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Adultery मस्तराम की कहानियाँ

भैया मुझे कोई अच्छा सा गन्ना दो ना

मेरा नाम धवल है। दोस्तों मेरी उम्र 23 साल की है मेरी लम्बाई 5.7 है रंग गौरा और में बहुत हेंडसम हूँ। अभी कुछ समय पहले मेरी बाहर नई नई नौकरी लगी थी। में वहाँ से कुछ दिनों कि छुट्टी ले कर घर पर आया था।

ये कहानी अभी पिछले महीने की है जिसमे मैने अपनी छोटी बहन प्रिया की चुदाई खेत पर की और फिर उसके बाद क्या क्या हुआ वो आप सभी कहानी मे ही पड़ लेना। दोस्तो पहले में आपका परिचय अपनी बहन से करा देता हूँ। दोस्तों मेरी छोटी बहन का नाम प्रिया है। उसकी उम्र 20 साल तक होगी उसके फिगर बहुत बड़े 36 28 34 है। और वो बहुत सुंदर है वैसे तो वो शहर मे रहकर पड़ाई कर रही है।

लेकिन अभी उसकी कॉलेज की छुट्टियाँ चल रही है। और प्रिया जब से शहर से आई है। वो काफ़ी समझदार हो गई है। एक तो वो वैसे ही बहुत सुंदर है उपर से उसके छोटे छोटे कपड़े मे वो तो और सेक्सी लगती है। और उसका फिगर देख कर तो किसी का भी लंड खड़ा हो जाए। क्या फिगर है मोटे और गोरे बूब्स पतली कमर भरी हुई गांड दोस्तो आप तो जानते है की बाहर नौकरी जब कुछ भी नही कर सकते और वहाँ उन्हे कुछ भी देखने को नही मिलता। अब घर पर आकर तो बस मुझसे रहा नही जा रहा था। में हर समय बस यही सोच रहता था की बस किसी की भी चूत मिल जाए चाहे वो चूत प्रिया की ही क्यों ना हो बस मुझे तो चूत कि चुदाई करनी थी।

तभी एक दिन की बात है। में बैठ कर प्रिया के बूब्स को निहार रहा था। की तभी माँ ने कहा की बेटा जा कर अपने बाबूजी को खेत पर खाना दे कर आओ। तो मैने कहा ठीक है माँ आप खाने को पैक कर दो तो मैं बाबूजी को दे कर आता हूँ। तभी प्रिया ने कहा की माँ मैं भी भैया के साथ खेत देखने जाउंगी मुझे बहुत दिन हो गये खेत पर गये हुए तो माँ ने कहा की ठीक है। और माँ ने खाना पैक कर के मुझे दे दिया और हम दोनों जाने लगे।

मैने एक सायकिल ले ली और प्रिया को आगे बैठने के लिए कहा तो प्रिया आगे बैठ गई। और हम चल दिए और फिर खेत पर पहुंच कर बाबूजी को खाना खिलाया। और फिर हम खेत पर टहलने लग गये। बाबू जी खाना खा के एक मजदूर को घर उसे बुलाने चले गये। और हम दोनों को कहा की में जा रहा हूँ। और हो सकता है कि मुझे थोड़ी देर हो जाएगी तुम लोग टहल कर घर चले जाना। फिर क्या था मैं और प्रिया टहलने लगे वहाँ पर हमारा एक गन्ने का खेत था। में उसमे से एक गन्ना तोड़ कर उसे चूसने लगा था।

तभी प्रिया ने मुझसे कहा की भैया मुझे भी गन्ना चाहिए। तो मैने उसे भी तोड़ कर गन्ना दे दिया। और वो मजे से उसे चूसने लगी कुछ देर के बाद प्रिया ने मुझसे कहा की भैया मुझे टयलेट लगी है। तो मैने कहा की यहीं पर कहीं भी जगह देख कर कर लो। यहाँ पर कोई दरवाजा तो नही है। और मैं आगे की तरफ चला गया फिर मैने एक गन्ने के झुंड के पीछे छुप गया और चुप कर प्रिया को देखने लगा। प्रिया ने अपनी जीस उतारी। और मैने देखा की उसने अंदर एक पिंक कलर की पेंटी पहनी हुई थी उसे भी उतार दी। तब मैने पहली बार प्रिया की गोरी गांड देखी जिसे देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया।

और फिर प्रिया जब खड़ी हो रही थी। अब मैने उसकी गांद का गुलाबी छेद भी देखा जिसे देख कर मुझसे रहा नही जा रहा था। फिर प्रिया ने अपनी जींस पहन कर मुझे आवाज़ लगाई। तो मैं उसके पास गया और मेरे पास आते ही उसकी नज़र मेरे लोवर पर पड़ी। जो की एक टेंट बना हुआ था। अब वो ज़रूर समझ गई थी की मैं उसे टायलेट करते हुऐ देख रहा था। फिर वो मुस्कुराने लगी और उसने मुझसे कहा की भैया मुझे कोई अच्छा सा गन्ना तोड़ कर दो ना।

में पहले तो ये समझ नही पा रहा था। पर मैने कहा की तू यहीं रुक मैं तेरे लिए एक अच्छा से गन्ने का इंतज़ाम करता हूँ। तो प्रिया ने कहा की सच भैया जल्दी करो मुझसे रहा नहीं जा रहा। मुझे प्रिया की बातों मे मुझे कुछ शरारत नज़र आ रही थी। मैं खेत के अंदर चला गया और वहाँ मुझे एक जगह खाली और साफ सी नज़र आई। और अब तो मेरे सामने सिर्फ प्रिया की गोरी गांड ही घूम रही थी। फिर क्या था मैने अपना 8 इंच का लंड बाहर निकल कर मूठ मारने लगा उधर प्रिया काफ़ी देर तक मेरा बाहर इंतजार करने के बाद जाने कब अंदर आ गयी। और मेरी आँखे बंद थी अचानक मुझे किसी और का हाथ अपने लंड पर महसूस हुआ। तभी मैने आँख खोली तो देखा की प्रिया घुटनो के बल बैठ कर मेरे लंड को सहला रही है। मैने उसको कहा की प्रिया ये क्या कर रही हो। तो प्रिया ने कहा की भैया ये आपकी हालत मेरी वजह से हुई है ना तो मैने सोच की इससे ठीक भी मैं ही कर दूँ। फिर क्या था मेरे चेहरे पर मुस्कान थी। और मैंने प्रिया को कुछ नही कहा जिसे उसने मेरी हाँ समझी और उसने मेरा लंड मुहं मे लेकर उसे चूसने लगी मैं उसके सर पर हाथ फिरा रहा था और मेरे मुहं से अहाआ आआआहा की आवाज़ निकल रही थी। प्रिया मेरा लंड को एक गन्ने की तरह चूस रही थी। जैसे कि उसने पहले भी कई बार लंड चूसा हो।

काफ़ी देर बाद मैने प्रिया को खड़ा किया और उसकी टी-शर्ट के उपर से ही उसके मोटे बूब्स दबाए। और मैंने उसे कहा की रूको मैं अभी आता हूँ तो उसने कहा की कहाँ जा रहे हो तुम। तो मैने कहा की बस दो मिनट मे आया और मैं भाग के गया और जिस चादर पर बाऊजी ने खाना खाया था। वो चादर उठा कर लाया और फिर उसे वहाँ पर बिछा दिया। और मैने प्रिया के सभी कपड़े उतार दिये और प्रिया को पूरा नंगा कर दिया। और अपने भी सारे कपड़े उतार लिये। प्रिया के बड़े बड़े बूब्स पपीते की तरह हवा मे झूल रहे थे। मैने प्रिया को लिटा कर उसके बूब्स को मुहं मे लेकर चूसने लगा। और मैने एक उंगली प्रिया की चूत मे डालकर अंदर बाहर करने लगा। काफ़ी देर अंदर बाहर करने से प्रिया की चूत बहुत गीली हो गई थी। और प्रिया ने मुझसे कहा की भैया अब रहा नही जा रहा तो मैने भी अपने लंड पर थूक लगाकर प्रिया की चूत लंड लगाया और जोर से एक धक्का लगाया और मेरा आधे से ज्यादा लंड सरक कर उसकी चूत मे समा गया। और फिर दो चार धक्के मारने के बाद मे पूरा लंड प्रिया की चूत मे समा गया और मैं प्रिया को चोदने लगा। उसे चोदते वक़्त मेरे मन मे एक ही ख़याल आ रहा था। की जिस तरह प्रिया की चूत मे मेरा लंड गया है। इस चुदाई से तो ये साफ हो जाता है की प्रिया पहले भी कई बार चुद चुकी है। लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता की मेरी बहन किससे चुद्वाती है। क्योकि वो तो इतनी सेक्सी माल है की उसे चोदने के लिए कोई भी तैयार हो जाए और इसी उधेड़ वन मे प्रिया को करीब 20 मिनट से में ज़ोर ज़ोर से चोद रहा था। और प्रिया भी खूब आवाज़ निकाल रही थी आआआहाल्ह भैया और छोड़ो मुझे में झड़ने वाली हूँ। तब मैने और तेज़ धक्के मारने शुरू कर दिये। और प्रिया झड़ गई इधर में भी झड़ने वाला था। थोड़ी देर बाद मैं भी झड़ गया। जैसे ही में ने अपना लंड प्रिया की चूत मे से बाहर निकल कर हम खड़े हुए तो हम दोनो के होश उड़ गये सामने बाबूजी खड़े थे। उन्हे देख कर हम दोनो की ज़ुबान पर जैसे ताला लग गया था।

और फिर बाबूजी आगे आए और मुझे समझ नही आ रहा था। की में उनसे क्या कहूँ तभी बाबूजी आगे आए और उन्होने प्रिया की गांड पर हाथ फेरा और कहा की अरे प्रिया तू तो शहर जा कर और भी कड़क माल बन गई हो। इसे सुन कर तो हमारी जान मे जान आई। और फिर क्या था। प्रिया ने झट से घुटनो के बल बैठ कर बाबूजी के लंड को बाहर निकल लिया। बाबूजी का लंड 9 इंच लंबा और दो इंच मोटा है। फिर प्रिया ने बाबूजी का लंड को सहलाते हुए कहा की इतने मोटे ताज़े लंड हमारे घर मे ही है।

और में ऐसे ही बाहर के मर्दो से चुद्वाती रही। और फिर प्रिया ने बाबूजी का लंड मुहं मे ले लिया और चूसने लगी उसे देखा मेरा लंड भी फिर से खड़ा हो गया। और मैं भी प्रिया के सामने जा कर खड़ा हो गया। तभी प्रिया ने मेरा भी लंड हाथ मे ले लिया। और उसे भी चूसने लगी काफ़ी देर के बाद बाबूजी लेट गये। और प्रिया बाबूजी के लंड पर अपनी चूत को लगाकर बैठ गई फिर और बाबूजी धक्के मारने लगे। पहले तो थोड़ी देर तक प्रिया ने मेरा लंड चूसा फिर मैने अपने हाथ मे लेकर अपना लंड सहलाने लगा। और जब मुझे पीछे की वार मिल गया तो प्रिया की गोरी गांड देखकर मेरे मुहं मे पानी आ गया था।

मैने अपने लंड पर तोड़ा सा थूक लगाया। और पीछे से प्रिया की गांद के गुलाबी छेद पर लगाया। तो प्रिया ने पीछे देखकर मुझे एक स्माइल दी तो जैसे उसने हाँ भर दी फिर क्या था। मैने एक ज़ोर दार धक्का मारा और मेरा लंड प्रिया की गांड मे फिसलता हुआ चला गया। फिर हम दोनो ने धक्के मारने शुरू कर दिये और प्रिया आवाज़े निकल रही थी। आआहाआआहहाहा बाबूजी और तेज़ और तेज़ और बाबूजी भी और तेज़ मारने लग गये करीब 30 मिनट के बाद हम लोग बारी बारी से झड़ गये और फिर प्रिया ने मेरा और बाबूजी का लंड चूस कर साफ किया। और फिर हमने अपने कपड़े पहन कर बाहर आ गये। फिर हम दोनो घर आ गये उस दिन रात को भी माँ के सोने के बाद हम तीनो ने छत पर चुदाई की जब तक हमारी छुट्टियां थी हमने चुदाई के खूब मज़े लिए। और फिर प्रिया अपने कालेज चली गई। और में अपनी जॉब पर चला गया। अब भी में रोज़ शाम को प्रिया से फ़ोन पर बात करता हूँ। अभी कुछ दिनो के बाद में दीवाली की छुट्टीयां ले कर घर जाऊंगा और प्रिया भी आएगी तो हम फिर से चुदाई करेंगे।
 
अहहहह क्या मस्त है मेरी बहना

हैल्लो दोस्तों, मेरी बहन पदमा जब 22 साल की हुई तब में 21 साल का था. मेरा नाम आशु है और में एक प्राइवेट कम्पनी में काम करता हूँ. मेरा कद 5 फुट 11 इंच है और में बहुत कसरती जिस्म का मालिक हूँ. जिस कम्पनी मे में काम करता हूँ उसकी मालकिन मिस कुकरेजा एक 40 साल की महिला है जिसका पति मर चुका है और उसके एक बेटा और एक बेटी है. उसका बेटा अनिल मेरा दोस्त है और वो बिल्कुल लड़की जैसा दिखता है.

अनिल की उम्र कोई 23 साल की है और उसकी बहन अनीला 20 साल की है. दोनों भाई बहन बहुत सुंदर दिखते है. मिस कुकरेजा भी काफ़ी प्रभावशाली औरत है. बेशक अनिल की उम्र 23 साल की हो चुकी है, लेकिन उसकी शादी अभी तक नहीं हुई क्योंकि में कुकरेजा फेमिली का दोस्त हूँ इसलिए मिस कुकरेजा मुझे अपना बेटा ही मानती है. अनिल स्लिम सा लड़का है, बहुत गोरा, गुलाबी होंठ, कद कोई 5 फुट 7 इंच, भूरे बाल और सबसे आकर्षित करने वाली चीज़ उसकी गांड है जो काफ़ी उभरी हुई है. मेरे दोस्त लोग आमतौर पर बातें करते है कि अनिल को लड़की होना चाहिए था क्योंकि उसकी गांड चुदने वाली है. में और अनिल एक साथ पढ़ते थे और पढ़ाई के बाद मुझे उसकी माँ ने नौकरी पर रख लिया था. में कुकरेजा परिवार का बहुत एहसानमंद हूँ.

मेरी माँ यशोदा एक स्कूल में टीचर है और पिता जी का देहांत हो चुका है. मेरी दीदी पदमा कॉलेज में पढ़ती है और बहुत सेक्सी है, पदमा 5 फुट 5 इंच की सेक्सी लड़की है और कई बार लड़के मेरी बहन के कारण एक दूसरे से लड़ाई कर चुके है, लेकिन मेरी बहन किसी को घास नहीं डालती. पदमा का जिस्म 36-24-36 है और गोरा रंग, कटीले नेन. वो अधिकतर टाईट जीन्स और टॉप पहनती है जिसमें से उसकी सेक्सी गांड और चूची का उभार देखने को बनता है. बेशक पदमा मेरी बहन है फिर भी मेरा ध्यान उसके हुस्न की तरफ चला ही जाता है.

एक बार वो अपने रूम मे कपड़े बदल रही थी और दरवाजा लॉक करना भूल गयी और में ग़लती से रूम मे घुस गया. पदमा बिल्कुल नंगी थी और उसका साँचे में ढला हुआ नंगा जिस्म देखकर मेरी साँस रुक गयी. मेरी बहन की लंबी टाँगें, कसरती जांघे और सपाट पेट देखकर मेरा लंड खड़ा हो गया. उसने झट से अपने हाथों से अपनी बड़ी-बड़ी चूची को ढक लिया, लेकिन में उससे पहले ही पदमा दीदी के जिस्म को देख चुका था. फिर में मांफी मांगता हुआ वापस लौट गया, लेकिन दीदी के नंगे जिस्म की तस्वीर ना भुला सका.

अब 25 जून को मेरी बहन का जन्मदिन है और में कुकरेजा फेमेली को इन्वाईट करने चला गया. सबसे पहले मुझे अनीला मिली अनीला एक स्लिम सी सेक्सी लड़की है, जिसकी चूची कोई 34 करीब होगी और गांड भी बिल्कुल कसी हुई है और मुझे उसके जिस्म पर कोई भी कमी नहीं दिखती. भूरी आँखें और भूरे बालों वाली अनीला क़िसी का भी दिल जीत सकती है और में भी उसके हुस्न का आशिक था.

वो मुझे प्यार की नज़र से कभी-कभी देख लेती थी, लेकिन में उन लोगों के बराबर नहीं था इसलिए में हमेशा अनीला को बस इज़्ज़त की नज़र से देखता था. मिस कुकरेजा ने मेरे इन्विटेशन के बारे मे कहा कि बेटा में तो आ नहीं पाऊँगी, लेकिन अनिल और अनीला पदमा के बर्थ-डे पर ज़रूर आयेंगे. ख़ैर अब मेरी बहन के जन्मदिन पर अनिल पदमा पर फिदा हो गया और या यह कहो कि अनीला मेरी बहन को अपनी भाभी बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो गयी.

फिर उसने अपने भाई से ना जाने क्या कहा कि अनिल बोला कि आशु मुझे तेरी बहन बहुत पसंद है और में तुझे अपना साला बनाना चाहता हूँ क्या हुस्न है? तेरी बहन पदमा का, तू मुझे अपना जीजा बना ले. में सारी उम्र उसको हर खुशी दूँगा और अपनी रानी बनाकर रखूँगा. मुझे ये रिश्ता पसंद था अनिल एक ईमानदार लड़का था, सुंदर था, अमीर था. फिर मैंने माँ से बात कि तो वो तुरंत मान गयी, लेकिन अब मिस कुकरेजा पर निर्भर करता था कि ये रिश्ता होगा या नहीं.

फिर अनिल और अनीला ने अपनी माँ से बात चलाई तो मिस कुकरेजा ने मुझे ऑफिस मे बुलाया. मिस कुकरेजा उस वक्त सफेद साड़ी मे अपनी कुर्सी पर बैठी हुई थी. वो बोली कि आशु बेटा मुझे इस रिश्ते से कोई एतराज़ नहीं है अगर तुम अनिल को अच्छी तरह जानते हो, समझते हो और उसको अपनी बहन का सुहाग बनाना चाहते हो तो मुझे ये शादी मंज़ूर है, लेकिन फिर बाद में मुझे क़िसी बात पर दोषी मत ठहराना. फिर में बोल उठा आपको दोषी, नहीं आंटी, कभी नहीं ? आप तो हम लोगों को इतना प्यार करती है, तो ठीक है हम शादी की तैयारी शुरू करते है.

अब पदमा भी बहुत खुश थी, होती भी क्यों ना? उसको इतना पैसे वाला पति मिल रहा था. शादी की शॉपिंग मे में और अनीला भी बहुत काम कर रहे थे और अनीला भी मेरे नज़दीक आ रही थी, वो बात-बात पर हंस देती मुझे पीठ पर हाथ मारती और कई बार तो गले से लिपट जाती. फिर मुझे लगा कि वो मेरे साथ अपना चक्कर चलाने के मूड में है. ऐसी सेक्सी लड़की के साथ संबंध बनाने मे मुझे क्या एतराज़ हो सकता था? अब अनिल और पदमा की शादी हो गयी और कुछ दिन के बाद पदमा हमारे घर वापस आई, लेकिन उसके चेहरे पर कोई खास खुशी नहीं झलक रही थी. मेरा एक दोस्त पदमा की शक्ल देखकर मुझसे अकेले मे बोला आशु क्या बात है? पदमा दीदी खुश नज़र नहीं आती. में तो सोचता था कि शादी के बाद पदमा दीदी खिल उठेगी, लेकिन ये तो मामला ही कुछ और है.

सच कहूँ तो शादी के बाद जब औरत को खूब अच्छा लंड मिले और खूब ज़ोर से चुदाई हो तो पूरा बदन खिल उठता है. आशु कहीं अनिल जीजा जी के लंड मे तो कोई कमी नहीं है. साले अगर मुझे मौका मिलता तो चाहे में पदमा को दीदी पुकारता हूँ, लेकिन उसको चोद-चोदकर कली से फूल बना देता. मुझे मेरे दोस्त की बात पर बहुत गुस्सा आया और मैंने उसको बाहर जाने को कह दिया, लेकिन मेरे दोस्त के शब्द मेरे दिमाग मे टिक गये.

फिर अगले दिन दोपहर को में अनिल से बात करने गया तो पता चला कि वो गोदाम मे गया हुआ है. गोदाम के बाहर चौकीदार ने मुझे देखा तो बोला साहब अन्दर जाने की क़िसी को इजाजत नहीं है, लेकिन आप तो साहब के साले हो तो चले जाओ. फिर में अंदर गया तो सारा गोदाम खाली पड़ा था. में मुड़ने ही वाला था की एक कमरे से आवाज़ें आ रही थी, हह्ह्ह्ह ज़ोर से अकबर भाई, ज़ोर से चोदो अपनी रानी को बहुत दिनों के बाद मौका मिला है, आअहह चोदो मुझे अकबर, क्या मस्त लंड पाया है आपने? वाहह अकबर भाई.

ये आवाज़ तो अनिल की थी और अकबर हमारी कंपनी मे एक ड्राइवर था, दरवाजा कुछ खुला था और मुझे अनिल नग्न रूप मे घुटनों और हाथों के बल झुका हुआ नज़र आया. अनिल की गोरी गांड उठी हुई थी और अकबर का कम से कम 7 इंच लंबा और मोटा लंड अनिल की गांड में घुसा हुआ था. अकबर मेरे जीजा को बेरहमी से चोद रहा था और अनिल मज़े से लंड अपनी गांड मे ले रहा था. अकबर क़िसी कुत्ते की तरह हाँफ रहा था. फिर अकबर बोला हाँ मालिक जब से आप शादी मे व्यस्त थे, मुझे भी ऐसी गांड नहीं मिली.

अब तो मेरी बीवी भी गांड मरवाने से मना करती है और मुझे गांड के बिना कुछ और अच्छा नहीं लगता. मालिक आप ही मेरी रानी बने रहो, मुझे कोई बीवी नहीं चाहिए. अब अनिल भी नीचे से बोला कि अकबर भाई मैंने भी पदमा से शादी करके यू ही मुसीबत मोल ले ली है, अगर मेरी बहन मुझे ना कहती तो में कभी ये शादी नहीं करता, लेकिन में अपनी बहन को क्या कहता कि मुझसे ठीक तरह से चुदाई नहीं होगी? या ये कहता कि में पदमा को क्या चोदूंगा? मुझे तो खुद को अपनी गांड के लिए अकबर भाई का लंड चाहिए. अब में उनकी और बातें सुन नहीं सका और गुस्से से भरा हुआ मिस कुकरेजा के रूम में गया.

