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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

वो कभी अंधा था ही नहीं..." साइट फार ब्लाइंड्स हम दोनों मिलकर चलाते थे। ये जो आँखें लिए घूम रही हो। ना, ये उसकी अपनी आँखें थी। तुम्हें इसलिए दी थी उसने ताकि तुम उससे शादी कर लो। कमाल की बात है ना, तुम्हें उससे प्यार इसलिए हुआ क्योंकी तुम उसे देख नहीं पाती थी मगर जब उसी प्यार को अंजाम देने के लिए उसने तुम्हें आँखें दी तो तुमने इनकार इसलिए किया क्योंकी तब तुम उसे देख पाती थी। और उसका बड़प्पन । देखो की वो तुम्हें अपने हिस्से की रोशनी देकर खुद अंधेरे में खो गया और एक बार जताया तक नहीं..”

निशित की बात आज भी उसके कानों में गूंज रही थी।

***** समाप्त ******

 
24 लाटरी

जुलाई के महीने के बाकी दिनों की तरह ही उस दिन भी दोपहर की गर्मी की तपिश सुबह से ही हवा में महसूस होने लगी थी। आसमान साफ था और सूरज अपने आने वाले 12 घंटो के सफर पर निकल चुके थे। गाँव के । चारों ओर फसल हरी भरी थी। पिछले हफ्ते हुई लगातार बारिश की वजह से जमीन पर हरी घास की एक चादर सी फैली हुई थी।

आज का दिन खास था, बहुत खास।

गाँव के सभी लोग स्कूल के सामने मैदान में जमा होने शुरू हो गये थे। यूं तो रोजाना इस वक्त ये मैदान स्कूल में पढ़ने वाले बच्चो से भरा होता था पर आज स्कूल की छुट्टी थी। आस पास के कुछ गाँव में तो लाटरी खतम होने में कभी कभी दो से 3 दिन लग जाते थे पर इस गाँव की आबादी ज्यादा ना होने की वजह से ये काम दो घंटे में निपट जाता था।

सबकी कोशिश यही थी की जितनी जल्दी हो सके लाटरी शुरू की जाए ताकि दोपहर की गर्मी बढ़ने से पहले पहले सब खाने के वक्त तक आराम से वापिस अपने घरों में जा सके। हमेशा की तरह इस बार भी सबसे पहले बच्चे ही जमा हुए। स्कूल से छुट्टी होने का उत्साह सब में नजर आ रहा था। सब अलग अलग झुंड बनाए । मैदान में बिखरे हुए थे। कोई स्कूल की बातें कर रहा था, कोई अपने टीचर्स की, कोई किसी किताब की किसी कहानी की, तो कोई आज लाटरी के बाद शाम को खेलने की बातें।

आज पित्ठू खेलेंगे...” अनिल अपने साथ खड़े दोस्तों से कह रहा था।

उसकी दोनों जेबों में पत्थर भरे हुए थे और उसकी देखा देखी उसके बाकी दोस्तों ने भी यही किया था। पास की नदी से वो गोल चिकने पत्थर उठाकर लाए थे।

अनिल, रोहित और हिमांशु ने मिलकर मैदान के एक कोने में पत्थरों का एक टीला सा बना लिया था और वो उसके पास खड़े उसकी रखवाली कर रहे थे की कहीं गाँव के दूसरे लड़के वहाँ से पत्थर ना उठा ले जाएं।

लड़कों की तरह ही गाँव की सब लड़कियां भी एक साथ ही खड़ी हुई थी और उनमें भी आपस में तरह तरह की बातें चल रही थी।

थोड़ी ही देर बाद गाँव के मर्द उस साल की फसलों, ट्रैक्टर्स, खेतों और बारिश के बारे में बात करते हुए मैदान में जमा होने शुरू हो गये। वो सब भी एक साथ ही खड़े हुए थे और खामोशी से आपस में बात करते मुश्कुरा रहे। थे। उनकी हँसी और थोड़ी दूर पत्थर के टीले के पास खड़े लड़कों की हँसी में जमीन आसमान का फरक था। जहाँ वो लड़के हर बात पर दिल खोलकर हँस रहे थे, वहीं सब मर्द धीरे से मुश्कुराते हुए बात कर रहे थे।

थोड़ी देर बाद ही गाँव की औरतें ने भी आना शुरू कर दिए। साड़ी, सलवार कमीज, घाघरा चोली पहने सब औरतें इधर उधर की बातें करती अपने अपने घरवालों के पास जाकर खड़ी होने लगी। कुछ देर बाद ही बच्चों को।

