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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

“ओके … कोई बात नहीं … तुम्हें जैसे पसंद हो वैसे ही करेंगे.”

अब सुहाना अपनी आँखें बंद करके बेड पर लेट गई।

मैंने उसके पायजामे को नीचे सरकाना शुरू किया तो सुहाना ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर कर दिए। मैंने पायजामे को उसके घुटनों तक नीचे कर दिया। गुलाबी कच्छी में उसके पपोटों और चीरे वाली जगह कुछ गीली सी लग रही थी।

अब मैंने उसकी पैंटी को थोड़ा सा साइड में से सरका दिया।

मेरा लंड तो उसे सलामी पर सलामी देने लगा था और आज तो यह बहुत ही खूंखार हो चला था। अब मैंने फिर से एक चुम्बन उसकी बुर पर ले लिया तो सुहाना ने अपनी मुट्ठियाँ भींच ली।

मन तो कर रहा था एक ही झटके में अपना लंड इस कमसिन बुर में डाल दूं मैं इस फुलझड़ी पर इतना बेरहम भी नहीं होना चाहता था।

मैंने पास में पड़ी क्रीम की डिब्बी से थोड़ी क्रीम लेकर पहले तो अपने लंड पर लगाईं और फिर सुहाना की बुर के चीरे के अन्दर भी लगा दी।

सुहाना एक पल के लिए थोड़ा कुनमुनाई और उसने अपनी जांघें भींच ली।

एक गुनगुना सा अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस होने लगा। लंड तो झटके पर झटके खाने लगा था। ये तो शुक्र था कि सुहाना ने अपनी आँखें बंद कर रखी थी अगर वह मेरे इस मोटे और लम्बे लंड को देखकर घबरा ही जाती और हो सकता है मेरी बांहों से निकल कर भाग जाती।

मैंने थोड़ी और क्रीम अपनी अँगुलियों पर लगाईं और अपनी एक अंगुली उसकी बुर के छेद पर लगाकर थोड़ा सा अन्दर करने की कोशिश की तो सुहाना की एक आह सी निकली और वह अपनी जांघें भींचने लगी।

“बेबी रिलेक्स हो जाओ … कुछ नहीं होगा … अपने आप को ढीला छोड़ दो मैं तुम्हें बिल्कुल भी दर्द नहीं होने दूंगा.” मैंने उसे फिर से समझाया।

“आह..” सुहाना के मुंह से तो बस इतना ही निकला।

मैं अपनी एक अंगुली उसकी बुर में डाल कर उसे अन्दर-बाहर करने लगा। सुहाना ने अपनी मुट्ठियाँ और दांत और जोर से भींच लिए। अब मैं उसके ऊपर आ गया और उकडू होकर उसकी जाँघों पर बैठ गया। अब मैंने अपने एक हाथ की अँगुलियों से उसकी बुर के पपोटों को खोला और फिर अपने लंड को उस पर घिसने लगा।

सुहाना का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरी भी हालत वैसी ही हो रही थी। कितने दिनों की प्यास आज बुझने वाली थी। लंड तो अब ठुमकने ही लगा था और बार-बार उछलकर मेरे हाथों से फिसलता ही जा रहा था।

अब मैंने अपने लंड को सही निशाने पर लगाया और फिर धीरे से अपना सुपारा उसके छेद में डालने की कोशिश करने लगा। छेद इतना तंग और कसा हुआ था कि एक बार तो मुझे लगा यह इसके अन्दर जा ही नहीं सकता। इसका एक कारण तो यह था कि सुहाना डरी हुई भी थी और उसने अपनी जांघें और बुर को भींच सा रखा था।

“रिलेक्स बेबी … इतना डरने की कोई जरूरत नहीं है … अपने आप को ढीला छोड़ दो … डरो नहीं कुछ नहीं होगा … मैं तुम्हें दर्द बिल्कुल नहीं होने दूंगा.”

“आह …” सुहाना ने अपना सिर दूसरी ओर घुमा लिया।

अब मैंने फिर से अपने लंड को 2-3 बार घिसते हुए उसकी बुर के चीरे पर फिराया और फिर से छेद पर लगाकर अन्दर घुसाने के लिए थोड़ा जोर लगाया।

दोस्तो … खेली खाई औरत हो तो इस समय एक ही धक्के में किला फ़तेह किया जा सकता है. पर सुहाना जैसी कमसिन कलि के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता था।

मेरे थोड़े प्रयास के बाद मुझे लगा सुहाना की बुर ने थोड़ा रास्ता देना शुरू कर दिया है और मेरा लंड थोड़ा अन्दर सरकने लगा है।

“आआईईई … आमी मर जाबे … आह …” सुहाना अपना हाथ बढ़ाकर अपने बुर को टटोलने की कोशिश करने लगी और अपना एक हाथ मेरे सीने पर लगाकर मुझे दूर हटाने की कोशिश करने लगी।

“बस मेरी जान … हो गया.” कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ कर हटा दिया।

“आईईइ … सर.. बहुत दर्द हो रहा है … प्लीज अब निकाल लो.”

“रिलेक्स बेबी रिलेक्स … बस-बस हो गया … तुम हिलो मत … बिल्कुल ढीला छोड़ दो अपने आप को! शाबास गुड गर्ल!”

सुहाना ने अपने आप को थोड़ा ढीला छोड़ दिया था। मैंने उसके पेडू और पेट पर हाथ फिराना चालू कर दिया।

सुहाना की बंद आँखों से आंसू निकल कर उसकी कनपटियों पर आने लगे थे। मैंने एक हाथ बढ़ाकर उन्हें पौंछ दिया और फिर अपने लंड को थोड़ा सा बाहर करते हुए फिर से अन्दर डाल दिया।

इस बार मुझे लगा सुहाना की बुर ने थोड़ा रास्ता और दे दिया है और मेरा आधा लंड अन्दर चला गया है।

“आई … प्लीज … रुको … ओह … बहुत दर्द हो रहा है.”

अब मैं कोहनियों के बल होकर उसके ऊपर आ गया। मैंने ध्यान रखा मेरे शरीर का पूरा बोझ उस पर नहीं पड़े।

“बस बेबी … अब तो पूरा चला गया है अब दर्द नहीं होगा.”

“क्या पूरा चला गया?”

“हाँ बेबी …” शायद उसे विश्वास नहीं हो रहा था। और सच तो यह था कि मेरा आधा लंड अभी भी बाहर ही था। आप मेरी हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं मैंने किस प्रकार अपने आपको रोक कर रखा था।

अब मैंने सुहाना के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और पहले तो उनपर चुम्बन लिया और फिर उनपर अपने होंठों को फिराने लगा। सुहाना ने कोई ज्यादा ऐतराज नहीं किया अलबता आँखें बंद किए चुपचाप लेटी रही।

“सुहाना तुम बहुत खूबसूरत हो.”

“आह … सर.. अब निकाल लो … प्लीज!”

“ओहो … बस एक मिनट और रुको … मैं अपने आप बाहर निकाल दूंगा. तुम चिंता मत करो।”

अब मैंने अपने हाथ उसके उरोजों पर रख दिए और कुर्ती के ऊपर से ही उन्हें धीरे-धीरे मसलने लगा।

“आह …” जिस प्रकार से उसके मुंह से आवाज निकल रही थी मुझे लगता है उसे अब ज्यादा दर्द नहीं हो रहा है।

अब तो उसे बातों में उलझाए रखना होगा- अरे सुहाना?

“हम्म?”

“तुम्हारा जो प्रोजेक्ट है ना?”

“हम्म?”

“उसमें एक और करेक्शन अगर हो जाए तो तुम्हारी क्लास का यह सबसे बेस्ट प्रोजेक्ट होगा.”

“कैसा करेक्शन?”

“वो जो तुमने अलग-अलग कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के डाटा दिए हैं अगर उनको ग्राफ की शेप में दिखाया जाए तो बहुत अच्छा रहेगा. और अगर तुम कहो तो यह सब काम तो मैं खुद ही कर दूंगा.”

“थैंक यू सर …” अब तो सुहाना रिलेक्स हो गई थी।

“सर प्लीज … अब बाहर निकाल लो ना?”

“क्या तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा?” कहते हुए मैंने अपने लंड को थोड़ा सा और अन्दर सरका दिया।

अब तक सुहाना की बुर ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया था और मेरे लंड को आगे सरकने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी।

“वो.. वो …” कहते हुए सुहाना चुप हो गई।
 
मुझे लगता है उसे यह सब अच्छा तो जरूर लग रहा होगा पर डर के मारे अभी वह इसे स्वीकार नहीं कर पा रही है। उसकी बुर तो अब संकोचन भी करने लगी है।

“सुहाना सच में तुम बहुत खूबसूरत हो!”

अब मैंने उसकी कुर्ती को थोड़ा सा ऊपर करते हुए उसके उरोजों के ऊपर तक कर दिया। सुहाना ने ब्रा की जगह समीज पहनी थी। गोरे रंग की दो नारंगियाँ और उनके ऊपर गुलाबी रंग के चूचुक और उनके शिखर पर चने के दाने जितने निप्पल।

मैंने पहले तो एक उरोज पर जीभ लगाई और फिर उसके निप्पल को मुंह में भर कर चूमने लगा।

“आ..ह … क्या कर रहे हो सर … आईई. आह … ऐसे मत करो सर … आह!” सुहाना का प्रतिरोध कम होने लगा था।

मैंने धीरे-धीरे अपने लंड को अन्दर बाहर करते हुए पूरा अन्दर सरका दिया। सुहाना की बुर के अन्दर क्रीम भी लगी थी और उसकी बुर अब तक पानी भी छोड़ने लगी थी तो मेरे लंड को अन्दर जाने में कोई ज्यादा दिक्कत भला कैसे हो सकती थी।

अब तो सुहाना शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से तैयार हो चुकी थी। अब तो मैंने उसके उरोजों को चूसने के साथ-साथ अपने लंड से हल्के धक्के लगाते हुए अपने लंड को अन्दर बाहर भी करना चालू कर दिया था। अब तो सुहाना की भी हल्की-हल्की सीत्कारें निकलने लगी थी।

वैसे प्रकृति ने हर प्राणी में काम भावना को कूट-कूट कर भरा है। बस इसे ज़रा सी चिंगारी दिखाने की जरूरत होती है. फिर तो यह दावानल की तरह भड़कने लगती है।

सुहाना की भी इस समय यही हालत थी। उसे भी इस क्रिया में उतना ही आनंद आ रहा था जितना मुझे!पर वह प्रत्यक्ष रूप से इसे दर्शाना नहीं चाह रही थी।

उसने अपनी आँखें बन्द कर रखी थी और उसके मुंह से आह … ऊंग ईईइ … सीईई की आवाजें निकलती जा रही थी। मुझे लगा कि सुहाना का शरीर कुछ अकड़ने सा लगा है। उसकी सांसें बहुत तेज हो गई और उसने अपनी मुट्ठियाँ और जोर से भींच ली।

मुझे लगा मेरे लंड पर उसकी बुर ने शिकंजा सा बना लिया है।

मैंने अपने लंड को 2-3 बार और अन्दर-बाहर किया।

“सर मुझे चक्कर से आ रहे हैं … आह … उईई … मॉम … आह …”

“बस बस मेरी जान … रिलेक्स हो जाओ … कुछ नहीं होगा तुम्हें तो अब बहुत बड़े आनंद की अनुभूति होने वाली है.”