फिर में बोला आंटी मेरी बहन शादी से खुश नहीं है, अनिल तो खुद कहता है कि वो ठीक से चोद नहीं सकता, वो तो खुद गांडू है और इस वक्त गोदाम मे अकबर से गांड मरवा रहा है. आंटी मेरी बहन की तो ज़िंदगी बर्बाद हो गयी ना. फिर मिस कुकरेजा अपनी सीट से उठी और मुझे अपनी बाहों में भरकर सीने से लगाते हुए बोली कि आशु बेटा मैंने तुझसे कहा था ना कि कल मुझे दोष मत देना. असल में अनिल के पिता भी लंड के मामले में कमज़ोर थे, लेकिन मुझे ये पता नहीं था कि उसको ये गांड कि भी बीमारी है. बेटा निराश मत होना जो करना होगा में करूँगी.

में कभी पदमा के जज़्बातों का नुकसान नहीं होने दूँगी, आख़िर पदमा अब हमारे घर की बहू है. में अनिल से बात करूँगी और समस्या का हल ढूंढ ही लूँगी और फिर अनीला भी तो तुझसे शादी करना चाहती है, अब मेरी एक नहीं दो बेटियाँ है अनीला और पदमा और जल्द ही अनिल तुझसे बात करेगा. फिर में बोला अनिल साला मुझसे क्या बात करेगा? जो करना था वो ठीक से कर नहीं पाया, लेकिन उसी रात अनिल ने मुझे एक बार में बुलाया और दो पेग विस्की के पीने के बाद मुझसे बोला यार में जान चुका हूँ कि तुझे मेरे उस शौक के बारे मे पता चल गया है और तुम जानते हो कि मेरे लंड में इतनी ताक़त नहीं है, लेकिन मेरे पास एक बहुत अच्छा सुझाव है अगर कहो तो बोलूं?

फिर मैंने कहा अब क्या सुझाव बचा है मेरी बहन की ज़िंदगी बर्बाद करके? देख आशु पदमा की चुदाई तो होगी अगर में नहीं करता तो कोई और करेगा. अब किसी बाहर के आदमी से हो तो घर की इज़्ज़त का क्या होगा? मेरी बात मान लो तुम खुद पदमा की चुदाई जी भरकर कर लो.

तुम दोनों भाई बहन पर क़िसी को शक भी नहीं होगा और में तुझे अपनी मनाली वाली कोठी की चाबी भी दूँगा जहाँ तुम दोनों अपना हनीमून मना लेना. तुझे भी अपनी बहन के जिस्म का मज़ा मिल जायेगा और अगर भगवान की मर्ज़ी हुई तो पदमा माँ भी बन जायेंगी और सारे समाज मे में भी बाप कहलाऊंगा. फिर कल को तुझे ही तो अनीला का पति बनाना है. फिर तुम हमारे घर मे रहकर दोनों को चोद सकते हो बोलो मंज़ूर है? लेकिन में पदमा को कैसे? वो मेरी बहन है, ये कैसे हो सकता है? फिर अनिल पेग पीकर फिर से बोला तो हम क्या पदमा को क़िसी और गैर से चुदने के लिए छोड़ दें ? इससे बेहतर होगा कि तुम ही उसकी जवानी के मज़े लूट लो और घर की इज़्ज़त भी बची रहेगी. फिर में बोला लेकिन अगर मैंने अपनी बहन को स्पर्श भी किया तो वो मुझे जान से मार डालेगी, चोदना तो दूर की बात है.

फिर अनिल बोला तू उसकी चिंता मत कर कल ही हम तीनों मनाली जायेंगे और में पदमा को चोदने की कोशिश करूँगा और जब मुझसे चोदा नहीं जायेगा तो वो मुझे गाली देगी और तब तुम आ जाना. जब चूत जल रही होती है तो रिश्ते नहीं देखती और फिर अपनी बहन की चूत अपने लंड से भर देना, एक बार वो चुद गयी तो सदा के लिए तेरी हो जायेगी.

जीजा की बात सुनकर अचानक मेरा लंड खड़ा होने लगा और अपनी बहन को चोदने की इच्छा सच होती नज़र आने लगी. फिर अगले दिन हम तीनों मनाली की तरफ चल पड़े. पदमा को उत्तेजित करने के लिए अनिल बार-बार उसके जिस्म पर हाथ फेरने लगा. फिर हम दोपहर को शराब पीने लगे, अनिल जानबूझ कर मेरे सामने ही पदमा के साथ सेक्सी बातें करने लगा, जिनको सुनकर पदमा का रंग लाल होने लगा.

फिर मनाली पहुँचकर अनिल बोला आशु तुम पास वाले कमरे मे सो जाओ और में अभी अपनी बीवी के साथ चुदाई के मज़े लेता हूँ. उसकी बात सुनकर पदमा शर्म से लाल हो उठी थी. शराब पी होने की वजह से अनिल का लंड जो थोड़ा बहुत खड़ा होता था वो भी नहीं हुआ था. फिर पदमा गुस्से में चिल्लाने लगी कि अनिल बहनचोद अगर लंड में कमज़ोरी थी तो मुझसे शादी क्यों की? साले अब इस जलती हुई चूत को में कहाँ लेकर जाऊं? मादरचोद की औलाद, साले नपुंसक कहीं के.

फिर अनिल शर्मिंदा हुआ बाहर निकला और बोला आशु तू अब बस 5 मिनट इंतज़ार करना, फिर अंदर चले जाना तेरा मामला फिट हो जायेगा. फिर ठीक 5 मिनट के बाद जब मे पदमा दीदी के रूम मे गया तो मैंने देखा कि पदमा नंगी पलंग पर लेटी हुई है और जांघे फैलाकर अपनी चूत मे उंगली कर रही थी. सच मानो तो उस समय मेरी बहन कोई कामदेवी लग रही थी. उसकी शेव की हुई चूत से पानी टपक रहा था और वो आँखें बंद किए हुई थी और चूत रगड़ रही थी.

फिर मैंने हिम्मत की और पलंग के पास जाकर उसके नंगे जिस्म पर हाथ फेरने लगा तो उसने झट से अपनी आँखें खोल दी और बोली भैया तुम यहाँ क्या कर रहे हो? जाओं यहाँ से, लेकिन फिर मैंने अपने हाथ उसकी चूची पर रख दिए और रगड़कर बोला दीदी में तुझे ऐसे प्यासी कैसे छोड़ दूँ? आख़िर भाई का भी कोई फ़र्ज़ होता है या नहीं? अगर जीजा नपुंसक हो तो क्या भाई का फ़र्ज़ नहीं बनता कि अपनी बहन की चूत की आग ठंडी करे, ऐसा मदमस्त जिस्म क्या भगवान हर क़िसी को देता है? दीदी अपनी भारी-भारी चूची, आपकी मस्त चूत जो बेचारी मस्त लंड के लिए तरस रही है और आपकी गांड सब मुझे पागल बना रही है. दीदी अब मुझे चुदाई से मत रोकना, में अपनी पदमा दीदी की चूत चोदे बिना आज यहाँ से जाने वाला नहीं हूँ, अगर मुझ पर विश्वास नहीं होता तो अपने भाई का लंड देख लो.

फिर मैंने ये कहते ही अपनी पेंट उतार दी और अपना 9 इंच वाला मोटा लंड पदमा को दिखाते हुए उसके हाथ मे दे दिया. मेरा मोटा लंड मेरी काली झांटो के बीच में से क़िसी काले नाग की तरह फूंकार रहा था. दीदी अब बताओ कि आपके भाई का लंड मस्त है या नहीं? आपकी मस्त चूत इसको अंदर लेने के लिए मचल रही है या नहीं? अब पदमा के भाव बता रहे थे कि वो एक पल के लिए झिझकी, लेकिन फिर वासना ने उस पर काबू पा लिया.

फिर मैंने कमीज़ भी उतार दी और कमरे का दरवाजा बंद करने के लिए बढ़ा तो पदमा बोली कि नहीं मेरे प्यारे भैया दरवाज़ा खुला ही रहने दो, अगर मेरा नपुंसक पति देखना चाहे तो देख ले कि मर्द का लंड कैसा होता है? और जवान औरत की प्यास कैसे बुझाई जाती है? आ जाओ भैया और तोड़ दो मेरी सील, जो शायद आज तक मेरे भैया के लिए ही बची हुई थी. मेरे भाई आज मुझे अपना बना लो, मुझे इस मस्त लंड से चोदकर पूरी औरत बना लो, आपकी बहन आज से सिर्फ़ आपकी है.

फिर में भी पदमा दीदी की बात सुनकर पूरा जोश में आ गया और अपनी दीदी के होंठों को चूमने लगा. उसके होंठों पर जीभ फेरते हुए उसके नंगे जिस्म से लिपटने लगा. हमारे जिस्म जल रहे थे और दीदी अभी भी मेरे लंड को पकड़े हुई थी और में उसको चूम रहा था. फिर मैंने बोला कि दीदी तुमने कभी लंड चूसा है? तो दीदी मचलकर बोली कि अभी तक तो नहीं, लेकिन आज अपने भैया का लंड चूसने की इच्छा ज़रूर है. अगर इजाज़त हो तो चूस लूँ? अगर चूस लेती हूँ तो मेरे भैया मेरे सईयां बन जायेंगे.

फिर मैंने दीदी की चूची को चूम लिया और बोला कि देर किस बात की, बना लो मुझे अपना सईयां. फिर दीदी ने झुककर मेरे लंड का टोपा चूम लिया और मेरे अंडकोष थामकर लंड को मुँह में ले लिया. फिर मैंने दीदी के बाल पकड़कर उसका मुँह अपने लंड पर टिका दिया और कमर आगे पीछे करने लगा.

फिर मैंने दीदी को पलंग पर सीधा लेटाकर उसके ऊपर चढ़ गया और अब मेरा मुँह दीदी की लाल चूत पर था और मेरा लंड उसके मुँह में था. हम 69 पोजिशन में एक दूसरे को चाटने लगे. अब दीदी की चूत का रस मुझे बहुत उत्तेजित करने लगा और उसकी चूत फड़फडाने लगी. अब देरी करना फ़िज़ूल था क्योंकि दीदी अब बहुत गर्म हो चुकी थी. मैंने दीदी से पूछा कि अब चुदाई शुरू करें? तो दीदी बोली हाँ भैया, अब इंतज़ार नहीं होता पेल डालो अपना लंड मेरी चूत में भैया और इस रात को यादगार बना दो. अब दीदी ने शर्म छोड़कर मुझे चोदने का निमंत्रण दिया. अब मैंने चूत की भीगी हुई फांकों को फैलाकर लंड चूत के मुँह पर टिका दिया और धड़कते दिल से मैंने लंड को एक धक्का मारा और मेरा पूरा टोपा चूत में घुस गया, ओह भैया धीरे से आहह में मर गयी, अहह भैया धीरे से उई माँआआ धीरे से भैया. फिर मेरे लंड को चूत के अंदर गर्माहट महसूस हुई और मैंने धीरे से लंड और आगे बढ़ा दिया.

फिर में दीदी की गांड को थाम कर धीरे-धीरे लंड अंदर पेलने लगा, सच मानों दोस्तों ऐसा मज़ा मुझे आज तक नहीं मिला था. दीदी की चूत जन्नत का दरवाजा थी. मेरे लंड पर कसी हुई दीदी की चूत की दीवारें मेरे लंड को सहला रही थी. जब आधे से ज्यादा लंड चूत में घुस गया तो दीदी अपने चूतड़ उठाकर और लंड लेने लगी. में दीदी के ऊपर सवार था और जन्नत का मज़ा लेते हुए चुदाई करने लगा और चूत की चिकनाहट के कारण अब लंड आसानी से चूत में घुस रहा था.

फिर कोई 5 मिनट में लंड पूरा चूत में समा गया. मेरी रानी बहन मेरा लंड पूरा अपनी चूत में ले चुकी थी. मेरी रानी तेरी क्या मस्त चूत है? अहहहह क्या मस्त है मेरी बहना? अब तो दर्द नहीं हो रहा पदमा रानी? तो दीदी मज़े से आँखें बंद किए हुए बोली नहीं मेरे राजा भैया, अब तो मज़ा आ रहा है, चोद डालो अपनी लाडली बहना को, शाबाश राजा भैया, पेलो अपना लंड अपनी सजनी की चूत में, अब तो हम भाई बहन सिर्फ़ दुनिया के लिए ही है असल मे तो मेरा भाई मेरा पति है, ऑह्ह्ह्ह मेरे भैया का कितना मस्त लंड है.

अब दीदी अपनी गांड उठाकर चुदवाने लगी थी और में बहुत जोश में आकर ज़ोर ज़ोर से धक्के मारने लगा. अब पूरा कमरा फ़च फ़च की आवाज़ों से गूँज रहा था और चुदाई का संगीत चारों तरफ था और चुदाई की सिसकियाँ हम दोनों भाई बहन के मुँह से निकल रही थी. मेरा लंड क़िसी पिस्टन की तरह अपनी सग़ी बहन की चूत चोद रहा था. अब हमारे जिस्म पसीना-पसीना हो चुके थे और में आगे झुक कर दीदी के बूब्स चूसने लगा. दीदी मदहोश हो गई और बोली ओह्ह्ह्हह्ह्ह्ह भैया और चूसो आआआआआ म्‍म्म्मममममम चोदो मेरे राजा चोदो मुझे, मुझे हर रोज ऐसे चोदना भैया. फिर में दीदी को चोदने लगा और दीदी बेकाबू होने लगी, भैया मुझमे समा जाओ, रोज़ चोदना मुझे, भर दो मेरी चूत अपने लंड से, बना दो मुझे अपनी पत्नी, मुझे अपने बच्चे की माँ बना दो भैया. फिर लगातार चुदाई के बाद दीदी झड़ गई और वो पूरी तरह से संतुष्ट हो गई थी. अब हम बहुत चुदाई करते है और खूब मजे लेते है.

 
गुरु जी का केला Hindi Sexi Stories

दोस्तो आज काफ़ी दिन बाद आरएसएस पर आया हूँ तो सोचा क्यूँ ना आपको कुछ मस्त कहानियों का तोहफा दूं तो मित्रो इसी कड़ी में आज की ये तड़कती फड़कती दूसरी कहानी पेश है कैसे एक गुरु ने अपने शिष्य की पत्नी की चुदाई की...

मेरा नाम कोमल मिश्रा है और मैं एक मिड्ल क्लास घर की बहू हूँ. मेरी शादी, 3 महीने पहले जय से हुई थी.

जय एक व्यापारी है और उनका छोटा कारोबार है. घर में सास के अलावा, मेरी ननद डॉली रहती है जो अब कॉलेज ख़तम करके एक छोटी सी फर्म में नौकरी कर रही है..

मेरी सासू मां बहुत ही धार्मिक किस्म की औरत है जो ज़्यादातर वक़्त पूजा-पाठ में गुज़ार देती है.

सासू मां, सिर्फ़ 37 साल की है क्यूंकी उनकी शादी 15 वर्ष की आयु में हुई थी और जब जय पैदा हुआ तब वो सिर्फ़ 18 साल की थी.

जय 21 साल के है और मैं 19 की. उनकी छोटी बहन डॉली भी मेरे उम्र की ही है.

जय की शादी के बाद, अब डॉली की शादी के चर्चे जोरों पर है.

क्यूंकी मां जी बहुत धार्मिक है, उनके मुंह से हमेशा उनके गुरु जी के बारे में सुना करती थी.

गुरु जी का नाम आरके महाराज है जो इन दिनों उतर भारत की यात्रा पर गये हुए थे.

जब मैं नयी दुल्हन बन कर इस घर में आई थी तब से मां जी और डॉली को गुरु जी के आश्रम जाते हुए देखा करती थी.

मां जी ने मुझे सिर्फ़ इतना कहा था की गुरु जी की वजह से उनके परिवार में सुख-शांति बनी हुई है.

मैं मां जी की तरह घंटों पूजा घर में बैठ कर पूजा नहीं करती थी लेकिन फिर भी मैं धार्मिक थी. हमेशा से मेरे मां-बाबूजी ने मुझे धर्म के प्रति आस्था बनाए रखने की सलाह दी थी.

मैं भी रोज़ मां जी के साथ पूजा घर में बैठ कर उनके लिए पूजा की सामग्री तैयार करके देती.

परिवार में सब कुछ एकदम ठीक चल रहा था. मैंने अपने परिवार में हमेशा झगड़ा और नफ़रत देखी थी.

मेरे बाबूजी के रिश्तेदार, हमेशा जायदाद के नाम पर एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते थे पर यहाँ आकर मैं जैसे सब परेशानियों से मानो दूर आ गई थी. मेरे मा-बाबूजी शादी के बाद मेरी खुशी देख कर बहुत खुश थे.

जय मुझसे बहुत प्यार करते है. व्यापारी होने के कारण, वो हफ्ते में 2-3 बार देर से घर लौटते थे लेकिन फिर भी मैं उनका इंतेज़ार करती थी और हम दोनों साथ बैठकर खाना खाते.

आज रात को भी मैं जय का इंतेज़ार कर रही थी और जय को घर आते आते, रात का 1 बज गया.

थके हारे घर पर लौटने के बाद, फ्रेश होकर वो खाना खाने बैठे.

मैं भी उनके सामने बैठ गई.

पहला नीवाला खाने के बाद, दूसरा नीवाला मेरे मुंह के पास लाकर बोले – चलो खा लो जानेमन !?!

मैंने अपना मुंह खोला और उनकी उंगलियों को मुंह में लेकर नीवाला मुंह में लिया और जैसे ही उन्होंने अपनी उंगलियाँ पीछे खींची, मैंने उनकी कलाई पकड़ ली और उनकी उंगलियों को हल्के से चूस लिया.

नीवाला खाते हुए, मैं हल्के से हंस पड़ी.

आँखों-आँखों में मानो, वो मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे.

उनकी नज़रें, मेरे पूरे जिस्म का जायज़ा ले रही थी.

खाना खा कर जय अख़बार लेकर बेडरूम में चले गये और में रसोई के काम ख़तम करने लगी. रसोई के काम निपटाकर मैं बेडरूम में आई.

जय जैसे अख़बार में डूबे हुए थे.

मैं बिस्तर पर उनके पास बैठ गई और मैंने अख़बार खींचते हुए उनसे थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा – आप इतनी देर से मत आया करो जी… मुझे आपके साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता है और आप है की हमेशा देर से आते हो… घर से बाहर निकलने के बाद आपको याद भी रहता है की आपकी बीवी घर पर इंतेज़ार कर रही होगी !?!

जय मुस्कुराते हुए बोले – जानेमन, ये सब हमारे भविष्य के लिए ही तो कर रहा हूँ ना… हमारा परिवार बढ़ेगा तो हमें आगे के लिए भी तो सोचना चाहिए, है ना !?! – और मुझे समझाते हुए उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और अपने सीने से लगाते हुए कहा – कस कर पाकड़ो ना जान !!

जय की बाहों में, मुझे जैसे जन्नत नसीब होने के एहसास मिलता.

जय के होंठ मेरे गले को छू रहे थे. उन्होंने मेरी गर्दन पर अपनी जीभ फेरते हुए कहा – इतनी शिकायत करोगी तो कल से बिस्तर से नहीं उतुंगा और ना ही तुम्हें उठने दूँगा…

उनकी ये प्यार भरी बातें सुन कर मैं उनकी बाहों में जैसे पिघल सी गई थी.

जय ने मेरे गालों को चूमा और फिर मेरे होंठों पर अपना मुंह रखा और मेरे होंठों को चूमने लगे.

मैं भी उनके होंठों को चूमने लगी.. – उम्म्म म्म्म्म म म म मम म्म्म्म म मम…

फिर जय ने मेरा पल्लू हटाया और मेरी चोली के बटन्स खोल कर मुझे बिस्तर पर लिटा दिया.

मेरी साड़ी और पेटिकोट उतार कर मेरी चूत को पैंटी के ऊपर से सहलाना शुरू किया.

आ आ अह ह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स स्स विपूल्ल्ल्ल्ल् ल्ल्ल्ल्ल् ल्ल्ल्ल्ल् ल्ल सस्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्सस्स ओह…

जय के मेरी पैंटी निकाली और मेरी बुर पर कस कर अपनी उंगलियाँ रगड़ने लगे.

ओह, विपूल्ल्ल्ल आ आ आ अहह क्या कर रहे हूऊ ऊ ऊ ऊ ऊ स स्स्स्स्स् स्स्स स्स… – मैं सिसकारियाँ ले रही थी और जय मेरी बुर को रगड़ रहे थे.

फिर जय ने अपनी शॉर्ट्स उतारी और अपने लंड का सुपाड़े को मेरी बुर पर रगड़ना शुरू किया.

ओह म्म्म्म म म म म कितना गर्म है तुम्हारे ये जय…

अंदर डालूं ना जानेमन… – जय ने पूछा..

मैंने मुस्कुराते हुए, उनकी कमर पर हाथ रखते हुए कहा – एकदम गहराई तक डालो, जानू… मेरी ये सिर्फ़ तुम्हारी है… सिर्फ़ तुम्हारी…और जय ने मेरे पैर फैलाते हुए, अपना वो एक झटके के साथ मेरी बुर के अंदर डाल दिया.

उूउ उइ ई ई माआ आ आअ उू उउफ फ फ फ फफ फफ्फ़ स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स स्स ओह…

जय, मेरे ऊपर झुक गये और अपनी कमर ऊपर नीचे हिलाते हुए मेरी बुर मारने लगे.

उनका वो मेरी बुर के अंदर बाहर होने लगा और में सिसकारियाँ लेती रही – स स्स्स्स्स् स्स स्स ओह आ आह ह जय सस्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स स्स म्म्म्म म म म मम…

2-3 मिनिट बाद, जय ने अपना वो मेरी बुर से निकाला और अपना सारा मुठ मेरे पेट पर उंड़ेल दिया.

मैं बाथरूम गई और अपने आपको सॉफ करके उनके बगल में आ कर बैठ गई.

जय, मेरे तरफ देख कर बोले – मां जी ने बताया होगा ना की गुरु जी वापस आ गये है !?!

मैंने हाँ में सिर हिलाया.

देखो शायद, गुरु जी कल दोपहर को घर आ रहे है…

इससे पहले की व अपनी बात ख़तम करते मैंने उनके मुंह पर हाथ रखते हुए कहा – जी, मैं जानती हूँ की गुरु जी कल घर आ रहे है और उनकी खूब सेवा करनी है… मां जी ने सब बताया था, शाम को… आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए… आपकी जोरू आपको शिकायत का मौका नहीं देगी… मां जी ने आज मुझे गुरु जी के बारे सब कुछ बताया… ये भी की कैसे 10 साल पहले आपकी जान ख़तरे में थी तब गुरु जी ने ही आपकी रक्षा की थी… यहाँ आने के बाद मैंने गुरु जी के बारे में जितना सुना है, उससे मेरी उत्सुकता और बढ़ गई है… इतनी महान हस्ती से मिलने का मौका रोज़ रोज़ थोड़ी मिलता है !! – बात करते करते, मैंने जय के सीने पर सिर रखा..

