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Adultery Chudasi (चुदासी )

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माधो चन्दा के पास गया और अपना हाथ ऊपर करके इंडा उठाया, डर के मारे चन्दा के साथ-साथ मैंने भी अपनी आँखें बंद कर ली।

पापा, पापा, छोड़ दो मम्मी को..” बच्चों की आवाज सुनकर मैंने मेरी आँखें खोली और नीचे देखा तो चन्दा के दोनों बच्चे अपने माँ-बाप के बीच दीवार बनकर खड़े थे।

कुछ पल के लिए माधो नरम पड़ा पर तुरंत बच्चों को साइड में करने लगा।

मैंने अब अकेले नीचे जाने का फैसला कर लिया। मैं दौड़ती हुई मेरे घर में से बाहर निकली और लिफ्ट की तरफ देखे बिना सीढ़ियां उतरने लगी। मैंने नीचे उतारकर देखा तो माधो ने बच्चों को चन्दा के आगे से हटा दिया था। बच्चे रोते हुये थोड़ी दूर खड़े थे। माधो ने फिर डंडा ऊपर उठाया, लेकिन वो इंडे को नीचे करके चन्दा को मारे उसके पहले मैं वहां पहुँच गई और मैंने डंडे को पकड़ लिया- “ये क्या कर रहे हो?”

माधो- “हमारे रास्ते से हट जाओ मेमसाब, ये हमारा आपसी मामला है...” माधो ने गुस्से से इंडे को जमीन पर पटकते हुये कहा।

मैं- “पागल हो गये हो क्या? अपने बच्चों के बारे में तो सोचो, तुम्हारी बीवी को मारकर तुम तो जेल में चले जाओगे, फिर तुम्हारे बच्चों को भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं रहेगा...” मैंने माधो के हाथ से इंडा खींचकर नीचे फेंकते हुये कहा। न जाने कहां से मुझमें इतनी हिम्मत आ गई थी कि मुझसे दोगुनी ताकत वाले आदमी के हाथ से मैंने इंडा खींचकर नीचे फेंक दिया था।

दोनों बच्चे दौड़ते हुये आकर अपने बाप से लिपट गये। माधो अपने बच्चों को बाहों में लेकर रोने लगा। चन्दा भी रोती हुई खड़ी हुई। बच्चे माधो से अलग होकर अपनी माँ से लिपट गये। चन्दा रोती हुई घुटनों पे बैठकर अपने बच्चों को चूमने लगी।

मैं- “चन्दा की गलती बहुत बड़ी है माधो, लेकिन तुम्हारी भी कई गलतियां हैं। तुम पूरा दिन दारू पीते हो और अपने परिवार का ध्यान भी नहीं रखते, अभी भी देरी नहीं हुई है..."

मेरी बात सुनकर माधो चन्दा की तरफ आगे बढ़ा और बाहों में भरकर रोने लगा।

* * * * *

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* * *
 
दूसरे दिन रात को मैंने नीरव से कहा- “कल तुम नीचे नहीं उतरे, माधो मार डालता चन्दा को तो?”

नीरव- “दूसरे के झगड़े में हमें दखल नहीं देनी चाहिए निशु, और चन्दा की गलती भी थी...”

मैं- “चन्दा की गलती है, लेकिन माधो की भी गलती है नीरव। वो दिन में दारू पीकर पड़ा रहता है और रात को चौकीदारी करता है, चन्दा का जरा सा भी खयाल नहीं रखता..” मुझे चन्दा ने जो कहा था वो अक्षरसः मैंने नीरव को कह दिया।

नीरव- “चल छोड़ उन लोगों की बात को...” नीरव ने मुझे बाहों में लेकर किस करते हुये कहा।

मुझे भी नीरव की बात सही लगी और मैं उसे चूमने लगी।

दस दिन में ही माधो और चन्दा कहीं और रहने चले गये। बिल्डिंग का कार्यभार महेश के बजाय दूसरों को सौंप दिया गया, और दिन-रात के लिए चौकीदार की जगह किसी कंपनी के सेक्योरिटी गार्ड रख दिए गये। बिल्डिंग में बहुत कुछ बदल गया दस-पंद्रह दिन में मेरी तरह।

उस दिन चन्दा की हालत देखकर मैं बहुत डर गई थी। नीरव मुझे भी किसी के साथ पकड़ ले तो मेरा क्या हाल होगा, वो सोचकर मेरी रातों की नींद हराम हो गई थी। मैंने सिर्फ सेक्स करना ही नहीं उसके बारे में सोचना भी।

छोड़ दिया था। मैं धीरे-धीरे पुरानी वाली निशा बनने लगी थी।

तभी एक दिन अचानक सुबह मैंने न्यूसपेपर में एक खबर पढ़ी। अखबार के दूसरे पन्ने पर खबर थी- “पोलिस इंस्पेक्टर की बहन पर बलात्कार...”

