“अब अगर मगर रहने दो … अब इसमें इतना क्या सोचना है मैं सब मैनेज कर लूंगी तुम बस आ जाओ … मैं आज ही उनको बता देती हूँ कि नितेश का फोन आया है वो मिलने के लिए सन्डे को आ रहे हैं। फिर तो हम 2 दिन खूब मस्ती कर सकते हैं।”
“मैं कल एक बार ऑफिस अटेंड कर लूं उसके बाद सोचते हैं.” कहकर मैंने एक बार तो नताशा को टाल दिया।
मैं नताशा के प्रस्ताव के बारे में सोच रहा था।
एक बार नताशा ने मुझे बताया कि उसकी कजिन के दो किशोरी लौंडियाँ भी हैं। जिस प्रकार नताशा ने उनकी खूबसूरती का वर्णन किया था मेरा मन तो करने लगा था इन दोनों मुजस्समों का भी दीदार करके आँखें सेक ली जाएँ।
ओह … पर इसमें बहुत बड़ा रिस्क भी है।
अगर किसी को पता लग गया तो मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा. हाँ नताशा ना घर की रहेगी ना घाट की।
अभी तो उसके दिमाग में जवानी का फितूर चढ़ा है अगर कोई 19-20 बात हो गई तो संभालना मुश्किल हो जाएगा। मैं ऐसी जोखिम कदापि नहीं ले सकता।
कई बार तो मुझे लगता है मैं यह किस सिंड्रोम में उलझ गया हूँ? पता नहीं वे संधि की उम्र के आसपास जवानी की दहलीज के इस पार खड़ी किशोरी लड़कियों को देख कर मैं अपने आप को रोक नहीं पाता और किसी भी प्रकार उन्हें पाने के लिए बेताब रहने लगता हूँ।
पलक के जाने के बाद मैंने तीसरी कसम खाई थी कि अब मैं किसी नटखट नादाँ मासूम लड़की से प्रेम नहीं करूंगा पर कोमल और फिर सानिया ने मेरी इस कसम को तौड़ ही डाला।
प्रिय पाठको! आप की क्या राय है? क्या मुझे इन सब चीजों को अब छोड़ देना चाहिए?
यही सोचता हुआ मैं नताशा को टैक्सी तक छोड़कर वापस रूम में आ गया।
और फिर अगला दिन तो पूरा का पूरा ही ऑफिस के चुतियापे में ही बीत गया। सबसे पहले HRD मेनेजर से मुलाक़ात हुई। उम्र कोई 40-45 साल के लपेटे में रही होगी। गदराया सा बदन और नितम्ब देखकर तो लगा कभी यह इमारत भी बुलंद रही होगी अब तो खंडहर सी होने लगी है।
जिस प्रकार वह आत्मीयता से बात कर रही थी लगता है थोड़ी सी मेहनत की जाए तो इस आंटी को गुलफाम की सब्ज परी बनाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
ट्रेनिंग के लिये मेरे अलावा और जगह से भी स्टाफ के लोग आये हुये थे जिन्होंने 5-10 पहले ज्वाइन किया था।
उनसे परिचय के बाद वहाँ के लोकल सेल्स और फील्ड स्टाफ से भी मेरा परिचय करवाया गया। उसके बाद मुझे फेक्ट्री में विजिट करना था जहाँ मुझे 3-4 दिन प्रोडक्शन प्रोसेस समझना था।
उन्होंने बताया कि उनके गेस्ट हाउस में अभी रूम खाली नहीं हैं तो मुझे अभी 3-4 दिन होटल में ही रुकना पड़ेगा। मेरे लिए तो यह बहुत ही अच्छी बात थी।
होटल लौटते-लौटते 7 बज गए थे। दिन में 2-3 बार नताशा का फोन भी आया था पर उसे सॉरी बोलना पड़ा कि मैं आज जल्दी नहीं आ सकूंगा।
उसने कल (सन्डे) के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो मुझे उसके प्रस्ताव के लिए मना ही करना पड़ा। मैंने उसे समझाया कि मैं अभी होटल में 3-4 दिन और रुकुंगा तो हम लोग आराम से यहाँ मिल सकते हैं।
मुझे लगता है मेरी बातों से उसे निराशा तो जरूर हुई होगी पर मैं किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठा सकता था।
फिर नताशा ने बताया कि वह कल दिन में समय मिला तो होटल आने की कोशिश करेगी।
अगले दिन सन्डे था तो मैं थोड़ा देरी से उठा।
10 बज गए थे मैं नहाकर तैयार हो गया था और चाय पी चुका था। मैं सोच रहा था आज दिन में थोड़ी देर बंगलुरु के दर्शनीय स्थल का भ्रमण ही कर लिया जाए।
साली नताशा ने तो आज फोन ही नहीं किया, कहीं नाराज़ तो नहीं हो गई है।
एक बार तो मैंने उसे फोन करने की सोची पर बाद में मैंने अपना इरादा बदल लिया।
कोई 4 बजे का समय रहा होगा। नताशा का फोन आया।
“क्या कर रहे हो जानू?”
“बस तुम्हें ही याद कर रहा था.”
“चल … झूठे कहीं के.”
“क्यों?”
“इतनी याद आ रही थी तो फिर आये क्यों नहीं?”
“वो.. यार … दरअसल मैं …”
“अच्छा सुनो!” उसने मेरी बात को बीच में ही काटते हुए कहा।
“हाँ बोलो डिअर?”
“वो मेरी कजिन है ना?”
“हाँ … उसे क्या हुआ?”
“अरे … उनकी फॅमिली में किसी दूर के रिश्तेदार की डेथ हो गई थी तो आज वो सभी वहाँ जाने वाले हैं और रात को वहीं रुकेंगे। उन्होंने तो मुझे भी साथ चलने का बोला था पर मैंने मना कर दिया।”
“ओह … सो सैड … डेथ कैसे हो गई? कितनी एज थी?”
“ओहो … छोड़ो ना यह सब!”
“क्या मतलब?”
“अरे यार … किस्मत ने इतना सुनहरा मौक़ा हम दोनों को दे दिया है. और तुम फालतू बातों में लगे हो. तुम फटाफट यहाँ चले आओ.”
एक बार तो मुझे अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हुआ। साली यह किस्मत तो हर समय लौड़े लगाने को तैयार रहती है आज इस कदर मेहरबान हो रही है मैंने तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। फिर नताशा ने मुझे अपनी कजिन का पता बताया।
मैंने मार्किट से एक बुके और मिठाई का पैकेट ले लिया। मैं सोच रहा था उसके लिए कोई गिफ्ट भी ले लूं पर मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके लिए क्या लिया जाए जिसे पाकर वो ख़ुशी से झूम उठे।
जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने निश्चय किया कि कल उसको साथ लेकर उसके मनपसंद की कोई बढ़िया गिफ्ट खरीदकर उसे दे दूंगा।
और फिर जब मैं नताशा के बताये एड्रेस पर पहुंचा तब तक 7 बज चुके थे। थोड़ा धुंधलका सा हो रहा था। मैंने उसके फ्लैट के पास पहुँच कर उसे फोन पर अपने पहुँचने के बारे में बताया तो वह मुझे लेने के लिए नीचे आ गई।
उसने बालों की चोटियाँ बना रखी थी और काले रंग की पतली सी पजामे और लंबा सा कुर्ता पहन रखा था जिसमें अन्दर की तरफ ब्लाउज था और बाहर से खुला हुआ सा था। बलाउज और पजामे के बीच में उसका पतला सा पेट और नाभि का गोल और गहरा छेद नज़र आ रहा था। जिस प्रकार उसकी पजामी उसकी जाँघों पर कसी हुयी लग रही थी मुझे मुझे लगता है आज उसने अन्दर पैंटी और ब्रा नहीं पहनी है।
हम दोनों चुपचाप फ्लैट में आ गए। मैंने आप पास नज़र दौड़ाई कहीं कोई देख तो नहीं रहा। वैसे बड़े शहरों की एक तो अच्छी बात होती है कि किसी को दूसरे के बारे में कोई ज्यादा चिंता नहीं होती।
अन्दर आकर नताशा ने गेट बंद कर लिया।
मैंने अपने हाथों में पकड़ा बुके और मिठाई का डिब्बा उसे पकड़ा दिया।
नताशा ने ‘थैंक यू’ बोलते हुए उसे हॉल में रखी मेज पर रख दिया और फिर दौड़ कर मेरे सीने से लग गई।
उसने अपनी बांहें मेरे गले में डाल दी और मेरे होंठों को चूमने लगी। मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसकी कमर और नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया। अब तो मेरी अंगुलियाँ आराम से उसकी गांड और चूत की गर्माहट महसूस कर सकती थी।
जैसे ही मेरे हाथ उसके नितम्बों की खाई में सरकने लगे वह अपने पंजों के बल होकर मेरे गले में झूलने सी लगी।
मैंने अब अपने दोनों हाथों से उसकी कमर को पकड़ लिया उसे ऊपर उठाने की कोशिश करने लगा। वह थोड़ा सा उछली और फिर उसने अपनी दोनों टांगें मेरी कमर के गिर्द डाल कर कस ली।
हे भगवान्! आज तो नताशा किसी स्कूल गोइंग किशोरी की तरह चुलबुली सी हो रही थी।
मेरे पुराने पाठक, पाठिकाओं को जरूर याद होगा एक बार मिक्की (याद करें तीन चुम्बन) ने ऐसे ही उछलकर मेरी कमर के गिर्द अपनी मखमली टांगें मेरी कमर में कस ली थी।
फिर उसने मुझे बेडरूम की ओर चलने का इशारा किया। मैं उसे बांहों में लिए बेड रूम में आ गया। ट्यूब लाईट की दूधिया रोशनी पूरे कमरे में फैली हुयी थी। डबल बेड पर सुनहरे रंग की नई चादर बिछी हुयी थी. उस पर गुलाब और मोगरे की पत्तियाँ बिखरी हुयी थी। शायद बढ़िया रूम फ्रेशनर भी किया हुआ था।
अब मैंने उसे बेड पर लिटा दिया और मैं उसके ऊपर आ गया। उसकी जांघें अब भी मेरी कमर के बीच लिपटी हुई थी। मैंने उसके गालों और होंठों पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए।
नताशा की मीठी सीत्कारें कमरे में गूंजने लगी थी। कभी वह मेरे मुंह में अपने जीभ डाल देती तो मैं चूसने लगता और कभी मैं अपनी जीभ उसके मुंह में डाल देता तो वह किसी लोलीपोप की तरह उसे चूसने लगती।
मेरा लंड तो किसी लोहे की सलाख की तरह सख्त हो गया था और उसकी चूत के ऊपर ठोकर सी मारने लगा था।
“प्रेम …”
“हाँ जानेमन?”
“कल पता है मैं तो सारी रात तुम्हारे ही ख्यालों में खोई रही और बस तुम्हें ही याद करती रही.”
