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Adultery यौवन का शिकारी

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Guest
यौवन का शिकारी

शाम से बारिश हो रही थी…..और आसमान में अंधेरा छाता जा रहा था…..में अपनी दोनो बेटियों के साथ खाना बनाने के तैयारी कर रही थी. तभी फोन की घंटी बजी. में किचन से निकल कर अपने रूम में गयी. और फोन उठाया. दूसरी तरफ से किसी औरत की आवाज़ आई. “हेलो वंदना कैसी हो ? में बोल रही हूँ उर्मिला” ये मेरी एक पुरानी सहेली की आवाज़ थी. आज बरसो बाद उसकी आवाज़ सुनी, तो कुछ बीते हुए पलों की यादें दिमाग़ में घूम गयी.

उर्मिला: हेलो वंदना तुम हो ना लाइन पर.

में: हां हां बोल उर्मिला. में ठीक हूँ. तुम अपनी बताओ ?

उर्मिला: में भी ठीक हूँ. और तुम्हारी बेटियाँ कैसी है ?

में: वो दोनो भी ठीक है. खाना खा रही है.

उर्मिला: अच्छा वंदना सुन मुझे तुझसे कुछ काम था.

में: हां बोल ना क्या काम था.

उर्मिला: यार कैसे बोलूं समझ में नही आ रहा…..दरअसल बात ही कुछ ऐसी है.

में: तू ठीक है तो है. बोल ना क्या बात है.

उर्मिला: वो.. वो.. मुझे क्या तुम मुझे एक रात के लिए अपने घर पर रुकने दे सकती हो ?

में: हां क्यों नही इसमे पूछने की क्या बात है. कब आ रही है तू.

उर्मिला: यार आ नही रही. आ चुकी हूँ. पर पहले मेरी पूरी बात सुन ले. वो वो मेरे साथ कोई और भी है.

में: हां तो क्या हुआ आ जा.

उर्मिला: यार तू मेरी बात को समझ नही रही. वो मेरे साथ एक लड़का है.

में: क्या लड़का ! तेरा बेटा है क्या ?

उर्मिला: नही यार ! अब में तुम्हे कैसे बताऊ. वो वो समझ ना.

में: तू ये पहेलियाँ क्यों बुझा रही है. साफ साफ बता ना क्या बात है.''

उर्मिला: यार वो छोड़ तू ये बता कि तुम मुझे एक रात के लिए अपने घर पर एक रूम दे सकती हो या नही…..वो मेरे साथ मतलब समझ ना.

कहाँ हम जैसे ग़रीब और मजबूर लोग जो पैसे पैसे के लिए तरसते है और कहाँ वो उर्मिला जो अपने आशिक के साथ एक रात बिताने के लिए ५००० रुपये उड़ा रही है. पर फिर मुझे अहसास हुआ कि, ये मेने क्या कर दिया. मेरी दोनो बेटियाँ अब बारहवीं क्लास पास कर चुकी थी. और आगे पैसे ना होने के कारण में उन्हे आगे नही पढ़ा पा रही थी. उर्मिला मुझसे उम्र में ४-५ साल कम थी. में कैसे इतने बड़े लड़के को उसका बेटा बता सकती हूँ. फिर सोचा चलो जो होगा देखा जाएगा.

में बाहर आई, और किचन में चली गयी. ऑक्टोबर का महीना था. और बारिश से हवा भी ठंडी हो गयी थी. मतलब साफ था अब सर्दियाँ आने को है. जब में किचन में पहुची, तो मेरी बड़ी बेटी प्राची ने पूछा. “माँ किसका फोन था” मेने अपने आप को संभाले हुए कहा.”वो मेरी एक सहेली का फोन था. तुम नही जानती उनको. वो किसी काम से अपने बेटे के साथ यहाँ आई थी. और टाइम से वापिस नही जा पाई तो, आज रात वो यहा हमारे घर पर रुकेगी. तुम थोड़ा सा खाना ज़्यादा बना लो.

प्राजक्ता: माँ ठीक है. पर घर पर दूध नही है. उनको चाइ तो पिलानी है ना.

में: हां ठीक है में दुकान से दूध लेकर आती हूँ.

फिर में घर के बाहर आई, तो देखा बारिश अब धीमी पड़ चुकी है. तेज हवा के साथ बारिश की हल्की फुहार का भी अहसास हो रहा था. हमारा घर एक छोटे से कस्बे में था और एक घर दूसरे घर से काफ़ी दूरी पर थे. में रास्ते पर चलती हुई दुकान पर पहुचि, दूध का पॅकेट लिया, और फिर घर की तरफ चल पड़ी.

में जैसे ही घर के बाहर पहुचि तो पीछे से गाड़ी की आवाज़ आई. गाड़ी हमारे घर के बाहर आकर रुकी, मेने पलट कर देखा तो उसमे से उर्मिला नीचे उतर रही थी. उर्मिला ने मेरी तरफ मुस्कराते हुए देखा, और फिर मेरे पास आकर मुझे गले से मिली. “ओह्ह वंदना. कितने सालो बाद देख रही हूँ तुझे.” तभी मेरी नज़र पीछे खड़े लड़के पर पड़ी. जो टॅक्सी ड्राइवर को पैसे दे रहा था. जैसे मेने उसकी तरफ देखा. में एक दम से हैरान हो गयी.
 
मुझे अपनी आँखों पर यकीन नही हो रहा था. सामने जो लड़का खड़ा था. वो मुश्किल से मेरे बेटी से एक दो साल बड़ा होगा. में आँखें फाडे उसे देख रही थी. कभी उर्मिला को देखती. उर्मिला मेरे मन में उठ रहे सवालो को समझ चुकी थी. उसने अपने होंठो पर मुस्कान लाते हुए कहा. “अंदर चल बताती हूँ, अभिषेक ये बॅग उठा कर अंदर ले आओ’

उसके बाद हम दोनो अंदर आ गये. हमारे पीछे वो लड़का भी अंदर आ गया. मेने गेट बंद किया. और अंदर जाने लगी. मेने देखा मेरी दोनो बेटियाँ बड़े ही उत्साह के साथ घर आए हुए मेहमानो को देख रही थी. जब से उन दोनो ने होश संभाला था. तब से पहली बार हमारे घर पर कोई आया था.

हमारी जिंदगी बहुत ही नीरस होकर रह गयी थी. जब रात होती तो, घर में अजीब सा सन्नाटा छा जाता. खाना खाने के बाद हम तीनो अपने अपने बिस्तरों पर लेट जाते. और सोने की कोशिश करते. ना कभी हँसी मज़ाक होता. और ना ही कभी किसी तरह का एन्जॉयमेंट.

मेरे पति के गुजरने के बाद ये घर सिर्फ़ ईटो का मकान रह गया था. पर आज मेने कई सालो बाद अपनी दोनो बेटियों के चेहरे पर हल्की से मुस्कान देखी थी. हम लोग अंदर आए, और में उन्हें अपने रूम में ले गयी. अब ग़रीबो के पास सोफा तो था नही. इसलिए मेने उन्हे बेड पर बैठाया. और अपनी बड़ी बेटी प्राची को आवाज़ दी.

में: प्राची बेटा ज़रा दो ग्लास पानी ले आना.

प्राची: जी मम्मी.

थोड़ी देर में प्राची पानी लेकर रूम में आई, और उसने उर्मिला और उस लड़के अभिषेक को पानी दिया. “प्राची बेटा आंटी को नमस्ते कहो” प्राची ने उर्मिला को नमस्ते कहा.

उर्मिला: (प्राची को गले से लगाते हुए) ये प्राची है, देखो तो सही कितनी बड़ी हो गयी है. पहचान में नही आ रही. बहुत खूबसूरत है तुम्हारी बेटी. और छोटी कहाँ है प्राजक्ता.

मेने प्राजक्ता को आवाज़ दी, और प्राजक्ता भी रूम में आ गये.

प्राजक्ता: नमस्ते आंटी जी.

उर्मिला: (प्राजक्ता को गले लगाते हुए) नमस्ते बेटा. वंदना तुम्हारी दोनो लड़कियाँ कितनी खूबसूरत है. बिलकुल तुम पर गयी है.

प्राजक्ता: में नही आंटी जी. प्राची गयी है माँ पर.

और फिर उर्मिला और प्राजक्ता हसने लगी. आज पता नही कितने सालो बाद मेने अपने बेटियों के चेहरो पर खुशी देखी थी.”एक मिनिट” कहते हुए उर्मिला अपना बॅग खोलने लगी. और उसने उसमे से दो पॅकेट निकाले, और प्राची और प्राजक्ता को देते हुए कहा “ये तुम दोनो के लिए” दोनो ये गिफ्ट लेकर बहुत खुश थी.

में: अर्रे इसकी क्या ज़रूरत थी ?

उर्मिला: अर्रे कितने सालो बाद देख रही हूँ. तो खाली हाथ आती क्या ?

में: प्राची जाकर आंटी के लिए चाइ नाश्ते का इंतज़ाम करो.

प्राची: जी मम्मी.

और फिर प्राची और प्राजक्ता दोनो किचन में चली गयी. मेने उर्मिला की तरफ देखा, तो उसने मुझे इशारे से बाहर चलने को कहा. में और उर्मिला दोनो बाहर आ गये. में जानती थी कि उर्मिला से नीचे बात करना ठीक नही होगा. क्योंकि नीचे प्राची और प्राजक्ता दोनो किचन में थी. तभी अंदर से अभिषेक ने आवाज़ लगाई “आंटी जी” मेने उसकी तरफ पलट कर देखा तो वो मुझे ही बुला रहा था. में थोड़ा सा अनकंफर्टबल महसूस कर रही थी.

में उसके पास गयी और बोली “क्या हुआ कुछ चाहिए क्या”

अभिषेक: नही वो में कह रहा था. कि क्या में टीवी देख सकता हूँ.

