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सिरिशा ने भी सोचा था, की विट्ठल उस बदसूरत राजलक्ष्मी से शादी नहीं करना चाहता था इसलिए उसने फौरन सिरिशा का हाथ थाम लिया था।
राजलक्ष्मी रईस और एक बड़े घराने से जरूर थी पर हर कोई जानता था की वो देखने में सुंदर तो क्या, एक आम लड़की से भी गई गुजरी थी, और ऊपर से कितनी मोटी भी तो थी वो। उसके मुकाबले मासूम सी दिखने वाली सिरिशा तो जैसे आसमान से उतरी एक परी थी। विट्ठल ने जबरदस्ती राजलक्ष्मी से हो रही अपनी शादी से बचने के लिए सिरिशा का सहारा लिया था।
वजह जो भी थी, विठ्ठल शादी के लिए मान गया था और उसने काफी समझदारी से काम लिया था। और उससे कहीं ज्यादा समझदारी दिखाई थी राजलक्ष्मी के घरवालों ने। अंदर से भले ही उन्हें ही इस तरह रिश्ता तोड़ दिए जाने पर बेइज्ज़ती महसूस हुई हो पर ऊपर से उन्होंने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। और तो और, उन्होंने तो विठ्ठल के परिवार के साथ अपनी बोल-चाल भी जारी रखी थी।
राजलक्ष्मी के तीनों भाइयों ने विठ्ठल को अपने नये फार्महाउस पर आने का न्योता तक भेज दिया ताकि दोनों परिवार के बीच जो कुछ भी हुआ था, वो खता किया जा सके और वो लोग बिना दिल में कुछ रखे आगे बढ़। सकें। विठ्ठल भी यही चाहता था की इस सारे कांड में किसी को कोई नुकसान ना पहुँचे इसलिए उसने फौरन हाँ कर दी।
उसी दिन फार्महाउस की तरफ जाते हुए विट्ठल की कार का आक्सिडेंट हो गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। ना तो उस ट्रक का पता चला जिससे विट्ठल की कार की टक्कर हुई थी और ना ही उस ट्रक ड्राइवर का।
3 दिन बाद विठ्ठल का क्रिया-कर्म कर दिया गया। एक बार फिर बातों का बाजार गरम हो चला था। कुछ को भरोसा था की विट्ठल के साथ जो कुछ हुआ उसमें भगवान का हाथ था। एक मासूम लड़की के साथ किए गये उसके सलूक की सजा भगवान ने उसे दी थी। भगवान नाराज थे और यही वजह थी के इस साल इस कदर बरसात हुई थी।
कुछ लोगों का मानना था की विठ्ठल मरा नहीं बल्कि उसे मारा गया है।
राजलक्ष्मी के परिवार वाले इज्ज़त और रोबदार लोग थे। अपनी बेटी की यूँ शादी तोड़ दिए जाने से सरेआम हुई बदनामी को वो कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। 3 भाइयों की वो अकेली बहन थी। अपनी बहन का बदला लिया था भाइयों ने।।
कुछ भी हो भैय्या..” क्रिया कर्म में शामिल होने आए लोगों में से किसी ने कहा था- “हम कौन है बोलने वाला... पोलीस ने तो लड़के का शरीर ठंडा पड़ने से पहले ही आक्सिडेंट बोलकर फाइल बंद कर दी थी। आक्सिडेंट कैसे हुआ, क्यों हुआ ये जानने की कोशिश तक नहीं की गई थी।
हैरत की बात थी की इतने दिन से लगातार हो रही बरसात उस दिन रुकी थी जिस दिन विट्ठल की चिता को आग दी गई।
सबको लगा था की विठ्ठल की मौत का सिरिशा को बहुत सदमा होगा। आखिर वो उसके बच्चे का बाप था और उसका होने वाला पति और शायद ऐसा हुआ भी। सिरिशा पूरी तरह मातम में शामिल थी। लोगों की बात माने। तो ये सदमा था या कुछ और पर इयू डेट आई और निकल गई पर सिरिशा को बच्चा नहीं हुआ। और जब हुआ तब तक ड्यू डेट को एक पूरा महीना निकल चुका था। यानी तब सिरिशा पूरे 10 महीने की प्रेग्नेंट थी। हास्पिटल का पूरा खर्चा विठ्ठल के परिवार ने उठाया।
