं उसको निशा के बारे में बताने लगा और वो एक पेपर पर लिखने लगा। आखिर में उसने मुझसे उन दोनों की कोई चीज

माँगी।

मेरे पास उस वक़्त बाइ चान्स मेरी बीवी का पेन था और निशा का दिया हुआ रुमाल जो वो पहले खुद इस्तेमाल करती थी पर आखिरी मुलाकात में मेरे पास रह गया था और जिसे मैं साथ साथ लिए घूमता था। दोनों चीजें मैंने उसे दे दी।

आखिर दो हफ्ते गुजरे और वो दिन आया जिसका मैं बेसब्री से इंतेजार कर रहा था, यानी की पूजा का दिन। जिस दिन मेरी सारी मुश्किलें हाल हो जानी थी, जिस दिन निशा पूरी तरह मेरी होकर मेरी जिंदगी में आ जानी थी।

मेरी बीवी जल्दी सो गई थी और मैं रात के 11:00 बजे चुपचाप नोफरत के पास जाने के लिए तैयार हो रहा था। की अचानक फोन बज उठा।

क्या है?” मैंने गुस्से में फोन उठाते हुए पूछा।

सिर कमिशनर साहब ने आपको बुलाया है...” दूसरी तरफ से आवाज आई।

क्यों क्या हो गया?”

सिर फिर से लाश मिली है...” सुनकर मेरा दिल धड़क उठा।

“कहाँ?”

वहीं जोगेश्वरी में सर... रेलवे ट्रैक पर...”

मैं अजीब हालत में फँस गया। मुझे नफरत से मिलने जाना था पर कमिशनर की बात भी नहीं टाल सकता था।

ठीक है मैं आ रहा हूँ..” कहकर मैंने फोन रख दिया।

नोफरत जोगेश्वरी में ही रहता था। मैं कमिशनर से मिलके सीधा उसके पास जा सकता था। घर से मैं तैयार । होकर निकला। जोगेश्वरी रेलवे स्टेशन के बाहर मैंने अपनी गाड़ी रोकी तो एक कान्स्टेबल फौरन मेरी गाड़ी की तरफ आया।

क्या चल रहा है?” मैंने पूछा।

तूफान मचा हुआ है सर... किसी रेलवे में काम करने वाले आदमी ने लाशें देखी और पोलीस को फोन किया...” कान्स्टेबल ने जवाब दिया

लाशें...” मैंने हैरत से उसकी तरफ देखा।

इस बार दो मिली हैं सर..” उसने कहा और मेरे पीछे पीछे चल पड़ा।

जहाँ लाशें मिली वहाँ लोगों की भीड़ लगी हुई थी। आने जाने वाली सब ट्रेन्स को फिलहाल के लिए रोक लिया गया था। पोलिसवालों और मीडिया ने पूरी जगह को घेर रखा था।

“सर मरने वाले कौन हैं?”

आखिर ये कब तक चलेगा... पोलीस कुछ करती क्यों नहीं?”

क्या आपके पास कोई लीड्स हैं?" क्या किसी पर शक है?”

और इस तरह के हजारों सवाल मेरे वहाँ पहुँचते ही चारों तरफ से उठने लगे। मैं सबसे बचता हुआ लाश के करीब पहुँचा। कमिश्नर भी वहीं साइड पर खड़े थे।

मेरी नजर उनसे मिली और गुस्से में उन्होंने मुझे घूरा। चारों तरफ रोशनी फैली हुई थी और मेरे सामने दो शरीर पड़े हुए थे, सफेद चादर में ढके हुए और ऊपर की तरफ जहाँ उनका सर होना चाहिए था वहाँ खून का धब्बा बना हुआ था। सर दोनों लाशों के गायब थे।

इस बार दोनों औरतें हैं सर। फिलहाल कुछ भी छेड़ा नहीं गया है...” साथ खड़े सब-इनस्पेक्टर ने मुझसे कहा तो मैंने इशारे से चादर ऊपर करने को कहा।

