मैं सोच रहा था मेरी सुहाना नामक फुलझड़ी चोकलेट खाते समय मेरे बारे में जरूर सोचेगी। वह पैकेट मैंने सोफे के पास रखी मेज पर रख दिया।
अब मैंने हाल में नज़र दौड़ाई। हॉल में मध्यम रोशनी थी। घर ठीक ठाक ढंग से सजाया हुआ था। सामने वाली दीवाल पर सुहाना का बड़ा सा पोस्टर लगा था।
याल्ला … उसने एक हाथ में टेनिस का रैकेट और दूसरे हाथ में ट्रॉफी पकड़ी हुई थी। छोटी सी स्कर्ट में झांकती उसकी मखमली जांघें और तंग सी शर्ट में दबे फंसे गोल उरोज तो जैसे क़यामत ही ढा रहे थे। हे भगवान्! अपनी जवानी के दिनों में यह लैला भी इतनी ही खूबसूरत रही होगी।
सामने ही शो केस में कई ट्रॉफियाँ रखी हुई थी। और 3-4 फ्रेम की हुई हाथ से बनी पेंटिंग्स भी रखी थी। वैसे भी बंगाली औरतें कलाकार और हुनरमंद होती हैं, मुझे लगता है यह पेंटिंग जरूर लैला ने ही बनाई होगी।
डाइनिंग टेबल पर बहुत से बर्तन और हॉटकेस रखे लग रहे थे। लगता है लैला ने आज बहुत से चीजें बना डाली हैं।
थोड़ी देर में वह ट्रे में रखे दो गिलास लेकर आ गई।
“डिनर बाद में करते हैं पहले आपको रेल्ली सिंह का स्पेशल बादाम शरबत पिलाती हूँ। पता है यह शरबत कोलकता से मंगवाया है.” लैला तो आज खूब चहक रही थी।
“ओह … थैंक्स!”
शरबत वाकई लाजवाब था। शरबत पीते समय मैं सोच रहा था काश! इसका असली दूध वाला शरबत पीने को मिल जाए तो खुदा कसम यह जिन्दगी जन्नत बन जाए।
“आपका शरबत तो वाकई बहुत ही लाजवाब है।” मैंने तारीफ़ करते हुए कहा।
“और लाऊँ?”
“अरे नहीं … थैंक यू।”
“सॉरी … मैंने डिनर में आपकी पसंद तो पूछी ही नहीं?”
“अरे कोई बात नहीं हम लोग तो बस जो भी मिल जाए खा लेने वाले इंसान हैं, ज्यादा नखरे नहीं करते।“ मैंने हंसते हुए कहा।
“मैंने आज अपने हाथों से आपके लिए बंगाल की स्पेशल लुच्ची और शुक्तो बनाया है और साथ में खिचुरी और बंगाली मिष्ठी पुलाव भी बनाया है। आपको जरूर पसंद आएगा।”
लुच्ची नाम सुनकर मुझे हंसी सी आ रही थी।
मैंने कहा “अरे … आपने बहुत कष्ट किया? क्या जरूरत थी इतनी चीजों की?”
“अपनों के लिए कोई कष्ट थोड़े ही होता है?” मेरी सेक्सी पड़ोसन की मुस्कान तो कातिलाना ही थी।
दोस्तो! मुझे लगता है डिनर तो बस बहाना था। जिस प्रकार उसने डिनर में इतनी चीजें बनाई थी और मनुहार कर रही थी, लगता है शायद लैला आज जैसे मौके की तलास में ही थी।
हम लोग डिनर करने डाइनिंग टेबल पर आ गए। लैला मेरे बगल में ही बैठ गई।
लैला ने पास में रखी 2 मोमबत्ती की ओर इशारा करते हुए मुझे उन्हें जलाने के लिए कहा।
ओह … तो लैला … जान ने तो आज कैंडल लाईट डिनर करने का मूड बना रखा है। साथ में उसने मधुर संगीत भी लगा दिया था।
मैंने गौर किया दोनों मोमबत्तियों के नीचे अंग्रेजी के एस और पी (S+P) की आकृति बनी हुई थी। लैला की यह कारीगरी तो वाकई काबिले तारीफ़ थी।
लैला ने खाना बहुत बढ़िया बनाया था। उसने कई और भी अल्लम-पल्लम चीजें चीजों के साथ बंगाली मिठाइयाँ भी बनाई थीं। और सबसे बड़ी बात तो यह यही कि जिस प्रकार वह डाइनिंग टेबल पर मेरे बिल्कुल पास बैठी मनुहार कर रही थीं मुझे लगता है आज बस आज की रात क़यामत आने ही वाली है।
हम डिनर करते जा रहे थे और साथ में बातें भी करते जा रहे थे।
“पता है बनर्जी साहेब तो मीठा बिल्कुल नहीं खाते.”
“अरे क्यों?”
“शूगर के कारण डॉक्टर्स ने मना कर रखा है।” कहकर उसने मेरी ओर देखा।
“ओह … आई एम सॉरी!”
प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आप तो बहुत गुणी और अनुभवी हैं। आप तो जानते ही हैं शूगर के कारण ज्यादातर पुरुष अपनी पौरुष क्षमता खो देते हैं।
“और पता है सुहाना भी मीठा बहुत कम खाती है.”
“अच्छा?”
“वह ज्यादा ही फिगर कोंशियस है।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
“तभी आपकी तरह बिल्कुल स्लिम ट्रिम है। लगता ही नहीं आपकी बेटी है ऐसा लगता है जैसे आपकी छोटी बहन हो.”
मेरी बात पर पहले तो वह खिलखिला कर हंसने लगी और फिर किसी नव-विवाहिता की तरह लजा गई।
“एक बात बोलूँ?”
“हाँ … श्योर?”
“मिसेज माथुर ने भी फिगर बहुत अच्छा मेन्टेन किया हुआ है?” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।
तेज साँसों के साथ उसकी आँखों में लाल डोरे से तैरने लगे थे और कानों की लोब और उसका ऊपरी हिस्सा तो जैसे रक्तिम हो चला था।
“ओह … हाँ … ओके … पर आप भी मुझे प्रेम के नाम से हे संबोधित किया करें प्लीज!” मैंने मन में सोचा मेरी जान मैं तो मैं तो आज जया नहीं जानेमन बोलने के मूड में हूँ।
“हा … हा … हा … ओके …” उसने रहस्यमयी मुस्कान के साथ तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखते हुए कहा।
“आप मिसेज माथुर को मिस नहीं करते क्या?”
“हाँ मिस तो बहुत करता हूँ. पर मजबूरी है.”
“आपकी शादी को कितने साल हुए हैं?”
“10-12 साल होने को आए हैं.”
“अच्छा? पर आप दोनों को देखकर ऐसा लगता ही नहीं। आप दोनो तो ऐसे लगते हो जैसे शादी को 2-3 साल ही हुए हैं.” कहते हुए वह फिर हंसने लगी।
“थैंक यू ! वैसे आप भी 25-26 की ही लगती हैं। आपने तो अपनी फिगर बहुत अच्छे से मेन्टेन किया हुआ है। ऐसा लगता है जैसे कॉलेज गर्ल हों.”
“ओह … थैंक यू प्रेम जी!” अपनी तारीफ़ पर वह खिलखिला कर हंसने लगी पर बाद में कुछ संजीदा (सीरियस) होते हुए बोली- पर ऐसी फिगर का क्या फ़ायदा?
“क्यों … ऐसा क्या हुआ?”
“मैं तो बनर्जी साहब को बोल-बोल कर तक गई कि किसी ढंग के डॉक्टर से दवाई लें और एक्सरसाइज भी किया करें पर वो मानते ही नहीं.” कहते हुए वह उदास सी हो गई।
“ओह … आप हौसला रखें. किसी अच्छे डॉक्टर से भी जरूर सलाह लें.” अनायास मेरा हाथ उसके हाथ के ऊपर चला गया।
उसने अपना दूसरा हाथ मेरे हाथ पर रख दिया और सिर झुका लिया।
मुझे लगा उसकी आँखें छलकने लगी हैं। ये औरतें भी कितनी जल्दी आँखों से आँसू निकालने लग जाती हैं।
“ओह … आई एम सॉरी! ज … जया जी!”
मेरी हालत का अंदाज़ा आप लगा सकते हैं। जिस प्रकार उसने मेरे हाथ को पकड़ रखा था, मैं अगर छुड़ाने की कोशिश करता तो यह बेहूदगी (अभद्रता) ही होती।
मैं दूसरे हाथ से उसकी पीठ थपथपाते हुए उसे हौसला दिया।
हमने डिनर लगभग ख़त्म कर लिया था और मैं उठने का उपक्रम करने की सोच ही रहा था। अब वह थोड़ी नार्मल हो गई थी।
“अरे आपने तो ये सोन्देश और रोसोगुल्ला तो लिया ही नहीं?”
“बस … बस … मैं भी मिठाई ज्यादा नहीं खाता.”