मां जी ने तो ये भी बताया की कैसे आपने ये कारोबार गुरु जी के कहने पर सिर्फ़ 5,000 की लागत से शुरू किया और आज इससे इस मुकाम तक पहुँचाया है की आपने ये घर भी खुद के दम पर खरीदा…

अपनी बीवी की ऐसे समझदार बातें सुन कर, जय को अच्छा लगा..

अगले दिन दोपहर को बताए अनुसार गुरु जी घर आए. उनके आते ही, घर में मानो रौनक सी आ गई.

सारे घर पर चहल-पहल थी.

आस पड़ोस की औरतें भी उनके दर्शन करने आई थी.

गुरु जी ने जल-पान करके सबको एक एक करके आशीर्वाद दिया और जब सारे लोग लौट गये तो मां जी, दीदी, डॉली और मैंने गुरु जी के चरण स्पर्श किए.

मैं गुरु जी को पहली बार देख रही थी. उनके चेहरे पर मानो एक अलग सा तेज था.

मां जी ने मुझे एक बार बताया था की गुरु जी की उम्र लगभग 46-48 की है लेकिन उन्हें देख कर लग रहा था मानो वो मुश्किल से 25-30 वर्ष के है.

मां जी ने पहले सारी आस-पड़ोस की औरतों को गुरु जी के दर्शन करने दिए और तब तक, मैं सोलह शृंगार करती रही.

मेरे बाहर आने के बाद मां जी ने मुझे गुरु जी से मेरा परिचय कराया और साथ में मुझे इशारे करते हुए उनके पैर छूने को कहा. मैंने मां जी के कहे अनुसार गुरु जी के पैर छुए.

गुरु जी ने अपना हाथ मेरे सिर पर थपथपाते हुए मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा – सदा सुहागन रहो, बहू…

फिर गुरु जी ने मां जी की तरफ देखते हुए कहा – बहू तो बहुत सुंदर है मां जी और संस्कार बड़े अच्छे है… (गुरु जी के मुंह से अपनी तारीफ़ सुन कर, में हल्के से मुस्कुरा उठी.)

मां जी- आप के कहे अनुसार ही हमारे गाँव का सरपंच के बेटी से ब्याह कराया है, जय का… सच कहूँ तो अगर आपने बहू की सिफारिश नहीं की होती तो ऐसी बहू पाने का सौभाग्य नहीं मिलता, गुरु जी…

आस-पड़ोस की औरतें अब जा चुकी थी. डॉली भी तैयार हो रही थी लेकिन उससे इतनी देर होते देख मां जी ने मुझे उसके कमरे में भेजा.. मैं उसके कमरे की तरफ चलने लगी और मां जी गुरु जी से आश्रम के बारे में बातें करने लगी..

डॉली के कमरे में पहुँचते ही, डॉली ने दरवाज़ा खोल कर मुझे गले लगाते हुए पूछा – भाभी, आपको हमारे गुरु जी कैसे लगे !?!

मैंने उस सवाल को टालते हुए उससे पूछा – क्या सचमुच गुरु जी 47-48 साल के है !?! उन्हें देखकर लगता है की उनकी उम्र 30-32 से ज़्यादा नहीं होगी…

डॉली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – भाभी जान, आप भी ना !?! मां तो लगभग 17-18 वर्षों से गुरु जी की भक्त रही है… वैसे तो मां गुरु जी से उम्र में छोटी है लेकिन गुरु जी फिर भी मां को आदर से मां जी कहते है… आपने तो सुना ही होगा ना, उन्हें बातें करते हुए !?!

हम दोनों बातों में मसरूफ़ थी.

उतने में मां जी की आवाज़ आई – बहू और डॉली !?! दोनों ऊपर क्या कर रही हो इतनी देर !?! जल्दी नीचे आओ दोनों…

हम दोनों कहे अनुसार नीचे आई और डॉली ने भी गुरु जी के पैर छुए. गुरु जी ने उससे भी आशीर्वाद दिया और चलने की इजाज़त माँगी.

गुरु जी ने जब जाने की बात की तो मां जी ने गुरु जी से 2 मिनिट रुकने को कहा..

मां जी ने गुरु जी से कहा की उन्हें कुछ बात करनी है…

गुरु जी ने मां जी की तरफ मुड़ कर कहा – कहिए क्या बात है मां जी !?! निसंकोच होकर कहिए..

मां जी के चेहरे पर हल्की सी शिकन थी. बात करते हुए वो थोड़ा सा हड़बड़ा रही थी.

गुरु जी – वो… वो… वो… (गुरु जी ने फिर से उन्हें आश्वस्त किया.)

गुरु जी आपके कहे अनुसार मैंने तीर्थ यात्रा पर जाने का प्रबंध किया है… मैं कल रात 8 बजे की ट्रेन से जा रही हूँ… डॉली भी कल सुबह अपने ऑफीस के काम से मुंबई जा रही है, कुछ दिनों के लिए… लगा था की जय और बहू को अकेले में वक़्त बिताने का मौका मिलेगा… लेकिन जय ने आज सुबह बताया की उससे भी शायद कुछ दिन देल्ही जाना पड़ेगा… हम तीनो शायद 2 हफ्तों तक घर पर नहीं है… बहू की चिंता हो रही है, गुरु जी… ये गाँव के माहौल में पली बढ़ी है तो शहर में अकेले रखना उचित नहीं होगा… मैंने आश्रम में सुषमा दीदी से बात की थी और उन्होंने कहा की रात में किसी स्त्री का आश्रम में रहना उचित नहीं है… मैं ये सोच रही थी की अगर आप हमारे घर पर कुछ दिन रुक जायें तो बहू को अभी आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा… आस पड़ोस की बहनें भी आपकी छत्र-छाया में रहेंगी तो उन्हें भी आनंद होगा…

मां जी की बातें सुन कर मुझे दुख हुआ की जय 2 हफ्ते मुझसे अलग रहेंगे. लेकिन इस बात की खुशी थी की गुरु जी का सेवा करने का अवसर भी मिलेगा मुझे.

गुरु जी ने मुस्कुराते हुए, उन्हें आश्वस्त किया की अगर वो यही चाहती है तो वो ज़रूर रहेंगे हमारे घर पर.. लेकिन साथ में उन्होंने ये भी बताया की वो दिन के समय घर पर नहीं आ सकते क्यूंकी उनके भक्तों का आश्रम में ताँता लगा रहता है और अगर वो आश्रम में नहीं दिखाई दिए तो उनके भक्त नाराज़ हो जाएँगे..

बहू तुम्हें तो कोई ऐतराज़ तो नहीं है ना अगर में यहाँ रात में 11:30 बजे तक आओं तो !?! गुरु जी ने पूछा..

गुरु जी की बातें सुन कर मुझे थोड़ा गुस्सा आया क्यूंकी वो अपनी भक्त से अनुमति कैसे ले सकते है !?!

मैंने सिर का पल्लू ठीक करते हुए ज़मीन की तरफ देखते हुए कहा – गुरु जी आप हमसे अनुमति क्यूँ माँग रहे है !?! आप हमारे घर पर आकर रहें ये तो हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी… आपके यहाँ रहने से, ये घर पावन हो जाएगा…

गुरु जी कुछ देर बाद लौट गये और दूसरे दिन सुबह, जय और मां जी चले गये.. डॉली भी श्याम 6 बजे निकल गई.. मैं अब घर में अकेली थी..

रात को 11:40 के करीब, गुरु जी घर पर आए.

मैंने उन्हें घर के भीतर लिया और उनके चरण स्पर्श किए.

गुरु जी को उनकी पसंदीदा द्रक वाली चाय बना कर दी.

गुरु जी ने चाय की चुस्की लेते हुए मुझसे पूछा – बहू तुम्हें रात में डरावने सपने आते है क्या !?!

मैं चौंक गई क्यूंकी मैंने ये बात सिर्फ़ मां जी को बताई थी, सुबह जब वो निकल रही थी..

जी गुरु जी… 2-3 बार मुझे डरावने सपने आए थे… सपने में मैंने देखा की मैं एक बन्द कमरे में हूँ, जहाँ हर तरफ खून ही खून है… सुबह उठ कर मैं काफ़ी देर तक सोचती रही की इस सपने का मतलब क्या होगा लेकिन फिर मैंने अपने आप से कहा की ये सपना ही तो है !?!

गुरु जी मेरी बातें, ध्यान से सुन रहे थे.

फिर उन्होंने अपने झोले में से एक नारियल निकाला और मुझे अपने कमरे में ले जाने को कहा..

मैं कहे अनुसार उन्हें अपने बेडरूम में ले आई.

वहाँ चल कर गुरु जी ने नारियल पर विभूति छिड़क दी और आँखें बंद करके कुछ मंतरा पढ़े.

मंतरा पढ़ने के बाद, उन्होंने अपनी आँखें खोली और झोले में से गंगा जल निकाल कर नारियल पर छिड़का.

गंगा जल छिड़कते ही, नारियल में से धुआँ उठने लगा.

मैं डर के मारे सकपका गई.

गुरु जी ये क्या है !?! – मैंने 2 कदम पीछे जाते हुए पूछा..

गुरु जी ने मेरी तरफ देख कर नारियल को एक तरफ रखा और कहने लगे – इस कमरे में कोई नकारात्मक उर्जा महसूस कर रहा हूँ, बहू… कुछ है जो तुम्हें नुकसान पहुचाना चाहता है… गुरु जी की बातें सुन कर मेरे पैरों तले से जैसे ज़मीन सरक गई..

मैं उनके पैरों में गिर पड़ी..

मुझे इस विपदा से बचा लीजिए, गुरु जी… कृपा करके बचा लीजिए मुझे…

(मेरी आँखों से आँसू बहने लगे.)

गुरु जी ने मुझे कंधे से पकड़ कर उठाया और मेरे आँसू पोंछते हुए, मुझे दिलासा देते हुए कहा की वह सब ठीक कर देंगे…

फिर उन्होंने फिर से आँखें बंद करते हुए मुझे बिस्तर में बैठने को कहा.

मैं तुरंत बैठ गई.

आँखें बंद करते हुए, वो मुझसे बात कर रहे थे.

बहू, क्या तुम्हारी शादी के बाद तुम्हारे घर से कोई यहाँ आया था !?!

मैं डर के मारे कुछ सोच नहीं पा रही थी लेकिन फिर मुझे याद आया की मेरी मेरी मासी आई थी, शादी के 2 हफ्ते बाद..

जी गुरु जी… मेरी मासी आई थी, शादी के बाद मुझे आशीर्वाद देने के लिए… वो मेरी शादी में नहीं आ पाई थी इसीलिए शादी के बाद आई थी…

गुरु जी कुछ पलों के लिए शांत हो गये लेकिन फिर उन्होंने मुझसे कहा की मेरी मासी ने मुझपर जादू-टोना किया हुआ है…

बहू, जय काम से दूर नहीं गया है… उसे भेजा गया है… जब तक ये टोना दूर नहीं होगा, जय तुझ में दिलचस्पी नहीं लेगा…

गुरु जी के बातें सुन कर दिल बैठा जा रहा था.

जय से दूर रह सकती हो, बहू !?!

नहीं गुरु जी… मैं उनके बगैर नहीं रह सकती… – मैंने तुरंत जवाब देते हुए उनके सामने हाथ जोड़े..

कुछ कीजिए, गुरु जी… मैं अपने पति को खोना नहीं चाहती…

गुरु जी अब मेरे बगल में बैठ गये, बिस्तर में.

ये टोना दिन बा दिन बढ़ता जाएगा, बहू… इसे निकालने के लिए तेरे शरीर को शुद्ध करना होगा…

मैंने धीमे स्वर में पूछा – क्या करना होगा, गुरु जी !?!

(गुरु जी ने मेरे कंधों को पकड़ कर, मुझे बिस्तर में लिटा दिया)

तुम्हारे शरीर को मंत्रों द्वारा शुद्ध करूँगा, मैं… अच्छा हुआ जो मैं गंगा जल और शहद साथ ले आया… और उन्होंने अपने झोले से गंगा जल और शहद की बोतलें निकाली..

एक कटोरी में गंगा जल और शहद का मिश्रण करके उन्होंने मुझसे बिना कुछ बोले, मेरे धुन्नी (नेवेल) पर से साड़ी को हटाया…

मेरी धुन्नी पर कटोरी को थोड़ा सा तिरछा करके गंगा जल और शहद का मिश्रण धीरे धीरे गिराया..

फिर उन्होंने उनकी उंगलियों को मेरी धुन्नी पर रगड़ना शुरू किया..

शुद्धि करते हुए ऐसा एहसास होगा, ये सोचा नहीं था मैंने.
 
गुरु जी के गर्म हाथ मेरी धुन्नी को ज़ोर ज़ोर से रगड़ रहे थे.

उम्म्म… गुरु जी… – मैंने सिसकारी भरते हुए “आ” भरी..

उन्होंने अपनी एक उंगली मेरी धुन्नी में डाली और उंगली को हिलाने लगे जिससे उनकी उंगली का सिरा, मेरी धुन्नी में कस कर रगड़ने लगा..

ओह गुरु जी ये क्या… स स्स्स्स स्स…

फिर उन्होंने रुक कर मेरी तरफ देखते हुए कहा – बहू, धुन्नी को ठीक से शुद्ध करना होगा… तुम्हें मेरे साथ देना होगा, इसमें… अगर तुम मेरा साथ नहीं दोगी तो में ये टोना कभी नहीं निकाल पाउँगा, बहू…

मैंने उनकी तरफ देखते हुए, बस अपनी गर्दन हिलाते हुए हामी भरी..

गुरु जी अब नीचे झुक गये और उन्होंने अब अपनी जीभ मेरी धुन्नी पर रगड़नी शुरू की..

श गुरु जी… आ आ अह ह स स्स्स्स्स स्स…

मैंने उनकी बालों में उंगलियाँ फेरनी शुरू की और गुरु जी अपनी जीभ को गोल गोल घुमाने लगे, मेरी धुन्नी के इर्द-गिर्द.

श गुरु जी… स स्स्स्स्स स्स ओह माआ आ अ… मैं मज़े से कराहने लगी और मैंने बिना सोचे समझे कहा – और चाटिये ना, गुरु जी…. हाँ, और चाटिये ना…

मेरे मुंह से ऐसा सुन कर उन्होंने अपनी जीभ का सिरा, मेरी धुन्नी के छेद में धकेला और मेरी धुन्नी को चाटने लगे..

स स्स्स्स्स् सस्स आ आ आ आ अह ह उम्म्म्म म म म म म म म म म म म म ओह माआ आ आ आअ उफ फ फ फ फफ्फ़…

मैंने उनके सिर को ज़ोर ज़ोर से मेरी धुन्नी में दबाया..

फिर गुरु जी ने अपना मुंह खोल कर मेरी धुन्नी पर प्रेस किया और मैंने उनके दाँतों को मेरी धुन्नी पर कटोचते हुए महसूस किया..

आ आ आ आ स स्स्स्स्स स्स ओह माआ आ ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह और कीजिए ना मेरी शुद्धि गुरु जी… पूरे बदन की शुद्धि कीजिए पूरी रात… स स्स्स स्स…

अब गुरु जी ने मेरे सीने पर से पल्लू हटाया और मेरा ऊपर आकर बिना कुछ कहे मेरे मुंह पर अपना मुंह रखा.

उनके गर्म होंठों के स्पर्श से जैसे में पिघल से गई.

मैंने उनकी पीठ पर हाथ रखते हुए उन्हें कसकर दबोच लिया.

गुरु जी ने अपना मुंह खोल कर मेरे होंठों को कस कर अपने मुंह में भींचना शुरू किया.

फिर उन्होंने अपनी जीभ मेरे होंठों पर रगड़ना शुरू किया.

मेरे होंठों को वो अपनी जीभ से चाट रहे थे और मैं मस्त होकर मचल रही थी..

म्म्म्म म म म उम्म्म्म एम्म्म…

मैंने अपना मुंह खोला और उनकी जीभ अपने मुंह में ली.

गुरु जी अब अपनी जीभ को मेरी जीभ के चारों तरफ रगड़ रहे थे.

फिर मैंने अपनी जीभ उनके मुंह में डाली.. गुरु जी, मेरी जीभ को चूसने लगे अपने मुंह में लेकर..

चूसते हुए उनके मुंह से – मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह मु ह की आवाज़ें आ रही थी..

फिर उन्होंने मेरी जीभ पर अपने होंठों को आगे-पीछे रगड़ना शुरू किया..

उम्म्म स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प. उनकी चूसा से में पागल हो उठी और मैंने उन्हें कस कर अपनी तरफ खींचा..

चूसते हुए उन्होंने मेरी जीभ पर लगी सारी लार (थूक) चूस ली.

मैं भी गुरु जी के बालों में उंगलियाँ फेरते हुए, उन्हें सहला रही थी.

जय, इस तरह तेरी जीभ चूसता है क्या बहू !?!

मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा – मैं उनसे प्यार करती हूँ गुरु जी लेकिन सच कहूँ तो आपकी लार का स्वाद बहुत अच्छा लगा मुझे…

जय ने कभी मेरी जीभ की चूसा नहीं की थी लेकिन जिस तरह से गुरु जी ने मेरी जीभ चूसी उससे ऐसे लगा मानो मैं स्वर्ग में हूँ..

फिर गुरु जी ने मेरे दोनों गालों को कस कर दबाते हुए मेरे मुंह खोला और अपना मुंह मेरे मुंह के ऊपर ला कर अपनी गाढ़ी थूक मेरे मुंह में गिराने लगे.

मैंने उनकी थूक को अपनी जीभ पर लिया और जीभ को मुंह में घुमाते हुए उनकी थूक का स्वाद चखने लगी..

उम्म्म्म गुरु जी स स्स स्स कितनी पावन है आपकी लार म्म्म्म म… और मैं और कुछ बोले बिना, उनकी लार पी गई.

फिर गुरु जी ने मेरी क्लीवेज के बीचो-बीच चूमना शुरू किया..

ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरु जी आ आ अह ह स स्स्स्स्स् सस्स में आपकी दासी बनना चाहती हूँ गुरु जी… मुझे अपने काम वासना के लिए रोज़ इस्तेमाल कीजिया गुरु जी स स्स्स्स्स् स्स स्स…

मैं बस अपने होश खो कर उनके चुंबनों से पागल हो रही थी और गुरु जी की गर्दन को पकड़ कर उन्हें मेरे सीने पर दबा रही थी.

फिर उन्होंने मेरी क्लीवेज को अपनी जीभ से चाटना शुरू किया..

आ आह ह ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मा आ आ अ स स्स्स्स्स् स्स्स स्स श गुरु जिइ इ ई ई ई ई ई ई ई ई स स्स्स्स्स् स्स्स स्स…

फिर उन्होंने मेरी चोली के बटन्स खोले और पीछे हाथ डाल कर मेरी ब्रा उतारी.

उन्होंने मुझे बिस्तर पर बिठा दिया और मेरे स्तनों को हाथ में लेकर कस कर दबाने लगे.

आ आह ह कितने मजबूत हाथ है आपके स स्स्स्स्स् स्स्स्स स्स ज़ोर से… और ज़ोर से दबाइए ना, मेरे दूध… उम्म्म गुरु जी आ अह ह मेरी चूत गीली हो रही है म्म्म्म म गुरु जिइ इ ई…

अब उन्होंने मेरे दोनों दूध को अपनी मुट्ठी में जकड़ा और उन्हें कस कर मसलने लगे.

मैं उनकी इस हरकत से कराह उठी.. आ आ आ आ आ आ आ अहह…

मेरी चूत ने अपनी पहली धार छोड़ी.

फिर उन्होंने मेरे लेफ्ट चुचि मुंह में ली और मेरी चुचि को चूसने लगे..

ओह मा आ आअ स स्स्स्स्स् स स्स गुरु जी मेरी पैंटी पूरी गीली हो गई है… में झड़ चुकी हूँ, एम्म्म…

गुरु जी ने मेरी चुचि को अपने होंठों के बीच कस कर भींचा और उनकी इस हरकत से मैं थोड़ा पीछे झुकी.

उनके बालों को सहलाने लगी, अपनी उंगलियों से और गुरु जी मेरी चुचि को चूसते रहे..

कोमल, मेरी रंडियों की चूत में कभी सूखा नहीं पड़ता… उनकी चूत हमेशा गीली रहती है, मेरी कृपा से…

ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरु जी… आ आ अहह चूसीए अपनी रंडी बहू की चुचियाँ गुरु जी… ओह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स स्स उफ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फ फफ्फ़…

मेरी गंदी गंदी बातों से उत्तेजित हो कर, गुरु जी ने मेरी चुचियों को अपनी लार से गीला करना शुरू किया.

वो अपनी जीभ को मेरी चुचियों के चारों तरफ रगड़ने लगे, सर्कल्स में..

ओह, मा आ आ आ स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स कितना मज़ा आ रहा है गुरु जी स स्स्स्स्स् स स्स चाटिये मेरी चुचियों को आ आ अहह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स और चाटिये… और चाटिये ना स स्स्स्स्स् स्स्स स्स…

गुरु जी अब मेरी चुचियों को दांतों तले दबाने लगे.

मेरी चुचियों को काटने लगे..

आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आह ह गुरु जी… में मर गाइि ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई…

मेरी चूत फिर से गीली होने लगी..

उनकी जीभ मेरी चुचियों को लगातार सहला रही थी और उनके होन्ट मेरी चुचियों को कस कर दबा रहे थे.

मैं उनकी गर्दन को जकड़ कर अपनी तरफ खींचती रही और फिर जैसे मेरी चूत से ज्वाला-मुखी उफन पड़ा और मैं सिहर उठी.

मेरी चूत ने दूसरी बार अपना पानी छोड़ा था.

उफनती नदी की तरफ मेरी चूत के रस ने मेरी पैंटी को पूरी तरह भिगो दिया..

गुरु जी ने मेरी साड़ी पूरी तरह निकाल दी.

मैं उनके सामने सिर्फ़ अपने पेटिकोट और पैंटी में थी.

पैंटी का गीलापन पेटिकोट पर लगा हुआ था.

गुरु जी ने अपना कुर्ता निकाला और फिर अपनी धोती उतारी..

अब वो केवल एक लंगोट में, मेरे सामने बिस्तर पर बैठ गये.

मैंने उन्हें वासना भरी निगाह से देखते हुए पूछा – गुरु जी आपने अपनी रंडियों का जीकर किया था कुछ देर पहले… कितनी रंडियाँ है आपकी और क्या वो मुझसे अच्छी है, बिस्तर में !?!