अहमदाबाद, रविवार (हमारे सावंददाता सूचित) अहमदाबाद में नारायण नगर बी-22 में रहते पोलिस इंस्पेक्टर अमित जयंतीलाल शुक्ला की दिन दहाड़े हत्या की गई और उनकी बहन पर बलात्कार किया गया। पोलिस का कहना है की इसमें अंधारी आलम का हाथ हो सकता है, क्योंकि अमित ने उन लोगों की नाक में दम कर रखा था। सूत्रों के मुताबिक ये भी हो सकता है की अमित की कोई पुरानी अदावत हो। लेकिन अमित की बीवी का कहना है की उनको किसी से भी कोई अदावत नहीं थी।

अमित की बीवी नयना ने दरियापुर पोलिस स्टेशन में अमित की हत्या और अपनी ननद के बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाई है, और वहां से इंस्पेक्टर जादव इस केस की तहकीकात करने वाले हैं। खबर पढ़ते-पढ़ते मेरा बदन पसीने से तरबतर हो गया था, रीता पर बलात्कार...

मैं रोने लगी, मैंने टीवी के पास पड़ा मेरा मोबाइल लिया और कंपकंपाते हाथों से रीता का नंबर लगाया। रीता का मोबाइल स्वीच आफ आ रहा था। मेरे पास उसका और कोई कांटैक्ट नंबर नहीं था। मैंने पापा को फोन लगाया। पापा को भी अभी ही अखबार पढ़कर ही पता चला था, वो भी कुछ खास नहीं जानते थे इस बारे में।

नीरव कुछ ही देर पहले आफिस के लिए निकल चुका था, उसे टिफिन भी भेजना था। मैं रसोई करने लगी पर मेरा पूरा ध्यान रीता की तरफ ही था। मुझे वो हर पल याद आ गये जो मैंने रीता के साथ बिताए थे। वो हमेशा से मेरी खास सहेली थी, कालेज में कोई लड़का मुझसे छेड़छाड़ करता तो वो उससे लड़ पड़ती थी, मेरा पूरा खयाल रखती थी वो।

टिफिन भेजने के बाद मैं खाना खाने बैठी, पर खाना मेरे गले से नीचे नहीं उतरा। मैं फिर से रोने लगी और खाना छोड़कर बेडरूम में जाकर सो गई, पर नींद नहीं आई।

पूरा दिन मैं बेचैन रही, ना कुछ सूझ रहा था, ना समझ में आ रहा था। शाम को नीरव के आने का वक़्त हवा तब मैंने रसोई बनाई। सुबह से मेरे पेट में कुछ नहीं गया था, इसलिए शाम को नीरव के साथ बैठकर थोड़ा बहुत खाया। खाना खाते हुये मैंने नीरव को रीता के साथ हुये हादसे के बारे में बताया। नीरव तीन-चार बार रीता को मिल चुका था इसलिए उसे पहचानता था।

मैंने नीरव से कहा- “मुझे रीता से मिलने जाना है...”

नीरव ने तुरंत “हाँ” कर दी।

मैंने पहले से ही बैग भर रखी थी, मैंने जल्दी से घर काम निपटाया और फिर मुझे नीरव अहमदाबाद जाती बस में छोड़ गया। मैंने पापा को मोबाइल करके कह दिया- “मैं आ रही हूँ..” और सुबह छे बजे मैं अहमदाबाद पहुँच गई।
 
11:00 बजे मैं और पापा रीता के घर जाने के लिए निकल ही रहे थे तब मैंने रीता को फोन लगाया, रिंग बजने लगी और मेरी धड़कनें तेज हो गईं। मैंने कहा- “हेलो...”

भाभी- “कौन..." सामने से धीरे से सिर्फ इतनी आवाज आई जो रीता की नहीं थी शायद उसकी भाभी नयना की थी।

मैं- “भाभी मैं निशा...” मैं आगे क्या बोलू कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

सामने कुछ पल के लिए खामोशी छा गई और फिर धीरे से रोने की आवाज आई।

मैं भी रोने लगी- “भाभी, मैं घर आ रही हूँ...”

भाभी- “निशा, हम सिविल हास्पिटल में है, तुम वहीं पर आ जाओ...”

मैं- “सिविल हास्पिटल? भाभी, रीता कहां है?”

भाभी- “रीता की तबीयत ठीक नहीं है, तुम यहीं पर आ जाओ, तीसरे माले पर रूम नंबर 33 है...”