चादर हल्की सी ऊपर की गई ताकि मैं लाश को देख सकें। वो कोई 40-45 साल की औरत थी। देखने से वो साफ रंग, लंबा कद और मजबूत काठी की औरत लगती थी। मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी। सामने पड़े शरीर की जिस तरह की बनावट थी, अगर मुझे ये पता ना होता की मेरी बीवी को मैं अभी घर पर सोता हुआ छोड़के आया हूँ, तो मुझे यही लगता के वो मेरी बीवी है।

तभी मेरी नजर उस औरत के हाथ पर पड़ी। उसके हाथ में एक पेन था। मैंने नीचे बैठते हुए करीब से देखा। ये मेरी बीवी का पेन था, वही पेन था जो मैंने नफरत को दिया था।

“एक सेरेमनी करनी पड़ती है, एक पूजा। अब आप मुझे बताइए की आपकी बीवी और प्रेमिका दिखती कैसी है। बहुत बारीकी से बताईएगा...” मुझे नफरत की बातें याद आ रही थी।

धड़कते दिल के साथ मैंने मैंने दूसरी लाश से चादर हटाई। सबसे पहली चीज जो मुझे नजर आई वो थी उस लाश के हाथ पर बँधा रुमाल।

निशा का रुमाल, जो मैंने नोफरत को दिया था।

पहली औरत, शरीर से बिल्कुल मेरी बीवी जैसी। मैं शायद जानता था की दूसरी चादर के नीचे जो औरत होगी वो कैसी होगी पर जब चादर उठी तो मुझे खड़े खड़े चक्कर आ गये।

भले ही लाश से सर गायब था पर निशा का जिम मैं एक पल में देखते ही पहचान गया।

***** समाप्त *****

*****

*****

***** *****

 
मेहराम

कमरे में रखे रेडियो पर हल्की आवाज में गाना गूंज रहा था।

कैसे कहें अलविदा मेहराम, कैसे रहें अजनबी तुम हम...”

वर्कशाप खतम हो चुकी थी पर हमेशा की तरह दोनों वहीं बैठे बातें कर रहे थे।

मेहराम मतलब...” गाने के बोल सुनकर वो पूछ बैठी।

“मेहराम मतलब कोई आपका पहचान वाला। नाट ओन्ली पहचान वाला बट कोई आपका करीबी, वेलविशर टाइप यू नो। कोई जो आपका भला चाहता हो..” उसने समझाते हुए कहा।।

!!

कमाल हैं यार समीर। तुम इतनी अच्छी उर्दू कैसे बोल लेते हो समझ नहीं आता, आई मीन यू आर नाट ईवन आ मुस्लिम..” वो हँसती हुई बोली।

“य आई आम नाट बट जाने क्यों मुझे हमेशा दो जुबान बहुत अच्छी लगती थी। एक तो पंजाबी और दूसरी उर्दू। पंजाबी मैंने थोड़ी इधर और थोड़ी उधर से सीख ली और उर्दू मैंने कालेज में आस सेकेंड लँग्वेज ली हुई थी. वो हँसते हुए बोला।

सो यू वेंट टु कालेज टू.. यू नेवर टोल्ड मी तट..” वो शिकायत करने के से लहजे में बोली।

“वेल आई आम टेल्लिंग यू नाउ। य आई वेंट टु कालेज, बी.काम. आनर्स...” वो उसके लहजे को सुनकर मुश्कुराता हुआ बोला।

तो आक्सिडेंट कब हुआ था तुम्हारा?”

फाइनल एअर में, एग्ज़ैम्स से जस्ट पहले। आँखें जाने का अफसोस जो है सो है, उससे बड़ा अफसोस ये रहा की बी.काम. पास नहीं कर सका। थोड़ा बाद में हो जाता, आई मीन्स एग्ज़ैम्स के बाद, तो कम से कम जिस डिग्री के लिए इतनी मेहनत कर रहा था वो फाइनल एअर में ना छोड़नी पड़ती..” वो हँसता हुआ बोला।

शट अप, इट्स नाट फन्नी..." वो अब भी वही शिकायती लहजा कायम किए हुए थी।

ओके ओके आई आम सारी...” लड़के ने फौरन हथियार डाल दिए- “अच्छा ये बताओ आज वर्कशाप में क्या सीखा...”