मेरे इस सवाल पर गुरु जी ने हल्की मुस्कुराहट भरे अंदाज़ में कहा – तेरे इस खानदान में ही मेरी कई रंडियाँ है, बहू. तेरी सासू मां पिछले 10 साल से मेरे साथ सो रही है और तेरी ननद डॉली भी मेरे साथ सोने लगी है… उसकी नथ मैंने ही उतारी थी और मैंने मां जी से सॉफ सॉफ कह दिया है की उसकी शादी इसी शहर में कराना ताकि वो मुझे अक्सर मिलने आ सके और तो और तेरी मां जी और डॉली दोनों को पता है की इन 2 दिनों में, मैं तुझे दिन-रात चोदूंगा… तेरी सासू मां की बहनें सीमा, उसकी दोनों भाभी, पिंकी और निशा और फिर तेरे पति के चाचा की बीवी और उनकी तीनो बहुए, ये सारी की सारी औरतें मेरे साथ कई बार सो चुकी है…

गुरु जी की बातें सुनकर मुझे मां जी, डॉली और उनकी बाकी रंडियों पर जलन तो हुई लेकिन ये भी ख़याल आया की मुझे भी मौका मिला है, गुरु जी के साथ वक़्त बिताने का..

गुरु जी, मैं आपकी सबसे बड़ी रंडी बनना चाहती हूँ… मां जी, डॉली और जय के आने तक मैं पूरा दिन और पूरी रात घर में नंगी रहूंगी, आपकी सेवा में…

गुरु जी अब बिस्तर पर खड़े हो गये और उन्होंने बिना कुछ कहे, मुझे अपनी तरफ खींचा..

मेरे बाल पकड़ कर उन्होंने मेरा चेहरा अपने लंगोट पर दबाया..

सूंघ ले, अपने गुरु जी का लंड रंडी…

गुरु जी के आदेश अनुसार में उनके लंगोट पर से उनके लंड की मादक खुशबू सूंघने लगी उम्म्म्मम..

उनके लंगोट से पसीने की मादक खुशबू आ रही थी.. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उनके लंगोट को चाटना शुरू किया..

फिर, मैंने उनकी तरफ देखा और उनका लंगोट खोल कर मैंने उनके लंड के दर्शन किए..

उनका लंड, जय के लंड से काफ़ी मोटा और काला था..

मैं झट से उनके लंड से लिपट गई और अपनी जीभ से उनके अंडकोष को चूमने और चाटने लगी.

उनके लंड की मादक खुश्बू मुझे पागल करे जा रही थी.

गुरु जी ने अपने लंड को पकड़ कर उनका टोपा मेरे होंठों पर रगड़ा.

उम्म्म्मम गुरु जी… स स्स्स स्स कितनी मस्त खुश्बू आ रही है… स स्स स्स…

मैंने उनके लंड के टोपे को कवर करती चमड़ी को पीछे किया और उनका चिप-चिप स्लिपरी टोपा एक्सपोज़ करते हुए, उसे चाटने लगी.

गुरु जी मज़े में मोन करने लगे..

ओह प्रिय्आ अ म्म्म्म म कोमल बेटी आ आह ह स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् सस्स… साली, चाट अपने गुरु जी के टोपे को… मुंह में लेकर चूस ले कस कर तेरी मां की चूत…

मैं उनकी गालियों से और मस्त हो रही थी.

फिर मैंने उनके टोपे पर लगी पेशाब वाली क्रॅक पर जीभ घुमाना शुरू किया..

उम्म्म गुरु जी मुझे आपका मुठ पीना है… – और ये कह कर मैंने उनका लंड मुंह में लिया..

उनके लंड को चूसने लगी ज़ोर ज़ोर से..

स्ल स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प स्ल र्प…

फिर गुरु जी ने मेरे गालों को पकड़ा और अपने लंड को मेरे मुंह में मारने लगे.

मेरे मुंह को चोदने लगे ज़ोर ज़ोर से..

उनका लंड मेरे मुंह में थपेड़े मारने लगा – स्वूप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्वूऊप स्वू ऊ ओप स्वू ऊ ओप स्ओू ऊ ऊ ऊप स्ओू ऊ ऊ ऊप…

फिर उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला और अपने हाथ में थूक कर उस थूक को अपने लंड पर रगड़ा.

उनका लंड, उनकी थूक की परत में चमक रहा था.

मैंने फिर से उनका थूक से सना लंड मुंह में लिया और उससे और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी.

गुरु जी भी मेरे बालों को पकड़ कर अपना लंड मेरे मुंह में मारने लगे, फिर से..

ले ले रंडी… ले मेरा लंड… आ आह ह स स्स्स्स्स स्स आ आ अह ह ह आह ह अह ह…

तोप तोप तोप तोप तोप तोप तोप तोप…

खूब चूसा के बाद, गुरु जी ने मुझे पकड़ा और फिर अपने लंड का टोपा मेरे होंठों पर टीका कर मुस्कुराते हुए कहा – ले मेरा मुठ, कुतिया…

और बस कुछ ही पलों में, उन्होंने अपनी पहली धार मेरे मुंह में छोड़ दी.

उनका गाड़ा रस, मेरे मुंह में उफन पड़ा..

उू उ उम्म्म्म स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् सस्स प्रआ आ आ आ आ आ आ आ आ आअ…

गुरु जी का गर्म गर्म मुठ मेरे मुंह में था.

मैंने उससे अपने मुंह में ही रख कर उन्हें दिखाते हुए, मुठ को अपनी जीभ से मुंह में चारों तरफ घुमाया और फिर में उसे पी गई..

मुठ निकलने के बाद, मुझे लगा गुरु जी और मर्दों की तरह ठंडे पढ़ जाएँगे, कुछ देर के लिए लेकिन उन्होंने मुझे बिस्तर पर फिर से लिटा दिया और मेरा पेटिकोट उतार दिया, पूरी तरह..

अब, मैं सिर्फ़ पैंटी में थी उनके सामने.. गुरु जी ने नीचे झुक-कर, मेरी चिकनी सपाट जांघों को चूमना शुरू किया.

उनकी इस हरकत से, मैं फिर से सिहर उठी और उनके बालों में उंगलियाँ घुमाने लगी.

फिर उन्होंने, मेरी जांघों को और फैला दिया और वो अपनी जीभ के सिरे से मेरी जांघों को चाटने लगे.

उनकी लार से मेरी दोनों जांघें गीली होने लगी और में उनके बालों को कसकर खींचते हुए सिसकियाँ लेने लगी – सस्स्स्स्स् स्स्स स्स ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई म्म्म्म म म म म म म म म म ओह आ आ र र र्र र गज्ग घ ह… ऐसे चाटगे तो मेरी चूत फिर से पानी छोड़ देगी, मेरे रजा आा अ… – मैं मदमस्त होकर बड़बड़ाने लगी..

फिर उन्होंने, मेरी कमर को दोनों हाथों में दबोचा और अपने होंठों से मेरी चूत पर चुम्मों की बारिश करने लगे.

उनके होंठों का स्पर्श महसूस करते ही मुझे सातवें आसमान पर होने का अनुभव हुआ.

अब मैंने उनके बालों को पकड़ा और उन्हें सिर को नीचे दबाने लगी, मेरी चूत पर. मैंने अपने पैर उनकी गर्दन पर क्रॉस किए और उन्हें अपने पैरों में जकड़ लिया.

आह ह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई चाट लो, मेरी चूत को… चाट लो मेरे मालिकक्कक क स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स्स स्स… अब से मैं आपकी रखेल हूँ… आपके साथ बिस्तर गर्म करने के लिए, कुछ भी करूँगी म्म्म्म म और मैं खुद ही मस्ती में बड़बड़ाते हुए, अपनी कमर उठा कर उनकी चटाई का आनंद लेने लगी..

गुरु जी ने अपना मुंह खोला और मेरे चूत को मुंह में दबोच लिया.

उनके होंठों को मेरी चूत के इर्द-गिर्द महसूस करते ही, मेरा जिस्म जैसे एकदम टाइट हो गया और मैंने अपनी कमर उठा ली मस्ती में..

ओह गुरुजिइइई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ई ऐसा आनंद देंगे तो दुनिया की हर औरत आपके साथ सोने को तैयार होगी एम्म्म स स्स्स्स्स् स्स्स्स्स् स स्स और चूसो मेरी चूत… आज तक जय ने भी इतनी दफ़ा मेरी चूत से पानी नहीं निकाला है… मुझे तो पता ही नहीं था की मेरी चूत इतना पानी छोड़ सकती है स स्स्स्स्स् स्स्स स्स… खा जाइए, मेरी चूत… मसल दीजिए, मेरी चूत को…
 
Hindi sexi stori जब फँसा चूत में केला

यह एक ऐसी घटना है जिसकी याद दस साल बाद भी मुझे शर्म से पानी पानी कर देती है। लगता है धरती फट जाए और उसमें समा जाऊँ। अकेले में भी आइना देखने की हिम्मत नहीं होती। कोई सोच भी नहीं सकता किसी के साथ ऐसा भी घट सकता है ! ये एक केले का किस्सा है

उस घटना के बाद मैंने पापा से जिद करके जेएनयू ही छोड़ दिया। पता नहीं मेरी कितनी बदनामी हुई होगी। दस साल बाद आज भी किसी जेएनयू के विद्यार्थी के बारे में बात करते डर लगता है। कहीं वह सन 2000 के बैच का न निकले और सोशियोलॉजी विषय का न रहा हो। तब तो उसे जरूर मालूम होगा। खासकर हॉस्टल का रहनेवाला हो तब तो जरूर पहचान जाएगा।

गनीमत थी कि पापा को पता नहीं चला। उन्हें आश्चर्य ही होता रहा कि मैंने इतनी मेहनत से जेएनयू की प्रवेश परीक्षा पासकर उसमें छह महीने पढ़ लेने के बाद उसे छोड़ने का फैसला क्यों कर लिया। मुझे कुछ सूझा नहीं था, मैंने पिताजी से बहाना बना दिया कि मेरा मन सोशियोलॉजी पढ़ने का नहीं कर रहा और मैं मास कम्यूनिकेशन पढ़ना चाहती हूँ। छह महीने गुजर जाने के बाद अब नया एडमिशन तो अगले साल ही सम्भव था। चाहती थी अब वहाँ जाना ही न पड़े। संयोग से मेरी किस्मत ने साथ दिया और अगले साल मुझे बर्कले यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में छात्रवृत्ति मिल गई और मैं अमेरिका चली गई।

लेकिन विडम्बना ने मेरा पीछा वहाँ भी नहीं छोड़ा। यह छात्रवृत्ति हीना को भी मिली थी और वह अमरीका मेरे साथ गई। वही इस कारनामे की जड़ थी। उसी ने जेएनयू में मेरी यह दुर्गति कराई थी। उसने अपने साथ मुझसे भी छात्रवृत्ति के लिए प्रार्थनापत्र भिजवाया था और पापा ने भी उसका साथ होने के कारण मुझे अकेले अमेरिका जाने की इजाजत दी थी। लेकिन हीना की संगत ने मुझे अमेरिका में भी बेहद शर्मनाक वाकये में फँसाया, हालाँकि बाद में उसका मुझे फायदा मिला था। पर वह एक दूसरी कहानी है। हीना एक साथ मेरी जिन्दगी में बहुत बड़ा दुर्भाग्य और बहुत बड़ा सौभाग्य दोनों थी।

वो हीना ! जेएनयू के साबरमती हॉस्टल की लड़कियाँ की सरताज। जितनी सुंदर उससे बढ़कर तेजस्वी, बिल्लौरी आँखों में काजल की धार और बातों में प्रबुद्ध तर्क की धार, गोरापन लिये हुए छरहरा शरीर, किंचित ऊँची नासिका में चमकती हीरे की लौंग, चेहरे पर आत्मविश्वारस की चमक, बुध्दिमान और बेशर्म, न चेहरे, न चाल में संकोच या लाज की छाया, छातियाँ जैसे मांसलता की अपेक्षा गर्व से ही उठी रहतीं, उच्चवर्गीय खुले माहौल से आई तितली।

अन्य हॉस्टलों में भी उसके जैसी विलक्षण शायद ही कोई दिखी। मेरी रूममेट बनकर उसे जैसे एक टास्क मिल गया था कि किस तरह मेरी संकोची, शर्मीले स्वभाव को बदल डाले। मेरे पीछे पड़ी रहती। मुझे दकियानूसी बताकर मेरा मजाक उड़ाती रहती। उसकी तुर्शी-तेजी और पढ़ाई में असाधारण होने के कारण मेरे मन पर उसका हल्का आतंक भी रहता, हालाँकि मैं उससे अधिक सुंदर थी, उससे अधिक गोरी और मांसल लेकिन फालतू चर्बी से दूर, फिगर को लेकर मैं भी बड़ी सचेत थी, उसके साथ चलती तो लड़कों की नजर उससे ज्यादा मुझ पर गिरती, लेकिन उसका खुलापन बाजी मार ले जाता। मैं उसकी बातों का विरोध करती और एक शालीनता और सौम्यता के पर्दे के पीछे छिपकर अपना बचाव भी करती। जेएनयू का खुला माहौल भी उसकी बातों को बल प्रदान करता था। यहाँ लड़के लड़कियों के बीच भेदभाव नहीं था, दोनों बेहिचक मिलते थे। जो लड़कियाँ आरंभ में संकोची रही हों वे भी जल्दी जल्दी नए माहौल में ढल रही थीं। ऐसा नहीं कि मैं किसी पिछड़े माहौल से आई थी। मेरे पिता भी अफसर थे, तरक्कीपसंद नजरिये के थे और मैं खुद भी लड़के लड़कियों की दोस्ती के विरोध में नहीं थी। मगर मैं दोस्ती से सेक्स को दूर ही रखने की हिमायती थी

जबकि हीना ऐसी किसी बंदिश का विरोध करती थी। वह कहती शादी एक कमिटमेंट जरूर है मगर शादी के बाद ही, पहले नहीं। हम कुँआरी हैं, लड़कों के साथ दोस्ती को बढ़ते हुए अंतरंग होने की इच्छा स्वाभाविक है और अंतरंगता की चरम अभिव्यक्ति तो सेक्स में ही होती है। वह शरीर के सुख को काफी महत्व देती और उस पर खुलकर बात भी करती। मैं भारतीय संस्कृति की आड़ लेकर उसकी इन बातों का विरोध करती तो वह मदनोत्सव, कौमुदी महोत्सव और जाने कहाँ कहाँ से इतिहास से तर्क लाकर साबित कर देती कि सेक्स को लेकर प्रतिबन्ध हमारे प्राचीन समाज में था ही नहीं। मुझे चुप रहना पड़ता।

पर बातें चाहे जितनी कर खारिज दो मन में उत्सुकता तो जगाती ही हैं। वह औरतों के हस्तमैथुन, समलैंगिक संबंध के बारे में बात करती। शायद मुझसे ऐसा संबंध चाहती भी थी। मैं समझ रही थी, मगर ऊपर से बेरुखी दिखाती। मुझसे पूछती कभी तुमने खुद से किया है, तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होती! भगवान ने जो खूबियाँ दी हैं उनको नकारते रहना क्या इसका सही मान है? जैसे पढ़ाई में अच्छा होना तुम्हारा गुण है, वैसे ही तुम्हारे शरीर का भी अच्छा होना क्या तुम्हारा गुण नहीं है? अगर उसकी इज्जत करना तुम्हें पसंद है तो तुम्हारे शरीर ……

“ओफ… भगवान के लिए चुप रहो। तुम कुछ और नहीं सोच सकती?” मैं उसे चुप कराने की कोशिश करती।

“सोचती हूँ, इसीलिये तो कहती हूँ।”

“सेक्स या शारीरिक सौंदर्य मेरा निजी मामला है।”

“तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा नॉलेज भी तो तुम्हारी निजी चीज है?” उस दिन कुछ वह ज्यादा ही तीव्रता में थी।

केला अन्दर तक चला गया था..

“है, लेकिन यह मेरी अपनी योग्यता है, इसे मैंने अपनी मेहनत से, अपनी बुद्धि से अर्जित किया है।”

“और शरीर कुदरत ने तुम्हें दिया है इसलिए वह गलत है?”

“बिल्कुल नहीं, मैं मेकअप करती हूँ, इसे सजा-धजाकर अच्छे से संवार कर रखती हूँ।”

“लेकिन इससे मज़ा करना गलत समझती हो? या फिर खुद करो तो ठीक, दूसरा करे तो गलत, है ना?”

“अब तुम्हें कैसे समझाऊँ।”

वह आकर मेरे सामने बैठ गई, “माई डियर, मुझे मत समझाओ, खुद समझने की कोशिश करो।”

मैंने साँस छोड़ी, “तुम चाहती क्या हो? सबको अपना शरीर दिखाती फिरूँ?”

“बिल्कुल नहीं, लेकिन इसको दीवार नहीं बनाओ, सहज रूप से आने दो।” वह मेरी आँखों में आँखें डाले मुझे देख रही थी। वही बाँध देनेवाली नजर, जिससे बचकर दूसरी तरफ देखना मुश्किल होता। मेरे पास अभी उसके कुतर्कों के जवाब होते, मगर बोलने की इच्छा कमजोर पड़ जाती।

फिर भी मैंने कोशिश की, “मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ, प्रेम-व्रेम के चक्कर में फँसने नहीं।”

“प्रेम में न पड़ो, दोस्ती से तो इनकार नहीं? वही करो, शरीर को साथ लेकर।”

मैं उसे देखती रह जाती। क्या चीज है यह लड़की ! कोई शील संकोच नहीं? यहाँ से पहले माँ-बाप के पास भी क्या ऐसे ही रहती थी ! उसने छह महीने में ही कई ब्वायफ्रेंड बना लिये थे, उनके बीच तितली-सी फुदकती रहती। हॉस्टल के कमरे में कम ही रहती। जब देखो तो लाइब्रेरी में, या दोस्तों के साथ, या फिर हॉस्टल के कार्यक्रमों में। मुझे उत्सुकता होती वह लड़कों के साथ भी पढ़ाई की बातें करती है या इश्क और सेक्स की बातें?

मुझे उसके दोस्तों को देखकर उत्सुकता तो होती पर मैं उनसे दूर ही रहती। शायद हीना की बातों और व्यवहार की प्रतिक्रिया में मेरा लड़कों से दूरी बरतना कुछ ज्यादा था। वह नहीं होती तो शायद मैं उनसे अधिक मिलती-जुलती। उसके जो दोस्त आते वे उससे ज्यादा मुझे ही बहाने से देखने की कोशिश में रहते। मुझे अच्छा लगता- कहीं पर तो उससे बीस हूँ। हीना उनके साथ बातचीत में मुझे भी शामिल करने की कोशिश करती। मैं औपचारिकतावश थोड़ी बात कर लेती लेकिन हीना को सख्ती से हिदायत दे रखी थी कि अपने दोस्तों के साथ मेरे बारे में कोई गंदी बात ना करे। अगर करेगी तो मैं कमरा बदलने के किए प्रार्थनापत्र दे दूंगी।

वह डर-सी गई लेकिन उसने मुझे चुनौती भी देते हुए कहा था, “मैं तो कुछ नहीं करूँगी, लेकिन देखूँगी तुम कब तक लक्ष्मण रेखा के भीतर रहती हो? अगर कभी मेरे हाथ आई तो, जानेमन, देख लेना, निराश नहीं करूंगी, वो मजा दूंगी कि जिन्दगीभर याद रखोगी।”

उस दिन मैं अनुमान भी नहीं लगा पाई थी उसकी बातों में कैसी रोंगटे खड़े कर देनेवाली मंशा छिपी थी। लेकिन अकेले में मेरे साथ उसके रवैये में कोई फर्क नहीं था। दोस्ती की मदद के साथ साथ एक अंतनिर्हित रस्साकशी भी। नोट्स का आदान-प्रदान, किताबों, विषयों पर साधिकार बहस और साथ में उतने ही अधिकार से सेक्स संबंधी चर्चा। अपने सेक्स के, हस्तमैथुन के भी प्रसंगों का वर्णन करती, समलैंगिक अनुभव के लिए उत्सुकता जाहिर करती जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से मेरी तरफ इशारा होता। कोई सुंदर गोरी लड़की मिले तो… तुम्हारी जैसी… शायद मेरे प्रति मन में कमजोरी उसे मुझे खुलकर बोलने से रोकती। वह अशालीन भी नहीं थी। उसकी तमाम बातों में चालूपन से ऊपर एक परिष्कार का स्तर बना रहता। वह विरोध के लायक थी पर फटकार के लायक नहीं। वह मुझे हस्तमैथुन के लिए ज्यादा प्रेरित करती। कहती इसमें तो कोई आपत्ति नहीं है न। इसमें तो कोई दूसरा तुम्हें देखेगा, छुएगा नहीं?

वह रात देर तक पढ़ाई करती, सुबह देर से उठती। उसका नाश्ता अक्सर मुझे कमरे में लाकर रखना पड़ता। कभी कभी मैं भी अपना नाश्ता साथ ले आती। उस दिन जरूर संभावना रहती कि वह नाश्ते के फलों को दिखाकर कुछ बोलेगी। जैसे, ‘असली’ केला खाकर देखो, बड़ा मजा आएगा।’ वैसे तो खीरे, ककड़ियों के टुकड़ों पर भी चुटकी लेती, ‘खीरा भी बुरा नहीं है, मगर वह शुरू करने के लिए थोड़ा सख्त है।’ केले को दिखाकर कहती, “इससे शुरूआत करो, इसकी साइज, लम्बाई मोटाई चिकनाई सब ‘उससे’ मिलते है, यह ‘इसके’ (उंगली से योनिस्थल की ओर इशारा) के सबसे ज्यादा अनुकूल है। एक बार उसने कहा, “छिलके को पहले मत उतारो, इन्फेक्शन का डर रहेगा। बस एक तरफ से थोड़ा-सा छिलका हटाओ और गूदे को उसके मुँह पर लगाओ, फिर धीरे धीरे ठेलो। छिलका उतरता जाएगा और एकदम फ्रेश चीज अंदर जाती जाएगी। नो इन्फेक्शकन।”

मुझे हँसी आ रही थी। वह कूदकर मेरे बिस्तर पर आ गई और बोली, “बाई गॉड, एक बार करके तो देखो, बहुत मजा आएगा।”

एक-दो सेकंड तक इंतजार करने के बाद बोली,”बोलो तो मैं मदद करूँ? अभी ! तुम्हें खा तो नहीं जाऊँगी।”

“क्या पता खा भी जाओ, तुम्हारा कोई भरोसा नहीं।” मैं बात को मजाक में रखना चाह रही थी।

“हुम्म….” कुछ हँसती, कुछ दाँत पीसती हुई-सी बोली,”तो जानेमन, सावधान रहना, तुम जैसी परी को अकेले नहीं खाऊँगी, सबको खिलाऊँगी।”

“सबको खिलाने से क्या मतलब है?” मुझे उसकी हँसी के बावजूद डर लगा।

उस दिन कोई व्रत का दिन था। वह सुबह-सुबह नहाकर मंदिर गई थी। लौटने में देर होनी थी इसलिए मैंने उसका नाश्ता लाकर रख दिया था। आज हमें बस फलाहार करना था। अकेले कमरे में प्लेट में रखे केले को देखकर उसकी बात याद आ रही थी,”इसका आकार, लम्बाई मोटाई चिकनाई सब ‘उससे’ मिलते हैं।”

मैं केले को उठाकर देखने लगी, पीला, मोटा और लम्बा। हल्का-सा टेढ़ा मानो इतरा रहा हो और मेरी हँसी उड़ाती नजर का बुरा मान रहा हो। असली लिंग को तो देखा नहीं था, मगर हीना ने कहा था शुरू में वह भी मुँह में केले जैसा ही लगता है। मैंने कौतूहल से उसके मुँह पर से छिलके को थोड़ा अलगाया और उसे होठों पर छुलाया। नरम-सी मिठास, साथ में हल्के कसैलेपन का एहसास भी।

क्या ‘वह’ भी ऐसा ही लगता है?