“नहीं … नहीं आपको रोसोगुल्ले का यह एक पीस तो मेरे कहने पर लेना ही होगा. पता है यह कोलकता का स्पेशल रोसोगुल्ला है.” कहते हुए उसने अपने हाथ में रसगुल्ला लेकर मेरे मुंह में डालने लगी।
मैं ना … ना … करते ही रह गया और इस आपाधापी में थोड़ा रस मेरे कुर्ते पर और कुछ उसके गाउन पर भी गिर गया।
“ओह … सॉरी? आपके कपड़े खराब हो गए … आइये मैं साफ़ कर देती हूँ … आई एम सॉरी.” कहते हुए वह उठ खड़ी हुई और मुझे भी बाजू से पकड़कर वाशबेसिन की ओर ले आई।
हे लिंगदेव! मेरा तो पूरा बदन ही जैसे गनगना उठा था। गला सूखने लगा और कानों में सीटियाँ सी बजने लगी थी.
और लंड महाराज तो जैसे आज पायजामा फाड़कर बाहर आने को उतारू होने लगे थे।
लैला तो बस तिरछी नज़रों से मेरे लंड की ओर ही देखे जा रही थी। साली इन अनुभवी औरतें को पुरुषों को रिझाने और इश्क की आग को भड़काने का कितना बढ़िया हुनर आता है।
वाश बेसिन के पास लगे टॉवल स्टेंड से तौलिया लेकर उसे पानी में भीगोकर उसने मेरे कुर्ते को साफ़ करना शुरू किया। मेरा लंड तो झटके पर झटके खाने लगा था और दिल की धड़कने और साँसें ऐसे चल रही थी जैसे किसी लोहार की धोंकनी हो।
आप मेरी हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं। उसकी गर्म और महकती साँसें तो मैं अपने चहरे और सीने पर साफ़ महसूस कर सकता था। मेरे तो कानों में तो जैसे सीटियाँ सी बजने लगी थी।
मैंने झिझकते हुए कहा- ओह, आप रहने दें मैं कर लूंगा प्लीज!
रस थोड़ा मेरे कुर्ते पर सीने वाली जगह और पेट के नीचे वाली जगह पर (पायजामे के नाड़े के नीचे) पर भी लग गया था।
थोड़ा रस उसके गाउन पर भी गिर गया था अब वह अपने गाउन को साफ़ करने लगी। जिस अंदाज़ में वह नेपकिन को अपने गले पर लगाकर साफ़ कर रही थी उसके गुदाज़ उरोजों की गोलाइयां तो मेरे ऊपर जैसे बिजलियाँ ही गिराने लगी थी। उसकी तनी हुई घुन्डियाँ तो ऐसे लग रही थी जैसे कह रही हों ‘हमें मुंह में लेकर सारा दूध पी जाओ।’
“अरे आपके कुर्ते पर तो और भी रस लगा है?” कहते हुए उसने फिर से टोवल को पानी में डुबोकर मेरे कुर्ते के नीचे वाले हिस्से पर रगड़ने लगी।
मेरा लंड तो जैसे किलकारियां ही मारने लगा था। मुझे लगता है उसे मेरे खड़े लंड का अंदाज़ा तो हो गया है।
उसने बिना झिझके 3-4 बार जोर-जोर से मेरे लंड के ऊपर से मेरे कुर्ते को पौंछा। लंड तो जैसे अड़ियल घोड़े की तरह लट्ठ ही बन गया था और लैला तो जैसे मदहोश हुई मेरी हालत से बेखबर मेरे लंड को ऊपर से ही सहलाए जा रही थी।
“ब … बस … बस … प्लीज … हो गया!”
“ओह … आई एम रियली सॉरी.” कहते हुए उसने एक बार फिर से लंड के ऊपर तौलिया फिराया।
मेरे लंड ने एक झटका सा खाया तो लैला ने उसे कसकर पकड़ लिया।
दोस्तो! यह कुदरत भी कितनी अजीब है। औरत कितनी भी कामातुर हो कभी अपनी ख्वाहिश जबानी नहीं बताती बस उसके हाव-भाव (शारीरिक भाषा) सब कुछ बयान कर देते हैं। बीवियां (पत्नियां) तो अपना दाम्पत्य हकूक (पत्नी धर्म) ही निभाती हैं पर महबूबायें अपने हुस्न के खजा़ने लुटाती हैं।
मुझे लगता है लैला भी अपने हुस्न का खजाना लुटाने को बेताब हो चली है। कमसिन और कुंवारी लौंडियों को पटाना और उनका कौमार्य मर्दन करना बहुत ही मुश्किल काम होता है पर शादीशुदा और अनुभवी महिला अगर एक बार राजी हो जाए तो फिर अपने हुस्न के सारे खजाने ही अपने प्रेमी को लुटा देती है।
और फिर इससे पहले कि मैं कुछ करता अप्रत्याशित रूप से उसने अपना सिर मेरे सीने से लगा दिया। मुझे पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया, मेरे हाथ अनायास ही उसके सिर और पीठ पर चले गए और मैंने उन्हें सहलाना चालू कर दिया।
उसके गुदाज़ उरोजों की गर्माहट मैं अपने सीने पर महसूस कर रहा था।
मैं सच कहता हूँ उसके गुदाज़ और रसीले उरोजों की कसावट ठीक वैसी ही थी जैसी सुहाना की। आपको याद होगा तीन पत्ती गुलाब नामक कथानक में एक बार कुत्ते के डर से सुहाना भी इसी तरह मेरे सीने से चिपक गई थी।
लैला ने अब अपने होंठ मेरे होंठों से चिपका दिए। मैंने प्यासी पड़ोसन को अपनी बांहों में भींच लिया और मैं भी उसे बेतहाशा चूमने लगा।
हम दोनों को ही अब होश नहीं था। कितनी देर हम एक दूसरे की बांहों में सिमटे एक दूसरे को चूमते चाटते रहे। मैं कभी उसके उरोजों को दबाता और कभी उसके गोल कसे हुए नितम्बों को सहलाता।
जैसे ही मेरे हाथ टटोलते हुए उसकी बुर के पास पहुंचे, मेरी प्यासी पड़ोसन लैला अचानक चौंकी और फिर ‘ओह … आई एम सॉरी’ कहते हुए परे हट गई।
लग गए लौड़े!!
जैसे ही नैया किनारे के पास आई अचानक हिचकोले खाते हुए फिर से दूर चली गई।
हम हाथ धोकर वापस डाइनिंग टेबल पर आ गए।
संजीवनी बूंटी ने अपना सिर झुका रखा था। वह कुछ सोचे जा रही थी। उसकी आँखें बंद थी और आंसुओं के कुछ कतरे उसके गालों पर लुढ़क आए थे।
मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में क्या किया जाए या किस प्रकार उसे सांत्वना दी जाए?
इतना तो पक्का है कि उसकी उफनती खूबसूरत जवानी की शारीरिक भूख सुजोय बनर्जी नामक उस चमगादड़ के वश में बिल्कुल भी नहीं है.