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मैं- “अच्छा भाभी, मैं आती हूँ...” मैंने काल काटते हुये कहा।

कुछ ही देर में पापा मुझे सिविल हास्पिटल छोड़कर निकल गये। मैं तीसरे माले पर पहुँची, तीसरा माला पूरा आई.सी.यू. था, मैं रूम नंबर 33 पर पहुँची तो वहां बाहर दो पोलिस वाले खड़े थे। अंदर बेड पर रीता सोई हुई थी, वो वेंटीलेटर पर थी और भाभी बाजू में कुर्सी पर बैठी थीं। मुझे देखकर भाभी खड़ी हो गई और मुझे बाहों में लेकर रोने लगी। मैं भी रोती हुई उन्हें सांत्वना देने लगी।

थोड़ी देर बाद भाभी शांत हो गई तो मैंने उन्हें कुर्सी पर बिठाते हुये पूछा- “ये सब कैसे हो गया भाभी?”

भाभी- “परसों शाम को आठ बजे तक रीता घर पे नहीं आई तो मैंने उसका मोबाइल लगाया। मोबाइल लग नहीं रहा था तो मैंने तुम्हारे भैया को मोबाइल करके बताया...” इतना कहकर भाभी फिर से रोने लगी।

मैं खड़ी होकर रीता के नजदीक गई, उसे देखकर मेरी आँखें भर आई, मैं उसके बालों को सहलाने लगी।

भाभी- “तुरंत तुम्हारे भैया घर आ गये और वो रीता की जो-जो फ्रेंड हैं, उसे मोबाइल करके रीता को ढूंढ़ने लगे।

आधे घंटे बाद रीता के मोबाइल से मेसेज़ आया तुम्हारे भैया के मोबाइल पर। रीता ने किसी जगह का नाम लिखा था, तुम्हारे भैया वहां गये और फिर कभी वापस न आए...” भाभी फिर से रोने लगी।

थोड़ी देर बाद मैंने भाभी को पूछा- “रीता ने बताया तो होगा ना की कौन थे वो लोग...”

भाभी- “कुछ बोलने की हालत में होगी तो बोलेगी ना...”

मैं- “मतलब?”

भाभी- “हादसे का असर रीता के दिमाग पर इतना ज्यादा हुवा है की वो कोमा में चली गई है, डाक्टर भी कुछ नहीं कहते...”

भाभी की बात सुनकर मेरा पूरा अस्तित्व हिल गया।
 
हास्पिटल से निकलकर मैंने दीदी के घर जाने के लिए रिक्शा किया क्योंकि मुझे रात को ही राजकोट के लिए निकल जाना था। दीदी के घर पर ताला देखकर मैंने उन्हें मोबाइल लगाया, तीन-चार बार कोशिश करने के बाद दीदी ने मोबाइल उठाया।

दीदी- “हाँ निशा, बहुत दिन बाद याद किया..."

मैंने पूछा- “दीदी, आप कहां हो?”

दीदी- “मैं तेरे जीजू के फ्रेंड की मैरेज़ में हूँ..”

मैं- “मैं आपके घर के बाहर खड़ी हूँ..”

दीदी- “मैं कल सुबह आने वाली हूँ, तुम सुबह से ही आ जाना...”

मैं- “मैं तो रात को निकल जाने वाली हैं दीदी...”

दीदी- “आई हो तो एक, दो दिन बाद जाना...”

मैं- “नहीं दीदी...”

दीदी- “क्या नहीं नहीं कर रही है? मेरी कसम है तुझे, मुझसे मिले बिना मत जाना...”

मैं- “ओके दीदी, मैं फोन रख रही हूँ..” कहकर मैंने फोन काट दिया।

मैं रिक्शा करके घर गई, रात को खाना खाकर मैं, मम्मी और पापा टीवी देख रहे थे। मैंने पापा को कहा- 'आजतक' लगाओ ना पापा, देखो ना कोई खबर आ रही है विजय भैया के केस के बारे में?

पापा ने आज-तक, स्टार-न्यूज, जी-न्यूज, धीरे-धीरे करके सारी न्यूज चैनल देख ली, पर किसी में कुछ नहीं आ रहा था। फिर ई-टीवी गुजराती भी देख ली उसमें भी कुछ नहीं आ रहा था।

पापा- “ये न्यूज चैनल वाले एक बच्चा कुवें में गिरता है तो भी सारे देश को सिर पे उठा लेते हैं, और एक पोलिस इंस्पेक्टर की हत्या और उसकी बहन के बलात्कार को कोई महत्व नहीं दे रहे...” पापा ने किसी भी चैनल में विजय भैया की कोई न्यूज नहीं देखी तो हताशा से बोले।

मैं- “पापा, कल के बाद आज अखबार में भी कुछ नहीं आया था...” मैंने कहा।

मेरी बात सुनकर पापा कुछ बोलने जा रहे थे, उसी वक़्त किसी ने बेल बजाई और पापा दरवाजा खोलने उठे। वो अब्दुल था, वो अंदर आया, मुझे देखकर मुश्कुराया, मैं भी उसके सामने हँसी लेकिन मेरी हँसी बनावटी थी जो अब्दुल को मालूम पड़ गया।

अब्दुल- “क्यों क्या हुवा? चेहरे पे नूर नहीं है, सब खैरियत तो है ना?”