आवाज देकर अपने पास बुलाया जाने लगा और पहले जो झुंड आदमी, औरतों और बच्चों में बंटे हुए थे, अब परिवार के हिसाब से बंट गये।

अनिल को भी आवाज देकर उसकी माँ ने अपने पास बुला लिया था। वो कुछ पल तो शांति से अपने परिवार के साथ खड़ा रहा पर एक बार फिर नजर बचाकर पत्थर के टीले के पास पहुँच गया।

जब उसके पिता ने एक बार फिर चिल्लाकर उसका नाम पुकारा, तो वो गर्दन लटकाए फिर अपने परिवार के पास आकर खड़ा हो गया। हमेशा की तरह इस बार भी लाट्ते का आयोजन गाँव के सरपंच रामदीन काका ही कर रहे थे। वो उमर में कोई 60 साल के थे और उनका चीनी का कारोबार था। उनके मुँह पर तो कोई नहीं कहता था पर गाँव में हर किसी को उनसे हमदर्दी थी क्योंकी उनकी कोई औलाद नहीं थी और उनकी बीवी की जुबान तो आस पास के 10 गाँव में मशहूर थी। सब उन्हें पीठ पीछे जोरू का गुलाम कहकर बुलाते थे। कहते थे की गाँव का सरपंच जो सबके सामने शेर बना फिरता था वो घर की चारदीवारी में अपनी बीवी के इशारों पर नाचता है।

हाथ में काले रंग का डिब्बा उठाए जब रामदीन काका मैदान में आए तो हर तरफ एक खुशर फुसर सी होने लगी। सब नीची आवाज में आपस में बातें करने लगे।

माफ कीजिएगा आज थोड़ी देर हो गई..” रामदीन ने हँसते हुए चिल्लाकर कहा।

उनके पीछे पीछे ही पोस्ट-मास्टर शर्मा जी भी 3 पैरों वाला स्टूल उठाए आ गये। स्टूल को मैदान के बीच रख दिया गया और इब्बा उसके ऊपर। गाँव वाले अब भी थोड़ा दूर ही खड़े थे, स्टूल और काले रंग के उस डिब्बे से थोड़ा फासला बनाए।

मदद के लिए कोई आगे आए...” रामदीन ने चिल्लाकर कहा तो गाँव वाले सब एक दूसरे का मुँह देखने लग गये जैसे फैसला कर रहे हों के मदद के लिए आगे कौन बढ़ेगा। कुछ पल बाद शर्मा जी के दोनों बेटे आगे बढ़े और कागज के टुकड़ो को डब्बे के अंदर रखने में मदद करने लगे।

 
लाटरी निकालने का पुराना और असली तरीका वक़्त के साथ धीरे-धीरे खतम हो गया था। स्टूल के ऊपर रखा काले रंग का डिब्बा शमशेर चाचा जो की उमर में गाँव में सबसे बड़े थे, उनके पैदा होने से पहले से इस्तेमाल किया जा रहा था।

रामदीन काका अक्सर गाँव में एक नया डिब्बा बनाने की बात करते थे। पर गाँव में कोई भी पुराने रिवाज के खिलाफ नहीं जाना चाहता था। माना जाता था की स्टूल के ऊपर रखे उस काले डिब्बे में लाटरी के लिए। इस्तेमाल किए गये सबसे पहले डिब्बे के टुकड़े लगे थे। हर साल लाटरी के बाद रामदीन काका एक नया डिब्बा बनाने की बात करते थे पर हमेशा इस बात को बातों बातों में टाल दिया जाया करता था। हर साल डिब्बा घिसता जा रहा था और अब तो ऐसी हालत हो गई थी की उसपर से काला रंग उड़कर नीचे से लकड़ी का रंग

नजर आने लगा था।

शर्मा जी और उनके सबसे बड़े बेटे ने स्टूल और डिब्बे को कसकर पकड़ रखा था और सब कागज के टुकड़ों को उसमें डालकर अच्छी तरह से मिला दिया गया।

पहले कागज की जगह लकड़ी के टुकड़ों पर नाम लिख कर डिब्बे में डाला जाया करता था पर धीरे-धीरे वक़्त के साथ वो भी बदल गया।

अब गाँव की आबादी इतनी ज्यादा हो गई है...” रामदीन काका ने कागज डालने के पक्ष में कहा था- “इतने सारे नाम लकड़ी के टुकड़ों पर लिखेंगे तो डिब्बे में सब नाम समाएंगे कैसे... और जिस हिसाब से गाँव की आबादी बढ़ रही है, आने वाले कुछ सालों में दुगुनी हो जाएगी...”