और यह लैला भी अपनी जवानी की भूख को अब और सहन करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं लगती है।
“ज … जया जी … आप ब … बहादुर औरत हैं आपको हौसला नहीं छोड़ना चाहिए.” मैंने उसके गालों पर आए आंसुओं को पोछते हुए उसे दिलासा दी।
और फिर उसने अपनी मुंडी थोड़ी सी ऊपर उठाई तो उसने एक पल के लिए मेरी आँखों में झांका। शायद वह कुछ फैसला लेने में हिचकिचा रही थी। उसके होंठ काँप से रहे थे वह कुछ बोलना चाहती थी पर लगता है उसकी जबान उसका साथ नहीं दे रही थी।
मैंने उसका चेहरा अपेन हाथों में ले लिया और और … फिर … अचानक उसने अपना सिर फिर से मेरे मेरे सीने से लगा दिया।
“प … प्रेम! म … मैं …” वह सुबकने लगी थी और उसका गला रुंध सा गया था।
“ओह्ह …”
मेरे मुंह से तो बस इतना ही निकल पाया। अब तो सब कुछ शीशे की तरह साफ़ था। ऐसी हालत में शब्द मौन हो जाते हैं और सब कुछ चाहा-अनचाहा अपने आप घटित होने लग जाता है।
और फिर मैंने उसे अपनी बांहों में जोर से भींच लिया और उसके गालों और अधरों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।
लैला तो अब मेरी बांहों में सिमटी बस आह … ऊंह … करने लगी थी। हम दोनों को ही अब सुध ही नहीं थी। अब तो जो होना है कर लेने को हम दोनों का मन उतावला हो चला था।
हे लिंगदेव! आज तो सच में तेरी जय हो! मैंने तो कभी सपने भी नहीं सोचा था कि यह इतनी जल्दी मेरी बांहों में सिमट जाएगी।
प्यासी पड़ोसन बेतहाशा मुझे चूमे जा रही थी।
एक संयोग देखिये:
लैला ने हल्का संगीत लगा रखा था उसमें किसी पुराने गाने की धुन बज रही थी ‘हम जब सिमट के आपकी बांहों में आ गए।’
और फिर मैं उसे अपने सीने से लगाए उनके बेड रूम में चला आया। मैंने उसे बेड पर लेटा सा दिया।
बेडरूम में हल्की लाईट जली हुई थी। उसकी आँखें अब भी बंद थी और उसने अपनी बाहें अभी भी मेरे गले में ही डाल रखी थीं।
मैं उसके ऊपर अधलेटा सा हो गया और एक हाथ से गाउन के ऊपर से ही उसकी अब भी चूत को टटोलकर मसलने लगा। मेरा अंदाज़ा बिल्कुल सही था उसने पेंटी नहीं पहनी थी।
उसकी चूत की गर्माहट को महसूस करके मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा था।
अब मैंने अपने होंठों को उसके होंठों से लगा दिया।
लैला तो जैसे इसी इंतज़ार में थी। उसने जोर से मेरे होंठों को चूसना चालू कर दिया। उसकी साँसें बहुत तेज़ चलने लगी थी।
अब देरी करना बेमानी था, मैंने उसके गाउन की डोरी पकड़ कर खींच दी और अपने हाथ से उसके गाउन को पैरों की तरफ से ऊपर करना चालू कर दिया।
लैला थोड़ी कसमसाई; पर अब ज्यादा ऐतराज़ उसके वश में कहाँ था। उसने भी मेरे लंड को पायजामे के ऊपर से ही पकड़ कर सहलाना चालू कर दिया था।
अब तो हम दोनों ही अपनी मंजिल को पाने के लिए जैसे बेकरार और उतावले थे।
आँखों ही आँखों में इशारे हुए और फिर लैला ने झट से अपना गाउन उतार दिया और मैंने भी जल्दी से अपना कुर्ता-पायजामा और बनियान उतार फेंके। आज मैंने भी चड्डी जानबूझ कर नहीं पहनी थी। मेरा लंड तो जैसे फुफकारें ही मारने लगा था। लंड तो स्प्रिंग की तरह उछलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे लैला को सलामी दे रहा हो।
लैला उसे हैरानी भरी नज़रों से देखे जा रही थी।
हल्की रोशनी में उसका बदन ऐसे चमक रहा था जैसे कोई संगेमरमर का सांचे में ढला कोई मुजसम्मा हो।
कपड़े फेंक कर मैं लैला के पास आ गया तो लैला ने अपने हाथों से मेरे ठुमकते लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया। जब दो जवान जिस्म जवानी की आग में जल रहे हों तो किसी तकलुफ्फ़ की जरूरत कहाँ रहती है।
मुझे कोई ज्यादा जहमत करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। लैला ने बेड पर अपनी कमनीय काया को पसार दिया था। पूरा कमरा ही उसके जवान जिश्म की खुसबू से महक उठा था।
अब मैंने एक नज़र उसकी चूत पर डाली।
हे भगवान्! पतली सुडौल जांघें जाँघों के बीच हल्के ट्रिम किये काले रंग के रेशम जैसे बालों से लकदक चूत ऐसे लग रही थी जैसे शहद का छाता हो।
और … उसके ऊपर सपाट पेट और गहरी नाभि; और दो रसीले गोल अनार जैसे उरोज और उनकी घाटी के बीच मंगलसूत्र।
मैं तो ठीक से उसकी चूत का दीदार भी नहीं कर पाया था कि लैला ने मुझे अपने ऊपर खींच लिया।
लगता था लैला मेरे से भी ज्यादा जल्दी में थी। मेरा लंड अभी भी उसने हाथ में पकड़ रखा था जैसे उसे डर हो जरा सा ढीला छोड़ते ही वह कहीं ओर फिसल जाएगा।
अब मैं उसके ऊपर आ गया।
लैला ने अपनी जांघें खोलते हुए मेरे लंड को अपनी चूत पर घिसना चालू आकर दिया। उसकी चूत तो पहले से ही पनियाई हुई थी। किसी लुब्रिकेंट या तेल-क्रीम के जरूरत ही नहीं थी।
उसने मेरे लंड के सुपारे को जैसे ही अपनी चूत के मुहाने से लगाया मैंने एक तेज धक्का लगाया दिया। आधा लंड एक ही झटके में चूत की दीवारों को रोंदता हुआ अन्दर चला गया।
“उईईईइ … मम … माँ …” लैला की एक हल्की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी “ध … धीरे … प्लीज!”
अब रहम की गुन्जाइस करना बेमानी था।
मैंने दो-तीन धक्कों के साथ अपना पूरा लंड उसकी चूत में घोंप दिया।
लैला तो बस आई … उईई … आह … करती ही रह गई।
अब मैंने उसे कसकर बांहों में दबोच लिया और उस प्यासी पड़ोसन के होंठों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।
थोड़ी देर बाद लैला कुछ संयत हो गई थी। मैंने हल्के-हल्के धक्के लगाने चालू कर दिए। ऐसा लग रहा था चूत तो जैसे सदियों से किसी अदद लंड की प्यासी थी। मेरा अनुभव कहता है यह चूत ज्यादा नहीं चुदी है। उसके पेट और जाँघों पर जरा भी चर्बी नहीं थी। चूत की कसावट को देखकर तो कतई ऐसा नहीं लग रहा था कि उसने इसी चूत से एक बच्चे को जन्म दिया होगा।
हे लिंग देव! सुहाना नामक वह फित्नाकार फुलझड़ी की चूत भी ठीक ऐसी ही होगी।
काश! कभी उसकी चूत को चोदने का नहीं तो कम से कम एकबार तसल्ली से देखने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम मज़ा आ जाए।
यह पुरुष मानसिकता भी कितनी विचित्र है कि कभी संतुष्ट ही नहीं होती। जब कोई मनचाही चीज सर्वसुलभ हो जाए तो फिर दूसरी चीज की ओर मन दौड़ने लगता है।
मैं अपने ख्यालों में खोया हुआ था; अचानक लैला ने मेरा होंठों को अपने दांतों से जोर से काट लिया।
ओह … अब मुझे ध्यान आया मेरी बांहों में सुहाना नहीं लैला है। मैं दनादन धक्के लगा कर प्यासी पड़ोसन की चुदाई करने लगा।
लैला कभी अपनी चूत का संकोचन करती कभी मेरे धक्कों के साथ अपनी कमर और नितम्बों को थोड़ा ऊपर करती। मैं सच कहता हूँ इन अनुभवी औरतों को चोदने में जो मज़ा आता है वह कमसिन और अनुभवहीन लड़कियों को चोदने में कहाँ।
ऐसी अनुभवी औरतें काम-क्रिया में पूर्ण सहयोग देती है बिना कोई ना-नुकुर और नखरों के।
मेरा एक हाथ उसके सिर के नीचे था और दूसरे हाथ से मैं उसके उरोजों को दबा और मसल रहा था। उसके उरोजों के कंगूरे तो फूलकर छोटे अंगूर के दाने जैसे हो चले थे।
मैंने उसके स्तनाग्र (चुचूक) को अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा। लैला तो कामातुर होकर उछलने ही लगी थी। मुझे लगता है लैला के लिए यह नया अनुभव था और वह रोमांच के अतिरेक में डूबी आह … उंह … करती सिसकारियां लेने लगी थी।
जैसे ही मैंने अपनी दांतों से उस अंगूर के दाने (उरोजों की फुनगियाँ) को दबाया लैला के मुंह से एक सिसकारी सी निकली और उसका बदन अकड़ने सा लगा। उसकी चूत संकोचन सा करने लगी और वह अपने नितम्बों को जोर-जोर से उछालने लगी। और फिर उसने अपने दोनों पैर मेरी कमर के ऊपर लपेट से लिए।
“उईईईईइ म्म..मा … आ … आआ …” लैला ने अपने पैरों से मेरी कमर को जकड़ लिया।
ऐसा करने से मुझे धक्के लगाने में थोड़ी परेशानी सी होने लगी तो मैंने धक्के लगाने बंद कर दिए।
और फिर ‘आह’ करते हुए अचानक लैला का बदन ढीला सा पड़ने लगा। उसने अपने पैर भी फिर से पसार दिए और मेरी कमर की गिरफ्त भी ढीली कर दी। वह तो बस लम्बी-लम्बी साँसें लेती हुई प्रेम मिलन का पूर्णानंद अनुभव कर रही थी। लगता है उसका ओर्गाश्म हो गया था।
