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राज को बहुत मजा आया। बरसों से किसी ने उसे इस तरह नहीं जगाया था। वो आँखें खोलकर शहनाज को देखा तो मेकप के बाद शहनाज और हसीन लग रही थी। वो शहनाज को देखता ही रह गया की शहनाज गई।
राज ने नजरें नीची कर ली और उठकर बैठ गया।
शहनाज उस रूम से निकलकर अपने रूम में गई और वसीम को भी जगाई। दोनों जाग कर बाहर आ गये और सोफे पे बैठ गये। शहनाज दोनों को मार्निंग चाय सर्व की।
राज के कप उठाते ही राज का हाथ थोड़ा हिला ।
शहनाज तुरंत ताना मारी- “संभाल कर राज जी , जमीन पे मत गिराइए..
राज समझ गया की रांड़ क्या बोल रही है? लेकिन वो सिर झुकाए चाय पीने लगा।
नाश्ता करके वसीम और राज अपने-अपने कम पे चले गये और शहनाज सोचने लगी की क्या किया जाए? अब वो और देर नहीं करना चाह रही थी। उसने सोच लिया की आज दोपहर में उसे राज से बात कर ही लेनी है, क्योंकी कल सनडे है। कल वसीम घर में रहेंगे तो फिर बात नहीं हो पाएगी। अब उसकी हिम्मत बहुत बढ़ गई थी। शहनाज दोपहर का इंतजार करने लगी। दोपहर में जब राज घर आया, तब तक शहनाज मन बना चुकी थी।
राज घर आया तो उसने आज भी शहनाज का दरवाजा अंदर से ही बंद देखा उसे आज बुरा नहीं लगा क्योंकी उसे 100 फीसदी यकीन था की आज शहनाज उसके पास जरूर आएगी। वो अपने रूम में गया और लुंगी गंजी पहनकर बाहर आ गया।
शहनाज टाइम का अंदाजा लगाकर थोड़ी देर बाद छत पे चली आई। राज अभी शहनाज की पैंटी को हाथ में लिया ही था की शहनाज वहाँ पहुँच गई।
शहनाज राज जी ये क्या कर रहे हैं आप?”
राज ने ऐसी आक्टिंग की जैसे हड़बड़ा गया हो- "कुछ नहीं। ये तो बस नीचे गिर गया था तो उठा दे रहा था..."
शहनाज राज की हड़बड़ाहट देखकर मुश्कुरा दी। वो नहीं चाहती थी की उसके देख लेने से राज अपराधी महसूस करे। मुश्कुराती हुई शहनाज बोली - "मुझे सब पता है की रोज आप मेरी पैंटी के साथ क्या करते हैं? मुझे ये भी पता है की आज सुबह आपने क्या किया है?"
राज चुपचाप नजरें झुकाए खड़ा था। वो ये सब भाषण के लिए तैयार था। तभी तो वो अपनी चाल को और आगे बढ़ाता और शहनाज उसमें राज की पालतू कुतिया बनने के लिए अपने आपको फँसाती ।
शहनाज राज के करीब आते हुए बड़े प्यार से और समझाने के लहजे में बोली- “मुझे पता है राज जी की आप बहुत अरसे से अकेले हैं और मैंने यहाँ आकर आपकी सोई तमन्नाओं को जगा दिया है। मुझे आपके बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए मैं जैसे रहती थी वैसे ही हमेशा रहती रही। मुझे पता है की हर मर्द को जिश्म की अपनी जरूरतें होती हैं, भला मैं क्या करती ? मेरी क्या गलती की मैं खूबसूरत हूँ? मैं बचपन से ऐसे ही कपड़े पहनती आई हूँ। लेकिन जब से मुझे आपकी हालत पता चली है मैं खुद को आपके सामने लाने से बचती रही..."
राज फिर भी चुप रहा।
शहनाज फिर आगे बोली- "फिर मैंने सोचा की इस तरह दूर रहकर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। एकलौता उपाय था की हम इस घर से चले जाते, और इसके लिए मैंने वसीम से बात भी की। लेकिन उसने कहा की तुरंत दूसरा घर कहाँ मिलेगा और उसने बात को टाल दिया। अब ये संभव नहीं था की यहाँ रहते हुए आपसे दूर रह पाऊँ। कपड़े मुझे छत पे ही देने होते सूखने के लिए ।
किसी ना किसी तरह आपकी नजर मुझपे पड़ती ही, आप मेरी आवाज भी सुनते ही। तब सिर्फ एक उपाय था की फिर आपसे छुपने से आपकी मदद नहीं होगी, बल्कि खुलकर आपके सामने आना होगा...."
शहनाज सांस लेने के लिए रुकी और फिर बोलना चालू की- "मैं कई बार सोची की आपको बोलूं, आपकी मदद करूँ लेकिन आप मेरी तरफ देखते ही नहीं हैं। मैं आपको कितना हिंट दी, कितनी तरह से कोशिश की की आप मुझे देखें, मेरे से बातें करे। लेकिन अकेले में तो आप बहुत कुछ कर लेते हैं, लेकिन सामने तो नजर भी नहीं उठाते। तब जाकर फाइनली मैंने सोचा की आज आपसे खुलकर बातें कर ही लूँ..."