मैं कुछ देर उसे होंठों और जीभ पर फिराती रही फिर अलग कर लिया। थूक का एक महीन तार उसके साथ खिंचकर चला आया।

लगा, जैसे योनि के रस से गीला होकर लिंग निकला हो ! (एक ब्लू फिल्म का दृश्*य)।

धत्त ! मुझे शर्म आई, मैंने केले को मेज पर रख दिया।

मुझे लगा, मेरी योनि में भी गीलापन आने लगा है।

साढ़े आठ बज रहे थे। हीना अब आती ही होगी। क्लास के लिए तैयार होने के लिए काफी समय था। केला मेज पर रखा था। उसे खाऊँ या रहने दूँ। मैंने उसे फिर उठाकर देखा। सिरे पर अलगाए छिलके के भीतर से गूदे का गोल मुँह झाँक रहा था। मैंने शरारत से ही उसके मुँह पर नाखून से एक चीरे का पिहून बना दिया। अब वह और वास्तविक लिंग-जैसा लगने लगा। मन में एक खयाल गुजर गया- जरा इसको अपनी ‘उस’ में भी लगाकर देखूँ?

पर इस खयाल को दिमाग से झटक दिया।

लेकिन केला सामने रखा था। छिलके के नीचे से झाँकते उसके नाखून से खुदे मुँह पर बार-बार नजर जाती थी। मुझे अजीब लग रहा था, हँसी भी आ रही थी और कौतुहल भी। एकांत छोटी भावनाओं को भी जैसे बड़ा कर देता है। सोचा, कौन देखेगा, जरा करके देखते हैं। हीना डींग मारती है कि सच बोलती है पता तो चलेगा।

मैंने उठकर दरवाजा लगा दिया।

हीना का खयाल कहीं दूर से आता लगा। जैसे वह मुझ पर हँस रही हो।

मध्यम आकार का केला। ज्यादा लम्बा नहीं। अभी थोड़ा अधपका। मोटा और स्वस्थ।

मैं बिस्तर पर बैठ गई और नाइटी को उठा लिया। कभी अपने नंगेपन को चाहकर नहीं देखा था। इस बार मैंने सिर झुकाकर देखा। बालों के झुरमुट के अंदर गुलाबी गहराई।

मैंने हाथ से महसूस किया- चिकना, गीला, गरम… मैंने खुद पर हँसते हुए ही केले को अपने मुँह से लगाकर गीला किया और उसके लार से चमक गए मुँह को देखकर चुटकी ली, ‘जरूर खुश होओ बेटा, ऐसी जबरदस्त किस्मत दोबारा नहीं होगी।’

योनि के होठों को उंगलियों से फैलाया और अंदर की फाँक में केले को लगा दिया। कुछ खास तो नहीं महसूस हुआ, पर हाँ, छुआते समय एक हल्की सिहरन सी जरूर आई। उस कोमल जगह में जरा सा भी स्पर्श ज्यादा महसूस होता है। मैंने केले को हल्के से दबाया लेकिन योनि का मुँह बिस्तर में दबा था।

मैं पीछे लेट गई। सिर के नीचे अपने तकिए के ऊपर हीना का भी तकिया खींचकर लगा लिया। पैरों को मोड़कर घुटने फैला लिये। मुँह खुलते ही केले ने दरार के अंदर बैठने की जगह पाई। योनि के छेद पर उसका मुँह टिक गया, पर अंदर ठेलने की हिम्मत नहीं हुई। उसे कटाव के अंदर ही रगड़ते हुए ऊपर ले आई। भगनासा की घुण्डी से नीचे ही, क्योंकि वहाँ मैं बहुत संवेदनशील हूँ। नीचे गुदा की छेद और ऊपर भगनासा से बचाते हुए मैंने उसकी ऊपर नीचे कई बार सैर कराई। जब कभी वह होठों के बीच से अलग होता, एक गीली ‘चट’ की आवाज होती। मैंने कौतुकवश ही उसे उठा-उठाकर ‘चट’ ‘चट’ की आवाज को मजे लेने के लिए सुना।

हँसी और कौतुक के बीच उत्तेजना का मीठा संगीत भी शरीर में बजने लगा था। केला जैसे अधीर हो रहा था भगनासा का शिवलिंग-स्पर्श करने को।

‘कर लो भक्त !’ मैंने केले को बोलकर कहा और उसे भगनासा की घुण्डी के ऊपर दबा दिया।

दबाव के नीचे वह लचीली कली बिछली और रोमांचित होकर खिंच गई। उसके खिंचे मुँह पर केले को फिराते और रगड़ते मेरे मुँह से पहली ‘आह’ निकली। मैंने हीना को मन ही मन गाली दी- साली !

बगल के कमरे से कुछ आवाज सी आई। हाथ तत्क्षण रुक गया। नजर अपने आप किवाड़ की कुण्डी पर उठ गई। कुण्डी चढ़ी हुई थी। फिर भी गौर से देखकर तसल्ली की। रोंगटे खड़े हो गए। कोई देख ले तो !

नाइटी पेट से ऊपर, पाँव फैले हुए, उनके बीच होंठों को फैलाए बायाँ हाथ, दाहिने हाथ में केला।

कितनी अश्लील मुद्रा में थी मैं !!

मेरे पैर किवाड़ की ही तरफ थे। बदन में सिहरन-सी दौड़ गई। केले को देखा। वह भी जैसे बालों के बीच मुँह घुसाकर छिपने की कोशिश कर रहा था लेकिन बालों की घनी कालिमा के बीच उसका पीला शरीर एकदम प्रकट दिख रहा था। डर के बीच भी उस दृश्य को देखकर मुझे हँसी आ गई, हालाँकि मन में डर ही व्याप्त था।

लेकिन यौनांगों से उठती पुकार सम्मोहनकारी थी। मैंने बायाँ हाथ डर में ही हटा लिया था। केवल दाहिना हाथ चला रही थी। केला बंद होठों को अपनी मोटाई से ही फैलाता अंदर के कोमल मांस को ऊपर से नीचे तक मालिश कर रहा था। भगनासा के अत्यधिक संवेदनशील स्नायुकेन्द्र पर उसकी रगड़ से चारों ओर के बाल रोमांचित होकर खड़े हो गए थे। स्त्रीत्व के कोमलतम केन्द्र पर केले के नरम कठोर गूदे का टकराव बड़ा मोहक लग रहा था।

कोई निर्जीव वस्तु भी इतने प्यार से प्यार कर सकती है ! आश्चर्य हुआ।

हीना ठीक कहती है, केले का जोड़ नहीं होगा।

मैंने योनि के छेद पर उंगली फिराई। थोड़ा-सा गूदा घिसकर उसमें जमा हो गया था। ‘तुम्हें भी केले का स्वाद लग गया है !’ मैंने उससे हँसी की।

मैंने उस जमे गूदे को उंगली से योनि के अंदर ठेल दिया। थोड़ी सी जो उंगली पर लगी थी उसको उठाकर मुँह में चख भी लिया। एक क्षण को हिचक हुई, लेकिन सोचा नहा-धोकर साफ तो हूँ। वही परिचित मीठा, थोड़ा कसैला स्वाद, लेकिन उसके साथ मिली एक और गंध- योनि के अंदर की मुसाई गंध।

मैंने केले को उठाकर देखा, छिलके के अन्दर मुँह घिस गया था। मैंने छिलका अलग कर फिर से गूदे में नाखून से खोद दिया। देखकर मन में एक मौज-सी आई और मैंने योनि में उंगली घुसाकर कई बार कसकर रगड़ दिया।

उस घर्षण ने मुझे थरथरा दिया और बदन में बिजली की लहरें दौड़ गईं। हूबहू मोटे लिंग-से दिखते उस केले के मुँह को मैंने पुचकार कर चूम लिया।

और उसी क्षण लगा, मन से सारी चिंता निकल गई है, कोई डर या संकोच नहीं।

मैंने बेफिक्र होकर केले को योनि के मुँह पर लगा दिया और उसे रगड़ने लगी। दूसरे हाथ की तर्जनी अपने आप भगांकुर पर घूमने लगी। आनन्द की लहरों में नौका बहने लगी, साँसें तेज होने लगीं। मैंने खुद अपने यौवन कपोतों को तेज तेज उठते बैठते देख मैंने उन्हें एक बार मसल दिया।

मेरा छिद्र एक बड़े घूमते भँवर की तरह केले को अदंर लेने की कोशिश कर रहा था। मैंने केले को थपथपाया, ‘अब और इंतजार की जरूरत नहीं। जाओ ऐश करो।’

मैंने उसे अन्दर दबा दिया। उसका मुँह द्वार को फैलाकर अन्दर उतरने लगा। डर लगा, लेकिन दबाव बनाए रही। उतरते हुए केले के साथ हल्का सा दर्द होने लगा था लेकिन यह दर्द उस मजे में मिलकर उसे और स्वादिष्ट बना रहा था। दर्द ज्यादा लगता तो केले को थोड़ा ऊपर लाती और फिर उसे वापस अन्दर ठेल देती।

धीरे धीरे मुझमें विश्वास आने लगा- कर लूँगी।

जब केला कुछ आश्वस्त होने लायक अन्दर घुस गया तब मैं रुकी, केले का छिलका योनि के ऊपर पत्ते की तरह फैला हुआ था। मेरी देह पसीने-पसीने हो रही थी।

अब और अन्दर नहीं लूँगी, मैंने सोचा। लेकिन पहली बार का रोमांच और योनि का प्रथम फैलाव उतने कम प्रवेश से मानना नहीं चाह रहे थे।

थोड़ा-सा और अन्दर जा सकता है !

अगर ज्यादा अन्दर चला गया तो?

मैं उतने ही पर संतोष करके केले को पिस्टन की तरह चलाने लगी।

आधे अधूरे कौर से मुँह नही भरता, उल्टे चिढ़ होती है। मैंने सोचा, थोड़ा सा और… !

सुरक्षित रखते हुए मैंने गहराई बढ़ाई और फिर उतने ही तक से अन्दर बाहर करने लगी। ऊपर बायाँ हाथ लगातार भग-मर्दन कर रहा था। शरीर में दौड़ते करंट की तीव्रता और बढ़ गई। पहले कभी इस तरह से किया नहीं था। केवल उंगली अन्दर डाली थी, उसमें वो संतोष नहीं हुआ था।

अब समझ में आ रहा था औरत के शरीर की खूबी क्या होती है, हीना क्यों इसके पीछे पागल रहती है। जब केले से इतना अच्छा लग रहा था तो वास्तविक सम्भोग कितना अच्छा लगता होगा !?!

मेरे चेहरे पर खुशी थी। पहली बार यह चिकना-चिकना घर्षण एक नया ही एहसास था, उंगली की रगड़ से अलग, बेकार ही मैं इससे डर रही थी।

मुझे केले के भाग्य से ईर्ष्या होने लगी थी, केला निश्चिंत अन्दर-बाहर हो रहा था। अब उसे योनि से बिछड़ने का डर नहीं था। मैं उसके आवागमन का मजा ले रही थी। केले के बाहर निकलते समय योनि भिंचकर अन्दर खींचने की कोशिश करती। मैं योनि को ढीला कर उसे पुन: अन्दर ठेलती। इन दो विरोधी कोशिशों के बीच केला आराम से आनन्द के झोंके लगा रहा था। मैं धीरे-धीरे सावधानी से उसे थोड़ा थोड़ा और अन्दर उतार रही थी। आनन्द की लहरें ऊँची होती जा रही थीं, भगांकुर पर उंगलियों की हरकत बढ़ रही थी, सनसनाहट बढ़ रही थी और अब किसी अंजाम तक पहुँचने की इच्छा सर उठाने लगी थी।

बहुत अच्छा लग रहा था। जी करता था केले को चूम लूँ। एक बार उसे निकालकर चूम भी लिया और पुन: छेद पर लगा दिया। अन्दर जाते ही शांति मिली। योनि जोर जोर से भिंच रही थी। मैंने अपने कमर की उचक भी महसूस की।

धीरे धीरे करके मैंने आधे से भी अधिक अन्दर उतार दिया। डर लग रहा था, कहीं टूट न जाए। हालाँकि केले में पर्याप्त सख्ती थी। मैं उसे ठीक से पकड़े थी। योनि भिंच-भिंचकर उसे और अन्दर खींचना चाह रही थी। केला भी जैसे पूरा अन्दर जाने के लिए जोर लगा रहा था। मैं भरसक नियंत्रण रखते ही अन्दर बाहर करने की गति बढ़ा रही थी। योनि की कसी चिकनी दीवारों पर आगे पीछे सरकता केला बड़ा ही सुखद अनुभव दे रहा था।

कितना अच्छा लग रहा था !! एक अलग दुनिया में खो रही थी मैं ! एक लय में मेरा हाथ और सांसें और धड़कनें चल रही थीं, तीनों धीरे धीरे तेज हो रहे थे। मैं धरती से मानो ऊपर उठ रही थी। वातावरण में मेरी आह आह की फुसफुसाहटों का संगीत गूंज रहा था। कोई मीठी सी धुन दिमाग में बज रही थी…..

“आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन

शरारत करने को ललचाए रे मेरा मन, मेरा मन ….

धीरे धीरे दाहिने हाथ ने स्वत: ही अन्दर-बाहर करने की गति सम्हाल ली। मैं नियंत्रण छोड़कर उसके उसके बहाव में बहने लगी। मैंने बाएँ हाथ से अपने स्तनों को मसलना शुरू कर दिया। उसकी नोकों पर नाइटी के ऊपर से ही उंगलियाँ गड़ाने, उन्हें चुटकी में पकड़कर दबाने की कोशिश करने लगी। योनि में कम्पन सा महसूस होने लगा। गति निरंतर बढ़ रही थी – अन्दर-बाहर, अन्दर-बाहर… सनसनी की ऊँची होती तरंगें …. ‘चट’ ‘चट’ की उत्तेजक आवाज… सुखद घर्षण.. भगनासा पर चोट से उत्पन्न बिजली की लहरें… चरम बिन्दु का क्षितिज कहीं पास दिख रहा था। मैंने उस तक पहुँचने के लिए और जोर लगा दिया …..

कोई लहर आ रही है… कोई मुझे बाँहों में कस ले, मुझे चूर दे…………… ओह……

कि तभी ‘खट : खट : खट’…..

मेरी साँस रुक गई। योनि एकदम से भिंची, झटके से हाथ खींच लिया….

खट खट खट…..

हाथ में केवल डंठल और छिलका था। मैं बदहवास हो गई। अब क्या करूँ?

“पिहू, दरवाजा खोलो !”…. खट खट खट…

मैंने तुरंत नाइटी खींची और उठ खड़ी हुई। केला अन्दर महसूस हो रहा था। चलकर दरवाजे के पास पहुँची और चिटकनी खोल दी।

हीना मेरे उड़े चेहरे को देखकर चौंक पड़ी- क्या बात है?

मैं ठक ! मुँह में बोल नहीं थे।

“क्या हुआ, बोलो ना?”

क्या बोलती? केला अन्दर गड़ रहा था। मैंने सिर झुका लिया। आँखें डबडबा आईं।

हीना घबराई, कुछ गड़बड़ है, कमरे में खोजने लगी। केले का छिलका बिस्तर पर पड़ा था। नाश्ते की दोनों प्लेटें एक साथ स्टडी टेबल पर रखी थीं।

“क्या बात है? कुछ बोलती क्यों नहीं?”

मेरा घबराया चेहरा देखकर संयमित हुई,”आओ, पहले बैठो, घबराओ नहीं।”

मेरा कंधा पकड़कर लाई और बिस्तर पर बिठा दिया। मैं किंचित जांघें फैलाए चल रही थी और फैलाए ही बैठी।

“अब बोलो, क्या बात है?”

मैंने भगवान से अत्यंत आर्त प्रार्थना की- प्रभो ….. बचा लो।

अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने मेरी चाल और बैठने के तरीके में कुछ फर्क महसूस किया था। केले का छिलका उठाकर बोली, “क्या मामला है?”

मैं एकदम शर्म से गड़ गई, सिर एकदम झुका लिया, आँसू की बूंदें नाइटी पर टपक पड़ी।

“अन्दर रह गया है?”

मैंने हथेलियों में चेहरा छिपा लिया। बदन को संभालने की ताकत नहीं रही। बिस्तर पर गिर पड़ी।

हीना ठठाकर हँस पड़ी।

“मिस पिहू, आपसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप तो बड़ी सुशील, मर्यादित और सो कॉल्ड क्या क्या हैं?” उसकी हँसी बढ़ने लगी।

मुझे गुस्सा आ गया- बेदर्द लड़की ! मैं इतनी बड़ी मुश्किल में हूँ और तुम हँस रही हो?

“हँसूं न तो क्या करूँ? मुझसे तो बड़ी बड़ी बातें कहती हो, खुद ऐसा कैसे कर लिया?”

मैंने शर्म और गुस्से से मुँह फेर लिया।
 
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अब क्या करूँ? बेहद डर लग रहा था। देखना चाहती थी कितना अन्दर फँसा हुआ है, निकल सकता है कि नहीं। कहीं डॉक्टर बुलाना पड़ गया तो? सोचकर ही रोंगटे खड़े हो गए। कैसी किरकिरी होगी !

मैंने आँख पोछी और हिम्मत करके कमरे से बाहर निकली। कोशिश करके सामान्य चाल से चली, गलियारे में कोई देखे तो शक न करे। बाथरूम में आकर दरवाजा बंद किया और नाइटी उठाकर बैठकर नीचे देखा। दिख नहीं रहा था। काश, आइना लेकर आती। हाथ से महसूस किया। केले का सिरा हाथ से टकरा रहा था। बेहद चिकना। नाखून गड़ाकर खींचना चाहा तो गूदा खुदकर बाहर चला आया।

और खोदा।

उसके बाद उंगली से टकराने लगा और नाखून गड़ाने पर भीतर धँसने लगा।

मैंने उछल कर देखा, शायद झटके से गिर जाए। डर भी लग रहा था कि कहीं कोई पकड़ न ले।

कई बार कूदी। बैठे बैठे और खड़े होकर भी। कोई फायदा नहीं। कूदने से कुछ होने की उम्मीद करना आकाश कुसुम था।

फँस गई। कैसे निकलेगा? कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही। फिर निकलना पड़ा। चलना और कठिन लग रहा था। यही केला कुछ क्षणों पहले अन्दर कितना सुखद लग रहा था !

कमरे के अन्दर आते ही हीना ने सवाल किया,”निकला?”

मैंने सिर हिलाया। हमारे बीच चुप्पी छाई रही। परिस्थिति भयावह थी।

“मैं देखूँ?”

हे भगवान, यह अवस्था ! मेरी दुर्दशा की शुरुआत हो चुकी थी। मैं बिस्तर पर बैठ गई।

हीना ने मुझे पीछे तकिए पर झुकाया और मेरे पाँवों के पास बैठ गई। मेरी नाइटी उठाकर मेरे घुटनों को मोड़ी और उन्हें धीरे धीरे फैला दी। बालों की चमचमाती काली फसल………. पहली बार उस पर बाहर की नजर पड़ रही थी। हीना ने होंठों को फैलाकर अन्दर देखा।

हे भगवान कोई रास्ता निकल आए !

उसने उंगलियों से होंठों के अन्दर, अगल बगल टटोला, महसूस किया। बाएँ दाएँ, ऊपर नीचे। नाखून से खींचने की असफल कोशिश की, भगांकुर को सहलाया। ये क्यों? मन में सवाल उठा, क्या यह अभी भी तनी अवस्था में है? हीना ने गुदा में भी उंगली कोंची, दो गाँठ अन्दर भी घुसा दी। घुसाकर दाएं बाएँ घुमाया भी।

मैं कुनमुनाई। यह क्या कर रही है?

पलकों की झिरी से उसे देखा, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कहीं वह मुझसे खेल तो नहीं रही है?

“ओ गॉड, यह तो भीतर घुस गया है।” उसके स्वर में वास्तविक चिंता थी, “क्या करोगी?”

“डॉक्टर को बुलाओगी? वार्डन को बोलना पड़ेगा। हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट जानेगी, फिर सारी टीचर्स, … ना ना…. बात सब जगह फैल जाएगी।”

“ना ना ना…. ” मैंने उसी की बात प्रतिध्वनित की।

कुछ देर हम सोचते रहे। समय नहीं है, जल्दी करना पड़ेगा, इन्फेक्शंन का खतरा है।

…………. मैं क्या कहूँ।

“एक बात कहूँ, इफ यू डोंट माइंड?”

“………….” मैं कुछ सोच नहीं पा रही।

“करण को बुलाऊँ? एमबीबीएस कर रहा है। कोई राह निकाल सकता है। सबके जानने से तो बेहतर है एक आदमी जानेगा।”

बाप रे ! एक लड़का। वह भी सीधे मेरी टांगों के बीच ! ना ना….

“पिहू, और कोई रास्ता नहीं है। थिंक इट। यही एक संभावना है।”

कैसे हाँ बोलूँ। अब तक किसी ने मेरे शरीर को देखा भी नहीं था। यह तो उससे भी आगे……. मैं चुप रही।

“जल्दी बोलो पिहू। यू आर इन डैंजर। अन्दर बॉडी हीट से सड़ने लगेगा। फिर तो निकालने के बाद भी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। लोगों को पता चल जाएगा।”

इतना असहाय जिंदगी में मैंने कभी नहीं महसूस किया था,”ओके ….”

