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Adultery Chudasi (चुदासी )

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रामू ने मुझे सोफे पर से खड़े होते हुये देखा तो वो अंदर चला गया। मेरे अंदर जाते ही उसने मेरा हाथ पकड़कर उसकी चड्डी पर के उभरे भाग पर रखवा दिया। वहां हाथ रखते ही मुझे मालूम पड़ गया की वो चूत के अंदर जाने के लिए बिल्कुल तैयार है, और जो थोड़ी बहुत कमी थी वो मेरे हाथ के दबाव ने पूरी कर दी, उसका लण्ड झटके मारने लगा।

मैंने उसे शरारत से बिल्कुल धीमी आवाज में कहा- “कहीं ये तुम्हारी चड्डी फाड़कर बाहर न निकल जाए?”

रामू- “आपकी चूत उसे नहीं मिली तो वो क्या-क्या फाड़ देगा, वो तो मैं भी नहीं जानता। मेमसाब, आप साहेब को ऊपर भेज दो ना, मैं जल्दी-जल्दी कर लूंगा आप फिर ऊपर चली जाना...” रामू ने अपना मुँह मेरे मुँह के नजदीक लाकर कहा।

रामू के लण्ड को छूने के बाद मेरी वासना भी जाग गई थी, मेरी चूत रोने लगी थी और मुझसे कह रही थी

जब तक मुझे इंडे से मारोगे नहीं तब तक मैं चुप नहीं रहूंगी, रोती ही रहूंगी...”

मैंने रामू को धीमी आवाज में कहा- “मुझे छोड़ो और अपना काम जल्दी से निपटाओ, मैं कुछ करती हूँ..”

रामू- “सच ना?” कहते हुये रामू ने मेरा हाथ छोड़ दिया।

मैं कोई जवाब दिए बगैर बाहर निकल गई। मैं सोच रही थी क्यों नहीं करूंगी कुछ? अब तो मैं चुदासी बन चुकी हूँ, चुदवाने के लिए कुछ भी कर सकती हूँ। मैं बाहर आकर नीरव के बाजू में थोड़ी जगह थी वहां बैठ गई और उसके बालों को सहलाने लगी। मैंने देखा की रामू अब अपना काम जल्दी से निपटा रहा था।

मैंने कहा- “नीरव मैं थक चुकी हैं, थोड़ी देर सोना चाहती हूँ। तुम जाओ, मैं बाद में आऊँगी...”

नीरव- “ओके, जैसी मेडम की मर्जी, सोना है तो सो जाओ..” नीरव ने कहा।

मैंने रामू की तरफ देखा, हमारी नजरें मिली तो वो अपने लण्ड को चड्डी में अडजेस्ट (वहां कुछ ज्यादा ही उभरा हुवा दिख रहा था) करने लगा जो देखकर मुझे हँसी आ रही थी पर मैंने दबा दी।

नीरव- “पर मेडम हम भी आपके साथ सो जाएंगे और जब आप ऊपर जाएंगी तभी हम ऊपर जाएंगे..." नीरव ने पहले शायद अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी जो पूरी की।

नीरव की बात सुनते ही मेरा और रामू का चेहरा उतर गया और उसके बाद रामू काम निपटाकर निकल गया।

रामू को बाहर जाते देखकर नीरव बोला- “ये अभी घर में ही था?"

मैंने कहा- “हाँ, क्यों?”

नीरव- “मैंने उसके सामने तेरे साथ सोने की बात की, क्या सोचेगा मेरे बारे में?” नीरव ने कहा।

मैं कुछ बोली नहीं, सिर्फ मुश्कुराई की तेरे बारे में नहीं सोचेगा, मेरे बारे में सोचेगा की मेमसाब कब सोने आएंगी मेरे साथ? थोड़ी देर बाद मैंने नीरव से कहा- “चलो ऊपर चलते हैं, थकान तो कल भी उतर जाएगी, पतंग उड़ाने को कल नहीं मिलेगा..."