लल्लू बनाना सीखा। हमें टाइपिंग करना सिखा रहे हैं उस स्पेशल टाइपिंग मशीन पर जो अंधो के लिए बनी है। मैं पूछती हूँ की अगर चलो मैंने टाइपिंग सीख भी ली इनके तरीके से तो भला मुझे पता कैसे चलेगा अगर मैं गलती कर रही हैं तो। आई मीन आई कॅट रियली लुक अट इट ओर कन आई... और अनलेस आई कैन सी, हाउ द हेल आम आई सपोज तो नो की मैंने वही टाइप किया है जो करना था या गलती से अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल टाइप कर दिया...”

उसकी बात सुनकर वो हमेशा की तरह दिल खोलकर जोर से हँस पड़ा।

हाँ.. हाँ हँसो हँसो..” वो उसकी जाँघ पर हाथ मारते हुए बोली। पिछले दो साल से दोनों उस वर्कशाप में आते थे साइट फार ब्लाइंड्स” नाम की उस वर्कशाप में देख पाने से मजबूर लोगों को तरह तरह के काम सिखाए जाते थे। ऐसे काम जिन्हें करने के लिए आम जिंदगी में आँखों की जरूरत पड़ती है। उसी काम को बिना आँखों के कैसे किया जाए, यही उस वर्कशाप में सिखाया जाता था।

अच्छा कुछ सुनाओ ना। काफी दिन हो गये..” वो चहकते हुए बोली।

हम्म्म्म..” वो सोचने लगा-

सुनो तेरे कूचे से उठके जिधर जाऊं मैं,

चलू दो कदम और ठहर जाऊं मैं।

दुनिया खफा रहे तो परवाह नहीं कोई,

तू खफा हो तो मर जाऊं मैं।

बिन तेरे संभाले हैं खुद को मगर,

छू भी ले जरा सा कोई तो बिखर जाऊं मैं।

आसम... यू शुड रियली ट्राई व्रटिंग प्रोफेशनली यार। यू हव आ गिफ्ट, डोंट वेस्ट इट। काफी कम लोग होते हैं। दुनिया में जो शब्दों के साथ तालमेल बैठा पाते हैं। तुम ऐसा कर सकते हो तो अपने शौक को अपना प्रोफेशन क्यों नहीं बना लेते...”

सोचूंगा...” वो हमेशा की तरह टालते हुए बोला।

जब भी मैं इस बारे में कोई बात करती हूँ तुम टालने लगते हो। सोचो समीर और प्लीज मेरी बात का बुरा नहीं मानना। देखो इसके अलावा ऐसा और कोई टलेंट है नहीं तुम्हारे पास जो आँखें जाने के बाद तुम्हें दो वक़्त की। रोटी कमा कर दे सके। और चाहे हम कितना भी इस बात से इनकार करें, हकीकत तो यही है की ऊपर वाले ने आँखें लेकर जिंदगी के ज्यादातर रास्ते बंद कर दिए हैं। तो मेरी सलाह मानो और जो एक रास्ता अब भी खुला है, उस रास्ते को अपना लो...”

 
बात तो सही है..” लड़के ने सहमति जताई।

आफ कोर्स सही है। और जितना अच्छा तुम लिख लेते हो, यकीन मानो दो वक्त की रोटी से कहीं ज्यादा कमाओगे...”

*

जानते हो अगर मैं देख सकने के काबिल होती तो सबसे पहले क्या करती...” वो उसके काँधे पर सर टिकाए बैठी थी।

“क्या?” लड़के ने अपने एक हाथ से उसके बालों को सहलाते हुए कहा।

तुमसे शादी करती..” लड़की ने हल्की हँसी के बीच कहा।

थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच एक खामोशी छा गई।

इतना सीरियस क्यों हो गये। मैं ये थोड़े कह रही हूँ के अभी शादी कर लो मुझसे..." लड़की फिर हल्की सी हँसी के साथ बोली।

“हाँ... क्यों नहीं?” लड़के ने फौरन जवाब दिया।

“मतलब?”

