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Adultery शीतल का समर्पण

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मकसूद को बहुत बुरा लगा। फिर भी वो हँसता हुआ चल दिया की आज के लिए इतना कोटा काफी था। मकसूद ने होटेल में काल किया और वसीम से बात किया। मकसूद ने पहले ही वसीम को बता दिया था और वसीम ने होटल वालों को समझा दिया था। वसीम ने उससे पूछा और मकसूद उसे सब कुछ बताता गया।

मकसूद ने ये भी बताया की- "शीतल को बाइक पे बिठाकर मुझे बहुत मजा आया। तेरा शुक्रिया दोस्त की तरी बजह से वो हर आज मेरे बदन से सटी और हाय क्या मस्त चूचियां हैं साली की... अभी तक पीठ नरम लग रही

वसीम हँसने लगा।

मकसद ने उससे फिर पूछा- "त ये कर क्या रहा है? क्यों त बाहर है अपने ही घर से? क्यों वो तुझे इतनी बेकरारी से ट्रॅट रही है? तूने पक्का कुछ किया है उसके साथ.."

वसीम हँसता हुआ ही बोला- "बताऊँगा, साले सब बताऊँगा..."

मकसूद अपने काम पे चला गया और शीतल झल्लाती हुई घर पे थी। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था वसीम पे।

शीतल कपड़े चेंज करके खाना बनाने लगी और तभी विकास का काल आ गया। विकास ने वहाँ जोयिन कर लिया था। शीतल विकास को कुछ भी नहीं बताई वसीम और मकसूद के बारे में। कहीं विकास फिर गुस्सा ना करने लगे। थोड़ी देर बात करने के बाद वो फोन रख दी और फिर अपने काम में लग गई। वैसे उसके पास अब काई काम नहीं था। वो बस वसीम को याद करने लगी। वो वसीम को बहुत मिस कर रही थी की इतने दिन वो अकेली है और अगर वसीम रहता तो कितनी मस्ती करती उनके साथ। इतनी बार उनसे चुदवाती की उनके सारे अरमान पूरे हो जाते। दिन रात उनसे चुदवाते रहती।

***** *****
 
शीतल की सहेली दीप्ति का आगमन शीतल लेंटी थी की उसके घर पे नाक हुआ। वो घड़ी देखी तो 11:00 बज रहा था। वो खुशी से झूम उठी की

अभी कौन होगा? जरूर वसीम ही आए होंगे। लेकिन जब वो दरवाजा खोली तो उसकी एक पुरानी सहेली थी। दीप्ति। शीतल पहले तो वसीम को ना देखकर मायूस हो गई। लेकिन फिर दीप्ति को देखकर चकित हो गई। बो खुशी से उछल पड़ी और उसके गले लग गई।

दीप्ति शीतल की कालेज की दोस्त थी और उसी के उम्र की थी। पढ़ाई करते वक़्त ही दीप्ति की शादी हो गई थी। दीप्ति को एक बरचा भी था 6 महीने का और वो अब थोड़ी मोटी हो गई थी। लेकिन वो भी बहुत खूबसूरत थी। शीतल और दीप्ति कालेज के लड़कों की हाट लिस्ट में थी।

दीप्ति की शादी के बाद दोनों आज ही मिल रहे थे। दीप्ति को पता चला की शीतल यही है तो वो उसका अईस लेकर यहाँ चली आई थी। उसने शीतल का नम्बर लिया था लेकिन वो गलत नम्बर लिख ली थी। इसलिए फोन नहीं कर पाई और किसी तरह पूछते हए अपनी सहेली के पास आ गई थी। दीप्ति का पति भी इसी शहर में काम करता था।

दोनों सहेलियां लंबे समय बाद मिली थी तो दोनों गप्पे लड़ाने लगी। शीतल को बहुत अच्छा लग रहा था और कछ देर के लिए वो वसीम को भी भल गई थी। दोनों में बहुत सारी पुरानी बातें होती रही और थोड़ी देर के बाद दीप्ति शीतल को चिढ़ाते हुए बोली- "तू यहाँ इस मुस्लिम मुहल्ले में क्यों रहने आ गई। तुझ जैसी गरम माल को तो ये लोग आँखों में ही खा जाते होंगे..."

शीतल हँस दी और बोली- "अरे... इसमें नया क्या है? हर काई तो इसी तरह हम लोगों को देखता था। कालेज के दिन भूल गई क्या? याद है फेशार है पार्टी के दिन जब हम लोगों ने पहली बार साड़ी पहनी थी तो सब कैसे घर

रहे थे। वो तो अच्छा है की नजरों से चोदने से हम लोग प्रेगनेंट नहीं होती नहीं तो इंडिया की जनसंख्या 4 गुना

और होती... फिर दोनों सहेलियां ठहाके लगाने लगी।

दीप्ति फिर बोली- "फिर भी ये लोग कुछ ज्यादा ही घूरते हैं। कोई लाइन मरता है की नहीं?"

शीतल ऐसे मैंह बनाई की- "घूरते हैं तो घूरने दो, हम क्या?" फिर वो अपनी मौंग में लगे सिंदूर को दिखती हुई बोली- "ये देखती नहीं क्या, अब कौन लाइन मरेगा?"

दीप्ति हँसने लगी और बोली- "ता त किसी को पटा ले..."

शीतल हँसतं हए बोली- "तू कितनी को पटाकर रखी है जो मुझें पटाने बोल रही है साली?"