में: (थोड़ी देर सोचने के बाद) हां लगा लो. (जब से मेरे पति की मौत हुई थी. तब से ना तो कभी मेने टीवी देखा था और ना ही मेरे बेटियों ने. इसीलिए में थोड़ा झीजक रही थी)

में उर्मिला को लेकर ऊपर आ गयी. और ऊपर आते ही, उसने अपने पर्स से हजार हजार के पांच नोट निकाल कर मेरे सामने कर दिए. मुझे इन पैसो की सख़्त ज़रूरत थी. पर ना जाने क्यों में अपने हाथ आगे नही बढ़ा पा रही थी.

उर्मिला: अर्रे देख क्या रही है (और ये कहते हुए उसने मेरा हाथ पकड़ कर मेरे हाथ में पैसे थमा दिए) क्या सोच रही है.

में: तू ये सब क्यों मतलब उस लड़के की उमर तो देख ली होती. तेरे बेटे जैसा है वो. और आज कल के ये बच्चे भी.

उर्मिला: क्या क्या कहा तूने बच्चा.मेरी जान वो शिकारी है शिकारी. एक बार उसका हथियार देख लेगी ना तो खड़े खड़े तेरी योनि मूत देगी.

में: होश में रह कर बात कर उर्मिला. बच्चे नीचे है.

उर्मिला: (मुझे बाहों में भरते हुए) ओह्ह हो नाराज़ क्यों हो रही है. वैसे एक बात कहूँ, लड़के में दम बहुत है. मेरी जैसी औरत की भी तसल्ली करवा देता है. लिंग नही मानो लोहे का रोड हो. साले का लिंग जब भी योनि में जाता है, तो कसम से योनि पानी की नदी बहा देती है.

उर्मिला की बातें सुन कर मेरे बदन में अजीब से झुरजुरी दौड़ गयी. में उसकी ये बकवास बातें नही सुनना चाहती थी. पर नज़ाने क्यों उसके और अभिषेक के बीच की बातें जानने का दिल कर रहा था. अजीब सा अहसास हो रहा था. मेरा पूरा बदन रोमांच के कारण काँप रहा था. यही सोच कर कि, कैसे एक औरत अपने बेटे की उम्र के लड़के से ऐसे संबंध रख सकती है. एक अजीब सी उतेजना मुझमे भरती जा रही थी.

में: पर तू और वो लड़का कैसे ये कैसे हो सकता है. मतलब.

मेरे अंदर छुपी जिज्ञासा उर्मिला से छुपी ना रही. और वो मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देख कर बोली.”सब बता दूँगी. आगे चल कर तेरे काम आएगा” ये कहते हुए उसने शरारती मुस्कान के साथ मेरी कमर पर चुटकी काट दी.

में: आहह पागल है क्या कैसी बात करती है

.

तभी नीचे प्राजक्ता की आवाज़ आए. “माँ चाय तैयार है. नीचे आ जाओ” में और उर्मिला नीचे आ गये. उर्मिला सीधा रूम में चली गयी. और में किचन में चली गयी. जब में किचन में पहुची तो , मेने देखा प्राजक्ता और प्राची दोनो टीवी पर चल रहे सॉंग की आवाज़ के साथ गुनगुना रही थी. आज सच में मेने उनको पहली बार इस तरह खुश देखा था.
 
टीवी पर चले रहे सॉंग्स और उर्मिला और अभिषेक की मौजूदगी ने मानो जैसे इस घर में थोड़ी से जान डाल दी हो. मेने चाइ को कप्स में डाला, और रूम में चली गयी. दोनो को चाइ दी, फिर वहीं बैठ कर उर्मिला के साथ इधर उधर की बाते करने लगी. चाइ पीने के बाद उर्मिला बोली “चल वंदना छत पर चलते है. ऊपर मौसम बहुत अच्छा है”

में उर्मिला के साथ बाहर आई, मेने देखा प्राची और प्राजक्ता दोनो खाना बना रही थी. “प्राची तुम खाना बनाओ में तुम्हारी आंटी के साथ ऊपर जा रही हूँ” में और उर्मिला ऊपर आ गये. बारिश अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी. और अंधेरा छा चुका था. मेने ऊपर वाले रूम से एक चारपाई निकाली और बाहर बिछा दी. और फिर में और उर्मिला वहाँ पर बैठ गये.

में: उर्मिला में कहती हूँ. तू जो ये कर रही है, ठीक नही कर रही. अगर तेरे पति और घर वालो को पता चला तो क्या होगा ?

उर्मिला: क्या मेरा पति. उसे कभी अपने बिजनेस से फ़ुर्सत मिले तब तो उसे पता चले. और यार हम औरतें ही क्यों यूँ अपने अरमानो को मार कर घुट घुट कर जीती रहे. कब तक हां. में तो नही जी सकती.

में: पर एक बार उसकी उम्र का तो ख्याल किया होता. वो बच्चा है अभी, और अगर ग़लती से उसने किसी को तेरे बारे में बता दिया तो,

उर्मिला: तूने आज कल की जनरेशन को क्या समझ रखा है. डियर ये आज की जनरेशन हमसे कही समझदार है. और वैसे भी में कौन सी इसके प्यार में पागल हूँ. बस मेरी ज़रूरत पूरी हो जाती है, और उसकी भी.

में: तू सच में बहुत कमीनी है. कहाँ से पकड़ लाई तू इसे.

उर्मिला: अर्रे यार कुछ नही. अनाथ है बेचारा. तेरे शहर का ही है. पिछली मर्तबा जब में यहाँ अपनी बहन के यहाँ आई थी तो, मेरी बेहन के घर नौकर था.

में: पर ये सब कैसे शुरू हुआ ?

उर्मिला: उस दिन जीजा जी, और दीदी किसी की शादी में गये हुए थे. तो में घर पर अकेली थी. और मेने थोड़ी सी वाइन पी ली.मुझे हल्का हल्का नशा सा होने लगा था. में घर के हॉल में बैठ कर टीवी देख रही थी. तभी मुझे बहुत तेज पेशाब लगा. में अपने रूम की तरफ जाने लगी. जैसे ही में ऊपर वाली मंज़िल पर अपने रूम की तरफ बढ़ रही थी. तो मुझे स्टोर रूम से अभिषेक के कराहने की आवाज़ सुनाई दी. मुझे लगा कि अभिषेक किसी तकलीफ़ में है. में स्टोर रूम की तरफ बढ़ी. पर मेरे कदम स्टोर रूम के डोर पर ही रुक गये….

मुझे अपनी आँखों पर यकीन नही हो रहा था. जो में ये सब देख रही थी. एक लड़का अपने हाथ से अपने लिंग को तेज़ी से हिला रहा था. जैसे ही मेरी नज़र उसके लंबे और मोटे लिंग पर पड़ी….मेरी तो मानो जैसे साँसे ही रुक गयी हो. उसका गोरे रंग का लिंग इतना बड़ा था कि, मेरी योनि में एक टीस सी उठी. और मेरी योनि में झुरजुरी सी दौड़ गयी…. लाइट की रोशनी में चमक रहा उसका गुलाबी सुपाडा तो और भी बड़ा लग रहा था.

पता नही क्यों ये सब देख कर मेरे अंदर एक अजीब से खुमारी छाने लगी. पर तभी बाहर से डोर बेल बजी. मुझे लगा के, जीजा जी और दीदी आ गये हैं. में जल्दी से नीचे आ गयी, और डोर खोला. दीदी और जीजा जी वापिस आ चुके थे. वो दोनो खाना खा कर आए थे….

उसके बाद में अपने रूम में आ गयी. और सोने की कोशिश करने लगी. पर मेरे ध्यान में अभी भी अभिषेक का विशाल लिंग छाया हुआ था. मेने अपनी नाइटी को अपनी कमर तक ऊपर उठा रखा था. और अपनी योनि की आग को अपनी उंगलियों से शांत करने की कोशिश कर रही थी.

पर योनि की आग और बढ़ती जा रही थी……में एक दम से बोखला सी गयी. और उठ कर वाइन के दो पेग और मार लिए. पर फिर भी अभिषेक का वो फुन्कारता हुआ लिंग मेरी आँखों से हट नही रहा था. में काम वासना से एक दम विहल हो चुकी थी….अब मेरी योनि की खुजली और बढ़ चुकी थी….में बेड से खड़ी हुई, और अपनी नाइटी को ऊपर उठा कर अपनी पैंटी को उतार कर फेंक दिया. और फिर रूम से बाहर आकर स्टोर रूम की तरफ चल पड़ी.

अभिषेक उसी स्टोर रूम में सोता था. मेने उसके रूम का डोर नॉक किया. और थोड़ी देर बाद अभिषेक ने डोर खोला. मेरे बाल बिखरे हुए थे. मेने रेड कलर की नाइटी पहनी हुई थी. जो मेरी थाइस तक लंबी थी.

मुझे इस हालत में देख कर अभिषेक मुझे घुरने लगा. “जी आंटी क्या हुआ” अभिषेक ने मेरे बदन को घुरते हुए कहा.

में: वो अभिषेक बेटा……मेरी पीठ बहुत दर्द कर रही है……तू थोड़ी देर के लिए मेरी पीठ दबा दे ना. मुझे नींद नही आ रही….

मेरे ये बात सुनते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी….और मुझे उसकी आँखों में वो वासना देख कर समझने में देर ना लगी की, ये भी मेरी तरह सहवास का मारा हुआ है….और इसे पटाने में कुछ ख़ास मेहनत नही करनी पड़ेगी…..में पलट कर अपने रूम की तरफ जाने लगी. वो मेरे पीछे चल रहा था. में जानबूझ कर अपनी नितंब को मटका कर चल रही थी. मेने तिरछी नज़रों से जब पीछे की ओर देखा, तो अभिषेक अपने शॉर्ट्स के ऊपर से अपने लिंग को मसल रहा था.

