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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

मेरी समझ में तो घंटा भी नहीं आया। मैं गूंगे लंड की तरह मुंह बाए बस सोचता ही रह गया।

“क … क्या … मतलब?”

“बस आप चुपचाप बैड पर लेट जाओ। मैं आपकी आँखों पर यह दुपट्टा बाँध देती हूँ। जो भी करना होगा, मैं स्वयं करुँगी।”

“ओह …”

मैं तो हक्का बक्का सा ही रह गया। अब तो मामला शीशे की तरह बिलकुल साफ़ हो गया था।

ओह … मेरे भोले पाठको और पाठिका! आप भी नहीं समझे ना? चलो मैं संक्षेप में बता देता हूँ।

मेरे जिन पाठकों ने ‘मधुर प्रेम मिलन’ और ‘दूसरी सुहागरात’ नामक कहानी पढ़ी है वो जानते हैं कि मधुर भी अपनी महारानी का उदघाटन भी इसी प्रकार करवाकर पटरानी का खिताब हासिल किया था।

मुझे पहले तो थोड़ा संशय था पर अब तो मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि मधुर ने कामिनी को अपनी दूसरी सुहागरात मनाने वाली सारी बातें विस्तार से बताई होंगी और उस आनंद के बारे में भी बताया होगा जो हम दोनों ने उस रात भोगा था।

“क्या हुआ मेरे … भोले … सा..ज … न?” कामिनी की आवाज सुनकर मैं चौंका।

“ओह … हाँ … ठीक है.” अब मेरे पास उसकी बात मान लेने के अलावा और क्या चारा बचा था.

कामिनी ने पहले तो मेरे सारे कपड़े उतार दिए और फिर मेरी आँखों पर वही दुपट्टा कसकर बाँध दिया जो वह साथ लेकर आई थी। कामिनी ने भी अपनी नाइटी उतार दी। मैं देख तो नहीं सकता था पर अपने अंतर्मन की आँखों से महसूस तो कर ही सकता था।

और फिर मैंने कामिनी के हाथों की नाजुक और पतली अँगुलियों को अपने पप्पू के चारों ओर महसूस किया। मैं चित लेटा था और कामिनी मेरे पास आकर बैठ गई थी।

उसने पहले तो मेरे लिंग मुंड को अपने होंठों पर फिराया और फिर उसको मुंह में लेकर चूसने लगी। लंड तो ठुमके पर ठुमके लगाने लगा था। थोड़ी देर चूसने के बाद कामिनी ने उसे मुंह से बाहर निकाल दिया और फिर मुझे अपने लंड पर चिकनाई सी महसूस हुई। शायद कामिनी ने कोई ढेर सारी सुगन्धित क्रीम उस पर लगा दी थी।

अब कामिनी ने अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के दोनों ओर कर लिया और एक हाथ से मेरे पप्पू की गर्दन पकड़ कर अपनी महारानी (गांड) के छेद पर लगाकर घिसना शुरू कर दिया। जिस प्रकार उसके गांड का छेद चिकना सा लग रहा था मुझे लगता है उसने अपनी गांड के छेद पर और अन्दर भी ढेर सारी क्रीम जरूर लगाई होगी।

मैंने अपने हाथ उसके नितम्बों पर फिराने की कोशिश की तो कामिनी ने मना कर दिया- ना … आप कुछ नहीं करेंगे।

मेरा मन तो उसके नितम्बों और गांड के छेद को भी सहलाने का कर रहा था पर मन मार कर मैंने अपना हाथ हटा लिया।

अब कामिनी ने मेरे लंड को और जोर से कस लिया। लंड तो इतना सख्त हो चला था जैसे कोई लोहे की सलाख हो।

फिर कामिनी ने मेरे पप्पू को अपनी गांड के छेद पर लगा कर अपने नितम्बों को नीचे करना शुरू कर दिया। हालांकि मैं देख तो नहीं सकता था पर मैंने महसूस किया कि मेरा पप्पू उसकी गांड के सुनहरे छल्ले के ठीक बीच में लग गया है।

मेरा मन तो कर रहा था कि अपनी आँखों पर बंधे दुपट्टे को निकाल फेंकूं और इस सारे नज़ारे को अपनी आँखों से देखूं; पर मैं अभी ऐसा करना ठीक नहीं था।

कामिनी ने एक लंबा साँस लिया और मुझे लगा कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर के अपने दांत भींच लिए है। उसने अपने नितम्बों को नीचे करने की कोशिश की पर जल्दबाजी में लंड थोड़ा सा मुड़कर फिसल गया।

अब कामिनी ने फिर से निशाना लगाया और 2-3 बार धीरे-धीरे अपने नितम्बों को ऊपर नीचे किया और फिर अगले प्रयास में पप्पू तो उसकी गांड में धंसता ही चला गया जैसे किसी कुशल शिकारी का तीर सटीक निशाने पर अपना लक्ष्य भेद देता है।

और उसके साथ ही कामिनी की एक चीख पूरे कमरे में गूँज गई- उइइईईई ईईईइइ मा!

कामिनी जोर जोर से सांस लेने लगी थी। उसने अपने आप को स्थिर सा कर लिया था। ये पल उसके लिए बहुत ही नाजुक और संवेदनशील थे। उसका सारा शरीर कांपने सा लगा था।

मेरा मन तो उसकी गांड के छल्ले में फंसे मेरे लंड को अँगुलियों से छूने का कर रहा था पर इस समय मेरा थोड़ा सा भी हिलना कामिनी के नाजुक अंग को नुकसान पहुंचा सकता था। मैंने भी अपना दम साध लिया।

मुझे लगा कामिनी अपने दर्द पर काबू पाने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। थोड़ी देर वह इसी मुद्रा में बनी रही और फिर धीरे-धीरे वह अपने सिर को नीचे करके मेरे सीने से लग गई।

अब मैंने अपना एक हाथ उसकी नितम्बों की ओर बढ़ाया और अंदाज़े से उसके छेद को टटोलने की कोशिश की।

मेरा लंड तो केवल 1-2 इंच ही बाहर था, बाकी तो पूरा अन्दर समाया हुआ था।

मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी मेरा लंड गृह प्रवेश कर जाएगा। मेरे लंड की हालत यह थी कि जैसे प्लास्टिक की बोतल में अंगूठा फंस गया हो। सच में कामिनी की गांड बहुत ही कसी हुई थी।

अब पता नहीं उसने यह सब इन्टरनेट पर देखा था या यह सब मधुर ने उसे बताया था। यह तो अच्छा हुआ कि कामिनी ने पहले से ही मेरे लंड पर खूब सारी क्रीम लगा थी और अपनी गूपड़ी (गांड) के अन्दर भी लगा ली थी।

और सबसे ख़ास बात तो यह थी कि उसने बड़े इत्मीनान से मेरे लंड का गृह प्रवेश करवाया था। अगर वह ज़रा भी जल्दी करती तो निश्चित ही उसकी गांड का छल्ला जख्मी हो जाता।

थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद कामिनी कुछ संयत हुई तो उसने अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दिए।

अब मैंने एक हाथ कामिनी की पीठ पर फिराना शुरू कर दिया। कामिनी ने मना नहीं किया। शायद उसे भी अपनी कमर और नितम्बों पर मेरा हाथ फिराना किसी मरहम की तरह लग रहा होगा।

अब मैंने दूसरे हाथ से अपनी आँखों पर बंधा दुपट्टा निकाल फेंका। कामिनी की आँखें बंद थी और उसके गालों पर आंसू लुढ़क आये थे। मैंने उन आंसुओं को अपनी जीभ से चाट लिया और फिर कामिनी के होंठों को भी चूम लिया।

“मेरी प्रियतमा … आज तुम मेरी पूर्ण समर्पिता बन गई हो तुम्हारे इस समर्पण के लिए मैं तमाम उम्र बहुत आभारी रहूंगा.”

“आह … थोड़ी देर हिलो मत!” कामिनी के चेहरे पर दर्द की झलक सी लग रही थी। लेकिन मैंने देखा उसके चेहरे पर एक संतोष भी झलक रहा था। क्यों ना हो, आख़िर एक लंबी प्रतीक्षा, हिचक, लाज़ और डर के बाद आज उसने मेरा महीनों से संजोया ख्वाब पूरा जो कर दिया था।

स्त्री और पुरुष की सोच में कितना विरोधाभास होता है। पुरुष अपने लक्ष्य को पाकर आनंदित होता रहता है और स्त्री अपना कौमार्य अपने प्रियतम को सौम्पकर ख़ुशी महसूस करती है कि उसने अपने प्रियतम के मन की इच्छा को पूर्ण कर दिया है।

जैसे ही मैंने उसके चूचुक को अपने दांतों से थोड़ा सा दबाया तो कामिनी थोड़ी सी ऊपर हो गई तो पप्पू थोड़ा सा और आगे सरक गया। कामिनी झट से फिर नीचे हो गई और उसने अपना सिर फिर से मेरी छाती से लगा लिया। उसने एक हाथ पीछे करके पहले तो अपनी गांड के छल्ले को देखा और फिर मेरे पप्पू पर अंगुलियाँ फिरा कर देखा। मुझे लगता है वह यह देखना चाहती कि मेरा पप्पू कितनी गहराई तक अन्दर चला गया है।

मैंने उसकी पीठ और नितम्बों पर हाथ फिराना चालू रखा। उसके गदराये उरोज मेरी छाती से लगे हुए थे। मैंने महसूस किया उसके चूचुक आगे की ओर तन से गए हैं। मैंने उसके एक उरोज को पकड़ कर फिर से उसके चूचक को मुंह में भर लिया और चूसने लगा।

कामिनी के मुंह से एक मीठी सीत्कार सी निकल गई- आह …

“कामिनी … मेरी जान … अब दर्द तो नहीं हो रहा ना?”

“हट!” कहकर कामिनी ने मेरे होंठों को अपने दांतों से काट लिया।

मुझे लगा कामिनी का दर्द अब थोड़ा कम हो गया है। ऐसे समय में गांड के छल्ले में चुनमुनाहट सी होती है और बार-बार वहाँ घर्षण करवाने या खुजलाने की प्रबल इच्छा होती है। मैंने महसूस किया उसने अपने नितम्बों का संकोचन किया है। और ऐसा करने से मेरे लंड ने एक ठुमका सा लगाया। मुझे लगा मेरा लंड अन्दर फूल सा गया है।

कामिनी एक दो बार फिर से थोड़ा ऊपर नीचे हुई। उसने अब अपने नितम्बों को हिलाना शुरू कर दिया था। मैंने देखा उसके चेहरे पर ख़ुशी और हल्के दर्द के मिलेजुले भाव तरंगित हो रहे हैं।

ऐसी स्थिति में गांड के छल्ले के आसपास की संवेदनशीलता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। मुझे लगा इस समय कामिनी के लिए इस मीठी-मीठी जलन, पीड़ा, गुदगुदी और कसक भरी मिठास का आनन्द तो अपने शिखर पर था। वह मुंह से तो नहीं बोलेगी पर वह चाहती है कि अब पप्पू को कुछ व्यस्त किया जाए और काम पर लगा दिया जाए।

अब कामिनी ने अपना एक हाथ फिर से पीछे किया और सीधी हो गई। उसे थोड़ा दर्द तो महसूस हुआ पर अब तो पप्पू महाराज पूरा अन्दर चले गए थे। कामिनी ने अपनी गांड का संकोचन किया और फिर धीरे-धीरे ऊपर नीचे होना शुरू कर दिया।

Gand Ki Chudai

Gand Ki Chudai

मेरा रोमांच तो इस समय सातवें आसमान पर था। कामिनी की आँखें अब भी बंद थी और उसकी हल्की हल्की सीत्कारें भी निकलने लगी थी। लगता है पप्पू और गांड की अब तक पक्की दोस्ती हो गई है।

“कामिनी … अब दर्द कैसा है?”