लाटरी से एक रात पहले शर्मा जी और रामदीन काका ने मिलकर सब लोगों के नाम कागज के टुकड़ो पर लिखे थे और फिर उन्हें डिब्बे में डालकर पोस्ट आफिस में एक ताले में रख दिया गया जहाँ से फिर अगली सुबह उन्हें मैदान में लाया गया। हमेशा लाटरी होने के बाद डिब्बे को एक बार फिर एक साल के लिए पोस्ट आफिस की ही एक अलमारी में ताले में बंद करके रख दिया जाता था।

सब लोग जमा हुए बेसब्री से लाटरी शुरू होने का इंतेजार कर रहे थे पर अब भी कई सारे काम बाकी थे। एक पूरी लिस्ट अभी बनाई जानी बाकी थी। एक ऐसी लिस्ट जिसमें हर कुनबे और खानदान के मुखिया का नाम होते थे, उस खानदान में कितने परिवार थे और हर परिवार में कितने लोग थे। और फिर लाटरी शुरू होने से पहले पूजा होनी थी। पहले कहा जाता था की पहले लाटरी शुरू होने से पहले एक हफ्ते तक पूजा रखी जाती थी पर धीरे-धीरे वक़्त के साथ ये भी खतम हो गया।

अब लाटरी होने से पहले ही पूजा होती थी और उसमें भी लोग बस यही इंतेजार करते थे के कब पूजा खतम हो और लाटरी शुरू की जाए।

शर्मा जी खड़े गाँव वालों का हिसाब करते लिस्ट बना ही रहे थे की एक ओर से हाँफती हुई शांता बी चलती नजर आई। नीले रंग की साड़ी में कभी वो घुटनों से अपनी साड़ी को पकड़कर ऊपर करती तो कभी अपना पल्लू संभालती।

“मैं तो भूल ही गई थी की आज लाटरी है.” आते हुए वो शर्मा जी को देखकर बोली- “मुझे लगा मेरा मर्द खेतों में गया है पर जब मैंने खिड़की से बाहर देखा तो एक भी बच्चा नजर नहीं आया। तब मेरे ध्यान में बात आई की आज तो लाटरी है...”

तेज कदमों से चलती शांता बी अपने पति के पास जाकर खड़ी हो गई।

ले आ गई तेरी घरवाली...” रामदीन काका ने उनके पति की और देखते हुए कहा।

हमें तो लगा था की आज आपके बिना ही शुरू करना पड़ेगा शांता बी..” पीछे से शर्मा जी भी बोले।

मैं यहाँ आ जाती अगर तो घर का काम क्या आपकी घरवाली आकर निपटाती...” शांता बी ने जवाब में कहा तो सब उनकी बात पर हँसने लगे।

तो शुरू किया जाए...” थोड़ी देर बाद रामदीन काका चिल्लाकर बोले- “कोई है जो यहाँ नहीं है..”

सबने अपने आस पास देखना शुरू कर दिया।

रहमत..” थोड़ी देर बाद भीड़ में से किसी की आवाज आई।

रहमत...” शर्मा जी ने अपनी लिस्ट पर नजर डाली और फिर रामदीन काका की तरफ देखकर बोले- “बेचारा रहमत। टाँग तुड़ा ली थी उसने अपनी पिछले हफ्ते बारिश में फिसल कर..."

रहमत की जगह पर्ची कौन निकलेगा?” रामदीन काका ने चिल्लाकर कहा।

मैं..” एक औरत की आवाज आई।

आदमी की जगह एक औरत पर्ची निकालेगी... तेरे घर में और कोई मर्द नहीं है क्या?”

 
यूँ तो इस सवाल का जवाब रामदीन काका के साथ साथ पूरे गाँव को पता था पर लाटरी के तरीके के हिसाब से लाटरी निकालने वाले को सब बातें साफ रखने के लिए इस तरह से पूछना जरूरी था।

“युसुफ तो अभी बच्चा है। 15 साल का हुआ है। पिछले महीने...”

रहमत की बीवी ने जवाब दिया- “तो मैं ही निकालूंगी पर्ची इस बार...”