में अपने रूम में आकर पेट के बल बेड पर लेट गयी. मेने अभिषेक को डोर लॉक कर आने को कहा. अभिषेक ने डोर लॉक किया, और मेरे पास आकर बैठ गया. में बेड पर पेट के बल लेटी हुई थी….मेरी नाइटी मेरी जाँघो के ऊपर तक चढ़ि हुई थी. और वो मेरी चिकनी जांघे देख रहा था.

अभी उर्मिला मुझे अपने और अभिषेक के बारे में बता ही रही थी कि, प्राची ऊपर आ गयी. प्राची को देख कर उर्मिला चुप हो गयी.

में: हां बेटा कुछ काम था क्या……

प्राची: वो मम्मी खाना बन गया है. और लगा भी दिया है. नीचे आकर खाना खा लो.

में चाहती तो नही थी. पर फिर भी मुझे नीचे तो जाना ही था. मेने उर्मिला की तरफ देखा, तो उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा. “यार अब तुझमे इतनी भी ना समझ नही है कि, आगे क्या हुआ तुम्हे अंदाज़ा ना हुआ हो” मेने हां में सर हिला दिया और प्राची को बोला. “तुम चलो हम नीचे आ रहे हैं” प्राची नीचे चली गयी.

में: तो फिर ये तेरी बेहन के घर में नौकर है. और तू इसे यहाँ ले आई. तेरी बेहन को पता है क्या, ये तेरे साथ है.

उर्मिला: नही उसे नही पता. अब ये उसके पास नही रहता. और इसने वहाँ पर काम करना भी बंद कर दिया है.

में: तो फिर ये रहता कैसे है. कहाँ रहता है.

उर्मिला: यार ये शुरू से अनाथ नही है. बचपन में इसके माँ बाप की मौत हो गयी थी. इसके पिता सरकारी नौकरी करते थे. कुछ साल के होने पर इसे अपने पिता की नौकरी मिल जाएगी. अभी तो ये एक फॅक्टरी में काम कर रहा है. इसी शहर में. और अपने दोस्त के साथ उसके रूम में रहता है. और साथ में प्राइवेट स्टडी भी कर रहा है. अच्छा अब चल नीचे चल कर खाना खाते है……
 
में और उर्मिला नीचे आ गये. नीचे प्राची और प्राजक्ता ने उन दोनों का खाना रूम में लगवा दिया. और मेरा और अपना दोनो का खाना दूसरे कमरे में. हमने खाना खाया. और फिर मेने और प्राची ने मिल कर दूसरे रूम में उन दोनो के सोने का इंतजाज़ कर दिया. वो रात मुझ पर बहुत भारी रही. मुझे रह रह कर ये चिंता सता रही थी कि, कही प्राची और प्राजक्ता को किसी बात को लेकर शक ना हो जाए.

रात के करीब १ बजे में पेशाब लगने के कारण उठी, तो में रूम से बाहर निकल कर बाथरूम की तरफ जाने लगी.

मेने देखा कि , उनके रूम में अभी भी लाइट जल रही थी. और अंदर से उर्मिला की सिसकारियों की आवाज़ आ रही थी. मुझे तो बस यही डर सता रहा था कि, कही प्राची और प्राजक्ता को कुछ पता ना चल जाए. पर किसी तरह रात काट गयी. सुबह हुई तो मेने उनके रूम के डोर पर नोक कर उन्हे उठाया.

प्राची और प्राजक्ता पहले ही चाइ नाश्ता तैयार कर चुके थे. अभिषेक और उर्मिला उठ कर फ्रेश हुए, नाश्ता किए और जाने की तैयारी करने लगी. में घर के काम में लगी हुई थी, तब उर्मिला मेरे पास आई. “अच्छा वंदना अब हमे चलना है” पर जाने से पहले मुझे तुझसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.”

में: हां बोल ना.

उर्मिला: देख तू तो जानती है कि, अभिषेक का इस दुनिया में कोई नही है, और वो अपने दोस्त के साथ उसके रूम में रह रहा है. अभिषेक अपने लिए रूम ढूँढ रहा है, और तुम्हारे पास तो इतने रूम खाली पड़े है. हो सके तो इसको अपने घर में रूम किराए पर दे दे. तेरा खर्चा पानी भी चलता रहेगा. देख ये तुझे महीने के ५००० रुपये देता रहेगा. बस एक आदमी का खाना ही देना पड़ेगा तुझे.

में उर्मिला की बात सुन कर चुप हो गयी. में जानती थी कि, अभिषेक देखने में चाहे ही बच्चा लगता हो. पर उर्मिला के साथ रह कर वो कुछ ज़्यादा ही मेच्यूर हो गया है. और मेरे घर में दो जवान बेटियाँ भी तो थी. इसीलिए में उससे हां नही कर पा रही थी.

में: उर्मिला मुझे सोचने के लिए कुछ वक़्त चाहिए. तू तो जानती है ना कि, घर में दो दो जवान बेटियाँ है.

उर्मिला: हां में समझ सकती हूँ. वैसे अभिषेक वैसा लड़का नही है. बहुत ही समझदार है. में उसे समझा भी दूँगी. बाकी तू सोच ले.

उसके बाद उर्मिला और अभिषेक दोनो घर से चले गये.

उर्मिला ने जो ५००० रुपये मुझे दिए थे. उससे हमें बहुत राहत मिली. दिन रात फिर से उसी तरह काटने लगी. मेने बाहर कई लोगो से भी कह दिया था कि, अगर कोई फॅमिली वाला रूम किराए पर रहने के लिए ढूँढे तो उसे हमारे घर के बारे में बता दें.

में नही चाहती थी कि, में अपने घर पर किसी अकेले लड़के को रखूं, जो मेरे ही लड़कियो की उमर का हो. में उन्हे समाज की इस गंदगी से बचा कर रखना चाहती थी. मेरा यही सपना था कि, वो अपने दामन पर किसी तरह का दाग लिए बिना अपनी ससुराल चली जाए. पर अभी ना तो मेरे पास इतने पैसे थे और नी ही अभी उन दोनो की शादी की उम्र थी.

अब वो ५००० हज़ार तो ख़तम होने ही वाले थे. और आख़िर कब तो उन पैसों से गुज़ारा होता. दिन बीत रहे थे. एक बार फिर से हमारी माली हालत खराब होती जा रही थी. कभी कभी मुझे लगता कि, उस दिन मेने अभिषेक को कमरा देने से इनकार कर मेने बहुत बड़ी ग़लती कर दी. पर अब ना तो उर्मिला का कोई पता था और ना ही अभिषेक का. में किसी तरह सिलाई का काम करके अपने घर का खरच चला रही थी.

नवंबर का महीना शुरू हो चुका था. अब सर्दियाँ शुरू हो चुकी थी. एक दिन में अपनी छत पर बैठे हुई, धूप में सिलाई का काम कर रही थी. प्राची और प्राजक्ता दोनो अपनी सहेली के भाई की शादी में गयी हुई थी. तभी बाहर से डोर बेल बजी. मेने छत की दीवार के पास आकर नीचे देखा तो, नीचे कोई खड़ा था. में उसका चेहरा नही देख पा रही थी.

में: (छत पर से आवाज़ लगाते हुए) जी किस से मिलना है.

मेरी आवाज़ सुन कर उसने ऊपर की तरफ देखा तो, मेने देखा कि नीचे जो लड़का खड़ा है, वो कोई और नही अभिषेक है. उसने मुझे नीचे से नमस्ते कहा. में नीचे आ गयी, और गेट खोला.

अभिषेक: नमस्ते आंटी जी.

में: नमस्ते बेटा ! तुम इधर कहाँ ?

अभिषेक: वो उस दिन शायद उर्मिला आंटी ने आपको बताया हो कि मुझे रूम की ज़रूरत है.

में: हां बताया था. तुम अंदर आओ.

में और अभिषेक अंदर आ गये. मेने उसे रूम में बैठाया. और उसे पानी के लिए पूछा, तो उसने मना कर दिया. “चाइ तो पी लो.” पर अभिषेक ने मना कर दिया ये कह के, उसे थोड़ा जल्दी है वापिस जाना है काम पर. वो लंच टाइम पर घर आया था. मुझे एक बार फिर से कुछ आमदनी की आस हुई. पर मुझे नज़ाने क्यों सही नही लग रहा था. मेरे अंदर हज़ारो सवाल थी. और आख़िर कार मेने उससे अपनी मन की बात कह दी.

में: देखो बेटा मुझे भी रूम को किराए पर देने की उतनी ही ज़रूरत है. जितनी तुम्हें. पर पहले मेरी बात ध्यान से सुन लो.

अभिषेक: जी आंटी बोलिए.

में: देखो अभिषेक में जानती हूँ कि, तुम्हारे और उर्मिला के बीच में किस तरह का रिश्ता है…..में यी भी जानती हूँ कि तुम उम्र के किस दौर से गुजर रहे हो. और में नही चाहती कि, मेरी बेटियों पर इन बातों का असर पड़े.तुम समझ रहे हो ना में क्या कहना चाहती हूँ. मेरी दो जवान बेटियाँ है बेटा. हम बहुत ग़रीब लोग है. और हमारी इज़्ज़त के सिवा हमारे पास कुछ नही है. अगर तुम्हे मेरे घर में रूम चाहिए तो, अपनी हदों में रहना होगा.