दोस्तो! ये पल किसी भी स्त्री के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं। अब तो लैला शांत हुई लम्बी-लम्बी साँसें ले रही थीं। मैंने हल्के धक्कों के साथ उसके गालों, होंठों, गले, उरोजों और उनकी घाटी को चूमना और चाटना चालू रखा।
थोड़ी देर बाद लैला ने आँखें खोली। उसकी गहरी साँसें और आँखों में दौड़ती लालिमा उसके संतुष्ट होने का सबूत थी। मुझे अपनी ओर देखता पाकर उसने फिर से अपनी आँखें बंद कर लीं।
मैं अब अपने घुटने मोड़ कर ऊपर होते हुए उकङू होकर उसके ऊपर बैठ गया। मेरे दोनों पैर उसके नितम्बों और कमर के दोनों ओर थे। अब मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ ली और इसी अवस्था में ही धक्के लगाने लगा।
अब तो उसकी चूत भी दिखने लगी थी। धक्कों के साथ जैसे से ही मेरा लंड चूत के अन्दर जाता उसके लाल रंग के पपोटे भी अन्दर की ओर धंस से जाते और जब लंड थोड़ा बाहर आता तो उसकी गुलाबी लीबिया (अंदरूनी होंठ) साफ़ नज़र आने लगती।
याल्ला … उसके पतली कमर और सपाट पेट को देखकर मैं रोमांच से भर उठा। मुझे तो उसे देखकर उसके कुंवारी होने का धोखा ही होने लगा। सबसे हैरानी वाली बात तो यह थी कि उसके पेट पर स्ट्रेच मार्क्स भी नहीं थे। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि सुहाना नामक वह चुलबुली फुलझड़ी इसी पेट के अन्दर 9 महीने रही होगी।
हे भगवान … सुहाना नामक फुलझड़ी का पेट, कमर और नाभि भी बिल्कुल ऐसी ही होगी। आह … उसकी चूत या पिक्की पर भी हल्के रेशमी मुलायम बालों की केशर क्यारी बनी होगी। काश कभी उसके बदन को सहलाने और चूमने का मौक़ा मिल जाए तो किसी और नए जन्म का इंतज़ार ही ख़त्म हो जाए।
लैला ने मुझे यह बात तो बाद में बताई थी कि सुहाना उसकी एडॉप्टेड चाइल्ड (गोद ली हुयी लड़की) है।
मेरा लंड तो जैसे निहाल ही हो गया था। कितने वर्षों के बाद इस तरह की चूत को चोदने का आनंद और मौक़ा मिला था। मुझे याद आता है ऐसा सहयोग तो नीरूबेन (याद करें अभी ना जाओ चोद के और हुई चौड़ी चने के खेत में) और सुधा (नन्दोईजी नहीं लन्दोईजी) ने ही किया था बाकी तो बस चुदाई के समय हाय-हल्ला ही करती रही थी।
“जया … मज़ा आया या नहीं?” मैंने एक हल्का धक्का लगाते हुए पूछा।
“आह … प्रेम … बस कुछ मत पूछो और ना कुछ बोलो … आह … बस आज मुझे अपनी पूर्ण समर्पिता बनाकर एक सम्पूर्ण स्त्री बना दो.” कहते हुए उसने मेरी कमर पकड़ कर फिर से मुझे अपने ऊपर खींच लिया।
अब मैंने उसके ऊपर लेट कर धक्के लगाने चालू रखे। कभी मैं उसके एक उरोज को चूसता कभी दूसरे को और फिर उनको हल्का हल्का मसलता हुआ उसके होंठों को भी चूमता जा रहा था। और कभी-कभी अपने लंड को उसकी चूत पर घिसते हुए उसके दाने (मदन मणि) को रगड़ते हुए धक्के लगा रहा था।
लैला ने फिर से अपने नितम्ब उछालने चालू कर दिए थे। मैंने आज दोपहर में ही तसल्ली से अपना पानी अपनी सानूजान की याद में समर्पित किया था तो अभी इतनी जल्दी दुबारा पानी निकालने की जल्दी में नहीं था।
लैला की चूत ने फिर से संकोचन चालू कर दिया था। मुझे लगता है वह फिर से झड़ने वाली है।
मैंने उसे कसकर उसे अपनी बांहों में भींचते हुए जोर-जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए।
मेरे 4-5 धक्कों के साथ ही लैला की साँसें फिर से बेकाबू होने लगी और मुझे लगा जैसे मेरे लंड के चारों ओर एक बार फिर से गुनगना और शहद जैसा चिपचिपा रस लग गया है।
दोस्तो! चुदाई करते समय तो वक्त का तो जैसे ख्याल ही नहीं रहता। मन करता है बस लंड को चूत में फंसाए ऐसे ही सारी जिन्दगी बिता दी जाए। पर हर चीज का एक समय और आखिरी मंजिल भी होती ही है। मुझे लगाने लगा था कि अब मेरा शेर मैदाने जंग में शहीद होने वाला है।
“जया … वो … मैंने कोंडोम नहीं लगाया है?”
“ओह … प्रेम … चिंता मत करो … अपनी इस जान को आज ऐसे ही सींच दो … तुम्हारे प्रेम की बारिश मैं अपने अन्दर महसूस करने के लिए बेकरार हूँ … आह …” कहते हुए उसने मेरे होंठों को चूम लिया।
अब तो मैं बिना किसी हिचक के उसे चोदे जा रहा था। वह भी मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्ब उछालते हुए पूरा सहयोग करने लगी थी। उसने एक तकिया अपने नितम्बों के नीचे लगा लिया था। अति उत्तेजना में उसने अपने पैर एक बार फिर से ऊपर उठा लिए थे।
मुझे अपनी पीठ पर कुछ चुभता सा महसूस हुआ। ओह … लगता है लैला ने उत्तेजना में अपने नाखून मेरी पीठ पर चुभो दिए थे। मैंने अपने धक्कों की गति और बढ़ा दी।
और … फिर … आधे घंटे की इस मैराथन का अंतिम पड़ाव आ गया। और फिर इस बार हम दोनों ने एक साथ परम मोक्ष को प्राप्त कर लिया।
मेरे लंड ने 5-6 पिचकारियाँ उसकी चूत के अन्दर उंडेल दी। लैला ने अपनी चूत को अन्दर भींचते हुए मेरा पूरा वीर्य अपने गर्भाशय में खींच लिया। और फिर मैं भी लम्बी साँसें लेता हुआ उसके ऊपर ही पसर रहा।
लैला ने अपनी दोनों बाहें मेरी कमर पर कस ली और फिर होले-होले मेरे सिर और पीठ पर अपने हाथ फिराने लगी। अब तो वह ऐसे लग रही थी जैसे बरसों से धूप में तपती रेगिस्तान की जमीन को बारिश की फुहारें ही मिल गई हों।
कोई 10-15 मिनट हम दोनों इसी अवस्था में पड़े रहे। मेरा लंड थोड़ा ढीला जरूर हो गया था पर उसकी चूत से बाहर नहीं निकला था।
हाँ … उसकी चूत से वीर्य जरूर रिसने लगा था।
मैं एक चुम्बन लेते हुए उसके ऊपर से उठ गया और बगल में ही लेट गया।
लैला भी अब उठकर बैठ गई थी। उसने झुक कर पहले तो अपनी चूत को देखा और फिर मेरी ओर देखने लगी। मुझे अपनी चूत की ओर देखते हुए पाकर उसने झट से पास पड़ा तकिया उठाकर अपनी गोद में ले लिया और अपनी चूत को छिपा लिया। कोई और मौक़ा होता तो मेरी हंसी निकल जाती पर मैंने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर ली।
फिर लैला ने पास रखा तौलिया उठाया और अपनी कमर और नितम्बों को ढांपते हुए बाथरूम की ओर जाने लगी। जिस प्रकार वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रही थी मुझे लगता है अब मेरा रिसता हुआ वीर्य उसकी जाँघों पर भी फ़ैलाने लगा था।
मैं अपनी किस्मत को सराह रहा था। आज का अनुभव बहुत ही विलक्षण था। कितने दिनों बाद आज पूर्ण तृप्ति मिली थी। हालांकि बेचारी कोमल ने भी मुझे खुश करने का हर संभव प्रयास किया था पर अनुभवी औरतों की बात ही कुछ अलग होती है। बिस्तर के ऊपर मसली हुई मोगरे की पत्तियाँ बिखरी पड़ी थी और गुलाबी चादर मेरे वीर्य और लैला के कामरज से रंग दे बसंती सी गई थी।
थोड़ी देर बाद लैला तौलिया लपेटे फिर से कमरे में आ गई। इस तौलिये में वह अपने उरोजों और जाँघों को ढकने की नाकाम सी कोशिश कर रही थी।
हे भगवान! रेशम सी मुलायम और स्निग्ध पीठ पर नितम्बों तक झूलती केश राशि तो जैसे कहर बरपा रही थी। उसने मुझे भी बाथरूम जाने का इशारा किया।
मैं चुपचाप फरमाबदार आशिक (आज्ञाकारी प्रेमी) बना बाथरूम चला आया। मेरा सुपारा अभी भी फूला हुआ था और लाल हो गया था। मैंने अपने लंड को पहले तो साबुन और पानी से धोया और फिर थोड़ी क्रीम उस पर लगा ली। और फिर हाथ पैर धोकर एक तौलिया कमर पर लपेट कर मैं कमरे में वापस आ गया।
मेरा अंदाजा था लैला अपने कपड़े पहन चुकी होगी। पर मेरी सोच के विपरीत वह अभी भी तौलिया लपेटे बेड पर अधलेटी सी पड़ी थी।
मैं उसकी बगल में आकर बैठ गया। लैला ने थोड़ा सा उठते हुए झट से मेरा तौलिया खींच कर फेंक दिया और मेरे लंड को फिर से पकड़ लिया।
उसने 3-4 बार उसे हिलाया और ऊपर नीचे किया।
लगता है उसका मन अभी नहीं भरा था।
उसने पहले तो सुपारे के लाल छेद को ध्यान से देखा और फिर उस पर अपनी जीभ लगा दी।
हे भगवान्! यह लैला तो काम-कला में पूरी निपुण लगती है। और फिर उसने सुपारे को मुंह में भरकर चुस्की लगानी शुरू कर दी। थोड़ी देर में मेरा लंड फिर से अंगड़ाई लेटे हुए कसमसाने लगा था। जिस प्रकार वह मेरा लंड चूस रही थी मेरा अंदाज़ा है उसने उस चिमगादड़ के साथ भी यह प्रयोग जरूर किया होगा पर अपनी-अपनी किस्मत होती है।
“जया एक काम करें?”
“हम्म …” उसने लंड को मुंह से बाहर नहीं निकाला बस … गले से हल्की सी आवाज निकाली।
“क्यों ना हम दोनों एक साथ करे?”
