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Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

* पात्र ( किरदार) परिचय

01. वसीम- शहनाज का पति, उम्र 25 साल, मैनेजर, तीन महीने पहले शादी,

02. शहनाज- वसीम की पत्नी, उम्र 23 साल, फिगर 32-26-34 का, कमसिन काया

03. शाजिया- शहनाज की बहन, उम्र 20 साल, कद 55", फिगर 32-24-32 की, कुँवारी, बेहद हसीन,

04. राज- उम्र 50 साल, मकान मालिक,

05. जय- उम्र 50 साल, कद 55" इंच, वसीम के बैंक में चपरासी, बहुत ही बदसूरत,

06. आरके - राज और जय से उम्र में बड़ा,

07. दीप्ति- शहनाज की सहपाठी दोस्त, उम्र 23 साल, बहुत खूबसूरत,

08. ज़ुबैदा- वसीम की माँ, बहुत खूबसूरत,

09. नीलोफर- वसीम की बहन, उम्र 23 साल, फीगर 36-26-36 की, हँसमुख, खुले विचार, गदराया बदन,

10. अमन- रिक्शावाला,

11. कुणाल- मुहल्ले का गुन्डा, हट्टा-कट्टा,
 
नमस्कार दोस्तों, मैं एक बार फिर से आपका स्वागत करता हूँ और पेश करता हूँ एक और कहानी ,इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं और उनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है और अगर ऐसा कुछ होता है तो यह मात्र एक संयोग हो सकता है। इस कहानी का उद्देश्य सिर्फ लोगों का मनोरंजन करना है और किसी भी धर्म, जाती, भाषा, समुदाय का अपमान करना नहीं। इस कहानी के कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं, पाठकगण कृपया अपने विवेक से निर्णय लें। यह कहानी मात्र वयस्कों के लिए लिखी गई है, इसलिए 18 वर्ष से अधिक की उम्र होने पर ही आप इस कहानी को पढ़ें।

* शहनाज ने अपनी पैंटी और ब्रा से राज का वीर्य सूँघा और चाटा

ये कहानी है शहनाज की। शहनाज के समर्पण की। मात्र 23 साल की शहनाज अपनी कमसिन काया से किसी भी मर्द के जिश्म में उबाल ला सकती थी। अमीर और बड़े घर में पली बढ़ी शहनाज की नई-नई शादी हुई थी। अभी वो मात्र 23 साल की थी और अपने जवान जिश्म और मन में ढेरों अरमान लिए वो अपने पति के घर आई थी।

उसका पति वसीम भी एक बैंक में काम करता था। शहनाज बेहद खूबसूरत और मासूम चेहरे वाली लड़की थी जिसका कमसिन जिश्म कातिल अंदाज का था। 32-26-34 के फिगर के साथ वो किसी को भी मदमस्त कर सकती थीं। शहनाज एक बेहद ही शरीफ लड़की थी और यकीन मानिए की उसका कभी किसी के साथ कोई चक्कर नहीं रहा। बचपन से वो लड़कों को अपनी तरफ आकर्षित होता देखती आई है और इसे बहुत ही सलीके से वो इग्नोर करती आई है।

शहनाज ऐसे साफ महाल में पली बढ़ी, जहाँ लोगों की मदद करना, शिष्टाचार से रहना सीखी थी। शहनाज की शादी के अभी तीन महीने ही हुए थे की उसके पति का ट्रांसफरर एक दूसरे शहर में हो गया। शहनाज अपने जिंदगी से पूरी तरह खुश थी और उसे अपने जीवन से कोई समस्या नहीं थी। ये तीन महीने बड़े ही मजे से गुजरे थे शहनाज के पति के साथ एक शानदार हनीमून मनाकर लौटी थी शहनाज । एक लड़की को जो जो चाहिए था सब मिला था उसे। वसीम हैंडसम था और बहुत केयरिंग था। वो भी शहनाज जैसी हसीन बीवी पाकर बहुत खुश था और दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे।

वसीम नये शहर में जाय्न तो कर चुका था, लेकिन सही घर ना मिल पाने की वजह से वो शहनाज को अपने साथ नहीं ला पाया था। दोनों के दिन और रात बड़ी बैचैनी से कट रहे थे। किसी तरह वसीम ने एक सप्ताह गुजारा और एक घर किराये पे ले लिया। हड़बड़ी में वसीम को कोई घर मिल नहीं रहा था तो उसके बैंक के चपरासी जय ने उसे एक घर बताया जिसे वसीम ने आनन-फानन में देखकर पसंद भी कर लिया और अड्वान्स देकर किराये पे ले लिया।

वसीम ने जो घर किराये में लिया था वो एक हिंदू का घर था। एक 50 साल का हिंदू मर्द राज जो अकेला रहता था। उसका घर बहुत बड़ा सा था और उसने राज को अपने घर का पूरा ग्राउंड फ्लोर किराये पे दे दिया था। ऊपर आधे छत पे दो बेडरूम हाल किचेन था जिसमें राज खुद अकेला रहता था। बाकी आधी छत खाली थी। सीढ़ी से चढ़ते ही लेफ्ट साइड में एक छोटा सा रूम था जिसमें बस कचरा भरा हुआ था। उसके बाद खाली जगह थी जहाँ कपड़े सुखाने की जगह थी और उसके बाद राज का रूम था ।

पूरे छत पे 4 फुट की बाउंड्री की हुई थी। नीचे का पूरा ग्राउंड फ्लोर वसीम और शहनाज को मिल गया था। 4 बेडरुम, बड़ा सा डाइनिंग हाल, किचेन सब मिल गया था वसीम को और वो भी बहुत कम किराये में।

शहनाज भी वसीम के साथ नये शहर और नये घर में शिफ्ट हो गई। शहनाज बहुत खुश थी। उसके सास, ससुर, ननद नीलोफर और मम्मी, पापा और बहन शाजिया भी यहाँ आकर कुछ दिन रहकर गये। सबको घर बहुत अच्छा लगा लेकिन सबको एक ही प्राब्लम थी की ये हिंदू का घर है, लेकिन वसीम ने सबको समझा लिया था।

शहनाज बेहद हसीन थी और अमीर और खुले विचारों के घर के होने की वजह से उसके कपड़े भी माडर्न टाइप के होते थे। हालाँकी वो ट्रेडीशनल और एथनिक इंडियन कपड़े ही पहनती थी। लेकिन फिर भी उनमें थोड़ा खुलापन होता था। उसके लिए तो ये सब नार्मल बात थी, लेकिन लोगों को तो वो अप्सरा, परी, हूर नजर आती थी। नई- नई शादी होने की वजह से उसका जिश्म और खिल गया था और फुल मेकप और ज्वेलरी वैसे ही आग लगा देता था।

दो-तीन महीने होते-होते शहनाज की खूबसूरती की चर्चा पूरे मुहल्ले में होने लगी। शहनाज जब भी घर से बाहर निकलती तो वो भीड़ में भी चमक जाती थी। लेकिन शहनाज इन सब बातों से बेखबर रहती थी और मजे से अपनी जिंदगी जी रही थी।

वसीम भी ऐसी खूबसूरत बीवी पाकर बहुत खुश था। हालाँकी वसीम ने उससे कहा था की जब तुम मार्केट जाती हो तो सब तुम्हें ही घूरते रहते हैं तो शहनाज का जवाब था की ये तो बचपन से हो रहा है मेरे साथ। इसमें मैं क्या कर सकती हूँ? वसीम का मन हुआ की उसे बोले की ऐसे कपड़े यहाँ मत पहनो, लेकिन कहीं उसपे मीन माइंडेड होने का ठप्पा ना लग जाए इस डर से वो कुछ बोल नहीं पाया।