शहर के एक महंगे हास्पिटल में बच्चे को जनम दिया गया और पैदा होने से पहले ही विठ्ठल के पिता इस बात का एलान कर चुके थे की बच्चे को विट्ठल का नाम दिया जाएगा और उसे पालने पोसने का पूरा खर्चा वो खुद उठाएंगे। वो खुद अपने परिवार के साथ बच्चा हो जाने के बाद सिरिशा से मिलने भी आए थे और बच्चे का नामकारण कर गये थे।
पूरा दिन सिरिशा को अकेले रहने का बिल्कुल मौका नहीं मिला। लोगों का आना जाना लगा रहा। कोई ना कोई उससे मिलने आता रहता। तरह तरह के गिफ्ट्स कोई नयी माँ के लिए लाता तो कोई बच्चे के लिए। कोई उसके
घर का था तो कोई विट्ठल के घर का जिन्होंने शायद तकदीर के आगे हार मान ली थी और अपने बेटे की निशानी, उसके बच्चे को अपना लिया था। आने वालों में कोई शकल सूरत से बच्चे को सिरिशा जैसा बताता तो
कोई विठ्ठल जैसा।।
अगले दिन जब उसकी माँ घर से कुछ समान लाने के लिए गई तो सिरिशा को पहली बार बच्चे के साथ अकेले होने का मौका मिला। उसने प्यार से अपने बच्चे को गोद में लिया और उसकी तरफ टकटकी लगाकर देखने । लगी। एक नजर में ही उसे एहसास हो गया था की बच्चा ना तो उसके जैसा दिखता था और ना ही विट्ठल के जैसा।
बच्चे की आँखें भूरे रंग की थी और ब्राउन आँखें ना तो सिरिशा की थी और ना विठ्ठल की। उन दोनों की क्या, पूरे गाव में भूरी आँखें किसी की नहीं थी। सिवाय फादर पीटर के।
***** समाप्त *****
राजलक्ष्मी रईस और एक बड़े घराने से जरूर थी पर हर कोई जानता था की वो देखने में सुंदर तो क्या, एक आम लड़की से भी गई गुजरी थी, और ऊपर से कितनी मोटी भी तो थी वो। उसके मुकाबले मासूम सी दिखने वाली सिरिशा तो जैसे आसमान से उतरी एक परी थी। विट्ठल ने जबरदस्ती राजलक्ष्मी से हो रही अपनी शादी से बचने के लिए सिरिशा का सहारा लिया था।
वजह जो भी थी, विठ्ठल शादी के लिए मान गया था और उसने काफी समझदारी से काम लिया था। और उससे कहीं ज्यादा समझदारी दिखाई थी राजलक्ष्मी के घरवालों ने। अंदर से भले ही उन्हें ही इस तरह रिश्ता तोड़ दिए जाने पर बेइज्ज़ती महसूस हुई हो पर ऊपर से उन्होंने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। और तो और, उन्होंने तो विठ्ठल के परिवार के साथ अपनी बोल-चाल भी जारी रखी थी।
राजलक्ष्मी के तीनों भाइयों ने विठ्ठल को अपने नये फार्महाउस पर आने का न्योता तक भेज दिया ताकि दोनों परिवार के बीच जो कुछ भी हुआ था, वो खता किया जा सके और वो लोग बिना दिल में कुछ रखे आगे बढ़। सकें। विठ्ठल भी यही चाहता था की इस सारे कांड में किसी को कोई नुकसान ना पहुँचे इसलिए उसने फौरन हाँ कर दी।
उसी दिन फार्महाउस की तरफ जाते हुए विट्ठल की कार का आक्सिडेंट हो गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। ना तो उस ट्रक का पता चला जिससे विट्ठल की कार की टक्कर हुई थी और ना ही उस ट्रक ड्राइवर का।