अभिषेक: (मुझे बीच में टोकते हुए) आंटी जी आप फिकर ना करे. आपको अपने घर में मेरी मौजूदगी कर अहसास तक नही होगा. में अपनी आँखें हमेशा फर्श की तरफ रखूँगा. आप मेरा यकीन मानिए……

में: देख लो अभिषेक अगर मुझे तुम्हारी कोई भी हरकत अच्छी ना लगी तो, तुम्हे उसी वक़्त ये घर छोड़ कर जाना होगा….

अभिषेक: ठीक है आंटी जी. में आपको शिकायत का कोई मोका नही दूँगा. आप ये बताए कि आपको कितना रेंट चाहिए.

में: (थोड़ी देर सोचने के बाद) बेटा मुझे उर्मिला ने ५००० रुपये महीना कहा था.

अभिषेक: आंटी अब आप से क्या छुपाना. में फॅक्टरी में सिर्फ़ ८००० रुपये महीने का कमाता हूँ. बाकी आप जैसे कहे. वैसे ५००० हज़ार भी दे दूँगा. अगर आप खाना और मेरे रूम की साफ सफ़ाई और मेरे कपड़ों को धो सके तो.

में अभिषेक की बात सुन कर सोच में पड़ गई. आख़िर अकेला कितना खा लेगा. और अगर दो तीन दिन में इसका एक सूट धोना भी पड़े तो कौन सी आफ़त आ जाएगी.

में: पर में घर पर बेटियों को क्या कहूँगी , कि तुम यहाँ पर किराए पर क्यों रहे हो.

अभिषेक: आप उनसे कह देना कि में यहा पर पढ़ रहा हूँ. और उर्मिला आंटी ने आप से मुझे यहा रखने के लिए कहा है.

मुझे अभिषेक की बात सही लगी. मेने उससे हां कर दी. “ तो तुम कब अपना समान लेकर आ रहे हो “ मेने अभिषेक से पूछा.

अभिषेक: आंटी जी मेरे पास तो मेरे कपड़ो के सिवा कोई समान नही है. में कल सुबह आ जाऊंगा. कल सनडे है.

में: ठीक है तुम कल आ जाना. में तुम्हारे रहने वाले कमरे में एक सिंगल बेड लगवा देती हुई. पुराना है पर गुज़ारा कर लेना.

अभिषेक ने हां में सर हिला दिया. और अपनी जेब से ५००० रुपये निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिए. मेने हिचकते हुए उससे पैसे ले लिए. उसके अभिषेक चला गया. पर में अजीब सी उलझन में थी. मेरे दिल के किसी कोने में शायद ये बात मुझे काट रही थी कि, में जो कर रही हूँ ठीक नही कर रही.अगर तब मुझे इस बात का अहसास होता कि मै अपने घर मे किसी शिकारी को पनाह दे रही हु,तो शायद यह गलती में कभी नही करती. मेने अपना ध्यान बटाने के लिए घर के काम में लग गयी. शाम हो चुकी थी, अब तक प्राची और प्राजक्ता वापिस नही आई थी. मुझे थोड़ी चिंता होने लगी.

मेने बाहर आकर गेट खोला और बाहर देखने लगी. पर मुझे ज़्यादा देर इंतजार नही करना पड़ा. थोड़ी देर में ही मुझे प्राची और प्राजक्ता आती हुई दिखाई दी. जब वो घर के सामने आई तो, मेने उनसे पूछा कि इतनी देर कहाँ लगा दी, तो प्राजक्ता बोली, माँ अब शादी में टाइम तो लगता है ना.

उसके बाद दोनो अंदर आ गयी. मेने रात के खाने की तैयारी पहले ही कर ली थी.
 
थोड़ी देर रेस्ट करने के बाद मेने प्राची और प्राजक्ता को बुलाया, और उनको कहा. कि अभिषेक कल से यहाँ रहने आने वाला है.

में: तुम दोनो ध्यान से सुनो. उस दिन जो आंटी और उनका बेटा हमारे घर आए थे ना. उनका बेटा अभिषेक इसी शहर में आगे पढ़ रहा है. और वो कल से यही हमारे घर पर रहेगा.

प्राची: जी माँ.

में: देखो बेटा में चाहती हूँ कि, तुम दोनो उससे ज़्यादा बात मत करना. अपने काम से मतलब रखना.

प्राजक्ता: जी मम्मा.

में: मेने उसको नीचे वाला ही रूम दिया है. खाना तो मेने तैयार कर दिया है. अब तुम मेरे साथ मिल कर उस कमरे की थोड़ी सफाई कर दो. और हां जो बाहर बैठक में सिंगल बेड पड़ा है, उसे उसके रूम में शिफ्ट करना है.

दोनो ने हां में सर हिला दिया. उसके बाद हम तीनो ने कमरे की सफाई की, और उसके रूम में कुछ समान सेट करवा दिया. काम करने के बाद हम तीनो काफ़ी थक गये थे. थोड़ी देर आराम करने के बाद हमने रात का खाना खाया, और सोने के लिए अपने अपने कमरो में चले गये. प्राजक्ता और प्राची दोनो मेरे रूम के साथ वाले रूम में सोती थी.

अगली सुबह में थोड़ा सा असहज महसूस कर रही थी. में सोच रही थी कि, मेने कोई बड़ी ग़लती तो नही कर दी, अभिषेक को रूम रेंट पर देकर. फिर मेने सोचा, अभी हालत ऐसे है कि, में कुछ कर भी नही सकती, जब मेरे बाकी रूम रेंट पर चढ़ जाएँगे तो, में अभिषेक को दूसरा रूम लेने के लिए कह दूँगी.

सुबह के १० बजे में घर के आँगन में बैठी हुई, सिलाई का काम कर रही थी, कि तभी मुझे घर के बाहर बाइक के रुकने की आवाज़ आई. गेट बंद था, में गेट की तरफ देखने लगी. फिर थोड़ी देर बाद डोर बेल बजी, में खड़ी हुई, और गेट की तरफ जाकर गेट खोला, तो सामने अभिषेक अपने बॅग के साथ खड़ा था. मेने अपने होंठो पर ज़बरदस्ती मुस्कान लाते हुए उसे अंदर आने को कहा. उसने पहले अपना बॅग घर के अंदर रखा, और फिर बाइक घर के अंदर कर ली.

उसके अंदर आने के बाद मेने गेट लॉक कर दिया. “नमस्ते आंटी जी” अभिषेक ने मुस्कुराते हुए कहा.” मेने उस के रूम की तरफ इशारा करते हुए कहा. “चलो तुम्हे रूम दिखा देती हूँ. “ और उसके बाद में उसे उसके रूम में ले गयी.

में: अभिषेक ये तुम्हारा रूम है. तुम अपना समान सेट कर लो. में तुम्हारे लिए चाइ नाश्ते का इंतज़ाम करती हूँ.

अभिषेक: ठीक है आंटी जी.

में रूम से बाहर आ गयी. मेने देखा कि प्राची और प्राजक्ता दोनो अपने रूम के डोर के पीछे खड़े होकर बड़ी उत्सुकता से देख रही थी. मेने प्राजक्ता को आवाज़ लगाई , तो वो थोड़ी घबरा गयी. और मेरे पास किचन में आ गयी. “जी माँ”

में: ऐसे छुप छुप कर क्या देख रही हो.

प्राजक्ता: कुछ नही माँ वैसे ही.

में: चल छोड़ ये सब और चाइ नाश्ता तैयार कर दे, अभिषेक के लिए.

प्राजक्ता: जी माँ.

में बाहर आकर फिर से अपने सिलाई का काम करने लगी….हमारा घर छत से पूरा कवर था. बस ऊपर जाने के लिए सीडया थी. और उन सीडयों पर पर लोहे का गेट लगा हुआ था. जो हमेशा खुला रहता था. जब कभी हम तीनो एक साथ बाहर जाते थे, तो छत वाला गेट भी बंद कर के जाते थे. घर के पीछे की तरफ दो रूम थे. जिसमे से एक में में सोती थी, और दूसरे में प्राची और प्राजक्ता. उसके बाद हमारा किचन था. और गेट के पास एक तरफ दो रूम और थी. गेट के साथ वाला रूम खाली था.

और उससे पिछले वाले रूम को अभिषेक को दिया था. तो में बाहर बरामदे में बैठी थी, ठीक अभिषेक के रूम के सामने, उसका रूम का डोर खुला था. और वो अपनी पेंट शर्ट उतार रहा था. उसने पेंट उतारने के बाद अपने बॅग में से एक शॉर्ट निकाला, और पहन लिया. फिर टीशर्ट पहन कर बेड पर लेट गया.
 
शाम ढाल चुकी थी……..आज में बहुत रिलॅक्स फील कर रही थी……प्राची और प्राजक्ता दोनो बहुत खुश लग रही थी. और ऊपर छत पर बातें कर रही थी….इतने में अभिषेक अपने रूम से बाहर आया, और बाथरूम में चला गया….में बाहर बैठ कर काम कर रही थी…..बाथरूम से आकर वो मेरे साथ थोड़ी दूरी पर नीचे फर्श पर बैठ गया…….

में: चाइ पीओगे बेटा…..

अभिषेक: नही आंटी जी….

फिर थोड़ी देर खामोशी रही………

अभिषेक: आंटी जी एक बात पुछू……

में: हां बोलो……..

अभिषेक: आंटी जी दोपहर घर में बहुत शोर हो रहा था कोई आया था क्या ?

में: हां वो मेरे जेठ जी और जेठानी आए थे…..

अभिषेक: ओह्ह अच्छा…….सॉरी आंटी ये आप की घर के निजी बातें है……पर मेने सुना कि आप किसी की शादी और रिश्ते की बात कर रही थी….किसकी शादी है…….

में: (खुश होते हुए) वो मेरी जेठानी है ना..उसकी बेहन के लड़के का रिश्ता आया है प्राची के लिए….बहुत अच्छे लोग है..अगले सनडे को प्राची की शादी है उससे….लड़का सरकारी नौकरी करता है……और पता है. दहेज भी कुछ नही माँग रहे….बोल रहे थे अपनी लड़की को तीन कपड़ों में विदा कर दे…..

