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वसीम बोला- "मेरी नजर में तो दोनों फरिस्त हैं। ये आपकी महानता है की आपने अपनी बीवी का साथ दिया। एक अंजान इंसान की मदद के लिए इतना बड़ा फैसला लिया आपने। आप महान है विकास बाब.."
विकास धीरे से बोला- "महान नहीं चूतिया हूँ मैं.." जिसे कोई सुन नहीं सका लेकिन सबको उसका मूड समझ में आ रहा था।
वसीम के बगल में रखी शीतल की पेंटी को देखकर उसका गुस्सा और बढ़ गया था। उसे यकीन हो गया था की दोनों अभी भी सेक्स कर रहे थे। या तो सुबह का एक पाउंड हो चुका था या हो रहा था।
विकास- "तो सुहागरात हो गई या कुछ बाकी है? अगर बाकी है तो आप लोग कर सकते हैं अभी, में रूम में चला जाता है." बोलता हुआ विकास सोफा से उठ खड़ा हुआ, और उसकी आवाज में तल्खी आ गई थी।
वसीम तुरंत बोला- "ये कैसी बातें कर रहे हैं आप विकास बाबू?'
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विकास बोला- “नहीं अगर सुहागरात का कोटा पूरा नहीं हुआ है, या अभी और करना है तो आप लोग कर लीजिए, मैं गम में सो जाता हैं..."
फिर विकास शीतल से बोला- "शीतल, जाओ वसीम चाचा के साथ सुहागरात पूरी करो। उन्हें कोई कमी ना रह जाए...' बोलता हुआ वो शीतल की बौंह पकड़ा और वसीम की तरफ जाने को पुश किया।
शीतल हड़बड़ा गई- "ये क्या कर रहे हो विकास? ये क्या हो गया तुम्हें आते ही..."
वसीम भी बोला- "विकास बाबू ये कैसे कर रहे हैं आप?"
विकास बोला- “सही कह रहा हूँ। अगर आपको कुछ और करना है तो कर लीजिए। पूरा कर लीजिए अपनी सुहागरात। और अगर हो चुकी है तो अब आप जा सकते हैं यहाँ से। हम इससे ज्यादा आपकी मदद नहीं कर सकते..." विकास दोनों हाथ जोड़कर वसीम के सामने खड़ा था।
विकास फिर बोला "जितनी महानता मुझे दिखानी थी, दिखा चुका है। अब और नहीं..."
वसीम चकित सा होने की आक्टिंग कर रहा था। ये तो जैसा उसने सोचा था उससे भी अच्छा हो रहा था उसके प्लान के लिए। उसे यकीन नहीं था की विकास इस तरह गुस्से में आ जाएगा। उसने शीतल पे जो जान चलाया था, अब उसके असर होने का इंतजार कर रहा था वो।
शीतल अब चीख पड़ी- "विकास, ये क्या हो गया तुम्हें आते हो। तुम्हें नहीं पसंद था ता मना कर देते। तुमसे पूछूकर ना वसीम चाचा को ही बोली थी मैं। यहां तक की तुम्हारे हाँ बोलने के तीन दिन बाद इन्हें ही कहा मैंने।
और इन तीन दिनों में तुम्ही मुझे समझा रहे थे की मुझे करना चाहिए वसीम चाचा के साथ। अब अचानक क्या हो गया तुम्हें?"
विकास भी चीख पड़ा- "तो हो गया ना? चुदवा ली ना? मना ली ना सुहागरात? मैं उसके लिए तो कुछ नहीं बोल रहा। और अगर कुछ करना है तो कर ला अभी। मैं तो यही कह रहा है। लेकिन जिंदगी भर तो सुहागरात नहीं मनेगी ना?"
वसीम कुछ बोलने की सोच रहा था। लेकिन शीतल फिर बोल पड़ी- "तो कौन मना रहा है सहागरात? में तो जा ही रहे थे की में इन्हें नाश्ता करने के लिए रोक ली। तम पता नहीं क्यों आते ही शुरू हो गय?"
विकास बोला- "हाँ... नंगी होकर रोक ली थी ना... बो पैटी तुम खुद उतारी या यं उतारे? शीतल सुनो, मैं झगड़ा नहीं करना चाहता। जो होना था हो चुका, लेकिन अब ये और नहीं होगा। मेरी इजाजत से हुआ, मैं चूतिया था जो ये पागलपन कर बैठा। लेकिन अब और कुछ नहीं होगा..."
फिर विकास वसीम को बोला- "प्लीज वसीम चाचा, इससे ज्यादा मदद में आपकी नहीं कर सकता। आप जाइए..."
शीतल पेंटी और नाइटी की बात सुनकर सकते में आ गई की विकास कह तो सही हो रहा है। लेकिन उसे लगा की अगर वो अभी नहीं बोल पाई तो बाद में भले वो विकास को मना भी ले, लेकिन फिर भी वसीम उसे फिर कभी नहीं चोदेगा। नहीं नहीं, वसीम को तो मुझे चोदना ही होगा।
शीतल तुरंत बोल पड़ी- "विकास तुम समझ क्यों नहीं रहे? ये क्या पागलों के जैसी बातें किए जा रहे हो? जब तुम्हें नहीं पसंद था तो मुझे मना करना चाहिए था, रोकना था। लेकिन तब तो बहुत महान बन रहे थे और उल्टा मुझे ही समझा रहे थे। में तीन दिन तक यही सोचकर रुकी रही की मेरे जिश्म में मेरे पति का हक है, वो किसी और को क्यों दूं? लेकिन जब तुमने मुझे समझाया तब फिर मैं सोची की मुझे अब कर ही लेना चाहिए."