मतलब ये की हाँ, क्यों ना हम शादी कर लें। आई मीन अभी, हाल फिलहाल में...” लड़का उसके हाथ को अपने होंठो तक लाया और चूमते हुए बोला।

इस बार चौंकने की बारी लड़की की थी- “क्या कह रहे हो। यू कॅट बे सीरियस..” वो अपना सर उसके कंधे से हटते हुए बोली।

वाइ नोट..."

इसलिए समीर की हम दोनों देख पाने से मजबूर हैं और दो कमजोर लोग मिलकर एक मजबूत घर की बुनियाद नहीं रख सकते..” शोखी और मोहब्बत की जगह अब लड़की की आवाज में दर्द ने ले ली थी।

कुछ पल के लिए फिर खामोशी छा गई।

“मतलब अगर हम दोनों में से कोई भी देख सकता तो तुम मुझसे शादी कर लेती...” कुछ देर बाद लड़का बोला।

“कोई भी नहीं, मैं। शादी मेरे लिए एक ऐसा ख्वाब है समीर जो मैं सिर्फ अपने ख्यालों में नहीं देखना चाहती। मैं उस ख्वाब को सच होते हुए, अपने रूबरू देखना चाहती हूँ। अपनी आँखों से...”

मगर..."

नहीं समीर.. प्लीज...” लड़की ने उसकी बात को काट दिया- “मैं बचपन से आँधी हूँ और देखना किसे कहते हैं ये मैंने सिर्फ सुना ही है। तुम हमेशा कहते हो की मैं बहुत खूबसूरत हूँ पर जब तक ये सब मैं खुद महसूस ना कर हूँ तब तक मैं शादी जैसा बड़ा फैसला नहीं कर सकती। अगर मैं जिंदगी जियूंगी तो पूरी तरह नहीं तो ऐसे ही घुट घुट कर मरूंगी। आइदर इट्स एवेरिथिंग आर नथिंग, बीच का रास्ता मेरे लिए बना ही नहीं..."

कमरे में फिर खामोशी छा गई। कुछ देर बाद लड़का बोला

ना मंदिर में मूरत, ना मस्जिद में खुदा होता, हमसे ही ये तमाशा है, ना हम होते तो क्या होता।

घटा छाती, बाहर आती, तुम्हारा ताजकिरा होता, फिर उसके बाद गुल खिलते की जख़्म-ए-दिल हरा होता। बुलाकर तुमने महफिल में हमको गैरों से उठवाया, हम ही उठ गये होते, इशारा कर दिया होता

“कम ओन समीर...” वो फिर बच्चे की तरह बिलख पड़ी- “यू नो आई लव यू, यू नो दैट। इट्स जस्ट दैट देयरआर आ फ्यू थिंग्स..."

आई अंडरस्टॅड...” इससे पहले की वो रो पड़ती लड़का बीच में बोल पड़ा- “कोई बात नहीं। मैं नाराज नहीं हूँ..”

एक बार फिर उसने लड़की के हाथ को चूमा।

अच्छा एक बात बताओ..” उसने लड़की से पूछा।

हाँ..."

दो आँखें ही चाहिए... कहीं से एक मिल जाए तो नहीं चलेगा..” लड़के की बात पर दोनों हँस पड़े।

बिल्कुल नहीं चलेगा। कानी से शादी फिर तुम खुद ही नहीं करोगे और एक आँख वाली कानी कहलवाने से बेटर है की मैं आँधी ही रहूं...”

कुछ देर हँसने के बाद दोनों फिर खामोश बैठ गये।

“क्या हमारे ख्वाब कभी सच होंगे समीर.. क्या हम कभी देख पाएंगे..”