“हम्म.”
“पता है मेरा मन कर रहा था.”
“क्या?”
“कि एक पूरी रात तुम्हारे आगोश में बिताऊँ.”
“हाँ जान तुम्हारी यह तमन्ना तो आज पूरी होने वाली है। आओ तुम्हारी तमन्ना पूरी कर दूं.”
और फिर हम दोनों ने अपने कपड़े और जूते निकाल फेंके।
हे भगवान्! उसका गदराया हुआ सा बदन देखकर तो लगता है यह नताशा तो पूरी बोतल का नशा है। पतली कमर और गदराया हुआ सा नाभि के नीचे का भाग, सुतवां जांघें और मोटे कसे हुए नितम्ब उफ्फ्फ … इस फित्नाकार मुजसम्मे को कहर कहूं, बला कहूं, क़यामत कहूं या फिर खुदा का करिश्मा कहूं कुछ समझ ही नहीं आ रहा।
उसे देखकर मेरा लंड तो किसी घोड़े की तरह हिनहिनाने लगा था। नताशा ने उसे अपने हाथों में पकड़ लिया और मसलना चालू कर दिया।
फिर उसने बेड की साइड टेबल पर रखी क्रीम निकाली और मेरे लंड पर लगाने लगी।
उसकी नाज़ुक अँगुलियों का अहसास पाते ही मेरा लंड बेकाबू होकर उछलने ही लगा था। अब मैंने उसके हाथों से वह क्रीम की डिब्बी लेकर उसे लेट जाने का इशारा किया।
नताशा तो शायद इसी के इंतज़ार में थी। उसने अपनी जांघें चौड़ी कर दी। मोटे-मोटे पपोटों वाली चूत तो आज ऐसे लग रही थी जैसे कोई खिला हुआ गुलाब हो।
मेरी अंगुलियाँ तो उन पंखुड़ियों की नाज़ुकी महसूस करके जैसे निहाल ही हो गई थी। मैंने पहले तो उसकी चूत पर हाथ फिराया और फिर उसकी नथनिया को पकड़कर होले से खींचकर दबाया तो उसकी एक मीठी किलकारी निकल गई।
अब मैंने उसकी चूत की फांकों को चौड़ा किया। गहरी लाल चुकंदर सी चूत के पपोटे खुलकर गुलाब का फूल सा नज़र आने लगा तो मैंने अपने होंठ उसपर लगा दिए। पहले तो अपनी जीभ उन पर फिराई और बाद में उसकी मदनमणि को उस सोने की रिंग समेत अपने मुंह में भर कर चूसने लगा।
नताशा के ऊपर तो जैसे नशे का खुमार सा चढ़ने लगा था। मैंने जैसे ही उसके दाने पर अपने दांत गड़ाए उसकी एक हल्की सी आह निकल गई. उसने अपनी जांघें मेरे सर के चारों ओर लपेट ली और मेरे सर के बालों को अपने हाथ में पकड़ किया।
“आआईईई ईईईई … प्रेम … आह …”
मैं 4-5 चुस्की लगाकर हट गया और फिर उसकी चूत पर थोड़ी क्रीम लगा दी। बाद में अपनी एक अंगुली उसके छेद में डालते हुए अन्दर भी क्रीम लगा दी। नताशा के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई।
“ईईईस्स स्स्स” उसने मेरा हाथ हटाने की एक नाकाम सी कोशिश तो जरूर की पर ज्यादा विरोध नहीं किया।
मैंने 3-4 बार अपनी अंगुली को अन्दर-बाहर किया। अब मैं उसके ऊपर आ गया और अपने लंड को उसकी मक्खन सी मुलायम चूत के चीरे पर घिसने लगा।
“आह … प्लीज जल्दी करो … आह …”
अब देरी करना ठीक नहीं था। मैंने एक ही झटके में अपना पूरा लंड उसकी रसीली चूत में घोंप दिया। नताशा के मुंह से हुच्च की सी आवाज निकली और फिर एक मीठी किलकारी निकल गई।
“उईईईई माआआआ …”
अब मैंने उसकी चूत पर अपने लंड को घिसते हुए धक्के लगाने शुरू कर दिए। जैसे ही मेरा लंड उसकी मदनमणि में पहनी सोने की बाली (रिंग) से रगड़ खाता तो नताशा की एक मीठी चीख सी निकालने लगती।
मैंने उसके उरोजों को भी मसलना और चूसना शुरू कर दिया था। बीच बीच में उसकी फुनगियों को भी अपने दांतों से काटना जारी रखा।
नताशा तो अगले 3-4 मिनट में ही एक बार झड़ गई। और उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया।
मुझे लगा इस कबूतरी को अगर मोरनी बना कर ठोका जाए तो यह इस चुदाई को अगले कई दिनों तक याद करके रोमांच में डूबी रहेगी।
“जान … आओ आज एक नया प्रयोग करते हैं.”
“क्या?”
मैं उसके ऊपर से उठ गया उए उसके दोनों पैरों को मोड़कर उसके घुटने उसकी छाती की ओर कर दिए और एक तकिया उसके नितम्बों के नीचे लगा दिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब और भी ऊपर उठ गए। अब तो उसकी चूत किसी संतरे की फांकों की तरह चिपक सी गई थी। और गांड का छेड़ तो बहुत ही सिकुड़ा हुआ लगाने लगा था। मेरा तो मन करने लगा था अपना लंड उसकी चूत के बजाय उसकी गांड में ही डाल दूं पर अभी यह करना ठीक नहीं था।
फिर मैं अपने घुटनों के बल हो गया और अपना एक हाथ उसकी जाँघों पर रखा और दूसरे हाथ से अपने लंड को पकड़कर उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया। अब मैंने अपना दूसरा हाथ भी उसकी जांघ पर रखा उसे दबाते हुए एक जोर का धक्का लगा दिया।
“आआईईई ईईईईइ …”
धक्का इतना जबरदस्त था कि नताशा की एक घुटी घुटी सी चीख निकल गई। आप सोच रहे होंगे यार प्रेम गुरु तुम इतने कठोर या बेदर्द कैसे हो सकते हो?
आपका सोचना सही है पर इस आसन में चूत इतनी ज्यादा टाईट हो जाती है कि लंड अन्दर डालना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए तेज धक्का लगाना जरूरी होता है।
थोड़ी देर में नताशा संयत हो गई। मुझे लगता है जल्दी ही वह मेरे धक्कों के साथ भी अभ्यस्त हो जायेगी। नताशा ने अपने पंजे अपने दोनों हाथों में पकड़ लिए और मैंने उसकी जाँघों पर अपनी हथेलियाँ लगाते हुए धक्के लगाने शुरू कर दिए। मेरा लंड उसकी फांकों और कलिकाओं को रगड़ता हुआ अन्दर बाहर होने लगा।
अभी मैंने 5-4 धक्के ही लगाए थे कि मुझे लगा मेरे लंड के चारों ओर कोई चिकना सा तरल पदार्थ लगाने लगा है।
हे भगवान्! इस नताशा की चूत भी कितना शहद छोड़ती है।
नताशा ने अपने घुटने थोड़े से मोड़ दिए तो उसकी टांगें ऐसे लगाने लगी जैसे कोई गोल घेरा सा बन गया हो।
अब तो मेरे धक्कों के साथ उसकी मीठी किलकारियां निकलने लगी थी- प्रेम मैं तो तुम्हारे बिना अधूरी ही थी सच में आज तुमने मुझे पूर्ण स्त्री बनाने का अहसास दिलाया है.
“हाँ जानेमन मैं भी तुम्हें पाकर धन्य हो गया!”
अब मैंने और भी जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। मेरा पूरा लंड उसकी चूत में फंसा हुआ था। जैसे ही मैं धक्का लगाता मेरे अंडकोष उसकी गांड के छेद पर लगते तो रोमांच के मारे नताशा का पूरा शरीर ही लरजने लगता। उसकी चूत के मोटे मोटे पपोटों के बीच की पत्तियाँ भी मेरे लंड के घर्षण से और भी ज्यादा फूल गई थी और लंड के साथ थोड़ी अन्दर बाहर होने लगी थी।
नताशा के मुंह से गुर्र … गुरर्र … की आवाजें आने लगी थी। वह अपनी चूत का संकोचन करने का प्रयास भी कर रही थी. पर मेरे धक्कों की तब को सहन करना अब उसकी चूत और फांकों के वश में नहीं था।
उसका शरीर एक बार फिर से अकड़ा और फिर उसने अपने आप को ढीला सा छोड़ दिया। मुझे लगता है उसका एक बार फिर से स्खलन हो गया है।
हमें कोई 10-15 मिनट हो गए थे। नताशा इस दौरान 2 बार झड़ चुकी थी। मुझे लगा वह इस लम्बी मैराथन से थक गई है तो मैंने उसके पैरों को नीचे कर दिया और अब मैं उसके ऊपर आ गया। अब तो नताशा फिर से अपने नितम्बों को ऊपर-नीचे करने लग गई थी।
“प्रेम … आह … अब अपना प्रेम रस बरसा दो … आह …”
और फिर मैंने अपना एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे लगाया और दूसरे हाथ से उसकी कमर को पकड़कर 5-4 धक्के लगाए तो मेरे लंड भी पिचकारियाँ छोड़नी शुरू कर दी।
नताशा तो आह … ऊंह करती उस अनंत आनंद को भोगती रही।
जैसे बरसों की बंजर रेतीली भूमि को बारिश की फुहार मिल जाए! उसकी चूत तो संकोचन करती रही और मेरे वीर्य को पूरा अन्दर समेटती चली गई।
थोड़ी देर मैं उसके ऊपर ही पसरा रहा और उसके होंठों और गालों को चूमता रहा. नताशा तो शांत पड़ी बस लम्बी-लम्बी साँसें लेती रही। थोड़ी देर बाद मैं उसके ऊपर से उठ गया और उसकी बगल में ही लेट गया।
नताशा ने भी करवट लेकर अपना मुंह मेरी ओर कर लिया और मेरे सीने से अपना सर लगा दिया। मैंने अपने हाथ उसके सर और पीठ पर फिराने चालू कर दिए।
“प्रेम!”
“हाँ जानेमन?”
“पता है मेरा मन क्या करता है?”
“क्या?”
“मैं पूरी रात इसी तरह तुम्हारे सीने से लग कर तुम्हारे आगोश में बिताना चाहती हूँ।“
“हम्म!”
“और जब सुबह मेरी आँखें खुले तो सबसे पहले मैं तुम्हारे होंठों का चुम्बन लेकर तुम्हें जगाऊँ.”
“हम्म.”
“मैं चाहती हूँ हम दोनों साथ नहायें और फिर मैं किचन में नंगी होकर ही तुम्हारे लिए नाश्ता और खाना बनाऊँ और तुम भी उस समय बिना कोई कपड़ा पहने मेरे पास ही खड़े रहो.”