विकास धीरे से बोला- "महान नहीं चूतिया हूँ मैं.." जिसे कोई सुन नहीं सका लेकिन सबको उसका मूड समझ में आ रहा था।
वसीम के बगल में रखी शीतल की पेंटी को देखकर उसका गुस्सा और बढ़ गया था। उसे यकीन हो गया था की दोनों अभी भी सेक्स कर रहे थे। या तो सुबह का एक पाउंड हो चुका था या हो रहा था।
विकास- "तो सुहागरात हो गई या कुछ बाकी है? अगर बाकी है तो आप लोग कर सकते हैं अभी, में रूम में चला जाता है." बोलता हुआ विकास सोफा से उठ खड़ा हुआ, और उसकी आवाज में तल्खी आ गई थी।
वसीम तुरंत बोला- "ये कैसी बातें कर रहे हैं आप विकास बाबू?'
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विकास बोला- “नहीं अगर सुहागरात का कोटा पूरा नहीं हुआ है, या अभी और करना है तो आप लोग कर लीजिए, मैं गम में सो जाता हैं..."
फिर विकास शीतल से बोला- "शीतल, जाओ वसीम चाचा के साथ सुहागरात पूरी करो। उन्हें कोई कमी ना रह जाए...' बोलता हुआ वो शीतल की बौंह पकड़ा और वसीम की तरफ जाने को पुश किया।
शीतल हड़बड़ा गई- "ये क्या कर रहे हो विकास? ये क्या हो गया तुम्हें आते ही..."
वसीम भी बोला- "विकास बाबू ये कैसे कर रहे हैं आप?"
विकास बोला- “सही कह रहा हूँ। अगर आपको कुछ और करना है तो कर लीजिए। पूरा कर लीजिए अपनी सुहागरात। और अगर हो चुकी है तो अब आप जा सकते हैं यहाँ से। हम इससे ज्यादा आपकी मदद नहीं कर सकते..." विकास दोनों हाथ जोड़कर वसीम के सामने खड़ा था।
विकास फिर बोला "जितनी महानता मुझे दिखानी थी, दिखा चुका है। अब और नहीं..."
वसीम चकित सा होने की आक्टिंग कर रहा था। ये तो जैसा उसने सोचा था उससे भी अच्छा हो रहा था उसके प्लान के लिए। उसे यकीन नहीं था की विकास इस तरह गुस्से में आ जाएगा। उसने शीतल पे जो जान चलाया था, अब उसके असर होने का इंतजार कर रहा था वो।
शीतल अब चीख पड़ी- "विकास, ये क्या हो गया तुम्हें आते हो। तुम्हें नहीं पसंद था ता मना कर देते। तुमसे पूछूकर ना वसीम चाचा को ही बोली थी मैं। यहां तक की तुम्हारे हाँ बोलने के तीन दिन बाद इन्हें ही कहा मैंने।
और इन तीन दिनों में तुम्ही मुझे समझा रहे थे की मुझे करना चाहिए वसीम चाचा के साथ। अब अचानक क्या हो गया तुम्हें?"
विकास भी चीख पड़ा- "तो हो गया ना? चुदवा ली ना? मना ली ना सुहागरात? मैं उसके लिए तो कुछ नहीं बोल रहा। और अगर कुछ करना है तो कर ला अभी। मैं तो यही कह रहा है। लेकिन जिंदगी भर तो सुहागरात नहीं मनेगी ना?"
वसीम कुछ बोलने की सोच रहा था। लेकिन शीतल फिर बोल पड़ी- "तो कौन मना रहा है सहागरात? में तो जा ही रहे थे की में इन्हें नाश्ता करने के लिए रोक ली। तम पता नहीं क्यों आते ही शुरू हो गय?"
विकास बोला- "हाँ... नंगी होकर रोक ली थी ना... बो पैटी तुम खुद उतारी या यं उतारे? शीतल सुनो, मैं झगड़ा नहीं करना चाहता। जो होना था हो चुका, लेकिन अब ये और नहीं होगा। मेरी इजाजत से हुआ, मैं चूतिया था जो ये पागलपन कर बैठा। लेकिन अब और कुछ नहीं होगा..."
फिर विकास वसीम को बोला- "प्लीज वसीम चाचा, इससे ज्यादा मदद में आपकी नहीं कर सकता। आप जाइए..."
शीतल पेंटी और नाइटी की बात सुनकर सकते में आ गई की विकास कह तो सही हो रहा है। लेकिन उसे लगा की अगर वो अभी नहीं बोल पाई तो बाद में भले वो विकास को मना भी ले, लेकिन फिर भी वसीम उसे फिर कभी नहीं चोदेगा। नहीं नहीं, वसीम को तो मुझे चोदना ही होगा।
शीतल तुरंत बोल पड़ी- "विकास तुम समझ क्यों नहीं रहे? ये क्या पागलों के जैसी बातें किए जा रहे हो? जब तुम्हें नहीं पसंद था तो मुझे मना करना चाहिए था, रोकना था। लेकिन तब तो बहुत महान बन रहे थे और उल्टा मुझे ही समझा रहे थे। में तीन दिन तक यही सोचकर रुकी रही की मेरे जिश्म में मेरे पति का हक है, वो किसी और को क्यों दूं? लेकिन जब तुमने मुझे समझाया तब फिर मैं सोची की मुझे अब कर ही लेना चाहिए."