राज यहाँ अकेला रहता था। उसके घर में कोई नहीं था। उसकी बीवी और बच्चे की एक आक्सिडेंट में मौत हो चुकी थी। उसकी एक जूते की दुकान थी और वो सुबह 9:00 बजे अपनी दुकान पे चला जाता था और दोपहर में एक बजे आता था। दो घंटे तक वो आराम करता और फिर 3:00 बजे चला जाता था। फिर वो रात में 8:00 बजे आता था। उसका रोज का यही नियम था ।

वसीम भी सुबह 9:00 बजे बैंक चला जाता था और फिर सीधे शाम में 6:00 बजे घर आता था। दोनों की जिंदगी बड़े प्यार और मजे से काट रही थी। दोनों फिर से एक सप्ताह के लिए बाहर से घूम आए थे। वसीम और शहनाज दोनों में से कोई भी अभी बच्चा नहीं चाहता था, इसलिए शहनाज 6 महीने से प्रेगनेंसी रोकने वाली गोली खाती थी। दोनों की मर्जी अभी खूब मस्ती करने की थी। शहनाज को यहाँ आए तीन महीने हो चुके थे और उन लोगों के जीवन का सफर मजे से काट रहा था।

शहनाज अपने कपड़े को छत पे सूखने देती थी। राज जिस माले पे रहता था उसके सामने आधा छत खाली थी और कपड़े सूखने के लिए वही जगह थी। आज जब शहनाज अपने कपड़े लेकर अपने रूम में आई और उसे समेटने लगी तो उसे अपनी पैंटी कुछ हार्ड सी लगी। उसे कुछ खास समझ में नहीं आया। शहनाज ने इग्नोर कर दिया। उसे लगा की शायद ठीक से साफ नहीं हुआ होगा ।

अगले दिन भी यही हुआ की उसकी पैंटी चूत के पास वाले हिस्से में काफी हार्ड जैसी हो गई थी। जब उसने गौर से अपनी पैंटी को देखा तो उसे लगा की कोई लिक्विड जैसी चीज पैंटी में गिरी है जो सूखकर इतना टाइट हो गई है। इधर वो वसीम के साथ सेक्स भी नहीं की थी तो फिर ये क्या है? उसे कुछ समझ में नहीं आया । शहनाज की पैंटी ब्रा भी मँहगी और डिजाइनर थी। अगले दिन नहाने के बाद वो पैंटी को अच्छे से साफ करके सूखने दी। अगले दिन उसकी पैंटी तो ठीक थी लेकिन उसकी ब्रा टाइट जैसी थी। शहनाज को समझ में नहीं आ रहा था की हो क्या रहा है?
 
आज शहनाज जो डिजाइनर पैंटी ब्रा पहनी थी वो बिल्कुल नई और फुल्ली ट्रांसपेरेंट थी। अगले दिन जब शहनाज छत से कपड़े उतारने गई तो उसकी गुलाबी ट्रांसपेरेंट पैंटी चूत के एरिया में पूरी तरह से टाइट थी। शहनाज जब गौर से देखी तो उसे किसी लिक्विड का दाग उसमें नजर आया। नई पैंटी जिसे वो अच्छे से धोई थी, दाग होने का सवाल ही नहीं था।

शहनाज उसे अच्छे से छूकर देखने लगी और फिर अपनी नाक के पास ले गई। एक अजीब सी गंध थी जो शहनाज को बहुत अच्छी लगी। शहनाज फिर से उसे सूँघने लगी, और पूरी तरह से उस गंध को अपने सीने में भरने लगी। दो-चार बार सूँघने पर भी उसका मन नहीं भरा तो वो फिर अपनी पैंटी को चाटकर भी देखी। उसे बहुत अच्छा लगा लेकिन वो कुछ समझ नहीं पाई। शहनाज के दिमाग में बस वही खुश्बू और वही टेस्ट बसी थी ।

अगले दिन शहनाज थोड़ा जल्दी कपड़े को छत से ले आई और नीचे लाते ही वो अपनी पैंटी देखने लगी देखी तो पैंटी कुछ-कुछ गीली ही थी। आज भी उसपे लिक्विड गिरा हुआ था जो अभी पूरी तरह सूखा नहीं था। शहनाज अपनी पैंटी को सूँघने लगी और आज उसे कल से भी ज्यादा अच्छा लगा। सूँघते सूँघते ही उसपे अजीब सा नशा जैसा छाने लगा और वो अपनी पैंटी पे लगे लिक्विड को चाटने लगी।

शहनाज को बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन ये नहीं समझ में आया की ये आखिर है क्या? ना तो वो कभी अपने पति का लण्ड चूसी थी, और न ही वसीम ने कभी उसे ऐसा कहा था। वसीम भी शहनाज की चूत को कभी चाटा नहीं था। शहनाज अभी तक कभी ठीक से पोर्न भी नहीं देखी थी। दो-चार बार उसकी सहेलियों ने उसे दिखाया था, लेकिन थोड़ा सा देखकर वो मना कर देती थी और कहती थी की छी: तुमलोग ये क्या गंदी चीज देख रही हो?"

शहनाज के मन में उस खुश्बू के टेस्ट की याद बस चुकी थी। वो पैंटी ब्रा को सुबह भी सूँघ कर देखी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। शहनाज अब बस शाम का इंतजार कर रही थी ताकी वो फिर से उस खुश्बू को अपने सीने में ले सके।

अगले दिन शहनाज थोड़ा और जल्दी कपड़े को छत से ले आई। उसकी पैंटी पूरी तरह गीली थी और उसपे गाढ़ा सफेद लिक्विड लगा हुआ था, जिसे देखकर उसका दिमाग सन्न रह गया की ये तो वीर्य है किसी का। उसकी शादी को 6 महीने हो चुके थे और वो अब वीर्य के कलर को तो जानती ही थी। पहले तो उसका मन घृणा से भर गया और उसे गुस्सा भी बहुत आया की कौन है वो कमीना गंदा इंसान जो इस तरह की नीच हरकत कर रहा है? लेकिन इसकी खुशबू उसे बहुत अच्छी लगी थी तो वो वीर्य को फिर से सूँघने लगी और फिर मदहोश होकर उसे अपनी जीभ से भी सटा ली। फिर वो तुरंत ही अपनी जीभ हटा ली, लेकिन अब उसपे अजीब सा खुमार चढ़ चुका था, तो वो उसे धीरे-धीरे सूँघते हुए पूरी तरह चाटकर साफ कर ली। उसे पहले भी बहुत मजा आया था, लेकिन आज ये सोचकर उसकी चूत गीली हो गई की वो किसी अंजान आदमी का वीर्य सूँघ और चाट रही है जो उसने अपने पति के साथ भी नहीं किया है।

शहनाज के दिमाग में यही सब चलता रहा।

शहनाज ने आज बेड पे पहली दफा पहल की और वसीम से अपनी चुदाई करवाई। लेकिन आज पहली बार उसे लगा की जितना मजा आना चाहिए था वो नहीं आया। उसे लगा की वसीम को और अंदर तक डालना चाहिए था। उसे लगा की वसीम को और देर तक उसकी चूत को चोदना चाहिए था। लेकिन वो कह ना सकी और करवट बदलकर उस वीर्य की खुश्बू को याद करती सो गई।

अगले दिन सनडे था और वसीम घर पे ही था और राज चाचा कहीं बाहर गये हुए थे। आज शहनाज जब अपने कपड़े लेकर आई तो उसकी पैंटी ऐसे ही रह गई थी और शहनाज प्यासी ही रह गई आज उस खुश्बू के लिए। उसका मूड आफ हो गया।

वसीम ने पूछा भी- “क्यों, क्या हुआ अचानक उदास हो गई?"