“हा हा हा … यह कौन सी बड़ी बात है यह तो तुम जब चाहो कर सकती हो.”
“ओहो … कल तो वो सब आ जायेंगे. तो दिन में यह सब कैसे हो पायेगा?”
“यार इसमें समस्या वाली कौन सी बात है तुम चाहो तो दिन में नहीं तो रात में भी तो हम यह सब कर ही सकते हैं.”
“अरे हाँ … इस तरफ तो मेरा ध्यान ही नहीं गया.” कहते हुए वह खिलखिला आकर हंस पड़ी।
“पर एक समस्या है?”
“वो क्या?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
“यार तुम तो खाना बनाती रहोगी पर मैं किचन में खड़ा क्या करूंगा?”
“क्यों … तुम भी मेरी हेल्प करना.” कहते हुए उसने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा।
मुझे लगा वह मुझे निरा पपलू (अनाड़ी) समझ रही है।
अब उसे क्या मालूम किचन में जब प्रियतमा नंगी होकर खाना बना रही होती है तो उसके पीछे खड़ा होकर उसे बांहों में भर कर उसके नितम्बों में अपना खडा लंड डालने में कितना मज़ा आता है मेरे से ज्यादा भला कौन जान सकता है।
प्रिय पाठको और पाठिकाओ, आप सभी तो बहुत गुणी और अनुभवी हैं. मेरे पुराने पाठक यह जानते हैं कि जब हमारी नई-नई शादी हुई थी तो मधुर भी रसोई में इसी तरह नंगी होकर खाना बनाया करती थी. शुरू-शुरू में तो उसे बहुत शर्म आती थी पर बाद में तो वह बहुत ही चुलबुली हो जाया कराती थी। और फिर कई बार तो मैं किचन में ही उसे घोड़ी बनाकर पीछे से उसकी चुदाई कर दिया करता था।
मैं तो सोचने लगा था क्यों ना उन्हीं पलों को एक बार फिर से दोहरा लिया जाए।
“ओके … ठीक है चलो आज का खाना हम दोनों मिलकर ही बनायेंगे.”
“तुम्हें अभी भूख तो नहीं लगी ना?”
“लगी तो है पर मैं चाहता हूँ पहले थोड़ा शॉवर ले लें? क्या ख्याल है?”
“हाँ चलो साथ में नहाते हैं.” अब तो नताशा की आँखों की चमक देखने लायक थी।
अब मैं बेड से उठकर खड़ा हो गया और नताशा को अपनी गोद में उठा लिया और हम दोनों बाथरूम में आ गए। मैंने नताशा को फर्श पर खड़ा कर दिया।
“आआईईइइ …”
“क्या हुआ?”
“वो मेरा सु-सु निकल रहा है …” कहते हुए वह कामोड पर बैठने लगी तो मैंने उसे रोक दिया।
“जान मेरी एक बात मानोगी क्या?”
“ओह … क्या?”
“यार इस कमोड पर नहीं फर्श पर बैठ कर सु-सु करो ना?”
“क्यों?”
“यार तुम्हारा यह अनमोल खजाना इतना खूबसूरत है तो इसमें से निकलते हुए सु-सु की पतली धार का संगीत कितना मधुर होगा तुम्हें अंदाजा ही नहीं है … प्लीज …”
नताशा ने एक बार कातिल निगाहों से मेरी ओर देखा और फिर झट से फर्श पर बैठ गई। उसने अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी की और फिर कलकल करती उसकी मूत के पतली सी धार निकल कर फर्श पर दम तोड़ने लगी।
मुझे लगता है उसकी ऊंचाई तो जरूर एक फुट ऊंची रही होगी। उसकी कलिकाओं से टकराती हुई मूत की धार का संगीत तो ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने सितार का सप्तम स्वर ही छेड़ दिया हो।
नताशा आँखें बंद किये सु-सु करती रही और मैं इस मनमोहक दृश्य को देखता ही रह गया। मेरा मन तो कर रहा था मैं नीचे बैठकर उसकी सु-सु की धार में अपनी अंगुलियाँ ही लगा दूं। पर इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता नताशा के सु-सु की धार पहले तो मंद पड़ी और फिर एक बार हल्की सी ऊपर उठती हुयी बूंदों की शक्ल में ख़त्म हो गई।
मैं तो अपने होंठों पर जीभ ही फिराता रह गया।
उसके बाद हम दोनों ने शॉवर लिया। नताशा तो इस समय बहुत ही चुलबुली सी हो गई थी। उसने मेरे लंड को पकड़कर पहले तो उस पर साबुन लगाया और फिर उसे धोकर साफ़ किया। लंड महाराज तो उसकी इस कलाकारी को देखकर मंत्र मुग्ध ही हो गए और एक बार फिर से अंगड़ाई लेने लगे।
नताशा ने उसे मुंह में भर लिया और चूसने लगी। ऊपर ठन्डे पानी की फुहारें पड़ रही थी और नताशा किसी लोलीपॉप के तरह मेरे लंड को चूसे जा रही थी। कोई 5-6 मिनट लंड चूसने के बाद नताशा ने उसे अपने मुंह से बाहर निकाल दिया और अपना गला सहलाने लगी।
मुझे लगता है वह अभी इस मामले में अनाड़ी है पर मेरी संगत में रहकर धीरे- धीरे हुनर भी सीख जायेगी।
अब मैंने भी नताशा की चूत को साबुन लगाकर साफ़ किया और उसे अपना एक पैर कमोड पर रखकर खड़ा होने को बोला। जब नताशा मेरे कहे मुताबिक हो गई तो मैं नीचे बैठ गया और उसकी चूत को पहले तो चूमा और फिर अपनी जीभ नुकीली करके उसके चीरे पर फिराने लगा।
नताशा तो आह … ऊंह करती रह गई। अब मैंने उसकी चूत को पूरा मुंह में भर लिया और उसकी चुस्की लगानी शुरू कर दी। नताशा तो अब रोमांच के सातवें आसमान पर थी। उसकी मीठी सीत्कारें निकालने लगी थी।
“प्रे … म आह … तुम तो आह … सच में जादूगर को.. आह … मैं मर जाऊंगी … आऐईईइ …”
वह झटके से खाने लगी। मुझे लगता है उसका ओर्गास्म हो गया है। मैंने 2-3 चुस्की और लगाईं और फिर उसकी चूत से अपना मुंह अलग कर लिया। नताशा ने नीचे होकर मेरे होंठ चूम लिए।
अब नताशा शॉवर के नीचे आ गई। मैं उसके पीछे आ गया और उसकी पीठ से चिपक कर उसके उरोजों को दबाने लगा। मेरा लंड उसके नितम्बों की खाई में जा लगा। नताशा ने अपनी कमर को थोड़ा नीचे झुकाते हुए पानी की नल को पकड़ लिया और अपने नितम्ब और जांघें खोल दी।
मैंने शेल्फ पर पड़ी क्रीम की डिब्बी से क्रीम निकालकर थोड़ी तो अपने लंड पर लगाई और फिर अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। मुझे लगा मेरा लंड किसी खुरदरी सी कन्दरा (गुफा) में जा रहा है। शायद साबुन से धोने के कारण अन्दर की चिकनाहट थोड़ी कम हो गई थी। पर मेरे लंड को अन्दर जाने में कोई ज्यादा मुश्किल नहीं हुयी।
नताशा तो बस आह … उईई … करती रही।
मैंने उसकी कमर को पकड़ लिया और धक्के लगाने शुरू कर दिए। मेरे धक्कों से उसकी चूत से भी फच्च फच्च की आवाज निकलने लगी थी और जो उसके कन्धों और पीठ पर गिरते हुए पानी के साथ होती फच्च-फच्च की आवाज के साथ अपनी ताल मिलाने लगी थी।
अब तो नताशा भी अपने नितम्बों को थिरकाने लगी थी। मैं उसके नितम्बों पर थप्पड़ भी लगाता जा रहा था। मेरे थप्पड़ों से उसके नितम्ब लाल से नज़र आने लगे थे और नताशा तो जैसे ही थप्पड़ लगता जोर से आह … सी भरती और मस्ती में अपने नितम्बों को और जोर से मेरे धक्कों के साथ आगे पीछे करने लगती।
लगता है लैला की तरह नताशा को भी सेक्स के दौरान अपने नितम्बों पर मार खाना, दांतों से कटवाना और उरोजों को मसलवाना बहुत अच्छा लगता है। थोड़ी देर बाद नताशा कुछ ढीली सी पड़ने लगी थी। मुझे लगा वह थक गई है।
“नताशा एक नया प्रयोग करें क्या?”
“ओह … प्रेम अब और कुछ नहीं बस इसी तरह किये जाओ … आह!”