“अईईईई ईईईई …” और उसके साथ सुहाना का शरीर ढीला सा पड़ने लगा.

वह जोर-जोर से साँसें लेने लगी जैसे किसी पहाड़ पर चढने के बाद होता है।

मैंने उसके होंठों को फिर से चूम लिया।

“सुहाना सच बताना तुम्हें अच्छा लगा ना?”

“वो मुझे चक्कर से क्यों आ रहे थे?”

“अरे बेबी … इसे ओर्गास्म कहते हैं यही तो उस परम आनंद की पराकाष्ठा है जिसे जो हर स्त्री और पुरुष दोनों ही हर सम्भोग में पाना चाहते हैं।” कहते हुए मैंने 2-3 धक्के और लगा दिए।

सुहाना की तो अब मीठी सीत्कारें और आहें निकलने लगी थी। उसने अपने पैर थोड़े ऊपर करने की कोशिश की तो उसके पैरों में पायजामा उलझ सा गया।

अब सुहाना ने अपने पजामे को दोनों पैरों में फंसाकर निकाल दिया और फिर अपनी जांघें और ज्यादा खोलकर अपने नितम्ब उचकाने लगी।

लगता है सुहाना को भी अब अच्छा लगने लगा है।

“सुहाना … मेरी जान … तुम बहुत खूबसूरत हो … अगर तुम अपनी यह कुर्ती भी निकाल दो तो तुम्हें और ज्यादा आनंद की अनुभूति होगी।”

“आह … प्लीज … अब मुझे जाने दो … प्लीज … आह … ईईईईईइ …” कहते हुए उसने अपने हाथ मेरी पीठ पर रखते हुए जोर से भींच लिए। मुझे लगता है उसका एक बार फिर से ओर्गास्म हो गया है।

उसके शरीर ने 3-4 झटके से खाए और वह फिर से ढीली पड़ गई।

थोड़े देर बाद उसने मेरे सीने पर अपने हाथ लगाकर मुझे अपने ऊपर से हटाने की कोशिश की।

“क्या हुआ बेबी?”

“वो … वो … कुर्ती.”

“क्या हुआ कुर्ती को?”

“यह गले में फंस रही है.”

“तो फिर इसको निकाल ही दो.”

सुहाना मेरी ओर देखते हुए कुछ सोचने लगी थी।

थोड़ी देर बाद उसने एक लम्बी साँस लेते हुए अपनी गर्दन थोड़ी सी ऊपर उठाई और फिर कुर्ती और समीज निकालने की कोशिश करने लगी।

मैं तो चाहता था वह अपनी इस कच्छी को भी निकाल फेंके पर साथ में मुझे यह भी डर सता रहा था कि कच्छी निकालने के चक्कर में मुझे अपना लंड बाहर निकालना पड़ेगा और हो सकता है फिर सुहाना इसे दुबारा अन्दर डलवाने से मना कर दे।

और फिर हो सकता है मुझे बीच मझधार में ही छोड़ कर रफ्फूचक्कर हो जाए।

मैं कतई ऐसी जोखिम नहीं उठा सकता था, मैंने हाथ बढ़ाकर उसकी समीज और कुर्ती निकाल दी और सुहाना फिर से तकिए पर अपना सिर लगाकर लेट गई।

अब तो सुहाना का पूरा नग्न सौन्दर्य मेरी आँखों के सामने था। गोल नितम्बों के ऊपर पतली सी कमर और उभरे हुए से पेडू के ऊपर गोल गहरी नाभि। दोनों उरोज तो ऐसे लग रहे थे जैसे दो नन्हे परिंदे आजादी की राह ही तक रहे थे। उनकी फुनगियाँ तो अकड़कर और भी नुकीली हो गई थी। पतली सुराहीदार गर्दन और लम्बे छछहरी बांहों की रोम विहीन कांख।

एक बार तो मुझे धोखा सा हुआ शायद उसकी कांख में अभी बाल आये ही नहीं होंगे पर लगता है उसने या तो वैक्सिंग की होगी या कोई हेयर रिमूवर लगाया होगा।

आह … मैं तो उससे निकलती गंध से मदहोश ही हो चला था।

मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और मैंने अपनी जीभ उसकी कांख से लगा दी।
 
मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और मैंने अपनी जीभ उसकी कांख से लगा दी।

“आआई ईईईई …” सुहाना के मुंह से एक किलकारी सी निकल गई। वह अपने नितम्ब उचकाने लगी थी। अब मैंने फिर से हल्के-हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिए। सुहाना ने रोमांच के मारे अपनी जांघें और भी खोल दी। अब तो मेरा लंड सरपट दौड़ाने सा लगा था।

“सुहाना कैसा लग रहा है?”

“आह … अब कुछ मत पूछो … आह … आपने मुझे पागल सा कर दिया है आह … उईईईईइ … मा …” सुहाना पता नहीं क्या बड़बड़ा रही थी।

और फिर उसने मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और मेरे होंठों को चूमने लगी। मैंने अपना एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे लगा लिया और दूसरे हाथ से उसके उरोजों को दबाने लगा। सुहाना मदहोश हुई मुझे चूमे जा रही थी और साथ में सीत्कारें लेती अपने नितम्बों को भी मेरे धक्कों के साथ हिलाती जा रही थी।

दोस्तो! मैं तो चाहता था हमारा यह प्रेम मिलन अनंत काल तक चलता जाए!

पर आखिर शरीर की एक सीमा होती है। मुझे लगाने लगा था मैं अब उत्तेजना के उच्चतम शिखर पर पहुँचने वाला हूँ और अब किसी भी समय मेरा स्खलन हो सकता है।

सुहाना का इस दौरान उसका 2 बार और ओर्गास्म हो गया था। और अब तो वह आँखें बंद किए मस्त मोरनी बनी सपनों की दुनिया में खोई इस आनंद को भोगते जा रही थी।

मैंने अपने धक्कों की गति थोड़ी बढ़ा दी और मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होने की तैयारी करने लगा।

अचानक सुहाना ने अपनी बाहें मेरी पीठ पर जोर से कस लीं और अपने दोनों घुटने ऊपर उठा लिए।

“आह … आआ … ईईइ …” की आवाज के साथ उसने अपने पैर धड़ाम से नीचे कर दिए और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी।

और उसके साथ ही मेरी भी पिचकारियाँ निकल कर निरोध को भरती चली गई। काश! इस समय इस निरोध की दीवार हम दोनों के बीच ना होती। 2-3 मिनट मैं उसके ऊपर ही लेटा रहा। मुझे हैरानी हो रही थी सुहाना को मेरे शरीर का भार बिल्कुल नहीं लग रहा था। मैंने उसके होंठों को चूमते हए उसका धन्यवाद किया और फिर उसके ऊपर से उठ खड़ा हुआ।

सुहाना लम्बी लम्बी साँसें लेती हुई ऐसे ही लेटी रही। बेचारी पतली सी कच्छी की हालत देखकर तो उसकी बुर की हालत का अंदाज़ा लगाया ही जा सकता था। उसकी बुर से निकले कामरज से वह भीग सी गई थी। उसके पपोटे सूज कर और भी मोटे हो गए थे और उसकी लीबिया (अंदरूनी होंठ) तो ऐसे लग रहे थे जैसे किसी गुलाब की अध खिली कलि को बेदर्दी से मसल दिया हो ।

मैंने नीचे होकर एक बार उन कलिकाओं को चूमने की कोशिश की तो सुहाना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा- हट! की कोरचे? (हटो! क्या कर रहे हो?)

और फिर उसने अपने हाथ अपनी बुर पर रखते हुए उसे ढक लिया।

थोड़ी देर बाद सुहाना अपने कपड़े उठाकर लंगड़ाती हुई बाथरूम में चली गई।

हे भगवान् गोल कसे हुए नितम्बों की लचक तो कोमल और सिमरन से भी अधिक मादक थी। मेरा मन तो उसके साथ ही बाथरूम में जाने का कर रहा था पर मैंने अपने आप को रोक लिया।

थोड़ी देर में सुहाना बाथरूम से वापस आ गई। उसने अपने कपड़े पहन लिए थे। जब तक मैं बाथरूम से वापस आया सुहाना बाहर हॉल में आ गई थी और मेरे लैपटॉप से फाइल्स डिलीट करने की कोशिश में लगी हुयी थी।

“सर … वो फाइल्स डिलीट कर दो ना अब?”

“ओह … हाँ मेरी बुलबुल … लो मैं तुम्हारे सामने सारी फाइल्स डिलीट कर देता हूँ।”

और फिर मैंने सच में फाइल्स और फोटोज को परमानेंटली डिलीट कर दिया।

“वो … मोबाइल में भी थी ना?”

“लो तुम अपने हाथों से पूरी गैलरी की सारी पिक्चर और फाइल्स ही डिलीट कर दो!” कहते हुए मैंने उसे अपना मोबाइल पकड़ा दिया।

सुहाना ने सारी फोटो और विडियोज डिलीट करने के बाद पूछा- वो … मेरा प्रोजेक्ट?

“अरे बेबी! तुम क्यों चिंता कर रही हो? तुम थक गई होगी … आओ … पहले हम दोनों नाश्ता कर लेते हैं फिर मैं फ़टाफ़ट तुम्हारा प्रोजेक्ट कम्पलीट कर देता हूँ।”

और फिर सुहाना अपना प्रोजेक्ट कम्पलीट करवा कर अपने घर चली गई.