“की बोलचे?” (क्या मतलब?) अबकी बार उसने मेरे लंड को मुंह से बाहर निकाल कर पूछा।
“वो … मेरा मतलब है … 69 पोजीशन में हम दोनों को ही बहुत मज़ा आएगा?”
“हट!” लैला शर्मा सी गई।
“प्लीज आओ ना?” कहते हुए मैं लेट गया और पहले तो उसकी कमर से लिपटे तौलिये को खींच कर अलग किया. और फिर उसके नितम्बों और जाँघों को पकड़ते हुए अपने ऊपर खींच लिया।
फिर उसकी जाँघों को फैलाते हुए उसकी चूत को ठीक अपने मुंह के पास कर लिया। एक मादक गंध से मेरा सारा स्नायु तंत्र सराबोर हो गया।
मैंने अपना एक हाथ नीचे से उसकी लाकर उसकी चूत के पपोटों को थोड़ा चौड़ा किया तो एक पुट्ट की आवाज के साथ उसकी फांकें थोड़ी खुल गई।
आह … अन्दर से लाल रतनार जैसे कोमल मुलायम स्निग्ध मखमली चूत को देखकर मेरे से नाहीए रहा गया और मैंने अपनी जीभ उसपर लगा दी।
लैला तो जैसे उछल ही पड़ी।
अब मैंने उसकी चूत की दोनों पत्तियों को मुंह में भर लिया और चुस्की लगानी शुरू कर दी। बीच-बीच में उसके दाने पर भी अपनी जीभ लगाता और कभी-कभी उसके चीरे पर भी अपनी जीभ को नुकीला बनाकर फिराता।
लैला तो जैसे अपने होशो-हवास ही खोने लगी थी। वह जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगी थी “उईईइ … प्रेम आमी मर जाबे … ओह … आह …”
मुझे लगता है यह अनुभव उसके लिए नितांत नया था।
उसका सारा बदन जैसे हिचकोले खाने लगा था।
अचानक उसने मेरे लंड को पूरा अपने मुंह में भर लिया और जोर-जोर से चूसने लगी।
हे लिंग भगवान्! जिस प्रकार लैला मेरा लंड चूस रही थी मुझे लगा मैं तो इस बार जल्दी ही उसके मुंह में झड़ जाऊँगा।
वह अब तो जोर-जोर से अपनी चूत को मेरे मुंह पर घिसने भी लगी थी। मैं कभी उसकी चूत को चूसता और दाने को कभी अपनी जीभ से सहलाता कभी उसे दांतों के बीच लेकर काटता।
अब तो लैला की गूं … गूं … की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी थी। वह रोमांच में डूबी अपने नितम्बों को जोर-जोर से हिलाने लगी और अपनी चूत को मेरे मुंह पर जोर-जोर से रगड़ने लगी।
जैसे ही मैंने उसकी चूत को मुंह में भरकर एक जोर की चुस्की लगाई, अचानक उसका शरीर कुछ अकड़ने सा लगा और फिर उसने अपनी जाँघों को जोर से भींच लिया।
अचानक मुझे लगा जैसे मेरे मुंह में एक मीठा गुनगुना शहद से भरता जा रहा है।
उसके शरीर ने हिचकोले से खाने शुरू कर दिए थे। थोड़ी देर ठुमकने के बाद लैला मेरा लंड मुंह से बाहर निकाल कर मेरे ऊपर हट गई और मेरी बगल में आ गई।
मैं तो थोड़ी देर और इसी तरह करना चाहता था. पर इससे पहले कि मैं कुछ बोलता लैला मेरे ऊपर आ गई और उसने फिर से अपनी गुलाबी फांकों को चौड़ा कर के मेरे लंड को अन्दर घोंट लिया।
अब मैं नीचे लेटा था और लैला मेरे ऊपर घुटनों के बल बैठी धक्के लगा रही थी। उसके खुले बाल कभी उसके उरोजों पर फ़ैल जाते कभी उसके चहरे पर। उसके गले में पड़ा मंगल सूत्र तो किसी पेंडुलम की भांति हिल रहा था। उरोजों की फुनगियाँ तो तन कर भाले की नोक की तरह नुकीले हो गई थी।
मैंने उसके दोनों उरोजों को अपने हाथों में पकड़ लिया और मसलने लगा।
लैला आंह … ऊंह … करती जा रही थी।
कमाल यह था कि साथ-साथ वह अपनी चूत का संकोचन भी कर रही थी।
पर मुझे लगा लैला अब थोड़ा सुस्त पड़ने लगी है। अब मैंने अपने एक हाथ उसके सके नितम्बों पर फिराते हुए उसकी कमर पकड़ कर थोड़ा नीचे होने का इशारा किया।
लैला जैसे ही थोड़ी नीचे हुई मैंने झट से उसके उरोज को मुंह में भर लिया और चूसने लगा।
लैला ने अब धक्के लगाने बंद कर दिए।
मैंने अपना एक हाथ फिर से उसके नितम्बों की खाई पर फिराया। गोल-मटोल कसे हुए नितम्ब … आह … मेरे लंड ने एक बार चूत के अन्दर ही ठुमका सा लगाया।
उसकी गांड के छेद पर मुझे कुछ चिकनाई सी महसूस हुई। मुझे लगता है लैला ने अपनी चूत के साथ-साथ अपनी गांड के छेद पर भी कोई खुशबूदार क्रीम या तेल जरूर लगाया है।
मैंने धीरे-धीरे अपनी अंगुली उसकी गांड के छेद पर फिरानी चालू कर दी।
“आह … प्रेम … आमी मरा गेलामा … तुमि पूरो म्याजिसियाना आह …” (आह … प … प्रेम मैं मर गई … तुम पूरे ज … जादूगर हो … आह …)
तीन तरफ से हुए हमले से लैला तो जैसे मदहोश ही हो गई थी।
एक तरफ मेरा लंड चूत में फंसा हुआ ठुमके लगा रहा था. दूसरी ओर मेरे मुंह में उसके उरोजों का चूचक और मेरी अंगुलियाँ उसकी गांड के छल्ले को सहला रही थी।
तीन तरफ से हुए हमले को वह अब कैसे सहन कर पाती?
उसने एक बार फिर से पानी छोड़ दिया।
और फिर वह अपने पैरों को सीधा कर के मेरे ऊपर जैसे पसर सी गई।
कुछ देर हम इसी अवस्था में पड़े रहे और फिर मैं उसकी कमर को पकड़कर एक कलाबाजी सी खाते हुए उसके ऊपर आ गया। फिर मैंने दनादन धक्के लगाने चालू कर दिए।
लैला मस्त हिरनी की तरह फिर से अपने नितम्ब हिलाने लगी थी।
“जया, तुम कहो तो इस बार एक नए अंदाज़ में करे क्या?”