“तुम्हें और भी ज्यादा मज़ा आयेगा.” कहते हुए मैं रुक गया और धक्के लगाने बंद कर दिए।
नताशा अपनी गर्दन थोड़ी सी मोड़कर मेरी ओर देखने लगी कि मैंने धक्के क्यों बंद कर दिए।
मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया और फर्श पर बैठ गया। नताशा के कुछ भी समझ नहीं आया था। मेरा सुपारा तो इस समय फूल कर लाल टमाटर जैसा हो चला था और लंड तो ठुमके पर ठुमके लगा रहा था।
अब नताशा को समझ आया कि मैं क्या चाहता हूँ। वह इतराते हुए मेरी ओर मुंह करके मेरी गोद में आ बैठी और उसने अपने चूत की फांकों को चौड़ा कर के मेरे लंड को अपनी चूत में गटक लिया।
मैंने अपने दोनों हाथ पीछे कर लिए और नताशा को भी ऐसा करने का इशारा किया। अब नताशा भी अपने दोनों हाथों को पीछे कर लिए। मैंने हाथ बढ़ा कर नल खोल दी और पानी की मोटी धार उसकी चूत पर गिरने लगी। मेरा लंड उसमें फंसा हुआ सा लग रहा था और उसकी चूत का ऊपरी हिस्सा कुछ फूला सा नज़र आ रहा था।
मुझे भी पानी की गिरती धार से सनसनाहट सी होने लगी थी तो लाज़मी था कि नताशा को भी बहुत मज़ा आने लगा होगा। अब उसने अपने चूत के दाने को पानी की धार के नीचे सेट कर लिया। अब तो वह वह तो रोमांच के मारे किलकारियां ही मारने लगी थी और अपने नितम्बों को उचकाने भी लगी थी और ‘आह … उईईइ … ’ भी करती जा रही थी।
थोड़ी देर में उसने अपने एक हाथ से अपनी चूत के दाने को टटोला और चूत का जोर से संकोचन किया और अपने नितम्बों को जोर जोर से उछालने लगी। मुझे लगा उसका ओर्गास्म हो गया है। उसका शरीर झटके से खाने लगा था।
अचानक वह उठ खड़ी हुई और मुझे धकेलते हुए मेरे ऊपर आ गई और अपने दोनों घुटनों को मोड़कर मेरे लंड की सवारी करने लगे। उसने अपनी चूत को मेरे लंड पर घिसते हुए धक्के लगाना शुरू कर दिया और साथ में जोर-जोर मीठी सीत्कारें करने लगी।
मैं कुछ ज्यादा नहीं कर सकता था बस अपने हाथों से उसके नितम्बों को सहलाता रहा और उसके उरोजों को भींचता और मसलता रहा। उसके धक्के इतने तेज थे कि मुझे लगाने लगा मेरा लंड अपनी सहनशक्ति जल्दी ही खो देगा।
मेरा एक हाथ उसके नितम्बों की खाई में उसकी गांड के छेद को टटोलने लगा था. और जैसे ही मुझे वह कोमल सा छेड़ अपनी अँगुलियों पर महसूस हुआ, मैंने अपनी एक अंगुली का पोर उसकी गांड के छेद में घुसाने की कोशिश की।
उसकी गांड का कोमल अहसास पाते ही मेरी उत्तेजना बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
नताशा का भी यही हाल था। नताशा तो अब बड़बड़ाती जा रही थी ‘आह … उईईइ … मेरे राजा … आह …’
अचानक नताशा ने नीचे होकर मेरे होंठों को जोर-जोर से चूमना शुरू कर दिया और जोर से अपनी चूत को मेरे लंड पर धकेलने सी लगी। अब तक मेरी अंगुली का एक पोर उसकी गांड के छेद में समा चुका था।
मैं भी कब तक अपने उत्तेजना को संभाल पाता मेरी पिचकारियाँ फूटने लगी और उसके साथ ही नताशा ने एक जोर के किलकारी मारी और मेरे ऊपर पसर कर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी। हम दोनों का ओर्गास्म एक साथ हो गया था। हम दोनों एक दूसरे की बांहों में समाये ऐसे ही लेटे रहे और ऊपर ठन्डे पानी की फुहारें ऐसे बरसती रही जैसे सावन के मेघ बरसते हैं।
थोड़ी देर बाद हम दोनों उठ खड़े हुए। नताशा लड़खड़ाते हुए शॉवर के नीचे आ गई और फिर मैंने भी शॉवर लिया और फिर हम दोनों तौलिये से शरीर को साफ़ करके बाहर आ गए। नताशा ने कपड़े पहनने से मना कर दिया था।
“प्रेम तुम सोफे पर बैठो, मैं अभी आई.” कहकर नताशा रसोई में चली गई।
चलते समय जिस प्रकार उसके नितम्ब हिचकोले खा रहे थे आप सोच सकते हैं कि उसकी गांड मारने की मेरी कितनी प्रबल इच्छा होने लगी थी।
थोड़ी देर बाद नताशा दो गिलासों में गर्म दूध लेकर आ गई।
“लो यह केशर और बादाम इलायची डाला हुआ गर्म दूध पी लो तुम्हारी सारी थकान दूर हो जायेगी.”
“अरे थकान तो तुम्हें हो रही होगी?” मैंने हंसते हुए कहा तो नताशा किसी नवविवाहिता की तरह शर्मा गई।
“मेरे से तो ठीक से चला भी नहीं जा रहा!” उसने कामुक मुस्कान के साथ मेरी ओर देखते हुए कहा।
“सच कहूं तो मेरा तो मन ही नहीं भरा है अभी तक.”
“हट!”
“ऐ जान! मेरी गोद में बैठ जाओ ना?”
और फिर वह मनमोहक मुस्कान के साथ बड़ी अदा से मेरी गोद में आकर बैठ गई।
मेरा लंड तो उसके गोल नितम्बों के नीचे दब कर जैसे निहाल ही हुआ जा रहा था। दूध पीने के दौरान मैं उसके गालों को भी चूमता रहा और उसके उरोजों को भी मसलता रहा। नताशा को भला कोई ऐतराज कैसे हो सकता था वह तो सम्मोहित हुई बस आह … ऊंह करती रही।
“प्रेम, खाने के बारे में क्या विचार है?”
“भई जो बनाओगी खा लेंगे.”
“खाना तो मैंने पहले ही तैयार कर लिया था. दीदी और बच्चों को भी पैक करके दे दिया था और अपने लिए भी बनाकर रख दिया था। बस मैं उसे फ़टाफ़ट गर्म करके ले आती हूँ आप बैठो.” कहकर नताशा मेरी गोद से उठकर रसोई की ओर जाने का उपक्रम करने लगी।
“चलो मैं भी साथ चलता हूँ तुम खाना गर्म करना और मैं तुम्हें गर्म करता रहूंगा.”
“हट!” मेरी बात पर नताशा खिलखिलाकर हंस पड़ी।
और फिर हम दोनों किचन में आ गए। रसोई में आने के बाड़े नताशा ने फ्रिज से खाना निकाला और गर्म करने लगी। उसकी पीठ मेरी ओर थी।
मैंने पीछे से उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसके कानों की लोब को अपने मुंह में भर कर चूसने लगा था। मैंने उसके उरोजों को भी दबाना और मसलना चालू कर दिया था और एक हाथ से उसकी बुर के दाने और उस पर पहनी बाली को भी मसलने लगा।
मेरा लंड उसके नितम्बों से चिपक गया था और उसकी नाज़ुकी और कसावट महसूस करके फिर से खड़ा हो गया था।
मैं सोच रहा था कि नताशा की गांड मारने की बात किस प्रकार शुरू की जाए। क्या पता वह इस बात के लिए तैयार भी होगी या नहीं?
आज तो प्रेमगुरु का इम्तिहान ही होने वाला है।
इस भरपूर जवान जिस्म की मल्लिका की गांड कितनी हसीन होगी यह तो मैं पिछले एक महीने से सोच-सोच कर पागल ही हुआ जा रहा था। काश एक बार उसकी मुजसम्मे की तरह तरासी हुई गांड मारने को मिल जाए तो यह मानव जीवन ही सफल हो जाए।
मैं नताशा की हल्की सी चीख सुनकर चौंका। अब मुझे ध्यान आया मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था और उसकी गांड के छेद पर दबाव बना रहा था।
“नताशा तुम्हारे नितम्ब इतने खूबसूरत हैं कि मैं तो इनका दीवाना ही हो गया हूँ।”
“जान … सब कुछ तुम्हारे हवाले कर दिया है मैंने तो!” कहते हुए नताशा घूमकर मेरी ओर हो गई और उसने अपनी बांहों मेरे गले में डाल दी।
और फिर मैंने उसे अपने बांहों में भर कर चूम लिया।
डाइनिंग टेबल पर खाना खाने की तो मात्र औपचारिकता थी। मैंने नताशा को अपनी गोद में बैठा लिया और फिर अपने हाथों से उसे खाना खिलाया।
उसकी कजिन की बेटी के जन्मदिन पर जो केक कटा था वह भी थोड़ा उसने डिनर के साथ परोसा था।
मैंने पहले तो थोड़ा केक उसे खिलाया और फिर थोड़ा सा उसके गालों और होंठों पर लगा दिया और फिर अपनी जीभ से चाटने लगा।
नताशा को तो अब नशा सा चढ़ने लगा था। फिर मैंने थोड़ा केक उसके उरोजों पर भी लगा दिया और फिर उसे पहले तो चाटा और फिर पूरे उरोज को मुंह में भर कर चूसने लगा। नताशा तो मेरी इस कारीगरी और हरकतों को देख कर मंद-मंद मुस्कुराती हुई कामुक सीत्कारें ही भरती रही।
और फिर नताशा मेरी गोद से उठकर खड़ी हो गई और उसने भी थोड़ा सा केक मेरे लंड पर लगाया और उसे अपने मुंह में भर कर चूसने लगी। जिस प्रकार वह मेरा लंड चूस रही थी मुझे लगता है उसे अभी थोड़ी ट्रेनिंग की जरूरत है बाद में तो वह इस क्रिया में भी सिद्धहस्त और पारंगत हो ही जायेगी।
मेरा मन तो करने लगा था एक बार उसके मुख श्री का भी अभिषेक और उद्धार अपने वीर्य से कर दूं पर मेरा मन तो उसकी गांड के पीछे जैसे पागल हुआ जा रहा था।
डिनर निपटाने के बाद हम फिर से रूम में आ गए और हम दोनों एक दूसरे की ओर करवट लेकर लेट गए।
मैंने उसके होंठों को मुंह में भर लिया और चूमने लगा और अपने हाथों से उसकी पीठ और कमर को सहलाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे उसके नितम्बों पर भी हाथ फिराना चालू कर दिया।
उसने मेरे सीने से अपना सर लगा रखा था और मेरे सीने पर उगे बालों में अंगुलियाँ फिराने लगी थी और मेरे निपल्स को भी हाथों से दबा रही थी। वह इस समय कुछ बोल नहीं रही थी, पता नहीं वह क्या सोचे जा रही थी।
मेरे दिलो दिमाग में तो बस उसके खूबसूरत नितम्ब ही घूम रहे थे। मुझे लगता है अब उसके नितम्बों का उदघाटन करने का उपयुक्त समय आ गया है।
“नताशा?”
“हम्म?”
“क्या सोच रही हो?”
“कुछ नहीं!” उसने चौंक कर जवाब दिया।
“जान कोई बात तो है?”
“वो … वो मैं यह सोच रही थी काश! मेरी शादी तुम्हारे साथ हो जाती.”
इससे पहले कि मैं कुछ बोलता नताशा के मोबाइल की घंटी बजने लगी।
लग गए लौड़े!!
पता नहीं किसका फोन है? क्या पता उसकी कजिन वापस ना आ रही हो? हे लिंग देव! अब तो बस तुम्हारा ही सहारा है।
नताशा ने करवट बदलकर अपना मोबाइल उठाया और बात करने लगी। अब उसके नितम्ब मेरी ओर हो गए थे। मैं चुपके से उसके पीछे होकर उसके नितम्बों को अपने पेट से लगा लिया और उसके पेट और उरोज को सहलाने लगा।
“हेल्लो दीदी!”
“ …”
“हाँ मैं ठीक हूँ.”
“ …”
“हाँ आया था … आज भी दो बार बात हुई है. उनका तो मेरे बिना मन ही नहीं लग रहा. वो तो बोलते हैं मैं मिलने आ जाऊं क्या?”
“ …”
मुझे लगता है नताशा उस लटूरे को यहाँ बुलाने की भूमिका (बेकग्राउंड) बना रही है। मैंने अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच फिराते हुए उसकी चूत के छेद में अपनी अंगुली डाल दी।
नताशा के एक हल्की चीख सी निकल गई।
“ …”
“ओह … कुछ नहीं एक मच्छर ने काट लिया.”
“ …”
“हाँ ठीक है.”
“ …”
“ना … डर वाली क्या बात है? मैं भरतपुर में भी कई बार फ्लैट पर अकेली ही रहती हूँ.”
“ …”
“हाँ .. हाँ मैं ध्यान रखूंगी.”