मैं कोई जवाब दें उसके पहले पापा बोले- “परसों एक पोलिस वाले की हत्या हुई और उसकी बहन का बलात्कार हुवा, वो लड़की निशा की फ्रेंड है...”

अब्दुल- “वो तो हास्पिटल में है ना... बेहोश है ना?” अब्दुल ने मेरी तरफ देखकर कहा।

मैं- “हाँ..”

अब्दुल- “उसे वहीं मार डालेंगे...”

मैं- “क्या? क्यों? अब उसको कोई क्यों मारेगा?” रीता की हर बात आज मुझे झटके दे रही थी।

अब्दुल- “उसी ने तो देखा है उसके भाई के हत्यारों को और उसकी इज्ज़त लूटने वालों को, वो होश में आएगी तो पहचान लेगी उन सबको...” अब्दुल की बात में वजूद तो था लेकिन मेरा दिल रीता की मौत के बारे में सोचने को तैयार नहीं था।

मैं- “लेकिन वहां बाहर दो पोलिस वाले बैठे हैं रीता की सुरक्षा के लिए...”

अब्दुल- “वो भी हट जाएंगे पैसे मिलते ही...”

पापा ने कहा- “जिसके हाथ में ये केस है वो ईमानदार है और अमित पोलिस डिपार्टमेंट का आदमी था इसलिए मेरे खयाल से गुनहगार पकड़े जाएंगे...”

अब्दुल- “जावेद मेरा दोस्त है, बहुत ही नेकदिल और ईमानदार इंसान। पर उसके नीचे वाले पैसे खाकर काम करेंगे तो वो भी क्या करेगा?” अब्दुल ने कहा।

मैं- “आप तो बहुत कुछ जानते हैं?” मैंने कहा।

अब्दुल- “हाँ... ये भी सुना है की अदावत इंस्पेक्टर की नहीं थी, उसकी बहन की थी। कोई था उसका पुराना आशिक...”

मैं- “उसका पुराना आशिक...” मैंने कहा। मेरी आँखों के सामने विजय तैर रहा था, जो उसके पीछे नहीं मेरे पीछे पड़ा था।

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विजय ने रीता के जरिए मुझे कालेज के पीछे बुलाया था और उस वक़्त वो भी मेरे साथ फंस गई थी, और रीता ने अमित भैया को बुलाकर विजय को पिटवाया भी था। लेकिन ऐसा तो होता रहता है कालेज में, इतनी सी बात को कोई इतना वक़्त याद नहीं रखता और ना ही इतनी सी बात के लिए कोई किसी का कतल करता है ना बलात्कार। मैं मन ही मन बोली- “नहीं, विजय नहीं हो सकता...”

अब्दुल- “क्या सोच रही हो?” अब्दुल ने पूछा।

मैं- “नहीं, कुछ नहीं..."

अब्दुल- “ये भी सुना है की कोई बड़ी हस्ती है तुम्हारी फ्रेंड को बर्बाद करने वाली...”

मैं- “आप उसका नाम पता कर सकते हैं..."

अब्दुल- “वो तो मेरे बायें हाथ का खेल है, कल के दिन में ही पता करके तुझे बताता हूँ...”

उसके बाद पापा और अब्दुल दूसरी बातें करने लगे। पर मेरा बिल्कुल भी ध्यान नहीं था उनकी बातों में, मैं रीता के बारे में ही सोच रही थी।

अब्दुल ने कहा- “मैं चलता हूँ, शर्माजी...”

अब्दुल की जाने की बात से मैं मेरी सोच में से बाहर आई।

अब्दुल- “निशा तुम्हारी फ्रेंड के रिश्तेदारों को उसका ध्यान रखने को कह देना, और मैं तुम्हें पता लगाकर कल फोन करूंगा..."

दूसरे दिन सुबह मैंने दीदी को फोन करके दोपहर को हास्पिटल बुला लिया। अब्दुल की बात सुनने के बाद मैंने आज रीता के पास ही रहने को सोच लिया था। कल और आज में रीता की हालत में कोई फर्क नहीं था। दीदी आई तब तक मैंने भाभी के साथ रीता के पास बिताए थे। वो बीते दिनों की बात करती रही।

दीदी ने आते ही मुझे बाहों में जकड़ लिया, दीदी बहुत खुश थी। हम ऐसी जगह पर मिले थे जहां खुशी दिखाना लाजमी नहीं था, पर दीदी की खुशी उनके ना चाहते हुये भी दिख रही थी।

छे बजे अब्दुल का मुझे मोबाइल आया- “मैंने पता लगा लिया है, तुम जल्दी से मेरे घर आ जाओ...”