अभिषेक: ये तो बहुत अच्छी बात है आंटी जी पर ?

अभिषेक बोलते बोलते चुप हो गया……..”पर क्या अभिषेक”

अभिषेक: जाने दीजिए…..ये आप के घर की बात है…और वैसे भी आपने सोच समझ कर ही फ़ैसला लिया होगा…….

में: (अभिषेक की बात सुन कर सोच में पड़ गयी.कि कहीं मेने कोई जल्द बाजी तो नही कर दी) बोलो अभिषेक में बुरा नही मानूँगी…..तुम्हे तो पता है कि मेरी बेटियों का मेरे सिवाय कोई नही है….जो ऐसे फैंसले ले सके…..

अभिषेक: आंटी जी आप ने लड़के को देखा है ?

में: हां उसकी फोटो देखी है……अंदर रूम में है…..

अभिषेक: आंटी जी क्या में वो स्नॅप देख सकता हूँ……..

में: हां में अभी लेकर आती हूँ……..

में रूम में गयी……और उस लड़के का स्नॅप ले आई……और अभिषेक को देखते हुए बोली…..”ये देखो” अभिषेक ने मेरे हाथ से स्नॅप ली, और बड़े गोर से देखने लगा. कोई ३-४ मिनिट देखने के बाद अभिषेक बोला…….”आंटी जी हमारी प्राची वहाँ पर राज करेगी” में उसके मूह से हमारी प्राची सुन कर थोड़ा हैरान हो गयी. पर अगले ही पल जैसे उसको अपनी ग़लती का अहसास हुआ.

अभिषेक: ओह्ह सॉरी आंटी जी……वो ऐसे ही मूह से निकल गया……….दरअसल में तो अनाथ हूँ ना….तो जब भी कोई मुझसे अपने दिल के बात करता है या फिर थोड़ा प्यार करता है….में जल्द ही उनको अपना मानने लगता हूँ……

में: अर्रे कोई बात नही…….अब तुम अकेले नही हो…….वैसे तुम्हे कैसे लगा कि प्राची वहाँ खुश रहेगी….क्या तुम जानते हो इस लड़के को……

अभिषेक: नही आंटी जी जानता तो नही….पर आप यकीन नही करोगे……

में: क्या…….

अभिषेक: में किसी के भी चेहरे को देख कर ये बता सकता हूँ कि, वो इंसान कैसा है…..उसकी फ़ितरत कैसी है…..और ये फोटो देख कर भी में किसी के बारे में बता सकता हूँ……….

में: तुम सच कह रहे हो अभिषेक…….

अभिषेक: हां आंटी जी……अभी तक तो मेने जिसके बारे में जो जो बताया है वो ठीक ही हुआ है……..

उसके बाद में और अभिषेक यूँ ही इधर उधर के बातें करते रहे…मुझे मालूम ना था कि, अभिषेक इतनी जल्दी मुझसे इतना घुल मिल जाएगा कि, में उससे अपने घर के बातें भी करने लगी…..

अभिषेक: ठीक है आंटी जी….अगर किसी तरह की मदद के ज़रूरत हो तो, मुझे बोल देना….शर्माइयेगा मत….मेने कुछ पैसे जोड़ रखे है बॅंक में…अगर ज़रूरत हो तो बता देना…..और समझ लेना कि मेने आपको रेंट अड्वान्स दिया है…..

में: ठीक है बेटा….फिलहाल तो अभी ऐसे कोई ज़रूरत नही है…….पर हां तुम मेरी मदद कर दोगे……

अभिषेक: हां आंटी जी क्यों नही…….

में: वो दरअसल बात ये है कि, अगले सनडे को प्राची की शादी करनी है. तो उसके लिए नये कपड़े खरीदने है. तुम मुझे मार्केट ले चलोगे……तुम्हारे पास तो बाइक है……

अभिषेक: हां आंटी पर ?

में: क्यों क्या हुआ ?

अभिषेक: में कह रहा था कि, आप प्राची को भी साथ ले चलो…..आख़िर शादी उसकी है, उसे अपनी पसंद की ड्रेसस खरीदने दो……

मुझे अभिषेक के बात सही लगी..इतनी कम उमर में ही कितना समझदार है. वरना ये बात तो मेरे दिमाग़ में भी नही थी………अक्सर में ही प्राची और प्राजक्ता के लिए कपड़े खरीद कर लाती थी…..और उन्हने ने भी कभी कोई शिकायत नही की थी…..

में: पर एक बाइक पर तीन लोग कैसे जा सकते है……

अभिषेक: फिर टॅक्सी या ऑटो में चलते है……..

में: हां ये ठीक रहेगा…..

उसके बाद मेने प्राची को तैयार होने के लिए कहा….जब उसने पूछा कि कहाँ जाना है तो, मेने उसे बताया कि तुम्हारे लिए नये कपड़े खरीदने है..जेठ जी मुझे ५०००० रुपये देकर गये थे….मेरी बात सुन कर प्राजक्ता भी ज़िद्द करने लगी साथ जाने के लिए……

फिर हम चारो ऑटो पकड़ कर मार्केट पहुच गये….वहाँ पर ढेर सारी शॉपिंग की, आज प्राची और प्राजक्ता के चेहरे पर खुशी देखते ही बनती थी. मेने कई बार गौर क्या कि, अभिषेक दोनो की बहुत मदद कर रहा था…..और वो इतने कम समय में ही दोनो से बहुत घुल मिल गया था…..कौन सी ड्रेस अच्छी है…कौन सा सूट प्राची पर जचे गा….वगैरा वगैरा यहा तक कि कपड़ो का भाव तोल भी अभिषेक ने किया……..में उसे बार बार देख रही थी…..और मन में यही सोच रही थी कि, काश मेरा भी अभिषेक जैसा बेटा होता….

तो वो अपनी बहनो की इसी तरह मदद करता….सुख दुख में उनका साथ देता…हमने प्राची की शॉपिंग के साथ साथ प्राजक्ता के लिए भी कुछ ड्रेस खरीद ली. उसके बाद हम चारो ने बाहर होटेल में ही खाना खाया…..रात के ८ बज चुके थे……और और फिर हम घर वापिस आ गये…..\
 
भले ही में प्राची की शादी में कोई ताम झाम नही कर रही थी. पर फिर भी शादी के कुछ रीतिरिवाज करने के लिए अभिषेक मदद को हर समय तैयार रहता. आख़िर वो दिन भी आ गया…..जिसका मुझे बेसबरी से इंतजार था….जिसका हर माँ बाप को होता है, कि उनकी बेटी शादी करके खुशी खुशी अपनी ससुराल जाए….हम तैयार होकर सीधा मंदिर में पहुच गये….वहाँ पर मेरे जेठ जेठानी और उनके बच्चे और उनके जीजा और बेहन, और उनका बेटा जिससे प्राची की शादी होनी थी….वो सब पहले से मौजूद थे………और उनके साथ कुछ और लोग भी थे….

मंदिर के पीछे एक हॉल था.बहुत ज़्यादा बड़ा तो नही….पर ठीक ठाक था. अभिषेक ने हम सबसे वहाँ चलने के लिए कहा…..जैसे ही हम वहाँ पहुचे तो, मुझे यकीन ही नही हुआ….सामने मेरे बेटी का मंडप सज़ा हुआ था. एक तरफ टेबल पर खाने पीछे का समान था……..मेने अभिषेक की तरफ हैरान होते देखा. तो उसने मुस्कुराते हुए सर हिला दिया…..प्राची को और उसके होने वाले पति को मंडप में बैठा दिया गया……पंडित ने अपने मंतर पढ़ने शुरू कर दिए…. कुछ वेटर भी थे…जो सब को खाने वाली डिशस परोस रहे थे…..

में जब थोड़ा फ्री हुई तो, में अभिषेक के पास गयी…..और अपनी नम आँखों से उससे पूछा………”:ये सब तुमने कब किया अभिषेक” उस पर अभिषेक ने मुस्करा कर कहा…

अभिषेक: आंटी जी आप तो जानती ही हो…मेरा इस दुनिया में कोई नही है……और में ऐसा मोका कैसे छोड़ देता…अब मेरा कोई है तो नही जिसकी शादी में कोई मदद करता….सो बस दिल किया और मेने अपनी तरफ से ये छोटी से कोशिश करदी.

मेने अभिषेक के बारे में जैसे सोचा था, सब उसके उलट हो रहा था…..अब में उस पर और भरोसा करने लगी थी..उसने सब अरेंजमेंट बहुत अच्छे से किया था……शादी हो चुकी थी……..बेटी को भरे दिल से विदा करने के बाद हम लोग घर वापिस आ गये…..

पर आज घर में कुछ कमी लग रही थी…प्राची के घर में ना होने से पूरा घर सुना सुना लग रहा था. अभिषेक अपने रूम में चला गया. हम वहाँ से खाना साथ लेकर आए थे…इसीलिए खाना बनाने की ज़रूरत नही थी..मेने खाना लगाया और प्लेट में खाना लेकर अभिषेक के रूम की तरफ जाने लगी. पर अभी उसके रूम की तरफ बढ़ ही रही थी कि, में रुक गयी. और फिर से वापिस आकर प्राजक्ता और प्राची के रूम में चली गयी..जिसमे अब सिर्फ़ प्राजक्ता को ही रहना था. मेने वहाँ खाने की प्लेट रखी, और फिर अभिषेक के रूम की तरफ चली गयी.