और मैं सोफे पर ही आराम से पसर गया।

मेरा मन तो पीहू नामक उस फुलझड़ी का भी प्रोजेक्ट इसी प्रकार कम्पलीट करने का कर रहा था पर यह सब कहाँ संभव हो सकता था। हे लिंग देव मैंने जो चाहा और जो माँगा तुमने अपनी रहमत के सारे खजाने मेरी झोली में डाल दिए हैं।

अगले दिन नये बॉस ने ऑफिस ज्वाइन कर लिया और मेरे लिए 3 दिन बाद का बंगलुरु जाने का प्रोग्राम बना दिया। भरतपुर से सीधी फ्लाइट नहीं है इसलिए मैंने आगरा से बंगलुरु के लिए फ्लाइट की टिकट बुक करवा ली।

10 बजे की बंगलुरु के लिए फ्लाइट थी तो सुबह जल्दी आगरा के लिए निकलना होगा। नताशा तो पहले ही ट्रेन से बंगलुरु चली भी गई थी। मेरा मन तो नताशा के साथ ही जाने का कर रहा था पर वक़्त की नजाकत देखते हुए उसे पहले ही भेजना सही था।

सानिया का फोन आया था कि कल सुबह वह काम पर आ जायेगी। मेरा मन तो जाते-जाते बस एक-बार फिर से सानिया मिर्ज़ा को जी भर के चोद लेने को करने लगा था। पर सब कुछ अपने मन के मुताबिक़ कहाँ हो पाता है।

मैं सानिया का इंतज़ार कर रहा था और सोच रहा था आज एक बार से फिर से उन्ही पलों को दोहरा लिया जाए.

पर मैंने देखा उसके साथ गुलाबो भी आ धमकी है।

आप सोच सकते हैं मुझे मधुर और गुलाबो पर कितना गुस्सा आया होगा। साली यह किस्मत भी लौड़े लगाने से बाज नहीं आने वाली। अब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। कल मधुर का भी फोन आया था तो मैंने उसे बंगलुरु जाने के प्रोग्राम के बारे में बता दिया था।

ओह … तो यह सब उस मधुर की बच्ची का कारनामा है लगता है उसी ने गुलाबो को मेरे बंगलुरु जाने वाली बात गुलाबो को बताई होगी. और रसोई में जो राशन आदि बचा है उसे भी ले जाए और कुछ पैसे भी ले जाए।

बेचारी सानिया तो उदास नज़रों से बस मेरी ओर ताकती ही रह गई थी।

काश! आज एक घंटा इस फुलझड़ी के साथ बिताने को मिल जाता तो 3-4 दिनों की कसर इसी एक घंटे में ही पूरी हो जाती।
 
सानिया सफाई में लग गई और गुलाबो रसोई में मेरे लिए नाश्ता चाय बनाने लगी।

मैंने तो मना भी किया पर वह मानी ही नहीं।

अनमना सा होकर मैं बेड रूम में आकर लेट गया। मैं सोच रहा था काश! एकबार बस 2 मिनट के ही सानिया कमरे में आ जाए। मैं एक बार उसे गले से लगाकर चूम लेना चाहता था।

इतने में सानिया हाथों में झाडू लिए सफाई के लिए आ गई और उसने दरवाजे का पल्ला थोड़ा भिड़ा दिया।

मैंने झट से उसे बांहों में भर लिया और चूमने लगा।

“सानू मेरी जान … इन 4 दिनों में मैंने तुम्हें बहुत याद किया.”

सानिया बेचारी क्या बोलती वह तो मेरे सीने से लगी बस रोने ही लगी थी।

“सर … मैं आपके बिना मल जाऊंगी … आप जल्दी आ जाओगे ना?”

“हाँ मेरी जान मैं भी अब तुमसे दूर नहीं रह सकता मैं जल्दी ही वापस आ जाउंगा।” कहते हुए मैंने उसके गालों पर लुढ़कते हुए आसुओं को चूम लिया। सानिया मेरे सीने से लगी रोती रही। मेरी बेबसी देखो मैं तो उसे ठीक से सांत्वना भी नहीं दे पाया।

साली समस्याएं पीछा ही नहीं छोड़ती। मुझे नहीं लगता मधुर का जल्दी आने का कोई प्रोग्राम है। 3-4 महीनों के लिए घर खाली छोड़ना भी मुश्किल काम होता है। यह तो अच्छा हुआ कि मेरे साथ ऑफिस में काम करने वाले गुलाटी का कोई जानकार हमारे मकान में रहने के लिए तैयार हो गया था तो दोनों कमरों में पड़ा सामान एक कमरे में शिफ्ट कर दिया। और फिर घर की एक चाबी गुलाटी को भिजवा दी।

गुलाबो रसोईघर में रखा बचाखुचा राशन और फ्रिज़ में रखी मिठाई, सब्जियां और आइसक्रीम आदि लेकर चली गई।

मैंने उसे मधुर के कहे अनुसार 4000 रुपए भी दे दिए।

सानिया ने जाते समय उदास आँखों से मुझे एक बार देखा। उसके हृदय की असीम पीड़ा मेरे अलावा कोई ओर कैसे जान सकता था।

एक मन तो कर रहा था कि मैं मुंबई होते हुए निकल जाऊं। पता नहीं आज क्यों बार-बार कोमल की याद आ रही थी। साली मधुर ने तो एक बार भी मुंबई होते हुए निकल जाने के लिए नहीं बोला था।

कोई बात नहीं मुंबई की बाद में सोचेंगे मैं जल्दी से जल्दी बंगलुरु पहुँचना चाहता था वहाँ वह पूरी बोतल का नशा पलक पांवड़े बिछाए हमारा इंतज़ार कर रही है।

उसका तो 2-3 बार फोन भी आ चुका है।

पहले बंगलुरु एयरपोर्ट और बाद में होटल पहुंचते-पहुंचते 4 बज गए थे। रॉयल ऑकिड होटल में एक डीलक्स रूम मैंने पहले ही बुक करवा लिया था। मैंने अपने पहुँचने की खबर नताशा को दे दी और उसे रूम नंबर भी बता दिया था। फिर मैं चाय का आर्डर देकर मैं फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चला आया।

मैं अभी फ्रेश होकर रूम में आया ही था कि कॉल बेल बजी। मैं समझा वेटर चाय लेकर आया होगा। जैसे ही मैंने रूम का दरवाजा खोला तो सामने नताशा जलवा अफरोज थी।

नताशा ने अपने खुले बालों को एक चोटी की शक्ल में रबड़ बैंड से बाँधकर अपने उरोजों पर डाल रखा था। माथे पर छोटी सी बिंदी लगा रखी थी और और कानों के ऊपर सोने की छोटी छोटी डबल बालियाँ पहन रखी थी।

उसने स्पोर्ट्स शूज, सफ़ेद रंग की जीन पैंट और खुला टॉप पहन रखा था। इस कपड़ों में तो उसके नितम्ब इतने कसे हुए लग रहे थे जैसे अभी पैंट को फाड़कर बाहर आ जायेंगे। जीन पैंट के पीछे हिप्स के ऊपर एक तीर का निशान भी बना हुआ था।

वाह … क्या रबड़ बैंड की तरह टाईट गांड है। टॉप के अन्दर झांकते गोल उरोजों की घुन्डियाँ तो बहुत नुकीली सी लग रही थी। लगता था जैसे नीम की पकी हुयी निम्बोलियाँ हों।

उसने शायद काले रंग की ब्रा पहनी हुयी थी जिसकी पट्टियां साफ़ दिख रही थी।

हे भगवान् लगता है इसने पैंटी भी काले रंग की ही पहनी होगी। होंठों पर गुलाबी लिपस्टिक और लम्बी सुतवां बांहों के नीचे कलाइयों में एक एक चूड़ी … कजरारी नशीली आँखों के ऊपर पतली पतली पैनी कटार सी आई ब्रो (भोंहें) … कानों में छोटी-छोटी बालियाँ उफ्फ … शरीर से मदहोश कर देने वाली जवान जिस्म और परफ्यूम की मिलीजुली खुशबू …

मैं तो टकटकी लगाए बस उसे देखता ही रह गया। मुझे तो लगा उसके इस रूप की गर्मी से मैं तो पिंघल ही जाउंगा।

“गुड इवनिंग सर!” नताशा की मखमली आवाज सुनकर मैं चौंका।

“अरे … ओह … हाँ … नताशा … तुम? ओह … प्लीज आओ अन्दर आओ.”

नताशा ‘थैंक यू’ कहते हुए अन्दर आ गई।

मैंने कमरे की चिटकनी लगा दी। नताशा थोड़ा सा हट कर खड़ी हो गई।

“आओ नताशा … प्लीज बैठो!” मैंने सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा.

तो नताशा सुस्त कदमों से चलते हुए सोफे पर बैठ गई और अपने हाथ में पकड़ा काले रंग का ऑफिस बैग टेबल पर रख दिया।

वह एक हाथ से अपने लम्बे बालों की चोटी को सहलाती हुयी पता नहीं क्या सोचे जा रही थी।

“आपने तो सुबह चलने से पहले मुझे फोन ही नहीं किया?”

“ओह.. हाँ … वो दरअसल फ्लाईट थोड़ा लेट थी.”

“आप मुझे पहले बता देते तो मैं एयरपोर्ट पर आपको लेने आ जाती.” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।

हे भगवान्! उसकी नशीली आँखों में तो लाल डोरे से तैर रहे थे लगता था जैसे 2-3 रातों से नींद ही ना आई हो। सच कहूं तो इस समय मेरे कानों में भी सीटियाँ सी बजने लगी थी और मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था।

“ओह … थैंक यू … डिअर, मैंने सोचा तुम्हें परेशानी होगी.”

“आपने तो मुझे याद ही नहीं किया?” नताशा ने उलाहना सा दिया और अपने हाथों की अंगुलियाँ चटकाने सी लगी।

“ओह … हाँ … वो ऑफिस का चार्ज देने में ही सारा टाइम निकल गया। मधुर को भी फोन करने का समय नहीं मिला। अब यहाँ पहुँचते ही सबसे पहले तुम्हें ही फोन किया।”

“आपको मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा क्या?”
 
“अरे नहीं … तुम ऐसा क्यों सोच रही हो?”