लेकिन शहनाज कुछ जवाब नहीं दी। रात में शहनाज फिर से चुदवाना चाहती थी, क्योंकी कल उसकी प्यास बुझी नहीं थी। लेकिन अपने संस्कारों और शर्मो-हया की वजह से वो वसीम के सामने इजहार नहीं कर पाई। वसीम अपनी प्यासी बीवी को यूँ ही छोड़कर सो चुका था।

अब शहनाज उस खुश्बू और टेस्ट के लिए पागल होने लगी थी। आज शहनाज दोपहर में छत पे जाकर सीढ़ी के बगल में बने स्टोररूम में जाकर छिप गई और देखने लगी की क्या होता है। कौन है जो अपना वीर्य मेरी पैंटी पे गिरा कर चला जाता है?

थोड़ी देर में एक बजते ही राज अपने घर आया और अपने रूम में चला गया। अपने रूम में जाते वक़्त उसने शहनाज की पैंटी ब्रा को देखा जो आज शहनाज ज्यादा अच्छे से फैलाकर टांगी थी। शहनाज के दिमाग में अभी तक राज का ख्याल नहीं आया था की ये ऐसा कर रहा होगा।

राज को देखने के बाद उसे लगा की राज चाचा तो दो घंटे तक अपने रूम में रहेंगे, तब तक तो मैं यही फँसी रहूंगी। उसे लगा था की वो छत पे छिपकर देखेगी की कौन उसकी पैंटी के साथ क्या करता है? लेकिन अब तो लग रहा था की उल्टा वही फँस गई हैं दो घंटे के लिए। कहीं राज चाचा की नजर मुझपे पड़ गई तो क्या सोचेंगे की मैं छिपकर उन्हें देखती हूँ। छिः।

शहनाज वहाँ से निकलने का प्लान बना रही थी। लेकिन राज के रूम का दरवाजा खुला था तो वो डर से स्टोररूम से बाहर नहीं निकल पा रही थी। थोड़ी देर बाद राज चाचा अपने रूम से लुंगी और गंजी में बाहर निकला। वो अपने लुंगी के ऊपर से लण्ड को सहला रहा था। उसने शहनाज की पैंटी को रस्सी से उतारा और मुँह में लेकर चूमने चाटने लगा, जैसे शहनाज की चूत चाट रहा हो। उसकी लुंगी सामने से खुली थी जिसमें से उसने अपने लण्ड को बाहर निकाल लिया और दूसरे हाथ से आगे-पीछे करने लगा।
 
राज पैंटी लेकर स्टोररूम के सामने आ गया, क्योंकी यहाँ से उसे कोई देख नहीं सकता था दूसरी छत से । शहनाज स्टोररूम के दरवाजे के पीछे थी और दरवाजे में बने सुराख से बाहर झाँक रही थी। उसकी सांस ऊपर रुक गई थी की कहीं राज ने उसे देख लिया तो क्या होगा? राज दरवाजे के ठीक सामने खड़ा अपने लण्ड को आगे-पीछे कर रहा था। उसने शहनाज की पैंटी को अपने लण्ड पे लपेट लिया और आहह आहह.. करता हुआ मूठ मारने लगा।

राज इसी तरह लण्ड सहलाता हुआ शहनाज की ब्रा के पास गया और उसे भी उठा लाया। अब राज के एक हाथ में शहनाज की ब्रा थी जिसे वो ऐसे मसल रहा हो जैसे शहनाज की टाइट चूची मसल रहा हो। वो ब्रा को भी निपल वाली जगह को मुँह में लेकर चूसने लगा जैसे शहनाज की छोटी ब्राउन निपल को चूस रहा हो।

शहनाज को बहुत गुस्सा आया की कितना गंदा है ये इंसान, जिसे वो इतनी इज्जत देती है। लेकिन राज को ब्रा और पैंटी चूसते देखकर अंजाने में ही उसका हाथ अपनी चूत पे जा पहुँचा। उसे वहाँ पे चींटियां रेंगती हुई महसूस होने लगी।

राज अपने लण्ड को शहनाज की पैंटी में लपेटकर मूठ मारे जा रहा था। थोड़ी देर में उसका पानी निकालने वाला था तो उसने ब्रा को नीचे गिरा दिया, और पैंटी को हाथ में लेकर ऐसे फैलाया जिससे की जिस जगह पे चूत रहती है वो जगह ऊपर आ गई। राज ने पैंटी को हाथ में पकड़ा और अपना वीर्य पैंटी पे गिराने लगा।

अब शहनाज को राज का लण्ड साफ-साफ पूरा साइज में दिखा और उसका मुँह खुला का खुला रह गया। इतना बड़ा और मोटा लण्ड भी होता होगा, ये इसने सोचा भी नहीं था। वो तो अपने पति के 3 इंच के लण्ड को ही देखी थी आज तक ।

राज के लण्ड से मोटी सी धार निकली और शहनाज के पैंटी में जमा हो गया? इतना सारा वीर्य इतना तो वसीम एक हफ्ते में भी ना निकल पाए? उसने शहनाज की पैंटी को वीर्य से भर दिया और उसे स्टोररूम की दीवाल से बाहर निकले लोहे के छड़ में टांग दिया और फिर उसने ब्रा के एक कप को भी वीर्य से भर दिया। फिर लण्ड को ब्रा के दूसरे कप से ही अच्छे से पोछकर साफ कर लिया।

शहनाज को सब कुछ साफ-साफ दिख रहा था की कैसे इतने बड़े मोटे काले लण्ड से कितना सारा गाढ़ा सफेद वीर्य कैसे गिर रहा है और उसकी पैंटी और ब्रा को भर रहा है। शहनाज को नीचे कुछ गीलापन सा महसूस हुआ और उसे लगा की उसकी चूत गीली हो गई है।

राज ने ब्रा और पैंटी दोनों को अपनी-अपनी जगह पे अच्छे से टांग दिया और अपने लुंगी को ठीक करता हुआ अपने रूम में चला गया।

शहनाज चुपचाप अपनी जगह में खड़ी थी लेकिन वो चाह रही थी की तुरंत ही जाकर अपनी पैंटी ब्रा को उठाकर नीचे ले जाए। लेकिन ऐसा करने में राज को पता चल जाता। राज ने अपने रूम का दरवाजा बंद कर लिया और ऐसा होते ही तुरंत ही शहनाज भागकर नीचे चली गई और राज के जाने का इंतजार करने लगी।

शहनाज से नीचे रहा नहीं जा रहा था और वही दृश्य उसकी आँखों के सामने चल रहा था, जिसमें राज के लण्ड से वीर्य बाहर निकल रहा था और शहनाज की पैंटी को गीला कर रहा था। शहनाज नाइट सूट वाले टाप और ट्राउजर में थी । उसे याद आया की इस पैंटी पे भी उसने इसी तरह अपना वीर्य गिराया होगा, जो उसकी चूत से सटा हुआ है। ये सोचते ही की राज का वीर्य उसकी चूत से सटा हुआ है वो और गीली हो गई। शहनाज सोफा पे लेट गई और उसका हाथ उसकी पैंटी के अंदर चला गया और वो अपनी चूत को सहलाने लगी, जो की गीली हो चुकी थी।

शहनाज को अच्छा लग रहा था और उसकी उंगली उसकी चूत में जा घुसी और वो हस्तमैथुन करने लगी। ये काम वो पहली बार कर रही थी अपने जिंदगी में शहनाज बैठ गई और अपने ट्राउजर और पैंटी को पूरा नीचे करके एंडी के पास कर दी और अच्छे से दोनों जांघों को फैलाकर दोनों तलवों को सटा ली।