अभिषेक के रूम का डोर खुला था, और वो बेड पर लेटा हुआ था. पर फिर भी मेने डोर पर नॉक किया, तो उसने लेटे लेटे गर्दन घुमा कर देखा. इससे पहले कि वो कुछ बोलता….मेने उससे कहा.”अभिषेक चलो चल कर खाना खा लो.” में उसका जवाब सुने बिना वापिस आ गयी…..कल तक जिसे मेने अपने घर में मजबूरी में रखा था. आज में उसको खुद अपनी बेटी के रूम में बुला रही थी…थोड़ी देर बाद अभिषेक रूम में आ गया..प्राजक्ता बेड पर बैठ कर खाना खा रही थी…..

में: आओ बेटा बैठो.

अभिषेक हम दोनो के सामने आकर बैठ गया…….और अपनी प्लेट उठ कर खाना खाने लगा…..घर में सन्नाटा छाया हुआ था…जैसे इस घर में कोई रहता ही ना हो.खाना खाते खाते अचानक अभिषेक उठा और टीवी ऑन कर दिया……टीवी पर कोई सीरियल चल रहा था……जिसे देखते ही, प्राजक्ता उछल पढ़ी…

प्राजक्ता: ये ये रहने दो बहुत अच्छा सीरियल है…….

अभिषेक ने मुस्कुरा कर फिर से खाना शुरू कर दिया……..अब भले ही घर में कोई ना बोल रहा था. पर टीवी की आवाज़ से घर का माहौल बदल सा गया था. खाना खा कर अभिषेक ने कुछ देर तक टीवी देखा और फिर अपने रूम में चला गया. दिन भर की थकान के कारण जल्द ही हम सब नींद आ गयी….५

अगले दिन जब सुबे में उठ कर फ्रेश हुई, तो मेने देखा अभिषेक अभी भी अपने रूम में सो रहा था…..उसके रूम का डोर खुला हुआ था…..मेने एक बार उसकी तरफ देखा, और फिर उसके रूम में जाकर उसको आवाज़ लगाने लगी….वो जल्दी ही उठ कर बैठ गया….और मेरी तरफ देखने लगा….

में: अभिषेक तुम्हें आज काम पर नही जाना क्या ?

अभिषेक: नही आंटी आज मुझे वो वो कहीं और जाना है.

में: कहाँ जाना है….

अभिषेक: वो वो आज मुझे उर्मिला आंटी ने बुलाया है, उनके घर पर ?

अभिषेक ने ये कह कर सर नीचे झुका लिया..उसकी ये बात सुनते ही, मेरे दिल को नजाने क्या हुआ, में गुस्से से बाहर आ गयी….इन चन्द ही दिनो में अभिषेक हमारे घर का हिस्सा बन गया था…..और में उसे ऐसे अपनी लाइफ को बर्बाद करते हुए नही देखना चाहती थी……मेरी नाराज़गी शायद अभिषेक भी समझ चुका था…

में बाहर बरामदे में बैठ कर अपना काम कर रही थी……थोड़ी देर बाद अभिषेक अपने रूम से निकल कर बाथरूम में चला गया…..मेने प्राजक्ता को अभिषेक का नाश्ता लगाने को कहा……प्राजक्ता किचन में चली गयी….थोड़ी देर बाद अभिषेक नहा कर बाथरूम से बाहर आया, और अपने रूम में जाकर कपड़े पहनने लगा…मुझे नज़ाने क्यों अभिषेक का ऐसे उर्मिला से मिलने जाना अच्छा नही लग रहा था…..

में उठ कर अभिषेक के रूम में चली गयी…..अभिषेक कपड़े पहन चुका था….”कब जाना है तुम्हे” मेने अभिषेक से रूखे अंदाज़ में पूछा… और अभिषेक ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और बोला, दोपहर को जाऊंगा…इतने में प्राजक्ता रूम के बाहर अभिषेक के लिए नाश्ता लेकर खड़ी हो गयी…मेने जाकर प्राजक्ता से नाश्ते की प्लेट ली, और अभिषेक के रूम में बेड पर रख दी……और फिर में बाहर आकर अपना काम करने लगी…….

अभिषेक नाश्ते के बाद ऊपर छत पर चला गया…..क्योंकि सर्दियों का मौसम था इसलिए बाहर धूप में बैठना सब को अच्छा लगता था…..प्राजक्ता अपने रूम में कुछ काम कर रही थी….नज़ाने क्यों मेरे मन में बार बार यही आ रहा था कि, मुझे उसे ऐसे करने से रोकना चाहिए……फिर मन में आता में कौन होती हूँ, उसकी जिंदगी में दखल देने वाली…….

पर नज़ाने क्यों में अपने मन के हाथों मजबूर होकर, ऊपर छत पर चली गयी…..वहाँ अभिषेक चटाई बिछा कर नीचे लेटा हुआ था..में उसके पास जाकर बैठ गयी….

में: अभिषेक एक बात कहूँ ?

अभिषेक: (मेरी तरफ देखते हुए) हां आंटी जी कहो ना क्या बात है ?

में: देखो अभिषेक वैसे तो मुझे तुम्हारी निजी जिंदगी में दखल देने का हक़ मुझे नही है………पर फिर मुझे लगता है, कि तुम्हारे और जो उर्मिला के बीच में है, वो सही नही है…..अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है…..वो तुम्हारा इस्तेमाल कर रही है…..एक दिन तुम अपनी जिंदगी उसके चक्कर में खराब कर लोगे…….
 
मेने एक ही साँस में मेरे दिल में जो आया वो बोल दिया……मेरी बात सुन कर अभिषेक खामोश हो गया. फिर थोड़ी देर बाद उसने चुप्पी तोड़ते हुए बोला….

अभिषेक: आंटी जी में अब आपको कैसे बताऊ…….आप तो जानती है कि में अनाथ हूँ….और मेरा इस दुनियाँ में कोई नही है…जो मुझे अच्छा बुरा समझा सकता. पर उर्मिला आंटी से मेरा सिर्फ़ वही रिश्ता नही है…..उन्होने मेरा हर मुश्किल वक़्त में साथ दिया है…में आप को बता नही सकता कि, किस कदर उन्होने ने मेरे हर कदम पर मदद की है, आज अगर में खुद कमा कर खा रहा हूँ, तो ये सिर्फ़ उनकी बदोलत है……उन्होने ने ही मुझे मेरे पैरो पर खड़ा किया है….

में अभिषेक के बात सुन कर चुप हो गयी…..पर फिर भी मेरा मन उसकी बातों को मानने के लिए तैयार नही था……

में: ठीक है पर मुझे नही लगता ये सब ठीक है……

और फिर में नीचे चली आई…….अभिषेक दोपहर को घर से चला गया……प्राची तो पहले सी ही अपनी ससुराल में थी, और अभिषेक के जाने के बाद घर और सुना सा लग रहा था…..रात हुई, और फिर सुबह, फिर रात हुई….पर अभिषेक अभी तक वापिस नही आया था.मुझे उसकी थोड़ी चिंता होने लगी थी…..पर मेरे पास ना तो उर्मिला का कोई फोन नंबर था, और ना ही अभिषेक का……

में रात को सो रही थी कि, बाहर डोर बेल बजी……में आँखें मलते हुए बेड से उठी, और दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा…रात के १२ बज रहे थे…में अपने रूम से बाहर आई, और गेट के पास जाकर पूछा कि कौन है….तभी बाहर से अभिषेक के लड़खड़ाती हुई आवाज़ आई…..

अभिषेक: में हूँ में हम अभिषेक आंटी जी….

मेने गेट खोला तो देखा, अभिषेक सर झुकाए खड़ा था…..बाहर कोहरा छाया हुआ था, और ठंड बहुत ज़्यादा थी….

में: अभिषेक तुम इस वक़्त टाइम तो देखो……..

अभिषेक बिना कुछ बोले और मेरी तरफ देखे बिना अंदर चला गया…..जब वो मेरे पास से गुज़रा तो मुझे एक अजीब सी स्मेल आई……मैं गेट लॉक कर वापिस मूडी तो देखा, अभिषेक अपने रूम में जा चुका था…..गेट बंद करने के बाद में वापिस आई, और रूम के बाहर से ही अभिषेक को देखा, अभिषेक बेड पर बैठा हुआ था…उसने अपने सर को नीचे झुका रखा था, और मूह में कुछ बुदबुदाये जा रहा था…..मुझे लगा कि कुछ तो ग़लत हुआ है…..

में अभिषेक के रूम में चली गयी…..जैसे ही में अभिषेक के पास पहुचि, तो मुझे फिर से अजीब सी स्मेल आई……और फिर मुझे समझते देर ना लगी कि, अभिषेक ने ड्रिंक कर रखी थी……”क्या हुआ अभिषेक. कुछ हुआ है क्या”

अभिषेक: (नीचे फर्श की ओर देखते हुए) आंटी जी में बहुत अपसेट हूँ, और रात बहुत हो चुकी है, सुबह बात करते है…….

में: हां ठीक है खाना तो खाया है ना…..

अभिषेक ने हां में सर हिला दिया…मेने भी उससे ज़्यादा सवाल पूछना ठीक नही समझा. और अपने रूम में आ गयी….में बेड पर लेटी सोचने लगी कि, ये अभिषेक को क्या हो गया…कही कुछ ग़लत तो नही हुआ उसके साथ. ड्रिंक भी करके आया है. बस यही सब सवाल मेरे जॅहन में था.

रोशन दान से अभी लाइट अंदर आ रही थी.जो अभिषेक के रूम की थी….नज़ाने वो कब तक जागता रहा…पर में अपने रूम में लेटी रही…नज़ाने कैसे कैसे ख़याल मेरे दिमाग़ में आ रहे थे…कहीं उर्मिला के ससुराल वालो या उसके पति को उन दोनो के रिश्ते के बारे में तो नही पता चल गया…..में यही सब सोचते सोचते सो गयी…….अगली सुबह जब उठी, तो देखा प्राजक्ता मुझसे पहले ही उठ कर घर के साफ सफाई कर चुकी थी…….और नाश्ता बना रही थी…….में किचन में गयी और बोली” क्या बात है आज सुबह सुबह ही घर के सफाई कर ली, मुझे उठाया भी नही…….”