3 दिन बाद विठ्ठल का क्रिया-कर्म कर दिया गया। एक बार फिर बातों का बाजार गरम हो चला था। कुछ को भरोसा था की विट्ठल के साथ जो कुछ हुआ उसमें भगवान का हाथ था। एक मासूम लड़की के साथ किए गये उसके सलूक की सजा भगवान ने उसे दी थी। भगवान नाराज थे और यही वजह थी के इस साल इस कदर बरसात हुई थी।
कुछ लोगों का मानना था की विठ्ठल मरा नहीं बल्कि उसे मारा गया है।
राजलक्ष्मी के परिवार वाले इज्ज़त और रोबदार लोग थे। अपनी बेटी की यूँ शादी तोड़ दिए जाने से सरेआम हुई बदनामी को वो कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। 3 भाइयों की वो अकेली बहन थी। अपनी बहन का बदला लिया था भाइयों ने।।
कुछ भी हो भैय्या..” क्रिया कर्म में शामिल होने आए लोगों में से किसी ने कहा था- “हम कौन है बोलने वाला... पोलीस ने तो लड़के का शरीर ठंडा पड़ने से पहले ही आक्सिडेंट बोलकर फाइल बंद कर दी थी। आक्सिडेंट कैसे हुआ, क्यों हुआ ये जानने की कोशिश तक नहीं की गई थी।
हैरत की बात थी की इतने दिन से लगातार हो रही बरसात उस दिन रुकी थी जिस दिन विट्ठल की चिता को आग दी गई।
सबको लगा था की विठ्ठल की मौत का सिरिशा को बहुत सदमा होगा। आखिर वो उसके बच्चे का बाप था और उसका होने वाला पति और शायद ऐसा हुआ भी। सिरिशा पूरी तरह मातम में शामिल थी। लोगों की बात माने। तो ये सदमा था या कुछ और पर इयू डेट आई और निकल गई पर सिरिशा को बच्चा नहीं हुआ। और जब हुआ तब तक ड्यू डेट को एक पूरा महीना निकल चुका था। यानी तब सिरिशा पूरे 10 महीने की प्रेग्नेंट थी। हास्पिटल का पूरा खर्चा विठ्ठल के परिवार ने उठाया।
शहर के एक महंगे हास्पिटल में बच्चे को जनम दिया गया और पैदा होने से पहले ही विठ्ठल के पिता इस बात का एलान कर चुके थे की बच्चे को विट्ठल का नाम दिया जाएगा और उसे पालने पोसने का पूरा खर्चा वो खुद उठाएंगे। वो खुद अपने परिवार के साथ बच्चा हो जाने के बाद सिरिशा से मिलने भी आए थे और बच्चे का नामकारण कर गये थे।
पूरा दिन सिरिशा को अकेले रहने का बिल्कुल मौका नहीं मिला। लोगों का आना जाना लगा रहा। कोई ना कोई उससे मिलने आता रहता। तरह तरह के गिफ्ट्स कोई नयी माँ के लिए लाता तो कोई बच्चे के लिए। कोई उसके
घर का था तो कोई विट्ठल के घर का जिन्होंने शायद तकदीर के आगे हार मान ली थी और अपने बेटे की निशानी, उसके बच्चे को अपना लिया था। आने वालों में कोई शकल सूरत से बच्चे को सिरिशा जैसा बताता तो
कोई विठ्ठल जैसा।।
अगले दिन जब उसकी माँ घर से कुछ समान लाने के लिए गई तो सिरिशा को पहली बार बच्चे के साथ अकेले होने का मौका मिला। उसने प्यार से अपने बच्चे को गोद में लिया और उसकी तरफ टकटकी लगाकर देखने । लगी। एक नजर में ही उसे एहसास हो गया था की बच्चा ना तो उसके जैसा दिखता था और ना ही विट्ठल के जैसा।
बच्चे की आँखें भूरे रंग की थी और ब्राउन आँखें ना तो सिरिशा की थी और ना विठ्ठल की। उन दोनों की क्या, पूरे गाव में भूरी आँखें किसी की नहीं थी। सिवाय फादर पीटर के।
***** समाप्त *****