“आपने तो बस थैंक यू बोलकर ही निपटा दिया … क्या आये हुए मेहमान का इतना नीरस (बिना मन के) स्वागत करते हैं?” कहते हुए नताशा सोफे से उठकर खड़ी हो गई।

“ओह आई एम् सॉरी … बट …”

मेरे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए। मुझे तो डर लगने लगा था कहीं वह रूठकर जाने वाली तो नहीं है।

अब मैं भी सोफे से उठकर खड़ा हो गया तो वह मेरे पास आ गई। उसकी साँसें बहुत तेज चल रही थी। आँखों में तो जैसे कोई सैलाब सा उमड़ आया लग रहा था।

और फिर इससे पहले कि मैं कुछ बोलता या करता नताशा ने मेरे गले में अपनी रेशमी बाहें डाल दी और अपना सिर मेरी छाती से लगा दिया।

“प … प्रेम …” उसके मुंह से कांपती सी आवाज निकली।

मेरे लिए यह सब अविश्वसनीय सा था। मुझे थोड़ा अंदाज़ा तो था पर इतनी जल्दी नताशा यह सब कर बैठेगी मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था।

और फिर मैंने भी उसे अपनी बांहों में भर लिया और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। नताशा जोर-जोर से मेरे होंठ चूमने लगी।

“प्रेम तुम कितने निष्ठुर हो.”

“क … क्या मतलब?”

“मैं आपके आने की कितनी आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी और आपको तो मेरे से मिलने की कोई उत्सुकता ही नहीं लग रही है?”

“ओह … वो … सॉरी …” कहकर मैंने उसे एक बार फिर से जोर से अपनी बांहों में भींचा और उसके होंठों को चूम लिया।

मेरे हाथ उसकी पीठ से होते हुए नितम्बों की ओर बढ़ने ही वाले थे कि कॉल बेल बजी। नताशा छिटक कर मेरी बांहों से दूर हो गई और घबराकर मेरी ओर देखने लगी।

लग गए लौड़े!!

“ओह … शायद वेटर आया होगा मैंने चाय का आर्डर दिया था।”

नताशा सोफे पर बैठ गई और मैं दरवाजा खोलने चला आया। सामने चाय की ट्रे लिए वेटर खड़ा था। मैंने उसे अन्दर आकर चाय रखने का इशारा किया तो वह चाय का थर्मस और कप रखकर चला गया।

वेटर के जाने के बाद मैंने फिर से दरवाजे की चिटकनी बंद करके मैं जैसे ही मुड़ा तब तक नताशा मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई थी।

मैं तो सोच रहा था नताशा चाय को कप में डाल रही होगी।

और इससे पहले कि मैं कुछ बोलता नताशा ने अपनी बांहों मेरी ओर फैला दी। मैंने एक बार कसकर फिर से उसे बांहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगा। नताशा ने अपनी बाहें मेरी गर्दन में दाल दी।

मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और हम बेड पर आ गए। मैंने उसे बेड पर लेटाने की कोशिश की पर वह मेरे गले में अपनी बांहें डाले रही। मैंने थोड़ा सा उठने की कोशिश की तो नताशा ने मुझे अपनी ओर खींच लिया तो मेरा संतुलन बिगड़ सा गया और मैं उसके ऊपर आ गया।

नताशा मुझे पागलों की तरह चूमने लगी।

“प्रेम … तुमने तो मुझे पागल ही कर दिया है.” कहते हुए उसने मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और जोर-जोर से चुम्बन लेने लगी।

अब मैंने भी अपने एक हाथ से उसके एक उरोज को पकड़कर मसलना शुरू कर दिया और अपना एक पैर उसकी जाँघों के बीच फंसा लिया। जीन पैंट में कसी रेशम सी मुलायम जांघों का अहसास पाते ही मेरा लंड तो कसमसाने लगा।

और फिर जैसे ही मैंने एक हाथ उसकी जांघों के संधिस्थल के पास फिराने की कोशिश की.

नताशा ने कहा- एक मिनट प्लीज!

“क.. क्या हुआ?”

“प्लीज ये लाईट बंद कर दो और परदे भी लगा दो पहले!”

“ओह … हाँ.”

मैंने उठकर पहले तो परदे खींच दिए और फिर लाईट भी बंद कर दी।

जैसे ही मैं बेड की ओर आया तो नताशा अपने बैग से कुछ निकालने की कोशिश करने लगी। उसने अपना मोबाइल निकालकर उसे स्विच ऑफ कर दिया।

मेरे साथ तो कई बार ऐसा होता ही आया है। ऐन मौके पर साला यह मोबाइल जरूर खड़कने लग जाता है। मैंने भी अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।

उसके बाद मैं इधर-उधर कमरे में नज़र दौड़ाई। मैं यह यकीनी बना लेना चाहता था कि कोई सी.सी. कैमरा तो नहीं लगा। हालांकि अच्छे होटलों में ऐसा साधारणतया होता तो नहीं है पर सावधानी में ही सुरक्षा होती है।

“ओहो … क्या सोचने लगे?”

मैं नताशा की आवाज सुनकर चौंका।

“ओह.. सॉरी नथिंग … वो मेरा मतलब था अगर चाय पीने की इच्छा हो तो?” कई बार तो साली यह जबान भी साथ नहीं देती।

“ओहो … मैं आपके लिए मरी जा रही हूँ और आपको चाय की लगी है?”

“ओह … स..सॉरी …”

साली इन हसीनाओं की यही अदाएं और नखरे तो आदमी को अफलातून बना देते हैं उनके सामने तो दिमाग जैसे काम करना ही बंद कर देता है।
 
साली इन हसीनाओं की यही अदाएं और नखरे तो आदमी को अफलातून बना देते हैं उनके सामने तो दिमाग जैसे काम करना ही बंद कर देता है।

अब मैंने फिर से उसे जोर बांहों में भींच लिया और एक चुम्बन उसके होंठों पर लेते हुए उसके होंठों को अपने मुंह में भर लिया।

नताशा तो गूं … गूं … करती ही रह गई।

“नताशा क … कपड़े निकाल दें क्या?”

“क्या यह भी मुझे ही बताना होगा?” उसने पहले तो तिरछी निगाहों से मेरी ओर देखा और बाद में मुस्कुराने लगी।

और फिर मैंने जल्दी से अपनी शर्ट, पैंट और बनियान भी उतार फेंका। इस समय मेरा लंड तो बन्दूक की नली की तरह इतना तना हुआ कि लग रहा था जैसे चड्डी को फाड़कर ही बाहर आ जाएगा नताशा अपलक उसी की ओर देखे जा रही थी।

अपने कपड़े निकालने के बाद मैंने नताशा पहले तो उसके शूज निकाले और फिर उसके पांवों की कोमल एड़ियों पर अपनी अंगुलियाँ फिराने लगा और बाद में उन्हें चूम लिया। नताशा के पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई और वह मुझे हैरानी भरी नज़रों से मुझे देखने लगी थी।

आपको भी एक बात बताना चाहूँगा जिन लड़कियों की एड़ियां जितनी पतली, चिकनी, मुलायम और गोरी होती हैं वो बहुत सेक्सी भी होती हैं। अब तो आप भी अंदाज़ा लगा सकते हैं उसकी बुर के होंठ भी कितने गुलाबी और सेक्सी होंगे।

अब मैंने उसकी पैंट को टखनों के ऊपर से पकड़ कर निकालने की कोशिश की तो नताशा ने मेरी सहूलियत के लिए अपनी पैंट की बेल्ट खोल दी. और फिर जिप खोलकर अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए।

लगता है नताशा को तो मेरे से भी ज्यादा जल्दी थी। अब मैंने उसकी पैंट को खींच कर निकाल दिया।

हे भगवान! सुतवां टांगें, पतली पिंडलियाँ और घुटनों के ऊपर कोमल, मखमली, गुदाज़ जांघें देख कर तो मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा कि मुझे लगा यह कहीं धोखा ही ना दे दे।

काले रंग की नेट वाली पैंटी फंसी उसकी बुर का उभरा हुआ भाग देख कर तो मेरा लंड उसे सलामी ही देने लगा था। उसके पपोटों के बीच की दरार में पैंटी इस तरह फंसी थी कि दोनों पपोटे अलग अलग महसूस किए जा सकते थे।

उसकी गोल नाभि के नीचे उभरे हुए से पेडू पर एक छोटा सा जानलेवा काला तिल भी बना था। लगता है भगवान् ने इस मुजसम्मे को फुर्सत में तारशा है।

अब मैं उसके पास आकर बैठ गया और उसके टॉप को पकड़कर निकालने की कोशिश की तो नताशा बिना कोई ना नुकर के अपने हाथ ऊपर उठा दिए।

मैंने उसका टॉप निकाल दिया।

काले रंग की नेट वाली ब्रा में उसके उरोज भरे पूरे लग रहे थे जैसे दो अनार जबरन कस कर बंद दिए हों।

हे भगवान्! उसकी मक्खन जैसी चिकनी बगलों में तो एक भी बाल क्या रोयाँ तक नहीं था। मुझे लगता है उसने आज ही वैक्सिंग या हेयर रिमूवर क्रीम से बालों को साफ़ किया होगा। याल्ला … तब तो उसने अपनी मुनिया को भी इसी तरह चकाचक बनाया होगा।

अब मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फिराना चालू किया तो नताशा ने एक लम्बी सी साँस ली। शायद वह अगले पलों के लिए अपने आप को संयत और तैयार कर रही थी।

पतली कमर में बंधी काले रंग की जालीदार (नेट वाली) पैंटी के बीच मोटे-मोटे पपोटों वाली बुर की खूबसूरती का अंदाज़ा आप बखूबी लगा सकते हैं।

मैंने झुककर उनपर एक चुम्बन ले लिया। नताशा की एक मीठी सीत्कार ही निकल गई। मेरा स्नायुतंत्र एक मदहोश कर देने वाली खुशबू से महक उठा। लगता है उसने कोई खुशबू वाली क्रीम लगाई होगी। अब मैंने उसके पेडू, पेट, गहरी नाभि पर भी चुम्बन लेने शुरू कर दिए। नताशा तो अभी से आह … ऊंह … करने लगी थी।

एक बात तो है शादीशुदा औरतों के साथ यह बहुत बड़ी सहूलियत होती है कि वे एकबार राजी हो जाएँ तो फिर ज्यादा ना नुकर या बवाल खड़ा नहीं करती और पूरे समर्पण के साथ प्रेम लीला को सम्पूर्ण करवाती हैं।

अब मैंने उसका सिर अपने हाथों में पकड़कर उसके गालों पर चुम्बन लेते हुए पहले तो उसकी ब्रा की डोरी खींच दी और उसके खूबसूरत परिंदों को आजाद कर दिया।

मोटे-मोटे कंधारी अनारों के मानिंद दो अमृत कलश हो जैसे। नताशा तो बस आँखें बंद किए अगले पलों का इंतज़ार सा करने लगी थी. तो अब उसकी पैंटी को उतारने में अब ज्यादा समय कहाँ लगने वाला था.