“ओह … प्रेम … मैं तो आज ओह … आज मुझे सब कुछ मिल गया है … आह … बस ऐसे ही करते रहो …” लैला ने अपनी आँखें बंद किये हुए ही जवाब दिया।
“जया सच में तुम बहुत खूबसूरत हो …” कह कर मैंने पहले तो उसके होंठों को चूमा और फिर उसकी कांख पर अपनी जीभ फिराने लगा।
“ईईई ईईईई … आह … मेरे प्रेम …” लैला ने रोमांच भरी किलकारी मारी।
“जया! आओ प्लीज … एक नया प्रयोग करते हैं.” कहते हुए मैं लैला के ऊपर से हट गया।
“की होच्चे?” (क्या हुआ) लैला हैरानी से मेरी ओर देखने लगी।
मैंने उसकी कमर को पकड़ते हुए उसे थोड़ा घुमाया और फिर दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ कर उसे डॉगी स्टाइल में कर दिया. और अब मैं अपने घुटनों के बल होकर उसके पीछे आ गया।
“ओह … की कोरचा? … (क्या कर रहे हो?) … ना अमी पिछाना थेके एती ना ओह़ा … प्लीज अपेक्षा करा.” (नो … मैं पीछे से नहीं करवाऊँगी … ओह … प्लीज … रुको … )
“अरे मेरी जान तुम रुको तो सही … मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जो तुम्हें पसंद नहीं हो … विश्वास रखो।”
शायद लैला को डर था कहीं मैं उसकी गांड मारने का उपक्रम तो नहीं करने लगा हूँ।
अब मैंने उसकी चूत के पपोटों को दोनों हाथों की अँगुलियों से चौड़ा किया।
हे लिंग देव!! लाल रंग का चीरा तो मुश्किल से 4 इंच का रहा होगा … रतनार … रस से भरा हुआ … और उसके एक डेढ़ इंच ऊपर की ओर उसकी गांड का चमकता हुआ हल्के सांवले रंग का छल्ला।
मैंने जितनी भी लड़कियों या औरतों को चोदा है लगभग सभी की गांड का मर्दन जरूर किया है. पर पता नहीं जिन्दगी में आज पहली बार लैला के इतने खूबसूरत नितम्बों को देख कर भी मेरा मन तो बस उसकी चुकंदर जैसी चूत को ही चोदने का मन कर रहा था।
मैंने अपनी जीभ उसके पेरिनियम (योनि और गुदा के छेद के बीच का स्थान) पर लगा दी।
लैला को तो जैसे करंट सा लगा और वह तो घोड़ी की तरह हिनहिनाने सी लगी थी।
“ओह … प्रेम! आमी मर … जाबे आह … (मैं … मर जाउंगी … ओह …)” कहते हुए उसने अपना सिर नीचा करके तकिये पर लगा दिया।
अब तो उसके नितम्ब पूरे खुल से गए थे।
मेरा लंड झटके से खाने लगा था। मैंने उसे हाथ में पकड़ कर उसकी चूत के चीरे पर फिराया।
लैला की चूत ने संकोचन करना चालू कर दिया। उसकी गांड का छल्ला भी साथ में संकोचन कर रहा था, जैसे मुझे ललचा रहा था।
अब मैंने अपने को उसकी चूत के मुहाने पर सेट किया और फिर उसकी कमर पकड़ कर एक धक्का लगाया। हालांकि मैंने धक्का जोर से तो नहीं लगाया था पर उसकी चूत की फिसलन इतनी जबरदस्त थी कि एक ही धक्के में मेरा पूरा लंड उसके गर्भाशय से जा टकराया।
लैला के मुंह से एक घुटी-घुटी चीख सी निकल गई। उसने छटपटाने की कोशिश की पर मैंने उसकी कमर को अपने हाथों में कस कर पकड़े रखा।
“आईईईई … प्लीज धीरे … ओह … मुझे ऐसी आदत नहीं है प्लीज … बाहर निकालो।”
“मेरी जान कुछ नहीं होगा बस … थोड़ी देर में उम्हें बहुत मज़ा आने लगेगा।”
अब मैंने उसके नितम्बों पर कमर पर हाथ फिराना चालू कर दिया। मैंने महसूस किया उसका पूरा बदन झनझना रहा है। अब यह भयवश था या रोमांच के उच्चतम शिखर पर पहुँचने के कारण था, यह तो लैला ही अच्छे से बता सकती थी।
मेरा लंड पूरी तरह उसकी चूत की गहराई में समा गया था और अब मैंने धक्के भी लगाने चालू कर दिए थे।
लैला भी अब तो मेरे धक्कों के साथ अपनी लय मिलाने लगी थी।
मैं कभी उसकी कमर पर हाथ फिराता … कभी उसके गोल सांवले नितम्बों पर। कभी हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने को मसल देता तो लैला सित्कार सी निकल जाती।
जैसे ही मैं धक्का लगाता एक फच्च के आवाज आती। फचफचाहट का मधुर संगीत जैसे पूरे कमरे में गूंजने लगा था।
दोस्तो! आपको इस समय मैं एक बात बताना लाजमी समझता हूँ।
कुछ औरतों को सेक्स के दौरान हल्का कटवाना, खरोंचना और नितम्बों पर थप्पड़ लगवाना बहुत पसंद होता है। मुझे एक बार कोमल ने बताया था कि उसके भैया भी सेक्स करते समय उसकी भाभी के नितम्बों पर जोर-जोर से थप्पड़ लगाते हैं और भाभी को उसमें बहुत मज़ा आता है।
मैंने भी इस लैला के जब उरोजों की फुनगियों को अपने दांतों से काटा था तो यह रोमांच के मारे उछलने ही लगी थी।
शायद यह लैला भी सडेक्टिव है।
ऐसी औरतों को अपने प्रेमी या पति से सेक्स के दौरान मार खाना बहुत पसंद आता है। मैंने उसके नितम्बों पर हल्के थप्पड़ लगाने चालू कर दिए। मेरे थप्पड़ों से उसके नितम्ब लाल हो चले थे। मुझे आश्चर्य हो रहा था लैला ने कोई प्रतिवाद या प्रतिरोध नहीं किया अलबत्ता वह तो अपने नितम्बों को जोर-जोर से हिलाने लगी थी।
कोई 20 मिनट के बाद मुझे लगने लगा था मेरा लंड अब शहीद होने वाला है। हालांकि मन नहीं भरा था पर हम दोनों ही अंतिम सांस तक हिम्मत हारने को तैयार नहीं थे। लैला इस दौरान 2-3 बार झड़ गई थी। उसकी चूत तो पानी छोड़-छोड़ कर जैसे नहर ही बन गई थी।
और फिर हम दोनों ने एक साथ उस आनंद को फिर से भोगा जिसे परम आनंद यानि ओर्गास्म कहा जाता है।
वीर्य स्खलन के बाद भी मैं और लैला उसी अंदाज़ में (डॉगीस्टाइल) में रहे।
सच कहता हूँ इस समय मुझे मधुर की बहुत याद आने लगी थी आप तो जानते ही हैं पिछले 6-8 महीने में हमने बहुत बार इसी आसन में सेक्स किया था।
मैं और लैला दोनों आँखें बंद किये प्रकृति के इस अनूठे और नैसर्गिक कर्म में लगे रहे। मेरा लंड अभी भी लैला की चूत की गहराई में डूबा हुआ था।
अब लैला ने धीरे-धीरे अपने पैर पसार दिए और मैं उसके ऊपर लेट कर उसके गुदाज़ नितम्बों का स्वाद लेने लगा। मैंने उसकी पीठ गले और कानों की लोब को कई बार चूम कर उसका धन्यवाद किया।
लैला तो मस्त मोरनी बनी लम्बी-लम्बी साँसें लेती बस रोमांच में डूबी रही।
और फिर उस रात हमने रात 3 बजे तक पता नहीं कितनी बार प्रेम मिलन की इस नैसर्गिक क्रिया को दोहराया होगा याद नहीं।
लैला की हालत तो यह हो गई थी कि उससे उठकर बाथरूम तक जाना भी मुश्किल सा लग रहा था। उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई बया (एक छोटी चिड़िया) अपनी चोंच को अपने दोनों परों के बीच समेटे चुपचाप बैठी हो। वह तो सूजकर पकोड़े जैसी हो गई थी। मुझे नहीं लगता अब वह 3-4 दिन ढंग से चल फिर भी पाएगी।
मेरी भी हालत कामोबेश ऐसी ही थी। मेरा लंड भी सूज सा गया था और सुपारा तो लाल टमाटर जैसा हो चला था।
लैला ने बताया कि सुबह सुहाना वापस आ जाएगी. लेकिन फिर कभी मौक़ा मिला तो वह इन पलों को एक बार फिर से जरूर दोहराना चाहेगी और पूरी रात मेरे आगोश में ही बिताएगी।
मैंने लैला का एक बार फिर से धन्यवाद किया।
हम दोनों का मन तो अभी भी नहीं भरा था। मेरा मन तो उसे बांहों में भर कर एक गहरी नींद लेने को कर रहा था पर अब घर वापस आने की मजबूरी थी। किसी ने अगर देख लिया तो मुसीबत खड़ी हो सकती थी।
आप तो जानते ही हैं साली यह किस्मत तो लौड़े लगाने के लिए हमेशा तैयार ही बैठी रहती है।
मैं लिंग देव का जयकारा लगाते हुए और उसका शुक्रिया अदा करते हुए घर लौट आया।
सुबह के कोई आठ बजे का समय रहा होगा। मोबाइल की घंटी बजने से से मेरी नींद खुली।
ओह … इतनी सुबह कहीं मधुर का फ़ोन तो नहीं आ गया?
मैंने मोबाइल में नंबर देखा। यह तो कोमल का नंबर था। कमाल है इतने दिनों बाद कोमल का फ़ोन आया था।
“हेलो … कैसी हो कोमल? तुमने तो हमें बिल्कुल ही भुला दिया?”
“सल! नमस्ते … मैं सानू बोल रही हूँ.”
“क … कौन सानू?”
“मैं स … सानिया हूँ सल!”
लग गए लौड़े!!
“ओह … अरे … सॉरी … हाँ … बोलो सानू? मैंने पहचाना नहीं मैं नींद में था.” मैंने बात संवारने की कोशिश की।
अब मुझे ध्यान आया यह कोमल वाला मोबाइल तो मैंने सानिया को दे दिया था। भेनचोद ये किस्मत भी कहीं ना कहीं गड़बड़ कर ही देती है।
“मैं आज काम पल नहीं आ सकूंगी.”
“क.. क्यों?”
“वो … वो.. मम्मी अस्पताल जाएगी भाभी और बाबू को लेकर!”
“ओह … पर क्यों?”
“बाबू को टीका लगवाना है.”
“ओह … अच्छा!”
“मैं कल सुबह आ जाऊँगी.”