“ …”
“ठीक है … कितने बजे तक पहुंचेंगे?”
“ …”
“ओके गुड नाईट दीदी.”
नताशा ने लम्बी बात नहीं की और ‘गुड नाईट’ फोन काट दिया।
“वो दीदी का फ़ोन था.”
“हम्म … क्या बोल रही थी?”
“अरे यही कि मुझे अकेली को डर तो नहीं लग रहा … गुलफाम से बात हुई क्या … ये … वो …”
“वो वापस कब तक आयेंगे?”
“यहाँ से 3 घंटे की ड्राइव हैं अगर सुबह 8-9 बजे वहाँ से निकलेंगे तो 1 बजे से पहले तो नहीं आ पायेंगे.”
“गुड … तब तक तो हम कई राउंड खेल लेंगे.” मैंने हंसते हुए कहा और फिर अपना खड़ा लंड उसके नितम्बों की खाई में लगा दिया।
मैंने उसके उरोजों को भी मसलना चालू रखा।
उसने अपना मोबाइल फोन स्विच ऑफ कर दिया था। और जैसे दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है मैंने तो पहले ही अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया था। मैं नहीं चाहता था कोई इन अन्तरंग पलों में नाहक खलल (डिस्टर्ब) डाले।
“प्रेम! तुमने तो बताया ही नहीं?”
“क्या?”
“यही कि अगर तुम्हारी शादी मेरे साथ हुई होती तो क्या होता?”
अब मैं सोच रहा था नताशा जैसी खूबसूरत लड़कियां हमबिस्तरी (सम्भोग) के दौरान बहुत ही रोमांटिक होती हैं पर उन्हें अपनी खूबसूरती पर बहुत नाज़ (गर्व) भी होता है। ये अपने पति या प्रेमी पर अहसान बहुत अधिक जताती हैं. अक्सर उन्हें दब्बू किस्म का पति पसंद होता है जो केवल उसकी हाँ में हाँ मिलाये और हर समय उसकी आगे पीछे घूमता ही रहे, जैसा वह बोले बस करता जाए।
ऐसी औरतों का घर गृहस्थी में कम ही मन लगता है. और सारे दिन बनाव श्रृंगार, गपसप्प और शोपिंग में ही बिताना पसंद करती हैं।
सच कहूं तो ऐसी लड़कियां बहुत ही आलसी और अपने करियर और फॅमिली के प्रति लापरवाह भी होती हैं। ऐसी औरतों का दाम्पत्य जीवन क्लेशपूर्ण ही होता है। इनका मन कभी भी एक आदमी से संतुष्ट नहीं होता और विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाने में भी संकोच नहीं करती।
मुझे लगता है नताशा अभी कामदेव के हसीन रथ पर सवार है और रंगीन सपनों में खोई हुयी है। थोड़े दिनों में उसे जब यह खुमार उतर जाएगा तब यह सब उबाऊ लगाने लगेगा और फिर यह अपने आप से और हालात से असंतुष्ट हो जायेगी। मुझे लगता है अगर मधुर की जगह मेरी शादी इसके साथ हो जाती तो ज्यादा लम्बी टिक ही नहीं पाती। कुछ भी कहो मधुर ने मुझे हर प्रकार का सुख दिया है और सच कहूँ हमारे इस लम्बे और सुखद दाम्पत्य जीवन का सारा श्रेय मधुर के समर्पण को ही जाता है।
“क्या सोचने लगे?”
“ओह … हाँ.. दरअसल मैं सोच रहा था … अगर मेरी शादी तुम्हारे साथ होती तो मेरी तो किस्मत ही संवर जाती। मैं तो निहाल ही हो जाता।”
“हम्म … कैसे?”
“वो … मैं सच कहता हूँ मैं तो बस सारी रात तुम्हें अपनी बांहों में लिए रहता और मैं तो और सोते समय भी तुमसे दूर नहीं होता अलबत्ता तुम्हारे अनमोल खजाने में अपने … उसको डाल कर निद्रा के आगोश में चला जाता। और 2-3 साल में ही 4-5 बच्चे पैदा कर देता … हां..हां … हां …” कहते हुए मैं हंसने लगा।
“मज़ाक नहीं प्लीज सच बताओ ना?”
“मैं सच बोल रहा हूँ … तुम्हारे जैसी पत्नी पाकर तो मैं दुनिया का सबसे बड़ा खुशकिस्मत इंसान ही बन जाता.”
“प्रेम!” मैंने महसूस किया उसके दिल की धड़कने बहुत तेज हो गई हैं और पूरा शरीर लरजने सा लगा है। अब उसने मेरी ओर करवट बदलने की कोशिश की।
पर मैंने उसकी एक बांह के नीचे से हाथ डाल कर उसके उरोजों को पकड़ रखा था और अपनी जांघें उसकी जाँघों के बीच फंसाकर अपना लंड उसके नितम्बों की खाई में डाल रखा था। मेरा लंड तो बस उसकी गांड के छेद को टटोलने में लगा हुआ था। नताशा अब करवट तो क्या मेरी मर्ज़ी के बिना ज़रा सी भी नहीं हिल सकती थी।
“प्रेम! शादी से पहले मैंने कितने सपने देखे थे कि मेरा पति कितना रोमांटिक होगा. मैं चाहती थी उसे हर प्रकार से खुश कर दूं. सारी रात हम एक दूसरे की बांहों में लिपटे बिता दें। सुबह मैं उठकर उसके लिए चाय बनाऊँ और वह हर समय वो दीवाना बना मेरे मेरे आगे-पीछे ही लगा रहे।“
“हम्म!”
“प्रेम! मैं चाहती हूँ पूरी दीन-दुनिया को भुलाकर बस अपने पति को अपना सारा जीवन समर्पित कर दूं.”
“हम्म.”
“पर देखो ना मुझे नितेश के साथ शादी करके क्या मिला?”
“क्यों क्या हुआ?”
“उसे मेरी ना तो कोई परवाह ही है और ना ही कोई क़द्र!”
“ओह … कैसे?”
“मैंने अपनी सुहागरात के लिए कितने हसीन सपने सपने देखे थे पर वह तो बस एक बार अपना पति धर्म भी मुश्किल से निभा पाया था। पता है वह सुहागरात के दिन भी उसने मुझे अपनी पैंट और शर्ट पहनाई थी और खुद उसने मेरा घाघरा और ब्लाउज पहना था। और तो और वह नीचे लेट गया और मुझे अपने ऊपर आकर करने को कहा था। तुम सोच सकते हो मुझे कितनी शर्म आई होगी। और उसके बाद तो मैं सारी रात उसके साथ का इंतज़ार करती रहती थी पर वह मोबाइल पर लड़कों की नंगी फोटोज देखता रहता था और अपनी लुल्ली सहलाता रहता था। कई बार उसके कई दोस्त भी आया करते थे और वे अन्दर कमरे में बंद होकर पता नहीं घंटों क्या किया करते थे। कोई हफ्ते दस दिनों में बस चूमाचाटी करके हट जाया करता था और मैं सारी रात करवटें बदलती रहने पर मजबूर थी।“ कहते कहते नताशा का गला सा रुंध गया था।
“घर वालों ने मेरी किस्मत ही फोड़ दी … “ कहते हुए नताशा सुबकने सी लगी थी।
भेनचोद इन खूबसूरत लड़कियों के नखरे भी अजीब होते हैं। मैं तो उसकी गांड मारने की सोच रहा था पर अब तो मामला बिगड़ने वाला हो चला था। इसलिए अब स्थिति को संभालना जरूरी था।
“देखो जान … ये शादी विवाह संयोग और किस्मत की बात होते हैं। मैं तुम्हें यह नहीं कहता कि तुम परिस्थितियों से समझौता करो. पर तुम अपना जीवन अपने हिसाब से भी जीने के लिए स्वतंत्र हो. और तुम तो वैसे भी खुद नौकरी करती हो और आत्मनिर्भर हो।”
“हाँ … प्रेम अब मैंने भी फैसला कर लिया है मैं अपना जीवन अपने हिसाब से बिताऊंगी।”
“ब्रेव गर्ल! वैसे एक बात पूछूं?”
”हम्म?”
“अच्छा तुम बताओ अगर तुम्हारी शादी मेरे साथ हो जाती तो तुम क्या करती?”
“काश ऐसा हो पाता … प्रेम मैं तो अब भी तुम्हारे लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ? मेरी शादी अगर तुम्हारे जैसे रोमांटिक व्यक्ति के साथ हो जाती तो मैं तो अपना सब कुछ तुम्हें सौम्पकर तुम्हारी पूर्ण समर्पिता बन जाती। तुम जिस प्रकार चाहते और जैसे चाहते मैं तुम्हें खुश करने की हर संभव कोशिश करती, किसी भी चीज या क्रिया के लिए तुम्हें ना तो मना करती ना ही तरसाती … पता है लड़कियां सुहागरात में भी और बाद में भी कितने नखरे करती हैं और पति तो बेचारा अपना मन मार कर रह जाता है।”
अब तो आप सोच सकते हैं मेरा लंड कितना बेकाबू होने लगा था। उसने अपने नितम्बों के बीच मेरे लंड की हिलजुल महसूस कर ली थी और अब तो वह भी अपने नितम्बों को भींचने लगी थी। नताशा के नितम्बों में एक ख़ास बात यह थी कि उसके नितम्ब गोल मटोल तो थे ही पर साथ में आपस में चिपके हुए से भी थे। अक्सर गदराये हुए बदन की स्त्रियों के नितम्ब आपस में चिपके हुए होते हैं। ऐसी औरतों की गांड मारने का अनुभव अपने आप में बेमिसाल होता है।
“जान सच कहूं तो मुझे भी ऐसी ही पत्नी की ख्वाहिश (इच्छा) थी कि वह अन्तरंग पलों में मुझे किसी भी क्रिया के लिए मना ना करे. और वह भी मेरे साथ हर उस सुख को बराबर भोगे जो मैं भोगना चाहता हूँ या भोग रहा हूँ। मेरी बहुत बड़ी इच्छा थी कि मैं …”
कहते हुए मैंने अपनी बात बीच में ही छोड़ दी। मुझे लगता है नताशा नामक विस्फोटक पदार्थ अब इतनी कमअक्ल तो नहीं होगी कि उसे मेरी इस इच्छा का आभास नहीं हुआ होगा।
“प्रेम … मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करने के लिए तैयार हूँ. जो तुम चाहते हो!”
“नताशा … वैसे तो मधुर मुझे प्रेम सम्बन्ध के समय पूरा सहयोग करती है पर उसे पता नहीं क्यों एक काम बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.”
“क्या?” मैंने महसूस किया नताशा के दिल की धड़कन बहुत बढ़ गई है और वह अपनी जाँघों के साथ अपने नितम्बों को भी दबा रही है।
“नताशा सच कहूँ तो तुम्हारे नितम्ब इतने खूबसूरत हैं कि एक बार मुझे उनके बीच अपने लंड को डालने का बहुत मन कर रहा है.”