“तुम चिंता न करो। ही इज ए वेरी गुड फ्रेड ऑव मी (वह मेरा बहुत ही अच्छा दोस्त है।)” उसने आँख मारी, “हर तरह की मदद करता है।”

गजब है यह लड़की। इस अवस्था में भी मुझसे मजाक कर रही है।

उसने करण को फोन लगाया, “करण, क्या कर रहे हो….. नाश्ता कर लिया?… नहीं?… तुम्हारे लिए यहाँ बहुत अच्छा नाश्ता है। खाना चाहोगे? सोच लो… इटस ए लाइफटाइम चांस… नाश्ते से अधिक उसकी प्लेट मजेदार … नहीं बताऊँगी…. अब मजाक छोड़ती हूँ। तुम तुरंत आ जाओ। माइ रूममेट इज इन अ बिग प्राब्लम। मुझे लगता है तुम कुछ मदद कर सकते हो… नहीं नहीं.. फोन पर नहीं कह सकती। इट्स अर्जेंट… बस तुरंत आ जाओ।”

मुझे गुस्सा आ रहा था। “ये नाश्ता-वाश्ता क्या बक रही थी?”

“गलत बोल रही थी?”

उसे कुछ ध्यान आया, उसने दुबारा फोन लगाया, “करण , प्लीज अपना शेविंग सेट ले लेना। मुझे लगता है उसकी जरूरत पड़ेगी।”

शेविंग सेट! क्या बोल रही है?….. अचानक मेरे दिमाग में एकदम से साफ हो गया … क्या वहाँ के बाल मूंडेगी? हाय राम!!!

कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई।

“हाय पिहू ! ” करण ने भीतर आकर मुझे विश किया और समय में मैं बस एक ठंडी ‘हाय’ कर देती थी, इस वक्त मुस्कुराना पड़ा।

“क्या प्राब्लम है?”

हीना ने मेरी ओर देखा, मैं कुछ नहीं बोली।

“इसने केला खाया है।”

“तो?”

“वो इसके गले में अटक गया है।”

उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे,”ऐसा कैसे हो सकता है?”

“मुँह खोलो !”

हीना हँसी रोकती हुई बोली, “उस मुँह में नहीं….. बुद्धू…. दूसरे में… उसमें।” उसने उंगली से नीचे की ओर इशारा किया।

करण के चेहरे पर हैरानी, फिर हँसी ! फिर गंभीरता…..

हे भगवान, धरती फट जाए, मैं समा जाऊँ।

“यह देखो”, हीना ने उसे छिलका दिखाया, “टूटकर अन्दर रह गया है।”

“यह तो सीरियस है।” करण सोचता हुआ बोला।

“बहुत कोशिश की, नहीं निकल रहा। तुम कुछ उपाय कर सकते हो?”

करण विचारमग्न था। बोला, “देखना पड़ेगा।”

मैंने स्वाचालित-सा पैरों को आपस में दबा लिया।

“पिहू….”

मैं कुछ नहीं सुन पा रही थी, कुछ नहीं समझ पा रही थी। कानों में यंत्रवत आवाज आ रही थी, “पिहू… बी ब्रेव…! यह सिर्फ हम तीनों के बीच रहेगा…..!”

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छाया हुआ है। मुझे पीछे ठेलकर तकिए पर लिटा रही है। मेरी नाइटी ऊपर खिंच रही है…. मेरे पैर, घुटने, जांघें… पेड़ू…. कमर….प्रकट हो रहे हैं। मेरी आत्मा पर से भी खाल खींचकर कोई मुझे नंगा कर रहा है। पैरों को घुटनों से मोड़ा जा रहा है……. दोनों घुटनों को फैलाया जा रहा है। मेरा बेबस, असहाय, असफल विरोध…. मर्म के अन्दर तक छेद करती पराई नजरें … स्त्री की अंतरंगता के चिथड़े चिथड़े करती….

जांघों पर, पेड़ू पर घूमते हाथ …. बीच के बालों को सरकाते हुए… होंठों को अलग करने का खिंचाव…।

“साफ से देख नहीं पा रहा, जरा उठाओ।”

मेरे सिर के नीचे से एक तकिया खींचा है। मेरे नितंबों के नीचे हाथ डालकर उठाकर तकिया लगाया जा रहा है…. मेरे पैरों को उठाकर घुटनों को छाती तक लाकर फैला दिया गया है… सब कुछ उनके सामने खुल गया है। गुदा पर ठंडी हवा का स्पर्श महसूस हो रहा है…

ॐ भूर्भुव: ………………………… धीमहि ….. पता नहीं क्यों गायत्री मंत्र का स्मरण हो रहा है। माता रक्षा करो…

केले की ऊपरी सतह दिख रही है। योनि के छेद को फैलाए हुए। काले बालों के के फ्रेम में लाल गुलाबी फाँक … बीच में गोल सफेदी… उसमें नाखून के गड्ढे…

कुछ देर की जांच-परख के बाद मेरा पैर बिस्तर पर रख दिया जाता है। मैं नाइटी खींचकर ढकना चाहती हूँ, पर….

“एक कोशिश कर सकती है।”

“क्या?”

“मास्टरबेट (हस्तेमैथुन) करके देखे। हो सकता है ऑर्गेज्म(स्खलन) के झटके और रिलीज(रस छूटने) की चिकनाई से बाहर निकल जाए।”

हीना सोचती है।

“पिहू!”

मैं कुछ नहीं बोलती। उन लोगों के सामने हस्तमैथुन करना ! स्खलित भी होना!!! ओ माँ !

“पिहू”, इस बार हीना का स्वर कठोर है,”बोलो…..”

क्या बोलूँ मैं। मेरी जुबान नहीं खुलती।

“खुद करोगी या मुझे करना पड़ेगा?”

वह मेरा हाथ खींचकर वहाँ पर लगा देती है,”करो।”

मेरा हाथ पड़ा रहता है।

“डू इट यार !”

मैं कोई हरकत नहीं करती, मर जाना बेहतर है।

“लेट अस डू इट फॉर हर (चलो हम इसका करते हैं)।”

मैं हल्के से बाँह उठाकर पलकों को झिरी से देखती हूँ। करण सकुचाता हुआ खड़ा है। बस मेरे उस स्थल को देख रहा है।

हीना की हँसी,”सुंदर है ना?”

शर्म की एक लहर आग-सी जलाती मेरे ऊपर से नीचे निकल जाती है, बेशर्म लड़की…!

“क्या सोच रहे हो?”

करण दुविधा में है, इजाजत के बगैर किसी लड़की का जननांग छूना ! भलामानुस है।

तनाव के क्षण में हीना का हँसी-मजाक का कीड़ा जाग जाता है,”जिस चीज की झलक भर पाने के लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं, वह तुम्हें यूँ ही मिल रही है, क्या किस्मत है तुम्हारी !”

मैं पलकें भींच लेती हूँ। साँस रोके इंतजार कर रही हूँ ! टांगें खोले।

“कम ऑन, लेट्स डू इट…”

बिस्तर पर मेरे दोनों तरफ वजन पड़ता है, एक कोमल और एक कठोर हाथ मेरे उभार पर आ बैठते हैं, बालों पर उंगलियाँ फेरने से गुदगुदी लग रही है, कोमल उंगलियाँ मेरे होंठों को खोलती हैं अन्दर का जायजा लेती हैं, भगनासा का कोमल पिंड तनाव में आ जाता है, छू जाने से ही बगावत करता है, कभी कोमल, कभी कठोर उंगलियाँ उसे पीड़ित करती हैं, उसके सिर को कुचलती, मसलती हैं, गुस्से में वह चिनगारियाँ सी छोड़ता है। मेरी जांघें थरथराती हैं, हिलना-डुलना चाहती हैं, पर दोनों तरफ से एक एक हाथ उन्हें पकड़े है, न तो परिस्थिति, न ही शरीर मेरे वश में है।

“यस … ऐसे ही…” हीना मेरा हाथ थपथपाती है तब मुझे पता चलता है कि वह मेरे स्तनों पर घूम रहा था। शर्म से भरकर हाथ खींच लेती हूँ।

हीना हँसती है,”अब यह भी हमीं करें? ओके…”

दो असमान हथेलियाँ मेरे स्तनों पर घूमने लगती हैं। नाइटी के ऊपर से। मेरी छातियाँ परेशान दाएं-बाएँ, ऊपर-नीचे लचककर हमले से बचना चाह रही हैं पर उनकी कुछ नहीं चलती। जल्दी भी उन पर से बचाव का, कुछ नहीं-सा, झीना परदा भी खींच लिया जाता है, घोंसला उजाड़कर निकाल लिए गए दो सहमे कबूतर … डरे हुए ! उनका गला दबाया जाता है, उन्हें दबा दबाकर उनके मांस को मुलायम बनाया जा रहा है- मजे लेकर खाए जाने के लिए शायद।

उनकी चोंचें एक साथ इतनी जोर खींची जाती है कि दर्द करती हैं, कभी दोनों को एक साथ इतनी जोर से मसला जाता है कि कराह निकल जाती है। मैं अपनी ही तेज तेज साँसों की आवाज सुन रही हूँ। नीचे टांगों के केन्द्र में लगातार घर्षण, लगातार प्रहार, कोमल उंगलियों की नाखून की चुभन… कठोर उंगलियों की ताकतवर रगड़ ! कोमल कली कुचलकर लुंज-पुंज हो गई है।

सारे मोर्चों पर एक साथ हमला… सब कुछ एक साथ… ! ओह… ओह… साँस तो लेने दो…

“हाँ… लगता है अब गर्म हो गई है।” एक उंगली मेरी गुदा की टोह ले रही है।

मैं अकबका कर उन्हें अपने पर से हटाना चाहती हूँ, दोनों मेरे हाथ पकड़ लेते हैं, उसके साथ ही मेरे दोनों चूचुकों पर दो होंठ कस जाते हैं, एक साथ उन्हें चूसते हैं !

मेरे कबूतर बेचारे !जैसे बिल्ली मुँह में उनका सिर दबाए कुचल रही हो। दोनों चोंचें उठाकर उनके मुख में घुसे जा रहे हैं।

हरकतें तेज हो जाती हैं।

“यह बहुत अकड़ती थी। आज भगवान ने खुद ही इसे मुझे गिफ्ट कर दिया।” हीना की आवाज…. मीठी… जहर बुझी….

“तुम इसके साथ?”

“मैं कब से इसका सपना देख रही थी।”

“क्या कहती हो?”

“बहुत सुन्दर है ना यह !” कहती हुई वह मेरे स्तनों को मसलती है, उन्हें चूसती है। मैं अपने हाँफते साँसों की आवाज खुद सुन रही हूँ। कोई बड़ी लहर मरोड़ती सी आ रही है….

“पिहू, जोर लगाओ, अन्दर से ठेलो।” करण की आवाज में पहली बार मेरा नाम… हीना की आवाज के साथ मिली। गुदा के मुँह पर उंगली अन्दर घुसने के लिए जोर लगाती है।

यह उंगली किसकी है?

मैं कसमसा रही हूँ, दोनों ने मेरे हाथ-पैर जकड़ रखे हैं,”जोर से …. ठेलो।”

मैं जोर लगाती हूँ। कोई चीज मेरे अन्दर से रह रहकर गोली की तरह छूट रही है……. रस से चिकनी उंगली सट से गुदा के अन्दर दाखिल हो जाती है। मथानी की तरह दाएँ-बाएँ घूमती है।

आआआआह………. आआआआह………. आआआआह……….

“यस यस, डू इट…….!” हीना की प्रेरित करती आवाज, करण भी कह रहा है। दोनों की हरकतें तेज हो जाती हैं, गुदा के अन्दर उंगली की भी। भगनासा पर आनन्द उठाती मसलन दर्द की हद तक बढ़ जाती है।

ओ ओ ओ ओ ओ ह…………… खुद को शर्म में भिगोती एक बड़ी लहर, रोशनी के अनार की फुलझड़ी ……….. आह..

एक चौंधभरे अंधेरे में चेतना गुम हो जाती है।

“यह तो नहीं हुआ? वैसे ही अन्दर है !”… मेरी चेतना लौट रही है, “अब क्या करोगी?”

कुछ देर की चुप्पी ! निराशा और भयावहता से मैं रो रही हूँ।

“रोओ मत !” करण मुझे सहला रहा है, इतनी क्रिया के बाद वह भी थोड़ा-थोड़ा मुझ पर अधिकार समझने लगा है, वह मेरे आँसू पोंछता है,”इतनी जल्दी निराश मत होओ।” उसकी सहानुभूति बुरी नहीं लगती। कुछ देर सोचकर वह एक आइडिया निकालता है। उसे लगता है उससे सफलता मिल जाएगी।

“तुम मजाक तो नहीं कर रहे, आर यू सीरियस?” हीना संदेह करती है।

“देखो, वेजीना और एनस के छिद्र अगल-बगल हैं, दोनों के बीच पतली-सी दीवार है। जब मैंने इसकी गुदा में उंगली घुसाई तो वह केले के दवाब से बहुत कसी लग रही थी।”

अब मुझे पता चला कि वह उंगली करण की थी। मैं उसे हीना की शरारत समझ रही थी।

“तुम बुद्धिमान हो।” हीना हँसती है, “मैंने तुम्हें बुलाकर गलती नहीं की।”

तो यह बहाने से मेरी ‘वो’ मारना चाह रहा है। गंदा लड़का। मुझे एक ब्लू फिल्म में देखा गुदा मैथुन का दृश्य याद हो आया। वह मुझे बड़ा गंदा लेकिन रोमांचक भी लगा था- गुदा के छेद में तनाव। कहीं करण ने मेरी यह कमजोरी तो नहीं पकड़ ली? ओ गॉड।

“एक और बात है !” करण हीना की तारीफ से खुश होकर बोल रहा था,”शी इज सेंसिटिव देयर। जब मैंने उसमें उंगली की तो यह जल्दी ही झड़ गई।”

उफ !! मेरे बारे में इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे कसाई मुर्गे के बारे में बात कर रहा हो।

“तो तुम्हें लगता है शी विल इंजॉय इट।”

“उसी से पूछ लो।”

हीना खिलखिला पड़ी,”पिहू, बोलो, तुम्हें मजा आएगा?”

वह मेरी हँसी उड़ाने का मौका छोड़ने वाली नहीं थी। पर वही मेरी सबसे बड़ी मददगार भी थी।

चुप्पी के आवरण में मैं अपनी शर्म बचा रही थी। लेकिन केला मुझे विवश किए था। मुझे सहायता की जरूरत थी। मेरा हस्तमैथुन करके उन दोनों की हिम्मत बढ़ गई थी। आश्चर्य था मैंने उसे अपने साथ होने दिया। अब तो मेरी गाण्ड मारने की ही बात हो रही थी।

मुझे तुरंत ग्लानि हुई ! छी: ! मैंने कितने गंदे शब्द सोचे। मैं कितनी जल्दी कितनी बेशर्म हो गई थी !

“पिहू, मजाक की बात नहीं। बी सीरियस।” हीना ने अचानक मूड बदल कर मुझे चेतावनी दी। उसका हाथ मेरे योनि पर आया और एक उंगली गुदा के छेद पर आकर ठहर गई।

“तुम इसके लिए तैयार हो ना?”

मेरी चुप्पी से परेशान होकर उसने कहा,”चुप रहने से काम नहीं चलेगा, यह छोटी बात नहीं है। तुम्हें बताना होगा तैयार हो कि नहीं। अगर तुम्हें आपत्ति्जनक लगता है तो फिर हम छोड़ देते हैं ! बोलो?”

मेरी चुप्पी यथावत् थी।

हीना ने करण से पूछा- बोलो क्या करें? यह तो बोलती ही नहीं।

“क्या कहेगी बेचारी ! बुरी तरह फँसी हुई है। शी इज टू मच इम्बैरेस्ड !” कुछ रुककर वह फिर बोला,”लेकिन अब जो करना है उसमें पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। उठकर सहयोग करना होगा।”

“पिहू, सुन रही हो ना। अगर मना करना है तो अभी करो।”

“पिहू, तुम…. मैं नहीं चाहता, लेकिन इसमें तुम पर… कुछ जबरदस्ती करनी पड़ेगी, तुम्हें सहना भी होगा।” करण की आवाज में हमदर्दी थी। या पता नहीं मतलब निकालने की चतुराई।

कुछ देर तक दोनों ने इंतजार किया,”चलो इसे सोचने देते हैं। लेकिन जितनी देर होगी, उतना ही खतरा बढ़ता जाएगा।”

सोचने को क्या बाकी था ! मेरे सामने कोई और उपाय था क्या?
 


मेरी खुली टांगों के बीच योनिप्रदेश काले बालों की समस्त गरिमा के साथ उनके सामने लहरा रहा था।

मैंने हीना के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया- जो सही समझो, करो !

“लेकिन मुझे सही नहीं लग रहा।” करण ने बम जैसे फोड़ा,”मुझे लग रहा है, पिहू समझ रही है कि मैं इसकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठा रहा हूँ।”

बात तो सच थी मगर मैं इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थी। वे मेरी मजबूरी का फायदा तो उठा ही रहे थे।

“खतरा पिहू को है। उसे इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पर यहाँ तो उल्टे हम इसकी मिन्नतें कर रहे हैं। जैसे मदद की जरूरत उसे नहीं हमें है।”

उसका पुरुष अहं जाग गया था। मैं तो समझ रही थी वह मुझे भोगने के लिए बेकरार है, मेरा सिर्फ विरोध न करना ही काफी है। मगर यह तो अब …..

“मगर यह तो सहमति दे रही है !”, हीना ने मेरे पेड़ू पर दबे उसके हाथ को दबाए मेरे हाथ की ओर इशारा किया। उसे आश्चर्य हो रहा था।

“मैं क्यों मदद करूँ? मुझे क्या मिलेगा?”

सुनकर हीना एक क्षण तो अवाक रही फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी,”वाह, क्या बात है !”

करण इतनी सुंदर लड़की को न केवल मुफ्त में ही भोगने को पा रहा था, बल्कि वह इस ‘एहसान’ के लिए ऊपर से कुछ मांग भी रहा था। मेरी ना-नुकुर पर यह उसका जोरदार दहला था।

“सही बात है।” हीना ने समर्थन किया।

“देखो, मुझे नहीं लगता यह मुझसे चाहती है। इसे किसी और को ही दिखा लो।”

मैं घबराई। इतना करा लेने के बाद अब और किसके पास जाऊँगी। करण चला गया तो अब किसका सहारा था?

“मेरा एक डॉक्टर दोस्त है। उसको बोल देता हूँ।” उसने परिस्थिति को और अपने पक्ष में मोड़ते हुए कहा।

मैं एकदम असहाय, पंखकटी चिड़िया की तरह छटपटा उठी। कहाँ जाऊँ? अन्दर रुलाई की तेज लहर उठी, मैंने उसे किसी तरह दबाया। अब तक नग्नता मेरी विवशता थी पर अब इससे आगे रोना-धोना अपमानजनक था।

मैं उठकर बैठ गई। केले का दबाव अन्दर महसूस हुआ। मैंने कहना चाहा,”तुम्हें क्या चाहिए?”

पर भावुकता की तीव्रता में मेरी आवाज भर्रा गई।

हीना ने मुझे थपथपाकर ढांढस दिया और करण को डाँटा,”तुम्हें दया नहीं आती?”

मुझे हीना की हमदर्दी पर विश्वास नहीं हुआ। वह निश्चय ही मेरी दुर्दशा का आनन्द ले रही थी।

“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।”

“क्या लोगे?”

करण ने कुछ क्षणों की प्रतीक्षा कराई और बात को नाटकीय बनाने के लिए ठहर ठहरकर स्पष्ट उच्चारण में कहा,”जो इज्जत इन्होंने केले को बख्शी है वह मुझे भी मिले।”

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। अब क्या रहेगा मेरे पास? योनि का कौमार्य बचे रहने की एक जो आखिरी उम्मीद बनी हुई थी वह जाती रही। मेरे कानों में उसके शब्द सुनाई पड़े, “और वह मुझे प्यार और सहयोग से मिले, न कि अनिच्छा और जबरदस्ती से।”

पता नहीं क्यों मुझे करण की अपेक्षा हीना से घोर वितृष्णा हुई। इससे पहले कि वह मुझे कुछ कहती मैंने करण को हामी भर दी।

मुझे कुछ याद नहीं, उसके बाद क्या कैसे हुआ। मेरे कानों में शब्द असंबद्ध-से पड़ रहे थे जिनका सिलसिला जोड़ने की मुझमें ताकत नहीं थी। मैं समझने की क्षमता से दूर उनकी

हरकतों को किसी विचारशून्य गुड़िया की तरह देख रही थी, उनमें साथ दे रही थी। अब नंगापन एक छोटी सी बात थी, जिससे मैं काफी आगे निकल गई थी।

‘कैंची’, ‘रेजर’, ‘क्रीम’, ‘ऐसे करो’, ‘ऐसे पकड़ो’, ‘ये है’, ‘ये रहा’, ‘वहाँ बीच में’, ‘कितने गीले’, ‘सम्हाल के’, ‘लोशन’, ‘सपना-सा है’…………… वगैरह वगैरह स्त्री-पुरुष की

मिली-जुली आवाजें, मिले-जुले स्पर्श।

बस इतना समझ पाई थी कि वे दोनों बड़ी तालमेल और प्रसन्नता से काम कर रहे थे। मैं बीच बीच में मन में उठनेवाले प्रश्नों को ‘पूर्ण सहमति दी है’ के रोडरोलर के नीचे रौंदती चली गई। पूछा नहीं कि वे वैसा क्यों कर रहे थे, मुझे वहाँ पर मूँडने की क्या आवश्यकता थी।

लोशन के उपरांत की जलन के बाद ही मैंने देखा वहाँ क्या हुआ है। शंख की पीठ-सी उभरी गोरी चिकनी सतह ऊपर ट्यूब्लाइट की रोशनी में चमक रही थी। हीना ने जब एक उजला टिशू पेपर मेरे होंठों के बीच दबाकर उसका गीलापन दिखाया तब मैंने समझा कि मैं किस स्तर तक गिर चुकी हूँ। एक अजीब सी गंध, मेरे बदन की, मेरी उत्तेजना की, एक नशा, आवेश, बदन में गर्मी का एहसास… बीच बीच में होश और सजगता के आते द्वीप।

जब हीना ने मेरे सामने लहराती उस चीज की दिखाते हुए कहा, ‘इसे मुँह में लो !’ तब मुझे एहसास हुआ कि मैं उस चीज को जीवन में पहली बार देख रही हूँ। साँवलेपन की तनी छाया, मोटी, लंबी, क्रोधित ललाट-सी नसें, सिलवटों की घुंघचनों के अन्दर से आधा झाँकता मुलायम गोल गुलाबी मुख- शर्माता, पूरे लम्बाई की कठोरता के प्रति विद्रोह-सा करता। मैं हीना के चेहरे को देखती रह गई। यह मुझे क्या कह रही है!