ठीक है...” शर्मा जी ने अपनी लिस्ट में कुछ लिखते हुए कहा और फिर चिल्लाकर कहा- “महतो का लड़का उठाएगा ना इस बार पर्ची...”

हाँ..” भीड़ में खड़े एक लड़के ने जवाब दिया- “अपनी माँ और अपने लिए खुद मैं पच उठाऊँगा..”

“शाबाश बेटा। खुशी है की तुम्हारे पिता के बाद घर की देख-भाल के लिए उस बुधि औरत के पास तुम हो।। शमशेर भाई भी आ गये...”

हाजिर हूँ जनाब...” भीड़ में खड़े शमशेर चाचा ने हाथ उठाते हुए कहा और सब फिर हँस पड़े।

तो शुरू करते हैं... रामदीन काका ने चिल्लाकर कहा और भीड़ में खामोशी छा गई।

अब मैं सबके नाम पुकारूंगा...” रामदीन काका ने बोलना शुरू किया- “नाम बुलाए जाने पर हर परिवार का मुखिया आगे आएगा और डिब्बे में से पच उठाएगा। पर्ची को अपने अपने हाथ में रखें और तब तक ना खोलें जब तक सब लोग अपनी अपनी पच ना निकल लें। ठीक है...”

सब लोगों में ये कोई नयी बात नहीं थी। हर साल लाटरी इसी तरह होती थी इसलिए आधे लोग ही रामदीन काका की बात को ध्यान से सुन रहे थे।

संतोष...” रामदीन काका ने पहला नाम पुकारा।

भीड़ में से एक आदमी निकलकर बाहर आया और डिब्बे में हाथ डालकर एक पर्ची निकली।

कैसे हो काका...” उसने रामदीन से कहा और बिना जवाब का इंतेजार किए पर्ची हाथ में थामे फिर अपनी जगह पर जाकर खड़ा हो गया।

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इल्यास..” रामदीन काका ने लिस्ट में देखकर बुलाना शुरू किया- “मेहंदी, लालचंद, हीरसिंह...”

वक्त कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता..." शांता बी के पास खड़ी एक औरत ने धीरे से उनसे कहा।

हाँ..” शांता बी ने अपनी साड़ी का पल्लू उंगली में घुमाते हुए कहा- “लगता है की अभी पिछले हफ्ते ही तो लाटरी की थी। एक साल कैसे निकल गया खबर ही नहीं हुई...”

“पठान, मीरपुरी, शिवलाल...”

तेरा होने वाला मर्द..” शिवलाल को जाते देख शांता बी ने अपने पास खड़ी औरत के कंधे पर हाथ मारते हुए कहा।

रहमत...”

“आओ आओ आगे आओ..” रामदीन काका ने रहमत की बीवी से कहा।

अब तक भीड़ में ज्यादातर मर्यों के हाथ में एक पर्ची थी जिसे थामे वो चुपचाप नजर झुकाए खड़े थे।

खुदाबक्स, लाल सिंह...”

जाओ ना... खड़े खड़े सोच क्या रहे हो..." शांता बी ने अपने पति को कोहनी मारी तो सब फिर हल्के से हँस पड़े।

आस पास के गाँव में बात चल रही है आजकल..” शिवलाल ने अपने पास खड़े शमशेर चाचा से कहा- “लाटरी बंद करने की बात...”

बेवकूफ हैं साले.." शमशेर ने मुँह बनाते हुए कहा- “आजकल की पीढ़ी को जाने क्या हो गया। कुछ पूरा नहीं। पड़ता, जितना दो कम है। लाटरी बंद करेंगे तो उसके बाद क्या करेंगे.. पुराने जमाने की तरह आदि मानव । बनेंगे... पहले कहावत होती थी की लाटरी लगेगी, फसल उगेगी। लाटरी बंद कर देंगे तो खाएंगे क्या? मिट्टी पत्थर... सालों साल से लाटरी चलती आ रही है। पहले तो नाम बदला। अंग्रेज आए तो नाम बदल कर लाटरी कर दिया। अंग्रेजी नाम ताकि अंग्रेजो जैसे बन सकें। अब तो मुझे याद भी नहीं के इसका असली नाम होता क्या था, बस लाटरी चढ़ गया जुबान पर। सब बदल डालो, बंद कर दो लाटरी। बेवकूफ साले...”

कुछ गाँव में तो उन्होंने लाटरी निकालना बंद कर भी दिया है...” शिवलाल ने अपने हाथ में थामें कागज को घूमते हुए कहा।

बेवकूफ हैं साले.." शमशेर ने फिर अपनी बात दोहराई।

“हरदयाल, राजन, मुंशी...”