“ज्यादा नहीं … पर गुदगुदी और चुनमुनाहट सी हो रही है।”

“एक काम करोगी … प्लीज?”

“हम्म?”

“तुम अपना एक पैर मोड़कर दूसरी तरफ करके थोड़ा घूम जाओ, फिर हम दोनों करवट के बल लेट जायेंगे तो तुम्हें और भी ज्यादा आनंद आयेगा।”

कामिनी मेरी ओर देख कर मुस्कुराने लग गई थी। लगता है उसे अपने भैया और भाभी वाली बात याद आ गई थी। और फिर कामिनी मेरे कहे मुताबिक़ हो गई। अब उसने अपनी पीठ धीरे-धीरे मेरे सीने से लगाते हुए अपने पैर सीधे कर दिए।

मैंने उसका पेट और कमर पकड़े रखा ताकि मेरा पप्पू बाहर फिसलकर धोखा ना दे दे। और फिर हम दोनों करवट के बल हो गए। कामिनी ने अपनी एक जांघ थोड़ी सी मोड़ ली थी और मैंने अपनी एक जांघ उसके दोनों टांगों के बीच कर ली।

मैं एक हाथ से उसका उरोज पकड़ लिया और उसे दबाने लगा।

मैंने धीरे से एक धक्का लगाया।

“उईईईई … आह … थोड़ा धीरे … आह …” कामिनी ने अपनी जांघ थोड़ी और ऊपर कर ली और अपने आप को थोड़ा और ढीला कर लिया।

अब तो पप्पू बिना किसी रोक-टोक और झिझक के आराम से अन्दर बाहर होने लगा था। हर धक्के के साथ कामिनी का रोमांच बढ़ता ही जा रहा था।

मैंने अपने एक हाथ से कामिनी की सु-सु को टटोला। उसके पपोटे फूलकर मोटे-मोटे से हो गए थे और उसका चीरा तो रतिरस से लबालब भर गया था। उसकी मदनमणि भी फूल कर मूंगफली के दाने जितनी हो गई थीड़ा मैंने अपनी चिमटी में पकड़ कर उसे भी थोड़ा मसलना चालू कर दिया।

अब मैंने कामिनी को पेट के बल होने को कहा। कामिनी धीरे-धीरे अपने पेट के बल औंधी हो गई और मैं उसके ऊपर आ गया। कामिनी ने अपनी जांघें जितनी चौड़ी हो सकती थी कर दी थी। अब तो पप्पू बड़े आराम से उछलकूद मचा सकता था।

कामिनी बार-बार अपने नितम्बों का संकोचन करती जा रही थी। मैंने एक हाथ से उसके उरोज को पकड़ लिया और दूसरे हाथ को नीचे कर के उसकी सु-सु को फिर से पकड़कर मसलना चालू कर दिया।

सुविधा के लिए कामिनी ने अपने नितम्ब थोड़े ऊपर उठाकर एक तकिया पेट के नीचे लगा लिया। पता नहीं यह सब फार्मूले उसे मधुर ने बताये थे या अपनी भैया और भाभी की देशी सुहागरात से प्रेरित थे।

कुछ भी कहो ऐसा करने से मेरा पूरा लंड अब कामिनी की गांड में जाने लगा था।

हर धक्के के साथ मेरा और कामिनी का रोमांच बढ़ता ही जा रहा था। मैं तो चाह रहा था यह समय रुक जाए और मैं इसी प्रकार कामिनी को अपने आगोश में लिए जिन्दगी बिता दूं।

“आह … उईई … माआअ …” कामिनी की मीठी सीत्कारें कमरे में गूंजने लगी थी।

मैंने कामिनी के कान की लोब को मुंह में ले लिया और अपनी दांतों से उसे हल्का हल्का काटने लगा तो कामिनी ने मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्ब उचकाने शुरू कर दिए।
 
कोई 10-12 मिनट के बाद मुझे लगने लगा कि मेरी उत्तेजना इस समय अपने चरम पर है और अब मेरी मंजिल करीब आने को है। मेरा मन तो उसे डॉगी स्टाइल में करके उसके नितम्बों पर कस-कस कर थप्पड़ लगाते हुए पीछे से धक्के लगाऊँ पर बाद में मैंने अपना इरादा बदल लिया।

इस डॉगी स्टाइल के चक्कर में अगर पप्पू बाहर निकल गया तो दुबारा अन्दर करने में बहुत समय और ऊर्जा की जरूरत होगी और अगर फिर से अन्दर नहीं डाल पाया तो मेरा पप्पू बाहर ही शहीद हो जाएगा। मैं कतई ऐसा नहीं चाहता था।

कामिनी की मीठी कराहें पूरे कमरे में गूँज रही थी- आह … उईइ … याआ … मैं अपना लंड सुपारे तक बाहर निकालता और फिर से एक धक्के के साथ अन्दर कर देता। उसके साथ ही कामिनी के नितम्बों से ठप्प की सी आवाज निकलती।

“आह … मेरी जान … कामिनी आज तुमने मुझे मेरे जीवन का बहुत बड़ा सुख दिया है इसे मैं जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा। अईई … मेरा … तो … निकलने … जा रहा है …”

मैंने अपने एक हाथ से कामिनी की सु-सु को मसलना चलू कर दिया और दूसरे हाथ से उसके उरोज की घुंडी को मसलने लगा। कामिनी रोमांच से उछलने लगी और उसने अपने नितम्बों का संकोचन शुरू कर दिया। उसका पूरा शरीर लरजने सा लगा था। मुझे लगा उसका ओर्गास्म भी होने ही वाला है।

इसके साथ ही कामिनी की एक किलकारी सी हवा में गूँज उठी। मुझे अपने हाथ पर चिपचिपा सा रस अनुभव हुआ। मुझे लगता है उसका भी स्खलन हो गया है।

मैंने एक जोर का धक्का लगाया और अपने लंड को पूरी गहराई तक अन्दर डाल दिया। इसके साथ ही मुझे लगा मेरा लंड कामिनी की गांड में फूलने और पिचकने सा लगा है और उससे प्रेमरस की फुहारें निकलने लगी है।

कामिनी ने अपनी गांड को जोर से भींच लिया जैसे वह इस सारे रस को अन्दर चूस लेना चाहती हो।

मैंने कसकर कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया और उसके गालों पर चुम्बनों की झड़ी सी लगा दी। कामिनी ने अपनी गांड का संकोचन जारी रखा। मेरी साँसें बहुत तेज हो गई थी और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरा लंड 8-10 पिचकारियाँ मार कर शांत हो गया। और मैं कामिनी के ऊपर पसर सा गया।

मैंने 2-3 मिनट ऐसे कामिनी को अपनी बांहों में भींचे रखा। थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिसल कर बाहर निकल गया। और कामिनी की गांड से धीरे-धीरे प्रेम रस बाहर निकाल कर उसकी सु-सु के छेद से होता हुआ नीचे तकिये को भिगोने लगा।

“आईईईई … ” अब कामिनी थोड़ी कसमसाने सी लगी थी।

“क्या हुआ?”

“मुझे गुदगुदी सी हो रही है.”

मैं कामिनी के ऊपर से उठ गया। कामिनी लम्बी लाबी साँसें ले रही थी। मैंने उसके नितम्बों पर पहले तो हाथ फिराया और फिर दोनों हाथों से उसके नितम्बों को थोड़ा चौड़ा कर दिया। उसके गांड से अभी भी सफ़ेद गाढ़ा रस निकलता जा रहा था।

अब कामिनी पलट कर बैड से उतरकर नीचे खड़ी हो गई। उसकी गांड से झरता हुआ रस उसकी जाँघों तक बहने लगा था। कामिनी अपनी टांगों को चौड़ा कर के बाथरूम में भाग गई।

मेरी निगाह अब तकिये पर पड़ी। तकिया तो 5-6 इंच के व्यास में गीला हो गया था। मुझे हंसी सी आ गई। मैं आँखें बंद करके अभी-अभी भोगे उस अनूठे आनंद के बारे में ही सोचता जा रहा था।

कोई 10 मिनट के बाद कामिनी अपने शरीर को तौलिये से ढके हुए वापस आई। अब उसकी निगाह तकिये पर पड़ी।

“ओह … यह तकिया तो खराब हो गया?” कहकर उसने मेरी ओर देखा।

“ओए भिडू … तकिया खराब नई होएला है इसकी तो किस्मत इच चमक गयेली है और अबी तो अपुन को ऐसे इच 3-4 तकियों की किस्मत चमकाने का है … क्या?” कहकर मैंने फिर से कामिनी को अपनी बांहों में दबोच लिया।

कामिनी तो आह … उईई … करती ही रह गई।

सच कहूं तो सम्भोग की यह क्रिया है ही ऐसी कि इससे मन ही नहीं भरता। आपका इस बारे में क्या विचार है? अपनी कीमती राय लिखेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी।

अथ श्री ‘ये गांड मुझे दे दे कामिनी’ सोपान इति !!!

अगले भाग में कामिनी की गोद भराई की रस्म पूरी होगी … बस थोड़ा सा इंतज़ार …

हे लिंग देव !!! आज तो तुमने सच में ही लौड़े लगा ही दिए। सुबह-सुबह कामिनी के घर से समाचार आया कि उसकी भाभी को लेबरपेन (जचगी का दर्द) शुरू हो गया है और उसे अस्पताल ले जाना होगा।

रात के घमासान के बाद कामिनी की तो उठने की भी हिम्मत नहीं थी। मैंने देखा कामिनी के चहरे पर थकान और उनींदापन सा था। उसे यहाँ से जाना कतई पसंद नहीं आया था। पर क्या किया जा सकता था कामिनी को तो घर जाना ही पड़ा।

मधुर ने उसे पांच हज़ार रुपये देते हुए यह भी कहा कि वह ज्यादा दिन उसे वहाँ नहीं रुकने देगी और गुलाबो को कहकर वहाँ अंगूर या किसी और को बुलाने के लिए बोल देगी।

मधुर के पीछे स्कूटी के पीछे बैठकर घर जाते समय उसने कातर नज़रों से मेरी ओर देखा।

मुझे लगा वह अभी रोने लगेगी।

अगले 3-4 दिन तो बस कामिनी की याद में ही बीते। मधुर तो वैसे भी आजकल सेक्स में ज्यादा रूचि नहीं दिखाती है। सितम्बर माह शुरू हो चुका है और इसी महीने के अंत तक मुझे भी ट्रेनिंग के लिए बंगलुरु जाना पड़ेगा।

कई बार तो मन करता है यह नौकरी का झेमला छोड़-छाड़कर किसी शांत जगह पर किसी आश्रम में ही रहना शुरू कर दूं।

और फिर एक अनहोनी जैसे हम सब का इंतज़ार ही कर रही थी।

कोई 3 बजे होने मधुर का फ़ोन आया।

“प्रेम! वो … वो … कामिनी के साथ एक अप्रिय घटना हो गई है.” मधुर की आवाज काँप सी रही थी।

“क … क्या हुआ? कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया?” मेरी तो जैसे रूह ही कांप उठी और मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा था।

“प्लीज एक बार आप घर आ सकते हो तो जल्दी आ जाओ.”

“ओह … कामिनी ठीक है ना?”

“आप जल्दी आ जाओ हमें कामिनी के घर चलना होगा.”