प्राजक्ता: ओह्ह माँ तुम भी ना कुछ याद नही रहता…….आज प्राची दीदी और जीजा जी आने वाले है…..

में: ओह्ह हां में तो भूल ही गयी…..जल्दी से नाश्ता तैयार करो…में बाज़ार से कुछ खाने पीने का समान ले आती हूँ…..

में फिर से अपने रूम में गयी, और पैसे लेकर बाज़ार के तरफ जाने लगी, तो मेने देखा अभिषेक का रूम खुला था……पर अभिषेक अंदर नही था……..में थोड़ा जल्दी में थी, इसीलिए सीधा बाज़ार चली गयी…..बाज़ार से कोल्ड्रींक्स और कुछ और खाने का समान लेकर में घर आ गयी….अंदर आते वक़्त भी मेने अभिषेक के रूम में झाँका तो वो वहाँ नही था…..में किचन में गयी..और साथ लाया समान सेल्फ़ पर रख कर प्राजक्ता से पूछा…..

में: प्राजक्ता अभिषेक कहाँ है…..तुमने देखा है उसे……..

प्राजक्ता: हां ऊपर है छत पर…

में: अच्छा प्राची और तुम्हारे जीजा जी कब आने वाले है……

प्राजक्ता: वो तो दोपहर तक आएँगे क्यों क्या हुआ.

में: कुछ नही….अच्छा अभिषेक को चाइ दी……..

प्राजक्ता: हां दी थी……वो कप लेकर ऊपर ही चला गया था…….

में: अच्छा ठीक है में कप लेकर आती हूँ….

उसके बाद में ऊपर आ गयी……मेने देखा अभिषेक चारपाई पर बैठा हुआ था…. वो किसी बात को लेकर बहुत परेशान था…….मेरे कदमो की आहट सुन कर एक बार उसने मेरी तरफ देखा और फिर सर झुका लिया……में उसके पास जाकर बैठ गयी.

में: क्या हुआ बहुत उदास लग रहे हो ?

अभिषेक: कुछ नही ऐसे ही……

में: अभिषेक तुम कल रात को दारू पीकर आए थे ना ?

अभिषेक: (थोड़ा सा चोन्कते हुए) हूँ हां वो सॉरी आंटी….

में: क्या कुछ तो बात है . जो तुम इतने परेशान हो ?

अभिषेक: नही ऐसी कोई बात नही……

में: देखो अभिषेक भले ही तुम मुझे कुछ ना बताओ….पर तुम मेरे बेटे जैसे हो उसकी उमर के ही हो बताओ ना क्या हुआ…..

मेरे इस तरह सवाल करने पर अभिषेक ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें नम हो चुकी थी……..में उसकी आँखों में आँसू की नमी अच्छी से देख पा रही थी…फिर वो एक दम से रोने लगा….

मेने उसे कंधे से पकड़ कर दिलासा देना शुरू कर दिया” क्या हुआ ऐसे क्यों रो रहे बच्चो की तरह…”
 
अभिषेक: आंटी अब में उस औरत के पास कभी नही जाऊंगा, (अभिषेक ने रोते हुए कहा)

में: क्यों क्या हुआ कुछ कहा उसने……(इस दौरान कब उसका सर मेरी छाती पर आ गया मुझे पता ही नही चला…….में उसे चुप करते हुए उसके सर पर हाथ फेर रही थी…..मुझे इसका अहसास तब हुआ जब उसकी आँखों से आँसू निकल कर मेरी स्तनों के दरमियाँ कमीज़ के गले से नीचे गये…. मेरा पूरा बदन काँप गया…..पर चाह कर भी उसे अपने से दूर ना कर पाई.)

अभिषेक: (चुप होकर सीधे बैठते हुए) कल जब में उसके पास गया था, तब वो मुझसे कहने लगी कि, में उसके घर ही आ जाउ……जब मेने पूछा कि तुम घर वालो को क्या कहोगी तो उसने कहा कि, कहूँगी तुम्हे घर के कामो के लिए नौकर रखा है….जब मेने उसे इस बात के लिए मना किया और कहा कि, में अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूँ २ साल बाद मुझे पापा की सरकारी नौकरी भी मिल जाएगी….में ये नौकरा वाला काम नही करना…….तो वो मुझ पर बरस पड़ी..बहुत झगड़ा किया……और मुझे थप्पड़ भी मार दिया.

में: अच्छा अब रोना बंद करो…..मेने कहा था ना कि वो तुम्हारी जिंदगी खराब कर देगी……..अच्छा किया जो उसे जवाब दे दिया…..अच्छा अब रोते नही तुम तो इतने बहादुर हो……..

मेरे काफ़ी समझाने के बाद उसने रोना बंद कर दिया……और फिर वो मेरे साथ नीचे आ गया……..हम तीनो ने साथ मिल कर नाश्ता किया..और फिर प्राची और उसके पति की मेहमाननवाज़ी की तैयारी करने लगी……६

दोपहर तक हम सब तैयार कर चुके थे……अभिषेक ने रात को ड्यूटी पर भी जाना था…इसीलिए वो खाना खा कर अपने रूम में जाकर सो गया…….दोपहर को प्राची और उसका पति विशाल दोनो घर पर आ गये……मेने बेटी को गले से लगा लिया….बेटी को देखते ही मेरी आँखें नम हो गयी…..

चाइ नाश्ते के बाद प्राची ने मुझसे पूछा…..माँ अभिषेक भैया कहाँ पर है….

में: अपने रूम में सो रहा है, उसकी रात की ड्यूटी है…..

उसके बाद मेने और प्राजक्ता ने प्राची से ढेर सारी बातें की, उसके ससुराल के बारे में पूछा….उसके चेहरे की खुशी ही बता रही थी कि, वो कितनी खुश है. उसने मुझे बताया कि उनका घर बहुत बड़ा है..घर में उनके अलावा उसके सास ससुर ही है, और काम करने के लिए नौकरानी भी रखी हुई है…….

अपनी बेटी की बातें सुन कर मेरा दिल खुशियों से भर गया….मेने कभो सपने में भी नही सोचा था कि, मेरी बेटी की शादी इतने बड़े घर में होगी. और वो इतनी खुश रहेगी……..रात को अभिषेक खाना खा कर काम के लिए चला गया….अब प्राची घर पर थी तो, प्राजक्ता के बारें ख़तम होने का नाम ही नही ले रही थी.. वो तो ऐसे बातें कर रही थी……जैसे अपनी बेहन से बरसो बाद मिली हो…

विशाल भी दिल का बहुत अच्छा था…….प्राजक्ता के हर मज़ाक और बात का मुस्करा कर जवाब देता….हम रात के १ बजे तक यूँ ही बातें करते रहे……उसके बाद जब तक नींद ने अपना पूरा असर नही दिखाई तब तक बैठे रहे….लेटते ही नींद आ गयी…..कब सुबह हुई पता ही नही चला…..सुबह नाश्ते के वक़्त अभिषेक भी आ गया…..फिर मेने उसे भी अपने साथ नाश्ते के लिए कहा…….थोड़ी झिझक के साथ वो भी मान गया…….

नाश्ते के बाद विशाल ने कहा “मम्मी अब हमें चलना चाहये”

मेने कहा एक दो दिन रुक जाते तो”

विशाल: नही मम्मी जी काम बहुत है. ……ऊपर से पापा अकेले है काम संभाल नही पाएँगे…….अगली बार लंबी छुट्टी लेकर आएँगे……पर पहले आप को और प्राजक्ता को हमारे घर आना होगा”

थोड़ी देर और हँसी मज़ाक चलता रहा…….फिर प्राची और विशाल अपने घर के लिए चले गये……..

दिन इस तरह कट रहे थे……सब कुछ नॉर्मल चल रहा था…..अब में अभिषेक पर पूरा यकीन करने लगी थी……और उसने भी कभी मुझे शिकायत मोका नही दिया था………जब उसकी नाइट ड्यूटी होती, तो में कभी बाज़ार कुछ खरीदने के लिए जाती तो प्राजक्ता और अभिषेक दोनो घर पर अकेले होते….पर अक्सर अभिषेक सो रहा होता क्योंकि रात भर जाग कर काम करता था……… मेरे विश्वास भी उस पर बढ़ता जा रहा था…..हर दुख सुख में उसने मेरी बहुत मदद की थी. वो मुझे बहुत ही नेक दिल बच्चा लगता था. वो तो उसे उर्मिला ने अपने चुंगल में फँसा लिया……….नही तो वो ऐसी हरकत भी ना करता…७

एक दिन में किसी काम से बाज़ार गये हुई थी, लौटने में बहुत देर हो चुकी थी….जब मेने घर के बाहर पहुँच कर डोरबेल बजाई तो, काफ़ी देर तक गेट नही खुला……..मेने फिर से डोर बेल बजाई पर गेट नही खुला…..जब में तीसरी बार डोर बेल बजाने वाली थी…….तब जाकर गेट खुला……..गेट अभिषेक ने खोला था….