नीरव- “मुझे मालूम था कि थोड़ी ही देर में तुम ऐसा ही कहोगी.” नीरव ने कहा।

मैं- “क्यों ऐसा कहते हो?” मैंने पूछा।

नीरव- “वो तुम्हें पतंग का शौक इतना है ना, चलो अब छत पे चलते हैं..” नीरव ने कहा।

थोड़ी देर बाद नीरव के पतंग ने 3 पतंगें काट दिए थे, हमारी छत पर से सब थोड़ी-थोड़ी देर में- “कयपो छे..” की आवाज लगा रहे थे, सारे लोग पूरा एंजाय कर रहे थे। छत पर जितने लोग थे सबका ध्यान हम पर था और मेरा ध्यान रामू की तरफ था। मेरे तन, मन में वासना की आग लगी थी, मैं उसके नीचे पिसने के लिए तड़प रही थी, तभी मेरे दिमाग में एक खयाल आया।

मैंने मेरा मोबाइल निकाला और कान पे लगाकर- हेलो...” कहा। मैं चाहती थी कि नीरव देखे, पर वो अपनी मस्ती में मसगूल था तो मैंने और जोर-जोर से- “हेलो, हेलो...” कहा।
 
तब नीरव का ध्यान मेरी तरफ गया। उसने पूछा- “किसका है?”

मैं- “मेरी फ्रेंड का है...” कहकर मैंने फिरकी जमीन पर रखी और साइड में हो गई। थोड़ी देर तक मैं साइड में जाकर मेरे मोबाइल पे ऐसे ही बात करती रही और फिर मैंने नीरव के पास आकर फिरकी उठाकर कहा- “मेरी फ्रेंड का काल था, वो मुझे साड़ी देखने शाप पे बुला रही है, ना बोला तो उसे बुरा लग गया और काल काट दी तुम कहो तो मैं जाऊँ?”

नीरव- “आज के दिन कौन सी शाप खुली होगी?” नीरव ने पूछा तो मुझे लगा की गई भैंस पानी में।

तभी एक अंकल जो हमारी बात ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने कहा- “कपड़े की दुकान त्योहार के दिन खुली रहती ही है, उनको आज ज्यादा ग्राहकी रहती है...”

अंकल की बात सुनकर नीरव ने लगभग चिढ़ते हुये कहा- “जाओ, जाकर आओ पर आधे घंटे में आ जाना, नहीं तो मैं नीचे उतर जाऊँगा और आज तो फिर ऊपर नहीं आऊँगा...”

मैंने जिस अंकल ने हमारी बात सुनकर बीच में बोला था, उन्हीं के हाथ में फिरकी पकड़ा दी और छत से नीचे उतरने लगी। छत से बाहर निकलते हुये मैंने पीछे मुड़कर नीरव पे नजर डाली, तो नीरव घड़ी देख रहा था। मैंने मुँह फेर लिया और में 8वें फ्लोर पे आई लिफ्ट के लिए (हमारी बिल्डिंग 8 फ्लोर की है) तो मैंने देखा की लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पे थी। मैं सीढ़ियां उतरने लगी, क्योंकि मैं लिफ्ट खीचें और अंदर बैठें तब तक तो नीचे भी पहुँच । जाऊँगी। मैंने जीन्स पहना था इसलिए जल्दी-जल्दी सीढ़ी उतर नहीं पा रही थी, ऊपर टाप पहना था और अंदर से ऊपर-नीचे दोनों जगहें नंगी थी।

मैंने सोचा था की मैं रामू को घर पे बुला लँगी पर जिस तरह से मैंने नीरव को समय चेक करते देखा, मुझे डर लगा की कहीं वो सच में 30 मिनट में नीचे आ न धमके। मैं जहां तक जानती थी कि जब वो एक बार पतंग चढ़ाना चालू करे उसके बाद वो नीचे आने वाला नहीं था। पर आज मुझे किसी तरह का रिस्क लेना ठीक नहीं लग रहा था।

मुझे अब रामू के रूम में जाना था। मुझे याद आया की रामू चाहे कितनी भी देर कर दे तो भी मैं कभी उसे काम के लिए बुलाने उसके रूम के पास भी नहीं जाती थी, पर आज मैं हर रोज से अलग किश्म के काम के लिए उसके पास जा रही थी। आज तो मैं उसके रूम के अंदर जाकर उसके साथ सोने वाली थी। मैंने रामू के रूम में जाकर धीरे से दरवाजा खटखटाया।

अंदर से रामू की आवाज आई- “आ जाओ मेमसाब, दरवाजा खुला है...”