शहनाज की चूत अब अच्छे से फैल गई थी और वो अपनी बीच वाली उंगली को पूरी तरह जल्दी-जल्दी अंदर-बाहर कर रहीं थी। आज तक ऐसी आग वो महसूस ही नहीं की थी। शहनाज एक हाथ से अपनी ब्रा को ऊपर की और चूचियों को जोर-जोर से मसलने लगी। वो पागल हुई जा रही थी। उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया और वो ऐसे ही सोफे पे लेट गई। शहनाज की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी।

चूत से पानी निकलते ही शहनाज के अंदर के संस्कार और शरीफ औरत जाग गई और उसे बुरा लगने लगा की ये क्या कर रही थी वो? आज पहली दफा वो अपनी चूत में उंगली डाली थी और इस तरह अपने कपड़े उतारकर ऐसी हरकत की थी।

शहनाज सोचने लगी- "मैं एक शादीशुदा औरत हूँ और किसी दूसरे मर्द के बारे में सोचना भी मेरे लिए पाप है और मैं तो दूसरे मर्द के बारे में सोचकर अपनी चूत से पानी निकल रही थी..” उसे अपने आप पे बहुत गुस्सा और घिन आने लगी।

उसे राज पे भी जोरों से गुस्सा आने लगा की कैसा घटिया नीच गिरा हुआ इंसान है, जो अपने से आधी उम्र की औरत के बारे में ऐसी घटिया बात सोचता है और ऐसी घटिया हरकत करता है। उसने फैसला कर लिया की ये बात वसीम को बताएगी और अब हम इस घर को खाली करके कहीं और किराये पे रहेंगे। शहनाज एक घंटे तक राज के बारे में ही सोचती रही- "सच में ये लोग ऐसे ही होते हैं। क्या जरूरत थी वसीम को यहाँ घर लेने की। एक सप्ताह और दूर रहते हम तो क्या हो जाता? लेकिन कम से कम घर तो मुस्लिम कम्यूनिटी में मिल जाता। कुछ पैसे और लगते तो क्या हुआ??

सोचते-सोचते उसके अंदर से शैतान की आवाज आई तो क्या मुस्लिम कम्यूनिटी में लोग उसे अच्छी नजरों से देखते? क्या वो लोग मेरे बारे में ऐसा नहीं सोचते? वो भी सोचते। ये मर्द जात होती ही ऐसी है की जहाँ हसीन औरत दिखी नहीं की उनके लण्ड टाइट हो जाते हैं। वसीम ही शरीफ है क्या? उस दिन उस दुकान में उस लड़की को कैसी ललचाई नजरों से देख रहा था। सारे मर्द एक जैसे होते हैं। और कम से कम जो भी है वो राज चाचा के मन में है। उन्होंने कभी मेरी तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखा ?"

शहनाज की सोच फिर से आगे बढ़ी- "राज नजर उठाकर कहाँ देखते हैं, लण्ड उठाकर देखते हैं। वो तो मजबूर हैं, अगर बस चले तो नंगी ही रखे मुझे और दिन रात चोदता रहे। घटिया इंसान उसे ऐसा सोचते हुए भी शर्म नहीं आई। उसकी बेटी की उम्र की हूँ मैं?"

फिर से शैतान ने शहनाज को आवाज लगाई- बेटी की उम्र का लिहाज है इसलिए तो नजर उठाकर नहीं देखते। एक इंसान जो बहुत लंबे वक़्त से अकेला तन्हा है, उसके सामने अगर मेरी जैसी हसीन कमसिन औरत ऐसे रहेगी तो भला वो इंसान खुद को कैसे रोके? मेरे लिए ये कपड़े नार्मल और जेन्यूवन हैं. लेकिन उनके हिसाब से तो सलवार सूट में भी मैं आग लगाती होऊँगी। सच में उन्होंने खुद पे बड़ा काबू किया हुआ है?

शहनाज का जवाब आया "तो क्या बुर्का पहनकर रहूं?"

फिर शहनाज खुद ही सोचने लगी- "नहीं। लेकिन मैं अब उनके सामने भी नहीं जाऊँगी और हम जल्द से जल्द ये घर खाली कर देंगे। सही है की मैं कुछ भी पहनू उनके अरमानों में तो हलचल होगी ही। वसीम एक सप्ताह में मेरे बिना पागल हो रहा था और ये तो सालों से अकेले हैं...
 
शहनाज एक घंटे तक राज के बारे में ही सोचती रही। उसके दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी। वो उसी तरह सोफे पे लेटी हुई थी और उसका ट्राउजर और पैंटी नीचे पैर की एंड़ी के पास थी। शहनाज को राज के अपने काम पे चले जाने की आहट हुई। शहनाज उठकर बैठी और अपने कपड़े ठीक की। फिर वो छत पे आ गई और अपने कपड़े ले आई। पैंटी गीली ही थी और ब्रा भी। शहनाज सोच ली थी की कल से पैंटी ब्रा को छत पे सूखने ही नहीं देगी।

शहनाज उसे धोने जा रही थीं, लेकिन वो बाकी के कपड़े रखकर पैंटी को देखने लगी। ब्राउन कलर की पैंटी पे सफेद वीर्य अब तक हल्का-हल्का दिख रहा था। उसकी आँखों के सामने वो दृश्य घूम गया। कैसे उसके इतने सामने राज का इतना बड़ा मोटा काला लण्ड ढेर सारा वीर्य उसकी पैंटी में गिरा रहा था। वो ब्रा भी उठाकर देखने लगी। उसकी चूत में फिर से हलचल मचने लगी। फिर से उसे एक बार उस वीर्य को सूँघने का मन हुआ और वो पैंटी को नाक के पास ले आई।

उफफ्फ ... अजीब सी मदहोश कर देने वाली खुश्बू उसके नथुने से टकराई, जिसे वो अपने सीने में भरती चली गई। उसने अपनी पैंटी पे लगे वीर्य पे जीभ को सटाया तो उसे ऐसा एहसास हुआ की वो राज के लण्ड के टोपे को अपनी जीभ से चाट रही है। शहनाज की चूत अब हलचल करने लगी। उसका बदन हिलने लगा ।

शहनाज पैंटी ब्रा को सोफे पे रख दी और पहले अपनी ट्राउजर और पैंटी को उतार दी। इतने से भी उसका मन नहीं भरा तो उसने टाप और ब्रा को भी उतार दिया और पूरी नंगी हो गई। उसका बदन आग में तप रहा था। वो फिर से पैंटी और ब्रा को उठा ली और नंगी चलती हुई सोफे पे जा बैठी। उसने पैंटी को चाटते हुए कल्पना में राज के लण्ड को चाटना स्टार्ट कर दिया।

उसने पैंटी को रख दिया और ब्रा को उठा लिया और सूँघने चाटने लगी। वो राज के वीर्य लगे पैंटी को अपनी चूत पे रगड़ने लगी और उंगली अंदर-बाहर करने लगी। वो पागलों को तरह अपनी कमर उछालने लगी जैसे वो चुद रही हो। उसने ब्रा के कप को अपने मुँह पर रख लिया और हाथ के सहारे अपने जिश्म को ऊपर उठाई और कमर उठाकर चुदवाने जैसी उंगली अंदर-बाहर करते हुए कमर ऊपर-नीचे करने लगी। उसकी चूत ने पानी का फव्वारा छोड़ दिया और शहनाज हाँफती हुई सोफे पे पर गई। पहली बार से ज्यादा हाँफ रही थी शहनाज और पहली बार से ज्यादा मजा आया था उसे ।

शहनाज हाँफती हुई सोफे पे ही पड़ गई। उसकी आँखें बंद थी और चेहरे पे असीम सुकून था। जिश्म पसीने से भीग गया था। हवा उसके जिश्म को ठंडक पहुँचा रही थी। उसकी आँख लग गई। वो इसी तरह नंगी ही सोफे पे सो गई थी।