कुछ देर बाद शर्मा जी ने अपना नाम पुकारा और डिब्बे में से एक पच उठा ली। अगला नाम रामदीन काका का था और उन्होंने भी एक आगे बढ़कर डिब्बे में हाथ डाला और एक पर्ची निकली।

महतो..”

भीड़ में खड़ा महतो का लड़का आगे आया।

“घबराने की कोई बात नहीं बेटा। एक पर्ची निकाल लो...” रामदीन ने प्यार से उसका कंधा थपथपाया।

“शमशेर..."

70 साल..." छाती चौड़ी किए बुड्ढा शमशेर आगे आया- “70 साल आज पूरे हो गये मुझे पर्ची निकलते हुए...”

और उसके बाद एक अजीब सी खामोशी छा गई। नाम पूरे पढ़े जा चुके थे। सब अपनी अपनी पर्ची निकल चुके थे।

 
सबके नाम पढ़े जा चुके हैं...” शर्मा जी ने चिल्लाकर कहा।

अब सब अपनी अपनी पर्ची खोलेंगे..” रामदीन काका ने कहा।

एक पल के लिए भीड़ में कोई नहीं हिला और फिर एक एक करके सब मर्दो ने पर्चियां खोलकर देखनी शुरू की।

कौन है?"

किसका नाम आया?” फौरन ही आपस में लोग पच देखने लगे और चारों तरफ सवाल उठने लगा- “किसके पास आई काली पच?”

लाल सिंह...”

लाल सिंह..”

लाल सिंह के पास है पचीं। काला निशान उसकी पच पर है..."

सबकी नजर लाल सिंह और शांता बी पर आकर रुक गई। लाल सिंह खामोशी से खड़ा अपने हाथ में पकड़े कागज के टुकड़े को घूर रहा था।

“बेईमानी हुई है...” अचानक शांता बी चिल्ला पड़ी “आपने इनको अच्छी तरह से देखकर पच नहीं उठाने दी, देखा था मैंने। जल्दबाजी करी थी आपने इनके साथ...”

ऐसा कुछ नहीं हुआ...” भीड़ में से एक औरत चिल्लाई- “सबको बराबर का वक़्त मिला था चुनकर पच उठाने का..."

चुप हो जा...” लाल सिंह अपनी बीवी को घूरते हुए बोला।

लाटरी का पहला पड़ाव पूरा हुआ... रामदीन काका ने डिब्बा खोलते हुए कहा- “अब हमें आगे बढ़ना चाहिए ताकि सब वक़्त रहते दोपहर के खाने तक अपने अपने घर वापिस जा सकें। लाल सिंह, अपने परिवार की तरफ से । पच तुम निकालोगे। तुम्हारे परिवार में कुल कितने लोग हैं...

अनिता और सुनीता अब जवान हो गई हैं। पच खुद निकाल सकती हैं...” शांता बी चिल्लाई- “अपनी किश्मत का फैसला उन्हें आप करने दो...”

बेटियां अपनी ससुराल की तरफ से पर्ची निकलती हैं शांता बी..." शर्मा जी ने मुश्कुराते हुए कहा- “आप ये बात अच्छी तरह जानती हैं। वो तो आपके परिवार में शामिल होंगी ही नहीं तो उनका तो फिलहाल आपसे कोई लेना देना ही नहीं...”

बे-ईमानी हुई है.." शांता बी ने एक बार फिर मुँह फेरते हुए कहा।

मेरी बेटियां अपने पति के परिवार की तरफ से आई हैं..” लाल सिंह आगे बढ़ता हुआ बोला- “मेरे परिवार में बेटियों को निकालकर मेरे, मेरी बीवी और बच्चों के सिवा और कोई नहीं.”

तो ठीक है फिर लाल सिंह। पर्ची अपने परिवार की तरफ से एक बार फिर तुम ही निकलोगे। बच्चे कितने हैं?”