दीप्ति का बेटा रोने लगा तो वो अपनी ब्लाउज़ को ऊपर की और उसे दूध पिलाने लगी।

उसकी चूचियों को देखकर शीतल हँस दी और बोली- "कालेज टाइम में तो तेरे बड़े छोटे-छोटे थे। लगता हैं जीजाजी बहुत मेहनत कर रहे हैं, या तू और भी बहुत सारे मजदूर लगा रखी है इसे बढ़ाने के लिए."

दोनों फिर से हँसने लगे। दीप्ति कोई जवाब नहीं दी इसका।

दीप्ति शीतल के चूचियां की तरफ इशारा की, और कहा- "तेरे भी तो बहुत बड़े-बड़े हो गये हैं."

शीतल जबाब दी- "कहाँ, मेरे तो इतने ही बड़े हैं। तेरे जीजाजी मेहनत ही नहीं करते। मैं भी सोच रही हैं दो-चार मजदूर रख ही ल..."

बातें चलती जा रही थी। दोनों खाना खाने लगे। 2:30 बज रहा था। शीतल के घर का मुख्य दरवाजा खुला और फिर कोई सादियों में चढ़ता चला गया। शीतल का कलेजा धक्क से कर गया। वसीम चाचा आ गये क्या?

शीतल खाना छोड़कर उठी और दरवाजा खोलकर सीटी पे देखी- "हौं... ये तो वसीम चाचा हैं। ओहह ... शुक है भगवान का की ये सही सलामत वापस आ गये हैं। उसका मन हुआ की अभी दौड़ कर जाए और उनसे लिपट जाए लेकिन दीप्ति घर पे ही थी। अगर इसे जरा भी शक हुआ तो खबर उसके घर और शहर तक आग की तरह फैल जाएगी..."

शीतल वापस आकर जल्दी-जल्दी खाना खाने लगी। खाना खाने के बाद भी दीप्ति सोफा में बैठकर बातें करने लगी, लेकिन शीतल को बैचैनी हो रही थी।

दीप्ति वसीम के बारे में पूछी।

लेकिन शीतल- "मकान मालिक है.' बोलकर बात को टाल गई।

दीप्ति 15 मिनट होते-होते बस एक बार फार्मेलिटी के लिये बोली. "अब चलना चाहिए मुझे.."

शीतल तुरंत बोल दी- "हीं, ठीक है अब जा त। फिर आना। अपना नम्बर दे दें, मैं भी आऊँगी तेरे घर। फोन करेंगी तुझे... इसके बाद 10 मिनट होते-होते शीतल दीप्ति को भेज चुकी थी।

शीतल की सांसें भारी हो गई थी। उसे बैचैनी होने लगी थी। 5 दिन बाद वसीम आया था और वो उसके पास जा भी नहीं पा रही थी। पता नहीं इन 5 दिनों में वो कहीं रहें, क्या किया? बो अब तक उनके पास नहीं गई हैं, पता नहीं क्या सोच रहे होंगे? दीप्ति के जाते ही वो मुख्य दरवाजा लाक की और ऊपर भागी।

वसीम आते ही ऊपर अपने घर में चला गया था। शीतल दौड़ती हई ऊपर पहुँची। वसीम का सामान फैला हुआ था। वो शायद अपने जरी सामान समेट रहा था।

शीतल उसे पीछे से पकड़ ली और उससे चिपक गई और सवालों की झड़ी लगा दी- "आप कहाँ थे? कहाँ चले गये थे मुझे छोड़कर? कोई अपने ही घर में जाता है क्या? मोबाइल क्यों नहीं लग रहा था? कम से कम मुझसे तो बात करतें, मुझे कितनी चिंता हो रही थी एट्सेंटरा."

वसीम अंदर ही अंदर तो बहुत खुश था लेकिन वो बस सीधा खड़ा था। थोड़ी देर में शीतल उससे अलग हुई और उसे अपनी तरफ घुमाईं। वसीम की दादी बिल्कुल बदी हुई थी, बाल बिखरे थे, आँखें लाल थी। शीतल को उसकी हालत में तरस आ रहा था की इस सबकी जिम्मेदार बो है। वो फिर से वसीम से लिपट गई। वसीम इन 5 दिनों में नहाया भी नहीं था तो उसके जिस्म से बदबू आ रही थी। लेकिन ये बदबू भी शीतल को मैंहगे लेवेंडर की खुश्बू दे रही थी। वो रोने लगी थी और फिर से वहीं सारे सवाल दुहरा रही थी।

थोड़ी देर बाद जब शीतल उससे अलग हुई तो वसीम बिलकुल उदास, मागश, थका हारा सा दिख रहा था।
 
थोड़ी देर बाद जब शीतल उससे अलग हुई तो वसीम बिलकुल उदास, मागश, थका हारा सा दिख रहा था।

शीतल उसे समझाने लगी- "आप क्यों गये यहाँ से? मैंने तो आपको मना नहीं किया था। मुझे पता है सारी गलती मेरी है, लेकिन मैं तो कह चुकी है की जब आपके मन में जो आए वैसे करिए मेरे साथ, मैं बिल्कुल मना नहीं करूँगी । विकास को भी बाद में कितना अफसोस हुआ। वो मुझे सुबह में सिर्फ नाइटी में देखें और मेरी पैंटी को सोफा पे देखें तो उन्हें गुस्सा आ गया था। लेकिन बाद में उन्हें बहुत अफसोस हुआ। कितना परेशान हुए हम लोग आपको टूटने के लिए। देखिए तो ये क्या हालत बना रखी है आपने?" शीतल एक सांस में बोले जा रही थी लेकिन वसीम उसी तरह शांत, मायूस, उदास खड़ा था।