राज ने नजरें नीची कर ली और उठकर बैठ गया।
शहनाज उस रूम से निकलकर अपने रूम में गई और वसीम को भी जगाई। दोनों जाग कर बाहर आ गये और सोफे पे बैठ गये। शहनाज दोनों को मार्निंग चाय सर्व की।
राज के कप उठाते ही राज का हाथ थोड़ा हिला ।
शहनाज तुरंत ताना मारी- “संभाल कर राज जी , जमीन पे मत गिराइए..
राज समझ गया की रांड़ क्या बोल रही है? लेकिन वो सिर झुकाए चाय पीने लगा।
नाश्ता करके वसीम और राज अपने-अपने कम पे चले गये और शहनाज सोचने लगी की क्या किया जाए? अब वो और देर नहीं करना चाह रही थी। उसने सोच लिया की आज दोपहर में उसे राज से बात कर ही लेनी है, क्योंकी कल सनडे है। कल वसीम घर में रहेंगे तो फिर बात नहीं हो पाएगी। अब उसकी हिम्मत बहुत बढ़ गई थी। शहनाज दोपहर का इंतजार करने लगी। दोपहर में जब राज घर आया, तब तक शहनाज मन बना चुकी थी।
राज घर आया तो उसने आज भी शहनाज का दरवाजा अंदर से ही बंद देखा उसे आज बुरा नहीं लगा क्योंकी उसे 100 फीसदी यकीन था की आज शहनाज उसके पास जरूर आएगी। वो अपने रूम में गया और लुंगी गंजी पहनकर बाहर आ गया।
शहनाज टाइम का अंदाजा लगाकर थोड़ी देर बाद छत पे चली आई। राज अभी शहनाज की पैंटी को हाथ में लिया ही था की शहनाज वहाँ पहुँच गई।
शहनाज राज जी ये क्या कर रहे हैं आप?”
राज ने ऐसी आक्टिंग की जैसे हड़बड़ा गया हो- "कुछ नहीं। ये तो बस नीचे गिर गया था तो उठा दे रहा था..."
शहनाज राज की हड़बड़ाहट देखकर मुश्कुरा दी। वो नहीं चाहती थी की उसके देख लेने से राज अपराधी महसूस करे। मुश्कुराती हुई शहनाज बोली - "मुझे सब पता है की रोज आप मेरी पैंटी के साथ क्या करते हैं? मुझे ये भी पता है की आज सुबह आपने क्या किया है?"
राज चुपचाप नजरें झुकाए खड़ा था। वो ये सब भाषण के लिए तैयार था। तभी तो वो अपनी चाल को और आगे बढ़ाता और शहनाज उसमें राज की पालतू कुतिया बनने के लिए अपने आपको फँसाती ।
शहनाज राज के करीब आते हुए बड़े प्यार से और समझाने के लहजे में बोली- “मुझे पता है राज जी की आप बहुत अरसे से अकेले हैं और मैंने यहाँ आकर आपकी सोई तमन्नाओं को जगा दिया है। मुझे आपके बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए मैं जैसे रहती थी वैसे ही हमेशा रहती रही। मुझे पता है की हर मर्द को जिश्म की अपनी जरूरतें होती हैं, भला मैं क्या करती ? मेरी क्या गलती की मैं खूबसूरत हूँ? मैं बचपन से ऐसे ही कपड़े पहनती आई हूँ। लेकिन जब से मुझे आपकी हालत पता चली है मैं खुद को आपके सामने लाने से बचती रही..."
राज फिर भी चुप रहा।
शहनाज फिर आगे बोली- "फिर मैंने सोचा की इस तरह दूर रहकर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। एकलौता उपाय था की हम इस घर से चले जाते, और इसके लिए मैंने वसीम से बात भी की। लेकिन उसने कहा की तुरंत दूसरा घर कहाँ मिलेगा और उसने बात को टाल दिया। अब ये संभव नहीं था की यहाँ रहते हुए आपसे दूर रह पाऊँ। कपड़े मुझे छत पे ही देने होते सूखने के लिए ।
किसी ना किसी तरह आपकी नजर मुझपे पड़ती ही, आप मेरी आवाज भी सुनते ही। तब सिर्फ एक उपाय था की फिर आपसे छुपने से आपकी मदद नहीं होगी, बल्कि खुलकर आपके सामने आना होगा...."
शहनाज सांस लेने के लिए रुकी और फिर बोलना चालू की- "मैं कई बार सोची की आपको बोलूं, आपकी मदद करूँ लेकिन आप मेरी तरफ देखते ही नहीं हैं। मैं आपको कितना हिंट दी, कितनी तरह से कोशिश की की आप मुझे देखें, मेरे से बातें करे। लेकिन अकेले में तो आप बहुत कुछ कर लेते हैं, लेकिन सामने तो नजर भी नहीं उठाते। तब जाकर फाइनली मैंने सोचा की आज आपसे खुलकर बातें कर ही लूँ..."