डोंट वरी... ऐसा होगा। पहले तुम दुनिया देखोगी और उसके बाद मैं पर देखेंगे जरूर..."

पहले मैं क्यों?"

ताकि तुम देख सकने के काबिल हो जाओ और हमारी शादी हो जाए। मैं अपना नंबर शादी के बाद लगा लूंगा...”

और दोनों फिर हँस पड़े।

**

“आई आम स्केई समीर...” वो बेड पर लेटी काँप रही थी। कुछ डर से और कुछ ठंडी आह. सी... की हवा से।

डोंट वरी, यू विल बे आल राइत। ये काफी बड़ा हास्पिटल है और यहाँ अक्सर आई ट्रॅन्सप्लँट आपरेशन्स होते हैं। यू विल बी जस्ट फाइन...”

वाट इफ समथिंग गोस रांग...”

“नथिंग विल गो रांग, इट विल बी आल ओके और इन आ फ्यू डेज, यू विल बी एबल तो सी एवेरिथिंग। कुछ गलत नहीं होगा। भरोसा रखो...” वो बड़े प्यार से उसे समझा रहा था।

और आई स्टिल फील की ये आँखें तुम्हें खुद अपने चेहरे पर ट्रॅन्सप्लांट करा लेनी चाहिए थी। इतने बरसो में एक डोनर मिला तुम्हें और तुमने वो आँखें खुद अपने बाड़ी में ट्रेन्सप्लँट करने की बजाय मेरा नाम सजेस्ट कर दिया। आई मीन हाउ आफन दो यू फाइंड आ डोनर समीर, इट्स नाट आन एवेरिडे अक्योंवरेन्स। हूँ नोस हाउ लोंग इट विल बी बिफोर यू फाइंड अनदर डोनर और दैट टू इफ यू फाइंड वन...”

“एग्जॅक्ट्ली ..” लड़के ने कहा- “और दैट इस द रीजन वाइ आई चोज यू ओवर मी बिकाज गाड नोस हाउ लोंग इट कुड टेक तो फाइंड अनदर डोनर और तब तक तुम मुझे शादी के लिए लटकाती रहती। इसलिए मैंने तुम्हारा नाम पहले सजेस्ट किया। अब तुम देख सकोगी और हम शादी कर लेंगे। फिर बाद में कोई दूसरा डोनर मिलने पर मेरा भी काम चल जाएगा..." लड़का बोला।

 
“य राइत... और वो तो भला हो निशित का की उसने मुझे ये बात बता दी वरना तुम तो कुछ कहने वाले नहीं थे..” निशित जिस वर्कशाप में दोनों मिले थे उस वर्कशाप का मालिक था। वो अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर साइट फार ब्लाइंड्स...” चलाता था।

आई लोव यू सो मच। प्रामिस दैट यू विल आल्वेज बी विद मी...”

“मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ..” लड़के ने लड़की का हाथ ऐसा थामा जैसे उसे नहीं खुद अपने आपको भी दिलासा दे रहा हो।

वादा..” लड़की ने फिर वही सवाल किया।

आँखें भर आई और आँसू की बूंद टपक कर लड़के के हाथ पर गिरी जिसे महसूस कर उसने कहा।

पोंछ डालो ना आँख से काजल कुछ तो खंजर पे अब रहने दो उनके चेहरे की बात हो जाए।

आज जिक्र-ए-गुलाब रहने दो। उनकी चौखट को चूम लो यारों, बाकी सारे सवाब रहने दो।

बस यार.. पट गई मैं तुमसे, कर लूंगी शादी। इतनी झूठी तारीफ मत किया करो मेरी...” लड़की ने हँसते हुए शायरी का जवाब दिया।

शी इजन्ट वान्ट टु मीट यू यार समीर..” निशित ने गुस्से में जवाब दिया- “इट्स ओवर, ओके.."

आई नो इट्स ओवर यार..." लड़के ने भी गुस्से में जवाब दिया- “वाट दो यू थिंक आई आम, आ किड... मुझे सिर्फ ये जानना है की क्या वजह हो गई की अचानक हर वादा टूट गया और हर इरादा बदल गया...”