वसीम ने थोड़ी देर बाद शीतल को अलग किया और सामान समेटने लगा।

शीतल को बुरा भी लगा और गुस्सा भी आया। वो वसीम का हाथ पकड़कर अपनी तरफ घुमाई और बोली "मैं आपसे बात कर रही हैं वसीम, ये क्या कर रहे हैं आप? आप समझ क्या रहे है खुद को?" बोलती हुई वो वसीम के हाथ का सामान ले ली और नीचे फेंक दी।

वसीम चयर में बैठ गया उदास, परेशान, हताश जैसा।

शीतल की नजर वसीम के चेहरे पे गई तो उसका गुस्सा ठंडा हो गया। वो जाकर वसीम की गोद में बैठ गई

और उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर लगभग से हई बोली- "प्लीज... हमें माफ कर दीजिए। मुझे माफ कर दीजिए.."

वसीम में कोई जवाब नहीं दिया। शीतल वसीम के जिश्म से चिपकती गई और उसके गर्दन, गालों पे किस करने लगी। वो बहुत कुछ बोलती जा रही थी, लेकिन वसीम कुछ नहीं बोल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वो शीतल की बात सुन ही नहीं रहा हो।

अचानक वसीम चैयर से उठ खड़ा हुआ और शीतल को भी खुद से अलग कर दिया। वो लगभग चीखता हुआ बोला- "देखो शीतल प्लीज... मुझे छोड़ दो। ये किसी और की नहीं सिर्फ मेरी गलती थी। मुझे माफ कर दो और मेरे पास भी मत आओ। मैं नहीं चाहता की फिर से तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी में कोई भूचाल आए.."

शीतल वसीम के गुस्से को समझ रही थी, उसे शांत करने के लिए फिर से उसके गले लगने के लिए आगे बढ़ी।

लेकिन वसीम ने उसे रोक दिया- "नहीं शीतल, अब नहीं। जो होना था हो चुका। तुमने अपनी तरफ से भरपूर कोशिश की। मुझे वो सबसे कीमती चीज भी दे दी, जो किसी भी हालत में मुझे लेना ही नहीं चाहिए था। लेकिन मेरी किश्मत में तड़पना ही लिखा है। तभी तो मैं मर भी नहीं पाया..'

शीतल आगे बढ़कर क्सीम के मुँह पे हाथ रख दी- "प्लीज ऐसा मत बोलिए। मरें आपके दुश्मन, तड़पें आपके दुश्मन, आपको तड़पने की कोई ज़रूरत नहीं। मेरा जिस्म आपका है वसीम। मैं आपकी हैं। मैं तो विकास के सामने भी बोली भी ये बात और अभी फिर से बोल रही हैं की जब भी आपका मन करे आप करिए। जैसे मन करें वैसे करिए। मैं कभी मना नहीं करगी। मैं आपका साथ दूगी वसीम। प्लीज़.."

वसीम तुरंत बोला- "लेकिन तुम्हारा पति माना तो नहीं ना तुम्हारी बात..."

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शीतल भी तुरंत ही जवाब दी- "कैसे नहीं माना, आपके जाने के तुरंत बाद ही उसे पश्चाताप होने लगा और वो आपको हँटने आपके पीछे भी गया था लेकिन आप नहीं मिले। वो भी बहुत परेशान रहा और बहुत दूँटा आपको। उसनें आपके लिए मेसेज़ भी छोड़ा है। मैं मोबाइल लाती हैं और सुनाती हैं आपको की उसने मुझे आपसे एक नहीं सौ बार, हजार बार चुदवाने की पमिशन दी है..." कहकर शीतल अपना मोबाइल लाने के लिए नीचे जाने लगी तो वसीम ने मना कर दिया।

वसीम बोला- "रहने दो, पिछली बार भी उसने ऐसा ही पमिशन दिया था। अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है शीतल। मैं मर तो नहीं सका, लेकिन यहाँ से दूर जरूर रह सकता है। मुझे जाना होगा। मुझे जाने दो.."

और वो फिर से अपना सामान समेटने लगा।

शीतल फिर से उसके हाथ से सामान लेकर फेंक दी और बोली- "नहीं। मैं आपको जाने नहीं दूँगी अब। कहीं नहीं जाने दूंगी। कभी नहीं जाने दूँगी। अब ऐसा कुछ नहीं होगा। अब अगर विकास या कोई भी मना करेंगा फिर भी मैं आपकी ही रहूंगी। अब अगर विकास मना करेंगा तो मैं उसके सामने आपसे चुदवाऊँगी। आप उसके सामने मुझे गाली दीजिएगा और मैं हँसती हुई आपकी गालियां सुनेंगी। लेकिन अब मैं आपका जाने नहीं दूँगी..."

वसीम बोला- "जाना तो मुझे होगा ही शीतला इसी में हम सबकी भलाई है.."

शीतल दरवाजा बंद कर दी और बोली- "नहीं मैं आपको जाने नहीं दूँगी..." फिर वो अपने टाप को ऊपर करके उतार दी और फिर तुरंत ट्राउजर को भी नीचे करके उतार दी। उसका गोरा जिएम डिजाइनर ट्रांसपेरेंट ब्रा पैंटी में चमक रहा था।

शीतल जानती थी की इसका बहुत ज्यादा असर वसीम पे नहीं होता है। लेकिन अब तो वा चोद चुके हैं तो शायद कुछ असर करें। वो वसीम की बाँहा में सिमट गई और बोली- "वसीम आपको मेरी कसम है की आप यहाँ से गये। अगर आप मुझे छोड़ कर गये तो अब मैं कहीं चली जाऊँगी। मैं अपनी जान दे दूँगी..."