मुझे तो लगा मुझे सन्निपात (लकवा) हो गया है।

हे लिंग देव! ये क्या हो गया।

मैं ऑफिस का काम समझाकर घर पहुंचा तो मधुर मेरा इंतज़ार ही कर रही थी।

हम दोनों गुलाबो के घर पहुंचे। मधुर तो यहाँ कई बार आई भी है पर मेरे लिए यह पहला मौक़ा था। मधुर कार से उतर कर जल्दी से घर के अन्दर चली गई और मैं बाहर ही खड़ा रहा।

कोई आधे घंटे के बाद मधुर कामिनी को साथ लिए बाहर आई।

कामिनी के कपड़े अस्त व्यस्त से थे और वह बहुत घबराई हुई सी लग रही थी। मधुर उसे सांत्वना दे रही थी।

घर आने के बाद मधुर ने कामिनी से कहा- तुम हाथ मुंह धोकर कपड़े बदल लो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ। पता नहीं सुबह से कुछ खाया भी है या नहीं?

“मेली इच्छा नहीं है.” कामिनी ने कहा।

“मैंने गुलाबो को बोला भी था किसी और को बुला लो पर घर वाले तो सब बस तुम्हारी जान के पीछे पड़े हैं.”

कामिनी तो अब रोने ही लगी थी।

“ना … मेरी लाडो … अब तुम उस घटना को भूल जाओ। किसी से कुछ बताने की जरूरत नहीं है और अब मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर दुबारा वहाँ नहीं जाने दूँगी. मैंने बोल दिया है गुलाबो को।”

फिर कामिनी बाथरूम चली गई और मधुर चाय नास्ता बनाने रसोई में चली गई।

“मैं थोड़ी देर मार्किट में जाकर आता हूँ.” कहकर मैं घर से बाहर आ गया।

इस आपाधापी में शाम के 6 बज गए थे। मुझे कोई विशेष काम तो नहीं था पर अभी थोड़ी देर कामिनी और मधुर को अकेले छोड़ना जरूरी था। पता नहीं क्या बात हुई थी? कामिनी के सामने मैं यह सब नहीं पूछना चाहता था।

रात को कामिनी तो सोने चली गई और फिर मधुर ने जो बताया वो संक्षेप में इस प्रकार था।

कामिनी की भाभी के लड़का हुआ था। बच्चा कमजोर था तो उसे आईसीयू में रखना पड़ा था। डॉक्टर बता रहे थे कि नवजात को इन्फेक्शन है और साथ में पीलिया भी है। बेचारी कामिनी पहले घर का काम करती और फिर भाभी और अन्य लोगों का खाना लेकर अस्पताल के चक्कर काटती रहती है।

3-4 दिन बाद जच्चा-बच्चा घर आ गए।
 
तीन दिन बाद आज सुबह कामिनी दवाई लेने अस्पताल अस्पताल गई थी तो आते समय उसी अस्पताल में भर्ती किसी मरीज को देखने आये मोहल्ले के एक जानकार लड़के ने कामिनी को अपनी बाइक पर घर छोड़ देने के लिए कहा।

रास्ते में उसने सुनसान जगह पर उसने कामिनी के साथ छेड़-छाड़ करने की कोशिश की। कामिनी ने अपने आप को किसी तरह छुड़ाया और उसके शोर मचाने से वहाँ कुछ लोग आ गए। और फिर उस लड़के को पकड़ कर खूब पिटाई की.

और बाद में कामिनी के घरवालों को समाचार दिया तो कामिनी का बाप 8-10 लोगों को लेकर मौके पर आ गया। वह सब तो उस लड़के को जान से मार देने पर उतारू हो गए थे। इस बीच लड़के के घर वाले भी आ गए। वह लड़का बार-बार बोलता जा रहा था उसने कुछ नहीं किया। कामिनी के अस्त व्यस्त कपड़ों पर खून के दाग लगे देखकर सभी यह सोचे जा रहे थे कि जरूर इसके साथ दुष्कर्म हुआ है।

कामिनी का बाप पुलिस बुलाने पर जोर देने लगा। लड़के वाले घबरा गए थे और बीच बचाव करने लगे थे। साथ के लोगों ने समझाया बुझाया और फिर एक नेता टाइप के आदमी ने, जो लड़के वालों के साथ आया था कामिनी के बापू को एक तरफ ले जाकर कुछ समझाया। और फिर उसने लड़के वालों से एक लाख बीस हज़ार रुपये कामिनी के बाप को देने का फैसला किया कि यह मामला पुलिस तक ले जाने के बजाय यहीं निपटा दिया जाए।

चूंकि लड़की का मामला है इसलिए उसकी और परिवार की भी इज्जत की दुहाई देकर मामला वहीं रफा दफा कर दिया। बेचारी कामिनी से तो किसी ने कुछ पूछने की भी जरूरत नहीं समझी।

बाद में कामिनी ने मधुर को फ़ोन पर इस घटना की जानकारी दी। आगे की कहानी तो आप जान ही चुके हैं।

“प्रेम! इस समय कामिनी की मानसिक हालत ठीक नहीं है। उसे बहुत बड़ा सदमा पहुंचा है। तुम भी 2-4 दिन उससे कुछ मत पूछना और कहना।”

“हुम्म …” मेरे मुंह से बस यही निकला। ये कामिनी के घर वाले भी अजीब हैं।

अगले 2-3 दिन स्कूल से छुट्टी लेकर घर पर ही रही। कामिनी अब कुछ संयत (नार्मल) होने लगी है। आज सुबह मधुर स्कूल चली गई है। कामिनी ने चाय बना दी थी और हम दोनों चाय पी रहे थे। कामिनी पता नहीं किन ख्यालों में डूबी थी।

“कामिनी एक बात पूछूं?”

“अं… हाँ…” आज कामिनी के मुंह से ‘हओ’ के बजाय ‘हाँ’ निकला था।

“तुम्हारी तबीयत अब ठीक है ना?”

“हओ” उसने उदास स्वर में जवाब दिया।

“कामिनी मैं तुम्हारी मानसिक हालत समझ सकता हूँ और अब उन बातों को एक बुरा सपना समझ कर भूलने की कोशिश करो और फिर से नई जिन्दगी शुरू करो।”

कामिनी ने मेरी ओर देखा। मुझे लगा कामिनी की आँखें डबडबा आई हैं। मैं उठकर कामिनी के पास आ गया और उसके पास बैठ कर उसके सिर पर हाथ फिराने लगा। कामिनी की आँखों से तो जैसे आंसुओं का झरना ही निकल पड़ा।

“इससे अच्छा तो मैं मलर जाती।”

“ओह… तुम ऐसा क्यों बोलती हो?”

“अब मैं जी कर क्या करुँगी? किसी को मेरी परवाह कहाँ हैं, सबके अपने-अपने मतलब के हैं। पैसा मिलते ही बाप तो दारु की बोतल ले आया। मोती (कामिनी का भाई) इन पैसों से बाइक लेने के लिए झगड़ा करने लगा और अनार दवाई और घर खर्च के लिए पैसे माँगने लगी। सब मेरे बदले मिली खैरात से मजे करना चाहते हैं किसी को मेरी ना तो परवाह है और ना ही मेरे साथ हुई इस दुर्घटना का दुःख। सच कहूं तो मेरा मन तो आत्मह्त्या कर लेने का कर रहा है।” कहकर कामिनी सुबकने लगी थी।

कामिनी अपनी जगह सही कह रही थी। सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और सभी कामिनी को इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे कामिनी एक जिन्स (मंडी में बिकने वाली वस्तु) है।

“नहीं मेरी प्रियतमा… ऐसा नहीं बोलते… तुम्हारे बिना मैं और मधुर कैसे रह पायेंगे? ज़रा सोचो?”

कहकर मैंने रोती हुई कामिनी को अपने सीने से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फिराने लगा।

“अब मैंने भी फैसला कर लिया है, मैं ना तो अब घर जाऊँगी ना कभी घरवालों का मुंह देखूँगी। अगर उन लोगों ने ज्यादा कुछ किया तो मैं जहर खा लूंगी। अब मैंने भी अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीने का फैसला आकर लिया है।”

“ओह… तुम चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। मैं नहा लेता हूँ तुम आज मेरी पसंद का बढ़िया सा नाश्ता बनाओ हम दोनों साथ में नाश्ता करेंगे… शाबाश अच्छे बच्चे.” कहकर मैंने कामिनी के गालों को थपथपाया। लगता है कामिनी आज कामिनी का मूड बहुत खराब है।

नाश्ता करते समय मैंने कामिनी द्वारा बनाए पराठों की तारीफ़ करते हुए पूछा- कामिनी तुम्हें थोड़ा अच्छा तो नहीं लगेगा पर एक बात पूछूं?

“क्या?”

“वो… दरअसल उस दिन उस लड़के ने तुम्हारे साथ किया क्या था?” मुझे लगा कामिनी आनाकानी करेगी।

“मुझे इसी बात का तो दुःख है.”

“क्या मतलब?” अब मेरे चौंकने की बारी थी।

“किसी ने भी मेरे से यह जानने की जरूरत ही नहीं समझी कि हुआ क्या था?”

“ओह… क… क्या हुआ था?” मैंने झिझकते हुए पूछा।

“उस लड़के ने रास्ते में सु-सु करने के लिए एक सुनसान सी जगह पर बाइक रोकी। मुझे भी लग रहा था कि मेरा एमसी पैड सरक गया है। मुझे डर था कहीं कपड़े ना खराब हो जाए तो मैं भी झाड़ियों में सु-सु करने और पैड ठीक करने बैठ गई। मुझे क्या पता वह लड़का मुझे पीछे से देख रहा था। अचानक वह मेरे पीछे आ गया और मुझे पकड़कर अपनी ओर खींचने लगा। फिर वह मुझे पैसों का लालच भी देने लगा तो मैं जोर-जोर से चिल्लाने लगी तो वहाँ पर 3-4 आदमी आ गए मेरे अस्त व्यस्त कपड़े और नीचे के कपड़ों पर लगा खून देखकर उन्होंने समझा कि यह लड़का मेरे साथ दुष्कर्म कर रहा था। पहले तो उन लोगों ने उसे खूब मारा और फिर मेरे मोबाइल से घर वालों को फोन करके बुला लिया।”

“और वो दुष्कर्म वाली बात?”

“मैंने बताया ना उसने मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी। मैंने अपना हाथ छुड़ाकर उसे धक्का दे दिया था और सड़क की ओर भाग आई थी। वह दौड़ता हुआ मेरे पीछे आया फिर मेरे शोर मचाने से लोग आ गए थे।”

“इसका मतलब उसने तुम्हारे साथ दुष्कर्म जैसा तो कुछ किया ही नहीं?”

“किच्च…”

“क्या मधुर को तो इस बात का पता है?”

“पता नहीं … मुझे रोता हुआ देखकर दीदी ने मुझे अपनी कसम देकर कहा कि अब तुम्हें इस बारे में किसी से कोई बात नहीं करनी है, जो हुआ उसे भूल जाओ.”

“ओह…” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला।

प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मुझे मधुर के इस व्यवहार पर जरूर शक हो रहा है। मधुर तो उड़ते हुए कौवों के टट्टे (आंड) गिन लेती है तो यह बात उससे कैसे छिपी रह सकती है कि कामिनी को उस दिन महीना (पीरियड) आया हुआ था? पता नहीं मधुर के मन में क्या चल रहा है। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह है कि ना तो उसने कामिनी से दुष्कर्म के बारे में कोई सवाल किया ना ही उसे कोई दवाई या पिल्स लेने को कहा.

मैं मधुर से इन सब बातों को पूछना तो चाहता था पर बाद में मैंने अपना इरादा बदल लिया।

चलो आज 4-5 दिन के बाद कामिनी से सम्बंधित चिंता ख़त्म हो गई। मैंने आज जान बूझकर कामिनी के साथ तो कोई अन्यथा हरकत (बकोल कामिनी-शलालत) नहीं की अलबत्ता रात में मधुर को दो बार कस-कस के रगड़ा।

दूसरे दिन वह जिस प्रकार वह चल रही थी आप जैसे अनुभवी लोग अंदाज़ा लगा सकते हैं कि रात को उसके क्या हालत हुई होगी।

और फिर दूसरे दिन सुबह जब मधुर स्कूल चली गई तो कामिनी मेनगेट बंद करके सोफे पर आकर बैठ गई। मैंने प्यार से कामिनी को अपनी ओर खींचकर उसे अपनी बांहों में भर लिया।

कामिनी ने कोई आनाकानी नहीं की।

मुझे बड़ी हैरानी सी हो रही थी आज पहली बार कामिनी ने मेरे होंठों का चुम्बन लेने में पहल की थी।

“कामिनी! पिछले 8-10 दिन से तुम्हारे बिना तो यह पूरा घर ही सूना-सूना सा लग रहा था। तुम्हारे आने से रौनक फिर से लौट आई है।”

“मैं भी आपको कित्ता याद किया… मालूम?”