“ओह …”
“क्या हुआ?”
“पर उसमें तो बहुत दर्द होता है?”
“हाँ पहली बार में थोड़ा तो जरूर होता है पर बाद में बहुत मज़ा भी आता है।“
“क्या तुमने पहले कभी किसी के साथ किया है?”
“मैंने मधुर के साथ एक बार कोशिश की थी पर बीच में ही हमें रुकना पड़ा था.”
“क्यों?”
“वो बोली उसे यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता?”
“नखरे करती होगी साली!”
आज पहली बार नताशा के मुंह से मैंने गाली सुनी थी।
“जबरदस्ती ठोक देते साली को?”
“अरे नहीं … मेरा मानना है प्रेम संबंधों में कभी इतना रयूड (कठोर-अभद्र) नहीं होना चाहिए. यह सब तो एक दूसरे की सहमति और सहयोग से ही यह सब अच्छा रहता है।”
“हम्म!”
मुझे लगा नताशा कुछ सोचने लगी है। शायद वह इस क्रिया को भी एक बार आजमा लेने पर विचार करने लगी है। काश! अगर एक बार वह हाँ कर दे तो फिर तो मैं उसे इस प्रकार अपने झांसे में फंसा लूंगा कि बाद में तो वह कितना भी मना कर चिल्लाये मेरे लंड को अपनी गांड से नहीं निकाल पायेगी।
“प्रेम! मैंने कभी इस प्रकार के संबंधों के बारे में सोचा ही नहीं था. तुम्हें एक बात बताऊँ?”
“हाँ … श्योर!”
“मैं जब कॉलेज में थी तो मैं एक लड़के से प्रेम करती थी। हम दोनों शादी करना चाहते थे पर उसकी जिद थी कि नौकरी लगने के बाद ही शादी करेगा। और मेरी किस्मत देखो घर वालों ने इस जमूरे तथाकथित इंजिनियर के साथ मेरी तकदीर जोड़कर मेरी किस्मत फोड़ दी।”
“मैंने बताया ना शादी कई बार अनचाहे संयोग से भी हो जाती है।“
“वही तो … पता है वह मेरे नितम्बों की कितनी तारीफ़ किया करता था। वह कहता था मेरे नितम्ब दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत हैं। उसने एक दो बार मुझे उसमें संबंध बनाने के लिए भी कहा था।”
“फिर?”
“मैंने दर्द के डर से मना कर दिया था.”
“अच्छा नताशा … एक बात बताओ …”
“हम्म?”
“मान लो हमारी शादी हो जाती और मैं तुम्हें इसके लिए कहता तो?” आखिर मैंने अपने तुरप का पत्ता चल ही दिया। अब तो इस मुजसम्मे के लिए मेरे इस प्रस्ताव को सहर्ष मान लेने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचा था।
“प्रेम! … मैं तो बिना शादी के ही तुम्हें अपना सर्वस्व सौम्प कर तुम्हारी पूर्ण समर्पिता बन जाना चाहती हूँ।”
“ओह … थैंक यू मेरी जान” कहते हुए मैंने जोर से उसे अपने आगोश में भींच लिया।
और उसने भी अपने घुटने थोड़े से मोड़कर अपने नितम्बों को मेरी गोद से चिपका दिया।
“नताशा बुरा ना लगे तो एक बात पूछूं?”
“हम्म?”
“वो … कभी इंजिनियर साहब ने तुम्हें इसके लिए नहीं कहा?”
“अरे उस गांडू की बात छोड़ो … वो तो मेरी चूत को ही नहीं संभाल पाता. तो उसके लिए उसमें इतना दम कहाँ है? ओह … प्रेम! उसका नाम लेकर मेरा मूड अब खराब मत करो.” उसने झुंझलाते हुए से कहा।
“ओह … सॉरी जान … अगर तुम पेट के बल होकर लेट जाओ तो बड़ी आसानी होगी.”
“वो … वो … मुझे डर लग रहा है ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना?”
“तुम दर्द की बिल्कुल चिंता मत करो बस जैसा मैं कहूं करती जाओ और अपने आपको रिलेक्स कर लो.”
“क्रीम जरूर लगा लेना प्लीज …”
“हाँ तुम घबराओ नहीं मेरी जान!”
अब मैंने बेड के पास बनी साइड टेबल से क्रीम की ट्यूब ली और नताशा को पेट के बल लेटाकर उसे अपनी जाँघों को खोल देने का इशारा किया।
जब वह मेरे कहे मुताबिक़ हो गई तो मैंने उसे अपने नितम्बों को अपने हाथों से थोड़ा चौड़ा करने को कहा।
अब नताशा ने अपने दोनों हाथ पीछे करके अपने नितम्बों का खूबसूरत खजाना मेरे लिए खोल दिया और धड़कते दिल से आने वाले पलों का इंतज़ार करने लगी।
मेरा लंड तो कुंवारी गांड की खुशबू पाकर उछलने ही लगा था।
मैंने धीरे-धीरे उसकी गांड के छेद पर क्रीम लगानी शुरू कर दी। पहले तो उसकी गांड के छेद पर हल्का मसाज किया और फिर अपनी अंगुली के एक ने पोर पर खूब क्रीम लगाकर हल्के से अपनी अंगुली को उसकी गांड में अन्दर करने की कोशिश की।
उसकी गांड का छेद बहुत ही कसा हुआ सा लग रहा था. शायद भय मिश्रित रोमांच के कारण वह नार्मल नहीं हो पा रही थी.
पर मैं अभी कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था।
मैंने एक बार फिर से उसे रिलेक्स हो जाने को कहा तो उसने अपना शरीर ढीला सा छोड़ दिया और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी।
अब मुझे लगा कि उसकी गांड का कसाव कुछ ढीला पड़ने लगा है तो मैंने अपनी अंगुली का पोर (आगे का हिस्सा) उसकी गांड में डालने की कोशिश की।
3-4 बार धीरे धीरे अन्दर-बाहर करने की कोशिश करने के बाद मेरे अंगुली उसकी गांड के अभेद्य दुर्ग को भेदने में कामयाब हो गई।
अब तो मेरी अंगुली आराम से अन्दर-बाहर होने लगी थी। मैंने अपनी अंगुली पर फिर से थोड़ी क्रीम लगाई और उसे अन्दर-बाहर करना चालू रखा।
मैंने ध्यान रखा शुरू में केवल एक इंच तक अंगुली को अन्दर बाहर करूँ, बाद में तो वह पूरी अंगुली ही नहीं मेरे लंड को भी बिना किसी रुकावट के अन्दर घोंट लेगी।
जब मेरी अंगुली पूरी अन्दर-बाहर होने लगी तो नताशा के मुंह से हल्की सीत्कार निकलने लगी। मुझे लगा उसे भी अब इस क्रिया में दर्द के अहसास के बजाय मज़ा आने लगा है। अब मैंने एक हाथ से उसके नितम्बों पर थप्पड़ लगाया और फिर उसपर एक चुम्बन ले लिया।
नताशा तो किसी घोड़ी की तरह हिनहिनाने ही लगी थी कि सवार अब घुड़सवारी करने में देरी क्यों कर रहा है। नताशा की मीठी सीत्कारें पूरे कमरे में गूंजने लगी थी।
और मुझे भी लगने लगा था अब उसके गांड का किला फ़तेह करने का माकूल वक़्त आ चुका है।
हे लिंग देव! तेरी जय हो।
अब मैंने अपने लंड पर भी खूब सारी क्रीम लगा ली। मेरा लंड तो पहले से ही झटके से खाने लगा था और सुपारा फूल कर इतना मोटा हो चला था कि मुझे तो डर सा लगाने लगा इतना मोटा सुपारा इस नाजुक सी गांड में कैसे जा पायेगा।
पर यह वक़्त किन्तु परंतु पर ध्यान देने का नहीं था। मैंने एक बार फिर से नताशा की गांड पर मसाज सी की और अपनी अंगुली उसके छेद में अन्दर बाहर की।
और फिर उसके नितम्बों पर 2-3 थप्पड़ फिर से लगाए और उनको अपनी जीभ से चाटने लगा।
नताशा तो रोमांच के मारे किलकारियां ही भरने लगी थी।
अब मैंने उसे अपने नितम्ब थोड़े ऊपर करने को कहा और एक तकिया उसके पेट के नीचे लगा दिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब और भी ऊपर होकर खुल गए। अब तो उसकी गांड का गुलाबी छेद भी नज़र आने लगा था।
मैंने एक हाथ की अँगुलियों और अंगूठे से उसके नितम्बों को थोड़ा और चौड़ा किया और अपना लंड उसके छेद पर लगा दिया।
नताशा के सारे शरीर में एक सिरहन सी दौड़ने लगी। मैं सोच रहा था कि इसकी कमर को कसकर पकड़ ली जाए और फिर अपने लंड का दबाव बनाया जाए।
पर मुझे डर था ऐसा करने से मेरा लंड रास्ता भटक सकता है क्यों कि उसकी गांड का छेद बहुत संकरा था और नताशा भी अभी नार्मल नहीं हुई थी।
“नताशा डिअर?”
“हम्म?”
“तुम अपने आप को बिल्कुल ढीला छोड़ दो … मेरा विश्वास रखो तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं होगा।”
“आह …” कहते हुए उसने अपने नितम्बों का एक बार संकोचन किया और फिर अपने आप को ढीला छोड़ दिया।
अब मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ में मैंने अपने लंड को पकड़ कर उसकी गांड के छेद पर दबाव बनाया। यह जरूरी भी था मुझे लगता था अगर मैंने अपने लंड को छोड़ दिया तो यह फिसल जाएगा और गांड में नहीं जा सकेगा।
पहले प्रयास में लंड थोड़ा सा मुड़ा और फिसलने सा लगा था पर मैंने ज्यादा जोर नहीं लगाया। धीरे-धीरे अपने लंड को उसके छेद पर दबाता रहा।
ऐसा मैंने 4-5 बार किया तो नताशा की गांड का छल्ला (अनल रिंग) अब थोड़ा नरम पड़कर खुलने सा लगा था और मेरे लंड के सुपारे का अग्रभाग अब थोड़ा सा अन्दर भी जाने लगा था।
इस समय मैं कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रहा था।
अब मैंने 2-3 बार फिर से वैसे ही दबाव बनाना चालू रखा। अब तो मेरा आधा सुपारा अन्दर जाने लगा था। उसकी गांड का छल्ला अब तो रास्ता देने के मूड में लगाने लगा था। जैसे ही सुपारा थोड़ा अन्दर सरकता, नताशा हल्की सी आह भारती और उसका शरीर फिर से थोड़ा अकड़ने लगता।
“नताशा मेरी जान … आह … तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत हैं मेरी रानी … आज मैं तुम्हें मुकम्मल (पूर्णरूप) से पा लेना चाहता हूँ। प्लीज अपने आप को रिलेक्स कर लो … आह!”