जैसे ही मैंने उसकी पैंटी की डोरी को खोलकर निकालने की कोशिश की उसने अपने नितम्ब उठा दिए. तो पैंटी को निकालने में ज़रा भी समय बर्बाद नहीं हुआ।

मैंने पैंटी को अपने हाथ में पकड़ कर पहले तो उसे गौर से देखा और फिर उसे सूंघने का उपक्रम करने लगा। मेरे नथुनों में जवान जिस्म की मदहोश कर देने वाली खुशबू समा गई। नताशा इन हरकतों को बड़े ध्यान से देख रही थी।

अब उसने मेरी चड्डी के ऊपर से ही मेरे लंड को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया। मेरा लंड तो उसकी नाजुक अँगुलियों का स्पर्श पाते ही उछलने ही लगा था। नताशा ने मेरी चड्डी के इलास्टिक को पकड़ कर नीचे खींच दिया। अब तो मेरा लंड किसी स्प्रिंग की तरह उछलकर ऐसे लगने लगा जैसे कोई मोटा सा सांप अपना फन उठाकर फुफकारने लगता है।

मक्खन सी मुलायम चूत पर तो एक रोयाँ भी नहीं था। मेरा अंदाज़ा सही था लगता है उसने बगलों की तरह अपनी चूत के बाल भी वेक्सिंग या बालसफा क्रीम से साफ़ किए हैं। मोटे-मोटे गुलाबी पपोटों के बीच रस से लबालब भरा चीरा कम से कम 4-5 इंच का तो जरूर होगा। चीरे के ऊपर मोटा सा गुलाबी रंग का लहसुन (मदनमणि) के बीच पिरोई हुयी सोने की छोटी सी बाली (रिंग) … को देखकर तो बरबस मुंह से निकल उफ्फ्फ्फ़ … हाय मेरी नथनिया …

दोनों फांकों के बीच की पत्तियों (अंदरुनी होंठ- कलिकाएँ) का रंग कुछ सांवला सा लग रहा था। मुझे लगता है यह जरूर इनको अपने हाथों से मसलती होगी और अपनी अँगुलियों से अपनी काम वासना को शांत करती रही होगी तभी तो इनका रंग थोड़ा सांवला सा हो गया है।

साले उस लंगूर के में इतना दम कहाँ होगा जो इसकी चूत की गर्मी को ठंडा कर पाता। उसकी जगह कोई और प्रेम का पुजारी होता तो अब तक इसकी चूत का हुलिया ही बिगाड़ देता। मेरा मन तो एक बार उसकी चिकनी चूत को तसल्ली से चाटने और चूमने को करने लगा था।

“ओहो … अब क्या सोचने लगे?”

“बेबी वो …?”

“क्या हुआ?”

“वो … वो … मेरे पास कंडोम नहीं है.”

“ओह … गोली मारो कंडोम को …” कहते हुए नताशा ने मेरे हाथ को पकड़कर मुझे अपने ऊपर खींच सा लिया।

मैं धड़ाम से उसके ऊपर आ गिरा तो नताशा की मीठी किलकारी ही निकल गई। उसने मेरे होंठों को चूमना शुरू कर दिया। मैं तो अभी ठीक से उसकी चिकनी बुर को देख भी नहीं पाया था कि नताशा ने मेरा लंड अपने हाथों में पकड़ लिया और खींचकर अपनी बुर पर घिसने लगी। एक नर्म मुलायम और गुनगुना सा अहसास मुझे अपने सुपारे पर महसूस होने लगा।

अब देरी की गुन्जाइश बिल्कुल भी नहीं थी। उसकी चूत तो रस बहाकर जैसे दरिया ही बन चुकी थी. तो किसी तेल या क्रीम की जरूरत ही नहीं थी। अब कमान मैंने अपने हाथ में ली और अपने लंड को ठीक उसकी चूत के छेद पर लगा दिया।

मैं कुछ पलों के लिए रुका रहा। नताशा की साँसें बहुत तेज हो गई थी और दिल की धड़कन भी बहुत तेज हो चली थी। मैंने लंड को निशाने पर लगाए हुए एक जोर का धक्का लगाया तो मेरा आधा लंड उसकी पनियाई बुर में घुस गया।

और नताशा की घुटी-घुटी एक चींख पूरे कमरे में गूँज उठी- आआआईई ईईई ईईइ … आह … धीरे!

उसके चहरे पर थोड़ा दर्द साफ़ महसूस किया जा सकता था।

मैंने उसे अपनी बांहों में दबोच लिया और फिर से 3-4 धक्कों के साथ अपना खूंटा उसके गर्भाशय तक गाड़ दिया। इस प्रकार की हसीनाओं के साथ रहम की गुंजाइश बेमानी होती है।

जब मेरा लंड उसकी कसी हुई चूत में पूरी तरह अन्दर फिट हो गया तो मैंने उसके गालों और होंठों को चूमना शुरू कर दिया और फिर धक्के लगाने शुरू कर दिए। लंड तो किसी पिस्टन की तरह अन्दर बाहर होने लगा। मेरे ऐसा करने पर नताशा ने अपनी जांघें जितना हो सकता था खोल दी।

अब तो नताशा की मीठी सीत्कारें पूरे कमरे में गूंजने लगी- आह … मेरे प्रेम … मैं कितने दिनों से तुम्हारा प्रेम पाने के लिए तड़फ रही थी और तुम्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं.

“मेरी जान चाहता तो मैं भी था. पर ऑफिस का मामला था. तो थोड़ा डर भी लगता था कि कहीं किसी को संदेह ना हो जाए।”

“तुम तो निरे फट्टू (डरपोक) हो.”

“कैसे?”

“आपने तो मुझे बताया ही नहीं कि आपकी वाइफ मुंबई गई है?”

“ओह … हाँ … पर?”

“मुझे घर बुला लेते तो यहाँ बंगलुरु आने का झंझट ही नहीं होता.” कहते हुए वह जोर-जोर से हंसने लगी।

“हाँ … पर चलो कोई बात नहीं बंगलुरु का यह कमरा और बेड भी हमारे प्रेम मिलन का गवाह बन ही जाएगा.” कहकर मैं भी हंसने लगा।

हम बातें भी करते जा रहे थे और मैं जोर-जोर से धक्के भी लगा रहा था। नताशा की चूत वैसे तो बहुत मुलायम सी थी पर कसी हुयी भी लग रही थी। मुझे लगता है इस बेचारी तो शादी के बाद भी सिर्फ मूतने का ही काम किया है।

“नताशा एक कॉम्प्लीमेंट दूं क्या?”

“श्योर?”

“यार तुम्हारी चूत तो वाकई बहुत ही खूबसूरत और कसी हुई है. ऐसा लगता है जैसे पहली बार किसी लंड के संपर्क में आई है.” कहते हुए मैंने उसके कानों की लटकन (लोब) को अपने मुंह में भर लिया।

“आह …” नताशा ने एक मीठी आह भरी और अपने नितम्ब उचकाने लगी।

“वो इंजिनियर साहब के क्या हाल हैं उनसे बात हुई या नहीं?”

“उस साले चूतिये से मैंने यहाँ आने के बाद बात ही नहीं की.”

“अरे क्यों?”

“ओह … प्रेम … उसका नाम लेकर अब मेरा मूड खराब मत करो … प्लीज …”

“ओके डिअर!”

मुझे लगता है उस लंगूर के साथ इसने कोई रूमानी(रोमांटिक)या यादगार पल मुश्किल से ही बिताये होंगे।
 
अब मैंने अपने धक्कों की गति और भी ज्याद बढ़ा दी। नताशा तो बस आँखें बंद किए मीठी आहें ही भरती जा रही थी। उसने अपने नितम्ब उचकाने शुरू कर दिए थे और मेरी पीठ और कमर पर भी हाथ फिराने शुरू कर दिए थे।

अचानक उसने अपने पैर थोड़े ऊपर उठा लिए। अब तो मेरा लंड सीधे उसके गर्भाशय से टकराने लगा था। नताशा ने अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर कस लिए और मुझे लगा उसकी चूत भी अब संकोचन करने लगी है। उसका शरीर कुछ अकड़ने सा लगा है तो मैंने दो-तीन धक्के और जोर से लगा दिए।

“आऐईई ईईई … आह … मेरे … प्रेम … आह्ह …” उसके साथ ही नताशा ने एक जोर की किलकारी सी मारी और उसके दोनों पैर नीचे आ गिरे। वह जोर-जोर से हांफने सी लगी थी। मुझे लगा उसका ओर्गास्म हो गया है।

मैं थोड़ी देर के लिए रुक गया और धक्के लगाने भी बंद कर दिए। ये पल किसी भी स्त्री के लिए बहुत ही संवेदनशील होते हैं। इन पलों में उसे अपने प्रेमी से यही उम्मीद रहती है कि वह उसे अपनी बांहों में भरे रखे और चूमता जाए। मैंने उसके माथे, होंठों, गालों, कान और गले को चूमना चालू रखा।

“नताशा तुम बहुत खूबसूरत हो मेरी जान …”

“आह … मेरे प्रेम … मैं कब की प्यासी थी तुम्हारे इस प्रेम की। मेरा तो रोम रोम तरंगित होता जा रहा है और पूरा शरीर ही स्पंदन सा करने लगा है।”

मुझे लगा उसका ओर्गास्म हो गया है। उसने लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थी। मैंने उसे चूमना-चाटना जारी रखा। मैं उसके ऊपर लेटा हुआ धक्के भी लगा रहा था। मुझे लगा उसे मेरे शरीर के पूरे भार से उसे परेशानी हो रही होगी तो मैंने अपनी कोहनियों को बेड पर रखते हुए अपनी छाती को थोड़ा ऊपर उठा लिया।

मेरे ऐसा करने पर नताशा ने अपनी आँखें खोल ली और मेरी आँखों में झांकने लगी जैसे पूछ रही हो रुक क्यों गए?