“मैं समझ सकता हूँ.” कह कर मैंने उसे एक बार फिर से चूम लिया और जोर से बांहों में भींच लिया। कामिनी तो उईईईई… करती ही रह गई। मेरा लंड पायजामे में उछलने लगा था। उसके गुलाबी होंठों को देखकर अपना लंड चुसवाने को करने लगा था।

“कामिनी एक बात बोलूं?”

“हम्म” कहकर कामिनी ने मेरी नाक को चूम लिया।

“तुमने अगर वो मुहांसों की दवा नहीं ली तो ये मुहांसे फिर से हो जायेंगे.” मैंने हंसते हुए कहा।

मुझे लगा कामिनी जरूर ‘हट’ बोलेगी और फिर मैंने उसके नितम्बों की खाई में हाथ फिराना चालू कर दिया।

“अब मुझे मुंहासों का कोई फिक्र नहीं है.”

“ऐसा क्यों?”

“मुझे अब कौन सी शादी करवानी है?” कहकर कामिनी जोर-जोर से हंसने लगी थी।

“ओह…”

“कामिनी क्या तुम्हारा मन प्यार करने और करवाने का बिल्कुल नहीं होता?”

“हट! प्यार करने से थोड़े ही होता है वह तो अपने आप हो जाता है?”

अब मैंने कामिनी की सु-सु के पपोटों को पकड़कर भींचना शुरू कर दिया। कामिनी की मीठी सीत्कार निकलने लगी।

“कामिनी आज मेरा मन बहुत कर रहा है तुम अपने लड्डू को अपने होंठों से प्यार करो.”

“अच्छा जी … मेरे लड्डू को इतने दिनों बाद इन होंठों की याद आई? मुझे तो लगा वह तो मेरे होंठों को भूल ही गया है.”

और फिर कामिनी मेरी गोद से उठकर सामने आ गई और मेरे पायजामे का नाड़ा खोल दिया। लंड तो किसी स्प्रिंग की तरह उछलकर खड़ा हो गया। कामिनी ने मेरे लंड को कसकर मुट्ठी में पकड़ लिया और पहले तो सुपारे पर अपनी जीभ फिराई और फिर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी।

कितने दिनों बाद उसके होंठों और मुंह का गुनगुना सा अहसास महसूस हुआ था। मुंह के अन्दर-बाहर होता लंड तो ठुमके लगाता हुआ मस्त हो गया।

थोड़ी देर चूसने के बाद कामिनी ने उठ कर खड़ी हो गई और मुझे धक्का सा देते हुए सोफे पर लेट जाने का इशारा किया। अब कामिनी मेरे ऊपर आ गई और अपनी पजामी के उपर से ही अपनी सु-सु को मेरे लंड पर घिसने लगी थी। आज तो कामिनी की यह अदा सच में ही दिल फरेब थी।

और फिर उसने अपने इलास्टिक वाली पजामी को नीचे किया और फिर से अपनी सुसु को मेरे लंड पर रगड़ने लगी। लंड जब भी उसके दाने से टकराता उसकी हलकी सी सीत्कार और किलकारी सी गूँज जाती। उसके सु-सु तो रतिरस से लबालब भर सी गई थी।

मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया- कामिनी ऐसे रगड़ने से तुम्हें अच्छा लग रहा है ना?

“किच्च…” कह कर कामिनी ने मेरे होंठों को जोर से चूम लिया।

नारी सुलभ लज्जा के कारण स्त्री कभी भी खुलकर अपनी इच्छा को प्रकट नहीं करना चाहती। यह तो उसके हाव भाव और अदाओं से ही समझना होता है।

“कामिनी प्लीज… बताओ ना?”

“हट! मुझे शर्म आती है।”

मैं कामिनी के नितम्बों की खाई में हाथ फिराता जा रहा था। अब मैं अपनी एक अंगुली उसकी गांड के छेद पर भी फिराने लगा था और साथ में उसके बूब्स भी चूसने चालू कर दिए थे। अब तक कामिनी ने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर अपनी सु-सु में सेट कर लिया था और अपने नितम्बों को ऊपर नीचे करने लगी थी।
 
“आपको एक बात बताऊँ?”

“हओ”

“वो… अंगूर दीदी है ना?”

“हम?”

“कई बार वह बहुत बेशर्म और गन्दी बातें करती है.”

“कैसे?”

“पता है क्या बोलती है?”

“क्या?”

“वो… वो… बोलती है मरद के मुंह पर अपनी सु-सु रगड़ने में बहुत मजा आता है?”

“हा… हा… हा… वो अपने आदमी के मुंह पर रगड़ती है क्या?”

“मुझे क्या पता? मुझे तो उन्होंने उस सुहागरात वाली रात को बताया था।”

“हम्म… और क्या बताया?”

“और … और …” कहते हुए कामिनी फिर से शर्मा गयी।

इस्स्स्सस…

“यार अब बता भी दो? एक तो तुम बेवजह शर्माती बहुत हो.” कहकर मैंने उसकी कमर पकड़कर अपने नितम्बों को उचकाते हुए एक धक्का लगा दिया।

“वो दीदी बोलती है… कसम से किसी मर्द के मुंह में मूतने का मजा ही कुछ और होता है। जब मूत की धार उसकी चूत से सटी हुई मर्द की जीभ से टकराती है और वो चूत के घुंडी को अपनी जीभ से सहला रहा होता है तो पूरा शरीर रोमांच से गनगना उठाता है।”

“वाह… अंगूर तो फिर खूब मजे करती होगी?”

“वो एक बात और भी बोलती है?”

“क्या?”

“हाय … छर्र-छर्र मूत की धार में लण्ड की तलवार जब अचानक से उसके बहाव को रोकने के लिए चूत में घुस जाए तो कसम से औरत को स्वर्ग जैसे आनंद की अनूभूति होती है।”

“ए कामिनी आज हम भी करें क्या?”

“हट! मुझे नहीं करना गंदा काम!”

शायद अंगूर को मेरे साथ बिताए पल बहुत याद आते होंगे। मुझे याद पड़ता है एकबार हम दोनों ने घंटों बाथरूम में नहाते हुए एक दूसरे के गुप्तांगों को चूमा और चूसा था और फिर अंगूर का तो रोमांच के कारण सु-सु ही निकल गया था। आह… उन पलों की याद और कसक आज भी मेरे जेहन में उमड़ती रहती हैं। (याद करें मेरी कहानी – अंगूर का दाना)

“एक बात पूछूं?” कामिनी की आवाज मेरे कानों के पास सुनाई दी तब मैं अपने ख्यालों से बाहर आया।

“हओ”

“ये मोरनी कैसे बनती है?”

“मोरनी…? क्या मतलब?”

“वो कालू … भैया … ने उस चिकनी को मोरनी बनाया था ना?”

“ओह… अच्छा वो…? हा… हा… हां…” मेरी हंसी निकल गई।

“कामिनी तुम कहो तो आज वैसे ही करें क्या?”

“हट! … मैं तो केवल पूछ रही थी.”

“प्लीज … आओ ना… वैसे ही करते हैं तुम्हें भी बहुत मज़ा आएगा.”

“ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना?”

“अरे नहीं मेरी जान… तुम तो सच में मोरनी की तरह मस्त हो जाओगी. मैं सच कहता हूँ मधुर तो इस आसन की दीवानी है.”

“सच्ची?”

“और नहीं तो क्या!”

कामिनी मेरे ऊपर से उठ खड़ी हुई। मैंने अपने कपड़े झट से निकाल दिए और कामिनी को भी सारे कपड़े उतारने का इशारा किया। कामिनी ने शर्माते हुए अपने पायजामे और कुर्ती को उतार दिया। शर्म के मारे उसने अपने एक हाथ से अपने उरोजों को ढकने की कोशिश की और दूसरा हाथ अपनी सु-सु पर रख लिया।

मुझे अपने नंगे बदन की ओर घूरते हुए देखकर उसने अपनी पीठ मेरी ओर कर दी। याल्लाह… उसके खूबसूरत गोल कसे हुए नितम्बों को देख कर तो मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। इतने गद्देदार और कसे हुए नितम्ब देखकर तो कोई मुर्दा भी जी उठे।

सच कहता हूँ उसके कसे हुए नितम्बों को देख कर मेरा मन करने लगा था कि उसे सोफे पर अपनी गोद में बैठाकर अपना लंड उसकी गांड में डाल दूं पर इस समय तो उसे मोरनी आसन का फितूर चढ़ा था जिसे पूरा करना जरूरी था।

मैंने झट से सिंगल सीटर सोफे की दोनों गद्दियाँ उठाकर सामने वाले सोफे पर रख दी। अब मैंने कामिनी को अपनी गोद में उठा लिया और उसे उन गद्दियों पर लेटा दिया। ऐसा करने से उसके पैर नीचे लटकने लगे। मैंने उसे अपने पैर ऊपर हवा में उठाने को कहा। कामिनी ने धीरे-धीरे अपने दोनों पैर ऊपर उठा दिए। अब मैंने कामिनी के दोनों हाथों को उसके पैरों के बीच से निकालते हुए उसे कहा कि अपने पैरों को सपोर्ट देने के लिए हाथों से अपने पैरों के पंजों को पकड़ ले।

अब तो उसकी सु-सु के मोटे-मोटे पपोटों के नीचे उसकी गांड का गुलाबी छेद नज़र आने लगा था। सु-सु का चीरा जहां ख़त्म होता है उसके एक डेढ़ इंच नीचे गांड का गुलाबी छेद और उसके चारों ओर हल्का सा बादामी रंग का घेरा सा बना था।

मैंने झुककर पहले तो उसके पपोटों पर अपनी अंगुलियाँ फिराई और फिर धीरे-धीरे उसकी गांड के छेद को सहलाने लगा। और फिर मैंने अपनी जीभ उसके चीरे पर फिराते हुए जैसे हो उसके मूलबंद (पेरीनियम) पर जीभ को फिराया तो कामिनी की अति रोमांच के कारण किलकारी सी निकल गई।

मेरा पप्पू तो झटके पर झटके से खाने लगा था। अब मैं खड़ा और एक हाथ से अपने पप्पू को पकड़ कर उसे कामिनी की फांकों और चीरे पर फिराने लगा। कामिनी की तो मीठी सीत्कारें निकलने लगी थी। चीरा तो पहले से ही रतिरस से लबालब भरा था, पप्पू को अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने में कोई दिक्कत कहाँ हो सकती थी।

मैं सीधा खड़ा था और कामिनी के पैर मेरे सीने से होते हुए मेरे कन्धों पर आ गए थे। अब मैंने थोड़ा सा झुककर एक धक्का लगाया। मुझे लगा एक ही झटके में मेरा लंड पूरा का पूरा कामिनी के गर्भाशय तक चला गया है।

कामिनी की आँखें बंद थी और होंठ लरज से रहे थे। अब मैं धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा था। हर धक्के के साथ कामिनी के नितम्बों की थिरकन बढ़ाती ही जा रही थी।