“ओह … हाँ ठीक है।”
पता नहीं कोमल का नाम सुनकर सानू जान क्या सोच रही होगी? चलो देखते हैं क्या होता है।
आज मेरे दफ्तर पहुंचते ही नताशा नामक विष्फोटक पदार्थ केबिन में आ गई। शायद वह मेरे आने का ही इंतज़ार ही कर रही थी।
उसने भूरे रंग की जीन पेंट और ऊपर छोटा सा डोरी वाला टॉप पहना हुआ था। आज उसके हाथों में चूड़ियाँ गायब थी और एक विशेष बात आज उसने मांग में सिन्दूर भी नहीं लगाया था।
हे लिंग देव! इस जीन पेंट में उसके कसे हुए नितम्ब तो ऐसे लग रहे थे जैसे अभी कहर बरपा देंगे।
पर … पता नहीं क्यों इस छमकछल्लो के चहरे पर तो बैरण उदासी सी छाई हुई थी। उसकी आँखें कुछ लाल-लाल और सूजी हुई सी भी लग रही थी।
आज मैंने उसके चहरे पर ध्यान दिया उसके ऊपरी होंठ पर एक छोटा सा तिल भी है। हे भगवान् ऐसे जातक तो अति कामुक प्रवृति के होते हैं।
मुझे लगता है उसके गुप्तांगों पर भी तिल जरूर होगा। अगर चूत के पपोटों पर नहीं तो कम से कम उसके नितम्बों पर तो जरूर होगा।
आप तो बहुत गुणी हैं जानते ही होंगे ऐसे स्त्रियाँ की कुंडली में गांड मरवाने का भी योग होता है। ऐसा सोच कर ही मेरा लंड तो कसमसाने लगा था।
वह बिना कुछ बोले अपनी मुंडी नीचे झुकाए सामने कुर्सी पर बैठ गई।
“क्या बात है नताशा … आज तुम कुछ परेशान लग रही हो?”
“सर … मैं यह नौकरी छोड़कर कहीं चली जाऊंगी.” उसने रुंधे गले से कहा।
मुझे लगा वह अभी रोने लगेगी।
“अरे … ओह … सॉरी … ऐसा क्या हुआ?” मैंने आश्चर्य से उसके ओर देखा।
“सर! वो … वो.. आप ट्रेनिंग पर कब चलने वाले हैं?”
अजीब सवाल था … मुझे लगा नताशा कुछ छिपा रही है। पता नहीं क्या बात है?
“अरे प्लीज बताओ ना क्या बात हुई? कहीं इंजिनियर साहब से झगड़ा तो नहीं हो गया?”
नताशा कुछ नहीं बोली, उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे थे।
“सर! अब मैं इस आदमी के साथ और ज्यादा नहीं रह सकती।”
लगता है उस कबूतर के साथ आज इसका फिर से झगड़ा हुआ है। एक दो बार इसने पहले भी इस चिड़ीमार का जिक्र किया था। मुझे लगता है इसकी भरपूर जवानी की प्यास बुझाना उस अफलातून के बस में बिल्कुल भी नहीं है।
“ओह … आई एम सॉरी … देखो नताशा मैडम, आप बहुत समझदार हैं। पति-पत्नी में कभी कभार कहा सुनी हो भी जाती है ऐसी बातों को ज्यादा सीरियसली नहीं लेना चाहिए.” मैंने उसे समझाते हुए कहा।
“घर वालों ने मेरी जिन्दगी बर्बाद कर डाली।” उसने सुबकते हुए कहा।
मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था इसे कैसे समझाया जाए।
लैला की भी यही हालत थी उसे तो मैंने पूरी रात अच्छी तरह समझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी.
पर यहाँ मामला ऑफिस का था। मैं कोई रिस्क नहीं ले सकता था। अगर कोई और जगह होती तो मैं जरूर इसके गालों पर आए आँसू पौंछते हुए इसे दिलाशा देने की कोशिश करता।
आप मेरी इन बातों को पढ़कर जरूर हंस रहे होंगे।
“नताशा आप चिंता ना करें … सब ठीक हो जाएगा। मैं अगले हफ्ते ही बंगलुरु का प्रोग्राम बना रहा हूँ।” मैंने उसको पानी का गिलास पकड़ाते हुए फिर समझाया।
वो कुछ नहीं बोली। बस अपनी मुंडी नीचे किये कुछ सोचे जा रही थी।
“और नौकरी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। आप बहुत होनहार हैं बहुत बढ़िया फ्यूचर आपके सामने है।”
नताशा ने एक लम्बी सांस ली। लगता है वह कुछ निर्णय लेने का सोच रही है।
“मैं चाय मंगवाता हूँ.” कहते हुए मैंने चपरासी के लिए कॉल बेल दबाई। अब नताशा ने जल्दी से अपने पर्स से रुमाल निकाल कर अपने गालों पर आए आँसू पौंछ लिए।
“वो मैं तुम्हें बताने ही वाला था अगले हफ्ते नया बॉस आ जाएगा तो मैं उसके 2-3 दिन बाद ट्रेनिंग का प्रोग्राम बना लेता हूँ।”
“सच्ची?”
“नताशा एक काम तो हो सकता है?”
“क्या?”
“अगर पॉसिबल हो तो तुम भी इसी हफ्ते बंगलुरु की टिकट बनवा लो।”
“क्यों … आप मुझे साथ नहीं ले जाना चाहते क्या?”
“अरे ऐसा नहीं है … दरअसल नये बॉस के आने के बाद तुम्हारी छुट्टियों में कोई झमेला ना हो जाए इसलिए बोल रहा था।”
“हम्म …”
“क्या ख्याल है?”
“ठीक है … मैं 2-3 दिन बाद का टिकट बुक कर लेती हूँ.”
“गुड गर्ल!”
“आप बंगलुरु में कहाँ ठहरेंगे?”
“एक बार तो 2-4 दिन किसी होटल में ही ठहराना पड़ेगा बाद में हो सकता है कंपनी के गेस्ट हाउस में व्यवस्था हो जाए। पर चिंता की कोई बात नहीं है बेबी … मैं बंगलुरु पहुँच कर तुम्हें बता दूंगा।”
चाय पीने के बाद नताशा तो चली गई पर मैं अपने केबिन में बैठा बहुत कुछ सोचने लगा था। लगता है लौंडिया की उफनती जवानी उसके बस में नहीं है।
जिस प्रकार इसकी नशीली आँखों में मद मस्त जवानी का नशा नज़र आता है; इसे तो रोज रात को 2-3 बार आगे और पीछे दोनों तरफ से ठोका जाए तब जाकर इसे पूर्ण संतुष्टि मिलेगी.
पर बेचारे उस सुकडू में इतनी काबलियत कहाँ है जो इसकी जवानी की प्यास बुझा सके।
मन तो करता है किसी दिन इसे रात को घर पर बुला लिया जाए और फिर तो सारी रात इसकी जवानी का जहर और बुखार उतारा जा सकता है।
पर … ऐसा कैसे मुमकिन हो सकता है? यह तो सिर्फ किस्से कहानियों में ही संभव हो सकता है। असल जिन्दगी में तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।
पर लगता है बंगलुरु हम दोनों के स्वागत सत्कार के लिए जरूर तैयार है।
आज सुबह कोई आठ बजे हमारी सानू जान पूरे 48 घंटों के बाद आ गई थी। उसने पाजामा और कमीज पहन रखी थी जिसपर नीले और काले रंग के फूल-पत्तियाँ (बेल-बूटे) बने थे। शर्ट के ऊपर का बटन खुला हुआ था उसमें उरोजों की घाटी ऐसे लग रही थी जैसे दो पहाड़ियों के बीच बहती नदी का पाट हो।
हे भगवान्! उस पजामे में उसकी पुष्ट जांघें तो बहुत ही कातिलाना लग रही थी और आगे का फूला हुआ भाग देख कर तो लगता है उसने अन्दर पेंटी नहीं पहनी है।
आज मैंने एक ख़ास बात नोट की। आज हमारी रश्के कमर का चेहरा कुछ उदास सा था और आँखें भी कुछ लाल सी नज़र आ रही थी। पता नहीं क्या बात थी।
“अरे सानू … क्या बात है आज तुम बहुत उदास हो?”
“किच्च!” चिरपरिचित अंदाज़ में सानिया ने अपनी मुंडी ना में हिलाते हुए कहा।
“चलो पहले बढ़िया सी चाय बनाओ फिर बात करते हैं।“
सानिया सुस्त कदमों से मेन गेट बंद करके चुपचाप रसोई में चली गई।
थोड़ी देर बाद वह चाय बनाकर ले आई। उसने दो गिलासों में चाय दाल दी और हम दोनों चाय पीने लगे।
सानिया मुंडी नीची किये चाय पी रही थी। इस दौरान कोई बात नहीं हुई। मैं यह सोच रहा था कि बातों का सिलसिला कैसे चालू किया जाये।
“अरे सानू?”
“हओ?” पता नहीं सानिया किन ख्यालों मन डूबी हुयी थी।
“और फिर दो दिनों में क्या-क्या किया?”
“कुछ नहीं … बस घल का काम किया.”
“वो तुम बता रही थी बेबी को टीका लगवाना था? लगवा दिया क्या?”
“हओ … लगवा दिया … पर बाबू बहुत रो रहा था.”
“हाँ बेचारे को बहुत दर्द हुआ होगा?”
“हओ.”
चाय हमने ख़त्म कर ली थी पर सानू जान तो अभी भी चुपचाप ही थी।
“अरे सानू?”
अब उसने अपनी मुंडी मेरी ओर प्रश्न वाचक निगाहों से देखा।
“पता है मैं कल तुम्हारे लिए क्या-क्या लेकर आया था?” मैंने थोड़ा रहस्य बनाते हुए कहा।
“क्या?”
“तुम बैठो मैं अभी आता हूँ?”
और फिर मैं उठकर अपने कमरे में जाकर सानिया के लिए लायी हुई चीजें ले आया। मेरे हाथों में 3-4 पैकेट्स देखकर सानू जान के चहरे पर मुस्कान फिर से लौट आई। अति उत्सुकता वश वह तो उठकर खड़ी हो गई।
“ये देखो तुम्हारे लिए नए शूज … जुराब … क्रीम … बढ़िया है ना?”