“आई डोंट नो, ओके..” निशित चिढ़ते हुए बोला- “आई आस्क्ड हर आस यू वांटेड मी टु, वर्ड बाइ वर्ड। आई रिपीटेड वाट यू सेड। आई आस्क्ड हर, ओके...”

और?”

और उसने कुछ भी नहीं कहा। शी ब्लडी आस्क्ड

में तो लीव और वेंट तो हर रूम...”

कुछ भी नहीं कहा उसने?”

L

नहीं समीर, उसने कुछ नहीं कहा। मुझे एक ग्लास पानी को भी उसकी माँ ने पूछा और तू जानता है उसकी माँ ने मुझसे क्या कहा?"

“क्या ?"

“यही की अब ये बात जरूरत से कहीं ज्यादा खिंच चुकी है, कि अब उनकी लड़की अपना फैसला कर चुकी है।

और बेहतरी इसी में है की हम भी बात को जाने दें और उन्हें परेशान ना करें..” निशित गुस्से में बौखलाया हुआ बोला।

उसकी बात सुनकर समीर के मुँह से बोल नहीं फूटा। “उसकी शकल तो देखी थी ना तूने, तुझे क्या लगता है की ना क्यों बोला उसने..” कुछ देर बाद समीर ने कहा।।

अगेन, आई इनो ब्रो। बी बिकाज अब उसे पता है की वो बहुत खूबसूरत है और अब वो ये भी देख सकती है। की यू आर नाट एग्ज़ेक्ट्ली द हंक शी मस्ट बी वांटिंग नाउ। क्योंकी अब उसे दिख गया है की वो गोरी चिट्टी है। और तू काला है, की वो खासी लंबी है और तेरी हाइट आवरेज है, की उसके नैन नक्श अच्छे खासे हैं और तेरा चेहरा किसी कामन आदमी का है। इन शार्ट ड्यूड आई थिंक नाउ शी नोस दैट शी इस प्रेटी और यू आर नोट, रादर दीज गेपिंग होल्स इन युवर आई साकेट्स मेक यू लुक शीत अग्ली। अब तो वो अपने जैसा खूबसूरत लड़का चाहती होगी, एक काला बदसूरत अंधा नहीं..” निशित जैसे अब भी अपने दिल की भड़ास निकाल रहा था।

आई डोंट बिलीवे इट" समीर बोला।।

डोएसन्थ चेंज दैट वाट आई सेड इस प्रॉबब्ली दू..." निशित ने कहा और कमरे से बाहर निकल गया। ट्रॅन्सप्लँट सक्सेस्फुल था। वो अब देख सकती थी पर जिस बात की शायद लड़के को सबसे ज्यादा खुशी होनी चाहिए थी। वही बात उसके लिए एक गम भरी खबर बन गई थी।

 
कुछ दिन बाद लड़की ने उससे मिलना जुलना कम कर दिया था और कुछ अरसे बाद बिल्कुल बंद ही कर दिया। वो अब उसके फोन काल्स भी नहीं लेती थी और जब शादी की बात आई तो साफ मुकर गई।

क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ ये सब जैसे एक बहुत बड़ा सवाल बनकर लड़के के सामने खड़े रह गये।

क्या सोच रहा है. थोड़ी देर बाद कमरे में दाखिल होते हुए निशित ने पूछा।

“यही की अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता, कभी जान सदके होती कभी दिल निसार होता। ये मजा था दिल्लगी का की बराबर आग लगती, ना उन्हें करार होता ना हमें करार होता। उसके वादे पे सीतमगर अभी और सब्र करते, अगर अपनी जिंदगी का हमें ऐतबार होता..."

आई आम सारी समीर.” निशित उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला- “आई रियली आम...”