वसीम सीधा खड़ा रहा, और बोला- "यं तुम ठीक नहीं कर रही हो शीतल। ये गलत हो रहा है...

शीतल तुरंत बोली- "कुछ गलत नहीं हो रहा है। वसीम मैनें आपसे शादी की है। आपने मेरी माँग में सिंदूर भरा है। ये मंगलसूत्र आपने पहनाया है मुझे। मैं आपको ऐसे तड़फ्ता हुआ नहीं छोड़ सकती.."

वसीम ने शीतल का चेहरा ऊपर किया और बोला- "सोच लो शीतल। क्योंकी अब फिर चाहे कुछ भी हो जाए, में पीछे नहीं हटूंगा। मेरे अरमान तुम्हें एक बार या एक रात चोदने में पूरे नहीं होंगे। बरमों की चिनगारी दबी है इस सीने में। वो सब निकालूँगा मैं। फिर तुम भी मुझे मना नहीं कर सकती, विकास या किसी और की तो बात ही अलग है....

शीतल ने तुरंत वसीम के होंठ में एक किस की और मुश्कुराती हुई बोली- "सब सोच ली हैं मेरे गाजा। जैसे अपनी नचनिया को नचाओंगे वैसे नाचूंगी। जैसे चाहो जितनी बार चाहो चोदो। जो कहना हो सब कहो। मैं कभी मना नहीं करगी..."

वसीम उसप्तं अलग होता हुआ बोला- "सिर्फ चोदूंगा ही नहीं, और भी बहुत कुछ होता है। बहुत कुछ दबा है मेरे

मन में सब करोगा। ये सोच लो शीतल शर्मा। आराम से सोच लो फिर मुझे बताना। ऐसा ना हो की बाद में तुम्हें पीछे हटना पड़े..."
 
शीतल फिर से वसीम में लिपट गई और बोली- "ऐसा कुछ नहीं होगा मेरे राजा। जो कुछ भी दबा है सब करना। सब सोच चुकी हैं। आपको अगर मुझे रोड पे चोदने का मन होगा ना तो वहाँ भी आपकी शीतल नंगी हो जाएगी। बस आप कहीं मत जाना और हमेशा मेरे बनकर रहना.."

वसीम के चेहरे पे शैतानी हँसी आ गईं। उसने शीतल के बाल को कस के खींचा और उसके चेहरे को ऊपर उठाते हए शीतल के होठों को, जीभ को पागलों की तरह चूसने लगा। शीतल दर्द सहती हुई उसका साथ देने लगी।

वसीम ने मुँह हटा लिटा और बोला- "एक बार और फाइनली सोच ले मादरचोद और बोल..."

शीतल दर्द को सहती हुई बोली- "आह्ह... हौ.. वसीम, इजारों बार सोच चुकी हैं। आप जो कहेंगे सब मंजूर है..."

वसीम ने बाल छोड़ दिए और शीतल से अलग होता हुआ बोला- "उतारो अपनी पैंटी वा और नंगी जो जाओ..."

शीतल एक सेकेंड की भी देरी नहीं की। भला वसीम से क्या शर्माना? इसी के लण्ड की तो प्यासी हैं शीतल की चूत। तुरंत ही शीतल पैटी ब्रा उतार दी और नंगी हो गई।

वसीम ने पैटी ब्रा को उठा लिया और बोला- "अब बाहर जो पैंटी वा सूखने के लिए टंगी है वो लेकर आ.."

शीतल दरवाजा खोलने लगी तो उसके हाथ कांप गये की वो इस तरह नंगी बाहर निकलेगी।

वसीम में शीतल को हिचकिचातं देखा तो हँसता हुआ टांट मारता हुआ बोला- "हो गई सारी बात... निकल गई हवा? हटो शीतल मुझे जाने दो। तुम भी खुश रहो अपने पति के साथ और मुझं भी खुश रहने दो.."

अब शीतल एक बार भी नहीं हिचकिचाई और दरवाजा खोलते हुए इसी तरह नंगी ही बाहर छत पे खुल्ले में आ गई। दोपहर का वक़्त था और छत पे चारों तरफ कमर की उंचाई तक का बाउंड्री भी किया हुआ था ही लेकिन फिर भी कोई भी देख सकता था। शीतल ने जल्दी में अपनी पैंटी ब्रा उठाई और दौड़ती हुई अंदर आ गई। शीतल ने ये बहुत बहादरी का कम किया था। शीतल को खुशी हई की वो अपनी बात में कायम रह पाई। वसीम की बात उसे तीर की तरह चुभी थी। शीतल दौड़ती हुई बाहर से आई। उसके हाथ में उसकी पैंटी और बा थी जो आज वो सूखने के लिए रखी थी। शीतल वसीम के सामने एक अच्छी बच्ची की तरह खड़ी हो गई हाथ में ब्रा पैटी आगे करके।

वसीम ने उसके हाथ से ब्रा पैंटी ले लिया और बोला- "तेरे पास जितनी भी बा पैंटी है सब लेकर आओ..."

शीतल फिर एक पल के लिए सोचने लगी।

वसीम बोला- "क्या हुआ, नहीं लाना क्या?"