दोनों बेटियों को निकलकर 3 नाबालिग लड़के और... अर्जुन, दीपक और मोहित...” लाल सिंह ने जवाब दिया।

"तो परिवार में कुल 5 हुए। सबके लिए पचीं तुम निकलोगे?” शर्मा जी ने कहा।

लाटरी फिर से शुरू करनी चाहिए.” शांति बी इतने धीरे से बोली जैसे अपने आपसे बात कर रही हों- “सबने देखा, जल्दी बाजी करती थी। पच चुनने का वक़्त ही नहीं दिया। सबने देखा था...” ।

शर्मा जी ने 5 पर्चियां उठाई और उन्हें डिब्बे में डालकर डिब्बा बंद कर दिया।

तैयार हो...” रामदीन काका ने लाल सिंह से पूछा। जवाब में उसने हाँ में गर्दन हिला दी।

ध्यान रहे...” शर्मा जी ने चिल्लाकर कहा- “आप पाँचो लोग एक एक करके डिब्बे में से पच निकालेंगे और अपने अपने हाथ में तब तक मोड़ कर रखेंगे जब तक की आपको खोलने को ना कहा जाए। ठीक है...”

लाल सिंह और उसके बच्चों ने हाँ में गर्दन हिला दी। शांता बी अब भी साड़ी का पल्लू घुमाती अपने आपसे कुछ बड़बड़ा रही थी।

सबसे पहले लाल सिंह का पहला बेटा आगे आया और डिब्बे में हाथ डालकर एक पर्ची उठा ली। फिर दूसरा और तीसरा बेटा और तीनों अपने हाथ में पच थामे कुछ कदम पीछे होकर खड़े हो गये। भीड़ में खड़े उनके सब दोस्त साँस थामे गौर से उन्हें देख रहे थे।

शांता बी...” नाम सुनकर वो जैसे नींद से जागी।

आपकी बारी...” रामदीन काका ने कहा तो वो आगे बढ़ी, एक पल के लिए झिझकी और फिर डिब्बे में हाथ डालकर एक पच उठा ली।

तुम्हारी बारी लाल सिंह...” शर्मा जी ने इशारा किया, लाल सिंह ने डिब्बे में हाथ डालकर आखिरी पच उठा ली।

 
भीड़ में सन्नाटा छा चुका था। सब साँस रोके बीच में खड़े लाल सिंह, शांता बी और उनके बच्चों को देख रहे थे।

लाटरी में अब वो मजा नहीं रहा.." शमशेर चाचा अपने पास खड़े आदमी से कह रहे थे- “लोगों में अब वो जोश नहीं रहा, वो श्रद्धा नहीं रही...”

सब पर्चियां निकली जा चुकी हैं..." रामदीन काका ने चिल्लाकर कहा- “अब आप लोग अपनी अपनी पर्ची खोलें...” पर्चियां खोली गई। शर्मा जी ने आगे बढ़कर पहले बच्चों की पर्चियां देखनी शुरू की। उन्होंने पहले बच्चे की पर्ची हाथ में लेकर अपने सर के ऊपर उठाई। पच पर कोई निशान नहीं था। बाकी दोनों बच्चों ने तब तक अपनी पर्चियां खोल ली थी और कोई निशान ना देखकर दोनों आपस में हँस पड़े।

लाल सिंह...” रामदीन काका ने कहा तो उसने अपनी पच खोलकर देखी और सर के ऊपर उठाकर भीड़ को दिखाई। पच पर कोई निशान नहीं था।

शांता बी. निशान वाली पर्ची शांता बी ने उठाई है। पर्ची खोलकर देखी जाए..” रामदीन काका ने कहा और शर्मा जी ने आगे बढ़कर पच शांता बी के हाथ से निकली।

निशान इस पच पर है." उन्होंने जोर से कहा और हाथ हवा में उठाकर पच आस पास खड़े लोगों को दिखाई।

लाल सिंह ने आगे बढ़कर पच पर नजर डाली। पच पर एक काले रंग का निशान था। वो निशान जो रामदीन काका ने कल रात एक काले रंग के कलम से बनाया था। थोड़ी देर पहले यही पर्ची उसके हाथ में थी जब उसके परिवार को चुना गया था और अब वो पर्ची उसकी बीवी ने डिब्बे से उठाई थी।

लाटरी में नाम चुन लिया गया है। अब लाटरी का आखिरी पड़ाव पूरा करने का वक्त आ गया है। धूप तेज हो गई है तो जल्दी ये काम भी खतम कर लेते हैं ताकि आप लोग अपने अपने घर जा सकें." शर्मा जी ने चिल्लाकर कहा,

यूँ तो गाँव वाले पर्ची निकालने के बारे में ज्यादातर बातें भूल चुके थे, इसका असली नाम भूल चुके थे, सही रिवाज भूल चुके थे पर पत्थरों का सही इस्तेमाल वो अब तक नहीं भूले थे। लड़कों ने पत्थरों का जो टीला बनाया था अब उसे इस्तेमाल करने का वक्त आ गया था।

इस बार इतनी भारी भारी पत्थर क्यों जमा कर लिए इन लड़कों ने...” एक औरत दूसरी से कह रही थी- “इनको उठाऊं कैसे?"