फिर वह मेरे सीने पर हाथ फिराने लगी और फिर पहले तो मेरे बूब्स की घुंडी को पकड़कर मसला और फिर उसे चूमने लगी।

ओह … मैं भी कितना गाउदी हूँ। मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैं तो जल्दबाजी में उसके उरोजों को मसलना और चूमना ही भूल गया था।

अब मैंने अपने एक हाथ से उसके एक उरोज को पकड़कर मसलना चालू कर दिया और दूसरे उरोज के कंगूरे को अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा।

नताशा की तो एक किलकारी ही कमरे में गूँज उठी।

अब मैंने बारी बारे दोनों गुदाज़ उरोजों को मसलना और चूसना चालू कर दिया।

नताशा तो फिर से आह … ऊंह करती हुई फिर से अपने नितम्ब हिलाने लगी थी- आह … प्रेम … तुम सच में कामदेव हो … आह … उईइइइइइ!

मैंने अब फिर से धक्के लगाने शुरू कर दिए और बीच-बीच में मैंने उसके उरोजों को चूसना और घुंडियों को अपने दांतों से काटना भी जारी रखा। अब तो उसके उरोजों की घुन्डियाँ गुलाबी निम्बोलियों की जगह अंगूर के दाने की तरह हो गई थी।

जैसे ही मैं अपने जीभ से उन्हें चुभलाता या दांतों से काटता तो नताशा की एक मीठी सीत्कार निकलती और वह अपनी चूत का संकोचन करती और अपने नितम्ब उछालकर मेरा लंड अन्दर तक लेने की कोशिश करने लगती।

उसने अपने दोनों पैर मेरी कमर पर कस लिए थे और अब मैं अपने पंजों और कोहनियों के बल हुए धक्के लगाने लगा था। मेरे ऐसा करने से नताशा के नितम्ब हवा में थोड़ा ऊपर उठते और फिर मेरे धक्के के साथ ही धप्प की आवाज के साथ बेड पर गिरते।

मुझे लगता है नताशा के लिए ये पल नितांत अनोखे और नये थे। अचानक नताशा ने जोर से मेरे सिर के बाल पकड़ लिए और फिर एक जोर की किलकारी सी मारते हुए उसने अपने पैरों की जकड़ को और भी ज्यादा कस लिया और उसका शरीर झटके से खाने लगा।

थोड़ी देर बाद उसने अपने पैरों की जकड़ को ढीला करते हुए उन्हें सीधा कर दिया और फिर लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी। मुझे लगता है वह एक बार फिर से झड़ गई है।

उसकी चूत से कामरज निकल कर मेरे लंड के चारों ओर लगा गया था और कुछ तो मेरे अण्डों पर भी महसूस सा होने लगा था। मुझे लगता है थोड़ा रस जरूर उसकी गांड तक भी चला गया होगा।

मैंने अपने एक हाथ को उसके नितम्बों के नीचे किया और उसकी खाई में फिराने लगा। जैसे ही मेरी शातिर अंगुलियाँ उसकी गांड के छेद से टकराई नताशा के एक मीठी सीत्कार निकल गई और उसने मेरा हाथ पकड़कर परे हटा दिया।

हे भगवान्! जिस प्रकार उसकी चूत लगभग अनचुदी जैसी ही लग रही थी, उसकी गांड तो नितांत कुंवारी ही होगी। काश एक बार उसकी गदराई हुई गांड मारने का मौक़ा मिल जाए तो कसम से मज़ा ही आ जाए।

पर अभी मैं उसकी गांड मारने की कोशिश नहीं कर सकता था। पहले एकबार उसकी चूत की तसल्ली हो जाए उसके बाद तो वह मेरा लंड भी चूसेगी और बाद में गांड देने के लिए उसे राजी कर लेने का हुनर तो मुझे बखूबी आता ही है।

अचानक मुझे अपने होंठों पर उसके दांतों से काटने का दर्द सा महसूस हुआ।

ओह … अब मुझे ख्याल आया कि मैं गांड के चक्कर में धक्के लगाना ही भूल गया हूँ। अब मैंने फिर से दनादन धक्के लगाने शुरू कर दिए।

मेरा मन तो उसे एक बार डॉगी स्टाइल में करके धक्के लगाने का कर रहा था पर अब मुझे लगने लगा था मेरा शेर-ए-अफगान शहीद होने के कगार पर है।

मैंने 4-5 धक्के जोर-जोर से लगाए तो नताशा की गूं … गूं … की आवाजें आने लगी। मुझे लगा वह इन तेज धक्कों की ताब सहन नहीं कर पा रही है और एक बार फिर से ओर्गास्म की ओर बढ़ने वाली है। लगता है वह उत्तेजना के उच्चत स्तर पर पहुँच गई है उसका शरीर हिचकोले सा खाने लगा है और अब तो उसने अपनी जांघें और भी फैला दी।

ऐसा करने से मेरा लंड किसी पिस्टन की तरह अन्दर बाहर होने लगा था।

“आह … प्रेम … आह … रु … क..को … आईईईईईइ …”

मैंने कसकर उसे अपनी बांहों में कस लिया और फिर अंतिम 3-4 धक्कों के साथ ही मेरा लावा फूटकर पिचकारियों की शक्ल में उसकी चूत को सींचता चला गया। नताशा को भी अंदाज़ा हो गया था तो उसने जोर से अपनी चूत को अन्दर सिकोड़ लिया और मेरा पूरा वीर्य अन्दर लेने की कोशिश करने लगी जैसे अंतिम बूँद तक चूस लेना चाहती हो।

हम दोनों की ही साँसें बहुत तेज हो गई थी। कमरे में हालांकि ए.सी. चल रहा था पर फिर भी हम दोनों को पसीना आ रहा था। मैं नताशा के ऊपर पसर गया और फिर नताशा मेरी कमर और पीठ पर हाथ फिराने लगी थी।

“जान … कैसा लगा?”

“आह … कुछ मत पूछो मेरे प्रेम आज तुमने मुझे पूर्ण स्त्री बना दिया है।” कहते हुए उसने मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़कर मेरे होंठों पर एक चुम्बन ले लिया।

थोड़ी देर बाद मुझे लगने लगा मेरा लंड अब सिकुड़ने लगा है और बाहर आने की फिराक में है। मैं नताशा की चूत से रिसते हुए अपने वीर्य को देखना चाहता था.

तो मैं उसके ऊपर से उठने लगा तो नताशा ने मुझे रोक दिया और थोड़ी देर इसी तरह अपने ऊपर लेटे रहने के लिए इशारा किया।

मैं भला उसे निराश कैसे कर सकता था मैं चुपचाप उसके ऊपर लेटा रहा और कभी उसके गालों और कभी उसके होंठों पर चुम्बन भी लेता रहा।

5-4 मिनट बाद नताशा ने मुझे अपने ऊपर से हटने का इशारा किया। मैं उसके ऊपर से उठकर उसकी बगल में ही लेट गया।

मेरा अंदाज़ा था अब नताशा उठकर बाथरूम में जायेगी। मेरा मन तो कर रहा था मैं भी उसके साथ ही बाथरूम में चला जाऊं। वह अपनी चूत को धोने से पहले सु सु भी करेगी और उसकी हालत और हुलिया भी जरूर देखेगी।

उसकी चूत से कलकल करती हुयी सु-सु की मोटी धार को देखने का नजारा कितना दिलकश होगा आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं।

पर वह तो अपनी आँखें बंद किए वैसे ही लेटी रही। अब मेरी निगाह उसकी चूत पर पड़ी। उसकी चूत के पपोटे सूजकर और भी फूल गए थे और चीरे के बीच की पत्तियाँ तो रक्त संचार बढ़ जाने से किसी रसीले सिन्दूरी आम के छिलकों की तरह मोटी-मोटी सी लगने लगी थी।

काश! एकबार यह अपनी चूत को धोकर आ जाए कसम से इसे पूरा मुंह में भरकर चूस लिया जाए तो मुझे ही नहीं इसे भी जन्नत की सैर का मजा मिल जाए।
 
थोड़े देर बाद वह करवट के बल हो गई और मेरे सीने से लग गई। मैंने उसकी पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया।

नताशा ने पहले तो मेरे सीने पर उगे बालों पर हाथ फिराया और फिर हाथ को नीचे करके मेरा मुरझाये लंड को पकड़ लिया।

मुझे लगता है उसका मन अभी नहीं भरा है।

उसने मेरे लंड को फिर से मसलना शुरू कर दिया और अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दिए। मैंने उसकी कमर को पकड़ कर उसे अपनी खींच कर अपने सीने से चिपका लिया और एक हाथ उसके नितम्बों पर फिराने लगा। उसके गोल-मटोल खरबूजे जैसे नितम्बों का सुखद अहसास पाते ही मेरा अलसाया लंड फिर से कुनमुनाने लगा था।

मेरी अंगुलियाँ उसकी गांड के छेद तक नहीं पहुँच पा रही थी तो मैं थोड़ा सा नीचे सरक गया और उसके एक उरोज को मुंह में भरकर चूसने लगा। नताशा के शरीर में फिर से सनसनाहट सी होने लगी थी। मैं अपना एक हाथ उसके नितम्बों पर फिराने लगा था। अब तो मेरी अंगुलियाँ आराम से उसकी गांड के छेद तक पहुँच सकती थी। अब मैं उसकी गांड के छेद को टटोलने लगा। जैसे ही मेरी अंगुलियाँ उस छेद से टकराई नताशा की एक मीठी सीत्कार सी निकल गई।

इससे पहले कि मेरी अंगुली मुकम्मल तरीके से उसकी गांड का मुआइना करती नताशा बोली- वो … मेरा बैग पकड़ाना प्लीज?

“क … क्या हुआ?”

“ओहो … प्लीज दो ना जल्दी!”