शीतल बोली- "अभी, यहाँ?"

वसीम ने ही मैं सिर हिलाया।

शीतल को फिर से छत पे नंगी दौड़ना था, लेकिन वो वसीम को किसी भी तरह से मना करके गुस्सा नहीं दिलाना चाहती थी। एक बार वो छत पे नंगी जा चुकी थी और अब उसे दबारा नगी ही रस्त से होते हए नीचे जाना था और फिर वापस भी आना था। उसके मन में थोड़ा इस बात का इर तो जरूर था की कहीं कोई उसे इस हालत में देख ना लें। अभी दौड़ने की वजह से वो हौंफ रही थी और उसकी तेज सांसों की वजह से उसकी नंगी चूचियां और उसके साथ उसका मंगलसूत्र ऊपर-नीचे हो रहा था। वो एक सेकेंड में खुद को तैयार की और ऐसे ही नंगी दौड़ती हई नीचे चली गई। शीतल फिर से दौड़ती हई नीचे अपने रूम की तरफ चल दी।

वसीम उसे जाते हए देखतें रहा। तब तक वसीम एक खाली टीन के कनस्तर को स्टोररुम से निकालकर अपने रूम में कर लिया।

शीतल नंगी दौड़ती हुई नीचे आ गई। वो जल्दी से अपनी आल्मिरा खाली और अपनी पैंटी ब्रा निकाली । उसके पास लगभग 8-10 ब्रा और पैटी थी। वो सबको अलग-अलग जगह से निकाली और वापस आने लगी। सारा काम बो जल्दी-जल्दी कर रही थी तो उसकी सांस अभी भी तंज ही चल रही थी। उसकी नजर आईने में पड़ गई।

शीतल खुद को नंगी हालत में परेशान देखकर सोचने लगी- "चाहे कुछ भी हो जाए शीतल शर्मा, आज तुझे वसीम के सामने खुद को साबित करना ही है। क्योंकी अब अगर वो चला गया तो फिर तेरी चूत को कोई लण्ड नहीं मिलना है....

फिर तुरंत उसके मन से आवाज आई- "नहीं नहीं। मैं अब वसीम को जाने नहीं दे सकती। उसे मेरे पास रहना ही होगा। मुझे चोदना ही होगा.."

शीतल पैंटी ब्रा को हाथों में पकड़ी और सीदियों पे आ गई। यहाँ तक तो कोई पूरेशानी नहीं थी। इसके आगे के सफर के लिए उसे थोड़ा सोचना था। वो झौंक कर इधर-उधर देखी और जब उसे कोई नहीं दिखा तो राहत की सांस लेती हुई दौड़कर वसीम के रूम में आ गई। इस बार उसकी सांसें और तेज थी और उसके बदन पे पशीना छलक आया था जो उसके गोरे नंगे जिश्म को और नशीला बना रहा था। शीतल ने अपने दोनों हाथ वसीम के सामने कर दिए।

वसीम शीतल की वा पैटी को एक हाथ में लिए अपने लण्ड को सहला रहा था जैसे वो पहले करता था। वसीम ने सारी बा पैटी लेकर उस कनस्तर में डाल दिया और बोला- "आज सं तुझं इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें बिना पैंटी ब्रा केही देखना चाहता है- हमेशा, हर जगह। तुम्हें मंजर है ना? कोई ऐतराज तो नहीं?

शीतल भला क्या बोल पाती? शीतल सोचने लगी- "कितने प्यार से में डिजाइनर पैंटी ब्रा खरीदी थी मैं। कितनी मस्त लगती थी मैं। ठीक हैं अब जैसा करना हैं वसीम को करने दो। लेकिन बिना ब्रा के घर में रहने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन बाहर कैसे जाऊँगी?" बो परेशान हो गई लेकिन वसीम को कुछ बोल नहीं पा रही थी।

शीतल मन मसोसकर बोली "ठीक है, नहीं पहनूँगी.."

वसीम करोसिन का डब्बा उठाया और उस कनस्तर में कैरिसिन डालने लगा। ये देखकर शीतल चकित हो गई की ये तो सारी पैटी ब्रा को जलाने जा रहे हैं। वसीम माचिस उठा लिया और तीली जलाने लगा तो शीतल दौड़कर उसका हाथ पकड़ ली।

शीतल- "ये क्या कर रहे हैं आप, इसे जलाइए मत, मेरे पास रहने दीजिए। इनसे मेरी बहुत सारी यादें जुड़ी हैं आपकी। इन्हीं सब में आपने वीर्य गिराया हुआ है। इसमें वो बा पैंटी भी है जिसमें मैं आपसे पहली बार चुदवाई थी, प्लीज इसे जलाइए मत, मैं बो पहनूँगी नहीं, बस अपने पास बतौर निशानी रडूंगी."

वसीम मुश्का दिया और बोला- "अब तो मैं तुम्हारी चूत में ही वीर्य गिराता हैं तो इन्हें रखने की क्या जरुरत है? ये सुहागरात वाली निकाल लो और दो-तीन पैंटी और निकाल लो, जब पीरियड्स होंगे तब पहनना और कभी नहीं..."