मैं तो धीरे-धीरे ही करूंगी। तुम उठाकर चलो, मैं पीछे आ रही हूँ..” दूसरी औरत ने जवाब दिया।

बच्चों ने अपनी जेबों से पत्थर पहले ही निकल लिए थे। कुछ ने आगे बढ़कर लाल सिंह के तीनों बेटों के हाथ में भी कुछ पत्थर थमा दिए। शांता बी भीड़ के बीचो बीच खड़ी अपने हाथ ऊपर किए चिल्ला रही थी। “बे-ईमानी हुई है..." उन्होंने कहा ही था के एक पत्थर उड़ता हुआ आया और उनको माथे पर आकर लगा। वो संभलती उससे पहले ही एक पत्थर और आकर कंधे पर लगा, फिर एक और पेट पर, फिर एक और सर पर।

चलो चलो आगे बढ़ो...” शमशेर चाचा बच्चो को उकसा रहे थे।

बे-ईमानी हुई है। लाटरी सही नहीं निकली..." शांता बी चिल्ला रही थी पर उनकी आवाज भीड़ के जोश के बीच कहीं खोकर रह गई थी।

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***** समाप्त *****

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25 टैबू (वर्जना)



तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे सिद्धू?” आशा फोन पर चिल्लाई।

मैं ऐसा ही करूंगा मोम..” दूसरी तरफ से सिद्धू की बेचैन आवाज आई- “अगर मैं आपके साथ नहीं जी सकता तो फिर जीने का कोई मतलब ही नहीं बनता.."

तुम मेरे साथ ही तो जी रहे हो मेरे बच्चे..” आशा का जैसे रोना छूट पड़ा- “मैं माँ हूँ तेरी, हमेशा तेरे साथ हूँ, जिंदगी भर..."

“नहीं मोम..” सिद्धू जिद पर अड़ा हुआ था- “आप जानती हैं मैं क्या कह रहा हूँ। माँ बेटे का रिश्ता तो हमने उसी रात खतम कर दिया था जब पहली बार मैं और आप एक मर्द और औरत की तरह साथ थे...”

“चुप हो जा सिद्धू। प्लीज... मैं हाथ जोड़ती हूँ तेरे...” आशा ने पानी से भरी आँखें बंद करते हुए कहा।

नहीं माँ... अब चुप नहीं हो सकता मैं। एक महीने से घुट घुट कर जी रहा हूँ पर अब और नहीं। अब नहीं जी पाऊँगा मैं...”

और तब पहली बार आशा को एहसास हुआ के वो लड़का कितना सीरियस था। वो एमोशनल होकर यूँ ही बकवास नहीं कर रहा था। उसकी आवाज में शामिल संजीदगी पहली बार आशा पर जाहिर हुई।

नहीं सिद्धू.. तुझे मेरी कसम है। कुछ उल्टा सीधा मत करना..” आशा ने कहा।

बहुत देर हो चुकी माँ... बहुत देर हो चुकी..."

कोई देर नहीं हुई सिद्धू। मेरी बात सुन...” आशा ने समझने की कोशिश की।

आप मेरी बात सुनो माँ..." सिद्धू ने बात बीच में ही काट दी- “क्या चाहती हो आप... मैं तो दोनों तरफ से पिस रहा हूँ ना... अगर मैं सब भूलकर फिर आपके साथ माँ बेटे का रिश्ता बना हूँ तो सारी जिंदगी अपने आपसे आँख नहीं मिला पाऊँगा की मैंने अपनी माँ के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाया था। दूसरी तरफ से मैं अगर ये सोचें की। मैं कितना चाहता हूँ आपको, कितना तरसता हूँ आपके लिए, एक बेटे की तरह नहीं पर एक मर्द की तरह तो भी नुकसान मेरा ही है क्योंकी आपका कहना है की हम एक नहीं हो सकते...”