जब से शहनाज बड़ी हुई थी ये पहली बार हुआ था की वो इस तरह घर में नंगी हुई थी और नंगी सोई थी। यहाँ तक की शादी के बाद भी वसीम से चुदवाने के बाद भी वो कपड़े पहनकर ही रूम से बाहर निकलती थी और बाथरूम या किचेन जाती थी।

वसीम ने कहा भी था की यहाँ कौन है जो कपड़े पहन लेती हो, नंगी ही हो आओ बाथरूम से या नंगी ही सो जाओ। लेकिन शर्म की वजह से शहनाज ऐसा कर नहीं पाती थी। चुदाई के बाद वो तुरंत ही कपड़े पहन लेती थी।

लेकिन आज वो अपने मन से घर में नंगी हो गई थी और एक के बाद एक और बार चूत में उंगली डालकर पानी निकाली थी।

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लगभग 5:00 बजे शहनाज की नींद खुली तो उसे खुद पे शर्म भी आई और आश्चर्य भी हुआ की ये क्या हो गया है आज उसे? वो बाथरूम जाकर नहा ली और फिर फ्रेश होकर वसीम के आने का इंतजार करने लगी।

आज रात को खाना खाते वक़्त शहनाज वसीम से राज चाचा के बारे में पूछी की- "राज चाचा अकेले क्यों रहते हैं, इनका परिवार कहाँ गई?"

वसीम को भी ज्यादा कुछ पता था नहीं तो जो मोटा मोटी पता था उसने बताया की "काफी साल पहले एक आक्सिडेंट में इनकी बीवी की मौत हो गई थी और इसने दूसरी शादी नहीं की और बच्चे बाहर रहते हैं..”

शहनाज को अपने स्वाभाव के अनुसार राज पे उसे दया आने लगी की एक इंसान इतने साल अकेले कैसे गुजार रहा है और ऐसे में अगर कोई मेरी जैसी लड़की उसके सामने रहेगी तो वो भला खुद को कैसे रोक पाएगा? पुरुष के जिश्म की जरूरतें होती हैं और राज चाचा ने इतने सालों पे अगर खुद पे काबू किया तो ये तो बहुत बड़ी बात है। ये तो सरासर मेरी गलती है की मैं ही इनकी परेशानी का सबब हूँ"

शहनाज फिर वसीम से पूछी- "इन्होंने दूसरी शादी क्यों नहीं की। इन्होंने पहली पत्नी के मर जाने के बाद भी दूसरी शादी नहीं की...*

वसीम हँसते हुए बोला- "मुझे क्या पता जान की इन्होंने दूसरी शादी क्यों नहीं की? लेकिन नहीं की और अकेले ही अपनी जिंदगी गुज़ार रहे हैं..."

शहनाज की नजरों में अब राज का कद और ऊंचा हो गया। अगले दिन शहनाज एक बजे के पहले काफी उधेड़बुन में थी। अपने दिमाग में चल रही जंग की वजह से वो अपनी पैंटी ब्रा छत पे सूखने तो दे दी थी लेकिन अब क्या करे वो डिसाइड नहीं कर पा रही थी। कभी वो सोच रही थी की पैंटी ब्रा वापस नीचे ले आती | फिर कभी सोचती की मेरी पैंटी ब्रा को हाथ में लेने और उसपे अपना वीर्य गिराने से अगर राज चाचा को संतुष्टि मिलती है तो मैं इसमें खलल क्यों डालूं? कहीं ऐसा ना हो की ये चीज भी छिन जाने से वो अपसेट हो जाएं। अकेले इंसान के मन में बहुत सारी बातें चलती रहती हैं। इसीलिए जो वो कर रहे हैं करने देती हूँ। मैं सोच लूँगी की मुझे पता ही नहीं है, और मैं उनके सामने जाऊँगी ही नहीं ।

शहनाज यही सब काफी देर से सोच रही थी वो जो कर रहे हैं उन्हें करने देने में ही उनकी भलाई है। और उन्हें थोड़े ही पता है की मुझे पता है। आह्ह... कितनी अच्छी खुश्बू आती है लेकिन उससे पता नहीं कल क्या हो गया था मुझे। मैं अब ऊपर जाऊँगी ही नहीं और देर से अपने कपड़े उठाकर लाऊँगी तब तक वीर्य सूख गया होगा। फिर वो सोचने लगी की उन्हें तो पता ही नहीं है की मुझे उनकी हरकत के बारे में पता है। तो उन्हें अपना मजा लेने देती हूँ और मैं अपना मजा लेती हूँ। उन्हें वीर्य गिराकर सुकून मिलता है और मुझे सूँघकर चाटकर सोचते-सोचते एक बजने वाले थे।

शहनाज अचानक उठी और जाकर चाट में स्टोररूम में छिप गई। उसकी सांसें तेज चल रही थी और दिल जोरों से धड़क रहा था।

तय वक़्त पे राज घर आया और रूम का दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। शहनाज की धड़कन और तेज हो गई। उसकी सांस लेने की आवाज भी लग रहा था जैसे बाहर जा रही हो। राज लुंगी और गंजी पहनकर रूम से बाहर आ गया। फिर से उसने पैंटी ब्रा को उठा लिया और चूमता हुआ स्टोररूम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। उसने लुंगी को साइड करके लण्ड को बाहर निकाला और आगे-पीछे करने लगा। आज शहनाज को और अच्छे से लण्ड के दर्शन हो रहे थे। राज के लण्ड और शहनाज के बीच में बस एक डेढ़ मीटर का अंतर होगा।

शहनाज के हिसाब से राज का लण्ड बहुत ही ज्यादा लंबा, काला, बहुत ही मोटा था और सामने से पूरा सुपाड़ा चमकता हुआ उसे दिख रहा था।

राज फुल स्पीड में मूठ मार रहा था और शहनाज वीर्य के बाहर आने का इंतजार कर रही थी। उसे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। राज के लण्ड ने पिचकारी की तरह तेज धार के साथ सफेद गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया, जिसे राज ने ब्रा के दोनों कप में भर दिया और फिर तुरंत ही पैंटी को लण्ड पे दबाकर उसे भिगोने लगा। जब उसका लण्ड शांत हो गया तो उसने हमेशा की तरह शहनाज की पैंटी ब्रा को उसकी जगह में टांग दिया और रूम बंद करता हुआ अंदर चला गया।

शहनाज के लिए अब एक लम्हा भी गुजारना मुश्किल हो रहा था। वो सोची की राज चाचा तो अंदर चले गये और अब 3:00 बजे बाहर आएंगे और दुकान जाएंगे। मैं कपड़े अभी ले जाऊँ या आधे घंटे बाद क्या फर्क पड़ता है ? पसीने से तरबतर हो चुकी थी शहनाज । किसी तरह उसने 5 मिनट गुजारे और फिर स्टोररूम से बाहर आकर ऐसे छत पे आई जैसे नार्मली नीचे से अपने कपड़े ले जाने के लिए आई हो। शहनाज चुपचाप धीरे-धीरे करके अपने कपड़े उठाई और नीचे भागी ।

राज रूम के अंदर से उसे कपड़े उठाते और नीचे ले जाते हुए देख रहा था और उसके चेहरे पे मुश्कान फैल गई। ऐसी शातिर मुश्कान जो शिकारी को तब होती है जब उसका शिकार चारा खाने लगता है।

शहनाज दौड़ती हुई नीचे आई और बाकी सारे कपड़े को टेबल पे फेंकी और पैंटी ब्रा को देखने लगी। पैंटी अलग- अलग जगह से भीगी हुई थी, लेकिन ब्रा के दोनों कप वीर्य से चिप चिप कर रहे थे। शहनाज वीर्य को सूँघने लगी और तुरंत ही नंगी हो गई।