शीतल ऐसे खुश हई जैसे उसकी कितनी बहुत बड़ी मुराद पूरी हो गई हो। वो तुरंत ही अपनी वो डिजाइनर रेड ब्रा पैंटी ब्राहर निकाल ली और साथ में तीन और अच्छी डिजाइनर पैटी भी। वसीम ने माचिस जलाकर उसमें गिरा दिया और शीतल की पैटी ब्रा के साथ उसकी रंडी बनने से रोकने वाले सारे बंधन भी जल पड़े। धुआँ उठने लगा

और शीतल की ब्रा पैंटी जलने लगी और फाइनली एक शर्मीली सी औरत पक्की रंडी बन गई।
 
वसीम उस कनस्तर को बाहर रख आया और वापस गम में आ गया। उसने शीतल को देखा जो नंगी खड़ी थी। एक 23 साल की नई-नई शादीशुदा हसीना उसके लिए नंगी खड़ी थी। वो शीतल के सामने आया और उसके दोनों कंधों में हाथ रखता हुआ बोला- "एक और बार सोच ला शीतल। अभी सिर्फ पैटी ब्रा ही जलाया है मैंने। ये तुम वापस भी खरीद सकती हो। अगर वापस जाना है तो अभी भी जा सकती हो। तुम ये मत सोचो की मैं सिर्फ तम्हें चोदंगा। मैं वो सब भी करेगा जो मेरा मन करेगा। तम अभी नंगी छत में आने जाने की तो इतना सोची।

और भी कई जगह नंगी होना पड़ सकता है। बहुत सारे ऐसे काम भी करने पड़ सकते हैं जो तुम सोची भी नहीं होगी। इसलिए कह रहा है की एक और बार सोच लो। शाम में विकास आए तो उससे पूछ लो, सलाह ले लो। मेरा नम्बर अब ओन हो गया है। मुझे काल कर लेना.."

शीतल तुरंत जवाब दी "विकास यहाँ नहीं है, फ्राइडे नाइट को आएगा। उसमें क्या पूछना जब करना और करवाना मुझे है तो। मुझे कुछ नहीं सोचना। आपको जैसे करना है वैसे करिए। बोल चुकी हूँ की रोड पे भी नंगी करेंगे तो हो जाऊँगी..."

तो था ही की आज से लेकर फ़ाइई तक शीतल अकॅलें है, और तब तक तो वो उसे 50 बार चोद लेना चाहता था। वो बोला- "तो इसलिए तुम तैयार हो अभी सब कुछ करने के लिए। अकेले में कुछ भी कर लेना बहुत आसान होता है। लेकिन तुम सटई और सनडे को कैसे मानोगी मेरी बात, जब विकास यही होगा तो?"

शीतल- "बोल तो चुकी हैं की विकास के सामने आपको जो जी में आएगा करिएगा। उसके सामने चोदिएगा, उसके सामने गाली दीजिएगा और में हसती हुई आपसे चुदवाऊँगी प्लीज... मेरा भरोसा करिए। अब मैं आपका साथ कभी नहीं छोड़गी..." और शीतल वसीम के गले से लग गई।

वसीम ने शीतल को खुद से अलग किया और बोला- "अगर इस बार फिर से विकास नहीं माना तो? उसने तुम्हें

भी घर से निकल दिया तो? तुम्हें छोड़ दिया ता?"

शीतल फिर से वसीम के गले लग गई और बोली- "तो मैं हमेशा-हमेशा के लिए आपके पास आ जाऊँगी। सिर्फ आपकी बन जाऊँगी। शादी तो कर ही चुकी हैं, फिर आपसे निकाह करके आपकी बीवी बन जाऊँगी। फिर कोई सकावट नहीं होगी। आप बिना किसी बंधन, इर, संकोच के अपनी मर्जी से जैसे चाहिएगा वैसे रखिएगा... ये बात शीतल के दिल में निकल रही थी। वो सच में चाहती थी की उसके और वसीम के बीच अब कोई नहीं रहें। वो पूरी तरह से वसीम की हो जाना चाहती थी, लेकिन अभी ऐसा संभव नहीं था।

वसीम ने फिर शीतल को खुद से अलग किया, और कहा- "मैं क्या रखगा तम्हें? मैं क्यों निकाह करुगा तुमसे? मुझे अगर निकाह ही करना होता तो अब तक अकेला क्यों रहता? अगर तुम ये सोचकर मेरे नजदीक आ रही जो तो मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी मदद..." कहकर वसीम थोड़ा पीछे हो गया।

शीतल एक पल के लिए सोचने लगी। उसके सिर पे वसीम के लण्ड का भूत नाच रहा था। उसके दिमाग में वसीम सं चुदवाने के अलावा और कुछ नहीं सझ रहा था। वो बोली- "ठीक है। तो भी आपको जो करना हो जैसे करना हो कीजिए। सिर्फ एक रिक्वेस्ट करूँगी की बस मेरी इज्जत का ख्याल रखिएगा। जब तक आपके काम आ पाऊँगी, आऊँगी और जब आने के काबिल नहीं रहूंगी तो कहीं गुम हो जाऊँगी.."

वसीम में शीतल को गले लगा लिया और उसके माथे पे चूमता हुआ बोला- "तुम मेरे लिए इतना कर रही हो तो भला मैं तुम्हें कुछ कैसे होने दे सकता हैं? बस आज से तुम भूल जाओं की तुम बैंक मैनेजर की बीबी जो, बस आज से मेरे लिए तुम 20 रुपये वाली रडी हो..."

शीतल खुश हो गई की फाइनली कप्तीम ने उसे अपना लिया है। वो वसीम को कस के पकड़ ली, और बोली- "रंडी तो मैं समझ गई, लेकिन 20 रुपये वाली रंडी का मतलब नहीं समझी..."