मैंने अपना एक हाथ उसकी बांह और गले के नीच से डालकर उसके उरोजों को पकड़ लिया और उसके कानों की लोब को अपने मुंह में भर लिया। मेरा आधा सुपारा उसकी गांड में फंसा हुआ था और अबकी बार मैंने अपने लंड के दबाव के साथ एक हल्का सा धक्का लगाया तो मेरा पूरा सुपारा अन्दर चला गया.
और उसके साथ ही नताशा ने अपनी मुट्ठियाँ भींच की। उसका शरीर हिचकोले से खाने लगा और उसके मुंह से एक घुटी घुटी सी चीख पूरे कमर में गूँज उठी।
“आआआईई ईईईईई …”
“आह मेरी जान …” कहते हुए मैंने उसके गालों को चूमना शुरू कर दिया। नताशा थोड़ी कसमसाई तो जरूर पर मेरी गिरफ्त इतनी मजबूत थी कि उसका मेरे नीचे से निकल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।
“ओह … प्रेम! बहुत दर्द हो रहा है … प्लीज बाहर निकालो … आह … ऊईई …”
“बस जान अब दर्द नहीं मजा आयेगा तुम बस रिलेक्स हो जाओ … हिलो मत!”
“प्लीज … प्रेम!”
मैंने उसकी बातों पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी और उसके गालों को चूमना चालू रखा। थोड़ी देर में उसने हाय तौबा करना और कसमसाना बंद कर दिया। मैं चुपचाप उसके ऊपर पड़ा रहा। मेरा लंड तो उस संकरी गुफा में विराजमान होकर निहाल ही हो गया था।
नताशा ने अपना सर तकिये से लगा दिया था और आँखें बंद किये लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी थी। मुझे लग रहा था जैसे मेरे लंड को किसी ने अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया हो। नताशा ने अपनी गांड का संकोचन किया तो मेरा सुपारा और भी अधिक फूल सा गया था और अब तो वह अपने यात्रा निर्विघ्न सम्पूर्ण करके ही बाहर आने की कोशिश करेगा।
“प्रेम! प्लीज बाहर निकालो … आह … बहुत दर्द हो रहा है ऐसा लगता है जैसे मेरी आह … पोट्टी … आह … प्लीज …” नताशा बोलती जा रही थी पर मुझे लगता है दर्द इतना भी असहनीय नहीं था कि मुझे अपना लंड बाहर निकालना पड़े।
“जान मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे आज मैंने अपने जीवन का सबसे अनमोल अनुभव प्राप्त कर लिया है। तुम्हारे इस समर्पण के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। बस तुम अपने आप को थोड़ी देर के लिए रिलेक्स कर लो … कुछ नहीं होगा बस थोड़ी सी चुनमुनाहट सी होगी और उसके बाद तो तुम्हें भी बहुत ही अच्छा लगने लगेगा।” कहते हुए मैंने उसके गालों पर आये आंसुओं को चूम लिया।
बेचारी नताशा के लिए मेरे इस परफेक्ट शब्द जाल से निकल पाना अब भला कैसे संभव था. वह चुपचाप मेरे लंड को अपनी गांड में फंसाए लेटे रही। उसने मेरे लंड को अपनी गांड से बाहर निकालने के लिए बाहर की ओर प्रेशर बनाया तो उसके गांड का छल्ला थोड़ा ढीला हो गया और मेरा लंड उस फिसलन में सरक कर उसकी गांड में जड़ तक अन्दर समा गया।
नताशा का शरीर दर्द के मारे थोड़ा अकड़ा तो जरूर पर अब मुझे लगा कि मेरा लंड पूरी तरह अन्दर एडजस्ट (समायोजित) हो गया है तो मैंने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठाते हुए अपने लंड को एक इंच बाहर निकाला और फिर से दबाव बनाकर अन्दर डाल दिया।
इस बार मेरे लंड को पूरा अन्दर जाने में कोई रुकावट नहीं हुई। नताशा ने इस बार कोई ज्यादा हाय तौबा नहीं की अलबता अब वह कुछ शांत सी होकर लम्बी साँसें लेने लगी थी।
अब मैंने अपना एक हाथ नीचे करके उसकी बुर के दाने और उसपर पहनी रिंग को अपनी अँगुलियों से दबाना और मसलना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से उसके उरोजों की घुंडियों को मसलना जारी रखा। मैंने उसके गालों कानों और गर्दन पर भी चुम्बनों की झड़ी सी लगा दी थी। अब तो नताशा आह … उंह … करती सीत्कारें लेने लगी थी।
“मेरी जान … मेरी प्रियतमा … अब ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा है ना?” मैंने फुसफुसाते हुए उसके कानों में कहा और उसके कानों की लोब को अपने मुंह में भर कर चूसने लगा।
“आह … प्रेम! थोड़ा दर्द तो हो रहा है … क्या पूरा अन्दर चला गया है?”
“हां मेरी जान!”
नताशा ने अपना एक हाथ पीछे करके अपने नितम्बों के बीच फंसे मेरे लंड को टटोलने की कोशिश की पर उसका हाथ अपनी गांड तक नहीं पहुंच पाया।
“आह … मुझे मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई मूसल मेरे पेट के रास्ते नाभि तक आ गया है।”
“जान … मैं किस प्रकार तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ मुझे समझ ही नहीं आ रहा? तुम कितनी समर्पिता प्रियतमा (महबूबा) हो इसका अंदाजा मुझे आज हो पाया है। मैं तो तुम्हारे इस समर्पण को ताउम्र याद करके रोमांचित होता रहूंगा।”
आज तो मैं पूरा प्रेमगुरु बन गया था और अपने शब्दकोष से सारे गूढ़ शब्द नताशा की तारीफ़ में कह देना चाहता था।
बेचारी नताशा तो बस मीठी आहें ही भरती रह गई।
अब मैंने अपने लंड को धीरे-धीरे उसकी गांड में आगे-पीछे करना शुरू कर दिया था। मुझे लगता है उसकी गांड अब मेरे लंड की अभ्यस्त हो गई है और उसे कोई ज्यादा दर्द नहीं हो रहा है। हाँ कुछ चुनमुनाहट जरूर हो रही होगी और इस चुनमुनाह में उसे भी मज़ा आने लगा होगा तभी तो वह अब सीत्कारें करने लगी थी।
“नताशा आज मैंने तुम्हें पूर्ण रूप से पा लिया है.” कहते हुए मैंने उसके गालों को चूमना शुरू कर दिया।
“प्रेम! एक बात बोलूँ?”
“हाँ जान?”
“तुम्हारा नाम प्रेम नहीं या तो कामदेव होना चाहिए या फिर प्रेमगुरु!”
“कैसे?” मैंने हंसते हुए पूछा।
“किसी स्त्री को कैसे अपने वश में किया जाता है तुम बहुत अच्छे से जानते हो?”
“अरे नहीं … ऐसा कुछ नहीं है?”
“अब देखो ना तुमने अपने शब्द जाल में मुझे फंसाकर मुझे इस काम के लिए भी आखिर मना ही लिया.”
“जान तुम इतनी खूबसूरत हो कि मैं तुम्हें पूर्ण रूप से पा लेने के लिए अपने आप को रोक नहीं पाया.”
“तभी तो मैं कहती हूँ तुम पूरे प्रेमगुरु नहीं महागुरु हो.”
“अच्छा एक बात बताओ?”
“हम्म?”
“क्या तुम्हें अब अच्छा नहीं लग रहा?”
“दर्द तो नहीं हो रहा पर चुनमुनाहट सी जरूर हो रही है। और … और इस चुनमुनाहट से सारे शरीर में एक नया रोमांच और सनसनी सी हो रही है।”
“जान यही तो सहचर्य का आनंद है … जब दोनों को इस क्रिया में समान आनंद आये तभी उसे सम्भोग कहा जा सकता है। मैं तो यह सोच कर ही अभिभूत हुआ जा रहा हूँ कि मैंने आज अपने प्रियतमा को पूर्ण रूप से पा लिया है।”
“हाँ प्रेम! मैंने भी आज महसूस किया है कि मैं आज पूर्ण समर्पिता स्त्री बन गई हूँ.”
प्रिय पाठको और पाठिकाओ!
अब तो नताशा नामक मुजसम्मा भी अपने आप को शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से तैयार कर चुकी थी तो अब अपने लंड को उसकी गांड में अन्दर बाहर करते समय मेरा यह डर भी ख़त्म हो गया था कि वह इस क्रिया को आगे जारी रखने के लिए कहीं मना ना कर दे।
अब मैंने हल्के धक्कों के साथ अपने लंड को उसकी गांड में अन्दर बाहर करना चालू आकर दिया था। मैं अब अपने हाथों और कोहनियों के बल होकर उसपर लेटा हुआ धक्के लगा रहा था।
हमें गांडबाज़ी करते हुए कोई 8-10 मिनट तो जरूर हो गए थे। मुझे लगा अगर अब नताशा को डॉगी स्टाइल में करके गांड मारी जाए तो हमारा आनंद दुगुना हो जाएगा। पर मुझे थोड़ा संशय था शायद नताशा इसके लिए अभी राजी नहीं होगी।
“प्रेम मैं थोड़ी ऊपर हो जाऊं क्या?”
“क्या मतलब?”
“अरे मेरी तो कमर ही दुखने सी लगी है मैं अपने पैर और घुटने मोड़कर डॉगी स्टाइल में हो जाती हूँ.”