उसने वीर्य से भरे ब्रा को अपने चूची से चिपका लिया। शहनाज सोफे पे सीधा लेट गई और पैंटी को सूँघने चाटने लगी और फिर उसी पैंटी को पहन ली। फिर उसने ब्रा को चूचियों से अलग किया। शहनाज की गोरी-गोरी गोल मुलायम चूचियां वीर्य लगने की वजह से चमक रही थीं। शहनाज ब्रा को अपने चेहरे पे रख ली और पैंटी को नीचे करके चूत में उंगली करने लगी।

शहनाज पागलों की तरह कर रही थी। वो उठकर बैठ गई और पैंटी को उतार दी और ब्रा को पहन ली। फिर वो ब्रा के ऊपर से चूची मसलती हुई चूत में उंगली करने लगी। चूत ने पानी छोड़ दिया और शहनाज शांत हुई।

दौड़कर नीचे आने और पैंटी ब्रा पे लगे वीर्य को सूँघने चाटने की हड़बड़ी के चक्कर में शहनाज अपने घर का दरवाजा बंद करना भूल गई थी।

शहनाज के नीचे आने के दो मिनट बाद राज अपने कपड़े पहनकर चुपचाप नीचे आ गया और छुप कर शहनाज को देखने लगा। वैसे तो उसे शहनाज को देखने के लिए मेहनत करना पड़ता लेकिन दरवाजा खुला होने की वजह से वो पर्दे की आड़ में सब कुछ लाइव देख रहा था। शहनाज के ढेर होने के बाद राज मुश्कुराता हुआ अपने रूम में चला गया। शिकार दाना चुग चुका था और अब बस शिकार करने की देरी थी।

अपने रूम में आकर राज नंगा हो गया और बेड पे लेटकर शहनाज के हसीन जिश्म के सपने देखने लगा की कितना मजा आएगा इस कमसिन काली को चोदने में? कितना मजा आएगा जब ये अपनी टाँगे फैलाकर मेरा मूसल लण्ड अपनी टाइट चूत में लेगी? आहह.. कितना मजा आएगा जब मैं कुतिया बनाकर इसकी गाण्ड मारूँगा? बहुत दिनों तक सस्ती रंडियों को चोदकर लण्ड को शांत किया है, अब वक़्त आ गया है की मेरे इस लण्ड को मस्त माल मिले। मुझे शहनाज को अपनी रंडी बनाना है और इसे दिन रात चोदते रहना है।
 
रंडी को क्या लगता है मुझे पता नहीं की वो स्टोररूम में छिपकर मुझे देख रही थी। इसलिए तो पूरा लण्ड उसके सामने कर दिया था मैंने मजा तो तब आएगा मेरी रंडी शहनाज, जब मेरा लण्ड तेरे हाथ में होगा और तू उसे चूसकर उसका वीर्य सीधा अपने मुँह में लेगी।

थोड़ी देर बाद शहनाज उठी तो फिर से उसे अपने आप पे गुस्सा आ रहा था। लेकिन आज का गुस्सा कल से कम था। इन 24 घंटों में उसके दिमाग में बहुत उथल-पुथल मची हुई थी और शहनाज अपने फेवर में अपने मन को समझा चुकी थी। शहनाज नहाने जाने लगी तो उसकी नजर दरवाजे पे पड़ी जो खुला था। उसका मुँह खुला रह गया, क्योंकी वो अब तक नंगी ही थी। हे भगवान् मैं पागल हो गई हूँ। ऐसे दरवाजा खोलकर मैं नंगी घूम रही हूँ और क्या-क्या कर रही हूँ। कहीं किसी ने देखा तो नहीं? फिर वो सोचने लगी की अभी भला कौन आएगा क्योंकी मुख्य दरवाजा तो बंद ही था और राज चाचा तो 3:00 बजे नीचे उतरते हैं। वो रिलैक्स हो गई और दरवाजा बंद करके नहाने चली गई।

वसीम के आने के बाद आज फिर शहनाज और वसीम का टापिक राज ही था। बातें करते-करते शहनाज राज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाह रही थी। इसलिये वसीम से पूछी "राज चाचा इतने साल अकेले रहे कैसे? क्या इन्हें औरत की कमी महसूस नहीं होती होगी, तुम तो एक हफ्ते में पागल हुए जा रहे थे..."

वसीम हँस दिया और बोला- "जिसके पास तुम जैसी हसीन बीवी हो वो एक हफ्ते क्या एक दिन में ही पागल हो जाएगा। मैं बहुत खुशनशीब हूँ की तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की मेरी बीवी है ..."

अब हँसने की बारी शहनाज की थी। वो हँसती हुई बोली- “इतनी भी खूबसूरत तो नहीं हूँ..

वसीम ने उसे पीछे से पकड़ लिया और बोला- “तुम माल हो, मस्त माल... गोरा चिकना बदन तुम्हारी चिकनी पीठ, फिसलती हुई कमर और गौरी मुलायम छाती को देखकर मेरा लण्ड कई बार टाइट हो जाता है। मैं तुमसे दूर होकर तो पागल हो ही जाऊँगा.. "

ऐसी तारीफ सुनकर शहनाज गई। रात को शहनाज वसीम को बोली- "कल हम राज चाचा को अपने यहाँ खाना खिलाएंगे, रात में। तुम कल उन्हें बोल देना। जो इंसान इतने सालों से अकेला है, खुद से सब कुछ कर रहा है, उसे हम कभी कभार लंच या डिनर तो खिला ही सकते हैं। वैसे भी वो हमारा मकान मालिक है और जब से हम आए हैं, तब से एक बार भी हमने उन्हें अपने घर नहीं बुलाया है...

अपने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से अच्छे रिश्ते बनाना, मिलना जुलना, खाना खिलाना शहनाज और उसकी परिवार की आदत में शुमार था। लेकिन जब से शहनाज यहाँ आई थी तो वो अपने आप में और अपने मेहमानों में ही बिजी थी। कभी वो वसीम के साथ घूमने चली गई थी तो कभी उसके पेरेंट्स या वसीम के पेरेंट्स यहाँ आ गये थे। राज का हिंदू होना भी एक वजह था।

वसीम बोला- “क्या बात है, आजकल राज चाचा का ज्यादा ही ख्याल रखा जा रहा है?" उसने शरारती मुश्कान के साथ ये कहा था।

लेकिन शहनाज डर गई और अंदर से डर भी गई थी। वो बोली- “क्या तुम भी कुछ भी बोल देते हो। कहाँ वो 50-55 साल का आदमी और कहाँ मैं?"