मैंने भाभी को रीता का खयाल रखने को कहा और दीदी के साथ बाहर निकली। मैंने दीदी से जीजू के बारे में पूछा तो वो शर्मा गई।

दीदी- “थॅंक्स निशा, तेरी वजह से मेरी जिंदगी बदल गई...”

मैंने दीदी को बाइ कहकर घर जाने के लिए रिक्शा किया और नीरव को मोबाइल लगाया।

नीरव- “बोल निशु.."

मैं- “मैं तीन-चार दिन बाद आऊँ तो चलेगा?” मैंने पूछा।।

नीरव- “चलेगा तो नहीं मेडम लेकिन चलाएंगे। पर आप वहां रुकना क्यों चाहती हैं, हमसे कोई गलती हो गई है। क्या?" नीरव ने बड़े नाटकीय अंदाज से पूछा।

मैं- “तुम तो जानते हो की रीता के मम्मी-पापा, रीता जब छोटी थी तभी गुजर गये थे और अमित भैया ने भी । अनाथ लड़की से शादी की थी, जिसकी वजह से उन लोगों का कोई रिश्तेदार नहीं है। तो भाभी ने मुझे कुछ दिन रुकने को कहा है...” मैंने आधा सच और आधा झूठ कहा।

नीरव- “ओके मेडम..."

मैं- “तुम हर महीने बिजनेस के लिए मुंबई जाते हो तो जा आओ.”

नीरव- “इस बारे में आज ही बात हुई पापा से, उन्होंने कहा इस बार भैया जाएंगे...”

मैं- “ओके, मैं तीन चार दिन बाद आऊँगी। बाइ...”

नीरव- “आई मिस यू...”

मैं- “सेम टु यू.”

नीरव- “आई लव यू..”

मैं- “आई लव यू टू..” मैंने कहा। शादी के दो साल तक नीरव जितने प्यार से बात करता था उतने प्यार से आज फिर उसने बात की थी, आजकल उसे बहुत प्यार आ रहा है मुझ पर।

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रात के दो बजे थे, मुझे नींद नहीं आ रही थी क्योंकि मेरे दिमाग में से विजय निकल नहीं रहा था। वो कालेज में था तब भी अच्छा लड़का नहीं था। वो हमेशा लड़कियों से छेड़खानी करता रहता था, मवालियों की तरह सबको परेशान करता रहता था।

लेकिन फिर भी ये बात दिमाग में बैठ नहीं रही थी की इतनी सी बात के लिए कोई ऐसा कर सकता है? मैं। अब्दुल से गुनहगार का नाम जानकार पोलिस से रिपोर्ट करने के बारे में सोच रही थी। पर अब्दुल से पूरी बात जानने के बाद पोलिस में रिपोर्ट करने की मूर्खता तो मैं हरगिज नहीं करना चाहती थी। लेकिन एक बात ये भी तय थी की विजय ना पकड़ाए तब तक रीता की जान को खतरा था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था तो मैंने अब्दुल से इस बारे में बात करने का सोचा और फिर सो गई।

दूसरे दिन खाना खाकर मैं हास्पिटल जाने के लिए कांप्लेक्स से बाहर निकली, तभी पीछे से गाड़ी का हार्न बजा। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो अब्दुल था, उसने मुझे इशारे से पूछा- “कहां जा रही हो?"

तब मैंने “हास्पिटल” कहा। अब्दुल भी उसी तरफ जा रहा था तो मुझे गाड़ी में बैठने को कहा। रास्ते में मैंने उसे हास्पिटल आने को कहा। मैंने उसे पोलिस वालों से चौंकन्ना रहने को कहने के लिए ऊपर आने को कहा।

अब्दुल ने ऊपर आकर नयना भाभी को रीता का अच्छी तरह से खयाल रखने को कहा और पूछा- “पहले दिन से जो पोलिस वाले थे वोही हैं या बदल गये?”

नयना भाभी ने कहा की- “हाँ, बदल गये हैं.”

अब्दुल- “अब तो मेरा शक यकीन में बदल गया है कि ये लोग रीता का कतल कर ही देंगे...”

अब्दुल के मुँह से इस तरह की बात सुनकर भाभी रोने लगी।

मैं भी सिहर उठी थी। मैंने अब्दुल से पूछा- “हम पोलिस कमिशनर को रिपोर्ट करें तो?"

मेरी बात सुनकर अब्दुल ठहाका लगाते हुये हँसने लगा- “जावेद की बदली किसने करवाई होगी? सबको पैसे बंट गये होंगे उसमें सबसे ज्यादा पोलिस कमिशनर को मिले होंगे...”

मैं- “तो क्या करें हम? रीता को वो मारने आएंगे तब चुपचाप देखें हम...” मैंने गुस्से से कहा।

अब्दुल- “नहीं..”

मैं- “तो?”