हालांकि कामिनी अपने नितम्बों से धक्के तो नहीं लगा सकती थी पर उसने अपनी सु-सु का संकोचन जरूर शुरू कर दिया था। उसकी बुर अन्दर से इतनी कस गई थी कि मुझे लग रहा था जैसे किसी ने मेरे पप्पू की गर्दन ही दबोच रखी है। जैसे ही मैं धक्का लगाता उसके नितम्ब थिरकने से लगते और थप्प की आवाज आती और उसके साथ कामिनी की मीठी आह… सी निकल जाती।

मैंने अपने हाथ नीचे करके कामिनी के उरोजों को पकड़ लिया और उसके फुनगियों को मसलने लगा। इससे तो कामिनी का उन्माद तो अपने चरम पर आ गया। अब मैंने एक हाथ से उसकी गांड का छेद टटोला। चूत से निकलता हुआ रतिरस उसकी गांड के छेद को भी गीला करने लगा था।

मैंने अपनी अंगुलियाँ उस छेद पर फिरानी शुरू कर दी और अपनी अंगुली का एक पोर उसकी गांड के छेद में डाल दिया। कामिनी थोड़ी सी उछली और उसका शरीर झटके से खाने लगा। मैंने अपने धक्कों की तीव्रता बढ़ा दी और उसके साथ ही कामिनी की किलकारी पूरे हॉल में गूँज उठी।

‘आआऐईई ईईईईई … मैं तो गईईईईई … आह… मेरे सा…जा…न्न…’

शायद कामिनी को परमानन्द मिल गया था।

मैंने कसकर कामिनी की जांघें पकड़ ली। कामिनी का शरीर अब कुछ ढीला सा पड़ने लगा था। उसने अपने घुटने मोड़ लिए थे। मैं उसके ऊपर हो गया और उसके होंठों को चूमने लगा।

मुझे लगा वह इस आसन में थोड़ी असहज सी होने लगी है। अब आसन बदलने का समय था।

“कामिनी मेरी जान आओ अब एक बार डॉगी स्टाइल में करते हैं.”

मैं कामिनी के ऊपर से उठकर खड़ा हो गया और फिर से उन गद्दियों को दुबारा सोफे पर रख दिया। कामिनी झट से सोफे पर अपने घुटनों को मोड़ कर डॉगी स्टाइल में हो गई। अब तो उसके नितम्ब खुलकर मेरे सामने थे। गांड का छेद खुलने और बंद होने लगा था जैसे मुझे निमंत्रण दे रहा हो। मेरा मन तो उसके गांड मार लेने को करने लगा था पर इस समय कामिनी अपनी चूत की प्यास बुझाने को तरस रही थी।

मैंने अपने खड़े लंड को हाथ में पकड़ कर कामिनी की पनियाई चूत के रसीले छेद पर फिर से लगाकर उसकी कमर को पकड़ लिया। मेरा आधा लंड उसके चूत में था। मैं थोड़ी देर रुक सा गया।

“आह… क्या हुआ? प्लीज… करो ना?… रूक क्यों गए? आह…” कहते हुए कामिनी ने अपने नितम्बों को पीछे धकेला।
 
मैंने कसकर कामिनी की कमर पकड़ी और एक जोर का धक्का लगाया। फच्च की आवाज के साथ मेरा लंड कामिनी की बुर के अंतिम सिरे तक जा पहुंचा और उसके साथ ही कामिनी की एक चीख सी निकल गई… आईईई… धीरे … प्लीज… आह…

अब तो लंड महाराज आराम से अन्दर-बाहर होने लगे थे। आज तो कामिनी की सु-सु ने इतना रस बहाया था कि किसी क्रीम या तेल की कोई आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई थी।

अब तो कामिनी ने भी अपने नितम्ब हिलाने शुरू कर दिए थे। मैंने अपना हाथ नीचे करके उसके मदनमणि (योनि मुकुट) को एक हाथ की चिमटी में लेकर मसलना शुरू कर दिया था और दूसरे हाथ से उसके उरोजों की घुंडियों को भी साथ-साथ मसलना चालू कर दिया।

तीन तरफ से हो रहे आक्रमण से बेचारी कामिनी अपने आप को कैसे बचा पाती। वह तो अब जोर-जोर से उछलकूद मचाने लगी थी साथ में आह… उईई… भी करती जा रही थी।

अब हमने लयबद्ध तरीके से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। हर धक्के के साथ कामिनी के नितम्ब थिरकते और नीचे उसके उरोज भी हिलते। मैं धक्के भी लगा रहा था और साथ में उसके उरोजों को भी मसलता जा रहा था। कभी-कभी उसकी बुर के दाने को भी मसल रहा था।

मैं बीच बीच में उसके नितम्बों पर हलके थप्पड़ भी लगा रहा था। थप्पड़ों से उसके नितम्ब लाल से हो गए थे। जब भी मैं उसके नितम्बों पर थप्पड़ लगाता कामिनी की एक मीठी सीत्कार सी निकल जाती।

आपको आश्चर्य हो रहा होगा ना?

कई स्त्रियों को सम्भोग के दौरान थोड़ी पीड़ा दी जाए तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है जैसे नितम्बों पर थप्पड़ लगाना उरोजों की घुन्डियाँ मसलना, गालों को दांतों से काटना और नाखूनों से हल्का खुरचना। इससे स्त्री का रोमांच और उन्माद बहुत जल्दी अपने चरम पर पहुँच जाता है और स्त्री कामातुर हो जाती है।

प्रिय पाठको और पाठिकाओ। हर कोई अपने सम्भोग और इन अन्तरंग संबंधों को एक लम्बे समय तक भोगना चाहता है। यही मन करता है कि इसी तरह हम समागम करते जाए और यह क्रिया कभी ख़त्म ही ना हो पर प्रकृति के अपने नियम भी हैं और उनके आगे आदमी मजबूर है।

अब मुझे लगने लगा था मेरा तोता उड़ने वाला है। अब तक कामिनी को दो बार ओर्गास्म हो चुका था। उसने अपने आप को ढीला छोड़ दिया था और अपना सिर नीचे करके सोफे पर लगा लिया था।

मैंने कामिनी के नितम्बों पर फिर से थपकी लगाईं और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। अब कामिनी भी जान चुकी थी कि अमृत की बारिश होने वाली है। उसने अपनी सु-सु का संकोचन शुरू कर दिया था।

और फिर उसके बाद पिछले आधे घंटे से मेरे अन्दर कुलबुलाता लावा पिंघलने सा लगा और रस की फुहारें छोड़ने लगा। पता नहीं आज कितनी पिचकारियाँ मेरे लंड से निकली होंगी हमें गिनने की फुर्सत कहाँ थी? प्रकृति ने अपना काम सम्पूर्ण कर लिया था।

मैंने झुककर कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया और उसकी पीठ और गर्दन पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। कामिनी भी आँखें बंद किये अपने प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति के आनंद को महसूस करके अपने आपको रूपगर्विता समझ रही थी।

थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया लेकिन कामिनी आँखें बंद किये लम्बी-लम्बी साँसें लेती उसी मुद्रा में बनी रही जैसे पिछले दिनों मधुर रहा करती थी। कामिनी की इस बात से मुझे बड़ी हैरानी सी हो रही थी।

साधारणतया स्खलन के बाद स्त्री को अपने गुप्तांगों अन्दर गुदगुदी सी महसूस होने लगती है और स्त्री सुलभ लज्जा के कारण भी सम्भोग के बाद स्त्री जल्दी से उठकर अपने गुप्तांगों को ढकने की कोशिश करती है। पर कामिनी तो अपने नितम्बों को ऊपर किये पता नहीं किन ख्यालों या आनंद में डूबी थी। है ना हैरानी वाली बात?

मैं कामिनी के पास सोफे पर बैठ गया। मैंने अपना एक हाथ कामिनी की पीठ पर फिराना चालू कर दिया और धीरे-धीरे उसके नितम्बों की खाई की ओर ले जाने लगा तब कामिनी चौंकी।

इससे पहले कि वह उठकर बैठती या बाथरूम की ओर भागती मैंने उसकी कमर पकड़ कर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और नीचे होकर उसके होंठों को चूम लिया।

“मेरी प्रियतमा … तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद!”

“मेरे साजन आपने भी मुझे अपने जीवन का एक अद्भुत आनंद दिया है मैं इन पलों को कभी नहीं भूल पाऊँगी।” कहकर कामिनी ने भी मेरे होंठों को चूम लिया।

“कामिनी, तुमने वो पिल्स तो ले ली थी ना?”

“अरे … आप चिंता मत करो … मैं तो रोज पिल्स लेती हूँ.”

“क… क्या मतलब?”

“दीदी ने मुझे टेबलेट्स लाकर दी हैं?”

“क… कैसी टेबलेट्स?” मेरा दिल किसी आशंका से धड़कने लगा था।

“वो बोलती है तुम्हें कमजोरी बहुत है तो रोज यह दवाई और एक टेबलेट लिया करो.”

“उसे कैसे पता कि तुम्हें कोई कमजोरी है?”

“वो उन्होंने मेरा खून ओल पेशाब टेस्ट करवाया था.”

“ओह… फिर?”

उन्होंने डॉक्टर से पूछकर मुझे पीने के दवाई और टेबलेट्स लाकर दी हैं.”

“प्लीज मुझे दिखाओ कैसी टेबलेट्स हैं?”
 
कामिनी अपने कपड़े उठाकर बाथरूम में भाग गई। वह 5-7 मिनट के बाद बाहर आई। शायद वह हल्का शॉवर लेकर आई थी। उसने जीन वाला निक्कर और लाल रंग का टॉप पहन लिया था। वह जानकर अपने नितम्बों को मटका कर चल रही थी। पता नहीं ये हसीनाएं इतने नखरे कहाँ से सीख लेती हैं।

फिर अपने कमरे में जाकर एक थैली सी उठा कर ले आई जिसमें दवाई की शीशी और गोलियों के 2-3 पत्ते थे।

ओह… मैं तो गर्भनिरोधक गोलियों की बात सोच रहा था और पर यह तो विटामिन बी और ई की गोलियां थी।

यह मधुर तो मुझे मरवाकर छोड़ेगी। अगर कामिनी गलती से भी प्रेग्नेंट हो गई तो निश्चित ही लौड़े लग जायेंगे। मैंने सोच लिया अगली बार से मैं निरोध का प्रयोग जरूर करूंगा।

“क्या हुआ?”

“ओह… हाँ.. वो.. वो…” मेरे दिमाग ने तो जैसे सोचना ही बंद कर दिया था।

“आप भी नहा लो, मैं नाश्ता बनाती हूँ.” कहकर कामिनी रसोई में चली गई।

मैं बोझिल कदमों से बाथरूम में चला आया। नहाते समय मैं मधुर के बारे में ही सोच रहा था। कुछ ना कुछ खुराफात तो मधुर के दिमाग में जरूर चल रही है। उस दिन कामिनी के घर वालों ने उसके साथ हुए दुष्कर्म के बारे में तो जरूर बताया ही होगा. पर मुझे हैरानी हो रही है कि उसने ना तो कामिनी से उस दिन की बात पर ज्यादा सवाल किये और ना ही गर्भ निरोधक पिल्स ही लेने को कहा। कमाल है? कामिनी प्रेग्नेंट हो गई तो?

हे लिंग देव! अब तो बाद तेरा ही एक सहारा बचा है।

अचानक मेरे दिमाग कि जैसे बत्ती ही जल उठी।

ओह… मैं भी निरा गाउदी ही हूँ? यह बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई? सब की नज़रों में कामिनी के साथ दुष्कर्म हुआ था और अगर अब वह गर्भवती हो भी जाती है तो इसे उसी के परिणाम स्वरूप देखा जाएगा। ओह … कहीं मधुर बेचारी इस कामिनी को इस्तेमाल तो नहीं कर रही?