शहनाज सोते समय बेड पे आने से पहले अपनी नाइटी को ढीला कर ली और वसीम से सटकर लेट गई। वसीम के लण्ड में थोड़ी हलचल मच गई। दोनों रोज सेक्स नहीं करते थे। कभी कभार तो एक सप्ताह 15 दिन भी हो जाता था। लेकिन आज शहनाज मूड में थी। वसीम उसे किस करते हुए उसका बदन सहलाने लगा। शहनाज ने खुद को नंगी होने दिया और वसीम के नंगे होने का इंतजार करने लगी। वो अच्छे से करीब से वसीम का लण्ड देखने लगी। उसे लगा की ये तो किसी बच्चे का लण्ड है।

राज का लण्ड उसकी नजरों के सामने घूम गया। वसीम का लण्ड राज के लण्ड का आधा भी नहीं होगा और उसके सामने बिल्कुल पतला था। वसीम का लण्ड स्किन से ढका हुआ था। वो हाथ में लेकर सहलाने लगी और स्किन को पीछे खींचकर सुपाड़े को बाहर करने लगी तो वसीम को दर्द होने लगा और उसने मना कर दिया।

शहनाज उठकर बैठ गई और लण्ड को दोनों हाथों में लेकर सहलाने लगी। शहनाज के इस रूप को देखकर वसीम सर्प्राइज़्ड था। अब तक शहनाज सेक्स में वसीम का बस साथ देती थी, वो भी कभी कभार और आज तो खुद लीड कर रही थी। दो दिन पहले भी शहनाज ने पहल की थी, लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी थी।

वसीम शहनाज के ऊपर आ गया और लण्ड को चूत पे रगड़ते हुए अंदर डालने लगा। शहनाज वसीम के लण्ड को चूमना चाहती थी, उसके वीर्य की खुश्बू लेना चाहती थी, लेकिन वसीम तब तक उसके ऊपर आ चुका था। वसीम ने लण्ड अंदर डाल दिया और 8-10 धक्के लगाते ही उसके लण्ड ने पानी छोड़ दिया। शहनाज को तो समझ में ही नहीं आया की हुआ क्या है? वो तो अभी तक शुरू भी नहीं हुई थी की वसीम का खेल खतम हो गया। वसीम बगल में हो गया और करवट बदलकर सो गया।

शहनाज अपनी प्यासी चूत लिए रात भर करवट इधर से उधर बदलती रहीं ।

दिन में शहनाज फिर से दोपहर का इंतजार कर रही थी। अब उसके मन में कोई वंद नहीं चल रहा था। उसने खुद को समझा लिया था की राज कई सालों से अकेला है और मैंने उसकी सोई ख्वाहिशों को जगा दिया है, जिसे वो छिपकर मेरी पैंटी ब्रा पे उतारता है। मुझे उससे उसकी खुशी नहीं छीननी है और मैं उसके वीर्य को सूँघकर चाटकर खुश हो रही हूँ। उसे नहीं पता की मुझे पता है तो दोनों अपना-अपना मजा ले रहे हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

वो अपने वक़्त पे एक बजे से कुछ पहले स्टोररूम में जाकर छिप गई। राज आया और आते वक़्त ही शहनाज की पैंटी ब्रा को देखता गया, जिसे शहनाज ने आज और अच्छे से फैलाया हुआ था। शहनाज चाहती थी की राज को जो सुख मिल रहा है वो अच्छे से मिले। उसने ट्रांसपेरेंट पैंटी ब्रा को छत पे टंगा था।
 
रोज की तरह राज रूम से लुंगी गंजी में आया और शहनाज की पैंटी ब्रा को उठाकर स्टोररूम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। आज शहनाज कल की तरह तेज सांस नहीं ले रही थी और न ही आज उसकी धड़कन तेज थी। राज ने आज अपनी लुंगी को नीचे गिरा दिया और नीचे से पूरा नंगा हो गया और मूठ मारने लगा।

शहनाज का मुँह खुला का खुला रह गया। राज के लण्ड को इतने साफ से देखकर उसकी धड़कन बढ़ गई। 10 मिनट तक राज पैंटी और ब्रा को चूमता चाटता रहा और लण्ड को आगे-पीछे करता रहा। उसने अपने लण्ड से ऐसे वीर्य गिराया की शहनाज को साफ-साफ वीर्य निकलता दिख रहा था। शहनाज की पूरी पैंटी गीली कर दी राज ने। फिर वो अपने लुंगी को पहनकर पैंटी ब्रा को टांग दिया और रूम में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

राज के लिए भी इंतजार करना अब मुश्किल हो रहा था। वो जानता था की शहनाज उसके सामने छिपकर उसके लण्ड को देख रही है, और अगर वो स्टोररूम के दरवाजे को खोल दे तो शायद शहनाज खुद को चुदवाने से रोक नहीं पाए। लेकिन वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। वो शहनाज को पर्मानेंट रंडी बनाना चाहता था अपनी। अपनी रखैल अपनी पालतू कुतिया बनाना चाहता था जो उसके इशारे पे नाचे । बड़े शिकार को फँसाने के लिए उसे अच्छे से चारा डालकर अच्छे से इंतजार करना होगा और वो कोई गलती नहीं करना चाहता था। वो दरवाजा के पीछे से देखने लगा।

आज राज के अंदर गये हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे की शहनाज स्टोररूम से बाहर आई और अपने कपड़े समेट कर नीचे चली गई। उसने दरवाजा को अच्छे से लाक कर लिया और बाकी कपड़ों को टेबल पे फेंक कर पैंटी को अपने चेहरा पे रख ली और नंगी हो गई। पैंटी में लगा वीर्य उसके चेहरा को भिगोने लगा और उसकी खुश्बू उसके सीने में भरने लगी। शहनाज नंगी होकर रोज की तरह चूत में उंगली करने लगी और वीर्य को चाटने लगी।

राज नीचे आया था लेकिन दरवाजा बंद होने की वजह से वो वापस चला गया था। उसने सोचा की देखने के लिए इतना मेहनत क्या करना।

चूत से पानी निकालने के बाद शहनाज नंगी ही सो गई और शाम तक नंगी ही अपना काम करती रही। राज के वीर्य की खुश्बू ने उसके अंदर की काम ज्वाला को प्रज्वल्लित कर दिया था। वसीम के आने से पहले वो नहाकर फ्रेश हो गई और शाम के दावत की तैयारी करने लगी।

शाम में वसीम आया तो पता चला की उसने राज को अब तक इन्वाइट ही नहीं किया है। शहनाज उससे झगड़ने लगी की मैं इतनी तैयारी कर रही हूँ और तुमने गेस्ट को इन्वाइट ही नहीं किया। वसीम ने तुरंत ही राज को काल किया। वसीम सोचने पे मजबूर हो गया की शहनाज आजकल राज में कुछ ज्यादा ही इंटेरेस्ट ले रही है। कहीं सच में दोनों के बीच कुछ है तो नहीं? उसके दिमाग में बहुत कुछ चलने लगा और उसके लण्ड में हलचल होने लगी की उसकी 23 साल की जवान और बेहद हसीन बीवी एक 50-55 साल के गैर मर्द के चक्कर में है।

राज के पास वसीम का फोन आया की आपका आज रात का खाना हमारे घर पे ही होगा। राज ने दावत कबूल किया और मुश्कुरा उठा। अब वो दिन दूर नहीं था जब शहनाज जैसी मस्त हसीन औरत उसके लण्ड के नीचे होने वाली थी। राज के मन में आगे का पूरा प्लान बन रहा था। उसका शिकार अब उसके पंजे से ज्यादा दूर नहीं था।

*****
 
शहनाज ने राज को डिनर पर बुलाया

शहनाज ने राज पे दया दिखाते हुए ये दावत रखी थी की वो अकेले रहते हैं इतने सालों से और खाना भी खुद बनाते हैं, तो हम हफ्ते में एक बार तो उन्हें अपने यहाँ खिला ही सकते हैं। शहनाज की सोच अब ये बन गई थी की उनके मन में मेरे लिए अरमान हैं, तो मैं उन्हें पता नहीं लगने दूँगी की मुझे पता है और उनकी हेल्प करूँगी। उन्हें मुझे देखना पसंद है तो वो घर आएंगे तो अच्छे से देख सकेंगे, खुलकर बातें कर सकेंगे। इस तरह उन्हें शायद आराम मिले।

शहनाज को क्या पता था की जो बीमारी राज को है ये उसका इलाज नहीं है, बल्कि उस मर्ज़ को और आगे बढ़ाने का उपाय है। शायद पता भी हो लेकिन उसने अपने मन को यही समझा लिया था की वो इस तरह राज की मदद कर रही है।

वसीम भी राजी था की सही बात है, कभी कभार तो हमें राज जी को लंच या डिनर तो कराना ही चाहिए। वसीम भी खाना बनाने में अपनी बीवी की मदद कर रहा था। शहनाज बहुत अच्छी साड़ी पहनी थी और बड़े प्यार से सारा खाना बनाया था। उसकी ये साड़ी भी डिजाइनर ही थी जिसमें क्लीवेज और पीठ दिख रही थी। शहनाज लो-वेस्ट साड़ी ही पहनी थी। साड़ी का आँचल ट्रांसपेरेंट था जिससे शहनाज की नाभि और क्लीवेज साफ दिख रही थी। हालांकी ये कोई नई बात नहीं थी। शहनाज हमेशा ऐसे ही कपड़े पहनती थी।

फिर भी वसीम ने मजाक में शहनाज से कहा- "आज तो राज जी पे तुम बिजलियां गिराने वाली हो...