नेहा किताब के आखिरी पेज पर थी और आज 10 साल बाद वो गुजरा वक़्त जैसे एक बार फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ था।

पिछले 5 साल में वो ये कहानी कम से कम 500 बार पढ़ चुकी थी और कम से कम 1000 बार आथर के लिए फोन कर चुकी थी पर हर बार पब्लिशिंग कंपनी से ये यही जवाब मिलता था की उनके पास आथर की कोई पेरसोन्नल डीटेल्स नहीं हैं।

कभी कभी इंसान के पास वक्त ही वक़्त होता है और वक्त के सिवा और कुछ नहीं होता। ऐसे ही हाल में नेहा ने अपनी जिंदगी के शुरुआती 25 साल गुजारे थे। अंधेपन की मारी वो अक्सर बस बैठी यही सोचती रहती थी के काश वो देख सकती तो कैसा होता। सोचने के लिए उसके पास वक़्त ही वक़्त था और वक़्त गुजारे नहीं गुजरता था। और कभी कभी यूँ भी होता है की वक़्त रोके नहीं रुकता। इतनी तेजी से निकलता है की समझ में नहीं आता की क्या हुआ और क्या समझ आया।

निशित आखिरी बार जब उससे मिलने आया तो कितना सही अंदाजा लगाया था उसने। हाँ ऐसा ही तो था। जब टॅन्सप्लँट के बाद उसकी आँखों को रोशनी मिली तो दिल में जैसे कई उम्मीदें थी पर सबसे बड़ी ख्वाहिश थी । समीर को देखने की। अपनी ख्यालों की आँखों से उसने हजार बार अपने उस चाहने वाले का चेहरा देखा था, एक नक्शा बनाया था पर जब हकीकत में वो चेहरा उसके सामने आया तो वो बर्दाश्त नहीं कर सकी। उस चेहरे की। काली रंगत और वो बंद अंदर को दबी हुई आँखें, वो इस बात को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकी की वो इस शख्स से शादी करना चाहती थी और जिंदगी भर इस चेहरे को देखने वाली थी।

पर ना ही वो सच बताने की हिम्मत भी कर सकी। बस बेरूखी से अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया और समीर से मिलना बंद कर दिया।

उन दिनों उसकी जिंदगी में काफी कुछ नया हो रहा था। वो पहली बार चीजें देख रही थी और समझ रही थी। ज़िंदगी एक नये सिरे से शुरू कर रही थी। जिंदगी से काले रंग की चादर हट गई और उसकी दुनिया अब रंगीन हो चली थी। कुछ अरसे बाद ही वो समीर को इस तरह भूल गई जैसे वो कभी था ही नहीं। और फिर एक दिन उसे रास्ते में निशित मिल गया। उसने उसे बताया था की समीर का किसी को कोई अता पता नहीं था। वो कहाँ गया, कहाँ है कोई नहीं जानता, खुद निशित भी नहीं।

आसम... यू शुड रियली ट्राई व्रटिंग प्रोफेशनली यार। यू हव आ गिफ्ट, डोंट वेस्ट इट। काफी कम लोग होते हैं। दुनिया में जो शब्दों के साथ मेल बैठा पाते हैं। तुम ऐसा कर सकते हो तो अपने शौक को अपना प्रोफेशन क्यों नहीं बना लेते..."

समीर को कही अपनी बात उसे आज भी याद थी और आज उसकी अपनी कहानी एक किताब के रूप में उसके हाथ में थी। किताब के आखिरी पेज पर लिखी गजल को वो कई बार पढ़ चुकी थी और हर बार वो उसे अपना मजाक सा उड़ती हुई महसूस होती थी।

कभी शेर-ओ-नाघमा बनके,

कभी आँसुओं में ढलके,

वो मुझे मिले तो लेकिन,

मिले सूरतें बदल के।

की इश्क़ की राह सख्त,

की तुम्हारे पैर नाजुक,

ना लो इंतेकाम मुझसे,

मेरे साथ साथ छलके।

ना तो होश से रिश्ता,

ना तो जुनून से आशनाई,

ये कहाँ आ गये हम,

तेरी बाजाम से निकल के।

 
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