“हओ … और इन दूसरे पैकेट्स में क्या है?”
“अच्छा चलो … तुम गेस करो?”
“मुझे क्या पता?” उसने हैरानी से कहा।
उसके चहरे पर आई मुस्कान को देखकर तो यही लगता था वह जानने के लिए बहुत उत्सुक हो रही है।
आपको बताता चलूँ मैं कल शाम को ऑफिस से घर आते समय सानिया के लिए एक क्रीम कलर की जीन पेंट और एक शर्ट और साथ में 4-5 आइसक्रीम के कोण ले आया था। पहले जो चोकलेट्स लाया था वह तो मैंने लैला को दे दिया था तो मैंने एक बढ़िया चोकलेट्स का एक और पैकेट भी साथ में ले लिया था।
“अच्छा चलो तुम मेरे पास आकर बैठो पहले?”
सानू जान अब बड़ी अदा से शर्माते हुए सोफे पर मेरे पास आकर बैठ गई।
मैंने महसूस किया उसकी साँसें तेज हो गई हैं और दिल की धड़कने भी साफ़ सुनी जा सकती थी। मेरा दिल भी जोर-जोर से धड़कने लगा था।
अब मैंने क्रीम वाली ट्यूब अपने हाथ में पकड़कर कहा- अपने पैर दिखाओ जरा?
“क … क्यों? उसे मेरी इन हरकतों से शायद आश्चर्य हो रहा था।
“अरे बाबा क्रीम लगा देता हूँ.”
“ओह … आप मेले पैरों को हाथ लगायेंगे? म … मैं अपने आप लगा लूंगी.”
“अरे … एक तरफ तुम मुझे अपना दोस्त मानती हो. और फिर कहती हो पैरों को हाथ क्यों लगाते हो?”
“नहीं … ऐसा नहीं है … वो … मेले पैर गंदे होंगे? इसलिए बोला.” उसने सकुचाते हुए कहा।
“कोई बात नहीं … तुम बाथरूम में जाकर पहले अपने पैर धो आओ फिर लगा देता हूँ.” मैंने हंसते हुए कहा तो पहले तो सानू जान शर्मा सी गई और फिर बड़ी अदा से मुस्कुराते हुए बाथरूम में हाथ पैर धोने चली गई।
आपको याद होगा परसों जो पेंटी सानू जान ने पहनी थी, उसमें मैंने मुठ्ठ मारते हुए अपना माल गिरा कर बाथरूम में फेंक दिया था। मेरा अंदाज़ा है सानू जान उस पेंटी को जरूर देखेगी।
मेरा तो मन कर रहा मैं अभी उसके पीछे बाथरूम में चला जाऊं और वहीं सानिया मिर्ज़ा को अपनी सानूजान बना डालू। पर लगता है चिड़िया खुद चुग्गा देने को तैयार है तो फिर इतनी जल्दबाजी की क्या जरूरत है।
5-7 मिनट के बाद सानिया अपने पैर धोकर वापस आकर सोफे पर बैठ गई। उसके कुंवारे बदन से आती मदहोश कर देने वाली तीखी गंध ने तो मेरे लंड को जैसे बेकाबू ही बना दिया था। जिस प्रकार उसने अपनी मुंडी नीची कर रखी थी मेरा अंदाज़ा है उसने मेरे वीर्य से रंजित उस पेंटी को जरूर देख लिया होगा।
अब मैंने अपनी अंगुली पर बिवाई वाली क्रीम लगा कर सानिया को अपने पैर ऊपर करने का इशारा किया तो उसने थोड़ा सा पीछे सरकते हुए अपना एक पैर उठाकर मेरी ओर कर दिया।
मैंने उसके पैर को अपने हाथ में पकड़कर अपनी गोद में रख लिया।
उसके पैर को छूते ही मेरा लंड तो किसी सांप की भाँति फुफकारें मारने लगा था।
मैंने पहले तो उसके पंजे को और बाद में उसकी ऐड़ी को सहलाया। इस चक्कर में उसकी ऐड़ी मेरे लंड से जा टकरा गई।
सानिया के शरीर में एक सनसनाहट सी दौड़ गई।
मैंने धीरे-घीरे मसलते हुए उसकी दोनों ऐड़ियों पर क्रीम लगानी चालू कर दी। क्रीम लगाते समय मैं सोच रहा था सानिया आज अगर वही स्कर्ट और कच्छी पहन कर आती तो कितना अच्छा रहता। उसकी बुर का पूरा जोगराफिया दिख जाता।
कुछ भी कहो … इसकी जांघें तो कमाल की हैं। उसकी बुर के निचले भाग की जगह से पायजामा कुछ गीला सा नज़र आ रहा था।
मेरा अंदाज़ा है सानू जान अपनी बुर भी जरूर धोकर आई होगी।
उसकी जांघें और उभरे हुए संधीस्थल का गीलापन देखकर तो मेरा लंड पागल ही हुआ जा रहा था। जैसे कह रहा हो गुरु … लोहा गर्म है मार दो हथोड़ा!
“लो भाई सानू जान अब रोज इसी तरह क्रीम लगवानी होगी तुम्हें!” मैंने हंसते हुए कहा तो सानिया ने झट से अपने पैर नीचे कर लिए।
“अरे रुको तो सही?”
“अब क्या हुआ?”
“एक तो तुम जल्दी बहुत करती हो? अभी जुराब और शूज भी तो पहनाने हैं.”
“वो तो मुझे पहनने आते हैं. ये कोई साड़ी थोड़े ही है.” सानिया तो खिलखिलाकर हंसने लगी थी।
”यार सानू जान, एक तो तुम कंजूस बहुत हो.”
“वो कैसे?” उसने चहकते हुए पूछा।
“अब थोड़ी देर के लिए तुम्हारे इन खूबसूरत पैरों को छूने का और मौक़ा मिल जाता पर तुम हो कि उसके लिए भी मना कर रही हो.”
अब तो लाज के मारे सानू जान तो उमराव जान अदा ही बन चली थी। मुझे लगता है उसे मेरी इन बातों से मेरी मनसा का अंदाजा तो भली भाँति हो ही गया होगा। बस अब तो वह मेरी पहल का इंतज़ार कर रही है।
जुराब और जूते पहनाना तो बस बहाना था मेरा मकसद तो बस उसे यह महसूस करवाना था कि मैं उसका कितना ख्याल रखता हूँ। और जब भी मैं उसे प्रणय निवेदन करूं तो उसे स्वीकारने में ज्यादा संकोच ना हो।
जूते पहनाने के बाद मैंने उसकी जाँघों के ऊपरी हिस्से पर एक धौल लगाते हुए कहा- सानू, अब जरा इन थोड़ी अदा से चलकर तो दिखाओ कि सही साइज के हैं या नहीं?
सानिया ने कहा तो कुछ नहीं पर उसकी रहस्यमयी मुस्कान ने सब कुछ बता दिया था।
वह बड़ी अदा से खड़ी हुई और फिर अपनी कमर और नितम्बों को लचकाते हुए रसोई की तरफ जाने लगी।
हे लिंग देव! उसके थिरकते हुए नितम्बों को देखकर मेरा दिल इतना जोर से धड़कने लगा कि मुझे लगा आज अगर कुछ नहीं किया तो यह जरूर धोखा दे जाएगा। और लंड देव तो उछल-उछल कर किलकारियां ही मारने लगे थे।
“अब आपके लिए नाश्ता बना दूं?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
“ओहो … अभी क्या जल्दी है तुम ज़रा बैठो तो सही!”
अब सानिया वापस आकर सोफे पर बैठ गई।
“क्यों साइज सही है ना?”
“हओ … मुझे ऐसे ही जूते पसंद थे.” उसने मेरी ओर देखते हुए कहा।
“देखो मुझे तुम्हारी पसंद का कितना ख्याल है.”
सानू जान बेचारी मेरी इस बात का क्या जवाब देती? वह तो ‘हओ’ कहकर बस मुस्कुराती ही रही।
उसकी निगाहें बार-बार उन दूसरे पैकेट्स पर जा रही थी जो पॉलीथिन के लिफ़ाफ़े में पड़े थे।
मैंने टेबल पर रखे उन पैकेट्स को उठाया।
“क्या है इसमें?”
“तुमने तो गेस किया नहीं?”
“प्लीज आप बताओ ना?” अब तो उसकी उत्सुकता अपने चरम पर थी।
“देखो मैं अपनी इस सानूजान के लिए 2 जोड़ी ब्रा-पैन्टी, एक जीन्स पैन्ट और शर्ट और एक इम्पोर्टेड चोकलेट का पैकेट और आइस क्रीम लाया हूँ। देख कर बताओ कैसे हैं?” मैंने उसके गालों पर हल्की सी चुटकी काटते हुए कहा।
सानिया ने कुछ बोला तो नहीं अलबता मैंने महसूस किया सानिया के गाल सूर्ख (रक्तिम) जरूर से हो गए हैं और होंठ भी कुछ कांपने से लगे हैं।
और खास बात तो यह भी थी कि मेरे द्वारा उसके गालों पर चिकोटी काटना और सहलाना उसे तनिक भी बुरा नहीं लगा था।