शहनाज भी मुश्कुरा दी। उसका इरादा तो यही था ।

राज अपने वक़्त पे घर आ गया और फ्रेश होकर वसीम के घर आ गया। राज ने सफेद कुर्ता पाजामा पहना था। दरवाजा पे नौ करते ही शहनाज दौड़कर दरवाजा खोली। वसीम टीवी देख रहा था और जितनी देर में वो उठता तब तक शहनाज दरवाजा खोल चुकी थी।

राज के ऊपर दरवाजा खुलते ही जैसे बिजली गिर पड़ी। शहनाज को देखकर उसके जिश्म में सिहरन हो गई। राज ने शहनाज को जब भी देखा था तो दूर से देखा था। इतने करीब से ये पहला मौका था उस हुश्न का दीदार करने का। शहनाज भी बिजली गिराने को तैयार ही थी।

ट्रांसपेरेंट साड़ी के अंदर से झांकता गोरा चिकना कमसिन बदन, माँग में सिंदूर, माथे पे लाल बिंदी, आँखों में काजल, होठों पे मरुन लिपस्टिक, गले में एक चैन क्लीवेज तक और मंगलसूत्र ब्लाउज़ के ऊपर, हुए

ब्लाउज़ के ऊपर से झांकती हुई चूचियां, गोरा चिकना पेट नाभि के नीचे तक, दोनों हाथों में पूरी चूड़ियां और पैरों में पायल शहनाज साक्षात अप्सरा लग रही थी। राज उसे देखता ही रह गया। उसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी। उसका मन हुआ की अभी ही शहनाज को बाहों में भर ले और उसे चूमना स्टार्ट कर दे।

शहनाज जब मुश्कुराती हुई खनकती आवाज में- “आइए ना चाचाजी.." बोलती हुई दरवाजे के आगे से हटी तब राज झटके से होश में आया ।

राज "आँन्न्.. हाँन्..." बोलता हुआ अंदर आया ।

शहनाज अंदर जाती हुई वसीम को आवाज लगाई- “उठिए ना, देखिए राज जी आए हैं, आप कब से टीवी ही देख रहे हैं..."

राज पीछे से शहनाज की चमकती पीठ और कमर में हो रही थिरकन का मजा ले रहा था।

वसीम तब तक राज का स्वागत करने के लिए उठ चुका था और राज को बोला- “आइए अंकल, बैठिए, कैसे हैं?"

राज अब सम्हल चुका था और “सब बढ़िया आप सुनाइए ?” बोलता हुआ सोफे पे बैठ गया ।

वसीम और राज बातें करने लगे। तब तक शहनाज किचेन से एक ट्रे में पानी और कोल्ड ड्रिंक ग्लास में ले आई और राज को बड़े अदब से सर्व की। शहनाज के झुकते ही उसकी चूचियां ब्लाउज़ से बाहर निकल जाने को आतुर हो जाती थीं। राज और वसीम ने कोल्ड ड्रिंक और पानी ले लिया तो फिर शहनाज किचेन की तरफ वापस चल दी।
 
राज का मन हुआ की कोल्ड ड्रिंक लेते वक़्त शहनाज के ब्लाउज़ में झाँके या जब वो वापस जा रही थी तो उसकी गाण्ड की हलचल को देखे। लेकिन ऐसा करना उसकी चाल का हिस्सा नहीं था। उसने बड़ी मुश्किल से खुद पे काबू किया और ऐसे रिएक्ट किया जैसे कुछ हो ही ना रहा हो।

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शहनाज भी एक ग्लास में कोल्ड ड्रिंक लेकर बाहर आ गई और सामने बैठकर उस बातचीत का हिस्सा बनने की कोशिश करने लगी। उसका मकसद बस यहीं था की वो राज की नजरों के सामने रहे, ताकी राज शहनाज को अच्छे से देख पाए ।

लेकिन राज ना तो शहनाज की तरफ देख रहा था और ना ही उससे बात कर रहा था।

थोड़ी देर बाद शहनाज उठी और बड़े प्यार से उसे खाना सर्व की राज और वसीम साथ में खाना खाए। शहनाज जानबूझ कर राज के सामने ज्यादा और देर तक झुकती थी ताकी राज उसके जिश्म को देख सके।

राज बिल्कुल शरीफ बंदे की तरह बैठा रहा और शहनाज पे एक नजर डालने के बाद उसने शहनाज की तरफ देखा भी नहीं। लेकिन वसीम का ध्यान बस शहनाज पे ही था। शहनाज एक तो वैसे ही इतनी खूबसूरत थी और उसपे ये साड़ी और फुल मेकप में वो कयामत ढा रही थी।

राज के लिए खुद को रोके रखना बहुत ही मुश्किल था लेकिन अगर शिकार को अच्छे से दबोचना है तो सही वक़्त का इंतजार करना चाहिए ये सोचते हुए वो खुद पे काबू किए रहा।

वसीम और राज में कई तरह की बातें होती रही और धीरे-धीरे बात राज के जिंदगी में आ गई और राज ने बताया की अपनी पत्नी के इंतकाल के बाद उसने दुबारा विवाह नहीं किया।

वसीम ने पूछ लिया- “इतना लंबा वक़्त हो गया तो कभी शारीरिक कमी महसूस नहीं हुई.. "

राज बस हँस पड़ा। उसने बताया की दो-तीन औरतों के साथ विवाह की बात चली लेकिन हर बार बात बिगड़ जाती थी। उसकी सारी कहानियों का सार यह था की उसने कभी किसी के साथ चीटिंग या बेईमानी नहीं की और हर औरत के साथ वो साफ और स्पष्ट तरीके से पेश आया था। लेकिन उन औरतों ने ही राज को चीट किया था।

वसीम का ककोल्ड मन जागने लगा और उसे लगा की उसकी बीवी इस तरह सजकर एक हिंदू मर्द के सामने खुद को पेश कर रही है। वसीम का लण्ड अंदर टाइट हो चला ।

राज थोड़ी देर बाद अपने कमरे में चला गया।

शहनाज खाने बैठी तो वसीम ने उससे कहा- “आज तो तुम राज जी पे कयामत ढा रही थी.. "

शहनाज हँस पड़ी और फिर मजाक में बोल दी- "लेकिन फिर भी राज जी ने तो देखा भी नहीं। वो कितने

शरीफ और नेक इंसान हैं..."

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वसीम को शहनाज की ये हँसी अजीब लगी और उसने भी हँसते हुए मजाक में पूछा- "क्या तुम राज जी के लिए ही इतना सजी थी?"

शहनाज मुश्कुरा दी और हँसकर बोली- "हाँ... तुम्हारे लिए इतना क्यों सजूं? तुम तो ऐसे ही मुझे इतना प्यार करते हो..."
 
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