पता नहीं आगे क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. पर मुझे लगा जैसे एक साथ बहुत बड़ा बोझ मेरे सिर से उतर गया है और मैं अपने आप को बहुत हल्का महसूस करने लगा हूँ। पिछले 1 महीने से मेरे दिमाग में चल रही सारी चिंताएं एक ही झटके में दूर हो गई है। अब तो बिना किसी चिंता और फिक्र के कामिनी को मर्ज़ी आये वैसे तोड़ा मरोड़ा जा सकता है।

हे लिंग देव! आज तो तेरी सच में जय हो!

मैं बाथरूम में फर्श पर बैठ गया और नल चलाकर अपने लंड को उसकी तेज़ धार के नीचे लगा दिया। मन तो कर रहा था कामिनी को पकड़ कर बाथरूम में ले आऊँ और फिर हम दोनों साथ नहायें और फिर कामिनी अपनी सु-सु को मेरे मुंह पर रगड़ने लगे तो खुदा कसम मज़ा ही आ जाए।

मेरा लंड तो इन्ही ख्यालों में फिर से झटके खाने लगा। हे भगवान्! उसके नितम्ब तो दिन पर दिन क़यामत ही बनते जा रहे हैं। उस रात तो बस एक बार ही उसने मुझे अपनी गांड का मज़ा लेने दिया था।

उस रात मेरा कितना मन था कि उसे डॉगी स्टाइल में करके उसकी गांड का मज़ा लिया जाए। मुझे लगता है कामिनी ने सुहागरात में अपने भैया को इसी स्टाइल में भाभी की गांड मारते देखा था तो उसे भी यह अनुभव ले लेने का मन तो जरूर करता होगा।

काश! आज सोफे पर कामिनी को अपनी गोद में बैठाकर अपने पप्पू को उसकी गांड में डालने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम यह जिन्दगी की सबसे हसीन यादगार बन जाए। पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लग रहा था कि अंगूर की तरह दुबारा इसकी गांड मारने का मौक़ा मुझे नहीं मिलेगा। पता नहीं मुझे आज इतनी असुरक्षा क्यों महसूस हो रही थी। किसी भी तरह आज कामिनी को इसके लिए मनाना ही पड़ेगा।

मैंने नहाने के बाद कपड़े नहीं पहने थे बस बनियान और लुंगी ही पहनी थी। जब मैं बाथरूम से बाहर आया तब तक कामिनी नाश्ता तैयार कर चुकी थी। उसने आज प्याज और हरी मिर्च डालकर बेसन के चीले बनाए थे और साथ में बढ़िया कॉफ़ी।

आजकल मधुर की अनुपस्थिति कामिनी नाश्ते के समय मेरी बगल में ही बैठ जाती है और फिर हम दोनों साथ में नाश्ता करते हैं। मैंने कामिनी को बाजू से पकड़ कर अपनी गोद में बैठा लिया। कामिनी थोड़ी कसमसाई तो जरूर पर उसने ज्यादा हील-हुज्जत नहीं की।

फिर हम दोनों ने एक दूसरे को अपने हाथों से नाश्ता करवाया। मेरा लंड बारबार ठुमके लगाने लगा था। कामिनी ने जब इसे महसूस किया तो उसने अपने नितम्बों को मेरी गोद में ठीक से सेट कर लिया।

“ये लड्डू तो हमेशा भूखा ही रहता है.” कामिनी ने हंसते हुए कहा।

“कामिनी तुम इतनी खूबसूरत हो कि मन ही नहीं भरता.” कह कर मैंने कामिनी के गालों पर एक चुम्बन ले लिया।

“हट!”

“ए जान! आओ न एक बार फिर से कर लें?”

“अभी तो किया था? ऐसे जल्दी-जल्दी करने से आपको कमजोरी आ जायेगी? अब आप ऑफिस जाओ देर हो जायेगी.”

“कामिनी प्लीज मान जाओ ना?” मैंने किसी बच्चे की तरह कामिनी से मनुहार की तो उसकी हंसी निकल गई।

“पता है मेरे से तो ठीक से चला भी नहीं जा रहा.”

“प्लीज… कामिनी यह दर्द तो बस थोड़ी देर का है पर वह आनंद तो हमें कितना रोमांच से भर देता है तुम अच्छे से जानती हो.” मैंने एक बार फिर से मनुहार की।

अब बेचारी कामिनी कैसे मना कर सकती थी।

“आप मुझे फिर से गंदा कर देंगे तो मुझे फिर नहाना पड़ेगा?”

“अरे… मेरी जान … प्रेम करने से कुछ गंदा नहीं होता.”

कह कर मैंने कामिनी को अपनी गोद में उठा लिया।

मैंने कामिनी को अपनी गोद में उठा लिया।

“ओह… रुको तो सही? मुझे कुल्ला करके हाथ तो धो लेने दो प्लीज…”

मैं कामिनी को अपनी गोद में उठाए वाशबेसिन की ओर ले आया। उसने किसी तरह हाथ धोये और कुल्ला किया। अब मैं उसे उसे लेकर आर्म्स वाले सिंगल सोफे पर बैठ गया और उसे अपनी गोद में बैठा लिया। मेरी लुंगी इस आपाधापी में खुल कर नीचे गिर गई।

“कामिनी इन कपड़ों में तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत लगते हैं। कामिनी मेरा मन इनको प्यार करने को कर रहा है.”

“ओह… उस रात मुझे बहुत दर्द हुआ था.”

“मेरी जान … पहली बार में थोड़ा दर्द होता है उसके बाद तो बस एक मीठी और मदहोश करने वाली चुनमुनाहट सी ही होती है और अगले कई दिनों तक उसकी याद रोमांचित करती रहती है.”

“प्लीज … आज रहने दो… कल कर लेना.” कामिनी ने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए कहा।

दोस्तो, यह खूबसूरत लौंडियों के नखरे होते हैं। उनकी ना में भी एक हाँ छिपी होती है।

“कामिनी प्लीज… कल तक का इंतज़ार अब मैं सहन नहीं कर सकूंगा। पता नहीं तुम्हारे रूप में ऐसी क्या कशिश है कि तुम्हें बार-बार अपनी बांहों में भरकर प्रेम करने को मन करता है। कहीं तुमने मेरे ऊपर कोई जादू तो नहीं कर दिया?” कह कर मैं हंसने लगा।

अब कामिनी के पास रूप गर्विता बनकर मुस्कुराने ले सिवा क्या बचा था।

“अच्छा आप रुको … मैं अभी आती हूँ.” कहकर कामिनी दुबारा बाथरूम में चली गई।
 
कोई 5-7 मिनट के बाद कामिनी वापस आई। उसके एक हाथ में नारियल तेल की शीशी पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से अपने अपने शरीर पर लिपटे हुए तौलिए को कसकर पकड़ रखा था। वह बेचारा तौलिया उसकी उफनती जवानी को ढक पाने में कहाँ सक्षम था, वह तो केवल उसके उरोजों और सु-सु को ही थोड़ा ढक सकता था।

मैं तो फटी आँखों से अपलक उसे देखता ही रह गया। कामिनी मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और उसने अपनी आँखें बंद कर के अपनी मुंडी झुका ली थी।

मैंने उसके तौलिये को हाथ से खींचकर हटा दिया। शर्म के मारे कामिनी ने अपने दोनों हाथों से अपनी सु-सु को ढक लिया। अब मैंने उसे अपनी गोद में बैठा लिया।

“आप तो मुझे पूरा ही बेशर्म बनाकर छोड़ोगे?”

“मेरी जान … भोजन और भोग में शर्म नहीं की जाती.” कहते हुए मैंने कामिनी की गर्दन और कानों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और उसके उरोजों को मसलना शुरू कर दिया। मेरा लंड उसके कसे हुए नितम्बों के नीचे दबा कसमसा रहा था। कामिनी जान बूझकर अपने नितम्बों से मेरे लंड को दबा सा रही थी।

“कामिनी तुम्हारा लड्डू तुम्हारे प्यार के लिए तरस रहा है मेरी जान!”

“आह… तरसने दो…” कह कर कामिनी ने एक बार अपने नितम्बों को थोड़ा सा उठाया और फिर से मेरे लंड को दबाने लगी।

“कामिनी तुम अपने पैर इस सोफे की आर्म्स पर रख लो तो आसानी होगी।”

कामिनी ने मेरे कहे अनुसार अपने पैरों को सोफे की आर्म्स पर रख लिया। मेरा लंड उछलकर उसके नितम्बों की दरार से होता हुआ आगे की तरफ निकलकर उसकी सु-सु के चीरे से लग गया था। अब मैंने पास पड़ी शीशी से तेल निकाल कर अपने पप्पू पर लगा लिया। फिर मैंने कामिनी की गांड के छेद को टटोला तो मुझे उस पर चिकनाई का अनुभव हुआ। मुझे लगता है कामिनी पूरी तैयारी के साथ आई थी। कामिनी ने अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया और मेरे पप्पू को पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर लगा लिया।

नितम्बों में बीच लंड के चुभन स्त्री को बहुत जल्दी कामतुर बना देती है। अब मैं एक हाथ से उसकी सु-सु के पपोटे मसल रहा था और दूसरे हाथ से उसके उरोजों की नुकीली फुनगियों को मसलने लगा था। साथ में उसके गालों और गर्दन पर चुम्बन की बौछारें भी चालू कर दी थी।

कामिनी तो अब उछलने ही लगी थी। मेरी जाँघों पर उसके गद्देदार नितम्बों स्पर्श पाकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अपने लैंडर रोवर को उसके ऑर्बिटर में डालने मेरी इच्छा कितनी बलवती होती जा रही थी।

“कामिनी मेरी जान… अब बेचारे पप्पू को और ज्यादा मत तरसाओ.” मैंने उसके गालों को चूमते हुए कहा।

“आह… उईइ माँ… आपने पता नहीं मेरे ऊपर क्या जादू-टोना कर दिया है? आप पूरे कामदेव हो… आआईईई…”

कामिनी का पूरा शरीर लरजने लगा था। कामिनी तो रोमांच के मारे उछलने ही लगी थी। इस समय मेरा पप्पू अपने पूरे जलाल पर था। उसका सुपारा फूल सा गया था और लंड पूरा कठोर हो गया था।

मेरा मन तो कर रहा था जैसे ही कामिनी जल्दी से थोड़ी ऊपर उठे मैं अपने पप्पू को उसकी गांड के गुलाबी छेद के ठीक नीचे लगा दूं। और जैसे ही वह नीचे आये मेरा पप्पू एक ही झटके में अन्दर चला जाए। पर अभी जल्दबाजी में ऐसा नहीं किया जा सकता था।

मैंने उसकी मदनमणि पर अपनी तर्जनी अंगुली फिरा दी।

“आआआईईई” रोमांच के कारण कामिनी की किलकारी निकल गई।

“कामिनी तुम एक बार थोड़ा सा ऊपर उठो मैं अपने पप्पू को सेट करता हूँ फिर धीरे-धीरे उस पर बैठ जाना.