वो मेरे से नज़रे नही मिला रहा था…..गेट खोलने के बाद वो अपने रूम में चला गया……मेने गेट बंद किया, और अपने रूम की तरफ जाने लगी…..जब में उसके रूम के सामने से गुज़री तो, उसके रूम का डोर बंद था…..मेने प्राजक्ता के रूम में देखा तो, प्राजक्ता सो रही थी………मुझे कुछ अजीब सा लगा…..पर मेने ज़्यादा ध्यान नही दिया……

मेने अपने रूम में आ गयी……और बेड पर लेट गयी…..लेटते ही थके होने के कारण मुझे नींद आ गयी….शाम को जब उठी, तो चाइ बना कर किचन से प्राजक्ता और अभिषेक को आवाज़ दी……में चाइ लेकर बरामदे में आ गयी….प्राजक्ता तो उठ कर बाहर आ गयी……..पर अभिषेक शायद अभी तक सो रहा था…….ये सोच कर में उसके रूम के तरफ गयी……….पर अभिषेक रूम में नही था…में जैसे ही पलट कर वापिस जाने लगी तो, मेरा ध्यान बेड के नीचे पड़े ब्लॅक कलर के कपड़े पर गया…..वो क्या चीज़ थी…..जैसे ही मुझे इसका अहसास हुआ……..

मेरे हाथ पैर काँपने लगे……”नही ये नही हो सकता…ये मेरी आँखों का धोका भी हो सकता है” पर फिर भी मन नही माना…..और मेरे काँपते हुए पैर उस बेड की तरफ बढ़ने लगी…..बेड के पास जाकर में नीचे झुकी और उस कपड़े को अपने हाथों में उठा लाया…..मेरे दिल के धड़कने मानो जैसे बंद हो गयी हो…..मुझे यकीन नही हो रहा था…..वो एक ब्लॅक कलर की पैंटी थी..

जिसे पहचानने में मुझे एक पल ना लगा……”ये ये तो प्राजक्ता की पैंटी है” मेरी तो जैसे साँसे ही थम गयी हो….सब कुछ मानो थम सा गया हो…ये ये यहाँ पर कैसे……दोपहर को भी अभिषेक ने बहुत देर बाद डोर खोला था….कही अभिषेक और प्राजक्ता कुछ... नही नही ...ये नही हो सकता…….अभिषेक मेरे साथ ऐसा नही कर सकता…मेने उसे अपने बेटे जैसा माना है……
 
में बहुत परेशान हो गयी थी…..मुझे समझ में नही आ रहा था कि, में क्या करूँ….लाखो सवाल मेरे जहन में घूम रहे थे….तभी बाहर से प्राजक्ता की आवाज़ आई”माँ कहाँ रह गयी” में एक दम से हड़बड़ा गयी…..और जल्दी से पैंटी को अपनी सलवार के जबरन में फँसा कर बाहर आई और सीधा अपने रूम में चली गयी, और उसे वहाँ पर रख दिया….और बाहर आ गयी….बाहर आकर में नीचे बैठ गयी…..मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरी दुनिया ही लुट गयी हो… तभी अभिषेक बाथरूम से बाहर आया, और पास बैठ कर चाइ पीने लगा……

मुझे परेशान देखकर अभिषेक ने मुझ से पूछा कि क्या हुआ आप इतनी पेरेशान क्यों लग रही हो……….उस पर मेने कहा नही कोई बात नही है…….पर मेरे मन में हज़ारो सवाल चल रहे थे…….कि आख़िर हो क्या रहा है…….मुझे पता करना ही होगा….रात को अभिषेक खाना खा कर ड्यूटी पर चला गया……

अब मेरे दिमाग़ ने भी काम करना बंद कर दिया था….कहीं मेरी बेटी ग़लत रास्ते पर तो नही चल रही…….मेने मन में ठान लिया था कि, अब चाहे जो भी हो जाए…..में प्राजक्ता से बात करके रहूंगी……खाना खाने के बाद मेने सारा काम ख़तम किया, और प्राजक्ता के रूम में गयी…….

मुझे अपने रूम में देख कर प्राजक्ता ने पूछा क्या हुआ माँ, तो मेने उसकी पैंटी दिखाते हुए गुस्से से पूछा ये क्या है…..

जैसे ही प्राजक्ता ने वो अपनी पैंटी मेरे हाथ में देखी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया….पर फिर अपनी घबराहट को छुपाते हुए बोली…..”ये ये तो मेरी पैंटी है माँ ! आप भी ना”

में: (गुस्से से) वो तो मुझे भी दिख रहा है……पर ये अभिषेक के रूम में कैसे पहुची ?

प्राजक्ता: (मेरी ये बात सुन कर और घबरा गयी, और रुवासि से होकर बोली) वो वो जब मेने ऊपर छत से कपड़े उतारे थे,और अभिषेक के कपड़े देने उसके रूम में गयी थी…शायद उसी के बीच में चली गयी होगी….

भले ही प्राजक्ता कुछ और ही कह रही थी……पर उसकी घबराहट से साफ जाहिर हो रहा था कि वो मुझ से झूट बोल रही है….में अब गुस्से से पागल हुई जा रही थी ……मे तेज़ी से प्राजक्ता की तरफ गयी……और उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मार दिया…..थप्पड़ पड़ते ही वो गाल पर हाथ रख कर सुबकने लगी……..

में: सच सच बता…..क्या चल रहा है तुम दोनो के बीच में…….

प्राजक्ता: (अब जोर जोर से रोने लगी थी) सच माँ कुछ नही है…..

में: (और गुस्से से चिल्लाते हुए) बताती है कि नही कि और लगाऊ……..

प्राजक्ता: (सुबक्ते हुए) वो माँ में में अभिषेक से प्यार करती हूँ……

उसकी ये बात सुन कर तो जैसे मेरे बदन में आग ही लग गयी हो…….मेने एक के बाद एक ४-५ थप्पड़ उसके गालो पर जड़ दिए……..

में: तुम जानती भी हो प्यार किसी कहते है……..ये सब गंदी हरकते करके तुम इसे प्यार का नाम दे रही हो…..तूने हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी….

प्राजक्ता सुबक्ते हुए मेरे पास आई, और मुझसे सॉरी कहने लगी…..”पर में उस पर और बरस पड़ी और बोली, तुझे तो बाद में देखूँगी…पहले कल उसकी खबर लेती हूँ”

में ये कह कर अपने रूम में आ गयी.मुझे रह रह कर उर्मिला की बात याद आ रही थी. सच कहा था उर्मिला ने.अभिषेक कोई बच्चा नही था,वो शिकारी था और इस शिकारी ने मेरी मासूम बच्ची का शिकार कर लिया था.अब उसे इस शिकारी के चंगुल से आजाद कराने की जिम्मेदारी मेरी थी.

अगली सुबह डोर बेल बजी……मेरा गुस्सा पहले ही सातवें आसमान पर था….में गेट पर गयी, और गेट खोला. बाहर अभिषेक खड़ा मेरी तरफ देख कर मुस्करा रहा था….जी तो चाह रहा था कि इस हरामजादे का यही मूह तोड़ दूं……पर में नही चाहती थी कि हंमरे घर की इज़्ज़त बाहर गली मुहल्ले में उछले…….

अभिषेक सीधा अंदर चला गया,और अपने रूम में जाने लगा….मेने जल्दी से गेट लॉक किया, और उसकी तरफ पलटी….

में: (गुस्से से चिल्लाते हुए) वही रुक जा हरामजादे…….

मेरी आवाज़ सुन कर अभिषेक मेरी तरफ पलटा, और हैरत से मेरी तरफ देखने लगा.

में: हां तुझे ही कह रही हूँ…..वेश्या की औलाद…….

अभिषेक: क्या हुआ आंटी आप मुझसे ऐसे क्यों बात कर रही है………

में गुस्से से उसकी तरफ बढ़ी, और उसको उसके बालों से पकड़ कर खेंचते हुए ४-५ झापड़ उसके मूह पर दे मारे……पर इस अचानक हमले से वो लड़खड़ा कर पीछे गिर गया…..पर गुस्सा अभी भी शांत नही हुआ था….में फिर उसकी तरफ लपकी…..पर उसने मुझे पीछे धक्का दे दिया…..

में: हरामज़ादे हमारी इज़्ज़त को उछालता है….में तुझे जिंदा नही छोड़ूँगी…….

में उसकी तरफ फिर लपकी, और उल्टे हाथ पैर चलाने लगी…….अभिषेक भी बचने के लिए हाथ पैर चलाने लगा….प्राजक्ता जो अब तक अंदर खड़ी तमाशा देख रही थी भागते हुए बाहर आ गयी.और मुझे पकड़ने लगी……..

प्राजक्ता: माँ क्या कर रही हो….पूरा माहौल्ला इकट्ठा हो जाएगा……

में: प्राजक्ता में कहती हूँ छोड़ मुझे…….में आज इसे जिंदा नही छोड़ूँगी…….

अभिषेक: अबे क्या नौटंकी लगा रखी है……..मेने तेरी लड़की के साथ कोई ज़बरदस्ती नही की, अगर मेरी ग़लती है तो तेरी भी लड़की की उतनी ही ग़लती है…….

में: तू अभी के अभी निकल यहाँ से…..में तेरी शकल भी नही देखना चाहती. आज के बाद इधर नज़र उठाई तो तेरी आँखें निकाल दूँगी……

अभिषेक: जा रहा हूँ.. जा रहा हूँ….मुझे भी कोई शॉंक नही है यहाँ रहने का….वो तो प्राजक्ता से प्यार करता हूँ इसीलिए चुप हूँ…….

में: चुप कर हरामी ! गंदी हरकते करके उसे प्यार का नाम देता है..दफ़ा हो जा यहाँ से……

अभिषेक अपने रूम का डोर पटके हुए अंदर गया, और अपने कपड़े और समान बॅग में डालने लगा…..में बाहर बरामदे में चारपाई पर बैठ गयी…. अभिषेक अपना समान बॅग में डाल कर चला गया……कुछ दिन घर का महॉल ऐसे ही रहा. अभिषेक के जाने के बाद प्राजक्ता उदास रहने लगी थी…..मुझे डर था कि बचपने में वो कोई ग़लत कदम ना उठा दे…..
 
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