मैं दरवाजा खोलकर अंदर गई, वो खटिया पे सिर्फ चड्डी में लेटा हुवा था। मैंने दरवाजा भिड़ाकर स्टापर लगाई और मैंने चौतरफा रूम में नजर घुमाई, एक खटिया, ऊपर पुराना पंखा जो किचुड़-किचुड़ की आवाज के साथ चल रहा था, एक तरफ पुरानी ट्यूबलाइट लगाई हुई थी जो कम उजाले के करण इस वक़्त भी जल रही थी, एक

लोकांड की बैग, पानी की मटकी, बीच में एक डोरी बँधी हुई थी जिस पर कुछ कपड़े लटके हुये थे, बाल्टी, टब और साबुन चौकड़ी बनाई हुई थी वहां थे, और कुछ बरतन और स्टोव भी थी, दीवालों पे पानी जम रहा था और कहीं-कहीं तो प्लास्टर निकल गया था और पूरे रूम में उजाला और हवा के लिए ऊपर एक रोशनदान ही था, रूम की हवा में अलग प्रकार की बदबू आ रही थी, जिसे मैंने दो बार बाहर सांसे निकालकर कम की। मैं रामू के पास

गई।

रामू ने मेरे हाथ को पकड़कर मुझे खींचा और बोला- “मैं जानता था कि आप जरूर आएंगी...”

मैं उसके बाजू में खटिया पे बैठ गई और उसके सीने को सहलाने लगी। रामू मेरे होंठों को उंगली से सहलाने लगा। मैंने मुँह खोला तो उसने मेरे मुँह में उंगली डाल दी। मैंने पहले तो उंगली को काट लिया और फिर उसे । चूसने लगी। मैंने उसकी चड्डी में हाथ डाल दिया और उसके लण्ड को पकड़ लिया। रामू ने मेरे टाप में हाथ डाल दिया और मेरी नंगी चूचियां पकड़कर धीरे-धीरे दबाते हुये सहलाना शुरू कर दिया। मैंने उसके लण्ड के सुपाड़े को पकड़कर जोर से नाखून मारा तो रामू के मुँह से सिसकारी निकल गई और उस वक़्त उसने मेरी चूची जोर से दबा डाली जिससे मैं दर्द से सीत्कार उठी।
 
मैं- “रामू समय कम है थोड़ा जल्दी करना है...” मैंने सुपाड़े पे जो छेद होता है उस पर उंगली से दबाव डालते हुये कहा।

मेरी बात सुनकर रामू ने मेरी निप्पल को दो उंगली के बीच लेकर दबाते हुये कहा- “मेमसाब, साहब ने कभी आपको खड़े-खड़े चोदा है?”

मैं क्या बोलूं? उसे ये तो नहीं बता सकती थी की साहब खड़े-खड़े क्या लेटकर भी नहीं चोदते, मैंने मेरा सिर हिलाकर 'ना' बोला।

राम्- “तो जल्दी से मेमसाब आप अपने कपड़े निकालिये और वो दीवार से सटकर खड़ी हो जाइए..." रामू ने उठते हुये कहा।

मैं भी खड़ी हो गई और मेरी टाप मैंने निकाल दी। रामू मुझे ही देख रहा था, उसकी चड्डी निकालने में उसे कहां वक़्त लगने वाला था। मैंने मेरी जीन्स का बटन और चैन खोला।

जैसे मैं जीन्स नीचे करने गई तो रामू ने मुझे रोक लिया- “बस इतना ही मेमसाब..” और उसने मुझे दीवार से सटा दिया और झुक कर मेरी चूचियों को चूसने लगा।