“ओह … हाँ मेरी जान!” मेरी तो जैसे बांछें ही खिल गई।
अब मैंने उसकी कमर अपने दोनों हाथों से पकड़ ली और अपने घुटनों को मोड़ते हुए नताशा को सहारा देते हुए थोड़ा ऊपर उठाया। इस दौरान मैंने ध्यान रखा लंड गांड से बाहर ना फिसल जाए। और थोड़ी कोशिश के बाद वह डॉगी स्टाइल में हो गई और उसने अपने पेट के नीचे रखा तकिया सामने रख कर उस पर अपना सर टिका दिया।
अब तो उसकी गांड के कपाट पूरे खुल गए थे। हे भगवान! उसकी गांड का लाल रंग का छल्ला तो बहुत ही खूबसूरत लगने लगा था। नताशा ने अपना एक हाथ पीछे करके अपने छल्ले पर अंगुलियाँ फिराई और मेरे लंड को भी टटोलने की कोशिश की।
उसकी नाज़ुक अँगुलियों का स्पर्श पाकर लंड तो फिर से ठुमके लगाने लगा था। उसकी गांड का लाल रंग का छल्ला तो किसी छोटे बच्चे के हाथ की कलाई में पहनी चूड़ी जैसा लगाने लगा था। मेरा लंड जैसे ही थोड़ा बाहर आता छल्ला भी थोड़ा सा बाहर आ जाता तो उसका लाल रंग नज़र आने लगता और जब लंड अन्दर जाता तो छल्ले की चमड़ी भी अन्दर चली जाती और नताशा चुनमुनाहट के कारण सीत्कार भरने लगती।
मैंने अब उसकी कमर कसकर पकड़ ली और हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिए। मैंने थोड़ी सी क्रीम अपने लंड पर और लगा ली इससे लंड आराम से अन्दर बाहर होने लगा था। अब तो नताशा का दर्द भी ख़त्म हो गया था और वह मेरे धक्कों के साथ सीत्कारें करती जा रही थी।
दोस्तो! आप सोच रहे होंगे मैं धक्के जोर से क्यों नहीं लगा रहा।
इसका एक कारण था।
एक तो नताशा का शायद यह पहला अनुभव था और पहली बार में मैं उसके साथ इतनी बेदर्दी से पेश नहीं आना चाहता था। क्योंकि मुझे तो अगले 5-7 दिनों में उसकी गांड का कई बार अलग अलग आसनों में और भी मज़ा लेना था। इसलिए अभी शुरुआत में इतना उतावलापन और कठोरता नहीं दिखाना चाहता था।
एक बार नताशा को मज़ा आने लगे उसके बाद तो वह खुद मेरे लंड पर बैठकर अपनी गांड मरवाने में भी कोई शर्म या झिझक महसूस नहीं करेगी।
अब मैंने ध्यान से उसके नितम्बों को देखा। उसके दायें कूल्हे (नितम्ब) कर एक तिल था। याल्ला … ऐसी स्त्रियाँ तो बहुत ही कामुक होती हैं और सेक्स में पूर्ण सहयोग के साथ हर क्रिया में आनंद लेने की कोशिश करती हैं।
मैंने उसके नितम्बों पर थप्पड़ लगाने शुरू आकर दिए। अब तो नताशा का रोमांच अपने शिखर पर पहुँच गया था। वह जोर से सीत्कारें कर ने लगी थी।
अपने एक हाथ से मैंने उसके उरोजों की घुन्डियाँ और दूसरे हाथ से उसके नथनिया को मसलना चालू कर दिया। बेचारी नताशा अपने आप को कब तक रोक पाती नताशा ने एक जोर की किलकारी मारी और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया और मेरी अंगुलियाँ किसी खुशबूदार चिकने रस से सराबोर हो गई।
मैं कुछ पलों के लिए रुक गया। अब मुझे भी लगाने लगा था मेरा लंड उसकी गांड की तपिश को ज्यादा देर तक नहीं झेल पाएगा।
मैंने उसके नितम्बों पर फिर से हल्के थप्पड़ लगाने शुरू कर दिए और चूत के दाने को मसलने लगा।
नताशा आँखें बंद किये अब भी आह … ऊंह करती जा रही थी। और फिर मेरे लंड ने अपनी पिचकारियाँ उसकी गांड में छोड़नी शुरू कर दी। नताशा तो आऐईई ईईईईइ करती ही रह गई।
उसने पहले तो अपनी गांड के छल्ले का थोड़ा सा संकोचन करने की कोशिश की फिर बाद में बाहर की ओर प्रेशर बनाकर मेरे लंड को बाहर धकलने की कोशिश की। उसकी गांड तो जैसे मेरे वीर्य से ओवरफ्लो ही होने लगी थी। अंतिम 5-4 धक्कों में तो मेरा लंड किसी पिस्टन की तरह अन्दर बाहर होने लगा था।
मैंने उसके नितम्बों पर थपकी सी लगाते हुए उसे अपने पैर पीछे पसार देने का इशारा किया।
नताशा ने अपने पैर मेरे कहे मुताबिक़ पीछे कर दिए और अब मैं फिर से उसके ऊपर पसर सा गया। और उसके उरोजों को दबाता रहा और गालों को चूमता रहा।
थोड़ी देर बाद मेरा लंड सिकुड़ गया और फिर फिसल कर एक पुच्च की आवाज के साथ उसकी गांड से फिसलकर बाहर आ गया।
नताशा की गांड से मेरा वीर्य अब थोड़ा बाहर आने लगा था। नताशा अब थोड़ा कसमसाने सी लगी थी और अपने नितम्बों को हिलाने लगी थी।
“क्या हुआ जानेमन?”
“ओह … प्रेम! मुझे गुदगुदी सी हो रही है कितना पानी निकाला है तुमने?”
“हाँ जान यह सब तुम्हारी गांड की खूबसूरती का कमाल है मेर लंड तो इसे भोगकर निहाल ही हो गया है।”
“आईई ईईईईईईइ” नताशा फिर कसमसाने लगी थी।
अब मैं उसके ऊपर से हट गया तो नताशा उठकर बैठ गई और पास रखे तौलिये को अपनी गांड के नीचे लगा लिया। उसकी गांड से झरझर करता रस बाहर आने लगा। नताशा आँखें बंद किये उसे बाहर निकलती रही।
मुझे हैरानी हो रही थी. इससे पहले भी मेरा दो बार वीर्यपात हो चुका था. तो इस बार गांड में इतना वीर्य कैसे निकला होगा?
पर मुझे इसमें ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं थी।
“ओह … प्रेम! मुझे बाथरूम तक ले चलो … प्लीज … मुझ से तो उठा ही नहीं जा रहा. आज तो तुमने मेरे सारे कस-बल निकाल कर जैसे मेरी हड्डियों का कचूमर ही निकाल दिया है। मैं तो अब 2-4 दिन ठीक से चल फिर भी नहीं पाउंगी।”
“अरे मेरी जान, अभी तो हमें 3-4 राउंड और खेलने हैं. तुम तो अभी से हार मान बैठी?” कहते हुए मैंने नताशा को अपनी गोद में उठा लिया और हम दोनों बाथरूम में आ गए।
नताशा ने अपनी बुर और गांड को अच्छे से धोया और फिर तौलिये से पौंछ कर साफ़ किया। मैंने भी अपने लंड को साबुन से धोया और फिर हम दोनों एक दूसरे की बांहों में लिपटे बेड पर आ गए।
मैंने पास में रखी बोरोलीन क्रीम ली और अपनी अँगुलियों पर लगाकर नताशा की गांड के छल्ले पर लगा दी। उसकी गांड का छल्ला तो सूज कर मोटा और लाल सा हो गया था। थोड़ी क्रीम मैंने अपने लंड पर भी लगा ली।
“प्रेम!”
“हम्म?”
“तुमने तो आज मेरी कुंवारी गांड के साथ भी सुहागरात ही मना ली।“
“हाँ मेरी जान … आज तुमने मेरी बरसों की प्यास और तमन्ना को पूरा किया है.”
“पर मुझे तुमसे एक शिकायत है.”
“क … क्या?” मुझे लगा नताशा अब इतनी बेरहमी से गांड मारने का उलाहना और शिकायत करने वाली है।
“तुमने आज अपनी प्रियतमा के साथ सुहागरात तो मना ली. पर उसे कोई गिफ्ट तो दिया ही नहीं?”
“ओह … हाँ.. वो दरअसल …” भेनचोद यह जबान भी ऐन मौके पर धोखा दे जाती है। मुझे तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि उसे क्या जवाब दूं।
“वो दरअसल मैं सोच रहा था कल हम दोनों साथ में मार्किट चलेंगे और फिर तुम अपनी पसंद की जो मन में आये गिफ्ट ले लेना मैं दिलवा दूंगा.” मैंने अपना गला खंखारते हुए कहा।
“ऐसे थोड़े ही होता है?”
“क्या मतलब?”
“अच्छा चलो मैं एक गिफ्ट मांगती हूँ पर पहले तुम प्रोमिज (वादा) करो मना नहीं करोगे?”
अब मैं सोच रहा था पता नहीं नताशा क्या चाहती है? कहीं यह मुझसे शादी के लिए तो दबाव नहीं बनाना चाहती?
“क्या सोचने लगे?”
“ओह … हाँ … ना कुछ नहीं … तुम बोलो मैं उसे जरूर पूरा करने की कोशिश करूंगा.” मैंने प्रोमिज तो कर दिया पर मेरा दिल भी धड़क रहा था। कुछ भी कहो मैं अपनी गृहस्थी (परिवार)की कुर्बानी नताशा के लिए नहीं सकता।
नताशा मेरे पास सरक आई और मेरे होंठों को चूमते हुए बोली- प्रेम! तुम कभी मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगे ना?
लग गए लौड़े!
हे भगवान्! यह कैसी अग्नि परीक्षा में मुझे डाल रहे हो?
“प्रेम! मैं … बस तुम्हारा साथ चाहती हूँ। तुम्हारा इस ट्रेनिंग के बाद प्रमोशन भी होने वाला है और किसी दूसरी जगह ट्रान्सफर भी हो जाएगा। मैं चाहती हूँ तुम किसी तरह मेरा भी ट्रान्सफर अपने साथ ही करवा दो. इतना तो तुम करवा ही सकते हो? बोलो?”
“ओह?” मेरे मुंह से निकला। मैं तो पता नहीं क्या क्या सोचता जा रहा था।
“क्या सोचने लगे?”
“ओह.. हाँ … कोई बात नहीं … मैं जरूर कोशिश करूंगा तुम बेफिक्र रहो।”
“थैंक यू मेरे प्रेम!” कहते हुए नताशा ने एक बार फिर से मेरे गले में अपनी बाहें डालकर मेरे होंठों को चूम लिया।
और फिर उस रात मैंने 2 बार नताशा की चूत का बैंड बजाया और और एक बार उसकी फिर से गांड भी मारी। हालांकि वह तो गांड के लिए मना करती रही पर मैं आज कहाँ मानने वाला था। सुबह तड़के पता नहीं कब हमारी आँख लग गई।
सुबह कोई 8 बजे हम दोनों जागे। नताशा की तो उठने की भी हिम्मत नहीं बची थी। मैंने रसोई में जाकर चाय बनाई और फिर कोई 9 बजे मैं होटल पहुंचा।
नताशा ने आज शाम को आने का वादा तो जरूर किया पर उसकी हालत देखकर मुझे तो नहीं लगता वह आज शाम को होटल आ सकेगी।
कोई बात नहीं हम कल का इंतज़ार जरूर करेंगे।
और फिर अगले 5-7 दिनों में उसे 84 आसनों की ट्रेनिंग भी देनी है क्योंकि पूरे कामशास्त्र का ज्ञान बिना अनुभव प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है।
देसी गांड सेक्स स्टोरी यहाँ समाप्त होती है.
कई बार मैं सोचता हूँ मैं किस प्रकार के लिजलिजे संबंधों में फंस सा गया हूँ। मुझे लगता है मैं सिमरन और मिक्की की याद में किसी मृगमरीचिका में भटक रहा हूँ। उम्र के इस पड़ाव पर क्या मुझे अब इन सब चीजों को तिलांजलि दे देनी चाहिए? आप मुझे अपनी राय से जरूर वाकिफ (अवगत) जरूर करवाएं।