पता नहीं नताशा अब क्या चाहती है। मैंने अपना हाथ बढ़ाकर बेड की साइड टेबल पर रखा उसका बेग उसे पकड़ा दिया। उसने जल्दी से उसे खोला और उसमें से सेनिटाइज्ड टिशु पेपर (नेपकिन) निकाला और थोड़ा उठकर मेरे लंड को उससे रगड़कर साफ़ करने लगी। मुझे पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया पर बाद में तो मेरी बांछें ही जैसे खिल गई।

इससे पहले कि मैं कुछ बोलता या करता नताशा ने मेरा लंड अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी।

“ओह … अरे … मुझे इसे धो आने दो प्लीज!” मैं तो उसे रोकने की कोशिश की पर उसने मुझे इशारे से मना कर दिया।

मेरे लिए तो यह किसी ख्वाब की तरह था। कोई हसीन महबूबा जब इस प्रकार लंड चूसे तो उसे कौन बेवकूफ मना करना चाहेगा। सच कहूं तो मैं तो उसकी इस अदा पर दिलो जान से फ़िदा ही हो गया।

थोड़ी देर उसने मेरे लंड को चूसा तो वह फिर से खड़ा हो गया और ठुमके लगाने लगा।

जब उसे लगा कि मेरा लंड पूरा उत्तेजित हो चुका है तो वह मुझे हल्का सा धक्का देते हुए मेरे ऊपर आकर बैठ गई। अब उसने एक हाथ से मेरा लंड पकड़ लिया और दूसरे हाथ से अपने चूत की फांकों को चौड़ा करते हुए मेरे लंड पर अपनी चूत को टिका दिया और फिर एक झटके के साथ उसने अपने नितम्ब नीचे कर दिए।

लंड एक ही झटके में पूरा का पूरा अन्दर दाखिल हो गया। नताशा की चूत तो पहले से ही मेरे वीर्य और उसके कामरज से सराबोर थी तो लंड को पूरा अन्दर तक जाने में भला कोई परेशानी कैसे हो सकती थी।

हालांकि नताशा ने अपने होंठों को कस कर बंद कर रखा था पर इसके बावजूद उसकी एक हल्की सी चीख निकल गई।

वह थोड़ी देर अपने आप को संयत करने की कोशिश करती रही और फिर उसने अपने नितम्बों को ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया।

मैं अपने लंड को उसकी कसी हुई चूत में अन्दर-बाहर होते देख रहा था।

नताशा की मीठी किलकारियां अपने चरम पर थी। थोड़ी देर उसने धक्के लगाए और फिर वह मेरे ऊपर लेट सी गई। मैंने उसकी पीठ पर अपने हाथ फिराने चालू रखे और बीच-बीच में उसके नितम्बों का जायजा भी लेता जा रहा था। काश एक बार वह अपनी गांड देने के लिए राजी हो जाए तो खुदा कसम बंगलुरु की यह शाम जिन्दगी भर के लिए यादगार बन जाए।

मुझे उसके शरीर का भार सा लगने लगा था तो मैंने उसके सिर को अपने हाथों में पकड़कर थोड़ा ऊपर किया और फिर उसके होंठों को चूमने लगा।

और उसके बाद हम दोनों ने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए पलटी सी मारी और मैं उसके ऊपर आ गया। हमने यह ध्यान जरूर रखा कि मेरा लंड उसकी चूत से बाहर ना निकल जाए।

मेरा लंड उसकी चूत में गहराई तक समाया हुआ था और नताशा भी अपनी चूत का अन्दर से संकोचन भी कर रही थी।

मैंने अब धक्के लगाने के बजाय अपने लंड को उसकी चूत पर घिसना शुरू कर दिया। मैं पहले थोड़ा नीचे की ओर सरकता और फिर अपने लंड को अन्दर ठेलते हुए उसकी चूत पर घिसता। ऐसा करने से उसकी दाने पर भी रगड़ होने लगी थी। ऐसा करने से तो नताशा तो रोमांच और उत्तेजना के उच्चतम शिखर पर पहुँच गई। अब तो उसने जोर-जोर से आह … ऊंह … करना शुरू कर दिया था।

मैंने आपको बताया था ना कि मेरा मन तो उसकी चूत को मुंह में भर कर चूसने और उसके दाने को अपने दांतों से काटने का कर रहा था. पर ऐसा करने का नताशा ने मौक़ा ही नहीं दिया था।

अब हालत यह थी कि जैसे ही मेरा लंड दाने पर रगड़ खाता उसकी एक हल्की सीत्कार निकल जाती।

उसका पूरा शरीर ही जैसे लरजने लगा था और अब तो वह अपने पैर भी पटकने लगी थी। मुझे लगता है वह अपनी उत्तेजना को संभाल नहीं पा रही है। और फिर जैसे अक्सर ऐसा होता है उसकी चूत ने हार मान ली और उसका एक बार फिर से स्खलन हो गया।

“आईईईइ … मैं मर जाऊंगी … प … प्रेम.. आह …” कहते हुए उसने मेरी पीठ पर अपने हाथ कस लिए।

अब मैं भी इतना बेरहम नहीं होना चाहता था। मैंने थोड़ी देर के लिए रगड़पट्टी बन्द कर दी। नताशा लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगी थी। थोड़ी देर हम ऐसे ही लेटे रहे।

“प्रेम?”

“हम्म?”

“एक बार तुम मेरे ऊपर आ जाओ ना प्लीज!”

“जान मैं ऊपर ही तो हूँ.”

“ओहो … ऐसे नहीं मैं पेट के बल लेट जाती हूँ तुम मेरे ऊपर लेट जाओ.”

“ओके” मुझे बड़ी हैरानी और खुशी भी हो रही थी। मुझे लगा मेरी बुलबुल तो शायद पीछे से देने के लिए भी तैयार हो गई है।

मैं उसके ऊपर से हट गया तो नताशा जल्दी से अपने पेट के बल होकर लेट गई और उसने अपने पेट के नीचे एक तकिया लगा लिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब और ऊपर उठ गए।

हे भगवान्! क्या नमूना है तेरी इस कारीगरी का … पूरा मुजसम्मा बनाकर भेजा है। पतली कमर के नीचे गोल खरबूजों जैसे गोरे रंग के नितम्ब और उनके बीच की गहरी खाई तो ऐसे से लग रही थी जैसे किसी नदी की गहरी घाटी हो।

मुझे तो अपनी किस्मत पर जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था। मेरा लंड तो किसी अड़ियल घोड़े की तरह हिनहिनाने ही लगा था।

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता। मैंने झुककर उनपर पहले तो एक चुम्बन लिया और फिर उन पर हल्की चपत सी लगाई तो नताशा की एक मीठी किलकारी निकल गई।
 
अब मैं नताशा के ऊपर लेट गया। मेरा लंड उसके नितम्बों की खाई से जा टकराया। मैंने अपने एक हाथ को नीचे करके उसके एक उरोज को पकड़ लिया और मसलने लगा और दूसरा हाथ नीचे करके उसकी चूत को टटोलकर अपनी अंगुली से उसे सहलाने लगा। मैंने उसके कान की लटकन को भी अपने मुंह में भर लिया और चूमने लगा।

नताशा के लिए तीन तरफ से हुए इस हमले से बचने की अब ज़रा भी गुंजाईश नहीं बची थी। नताशा शांत लेटी हुई लम्बी-लम्बी साँसें लिए जा रही थी। और मेरा लंड तो बार-बार उसके नितम्बों की खाई में अपने मंजिल तलासता हुआ ठोकरें मार रहा था और मेरा दिल जोर जोर से धड़कने सा लगा था।

पर … दोस्तो! मंजिल अभी थोड़ी दूर थी।

“प्रेम … आह …”

“हां मेरी जान?” मुझे लगा नताशा अब बोलेगी मेरे पिछले द्वार का भी उद्धार कर डालो।

अब नताशा ने अपने नितम्ब थोड़े से और ऊपर उठा लिए और फिर अपना एक हाथ पीछे करके मेरे लंड को पकड़कर उसे अपनी चूत के छेद पर लगाने की कोशिश करने लगी।

ओह … अब मुझे समझ आया मैडम नये आसन और अंदाज़ में करवाना चाहती है।

मुझे एक बार तो थोड़ी निराशा सी हुई पर बाद में मैंने सोचा चलो एक बार इसको जिस प्रकार चाहती है करवा लेने दो … देर सवेर गांड के लिए भी राजी हो ही जायेगी।

मैंने एक धक्का लगाते हुए नताशा का काम आसान बना दिया। मेरा लंड उसकी चूत में समा गया। नताशा ने एक हिचकी सी लेते हुए एक आह सी भरी।

आपको याद होगा यह आसन नीरुबेन (अभी ना जाओ चोदकर) को बहुत पसंद आता था। छोटे लिंग वालों के लिए यह आशन इतना सही नहीं होता पर थोड़े लम्बे लिंग वाले पुरुषों के लिए यह आशन बहुत अच्छा होता है।

मैंने धक्के लगाने शुरू कर दिए। जैसे ही मैं धक्का लगाता नताशा अपने नितम्बों को ऊपर उठा लेती और फिर धक्के के साथ ही उसकी जांघें और पेट तकिये से जा टकराता और नताशा के मुंह से ‘हुच्च’ की सी आवाज निकलती।

नताशा के लिए तो यह अनुभव ज़रा भी नितांत और नया नहीं लग रहा था। पता नहीं साली ने यह सब काम-कलाएं कहाँ से सीखी होंगी। उसके कसे हुए गोल नितम्बों का स्पर्श पाकर मेरी जांघें को तो जैसे जन्नत की हूरों का ही मज़ा आने लगा था।

मैंने इसी प्रकार 5-7 मिनट धक्के लगाए थे। नताशा तो आंखें बंद किए बस मीठी आहें ही भरती जा रही थी। मुझे लगा अगर यह डॉगी स्टाइल में हो जाए तो और भी ज्यादा मज़ा आ सकता है।

फिर मैंने उसे डॉगी स्टाइल में होने को कहा तो उसने पहले तो अपने नितम्ब ऊपर उठाये और फिर अपने पेट के नीचे से तकिया निकाल दिया और अपने पैरों को समेटते हुए डॉगी स्टाइल में हो गई।

अब तो वह और भी ज्यादा चुलबुली हो गई थी। उसने अपना सिर तकिये से टिका दिया और मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्ब भी आगे पीछे करने लगी थी। जैसे ही तेज धक्के के साथ लंड उसकी चूत में जाता एक फच्च की आवाज सी निकलती और हम दोनों ही रोमांच के सागर में गोते लगाने लगते।