मेरे बदन में वासना की आग और भड़क उठी और मैं उसके बालों को सहलाने लगी। बीच-बीच में रामू मेरी । निप्पलों को धीरे से काट लेता था, जिससे मैं और मचल उठती थी। साथ में रामू ने उसका हाथ मेरी जीन्स के अंदर डालकर मेरी चूत को उसकी उंगली से सहलाना चालू कर दिया। मैंने भी फिर से मेरा हाथ उसकी चड्डी में सरका दिया और उसके लण्ड से खेलने लगी। रामू ने अब मेरी चूचियो को छोड़ दिया, और मेरे सामने देखा तो मैंने मुश्कुरा दिया। वो मुझे किस करने लगा, और साथ में मेरी चूत में उंगली से दबाव बढ़ाने लगा। मैंने भी मेरा हाथ थोड़ा और नीचे किया और उसके टट्टे पकड़ लिए, जिससे रामू का लण्ड झटके मारने लगा।

रामू मेरे दोनों होंठों को बारी-बारी चूस रहा था और साथ में कभी कभार अपनी जबान बाहर निकालकर होंठों को चाट भी लेता था। रामू ने मेरी जीन्स को थोड़ा नीचे किया और फिर उसने अपने पैर को ऊपर करके जीन्स को मेरे घुटने तक कर दिया। मैंने भी मेरी उंगलियां उसकी चड्डी में फँसाई, थोड़ी नीचे सरकी तो मेरे पैर की उंगलियों से पकड़कर नीचे कर दी।

रामू ने झुक के मेरी नाभि पे पप्पी ले ली और झुक के मेरी चूत पे एक और पप्पी ली।

मैं सिहर उठी, मेरी चूत में से पानी बहने लगा तभी मुझे समय का खयाल आया। मैंने कहा- “ये मत करो रामू, समय नहीं है हमारे पास...”
 
रामू ने झुक के मेरी नाभि पे पप्पी ले ली और झुक के मेरी चूत पे एक और पप्पी ली।

मैं सिहर उठी, मेरी चूत में से पानी बहने लगा तभी मुझे समय का खयाल आया। मैंने कहा- “ये मत करो रामू, समय नहीं है हमारे पास...”

रामू कुछ बोले बगैर खड़ा हो गया पर उसका चेहरा ऐसे हो गया था, मानो मैंने उसके पास से कुछ खींच लिया हो। रामू मेरी चूत पर लण्ड रगड़ने लगा। उसने फिर से मुझे किस करना शुरू कर दिया इस बार मैं भी उसके होंठों को चूसने लगी थी।

रामू- “एक मिनट मेमसाब...” कहते हुये रामू मुझसे अलग हुवा और खटिया खींचकर मेरी दाईं तरफ रख दी, रामू ने मेरी एक टांग उठाई और खटिया के ऊपर रखवा दी, जिससे मुझे अहसास हुवा की मेरी चूत ज्यादा फैल गई होगी। अब रामू ने अपना लण्ड मेरी चूत पे टिकाया और एक ही झटके में पूरा अंदर घुसेड़ दिया।

मैं चीखते-चीखते रह गई और फिर थोड़ा संभल के उसे चिकोटी काट ली- “इतनी जोर से कोई डालता है क्या?”

रामू- “जन्नत में जाने को मिल रहा हो तब धीरे-धीरे जाने वाला चूतिया होता है...” और रामू ने लण्ड को आगेपीछे करना शुरू कर दिया था।

अब रामू ने फिर से मुझे किस करना शुरू कर दिया था और साथ में मैंने भी। उसकी छाती से मेरी चूचियां दब रही थीं। उसके हर फटके के साथ मेरी गाण्ड दीवार से सट जाती थी और मैं फिर से आगे लेती थी, तो वो फिर फटका मारता था और मेरी गाण्ड फिर से दीवार से सट जाती थी। रामू ने अपनी जबान बाहर निकाली और मैंने वो होंठों के बीच ले ली और चूसने लगी। रामू के लण्ड की सख्ती बढ़ गई। रामू के मुँह से थूक मेरे मुँह में आ रहा था।