“इसे गीला करो, नहीं तो अन्दर कैसे जाएगा।” हीना ने मेरा हाथ पकड़कर उसे पकड़ा दिया।

“पिहू, यू हैव प्रॉमिस्ड।”

मेरा हाथ अपने आप उस पर सरकने लगा। आगे-पीछे, आगे-पीछे।

“हाँ, ऐसे ही।” मैं उस चीज को देख रही थी। उसका मुझसे परिचय बढ़ रहा था।

“अब मुँह में लो।”

मुझे अजीब लग रहा था। गंदा भी……….. ।

“हिचको मत। साफ है। सुबह ही नहाया है।” हीना की मजाक करने की कोशिश……..।

मेरे हाथ यंत्रवत हरकत करते रहे।

“लो ना !” हीना ने पकड़कर उसे मेरे मुँह की ओर बढ़ाया। मैंने मुँह पीछे कर लिया।

“इसमें कुछ मुश्किल नहीं है। मैं दिखाऊँ?”

हीना ने उसे पहले उसकी नोक पर एक चुम्बन दिया और फिर उसे मुँह के अन्दर खींच लिया। करण के मुँह से साँस निकली। उसका हाथ हीना के सिर के पीछे जा लगा। वह उसे चूसने लगी। जब उसने मुँह निकाला तो वह थूक में चमक रहा था। मैं आश्चर्य में थी कि सदमे में, पता नहीं।

हीना ने अपने थूक को पोंछा भी नहीं, मेरी ओर बढ़ा दिया- यह लो।

“लो ना…….!” उसने उसे पकड़कर मेरी ओर बढ़ाया। करण ने पीछे से मेरा सिर दबाकर आगे की ओर ठेला। लिंग मेरे होंठों से टकराया। मेरे होंठों पर एक मुलायम, गुदगुदा एहसास। मैं दुविधा में थी कि मुँह खोलूँ या हटाऊँ कि “पिहू, यू हैव प्रॉमिस्ड” की आवाज आई।

मैंने मुँह खोल दिया।

मेरे मुँह में इस तरह की कोई चीज का पहला एहसास था। चिकनी, उबले अंडे जैसी गुदगुदी, पर उससे कठोर, खीरे जैसी सख्त, पर उससे मुलायम, केले जैसी। हाँ, मुझे याद आया। सचमुच इसके सबसे नजदीक केला ही लग रहा था। कसैलेपन के साथ। एक विचित्र-सी गंध, कह नहीं सकती कि अच्छी लग रही थी या बुरी। जीभ पर सरकता हुआ जाकर गले से सट जा रहा था। हीना मेरा सिर पीछे से ठेल रही थी। गला रुंध जा रहा था और भीतर से उबकाई का वेग उभर रहा था।

“हाँ, ऐसे ही ! जल्दी ही सीख जाओगी।”

मेरे मुँह से लार चू रहा था, तार-सा खिंचता। मैं कितनी गंदी, घिनौनी, अपमानित, गिरी हुई लग रही हूँगी।

करण आह ओह करता सिसकारियाँ भर रहा था।

फिर उसने लिंग मेरे मुँह से खींच लिया। “ओह अब छोड़ दो, नहीं तो मुँह में ही………”

मेरे मुँह से उसके निकलने की ‘प्लॉप’ की आवाज निकलने के बाद मुझे एहसास हुआ मैं उसे कितनी जोर से चूस रही थी। वह साँप-सा फन उठाए मुझे चुनौती दे रहा था।

उन दोनों ने मुझे पेट के बल लिटा दिया। पेड़ू के नीचे तकिए डाल डालकर मेरे नितम्बों को उठा दिया। मेरे चूतड़ों को फैलाकर उनके बीच कई लोंदे वैसलीन लगा दिया।

कुर्बानी का क्षण ! गर्दन पर छूरा चलने से पहले की तैयारी।

“पहले कोई पतली चीज से !”

हीना मोमबत्ती का पैकेट ले आई। हमने नया ही खरीदा था। पैकेट फाड़कर एक मोमबत्ती निकाली। कुछ ही क्षणों में गुदा के मुँह पर उसकी नोक गड़ी। हीना मेरे चूतड़ फैलाए थी। नाखून चुभ रहे थे। करण मोमबत्ती को पेंच की तरह बाएँ दाएँ घुमाते हुए अन्दर ठेल रहा था। मेरी गुदा की पेशियाँ सख्त होकर उसके प्रवेश का विरोध कर रही थीं। वहाँ पर अजीब सी गुदगुदी लग रही थी।

जल्दी ही मोम और वैसलीन के चिकनेपन ने असर दिखाया और नोक अन्दर घुस गई। फिर उसे धीरे धीरे अन्दर बाहर करने लगा।

मुझसे कहा जा रहा था,”रिलैक्सन… रिलैक्सव… टाइट मत करो… ढीला छोड़ो… रिलैक्स … रिलैक्स…..”

मैं रिलैक्स करने, ढीला छोड़ने की कोशिश कर रही थी।

कुछ देर के बाद उन्होंने मोमबत्ती निकाल ली। गुदा में गुदगुदी और सुरसुरी उसके बाद भी बने रहे।

कितना अजीब लग रहा था यह सब ! शर्म नाम की चिड़िया उड़कर बहुत दूर जा चुकी थी।

“अब असली चीज !” उसके पहले करण ने उंगली घुसाकर छेद को खींचकर फैलाने की कोशिश की, “रिलैक्स … रिलैक्स .. रिलैक्स…..”

जब ‘असली चीज’ गड़ी तो मुझे उसके मोटेपन से मैं डर गई। कहाँ मोमबत्ती का नुकीलापन और कहाँ ये भोथरा मुँह। दुखने लगा। करण ने मेरी पीठ को दोनों हाथों से थाम लिया। हीना ने दोनों तरफ मेरे हाथ पकड़ लिए, गुदा के मुँह पर कसकर जोर पड़ा, उन्होंने एक-एक करके मेरे घुटनों को मोड़कर सामने पेट के नीचे घुसा दिया गया। मेरे नितम्ब हवा में उठ गए। मैं आगे से दबी, पीछे से उठी। असुरक्षित। उसने हाथ घुसाकर मेरे पेट को घेरा …

अन्दर ठेलता जबर्दस्तब दबाव…

ओ माँ.ऽऽऽऽऽऽऽ…

पहला प्यार, पहला प्रवेश, पहली पीड़ा, पहली अंतरंगता, पहली नग्नता… क्या-क्या सोचा था। यहाँ कोई चुम्बन नहीं था, न प्यार भरी कोई सहलाहट, न आपस की अंतरंगता जो वस्त्रनहीनता को स्वादिष्ट और शोभनीय बनाती है। सिर्फ रिलैक्स… रिलैक्स .. रिलैक्सप का यंत्रगान…..

मोमबत्ती की अभ्*यस्त* गुदा पर वार अंतत: सफल रहा- लिंग गिरह तक दाखिल हो गया। धीरे धीरे अन्दर सरकने लगा। अब योनि में भी तड़तड़ाहट होने लगी। उसमें ठुँसा केला दर्द करने लगा।

“हाँ हाँ हाँ, लगता है निकल रहा है !” हीना मेरे नितम्बों के अन्दर झाँक रही थी।

“मुँह पर आ गया है… मगर कैसे खींचूं?”

लिंग अन्दर घुसता जा रहा था। धीरे धीरे पूरा घुस गया और लटकते फोते ने केले को ढक दिया।

“बड़ी मुश्किल है।” हीना की आवाज में निराशा थी।

“दम धरो !” करण ने मेरे पेट के नीचे से तकिए निकाले और मेरे ऊपर लम्बा होकर लेट गया। एक हाथ से मुझे बांधकर अन्दर लिंग घुसाए घुसाए वह पलटा और मुझे ऊपर करता हुआ मेरे नीचे आ गया। इस दौरान मेरे घुटने पहले की तरह मुड़े रहे।

मैं उसके पेट के ऊपर पीठ के बल लेटी हो गई और मेरा पेट, मेरा योनिप्रदेश सब ऊपर सामने खुल गए।

हीना उसकी इस योजना से प्रशंसा से भर गई,”यू आर सो क्लैवर !”

उसने मेरे घुटने पकड़ लिए। मैं खिसक नहीं सकती थी। नीचे कील में ठुकी हुई थी।

मेरी योनि और केला उसके सामने परोसे हुए थे। हीना उन पर झुक गई।

‘ओह…’ न चाहते हुए भी मेरी साँस निकल गई। हीना के होठों और जीभ का मुलायम, गीला, गुलगुला… गुदगुदाता स्पर्श। होंठों और उनके बीच केले को चूमना चूसना… वह जीभ के अग्रभाग से उपर के दाने और खुले माँस को कुरेद कुरेदकर जगा रही थी। गुदगुदी लग रही थी और पूरे बदन में सिहरनें दौड़ रही थीं। गुदा में घुसे लिंग की तड़तड़ाहट,योनि में केले का कसाव, ऊपर हीना की जीभ की रगड़… दर्द और उत्तेजना का गाढ़ा घोल…

मेरा एक हाथ हीना के सिर पर चला गया। दूसरा हाथ बिस्तर पर टिका था, संतुलन बनाने के लिए।

करण ने लिंग को किंचित बाहर खींचा और पुन: मेरे अन्दर धक्का दिया। हीना को पुकारा, “अब तुम खींचो…..”

हीना के होंठ मेरी पूरी योनि को अपने घेरे में लेते हुए जमकर बैठ गए। उसने जोर से चूसा। मेरे अन्दर से केला सरका….

एक टुकड़ा उसके दाँतों से कटकर होंठों पर आ गया। पतले लिसलिसे द्रव में लिपटा। हीना ने उसे मुँह के अन्दर खींच लिया और “उमऽऽऽ, कितना स्वादिष्ट है !” करती हुई चबाकर खा गई।

मैं देखती रह गई, कैसी गंदी लड़की है !

मेरी चूत मस्त गरम हो चुकी थी

मेरे सिर के नीचे करण के जोर से हँसने की आवाज आई। उसने उत्साठहित होकर गुदा में दो धक्के और जड़ दिये।

हीना पुन: चूसकर एक स्लाइस निकाली।

करण पुकारा,”मुझे दो।”

पर हीना ने उसे मेरे मुँह में डाल दिया, “लो, तुम चखो।”

वही मुसाई-सी गंध मिली केले की मिठास। बुरा नहीं लगा। अब समझ में आया क्यों लड़के योनि को इतना रस लेकर चाटते चूसते हैं। अब तक मुझे यह सोचकर ही कितना गंदा लगता था पर इस समय वह स्वाभाविक, बल्कि करने लायक लगा। मैं उसे चबाकर निगल गई।

हीना ने मेरा कंधा थपथपाया,”गुड….. स्वादिष्ट है ना?”

वह फिर मुझ पर झुक गई। कम से कम आधा केला अभी अन्दर ही था।

“खट खट खट” …………. दरवाजे पर दस्तक हुई।को इतना रस लेकर चाटते चूसते हैं। अब तक मुझे यह सोचकर ही कितना गंदा लगता था पर इस समय वह स्वाभाविक, बल्कि करने लायक लगा। मैं उसे चबाकर निगल गई।

हीना ने मेरा कंधा थपथपाया,”गुड….. स्वादिष्ट है ना?”

वह फिर मुझ पर झुक गई। कम से कम आधा केला अभी अन्दर ही था।

“खट खट खट” …………. दरवाजे पर दस्तक हुई।

मैं सन्न। वे दोनों भी सन्न। यह क्या हुआ?

“खट खट खट” ….. “करण, दरवाजा खोलो।”

पियूष उसके हॉस्टल से आया था। उसको मालूम था कि करण यहाँ है।

किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़कियों के कमरे में लड़का घुसा हुआ और दरवाजा बंद? क्या कर रहे हैं वे !!

“खट खट खट…. क्या कर रहे हो तुम लोग?”

जल्दी खोलना जरूरी था। हीना बोली, “मैं देखती हूँ।” करण ने रोकना चाहा पर समय नहीं था। हीना ने अपने बिस्तर की बेडशीट खींचकर मेरे उपर डाली और दरवाजे की ओर बढ़ गई। पियूष हीना की मित्र मंडली में काफी करीब था।

किवाड़ खोलते ही “बंद क्यों है?” कहता पियूष अन्दर आ गया। हीना ने उसे दरवाजे पर ही रोककर बात करने की कोशिश की मगर वह “करण बता रहा था पिहू को कुछ परेशानी है?” कहता हुआ भीतर घुस गया।

मुझे गुस्सा आया कि हीना ने किवाड़ खोल क्यों दिया, बंद दरवाजे के पीछे से ही बात करके उसे टालने की कोशिश क्यों नहीं की।

उसकी नजर चादर के अन्दर मेरी बेढब ऊँची-नीची आकृति पर पड़ी।

“यह क्या है?”उसने चादर खींच दी। सब कुछ नंगा, खुल गया….. चादर को पकड़कर रोक भी नहीं पाई। उसकी आँखें फैल गर्इं।

मुझे काटो तो खून नहीं। कोई कुछ नहीं बोला। न हीना, न मेरे नीचे दबा करण, न मैं।
 


पियूष ढिठाई से हँसा, “तो यह परेशानी है पिहू को… इसे तो मैं भी दूर कर सकता था।” वह करण की तरह जेंटलमैन नहीं था।

‘नहीं, यह परेशानी नहीं है !’ हीना ने आगे बढ़कर टोका।

“तो फिर?”

“इसके अन्दर केला फँस गया है। देखते नहीं?”

करण मेरे नीचे दुबका था। मेरे दोनों पाँव सहारे के लिए करण की जांघों के दोनों तरफ बिस्तर पर जमे थे। टांगें समेटते ही गिर जाती। पियूष बिना संकोच के कुछ देर वहाँ पर देखा। फिर उसने नजर उठाकर मुझे, फिर पिहू को देखा। हम दोनों के मुँह पर केला लगा हुआ था। मुझे लग गया कि वह समझ गया है। व्यंग्य भरी हँसी से बोला, “तो केले का भोज चल रहा है!!” उंगली बढ़ाकर उसने मेरे मुँह पर लगे केले को पोछा और मेरी योनि की ओर इशारा करके बोला, “इसमें पककर तो और स्वादिष्ट हो गया होगा?”

हममें से कौन भला क्या कहता?

“मुझे भी खिलाओ।” वह हमारे हवाइयाँ उड़ते चेहरे का मजा ले रहा था।

“नहीं खिलाना चाहते? ठीक है, मैं चला जाता हूँ।”

रक्त शरीर से उठकर मेरे माथे में चला आया। बाहर जाकर यह बात फैला देगा। पता नही मैंने क्या कहा या किया कि हीना ने पियूष को पकड़कर रोक लिया। वह बिस्तर पर चढ़ी, मेरे पैरों को फैलाकर मेरी योनि में मुँह लगाकर चूसकर एक टुकड़ा काट ली। पियूष ने उसे टोका, ‘मुँह में ही रखो, मैं वहीं से खाऊँगा।’ उसने हीना का चेहरा अपनी ओर घुमा लिया।

दोनों के मुँह जुड़ गए।

यह सब क्या हो रहा था? मेरी आंखों के सामने दोनों एक-दूसरे के चेहरे को पकड़कर चूम चूस रहे थे। हीना उसे खिला रही थी, वह खा रहा था।

पियूष मुँह अलग कर बोला, “आहाहा, क्या स्वाद है। दिव्य, सोमरस में डूबा, आहाहा, आहाहा… दो दो जगहों का।” फिर मुँह जोड़ दिया।

दो दो जगहों का? हाँ, मेरी योनि और हीना के मुख का। सोमरस। मेरी योनि की मुसाई गंध के सिवा उसमें हीना के मुँह की ताजी गंध भी होगी। कैसा स्वाद होगा? छि: ! मैंने अपनी बेशर्मी के लिए खुद को डाँटा।

“अब मुझे सीधे प्याले से ही खाने दो।”

हीना हट गई। पियूष उसकी जगह आ गया। मैंने न जाने कौन सेी हिम्मत जुटा ली थी। जब सब कुछ हो ही गया था तो अब लजाने के लिए क्या बाकी रहा था। मैंने उसे अपने मन की करने दिया। अंतिम छोटा-सा ही टुकड़ा अन्दर बचा था। अंतिम कौर।

“मेरे लिए भी रहने देना।” मेरे नीचे से करण ने आवाज लगाई। अब तक उसमें हिम्मत आ गई थी।

“तुम कैसे खाओगे? तुम तो फँसे हुए हो।” पियूष ने कहकहा लगाया, “फँसे नहीं, धँसे हुए…..”

हीना ने बड़े अभिभावक की तरह हस्तक्षेप किया, “पियूष, तुम करण की जगह लो। करण को फ्री करो।”

क्या ????

हैरानी से मेरा मुँह इतना बड़ा खुल गया। हीना यह क्या कर रही है?

पियूष ने झुककर मेरे खुले मुँह पर चुंबन लगाया, “अब शोर मत करो।”

उसने जल्दी से बेल्ट की बकल खोली, पैंट उतारी। चड़ढी सामने बुरी तरह उभरी तनी हुई थी। उभरी जगह पर गीला दाग।

वह मेरे देखने को देखता हुआ मुसकुराया, “अच्छी तरह देख लो।” उसने चड्डी नीचे सरका दी। “यह रहा, कैसा है?”

इस बार डर और आश्चर्य से मेरा मुँह खुला रह गया।

वह बिस्तर पर चढ़ गया और मेरे खुले मुँह के सामने ले आया,”लो, चखो।”

मैंने मुँह घुमाना चाहा पर उसने पकड़ लिया,”मैंने तुम्हारा वाला तो स्वाद लेकर खाया, तुम मेरा चखने से भी डरती हो?”

मेरी स्थिति विकट थी, क्या करूँ, लाचार मैंने हीना की ओर देखा, वह बोली, “चिंता न करो। गो अहेड, अभी सब नहाए धोए हैं।”

मुझे हिचकिचाते देखकर उसने मेरा माथा पकड़ा और उसके लिंग की ओर बढ़ा दिया।

पियूष का लिंग करण की अपेक्षा सख्त और मोटा था। उसके स्वभाव के अनुसार। मुँह में पहले स्पर्श में ही लिसलिसा नमकीन स्वाद भर गया। अधिक मात्रा में रिसा हुआ रस। मुझे वह अजीब तो नहीं लगा, क्योंकि करण के बाद यह स्वाद और गंध अजनबी नहीं रह गए थे लेकिन अपनी असहायता और दुर्गति पर बेहद क्षोभ हो रहा था। मोटा लिंग मुँह में भर गया था। पियूष उसे ढिठाई से मेरे गले के अन्दर ठेल रहा था। मुझे बार बार उबकाई आती। दम घुटने लगता। पर कमजोर नहीं दिखने की कोशिश में किए जा रही थी। हीना प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेर रही थी लेकिन साथ-साथ मेरी विवशता का आनन्द भी ले रही थी। जब जब पियूष अन्दर ठेलता वह मेरे सिर को पीछे से रोककर सहारा देती। दोनों के चेहरे पर खुशी थी। हीना हँस रही थी। मैं समझ रही थी उसने मुझे फँसाया है।

अंतत: पियूष ने दया की। बाहर निकाला। आसन बदले जाने लगे। मुझे जिस तरह से तीनों किसी गुड़िया की तरह उठा उठाकर सेट करने लगे उससे मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध करते हुए पियूष को गुदा के अन्दर लेने से मना कर दिया,”मार ही डालोगे क्या?”

मुझे करण की ही वजह से अन्दर काफी दुख रहा था। पियूष के से तो फट ही जाती। और मैं उस ढीठ को अन्दर लेकर पुरस्कृत भी नहीं करना चाहती थी।

केला इतनी देर में अन्दर ढीला भी हो गया था। जितना बचा था वह आसानी से करण के मुँह में खिंच गया। वह स्वाद लेकर केले को खा रहा था। उसके चेहरे पर बच्चे की सी प्रसन्नता थी।

उसने हीना की तरह मुझे फँसाया नहीं था, न ही पियूष की तरह ढीठ बनकर मुझे भोगने की कोशिश की थी। उसने तो बल्कि आफर भी किया था कि मैं नहीं चाहती हूँ तो वह चला जाएगा। पहली बार वह मुझे तीनों में भला लगा। योनि खाली हुई लेकिन सिर्फ थोड़ी देर के लिए। उसकी अगली परीक्षाएँ बाकी थीं। करण को दिया वादा दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था,‘जो इज्जत केले को मिली है वह मुझे भी मिले।’

समस्या की सिर्फ जड़ खत्म हुई थी, डालियाँ-पत्ते नहीं।

काश, यह सब सिर्फ एक दु:स्वप्न निकले। मां संतोषी !