अब्दुल- “उसका उपाय है...”

मैं- “क्या?”

अब्दुल- “जो लोग रीता को मारना चाहते हैं उसे पहले मार दो तो रीता बच सकती है...”

* * * * * * * * * *
 
भाभी- “भाई साहब, ये कैसी बातें कर रहे हैं? आप हमारी मदद करने आए हैं या मजाक करने आए हैं?” भाभी अब्दुल की हाजिरी में अभी तक कुछ खास नहीं बोली थी, जो अब्दुल के मुँह से कतल की बात सुनकर अचानक बोल पड़ी।

अब्दुल- “क्यों, ऐसा क्या कह दिया मैंने?”

भाभी- “खून करने का कहा आपने, शायद आपके लिए इंसान को मारना मतलब मच्छर मारना बराबर होगा। लेकिन हमारे लिए ये बहुत बड़ी बात है." वो दोनों आपस में बहस कर रहे थे और मैं चुपचाप सुन रही थी।

अब्दुल- “एक पोलिस इंस्पेक्टर की बीवी के मुँह से इस तरह की बात सुनकर मुझे भी हैरानी हो रही है। मैंने आपको ये मशवरा इसलिए दिया ताकि आप अपनी ननद की जान बचा सकें, बाकी आपकी मर्जी?” अब्दुल ने नाराजगी से कहते हुये बाहर की तरफ कदम बढ़ते हुये कहा- “मैं चलता हूँ, खुदा हाफिज...”

मैं- “एक मिनट ठहरो अब्दुल...” मेरे दिमाग में अब्दुल की बात बैठ रही थी इसलिए मैंने उसे रोका।

पर अब्दुल रुका नहीं।

मैं- “भाभी आपको इसे नाराज नहीं करना चाहिए था...” इतना कहकर मैं भी अब्दुल के पीछे बाहर निकली।

भाभी विस्मय भरी आँखों से मुझे देख रही थी, शायद मैं अब्दुल को 'तुम' कहकर बुला रही थी इसलिए वो मुझे अचरज से देख रही थी।

मैंने अब्दुल को थोड़ा आगे हास्पिटल की लाबी में पकड़ लिया- “मैं रीता को बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ, तुम मेरे लिए तुम्हारे आदमियों से ये काम करवा सकते हो?”

अब्दुल- “अरे मेरी बुलबुल, अगर मैं ये काम करवा सकता ना तो मैंने कब का कर लिया होता...”

मैं- “तुम तो उस दिन कहते थे ना की मेरे आदमी कोई भी काम कर सकते हैं..."

अब्दुल- “विजय के साथ हमेशा दो बाडीगार्ड रहते हैं, इसलिए उसे मारने के लिए प्रोफेसनल किल्लर की जरूरत पड़ेगी, मेरे आदमी वहां काम नहीं आएंगे...”

मैं- “प्रोफेसनल किल्लर...”

अब्दुल- “हाँ... प्रोफेसनल किल्लर जिसे हम सुपारी देना कहते हैं, और कम से कम दस लाख तो लेंगे ही वो लोग विजय का कतल करने के लिए...”

मैं- “लेकिन इतना पैसा कहां से आएगा?” मैंने चिंतित स्वर से पूछा।

अब्दुल- “हाँ... सबसे बड़ी मुश्किल बात यही है। अमित तो ईमानदार था, वो अपने पीछे इतने पैसे छोड़कर नहीं गया होगा की उसी के पैसे से उसके खून करने वाले की तुम सुपारी दे सको...”

मैं- “तो फिर हम क्या करें? इतने पैसे का इंतेजाम करना तो मुश्किल है..” मैंने निराशा से कहा।

अब्दुल- “सोचना पड़ेगा, कोई ना कोई रास्ता तो जरूर हम निकाल ही लेंगे..."

तभी अब्दुल के मोबाइल की रिंग बजी, उसने मोबाइल में देखा और कहा- “जावेद ने मुझे फोन क्यों किया होगा?”
 
मैं- “कौन जावेद?”

अब्दुल- “वो इंस्पेक्टर जो रीता के केस की तहकीकात कर रहा था...” इतना कहकर अब्दुल ने मोबाइल उठाया

और लाउडस्पीकर ओन किया- “खुदा हाफिज जावेद भाई...”

सामने से एक गहरी आवाज गूंजी- “खुदा हाफिज..."

अब्दुल- “कहिए, क्यों याद किया?”

जावेद- “आपने मुझसे एक वादा किया था, याद है?”