मैंने भी अपनी जबान बाहर निकाली और उसकी जबान से लड़ाने लगी। खटिया पे जो मेरा पैर था वो अब दर्द करने लगा था। रामू ने अपने हाथ से मेरी कमर पकड़ी ना होती तो शायद में बैठ जाती, रामू के हर फटके के साथ मैं अब सिसकने लगी थी। रामू भी जोर से आहें भर रहा था, उसके शरीर से पशीना पानी की तरह बह रहा था, जिससे वो मेरे बदन पे चिपक जाता था और साथ में मेरा बदन उसके पसीने से गीला हो रहा था, फर्श भी उसके पसीने से गीली हो गई थी।

रामू मेरी जबान को जैसे ही अपनी जबान से लड़ाने लगा तो मैंने मेरी जबान को अंदर खींच लिया। तब उसने भी मेरे मुँह में उसकी जबान डाल दी और हम एक दूसरे की जबान से जबान घिसने लगे। फिर रामू ने वही किया जो मैंने किया था। इस बार मैंने अपनी जबान उसके मुँह में डाल दी, फिर तो हमें इस खेल में मजा आने लगा। बारी-बारी हम दोनों एक दूसरे के मुँह में जबान डालकर जबान लड़ाते रहे। रामू ने उसकी स्पीड बढ़ा दी थी, वो तेजी से मेरी चुदाई कर रहा था। हमारी सांसें फूल रही थी, मुझे लग रहा था की पतंग की जगह, मैं आसमान में उड़ रही हूँ।
 
तभी मोबाइल में रिंग बाजी, मोबाइल जीन्स के पाकेट में थी और वो दिख रहा था। रामू ने झुक के मोबाइल लिया और मेरे हाथ में दे दिया, और फिर से चुदाई में जुट गया। मैंने स्क्रीन पे नजर डाली तो नीरव की काल

थी। मैं डर गई, पूरी रिंग खतम हो गई पर मैंने काल नहीं लिया। चंद सेकेंड में तुरंत रिंग बजने लगी। इस बार मुझे अलग डर लगने लगा की ये रिंग की आवाज रूम के बाहर भी जाती होगी तो कोई सुन भी सकता है और किसी का ध्यान रूम की तरफ जा सकता है।

मैंने काल उठाई और कहा- “मैं आ रही हूँ 5 मिनट में..” इतना कहकर नीरव कुछ समझे सोचे उसके पहले काल काट दी, और रामू को कहा- “जल्दी कर..."

मेरी बात सुनकर रामू ने एक हाथ कमर से हटाकर मेरी चूचियां पकड़ ली और उसे दबाने लगा और दूसरा हाथ कमर से चूतड़ों तक नीचे किया और मेरे चूतड़ों को पकड़कर एक उंगली गाण्ड में डाल दी और गाण्ड को चोदने लगा। रामू अब मुझे दोनों तरफ से चोदने लगा। चूत को लण्ड से, गाण्ड को उंगली से, साथ में दूसरे हाथ से । चूचियां दबा रहा था और ऊपर हम एक दूसरे को किस करते हुये जबान लड़ा रहे थे। मेरी उत्तेजना अब चरम सीमा पे पहुँच गई थी, और शायद रामू भी ये सब एक साथ इसलिए कर रहा था की वो भी जल्दी झड़ना चाहता था और थोड़ी ही देर बाद वही हुवा जो हर रोज होता था।

आज फर्क इतना पड़ा की मैं और रामू एक साथ झड़े। झड़ते हुये रामू का वीर्य छूटा जो मेरी चूत में गया और रामू के लण्ड बाहर निकालने के बाद नीचे टपकने लगा, जिससे मेरी जीन्स खराब हो गई।

रामू के हटते ही मैं खटिया में लेट गई, मेरे पाँव में जो दर्द हो रहा था उसे तब थोड़ा आराम मिला, रामू भी फर्श पे बैठ गया था। थोड़ी देर बाद मैं उठी और डोरी पर से एक कपड़ा लिया और उससे जीन्स पर पड़ा वीर्य पुंछा ।

और बाद में जीन्स के पाकेट में से रुमाल निकालकर शरीर को पोंछना चालू किया। पर उससे इतना पशीना कहां पोंछने वाला था। रामू खड़ा हवा और डोरी पर से तौलिया लेकर मेरा बदन पोंछने लगा। बाद में मैंने जल्दी सेकपड़े पहने और फिर रूम में से बाहर निकल गई।
 