लेकिन दु:स्वप्न किसी न समाप्त होने वाली हॉरर फिल्म की तरह चलता जा रहा था। मैं उसकी दर्शक नहीं, किरदार बनी सब कुछ भुगत रही थी। मेरी उत्तेजना की खुराक बढ़ाई जा रही थी। करण मेरी केले से खाली हुई योनि को पागल-सा चूम, चाट, चूस रहा था। उसकी दरार में जीभ घुसा-घुसाकर ढूँढ रहा था। गुदगुदी, सनसनाहट की सीटी कानों में फिर बजनी शुरू हो गई। होश कमजोर होने लगे।

क्या, क्यों, कैसे हो रहा है….. पता नहीं। नशे में मुंदती आँखों से मैंने देखा कि मेरी बाईं तरफ पियूष, दार्इं तरफ हीना लम्बे होकर लेट रहे हैं।

उन्होंने मेरे दोनों हाथों को अपने शरीरों के नीचे दबा लिया है और मेरे पैरों को अपने पैरों के अन्दर समेट लिया है। मेरे माथे के नीचे तकिया ठीक से सेट किया जा रहा है और ….. स्तनों पर उनके हाथों का खेल। वे उन्हें सहला, दबा, मसल रहे हैं, उन्हें अलग अलग आकृतियों में मिट्टी की तरह गूंध रहे हैं। चूचुकों को चुटकियों में पकड़कर मसल रहे हैं, उनकी नोकों में उंगलियाँ गड़ा रहे हैं।

दर्द होता है, नहीं दर्द नहीं, उससे ठीक पहले का सुख, नहीं सुख नहीं, दर्द। दर्द और सुख दोनों ही।

वे चूचुकों को ऐसे खींच रहे हैं मानों स्तनों से उखाड़ लेंगे। खिंचाव से दोनों स्तन उल्टे शंकु के आकार में तन जाते हैं। नीचे मेरी योनि शर्म से आँखें भींचे है। करण उसकी पलकों पर प्यार से ऊपर से नीचे जीभ से काजल लगा रहा है। उसकी पलकों को खोलकर अन्दर से रिसते आँसुओं को चूस चाट रहा है। पता नहीं उसे उसमें कौन-सा अद़भुत स्वाद मिल रहा है। मैं टांगें बंद करना चाहती हूँ लेकिन वे दोनों तरफ से दबी हैं।

विवश, असहाय। कोई रास्ता नहीं। इसलिए कोई दुविधा भी नहीं।

जो कुछ आ रहा है उसका सीधा सीधा बिना किसी बाधा के भोग कर रही हूँ। लाचार समर्पण। और मुझे एहसास होता है- इस निपट लाचारी, बेइज्जंती, नंगेपन, उत्तेजना, जबरदस्ती भोग के भीतर एक गाढ़ा स्वाद है, जिसको पाकर ही समझ में आता है।

शर्म और उत्तेजना के गहरे समुद्र में उतरकर ही देख पा रही हूँ आनन्दानुभव के चमकते मोती। चारों तरफ से आनन्द का दबाव। चूचुकों, योनि, भगनासा, गुदा का मुख, स्तनों का पूरा उभार, बगलें… सब तरफ से बाढ़ की लहरों पर लहरों की तरह उत्तेकजना का शोर।

पूरी देह ही मछली की तरह बिछल रही है। मैं आह आह कर कर रही हूँ वे उन आहों में मेरी छोड़ी जा रही सुगंधित साँस को अपनी साँस में खीच रहे हैं। मेरे खुलते बंद होते मुँह को चूम रहे हैं।

पियूष, हीना, करण…. चेहरे आँखों के सामने गड्डमड हो रहे हैं, वे चूस रहे हैं, चूम रहे हैं, सहला रहे हैं,… नाभि, पेट,, नितंब, कमर, बांहें, गाल, सभी… एक साथ..। प्यार? वह तो कोई दूसरी चीज है- दो व्यक्तियों का बंधन, प्रतिबद्धता। यह तो शुद्ध सुख है, स्वतंत्र, चरम, अपने आप में पूरा। कोई खोने का डर नहीं, कोई पाने का लालच नहीं। शुद्ध शारीरिक, प्राकृतिक, ईश्वर के रचे शरीर का सबसे सुंदर उपहार।

ह: ह: ह: तीनों की हँसी गूंजती है। वे आनन्दमग्न हैं। मेरा पेट पर्दे की तरह ऊपर नीचे हो रहा है, कंठ से मेरी ही अनपहचानी आवाजें निकल रही हैं।

मैं आँखें खोलती हूँ, सीधी योनि पर नजर पड़ती है और उठकर करण के चेहरे पर चली जाती है, जो उसे दीवाने सा सहला, पुचकार रहा है। उससे नजर मिलती है और झुक जाती है। आश्चर्य है इस अवस्था में भी मुझे शर्म आती है।

वह झुककर मेरी पलकों को चूमता है। हीना हँसती है। पियूष, वह बेशर्म, कठोर मेरी बाईं चुचूक में दाँत काट लेता है। दर्द से भरकर मैं उठना चाहती हूँ। पर उनके भार से दबी हूँ। हीना मेरे होंठ चूस रही है।

करण कह रहा है,”अब मैं वह इज्जत लेने जा रहा हूँ जो तुमने केले को दी।”

मैं उसके चेहरे को देखती हूँ, एक अबोध की तरह, जैसे वह क्या करने वाला है मुझे नहीं मालूम।

हीना मुझे चिकोटी काटती है,”डार्लिंग, तैयार हो जाओ, इज्जत देने के लिए। तुम्हारा पहला अनुभव। प्रथम संभोग, हर लड़की का संजोया सपना।”

करण अपना लिंग मेरी योनि पर लगाता है, होंठों के बीच धँसाकर ऊपर नीचे रगड़ता है।

हीना अधीर है,”अब और कितनी तैयारी करोगे? लाओ मुझे दो।”

उठकर करण के लिंग को खींचकर अपने मुँह में ले लेती है।

मैं ऐसी जगह पहुँच गई हूँ जहाँ उसे यह करते देखकर गुस्सा भी नही आ रहा।

हीना कुछ देर तक लिंग को चूसकर पूछती है,”अब तैयार हो ना? करो !”

पियूष बेसब्र होकर होकर करण को कहता है,”तुम हटो, मैं करके दिखाता हूँ।”

मैं अपनी बाँह से पकड़कर उसे रोकती हूँ। वह मुझे थोड़ा आश्चर्य से देखता है।

हीना झुककर मेरे योनि के होंठों को खोलती है। पियूष मेरा बायाँ पैर अपनी तरफ खींचकर दबा देता है, ताकि विरोध न कर सकूँ।

मैं विरोध करूंगी भी नहीं, अब विरोध में क्या रखा है, मैं अब परिणाम चाहती हूँ।

करण छेद के मुँह पर लिंग टिकाता है, दबाव देता है। मैं साँस रोक लेती हूँ, मेरी नजर उसी बिन्दु पर टिकी है। केले से दुगुना मोटा और लम्बा।

छेद के मुँह पर पहली खिंचाव से दर्द होता है, मैं उसे महत्व नहीं देती।

करण फिर से ठेलता है, थोड़ा और दर्द। वह समझ जाता है मुझे तोड़ने में श्रम करना होगा।

हीना को अंदाजा हो रहा है, वह उसका चेहरा देख रही है। वह उसे हमेशा पियूष की अपेक्षा अधिक तरजीह देती है। मुझे यह बात अच्छी लगती है। पियूष जबर्दस्ती घुस आया है।

हीना पूछती है,”वैसलीन लाऊँ?” पर इसकी जरूरत नहीं, चूमने चाटने से पहले से ही काफी गीली है।

करण बोलता है,”इसको ठीक से पकड़ो।”

दोनों मुझे कसकर पकड़ लेते हैं। करण, एक भद्रपुरुष अब एक जानवर की तरह जोर लगाता है, मेरे अन्दर लकड़ी-सी घुसती है, चीख निकल जाती है मेरी।

मैं हटाने के लिए जोर लगाती हूँ, पर बेबस।

करण बाहर निकालता है, लेकिन थोड़ा ही। लिंग का लाल डरावना माथा अन्दर ही है। मेरा पेट जोर जोर से ऊपर नीचे हो रहा है।

मेरी सिसकियाँ सुनकर हीना दिलासा दे रही है,”बस पहली बार ही…… ”

पियूष- असभ्य जानवर क्रूर खुशी से हँस रहा है, कहता है,”बस, अबकी बार इसे फाड़ दे।”

हीना उसे डाँटती है।

ललकार सुनकर करण की आँखों में खून उतर आया है।

मुझे मर्दों से डर लगता है, कितने भी सभ्य हों, कब वहशी बन जाएँ, ठिकाना नहीं।

हीना करण को टोकती है,”धीरे से !”

मगर करण के मुँह से ‘हुम्म’ की-सी आवाज निकलती है और एक भीषण वार होता है।

मेरी आँखों के आगे तारे नाच जाते हैं, पियूष और हीना मुँह बंद कर मेरी चीख दबा देते हैं।

कुछ देर के लिए चेतना लुप्त हो जाती है…
 


मेरी आँखें खुलती हैं, नजर सीधी वहीं पर जाती है। करण का पेडू मेरे पेडू से मिला हुआ है। लिंग अदृश्य है। मेरे ताजे मुंडे हुए पेडू में उसके पेड़ू के छोटे छोटे बालों की खूंटियाँ गड़ रही हैं।

सब मेरा चेहरा देख रहे हैं। हीना से नजर मिलने पर वह मुसकुराती है। करण धीरे धीरे लिंग निकालता है। लिंग का माथा लाल खून में चमक रहा है। मुझे खून देखकर डर लगता है। आँसू निकल जाते हैं, यह मेरा क्या कर डाला।

लेकिन हीना प्रफुल्लित है, वह ‘बधाई हो’ कहकर मेरा गाल थपथपाती है।

पियूष ताली बजाता है,”क्या बात है यार, एकदम फाड़ डाला !”

करण मानों सिर झुकाकर प्रशंसा स्वीकार करता है।

सभी मुस्कुरा रहे हैं, मैं सिर घुमा लेती हूँ।

पियूष बढ़ता है और मेरी योनि से रिस रहे रक्त को उंगली पर उठाता है और उसे चाट जाता है,”आइ लाइक ब्ल्ड” (मुझे खून पसंद है।)

हीना उसे देखती रह जाती है, कैसा आदमी है !

पियूष उत्साह में है,”तगड़ा माल तोड़ा है तूने याऽऽऽऽर…… ”

बार-बार बहते खून को देख रहा है।

करण आवेश में है, खून और पियूष की उकसाहटें उसे भी जानवर बना देती हैं। वह फिर से लिंग को मेरी योनि पर लगाता है और एक ही धक्के में पूरा अन्दर भेज देता है। मैं विरोध नहीं करती, हालाँकि अब मेरे हाथ पैर छोड़ दिए गए हैं, पर अब बचाने को क्या बचा है?

हीना भी उत्साहित है,”अब मालूम हो रहा होगा इसको असली सेक्स का स्वाद। इतने दिन से मेरे सामने सती माता बनी हुई थी। आज इसका घमण्ड टूटा। जब से इसे देखा था तभी से मैं इस क्षण का इंतजार कर रही थी।”

पियूष भी साथ देता है।

रक्त और चिकने रसों की फिसलन से ही लिंग बार बार घुस जा रहा है, नहीं तो रास्ता बहुत तंग है और इतना खिंचाव होता है कि दर्द करता है। केले से दुगुना लम्बा और मोटा होगा। मैं सह रही हूँ। योनि को ढीला छोड़ने की कोशिश कर रही हूँ ताकि दर्द कम हो।

करण मेरे ऊपर लेट गया है और मुझमें हाथ घुसाकर लपेट लिया है, मुझे चूम रहा है, कोंच रहा है कि उसके चुम्बनों का जवाब दूँ।

मेरी इच्छा नहीं है लेकिन….।

वह जितना हो सकता है मुझमें धँसे हुए ही ऊपर-नीचे कर रहा है। मुझे छूटने, साँस लेने, योनि को राहत देने का मौका ही नहीं मिलता।

इससे अच्छा तो है यह जल्दी खत्म हो।

मैं उसके चुम्बनों का जवाब देती हूँ।

मेरी जांघों पर उसकी जांघें सरक रही हैं, मेरे हाथ उसकी पीठ के पसीने पर फिसल रहे हैं। मेरी गुदा के अगल बगल नितम्बों पर जांघें टकरा रही हैं- थप थप थप थप।

रह-रहकर गुदा के मुँह पर फोते की गोली चोट कर जाती है। उससे गुदा में मीठी गुदगुदी होती है। पियूष और हीना मेरे स्तन चूस रहे हैं, मेरे पेट को, नितम्बों को सहला रहे हैं।

अचानक गति बढ़ जाती है, शायद करण कगार पर है, जोर जोर की चोट पड़ने लगी है, योनि में चल रहा घर्षण मुझे कुछ सोचने ही नहीं दे रहा, हाँफ रही हूँ, हर तरफ चोट, हर तरफ से वार।

दिमाग में बिजलियाँ चमक रही हैं।

“अब मेरा झड़ने वाला है।”

“देखो, यह भी पीक पर आ गई है।”

“अन्दर ही कर रहा हूँ।”

“तुम केला निकालने आए हो या इसे प्रेग्नेंट करने?”

“याऽऽर… अन्दर ही कर दे। मजा आएगा।”

पियूष उसे निकालने से रोक रहा है। “साली की मासिक रुक गई तब तो और मजा आ जाएगा।”

“आह, आह, आह” मेरे अन्दर झटके पड़ रहे हैं।

“गुड, गुड, गुड, हीना, तुम इसकी क्लिेटोरिस सहलाओ। इसको भी साथ फॉल कराओ।”

एक हाथ मेरे अन्दर रेंग जाता है। करण मुझ पर लम्बा हो गया है। मुझे कसकर जकड़ लेता है। जैसे हड़डी तोड़ देगा। भगनासा बुरी तरह कुचल रही है। ओऽऽऽह… ओऽऽऽह… ओऽऽऽह…..

गुदा के अन्दर कोई चीज झटके से दाखिल हो जाती है।

मैं खत्म हूँ ………

मैं खत्म हूँ ………

मैं खत्म हूँ ………

जिंदगी वापस लौटती है। हीना सीधे मेरी आँखों में देख रही है, चेहरे पर विजयभरी मुस्कान, बड़ी ममता से मेरी ललाट का पसीना पोछती है, होंठों के एक किनारे से मेरी निकल आई लार को जीभ पर उठा लेती है। लगता है वह सचमुच वह मुझे प्यार करती है? बहुत तकलीफ होती है मुझे इस बात से।

वह रुमाल से मेरी योनि, मेरी गुदा पोंछ रही है। मेरा सारा लाज-शर्म लुट चुका है। फिर भी पाँव समेटना चाहती हूँ। हीना रुमाल उठाकर दिखाती है। उसमें खून और वीर्य के भीगे धब्बे हैं।

वह उसे करण को दे देती है,”तुम्हारी यादगार।”

मैं उठने का उपक्रम करती हूँ, पियूष मुझे रोकता है,”रुको, अभी मेरी बारी है।”

“तुम्हारी बारी क्यों?” हीना आपत्ति करती है।

“क्यों? मैं इसे नहीं लूँगा?”

“तुमने क्या इसे वेश्या समझ रखा है?” हीना की आवाज अप्रत्याशित रूप से तेज हो जाती है।

‘क्यों ? फिर करण ने कैसे लिया?”

“उसने तो उसे समस्या से निकाला। तुमने क्या किया?”

पियूष नहीं मानता। “नहीं मैं करूँगा।”

करण कपड़े पहन रहा है। उसका हमदर्दी दोस्त के प्रति है। कमीज के बटन लगाते हुए कहता है,”करने दो ना इसे भी।”

हीना गुस्से में आ जाती है, “तुम लोग लड़की को क्या समझते हो? खिलौना?” हीना मुझे बिस्तर से खींचकर खड़ी कर देती है,”तुम कपड़े पहनो।”

फिर वह उन दोनों की ओर पलट कर बोलती है,”लगता है तुम लोगों ने मेरे व्यवहार का गलत मतलब निकाला है। सुनो पियूष, जितना तुम्हें मिल गया वही तुम्हारा बहुत बड़ा भाग्य है। अब यहीं से लौट जाओ। तुम मेरे दोस्त हो। मैं नहीं चाहती मुझे तुम्हा*रे खिलाफ कुछ करना पड़े।

पियूष कहता है,”यह तो अन्याय है। एक दोस्त* को फेवर करती हो एक को नहीं।”

हीना,”तुम मुझे न्याय सिखा रहे हो? जबरदस्ती घुस आए और …..”

पियूष,”करण को तो बुलाकर दिलवाया, मैं खुद आया तब भी नहीं? यह क्या तुम्हारा यार लगता है?”

हीना की तेज आवाज गूंजी,”तुम मुझे गाली दे रहे हो?”

करण को भी उसके ताने से से क्रोध आ जाता है,”पियूष, छोड़ो इसे।”

“चुप रह बे ! तू क्या हीना का भड़ुआ है? एक लड़की चुदवा दी तो बड़ा पक्ष लेने लगा।”

पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है। दोनों की एक साथ ‘खबरदार’ गूंज जाती है, मारने के लिए दौड़े करण को हीना रोकती है।

पियूष पर उसकी उंगली तन जाती है,”खबरदार एक लफ्ज भी आगे बोले, चुपचाप यहाँ से निकल जाओ। मत भूलो कि लड़कियों के हॉस्टल में एक लड़की के कमरे में खड़े हो। यहीं खड़े खड़े अरेस्ट हो जाओगे।”

मैं जल्दी-जल्दी कपड़े पहन रही हूँ।

कमरे की चिल्लाहटें बाहर चली जाती हैं, दस्तक होने लगती है,”क्या़ बात है हीना, दरवाजा खोलो !”

अब मामला पियूष के हाथ से निकल चुका है, वह कुंठा में अपने मुक्के में मुक्का मारता है।

मैं सुरक्षित हूँ। मेरा खून चखने वाले उसे राक्षस को एक लात जमाने की इच्छा होती है !

दुर्घटना से उबर चुकी हूँ। लेकिन स्थाई जख्म के साथ।

हीना निर्देश देती है,”कोई कुछ नहीं बोलेगा। सब कोई एकदम सामान्य सा व्य़वहार करेंगे।”

हीना दरवाजा खोलकर साथियों से बात कर रही है,’हाय अल्का, हाय प्रीति…. कुछ नहीं, हम लोग ऐसे ही सेलीब्रेट कर रहे थे। एक खास बाजी जीतने की।”

मेरा कलेजा मुँह को आ जाता है, कहीं बता न दे। पर हीना को गेंद गोल तक ले जाने फिर वहाँ से वापस लौटा लाने में मजा आता है। ऐसे सामान्य ढंग से बात कर रही है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बड़ी अभिनय-कुशल है।

उस दिन हीना ने अपने करीबी दोस्त* पियूष को खो दिया- मेरी खातिर। उस वहशी से मेरी रक्षा की। एक से बाद एक अपमान के दौर में एक जगह मेरे छोटे से सम्मान को बचाया।उसने मुझे केले के गहरे संकट से निकाला। कितना बड़ा एहसान किया उसने मुझपर !

लेकिन किस कीमत पर? मेरे मन और आत्मा में जो घाव लगा, मैं किसी तरह मान नहीं पाती कि उसके लिए हीना जिम्मेदार नहीं थी। बल्कि उसी ने मेरी दुर्दशा कराई। उसी के उकसावे पर मैंने केले को आजमाया था। मेरी उस छोटी सी गलती को हीना ने पतन की हर इंतिहा से आगे पहुँचा दिया।

फिर भी पहला दोष तो मेरा ही था। मैंने हीना से दोस्ती तोड़ देनी चाही- बेहद अप्रत्यक्ष तरीके से, ताकि अहसान फरामोश नहीं दिखूँ।

——-समाप्त——
 


Bhai bahan ki chudai--चोद दिया बड़ी बहन को

मेरा नाम तपन घोष है! मैं आसनसोल का रहने वाला हूँ ! आज मैं आपको ऐसी कथा बताने जा रहा हूँ जो सुनकर सब कहेंगे तपन बना बहन चोद !

मैं अपनी माँ का एकलौता बेटा हूँ! मेरी एक बड़ी बहन है छाया ! मुझसे उम्र में चार साल बड़ी है!

जब मैं अपने यौवन का स्वाद चख ही रहा था तब मुझे पता चला कि मैं हरामी हूँ .. उनकी अपनी संतान नहीं हूँ ! मेरे फ्लैट-सोसाईटी वाले मुझे छेड़ते थे इस बात को लेकर ! पापा मम्मी अलग कमरे में सोते थे और मैं और दीदी बाजू वाले कमरे में सोते थे।

वो मेरा बहुत ध्यान रखती थी ! मैं नया नया मुठ मरना शुरू किया था ! स्कूल के दोस्त कहते थे अगर किसी लड़की मुठ से मरवाई जाए तो क्या कहना . मैं सोचता था कि छाया मेरी अपनी बहन तो है नहीं ! क्यूँ न इस पर ही कोशिश करूँ?

एक रात वह बिलकुल मदहोश होकर सो रही थी! मैं अपना लंड उसके मुलायम हाथ में रखा ! आह अहह कितनी नर्म हैं दीदी की उंगलियाँ ! मज़ा आ गया ! फिर मैंने उसकी हथेली में अपना वीर्य निकाल दिया!

सुबह मैंने देखा वो अपने हाथ धो रही थी …

दीदी क्या हुआ ??

अरे देखो ना क्या लग गया है सोते सोते ! साबुन जैसा चिकना है !!

दीदी कैसी खुशबू है उसकी ?

उसने सूंघा, अहह पता नहीं अजीब सी है !

बेचारी अब तक कुँवारी चूत लेकर फिर रही है … मैं तो बेकार में ही सुनीश के साथ शक करता था ?

सुनीश की पास में परचून की दुकान थी।

एक दिन मैं स्कूल से जल्दी आ गया, घर का दरवाज़ा खुला था ..

मैंने अन्दर जाकर देखा कि सुनीश दीदी को चोद रहा था।

दीदी की गोरी-गोरी टाँगें फैली हुई थी और सुनीश की काली काली गांड हवा में उछल उछल के घस्से मार रही थी।

दीदी की गोरी गांड देख कर जैसे मेरा खड़ा हुआ कि सुनीश मुझे देख वहाँ से रफूचक्कर हो गया …

तपन ! मम्मी को मत बताना ! मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ !!

मैं ज़रूर बताऊंगा दीदी … मैं नाराज़ होकर बोला।

ठीक है ! बता देना ! फिर पापा को मैं भी तुम्हारे बारे बता दूंगी कि तुम रात में मेरे हाथ में मुठ मारते हो। हरामी कहीं के…

मैं चुप हो गया … रात आई .. मुझे नींद नहीं आ रही थी …

मैंने दीदी को पकड़ लिया।

अहह ! तपन यह क्या कर रहे हो ?

अपनी टांगें मैं उसकी नायटी में फेरने लगा …

नायटी में हाथ डाल कर उसकी पैंटी को छुआ !

आह्ह ! नहीं ! मैं तुम्हारी दीदी हूँ !

कैसी दीदी? मैं तो हरामी हू ना ?

कहकर मैंने उसकी पैंटी खोल दी … उसकी जांघें ! मानो जन्नत ..

आओ ना ! जो कसर सुनीश ने छोड़ी है, मैं पूरा किये देता हूँ !

ओह! आ जा मेरे राजा ! चढ़ जा !

उसने अपने नायटी हटाई, मैं उसके मम्मों को चूसने लगा।

दूध नहीं निकलता क्या ? मैं निचोड़ते हुए बोला।

हट पागल ..

उसने मेरे लौड़े को अपने चूत में घुसाया !

अहह ! मज़ा आ गया छाया दी !

अहह अह !

मैं स्खलित हो गया।

बस बच्चे ! दो चार ही बार में ही?

सुनीश तो पचास बार कम से कम करता है ! चलो मैं तुम्हें सिखाती हूँ !

उसने मेरे लण्ड को चूसा, जब खड़ा हो गया तो उसने अपने प्रवेश द्वार पर डाला। मैंने धक्के मारने शुरू किये ..

बस छाया दी निकल जायेगा ..

उसने पूछा- बता 5 गुने 5 ?

मैं सोचने लगा और मैं इस बार स्खलित नहीं हुआ ..

वाह दीदी ! क्या आईडिया है ..

मैंने इस तरह बहुत बार उस रात छाया दी को चोदा।

मैंने मुठ उसके होंठो पर मारी …

ओह तपन कितना शरारती हो ?

मैंने उसे अपने माल से नहला दिया।

अगले दिन छुट्टी थी ..

हम दोनों साथ में नहाए..
 
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