मैंने अपना एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने और उसमें पहनी हुयी बाली और दूसरे हाथ से उसके उरोज के घुंडियों को मसलना चालू कर दिया। नताशा ने अपना एक अंगूठा अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी। आप सोच सकते हैं उसे देख कर मुझे मिक्की (तीन चुम्बन) की कितनी याद आई होगी।

जैसे ही मेरा लंड उसकी चूत में जाता उसकी गांड का छल्ला भी संकोचन सा करता और जब मेरा लंड बाहर निकलता तो उसकी गांड का छेद थोड़ा खुल जाता और उसका अन्दर का गुलाबी रंग नज़र आने लगता। हे भगवान्! रबड़ बैंड जैसी कातिल गांड तो मुझे जैसे ललचा रही थी।

मैंने अपने अंगूठे पर अपना थूक लगाया और फिर उसकी गांड के छल्ले पर फिराने लगा। एक दो बार उसने अपना हाथ पीछे करके मेरे हाथ को हटाने की कोशिश जरूर की थी पर अब तो शायद उसे भी मज़ा आने लगा था। वह अपने नितम्बों को मेरे धक्कों के साथ आगे पीछे करने लगी थी। इस दौरान उसका एक बार फिर से ओर्गास्म हो गया था।

प्रिय पाठको! आप लोगों ने कई काम कहानियों में पढ़ा होगा कि ‘फिर उनकी चुदाई अगले आधे घंटे तक चली।’

दोस्तो, असल जिन्दगी में ऐसा नहीं होता। यह आसन बहुत आनंददायक होता है पर इसमें स्त्री जल्दी थक जाती है और पुरुष का वीर्य भी बहुत जल्दी निकल जाता है।

“ओह … प्रेम … मेरी तो कमर ही दुखने लगी है.”

“ओके … अच्छा तुम एक काम करो … धीरे-धीरे अपने पैर पसारकर सीधे कर लो.”

अब नताशा ने मेरे कहे अनुसार अपना एक पैर पसार दिया और करवट के बल होते हुए एक पैर मोड़कर अपना घुटना पेट की तरफ कर लिया। मैंने ध्यान रखा कि मेरा लंड उसकी चूत के अन्दर ही फंसा रहे।

मैं उसकी दोनों जाँघों के बीच आ गया और उसकी एक जांघ के ऊपर बैठ गया और अपने हाथों से उसके नितम्बों और कमर को सहलाने लगा। अब धक्के ज्यादा जोर से नहीं लगाए जा सकते थे। थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने अपना लंड अन्दर-बाहर करना चालू कर दिया।

“जान कहो तो एक नया प्रयोग करें?”

“क..क्या?” उसने अपनी आँखें बंद किए हुए ही पूछा।

“रुको एक मिनट!” कहकर मैं उसके ऊपर से उठ गया।

नताशा हैरानी भरी नज़रों से मेरी ओर देखती रही।

अब मैंने उसे पीठ के बल लेटाते हुए उसकी जांघ को पकड़कर उसे सीधा किया और उसका पैर पकड़कर ऊपर उठा लिया। फिर दूसरी जांघ पर बैठ कर उसके पैर को अपने कंधे पर रख लिया। ऐसा करने से उसकी चूत तो किसी फूल की तरह खिल उठी और रस से लबालब भरा हुआ लाल कमल नज़र आने लगा। अब मैंने अपने लंड को हाथ में पकड़कर उसकी चूत में फंसा दिया। लंड महाराज उसके गर्भाशय तक अन्दर समा गए।

“आइइइइईई …” नताशा की मीठी किलकारी कमरे में गूँज उठी।

अब मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी जांघ को पकड़ कर अपने पेट से लगा कर धक्के लगाने शुरू कर दिए। इस आसन में स्त्री बहुत जल्दी चरम उत्कर्ष तक पहुँच जाती है। मुझे एक बार आंटी गुलबदन ने बताया था कि गदराई हुई औरतों के लिए यह आसन बहुत अच्छा होता है इस आसन में उन्हें पूर्ण संतुष्टि मिल जाती है।

अब तो मेरा एक हाथ उसके गदराये हुए पेट और उरोजों की सैर करने लगा था. और दूसरा हाथ उसके नितम्बों की खाई में दबे उस जन्नत के दूसरे दरवाजे का रस पान करने लगा था।

मैं बार-बार सोच रहा था- काश!एक बार यह मेरे लंड को गांड में ले ले तो बंगलुरु आना सच में ही सफल हो जाए।
 
इसी ख्याल से मेरा लंड और भी खूंखार सा हो गया और मैंने अब जोर-जोर से धक्के लगाने चालू कर दिए। नताशा की चूत ने तो दो-तीन धक्कों के बाद ही एकबार फिर से पानी छोड़ दिया था पर मेरा मन अभी नहीं भरा था।

5-7 मिनट बाद नताशा आह … ऊंह … करती हुयी फिर से कसमसाने सी लगी थी। मुझे लगता है वह भी अब चाहने लगी है कि अब मैं अपनी फुहारें उसकी चूत में छोड़ दूं।

और फिर 3-4 धक्कों के बाद मेरे लंड ने फुहारें छोड़नी शुरू कर दी। नताशा तो उत्तेजना के मारे जैसे छटपटाने सी लगी थी मैंने कसकर उसकी जांघ को अपने हाथों में कस लिया। अब तो नताशा ने भी अपनी चूत का संकोचन करना शुरू कर दिया था और उसका शरीर भी झटके से खाने लगा था। और एक बार फिर से उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। इस बार हम दोनों का स्खलन एक साथ ही हुआ था।

वीर्य स्खलन के बाद मैं थोड़ा पीछे झुकते हुए अपना सिर उसके पैरों की ओर करते हुए लेट गया। मैंने ध्यान रखा मेरा लंड अभी उसकी चूत में फंसा रहे। अब हम दोनों की जांघें कैंची की तरह एक दूसरे में उलझी हुई थी। हम दोनों लम्बी-लम्बी साँसें लेते उस नैसर्गिक आनंद को लेते रहे जिसे आम भाषा में चुदाई और प्रेम की भाषा में तो बस मधुर मिलन या सुखद सहचर्य ही कहा जा सकता है।

थोड़ी देर बाद मैं उठकर बेड की टेक लगाकर बैठ गया और नताशा ने मेरी गोद में अपना सिर रख दिया। मैंने नीचे झुक कर एक बार उसके होंठों का चुम्बन लिया और फिर उसके माथे और सिर पर अपने हाथ फिराने लगा।

नताशा तो बेसुध सी हुयी बस मीठी सीत्कारें और आहें ही भरती रही।

थोड़ी देर बाद नताशा ने आँखें खोली और उठने का उपक्रम सा करने लगी।

“क्या हुआ जानेमन?”

“प्रेम … तुमने तो एक ही दिन में मेरे सारे कस बल निकाल दिए. अब और हिम्मत नहीं बची।“

“अरे मेरी जान तुम इतनी खूबसूरत हो कि मेरा तो अभी मन ही नहीं भरा है.” मैंने उसके गालों पर चुम्बन लेते हुए कहा।

“ना जान बस आज और नहीं … हे भगवान् 7 बज गए.” उसने दीवार पर लगी घड़ी देखते हुए कहा।

“क्या हुआ?”

“प्रेम … अब मुझे जाना होगा …

मुझे लगा नताशा अब बाथरूम जाना चाहेगी। मेरा मन तो कर रहा था उसे अपनी गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाऊं और उसकी सु-सु से निकलने वाली सीटी का मधुर संगीत सुनूँ। उसकी गुलाबी कलिकाओं से मूत की पतली धार को टकराते हुए देखने का दृश्य तो बहुत ही नयनाभिराम होगा आप सोच सकते हैं।

“अगर बाथरूम जाना हो तो हो आओ.”

“ओह … प्रेम … मेरे से तो उठा ही नहीं जा रहा.”

और फिर उसने अपनी बैग से टिशुपेपर निकाला और अपनी जाँघों और चूत के चीरे को थोड़ा सा साफ़ किया और फिर उस टिशुपेपर को अपनी चूत पर लगाकर पैंटी अपनी पैंटी पहन ली।

मुझे अपनी तरफ हैरानी से देखता पाकर उसने हंसते हुए कहा “प्रेम! मैं तुम्हारे इस प्रेमरस को किसी अनमोल खजाने की तरह सहेज कर रखना चाहती हूँ। धीरे-धीरे जब यह बाहर निकलेगा तो तुम्हारे प्रेम को बार-बार महसूस करूंगी।

मेरे होंठों पर भी मुस्कान फ़ैल गई।

“कल का क्या प्रोग्राम है आपका?”

“वो … कल तो मुझे एक बार सुबह ही हेड ऑफिस में रिपोर्ट करना होगा।”

“ओह … आप कब तक फ्री हो पाओगे?”

“बता नहीं सकता वहाँ जाने के बाद ही पता चलेगा। अगर जल्दी फ्री हो गया तो मैं तुम्हें फोन कर दूंगा.”

“ओह …” नताशा को शायद मेरी बातों से निराशा सी हो रही थी।

“यार परसों सन्डे है अगर तुम सुबह जल्दी आ जाओ तो हम दोनों पूरे दिन मज़े कर सकते हैं.” मैंने उसकी ओर आँख मारते हुए कहा।

“यही तो मुसीबत है.”

“क्या मतलब?”

“वो मेरी कजिन की बेटी का जन्मदिन है सन्डे को तो मेरा आना मुश्किल लग रहा है.”

“ओह …”

“प्रेम एक काम कर सकते हो क्या?”

“क्या?”

“तुम सन्डे दोपहर में या शाम को हमारे यहाँ आ जाओ और फिर रात में वहीं रुक जाना.”

“अरे नहीं जान … वो पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगा?”

“ओहो … तुम भी निरे फट्टू हो? मैं उन्हें बता दूंगी तुम मेरे गुलफाम हो?”

“गुलफाम … मतलब?” मेरे तो नताशा की बातें पल्ले ही नहीं पड़ रही थी सच कहूं तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था।

“अरे यार … मैं तुम्हारा परिचय अपने पति के रूप में करवा दूंगी कि तुम मेरे से मिलने के लिए आये हो। और खास बात तो यह है कि उन्होंने अभी तक मेरे उस चूतिये गुलफाम को देखा भी नहीं है तो किसी को क्या पता चलेगा?”

“पर … अगर …”
 
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