रामू के हटते ही मैं खटिया में लेट गई, मेरे पाँव में जो दर्द हो रहा था उसे तब थोड़ा आराम मिला, रामू भी फर्श पे बैठ गया था। थोड़ी देर बाद मैं उठी और डोरी पर से एक कपड़ा लिया और उससे जीन्स पर पड़ा वीर्य पुंछा ।

और बाद में जीन्स के पाकेट में से रुमाल निकालकर शरीर को पोंछना चालू किया। पर उससे इतना पशीना कहां पोंछने वाला था। रामू खड़ा हवा और डोरी पर से तौलिया लेकर मेरा बदन पोंछने लगा। बाद में मैंने जल्दी सेकपड़े पहने और फिर रूम में से बाहर निकल गई।

पहले मैं घर गई, मुँह धोया और टाप बदली, हल्का सा मेकप किया, बाल बनाकर छत पे जाने के लिए तैयार हो गई।

छत पर नीरव के पास पहुँचते ही नीरव ने मुझसे कहा- “12 मिनट लेट हो गई निशु तुम...”

मैं- “वो तुम्हारे कारण...” मैंने अंकल के हाथ से फिरकी लेते हुये कहा।

नीरव- “मेरे कारण, मैंने क्या किया?” नीरव ने चौंकते हुये पूछा।

मैं जब छत पे आ रही थी तब मुझे खयाल आया की मुझे जीन्स बदलना था और जल्दी-जल्दी में मैंने टाप बदल लिया। पहले तो मैंने सोचा की वापस जाकर बदल लेती हूँ, पर तभी मेरे दिमाग में ये खयाल आया की मैं नीरव पे ही सारा दोष थोप देती हूँ तो वो और किसी भी बात पे सवाल नहीं करेगा।

मैं- “तुम्हारा मोबाइल आया तब मैं वापस ही आ रही थी, मैंने अक्टिवा चलाते हुये मोबाइल निकाला और तुमसे बात करके जैसे ही काटा तभी बीच में कुत्ता आ गया, एक हाथ से चला रही थी तो बेलेंस नहीं रहा और स्लिप हो गई..” मैंने कहा।

नीरव- “कहीं लगा तो नहीं ना?” नीरव ने पूछा।

मैं- “लगा तो नहीं, पर कपड़े खराब हो गये, टाप ज्यादा बिगड़ गया था तो बदलकर भी आई..” मैंने कहा।

नीरव- “सारी, पर तुम्हें अक्टिवा रोक के मोबाइल निकालना चाहिए ना..." नीरव ने कहा।

मैं- “कैसे रोकती, तुमने जल्दी आने को कहा था ना...” मैंने प्यार जताते हुये कहा।

नीरव- “लगा नहीं इसलिए टेन्शन नहीं, तुम्हें पतंग चढ़ाना है?" नीरव ने पूछा।

मैं- “नहीं, मैं फिरकी पकड़ती हूँ..” मैंने कहा। मैंने नीरव से जो बहाना निकाला उससे ये हुवा की नीरव ने मुझे और कुछ पूछा ही नहीं, नहीं तो न जाने क्या-क्या पूछता, इतनी देर क्यों हुई? वो तुम्हारी फ्रेंड कौन थी? साड़ी पसंद आई की नहीं? कौन सी शाप से ली और भी कितने सवाल पूछता।।

तभी आवाज आई- “कयपो छे..." तो मैंने आसमान के तरफ नजर की।

हवा अच्छी थी जिसकी वजह से पतंग उड़ाने वालों को मजा आ रहा था। मुझे पप्पू का खयाल आया तो मैंने बाजू की छत की पानी की टंकी पे नजर डाली कि पप्पू कहीं दिख रहा है की नहीं? वो नहीं था, शायद वो चला गया होगा।

मैंने फिर से ऊपर हमारी पतंग की तरफ देखते हुये नीरव को पूछा- “मैं गई उसके बाद कितनी पतंग काटी नीरव.."