“ओहो… आप रुको… तो सही… एक मिनट…” कहते हुए कामिनी ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा लिए। उसने मेरे पप्पू की गर्दन पकड़ ली और मेरे लिंगमुंड को अपनी गांड के गुलाबी छेद पर लगा लिया।

लगता है वह पहले से ही अपने आप को इस स्थिति के लिए तैयार कर चुकी थी। वह धीरे-धीरे नीचे होने लगी। एक दो बार तो लंड थोड़ा फिसला पर कामिनी ने 2-3 बार निशाना साधे हुए अपने नितम्बों को ऊपर नीचे किया तो मेरा सुपारा उसकी गांड में सरकने लगा।

ये पल कामिनी के लिए बहुत ही संवेदनशील थे। मैं दम साधे उसी तरह बैठा रहा। हाँ मैंने उसकी कमर को जरूर सहारा दिए रखा। वह थोड़ा सा रुकी और फिर धीरे-धीरे उसने अपने नितम्बों को नीचे करना शुरू कर दिया।

मेरा पप्पू उसकी गांड को चीरता हुआ अन्दर समा गया।

उसके साथ ही कामिनी की हल्की चीख सी निकल गई- उईईईईई…

मैंने कसकर उसे अपनी बांहों में भर लिया। उसने मेरी जाँघों पर हाथ रखकर थोड़ा उठने की कोशिश की पर मैंने उसे अपनी बांहों में जकड़ रखा था तो उसकी कोशिश बेकार थी। वह जोर-जोर से साँसें लेने लगी थी। उसका शरीर कांपने सा लगा था।

थोड़ी देर हम ऐसे ही बैठे रहे। कामिनी अब थोड़ा संयत हो गई थी। अब मैंने कामिनी को फिर से चूमना शुरू कर दिया। लंड अन्दर और ज्यादा कठोर होकर ठुमके लगाने लगा था।

“कामिनी तुम अपने शरीर को ढीला छोड़ दो फिर कोई दिक्कत नहीं होगी.”

“आप मेरी जान लेकर मानोगे? आह…”

“अरे नहीं मेरी जान … कोई अपनी जान कैसे ले सकता है… तुम तो मेरी जान हो… आई लव यू…”
 
कामिनी को थोड़ा दर्द तो जरूर हो रहा था पर कामिनी ने खूब सारी क्रीम और तेल अपनी गांड में लगा लिया था और मैंने भी अपने पप्पू पर ढेर सारा तेल लगा लिया था तो चिकनाई के कारण पूरा लंड झेलने में उसे ज्यादा परेशानी नहीं आई।

और अब तो वैसे भी मेरी तोतेजान की गूपड़ी इसकी अभ्यस्त हो ही गई है। कामिनी ने अपने नितम्बों का संकोचन शुरू कर दिया था। सच कहता हूँ उसकी गांड अन्दर से इतनी कसी हुई थी कि मुझे लग रहा था जैसे किसी ने मेरे पप्पू की गर्दन ही दबोच रखी है।

अब तो कामिनी ने भी अपने नितम्ब हिलाने शुरू कर दिए थे। मैं उसके गालों गर्दन पर चुम्बन लेते जा रहा था। फिर मैंने अपना हाथ नीचे करके उसकी भगनासा को उँगलियों में लेकर मसलना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से उसके स्तन के निप्पल को भी मसलना चालू कर दिया। वह तो अब जोर-जोर से उछलने लगी थी साथ में आह… उईई… भी करती जा रही थी।

मैंने उसके चीरे पर अंगुलियाँ फिरानी चालू रखी और कभी-कभी उसके मदनमणि को भी मसलता जा रहा था। अचानक मुझे लगा कामिनी की साँसें तेज होने लगी है और बुर ने संकोचन शुरू कर दिया है और उसका शरीर भी हिचकोले से खाने लगा है। और फिर अचानक उसके मुंह से एक रोमांच भरी किलकारी सी निकली और उसके साथ ही उसकी बुर ने पानी छोड़ दिया। मेरी अँगुलियों पर चिपचिपा सा पानी महसूस होने लगा।

लंड तो गांड के अन्दर बैठा अपने भाग्य को सराह रहा था। कामिनी 3-4 बार और ऊपर-नीचे उछली और फिर उसका शरीर ढीला सा पड़ गया और वह लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगी। मैंने उसे बांहों में भरे रखा और उसके गालों को चूमता रहा।

कामिनी के पैर अभी भी सोफे के हत्थे पर ही थे। उसने अपने नितम्बों को थोड़ा ऊपर कर लिया था। अब मैंने नीचे से हलके हलके धक्के लगाना शुरू आकर दिया था। कामिनी की मीठी सित्कारें निकलने लगी थी।

कोई 8-10 मिनट के बाद मुझे लगा कामिनी थोड़ा थक सी गई है। पर मेरी ख़ुशी के लिए हर दर्द सहन कर रही है।

“कामिनी मेरी जान… अब दर्द तो नहीं हो रहा ना?”

“दर्द तो इतना नहीं है पर मेरे पैर दुखने लगे हैं?”

“तुम अपने पैर नीचे रख लो फिर आराम मिलेगा.”

कामिनी ने धीरे-धीरे अपने पैर नीचे जमीन पर कर लिए। ऐसा करने से उसकी गांड का छेद बहुत ही कस गया था और अब धक्के नहीं लगाए जा सकते थे। बस उस आनंद को महसूस किया जा सकता था कि मेरा पूरा लंड कामिनी के अन्दर समाया हुआ है। उसकी मखमली जांघें मेरी जाँघों से सटी हुई थी।

“एक… बात बोलूं?” कामिनी ने शर्माते हुए कहा।

“हम्म?” मैंने कामिनी की कांख पर जीभ फिराते हुए कहा।

“वो… वो…”

ईइईस्सस्स स्सस… कामिनी की यह शर्माने की आदत तो मेरा कलेजा ही चीर देगी।

“प्लीज बोलो ना?”

“वो डॉगी स्टाइल में हो जाऊं क्या?”

“अरे वाह… मेरी जान… तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली? नेकी और पूछ-पूछ?”

“ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना?”

“अरे मेरी जान … तुम्हारे भैया की तरह मैं कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ? तुम चिंता मत करो.”

मेरे ऐसा कहने पर कामिनी ने मेरी गोद से उठने का प्रयास किया तो मैंने उसके कमर पकड़ते हुए उठने से मना कर दिया। मैं जानता था एक बार अगर मेरा लंड बाहर निकल गया तो वापस डालने में बड़ी दिक्कत हो सकती है। इसलिए लंड अन्दर डाले हुए ही कामिनी को डॉगी स्टाइल में करना ठीक रहेगा।

“कामिनी मैं तुम्हें कमर से पकड़ कर गोद में उठाता हूँ फिर हम धीरे-धीरे बड़े वाले सोफे पर शिफ्ट हो जाते हैं. पर आराम से, जल्दबाजी मत करना!”

“हओ”

कामिनी को अपनी गोद में उठाये हुए मैं बड़े वाले सोफे की ओर आ गया। कामिनी ने अपने घुटने मोड़ दिए और डॉगी स्टाइल में हो गई। लंड थोड़ा तो बाहर निकला था पर आधा तो अन्दर ही फंसा रहा था।

मैं फर्श पर खड़ा हो गया और कामिनी ने अपना सिर सोफे पर टिका दिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब अब खुलकर मेरे सामने नुमाया हो गए। उसकी गांड का गुलाबी छल्ला तो ऐसे लग रहा था जैसे किसी छोटे बच्चे की कलाई में कोई चूड़ी फंसी हुई हो। मैं तो बस उसे देखता ही रह गया।

कामिनी के नितम्ब अब भी लाल से लग रहे थे। थोड़ी देर पहले जब हमने इसी मुद्रा में सेक्स किया था उस समय मैंने कामिनी के नितम्बों पर थप्पड़ लगाये थे उनकी लाली अभी भी बरकरार थे।

मैंने प्यार से उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू किया और फिर हल्का सा धक्के लगाया।

“आईईई …” कामिनी की मीठी सीत्कार निकल गई।

गांड के अन्दर-बाहर होता लंड तो किसी पिस्टन की तरह लग रहा था। कामिनी ने एक बार अपनी गांड का संकोचन किया। इस अदा से मेरा लंड तो निहाल ही हो गया।

कामिनी ने अपना एक हाथ पीछे कर के मेरे लंड को टटोला और फिर अपनी गांड के छल्ले पर अंगुलियाँ फिराई। शायद वह यह जानना चाहती थी कि मेरा इतना बड़ा और मोटा लंड वास्तव में ही गांड के अन्दर चला गया है।

खैर उसका जो भी सोचना था पानी जगह था पर मेरे रोमांच का पारावार ही नहीं था। कई बार मैंने मधुर के साथ भी इसी मुद्रा में कई बार गुदा मैथुन किया है पर कामिनी की कसी हुई गांड तो वास्तव में ही लाजवाब है।

मुझे लगता है वो ऑफिस वाला नताशा नाम का जो मुजसम्मा है उसकी गांड भी कामिनी की तरह बहुत ही खूबसूरत और कसी हुई होगी। जिस प्रकार वह अपने नितम्बों को मटकाकर चलती है लगता है उसे भी अपने नितम्बों की खूबसूरती का अहसास जरूर है। काश! एक बार उसकी गांड मारने को मिल जाए तो मज़ा आ जाए। मेरा तो मन करता है उसे बाथरूम में घोड़ी बनाकर एक ही झटके में अपना पप्पू उसकी गुलाबी गांड में डाल दूं।

कितना अजीब सी बात है ना? पुरुष और स्त्री की मानसिकता में? पुरुष एकाधिकारी बनाना चाहता है उसका प्रेम बस किसी वस्तु या सुन्दर स्त्री को प्राप्त के लेने से पूर्ण हो जाता है जबकि स्त्री अपने प्रेम को दीर्घायु बनाना चाहती है। जब तक मुझे कामिनी की चूत और गांड नहीं मिली थी तब तक मैं उसके लिए जैसे मरा ही जा रहा था और जब कामिनी मुझे अपना सब कुछ सोंप कर पूर्ण समर्पिता बन गई है मेरा मन फिर से किसी ओर की तरफ आकर्षित होने लगा है।

“क्या हुआ?” मैं कामिनी की आवाज सुनकर चौंका।

“ओह… हाँ…” मैं अपने ख्यालों से वापस हकीकत के धरातल पर आया।

मैंने उसकी कमर पकड़ कर फिर से धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। कामिनी की फिर से मीठी किलकारियां निकलने लगी थी। मैंने थोड़ा सा तेल अपने लंड पर और उंडेल लिया था. अब तो पप्पू महाराज हंसते हुए अन्दर बाहर होने लगे थे।
 
मैंने अब अपना हाथ नीचे किया और उसके उरोजों को भी मसलना चालू कर दिया। दूसरे हाथ से उसकी सु-सु के मोटे मोटे पपोटों और फांकों को मसलना चालू कर दिया। अपनी अँगुलियों पर चूत से निकला चिपचिपा सा तरल लेप सा महसूस करने से मुझे लगा कामिनी का एक बार फिर से स्खलन हो गया है।

हमें 15-20 मिनट तो हो ही गए थे कामिनी की सु-सु को मसलना चालू रखा। अब तक कामिनी की गूपड़ी ने पप्पू से पक्की दोस्ती कर ली थी। अब मैं भी अपनी अंतिम मंजिल पा लेना चाहता था।

“कामिनी मेरी जान … अब मेरा प्रेम बरसने वाला है क्या तुम तैयार हो?”

“आह… हाँ… मेरे साजन… अपनी इस रानी को पटरानी बना दो.”