वसीम मुश्कुरा दिया और बोला- "ये रंडिया 20 रूपये में चुदवाने के लिए तैयार हो जाती हैं। फिर 5-5 रूपये देते जाओ और जो मर्जी हो करवाते जाओ। वो पैसे के लिए करती हैं, लेकिन तुम मेरी खुशी के लिए जो मेरी मर्जी होगी वो सब करोगी। मैंहगी रडियां अपने मन की करती हैं अपने रेट के अनुसार। इसलिए तुम आज से मेरी 20 रूपये वाली रंडी हो..

शीतल- "होन्न." बोलती हुई वसीम से चिपक गई।
 
वसीम शीतल के होठों को चूसने लगा और उसके नंगे बदन का सहलाने नाचने लगा। वसीम में अपना जिस्म मसलवते ही शीतल गरमा हो गई थी। इतने में ही वो गीली हो गई। खड़े-खड़े ही वो शीतल के बदन से मनचाहे तरीके से खेल रहा था। अब में हसीन बदन वसीम का मिल्कियत था। वसीम में शीतल की चूचियों को जोर से पकड़कर मसल दिया, और फिर उसकी गीली चूत में अपनी बीच बाली उंगली घुसड़ दिया। शीतल आहह.. कर दी

और वसीम मुश्कुरा दिया। उसे अदाजा था की शीतल की चूत अभी पूरी तरह गरम होगी।

वसीम ने अपने कपड़े उतार दिए। उसने शीतल का सिर पकड़कर नीचे बैठा दिया। शीतल घुटने के बल बैठकर वसीम का लण्ड चूसने लगी। वो जल्दी-जल्दी चूस रही थी और चाहती थी की वसीम का लण्ड ज्यादा से ज्यादा उसके मुह में आ जाए। शीतल अपने हाथ से भी उसके लण्ड को सहला रही थी और इसमें उसकी चूड़ियां छन छन बज रही थी।

वसीम का लण्ड टाइट होकर तना हुआ था। अचानक वसीम में शीतल के बाल को खींचा और अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। शीतल चकित होकर वसीम को देखने लगी की अब जया गुनाह हो गया? वसीम ने शीतल को देखा और शैतानी हँसी हँसते हुए कहा- "मुझे पेशाब लगी है.."

शीतल थोड़ा पीछे हो गई की वसीम बाथरूम जाएगा।

तब वसीम गुस्से में होता हुआ बोला- "डी पीछे क्यों हो गई?"

शीतल घबरा रही थी, बोली- "आप ही ने कहा ना की आपको पेशाब करना है."

वसीम उसके सामने आता हुआ बोला- "तुझं क्या लगता है मैं बाहर जाऊँगा?"

शीतल कुछ समझ नहीं पाई।

वसीम में फिर उसे कहा- "मादरचोद कुतिया रंडी , मैं यहीं पेशाब करेगा और फर्श गंदा नहीं होना चाहिए.."

शीतल तो अभी भी नहीं समझ पाई। फिर उसे लगा की सही है, वसीम नंगे है तो बाहर कैसे जाएंगे। वो कोई बर्तन देखने लगी जिसमें वसीम पेशाब कर सकें। लेकिन शीतल को कोई ऐसा गंदा बर्तन नहीं मिला। तो वो सोची की पानी पीने वाला जग ही दे देती हैं, बाद में पेशाब फेंक कर अच्छे से साफ कर दूँगी। बो उत्तजित हो गई। वो पहली बार किसी बड़े आदमी को पेशाब करते देखने वाली थी। शीतल जग लेने के लिए उठने लगी तो वसीम ने उसे रोक दिया।

वसीम अब शीतल के और सामने आ गया और शीतल को कहा- "कहाँ जा रही हो मेरी 20 रूपये वाली रंडी। मझे तुम्हारे मुँह में मूतना है और तुम्हें उसे पूरा पी जाना है। ऐसा ना हो की फर्श गंदा हो जाए..."

शीतल- "क्या? मेरे मुह में करेंगे और मुझे पीना होगा?"

वसीम ने उसे पूरी तरह से गुस्से में घरा। अब ये शीतल के लिए मुश्किल हालत थी। उसे लगा था की वो प्यार से वसीम का लण्ड अपने हाथों में पकड़कर जग में पेशाब करवाएगी और अच्छे से देखेगी की मर्द कैसे पेशाब करते हैं। वो बच्चों को देखी थी लेकिन कभी किसी बड़े आदमी के लण्ड से पेशाब निकलते नहीं देखी थी। उसने बच्चों को पेशाब करते देखा था, जो अपने हाथों में लण्ड को पकड़कर पेशाब करते थे और इसलिए वो और उत्तेजित थी की वसीम के लण्ड को वो पकड़ लेंगी और वसीम शान में खड़ा होकर जग में पेशाब करेंगा। लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा था।

लण्ड चूसना अलग बात है लेकिन पेशाब मुँह में लेना और उसे पीना तो बहुत गंदा है। शीतल वैसे भी बहुत सफाई पसंद औरत थी। ये वसीम के लण्ड का लालच था जिसकी वजह से वो लण्ड को पकड़कर जग में पेशाब करवाने वाली थी, और वसीम से किया हुआ वादा था जिसकी वजह से वो अपने हाथों से जग को उठाकर पेशाब को टायलेट में फेंक कर जग को साफ करने वाली थी। हालौकी इसके बाद वो अच्छे से नहाती।