अब्दुल- “जावेद साहब, जो बात आप कर रहे हैं उसे पूरा करने में मुझे भी इंटरेस्ट है। लेकिन जोखिम भरा काम है ये...” अब्दुल ने कहा।

जावेद- “पहले आप अपने मोबाइल का स्पीकर आफ कीजिए जनाब, फिर बात करते हैं उस बारे में..." जावेद ने कहा और अब्दुल स्पीकर आफ करके मोबाइल पे बात करते हुये साइड में चला गया।

मैं वहीं पर खड़ी ध्यान से अब्दुल को देखने लगी और उसके बारे में सोचने लगी। मुझे शक तो पहले से ही था अब्दुल पर की वो किसी भी तरह मुझे उसके नीचे लेटने पर मजबूर कर ही देगा। उसकी हमेशा से आदत रही है। औरतों की मजबूरी का फायदा उठाने की।

कल भी उसने विजय का नाम देते वक़्त मुझसे मनमानी करवाई थी और उसने सुपारी देने की बात कही और उसके लिए दस लाख रूपये की जरूरत पड़ेगी ये कहा, जो सुनकर मेरा शक पूरा यकीन में बदल गया। वो अब मुझे दस लाख के बदले उसके साथ सोने को कहेगा और साथ में शायद दस लाख के बदले नयना भाभी के सोने की भी बात करेगा। लेकिन मेरा नाम भी निशा है, मैं उसकी मुराद पूरी होने नहीं देंगी। हो सकता है कि मुझे अब्दुल के साथ सोना पड़े, लेकिन मैं अब्दुल के हाथ भाभी पर पड़ने नहीं देंगी।

अब्दुल- “क्या सोच रही हो बुलबुल?” अब्दुल की मोबाइल पे बात कब खतम हुई और कब वो मेरा पास आ गया। उसका मुझे ध्यान नहीं था।

मैं- “नहीं, कुछ भी तो नहीं...”

अब्दुल- “रास्ता मिल गया है, विजय को खतम करने का, जावेद ने बताया है अभी-अभी..” उसने एकदम नजदीक आकर मेरे कान में फुसफुसाते हुये कहा।

मैं- “कौन सा रास्ता?” मैंने बेकरारी से पूछा।

अब्दुल- “उसके लिए तुम्हें कालगर्ल बनना पड़ेगा...” अब्दुल ने मेरे मुँह के नजदीक उसका मुँह लाकर कहा, उसकी गंदी बात के साथ-साथ उसकी गंदी सांस मेरे नथुने से टकराई।।

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विकास- “तुम्हारे चेहरे पे साड़ी बाँध लो...” विकास को लगा की उसने मुझे जो भी समझाया है वो मैं ठीक तरह से समझ गई हूँ तो उसने अंत में मुझे ये हिदायत दी।

मैंने तुरंत बुरके की तरह साड़ी को मुँह पे बाँध लिया। मैं उसकी हर बात मान रही थी। वो भी रीता की इस हालत के लिए उतना ही जिम्मेदार था, जितना विजय था। फिर भी मैं उसने जो कहा वो पोलिस स्टेशन में कहने के लिए तैयार हो गई थी। वैसे उसने जो भी मुझे कहने को कहा था वो मेरे लिए अच्छा ही था। फिर भी उसी ने हमें फँसाया था। वो भी मैं कैसे भूल सकती थी, शायद उसकी बात मानने की और एक वजह भी मेरे पास थी की थोड़ी देर पहले उसी ने ही मेरी जान बचाई थी।

कुछ देर बाद पोलिस की गाड़ी की सायरन बजी और विकास ने मुझसे कहा- “जो भी कहा है वोही कहना, ज्यादा एक... ...”

उसकी बात पूरी होने से पहले चार पोलिस कान्स्टेबल सीढ़ियों से ऊपर आते दिखाई दिए, उसमें एक लेडी कान्स्टेबल भी थी। विकास ने आगे बढ़कर लेडी कान्स्टेबल को मेरी तरफ इशारा करके कहा- “इसे लेजाकर जीप में बिठाओ...”

लेडी कान्स्टेबल ने मुझे साथ आने को कहा।

विकास- “जल्दी से कमरे को सील कर दो और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो..”

नीचे की तरफ उतरते मैंने विकास की आवाज सुनी तो मैंने लेडी कान्स्टेबल से पूछा की- ये कौन है?”

उसने कहा- “ये हमारी ब्रांच के मुख्य इंस्पेक्टर हैं...”

जो सुनकर मेरा दिमाग चकरा गया की विकास और इंस्पेक्टर?

जीप को एक कान्स्टेबल चला रहा था और विकास उसके बाजू में बैठा था। पीछे मैं और लेडी कान्स्टेबल बैठे हुये थे। जीप के साथ-साथ मेरे दिमाग के घोड़े भी दौड़ रहे थे। मैं चाहे कितना भी समझने की कोशिश कर रही थी। पर मेरे दिमाग में कोई बी बात बैठ नहीं रही थी।

विकास ने विजय को मेरे लिए क्यों मार दिया, ये बात मेरी समझ के बाहर थी। रह-रहकर एक ही खयाल आ रहा था मुझे की कहीं ये उन दोनों की चाल तो नहीं होगी ना मुझे जाल में फँसाने की? कहीं विकास ने विजय पर नकली गोली तो नहीं चलाई होगी ना? और विजय जिंदा होगा तो? लेकिन ये सब कैसे हो सकता है? उन दोनों को पहले से मालूम हो तो ही हो सकता था, उनको कौन बताएगा?