और फिर मेरे लंड ने पिचकारियाँ मारनी शुरू कर दी। कामिनी ने पूरा साथ दिया और मेरे पूरे वीर्य को अपने अन्दर सहेज लिया। मैं कामिनी की पीठ से चिपक गया था।

अब कामिनी ने अपने पैर सीधे करके नीचे कर लिए थे। थोड़ी देर में मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया। कामिनी की गांड का छल्ला भी धीरे-धीरे संकोचन करता सिकुड़ता गया और उसमें से गाढ़ा वीर्य निकल कर उसकी मोटी-मोटी फांकों और चीरे को भिगोने लगा था।

मैं अब सोफे पर बैठ गया था। कामिनी भी सरक कर उकड़ू सी होकर फर्श पर बैठ गई और अपनी मुंडी झुकाकर नीचे देखने लगी। शायद वह अपनी गांड की हालत और उससे निकलते रस को देख रही थी।

मेरा मन भी उस दृश्य को देखने का कर रहा था पर मुझे लगा शायद कामिनी को यह अन्तरंग बात पसंद नहीं आएगी। मैंने कामिनी का सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।

कामिनी तो उईईई… करती ही रह गई।

और फिर अगले 8-10 दिन हमने लगभग रोज ही इस आनंद अलग-अलग आसनों में भोगा। कभी बाथरूम में, कभी रसोई में, कभी इसी सोफे पर और कभी नंगे फर्श पर।

अब तो कामिनी मेरे लंड की मलाई पीने को में भी माहिर सी हो गई है।

भगवान् ने हर प्राणी मात्र में काम भावना को कूट-कूट कर भरा है और उसमें इतना माधुर्य और आनंद भरा है कि इसे कितना भी भोग लें पर मन कभी नहीं अघाता (भरता)।

बीच-बीच में मधुर ने भी अहसान सा दिखाते हुए अपना पत्नी धर्म निभाती रही। हेड ऑफिस से मेल आ गया था कि मुझे अब थोड़े ही दिनों में ट्रेनिंग के लिए बंगलुरु पहुँचना होगा।

आज मधुर की शायद छुट्टी थी। जब मैं शाम को ऑफिस से घर आया तो कामिनी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। बाद में मधुर ने बताया कि कामिनी की तबियत ठीक नहीं है। उसे थोड़ा बुखार सा भी है और पेट गड़बड़ी की वजह से जी मिचलाता है।

सुबह मैंने भी देखा तो था कामिनी वाश-बेसिन पर जब हाथ मुंह धो रही थी तो उसे उबकाई सी आई थी। पर उस समय मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।

रात को मधुर ने जी भर के चुदवाया। आज तो उसने मेरे ऊपर बैठ कर अपनी मुनिया को मेरे मुंह पर भी रगड़ा और मेरे लंड को भी कई महीनों के बाद चूसा था। और फिर हमने सारी रात पति पत्नी धर्म निभाया।

और फिर दूसरे दिन मधुर ने शाम को खुशखबरी सुनाई कि उसकी मनोकामना सिद्ध हो गई है और वह पेट से रह गई है। चलो 8-9 महीने की कठोर तपस्या का फल लिंग देव ने आखिर दे ही दिया।

मधुर ने अपने भैया-भाभी और रिश्तेदारों को भी यह खुशखबरी सुना डाली थी।

और फिर अचानक रात को कोई 9 बजे उसकी मुंबई वाली ताईजी का फ़ोन आया। ताऊजी की तबियत बहुत खराब है उनको फिर से हार्ट की परेशानी हो गई है। मधुर तो रोने ही लगी थी।

किसी तरह उसे समझाया कि तुम मुंबई जल्दी से जल्दी चली जाओ।

वह तो मुझे भी साथ ले जाना चाहती थी पर मेरी ऑफिस की मजबूरी थी।

और फिर मधुर के कहने पर मैंने अगले दिन सुबह ही हवाई जहाज के दो टिकट बुक करवा दिए। मुझे हैरानी हो रही थी मधुर ने दो टिकट मधुर माथुर और मधु के नाम से बुक करवाने को कहा था।

मधुर तो अपने साथ कामिनी को ले जाने वाली थी. यह मधु का क्या चक्कर है? मेरी समझ से परे था.

मुझे हैरानी हो रही थी. भरतपुर से सीधी उड़ान तो नहीं थी पर आगरा तक टेक्सी से और फिर वहाँ से मुंबई के लिए सीधी उड़ान थी।

दोस्तो! नियति के खेल बड़े अजीब होते हैं। आदमी अपने आप को कितना भी गुरु घंटाल या बुद्धिमान समझे भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता। आगरा तक मैं भी मधुर के साथ गया और उन दोनों को एअरपोर्ट छोड़कर मैं वापस आ गया। मैंने मधुर को गले लगाकर विदा किया।

मधुर ने कामिनी की ओर इशारा किया तो कामिनी झिझकते हुए मेरे पास आई और वह भी मेरे गले लग गई। उसके चेहरे को देख कर लग रहा था वह अभी रो पड़ेगी।

पास में खड़े एक आदमी के मोबाइल पर कॉलर ट्यून बज रही थी:

लग जा गले से फिर ये हसीं रात हो ना हो!

शायद इस जन्म में फिर मुलाक़ात हो ना हो!

फिर मधुर बोली- प्रेम! 10-5 दिन की बात है मैंने गुलाबो को कुछ पैसे भिजवा दिए हैं और उससे बात कर ली है. सानिया रोज घर की सफाई कर दिया करेगी और खाना-नाश्ता भी बना दिया करेगी।

मुंबई पहुँच कर मधुर ने फ़ोन पर बताया कि ताऊजी को अस्पताल में भर्ती करवा दिया है। भैया भी जयपुर से कल सुबह आ रहे हैं। अब चिंता की बात नहीं है पर 2-3 महीने उसकी देखभाल के लिए वहाँ रहना पड़ेगा।

ताई जी ने कई बार मुझे भी मुंबई में आकर अपने ताऊ जी का कारोबार संभालने के लिए कहा है पर इस नौकरी को छोड़कर मुंबई जाने से थोड़ा हिचकिचा सा रहा था।

ऑफिस में अभी मेरी जगह नए आदमी ने ज्वाइन नहीं किया है, उसके ज्वाइन करने के बाद ही मैं बंगलुरु जा सकूंगा।

कामिनी के जाने के बाद मेरी हालत का अंदाज़ा आप लगा सकते हैं। मेरा किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था। बस अब तो नताशा नाम के उस नए मुजसम्मे का ही सहारा बचा था।

नताशा आजकल बहुत खुश नज़र आ रही है। मेरे कहने पर उसकी भी 10 दिनों की छुट्टी मंजूर हो गई है और वह रोज पूछती है कि साथ में क्या क्या बनाकर ले चलूँ? आपके रहने की व्यवस्था कहाँ होगी? मैं आपसे मिलने जरूर आऊँगी।

उसकी आँखों में अजीब सा नशा दिखाई देता है और वह बार बार कोई ना कोई बहाना लेकर मेरे केबिन में आने का प्रयास करती है। कई बार तो अपने घर से खाना और मिठाई भी लेकर आती है।

साधारण लड़कियां करियर बनाने के लिए मन लगाकर खूब पढ़ती हैं और खूबसूरत लड़कियां मजे करती हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कोई ना कोई उल्लू का पट्ठा उनके लिए डॉक्टरी या इंजीनियरिंग कर रहा है।

नताशा के बारे में मुझे बाद में पता चला कि उसके वाला कबूतर (उल्लू का पट्ठा) विद्युत निगम में किसी तकनीकी पद पर है और बिजली के खम्बे की तरह दुबला पतला है।
 
अब नताशा के गदराये बदन को संभालना उस बेचारे के लिए कहाँ संभव था।

मैंने देखा नताशा की आँखों के नीचे हल्का सा सांवलापन सा नज़र आता है। अक्सर सेक्स में असंतुष्ट और ज्यादा आत्म रति (मुट्ठ मारने) करने से ऐसा हो जाता है।

और आज शाम को संजीवनी बूटी मतलब मेरी बंगाली पड़ोसन संजया बनर्जी सुहाना को लेकर घर आ पहुंची। मैं तो उन दोनों को अपने घर के दरवाजे पर देख कर चौंक ही पड़ा। सुहाना ने सफ़ेद रंग का छोटा निक्कर और लाल रंग का टॉप पहन रखा था।

हे भगवान्! यह तो इन 2-3 महीनों में ही कलि से खिलकर फूल बन गई है। डोरी वाले टॉप में उसके चीकू तो अब रस भरे अनार जैसे लगने लगे है। गोरी शफ्फाक जांघें देख कर तो मेरा दिल हलक के रास्ते बाहर ही आने को करने लगा था।

“आ… आइए मैम!”

“माथुर साहब! आपसे एक काम था.”

“ओह … आइए अन्दर तो आइए!”

“वो मिसेज माथुर दिखाई नहीं दे रही?”

“ओह … हाँ वो 5-7 दिन के लिए मुंबई गई हुई हैं.”

“ओह … आपको खाने-पीने की बड़ी दिक्कत होती होगी. आप हमारे यहाँ खाना खा लिया करें।” संजीवनी बूंटी ने जिस अंदाज़ में यह प्रस्ताव रखा था मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।

मेरे निगाहें तो बस सुहाना को ही घूरती जा रही थी। छोटे से निक्कर में फंसे उसके नितम्ब तो कामिनी से भी ज्यादा कसे हुए लग रहे थे और उसकी जांघें तो बस मुझे छू लेने का निमंत्रण सा देने लगी थी। मैं तो बस अपने होंठों पर जबान ही फिराता रह गया।

“ओह … थैंक यू! बताइए आपकी क्या सेवा करूँ?”

“वो दरअसल सुहाना का एक प्रोजेक्ट है.”

“कैसा प्रोजेक्ट?”

जैसे किसी अमराई में कोई कोयल कूकी हो या किसी ने जलतरंग छेड़ दिया हो। कितने बरसों के बाद निशा जैसी (दो नंबर का बदमाश) मधुर आवाज सुनी थी।

हे भगवान् … इसके गुलाबी रंगत वाले संतरे की फांकों जैसे होंठ और मोटी-मोटी आँखें और कमान की तरह तनी काली घनी भोंहें उफ्फ्फ … क़यामत जैसे मेरे सामने बैठी मुझे क़त्ल करने पर आमादा हो।

“ओह … बहुत खूबसूरत … आई मीन बहुत बढ़िया प्रोजेक्ट है. श्योर मैं हेल्प कर दूंगा।”

“इसे आपके ऑफिस में भेजूं या आप यहीं इसे गाइड कर देंगे?” संजया ने पूछा.

“कक्क … कोई बात नहीं, इसे दिन में ऑफिस भेज दें और शाम को एक घंटे घर भी आप कहेंगी तो मैं हेल्प कर दूंगा पर … इसे मेहनत बहुत करनी पड़ेगी.”

“हा … हा … हा … शी इज क्वाइट हार्ड वर्किंग एंड सिरियस गर्ल!” संजया ने हंसते हुए कहा।

हे भगवान् संजया के गालों पर पड़ने वाले गड्ढों को देखकर तो मेरा पप्पू पैंट में कसमसाने ही लगा था।

“आपके लिए चाय बना देता हूँ?”

“अरे नहीं आप अकेले हैं परेशानी होगी? आप हमारे यहाँ चलें वही चाय पीते हैं और प्लीज मना मत करना आज का खाना भी आपको हमारे साथ ही खाना पड़ेगा।”

अब इतनी प्यार भरी मनुहार को नकारना मेरे लिए कितना मुश्किल था।

प्रिय पाठको और पाठिकाओ!

इस समय आप मेरी हालत और परिस्थितियों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इस समय मैं जिन्दगी के दोराहे पर नहीं चौराहे पर खड़ा हूँ। एक तरफ नौकरी और घर गृहस्थी है और दूसरी तरफ नताशा नामक मुजसम्मा है, तीसरी ओर सानिया और चौथे रास्ते पर संजीवनी बूटी सुहाना को अपने साथ लिए खड़ी मुझे आमंत्रण दे रही हैं।

मेरे तो कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ?

अगर आप इस सम्बन्ध में अपनी कीमती राय लिखेंगे तो प्रेमगुरु को अपनी जिन्दगी का अहम् फैसला लेने में बड़ी सहायता मिलेगी।

विदा मित्रो! आप सभी ने इस लम्बी कहानी कहानी को धैर्यपूर्वक पढ़ा उसके लिए आप सभी का हृदय से आभार। मैं अपने उन पाठकों की भी क्षमा प्रार्थी हूँ जिनको इस कहानी की लम्बाई को लेकर शिकायत रही थी। मुझे विश्वास है प्रेमगुरु की इस कहानी को आप तक पहुंचाने के मेरे इस छोटे से प्रयास के बारे में अपनी राय जरूर देंगे।

धन्यवाद सहित
 
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