शीतल अभी सोच ही रही थी की वसीम ने फिर से उसे डाँटते हुए कहा- "क्या हुआ रांड़, निकल गई वफादारी की हवा की जो जब जहाँ जैसे कहेंगे सब करूँगी । जा तुझसे नहीं होगा। उठ और भाग यहीं से मादरचोद। मुझे पता था की तुम जैसी रंडियां मेरे अरमान खाक पूरा करोगी, इसलिए मैं इन सबसे बच रहा था। तुझे लगा होगा की बस चुदवाकर अपनी चूत की प्यास बुझा लेनी है। मुझे क्या पता था की मेरे अरमान पूरे करने के बहाने से तू अपनी प्यास बुझा रही है। मुझे तो बा 20-30 रूपये वाली रडियां ही ठीक है की अगर उसे बोल दो की मैंह में मतना है और 100 रुपये और दंगा तो झट से मान जाती है। भाग यहाँ से कतिया की बच्ची.."
 
शीतल को बहुत बुरा लगा की उसकी बफादारी पेशक किया जा रहा है। वसीम ने उसे अंदर तक नंगी कर दिया था और बात उसके ईगों को बर्दास्त नहीं हुई। सही बात है, वसीम ने तो मुझे पहले ही वार्निंग दे दी थी। मैं अब इन्हें मना नहीं कर सकती। इनके मन में ता सेक्स से जड़ा कोई भी ख्याल आ सकता है। तो क्या अब मुझे ये सब करना होगा। छोः मैं पेशाब पिगी अब? है भगवान... ये कैसी पूरीक्षा है? कोई बात नहीं शीतल, पूरीक्षा ही समझ लें और शुरू हो जा। कोई अच्छी चीज आसानी से थोड़ी मिलती है। वसीम से चुदवाने के लिए ये सब करना होगा। अब तू पीछे नहीं हट सकती। वसीम की मदद करना चाह रही है तो किसी भी कीमत पे करना होगा और तू इसलिए ये सब कर रही है नहीं तो त एक सीधी शरीफ और पतिक्ता औरत है।

शीतल अपने हाथ से वसीम का लण्ड पकड़कर अपने मुंह में डाल ली और बोली- "ठीक है, मुझे मालूम नहीं था की आप मेरे मुँह में पेशाब करना चाहते हैं। कीजिए पेशाब। मैं जो प्रामिस की हैं वो हर हाल में निभाऊँगी। पिलाइए मुझे अपना पैशाब..." और शीतल मुँह खोलकर वसीम के मतने का इंतजार करने लगी।

वसीम अंदर से तो खुश हो गया की तीर निशाने पे लगा, लेकिन वो बहुत टीठ था। उसने अपने लण्ड को बाहर निकाल लिया और बोला- "ना, तुझसे नहीं होगा, मेरी गलती थी और अब से नहीं होगी। तू जा और जितने की तेरे पैंटी ब्रा मैंने जलवाइ उन सबके पैसे ले ले..."

शीतल को और बुरा लगा। शीतल फिर से आगे बढ़ी और वसीम के लण्ड को हाथ से पकड़कर मैंह में सटा ली और बोली "नहीं वसीम, अब नहीं होगा, आप पेशाब करिए, चाहे जो करिए अब मैं कभी मना नहीं करूँगी । बस इस बार माफ कर दीजिए... और वो वसीम के लण्ड में हाथ आगे-पीछे करने लगी और मह में ले लो।

शीतल का मुँह पूरा खुला था और वो वसीम के द्वारा अपने मुँह में मते जाने का इंतजार करने लगी। शीतल आँखें बंद करके मुह पूरा खोलकर तैयार थी उस चीज को अपने गले से पेट में उतारने के लिए जो बहुत गंदी चीज था उसके लिए। वो इस तरह की औरत थी जो बचपन से बाथरूम जाने में पैर धोकर बाहर आती थी और उसे सफाई बहुत पसंद थी।

वसीम भी अब शीतल के मुह में मूतने के लिए तैयार हो गया। वो बहुत उत्तेजित और खुश था की एक पदी लिखी जवान हसीन औरत के मुंह में मतने वाला है। वसीम ने एक हाथ से शीतल के बाल को पकड़ा और दूसरे हाथ से अपने लण्ड को और शीतल के मुँह में सामने रखते हुए उसने पेशाब करना शुरू कर दिया।

पहली तेज धार सीधे शीतल के गले से टकराई और शीतल हड़बड़ा गई और जब तक वो खुद को सम्हालती वसीम का पेशाब सीधा उसके पेट में चला गया। जब तक शीतल उसे रोकती तब तक और पेशाब उसके मुंह में भर गया था। शीतल अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और उसे उबकाई आने वाली थी।

वसीम ने अपने पेशाब का रोक लिया और उसकी नाक को बंद करता हुआ बोला- "पी जा हरामजादी रंडी...

शीतल नाक बंद करने से छटपटाने लगी और सांस लेने के लिए उसे पूरे पेशाब का गटकना पड़ा।

वसीम हँसते हए उसकी नाक को छोड़ दिया और बोला- "बोल बनेंगी मेरी रंडी? कैसा लगा मत पीकर रांड?"

शीतल खुद का चार-पाँच सेकंड में अइजस्ट की और वो कुछ बोलना चाह रही थी लेकिन वो मुँह से बोल नहीं पाई, वो हौंफने लगी थी। शीतल को खुशी थी की जैसे भी हो लेकिन वसीम के पेशाब को मैं पी ली। शीतल अब रुकना नहीं चाहती थी। वा बस ही में सिर हिलाई और अपना मुंह खोल दी।
 
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