नीरव- “6 पतंग काटी, एक हमारी भी गई...” नीरव ने कहा।

तभी मेरा ध्यान पप्पू की तरफ गया, वो फिर से टंकी पे आकर बैठा हुवा था। उसका ध्यान मुझ पर ही था, मैं उसे देखकर मुश्कुराई तो वो भी मुश्कुराया। वो सच में बहुत ही क्यूट था, कोई सिर्फ उसका चेहरा देखकर उसे लड़की भी समझ सकता है, इतना क्यूट था वो।

मैंने नीरव से कहा- “वो पप्पू बेचारा उसके मामू की वजह से ऐसे ही बैठा है, तुम उसके मामा को कहो की उसे पतंग उड़ाने दे...”

नीरव- “सही बात है निशु तुम्हारी, कहता हूँ..” इतना कहकर नीरव ने पप्पू को कहा- “तेरे मामा को बुला...”
 
पप्पू ने तुरंत उसके मामा को बुलाया। उन्होंने आकर नीरव के सामने सवालिया नजरों से देखा।

नीरव- “मनसुख भाई हम तो मजाक कर रहे थे, इसमें इतना सीरियस लेना जरूरी नहीं, पप्पू को पतंग उड़ाने दो..." नीरव ने समझाते हुये कहा।

मनसुख- "नीरव भाई, मैंने बोला है तो पप्पू यहां से तो पतंग नहीं चढ़ाएगा...”

मनसुख भाई अभी भी अपनी बात पे कायम थे, वो अपनी बात छोड़ना नहीं चाहते थे।

नीरव- “क्या मनसुख भाई, आप भी एक काम करो कि पप्पू को यहां भेज दो वो हमारे साथ पतंग चढ़ाएगा...” नीरव ने कहा।

मनसुख- “मान गये नीरव साहब आपको, दरियादिल हैं आप तो, जा पप्पू बेटा नीरव अंकल के साथ पतंग उड़ा...” मनसुख भाई की बात सुनकर पप्पू तुरंत वहां दिखना बंद हो गया, और दो मिनट में हमारी छत पर प्रगट हो। गया।

पप्पू ने आते ही नीरव से हाथ मिलाया और कहा- “बैंक्स अंकल, आपने मुझे पतंग उड़ाने बुलाया, मैं तो बोर हो गया था...”

नीरव- “बैंक्स मुझे नहीं आंटी को बोल, उसके कहने पे तुझे बुलाया..” नीरव ने कहा तो पप्पू ने मेरी तरफ देखकर स्माइल की और फिर नीरव से बातें करने लगा।

पप्पू- “अंकल, आपको भी मेरी तरह पतंग उड़ाने का काफी शौक लगता है..” पप्पू ने पूछा।

नीरव- “हाँ, शौक तो है, पर तेरे जैसा अच्छा आता नहीं...” नीरव ने कहा।

पप्पू- “आपको सीखना है?” पप्पू ने पूछा।

नीरव- "क्यों नहीं, लो डोरी तुम ले लो...” नीरव ने पप्पू के हाथ में डोरी देते हुये कहा।

फिर तो वो दोनों एक दूसरे में इतना मसगूल हो गये की मैं उनके साथ हूँ, ये भी वो भूल गये। मैं पीछे खड़ी उनकी बातें सुन रही थी पर दोनों में से कोई मेरी तरफ देख भी नहीं रहा था। एक-दो बार मैंने उनकी बात में इंटरेस्ट दिखाया तो पप्पू ने बात को टाल दिया। उसका ये रवैया मेरी समझ में नहीं आ रहा था। मैं पप्पू को ध्यान से देखने लगी की वो ऐसा क्यों कर रहा है?