तूं अच्छी तरह जानता है की हम क्यों एक नहीं हो सकते। समझाया था मैंने तुझे उस दिन...” आशा लगभग चिल्लाती हुई बोली।

क्या सिर्फ वही एक वजह है..” सिद्धू ने पूछा।

“तू मेरा बेटा है और मैं तेरी माँ। इससे बड़ी वजह और क्या हो सकती है..” आशा इस बार चिल्ला ही पड़ी- “पाप है ये। घोर पाप..”

तो ठीक है माँ। फिर एक पाप और कर लेने दो मुझे। इस तरह से जिंदा नहीं रह सकता मैं। बस अब बर्दाश्त नहीं होता..."

सिद्धू सुन... कुछ उल्टा सीधा नहीं करना। मेरी कसम है तुझे। अपने साथ तूने कुछ भी किया तो...” इससे पहले की आशा बात पूरी करती, सिद्धू फोन काट चुका था।

आशा ने फौरन दोबारा फोन मिलाया, पर सिद्धार्थ का सेल स्विच्ड आफ था। उसने फौरन अपने घर का लण्डलाइन नंबर मिलाया, पर बिजी टोन आती रही। यानी किसी ने रिसीवर को उठाकर एक तरफ रखा हुआ था। वो बेचैन हो उठी। समझ नहीं आया की क्या करे?

एक बार को उसने किसी और को फोन करने की सोची पर फिर ये ख्याल आते ही रुक गई की क्या कहेगी... की उसका बैठा आत्महत्या कर रहा है, जाके रोको उसको.. क्यों करना चाहता है आत्महत्या?

झल्लाकर वो जल्दी से उठी और अपना बैग उठाकर होटल रूम से बाहर निकली। सामान पैक करने का टाइम था नहीं इसलिए रूम से चेक आउट नहीं किया। लाबी में आकर उसने अपनी गाड़ी निकली और तेजी से अपने घर की तरफ भगा दी।

हे भगवान... प्लीज सिद्धू.. कुछ करना मत बेटा..." दिल ही दिल में वो सोचती जा रही थी।

वो उस रात एक किटी पार्टी में थी जब पहली बार उसका और उसके बेटे सिद्धार्थ का रिश्ता बदल गया था। हर महीने वो और उसकी कुछ दोस्त मिलकर एक किटी पार्टी रखते थे जहाँ पर सिर्फ औरतें होती है, और वो सब आशा की अच्छी दोस्त थीं।

पार्टी के दौरान शराब बहुत ही आम बात थी। पार्टी में मौजूद सारी औरतें पीती थी और उसके बाद पार्न मूवीस और गंदी बातों का सिलसिला चलता। जब वहाँ मौजूद औरतें अपना मुँह खोलती, तो शर्म के सारे पर्दे हटाकर बात करती।

अपने ग्रुप में एक आशा को छोड़कर सब औरतों के बायफ्रेंड थे, ज्यादातर जवान लड़के और वहाँ सब अपने एक्सपीरियेन्सेस शेयर करती। कौन किस पोज में किससे चुदी, कब चुदी, कितनी देर चुदी, कैसे चुदी, सब खुलकर बताया जाता। पार्टी में चलेंज था की कौन सी औरत एक साथ कितने मर्दो को झेल सकती है और उसका रेकार्ड फिलहाल मिसेज कुलकर्णी के नाम था जिन्होंने एक साथ एक ही बिस्तर पर चार मर्दो से चुदवाया था। पूफ के तौर पर उन्होंने अपनी खुद की बनाई हुई एक फिल्म लाकर दिखाई थी जिसमें वो अपने बेडरूम में चार चार के साथ अकेली भिड़ी पड़ी थी।

उस रात भी यही हाल था। शराब और वासना हवा में थी और बेशर्मी हर औरत की जुबान पर। पर हद तब हो गई जब मिसेज शर्मा ने अपने पर्स से नशे की सिगरेट्स निकाली। आशा स्मोक तो करती थी पर ड्रग्स उसने पहली बार उस पार्टी में ली थी। पूरी सिगरेट खतम होने के बाद उसे अपना कोई होश नहीं था पर साथ ही साथ वो ये जानती थी की वो क्या कर रही है। सिगरेट में मौजूद ड्रग्स ने उसकी हालत अजीब कर दी थी। वो अपने होश में थी भी और नहीं भी।निकल रही हो..." रात के एक बजे जब आशा ने अपना समान पैक करना शुरू किया तो पास ही खड़ी मिसेज भट्टी ने पूछा।

हाँ..” आशा ने जवाब दिया।

कौन पिक कर रहा है?”

मेरा बेटा सिद्धार्थ..” आशा बोली।

 
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