मैं, अब्दुल और जावेद के सिवा हमारे प्लान के बारे में कोई जानता नहीं था। अब्दुल के किसी आदमी को पूरी बात पता नहीं थी फिर कौन बताएगा? जावेद... हाँ जावेद बता सकता है। उसने विजय को बताया होगा हमारे प्लान के बारे में। लेकिन एक बात और भी थी। विजय चाहता तो मुझे होटेल ले जाने की बजाय कहीं और उसी वक़्त ले जा सकता था। उसे इतना बड़ा नाटक करने की कोई जरूरत नहीं थी।
 
मेडम नीचे उतरिये..." लेडी कान्स्टेबल की आवाज से मैं मेरे खयालों से बाहर आई।

मैंने बाहर देखा तो जीप पोलिस स्टेशन के बाहर खड़ी थी। जीप से उतरते-उतरते मेरे दिमाग में एक और खयाल आया की ये पोलिस स्टेशन तो नकली नहीं हो सकता। क्योंकि भीड़-भाड़ वाले इलाके में पोलिस स्टेशन नकली बनाना जोखिम का काम है, इसीलिए तो अब्दुल ने हाइवे पर सुनसान रास्ते पर नकली पोलिस स्टेशन बनाया था।

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विकास ने पोलिस स्टेशन में दाखिल होते ही वहां बैठे एक कान्स्टेबल को रुवाब से कहा- “चौहान कहां है?”

कान्स्टेबल- “अरे सर, आप यहां... चौहान सर तो छुट्टी पर हैं.”

विकास- “इसीलिए मोबाइल स्विच आफ करके बैठा है, यहां का फोन क्यों बंद है?”

कान्स्टे बल- “मालूम नहीं सर, एक घंटे से बंद है..."

विकास- “इसका बयान ले लो...” मेरी तरफ हाथ करके विकास ने कहा।

कान्स्टेबल- “क्यों क्या हुवा सर?” कान्स्टेबल ने मेरी तरफ देखकर पूछा।

विकास- “चूतिए, मेरे को क्या पूछता है? उसका बयान लेते वक़्त तुझे मालूम पड़ जाएगा। तुम लोगों का काम हम लोग कर रहे हैं। उसके साथ जो हुवा वो तुम लोगों के एरिया में हुवा है, ऐन वक़्त पे मैं नहीं पहुँचता तो उसका रेप हो गया होता...” विकास ने गुस्से से कहा।

उसका गुस्सा देखकर कान्स्टेबल सकपका गया। उसने जल्दी से कागज और पेन निकाले और मुझे कुर्सी पर । बैठने को कहा। मैंने विकास की तरफ नजर की तो उसने मुझे इशारे से बैठने को कहा और वो दूसरे टेबल के पास जाकर बैठ गया।

कान्स्टेबल- “बोलिए, मेडम आपका नाम?”

मैं- “निशा...” मैंने धीमी आवाज में अपना नाम बताया।

कान्स्टेबल- “पूरा नाम बताइए..."

मैं- “निशा नीरव मेहता...”

कान्स्टेबल- “ओके। अब आपके साथ क्या हुवा वो ठीक से बताइए..” उसने मेरा नाम लिखते हुये कहा।

मैं- “शाम को सात बजे मैं घर से सिविल हास्पिटल जाने के लिए निकली। तब अचानक ही मेरे सामने एक गाड़ी आकर रुकी, उसमें से दो आदमी बाहर आए और मुझे जबरदस्ती गाड़ी में बिठा दिया...”

कान्स्टेबल- “एक मिनट मेडम, किसी ने देखा था उस वक़्त...”

मैं- “नहीं, कोई नहीं था वहां। गाड़ी के अंदर जो आदमी बैठा था वो कालेज में मेरे साथ था, उसने मुझ पर रेप करने की कोशिश की..” मैं बोलते हुये रोने लगी।

मेरे चुप होने के बाद कान्स्टेबल ने पूछा- “गाड़ी में रेप करने की कोशिश की क्या?”

मैं- “नहीं, होटेल ले गया था गन दिखाकर...”

कान्स्टेबल- “वो दो आदमी साथ नहीं थे?”

मैं- “नहीं, उसको उसने होटेल से बाहर ही कहीं जाने को कह दिया...”

कान्स्टेबल- “उसका नाम?”

मैं- “विजय...”

कान्स्टेबल- “होटेल के कमरे में क्या हुवा?”
 
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