बहुत देखने और सोचने के बाद मुझे लगा की शायद वो मुझसे शर्मा रहा है, वैसे उसकी उमर के ज्यादातर लड़के लड़कियां एक दूसरे से शर्माते ही हैं। मैं भी उसकी उम्र की थी तब कितना शर्माती थी, मैं कभी किसी लड़के के सामने आँख उठाकर भी नहीं देखती थी। मुझे पप्पू बहुत अच्छा लग रहा था, उससे प्यार करने को मन करता । था। पर इतना शर्मीला लड़का सामने से कुछ करने को तो क्या बोलने वाला भी नहीं था, और वो जिस तरह मुझे नजर-अंदाज कर रहा था उससे मुझे जलन हो रही थी।
 
बहुत देखने और सोचने के बाद मुझे लगा की शायद वो मुझसे शर्मा रहा है, वैसे उसकी उमर के ज्यादातर लड़के लड़कियां एक दूसरे से शर्माते ही हैं। मैं भी उसकी उम्र की थी तब कितना शर्माती थी, मैं कभी किसी लड़के के सामने आँख उठाकर भी नहीं देखती थी। मुझे पप्पू बहुत अच्छा लग रहा था, उससे प्यार करने को मन करता । था। पर इतना शर्मीला लड़का सामने से कुछ करने को तो क्या बोलने वाला भी नहीं था, और वो जिस तरह मुझे नजर-अंदाज कर रहा था उससे मुझे जलन हो रही थी।

अब पप्पू की जगह मैं बोर हो चुकी थी। मैं उसके साथ बातें करना चाहती थी इसलिए मैंने उसे यहां बुलाया था, पर वो तो यहां आकर मेरी तरफ नजर भी नहीं कर रहा था। 6:00 बज गये थे, अंधेरा हो चुका था, मैंने नीरव को कहा- “चलो अब नीचे चलते हैं, नीरव..” मैंने नीरव से कहा।

पप्पू- “थोड़ी देर रुकते हैं ना, आंटी...” पप्पू ने पहली बार मुझसे बात की।

मैं- “नहीं मुझे जाना है..” मैंने कहा।

नीरव- “रुक ना निशु, पप्पू कह रहा है तो थोड़ी देर रुकते हैं..” दोनों में शायद दोस्ती अच्छी हो गई थी।

मैं- “मुझे नहीं ठहरना, तुम दोनों रुक जाओ, मैं जाती हूँ..” कहते हुये मैंने फिरकी जमीन पर फेंकी, और छत से बाहर निकल गई। घर पे जाकर मैंने पोहा बनाया, एकाध घंटे बाद नीरव आया और साथ में पप्पू भी था।

नीरव- “पप्पू भी हमारे साथ खाना खाएगा निशु..” नीरव ने कहा।

पप्पू इतना पसंद था मुझे, फिर भी वो यहां आया ये मुझे अच्छा नहीं लगा। क्योंकि वो जिस तरह से मुझे । नजर-अंदाज कर रहा था वो मेरे लिए सहन करना मुश्किल था। खाना खाने के बाद वो बातें करने बैठा रहा, मैं तो थोड़ी ही देर में अंदर जाकर सो गई। न जाने वो कब गया और कितनी देर तक रहा।।

सुबह गोपाल चाचा से दूध लेने के बाद मैं हर रोज की तरह फिर से सो गई।

और तब उठी जब मुझे नीरव ने जगाया- “निशु 9:00 बज गये यार...”

नीरव की बात सुनकर मैं जल्दी से उठी और फटाफट चाय-नाश्ता बनाया। तब तक नीरव नहाकर तैयार होकर आ गया, फिर हम दोनों ने साथ मिलकर चाय-नाश्ता किया, तब तक तो 9:30 बज गये। नीरव के निकलते ही मैं जल्दी से रसोई की तैयारी करने लगी, नहाने का पोग्राम दोपहर को रखा क्योंकी इतना समय नहीं था मेरे पास। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की पर शंकर आया तब तक पूरी रसोई तैयार नहीं हुई थी।

मैं- “शंकर 5 मिनट ठहरो, सिर्फ रोटियां बाकी हैं..” इतना कहकर मैं जल्दी-जल्दी में दरवाजा खुल्ला छोड़कर अंदर चली गई। रोटियां बनाकर मैंने टिफिन भरा और बाहर गई।

देखा तो शंकर मेनडोर बंद करके खड़ा था, मैं उसका इरादा तो पहले से जानती थी फिर भी मैंने अंजान होकर पूछा- “दरवाजा क्यों बंद किया? ले ये टिफिन तैयार है...”
 
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