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Adultery Chudasi (चुदासी )

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वीरंग- “हाँ... कहा तो है...” भैया ने कहा।

भाभी- “मतलब की आज भी फिक्स नहीं है, कितने दिन हो गये वसीयत बनाने में?” भाभी ने कहा।

वीरंग- “काम तो दो दिन पहले ही शुरू किया है...”

भाभी- “मैं एक महीने से आपको कह रही हूँ की पापा से मैं किसी भी तरह साइन करवा देंगी, लेकिन आप हैं। की..” भाभी गुस्से में थी फिर भी दबी आवाज में बोल रही थी।

वीरंग- “कोई ऐरा-गैरा तो नहीं बना देगा ना? अपनी पहचान वाला होना चाहिए। बाद में किसी को बता दे या हमें ब्लैकमेल करे तो ये सोचकर मैंने अपने दोस्त से वसीयत बनाने की सोची और वो फारेन में था, दो दिन पहले। ही इंडिया में आया, आते ही पहला काम हमारा हाथ में लिया है...”

भाभी- “लेकिन उसके पहले पापा को कछ हो गया तो?"

वीरंग- “देख तू जितना सोचती है उतना आसान नहीं है ये, इसमें दो गवाह की साइन भी लेनी पड़ती है और रजिस्ट्री भी करवाना पड़ता है। इसलिए मैंने मेरे दोस्त को काम दिया है उसकी पहुँच ऊपर तक है...”

भाभी- “वो पुरानी वसीयत जिसमें नीरव भी हिस्सेदर है, वो रेजिस्टर्ड हैं क्या?” हमारा जिकर आते ही मैं और चौंकन्नी हो गई।

वीरंग- “अरे यार, वो रजिस्टर्ड नहीं होती तो क्या टेन्शन था? उसका हिस्सा लेने के लिए तो हमने ये सब किया है, लेकिन तू पापा को जल्दी लपेट न सकी...”

भैया की बात सुनकर मैं चौंक गई- “क्या भाभी और मेरे ससुर? नहीं इसका और कोई मतलब होता होगा...” मैंने सोचा।

भाभी- “तुमने जो कहा वो सब मैंने किया। मेरी एक भी ना ना तूने सुनी थी? मैं अपनी मर्जी से तुम्हारे पापा के साथ सोती नहीं थी, तुम्हारे कहने पर मैंने ये किया था। फिर भी तुम मेरी गलती निकाल रहे हो...” बोलते हुये भाभी की आवाज भारी हो गई थी और मेरा दिमाग।

वीरंग- “चल अब चुप कर, मैं फोन करके पूछता हूँ वसीयत बन गई है की नहीं?” कहकर भैया चुप हो गये और कुछ सेकेंड बाद उनकी आवाज फिर से सुनाई दी- “बन गई, ओके मैं आधे घंटे में ले जाता हूँ...”

भाभी- “बन गई...” भाभी की आवाज सुनाई दी, शायद भैया ने फोन रख दिया होगा।

वीरंग- “हाँ... जानेमन अब जल्दी कर, आज ही खतम कर देते हैं हम अपना काम..” भैया ने कहा।

और मैं सोच में पड़ गई की अब क्या होगा? वसीयत में पापा की साइन हो गई तो हमारा क्या होगा? ऐसे भी नीरव की कोई अहमियत नहीं है इस घर में, साइन हो गई तो भैया और भाभी तो हमें घर से भी निकाल देंगे। मैं जल्दी से वापस किचन के पास आ गई, मैं किसी भी तरह भैया और भाभी को हास्पिटल जाने से रोकना चाहती थी। लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या करूं?

तभी मेरे दिमाग में एक बात आई। मैं किचन के पास वहीं नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद मेरी सास कमरे से बाहर आई तो मैंने उन्हें झूठ कहा- “मेरा मासिक (पीरियड) आ गया है...”

मासिक में हमारे यहां मंदिर और किचन में नहीं जाते। मेरी बात सुनकर मेरी सास ने पूछा- “वो डोरा?”

मैंने मेरे हाथ की मुट्ठी खोलकर उन्हें डोरा दिखाया।

सास- "हे भगवान्... अब तो ये काम नहीं आएगा... नहीं तो पूजा को भेज देते डोरा बाँधने के लिए...” ।

हम बात ही कर रहे थे तभी भाभी ऊपर से आई, और पूछा- क्या हुवा?

सास- “निशा का मासिक आ गया, अब रसोई की पूरी जिमेदारी तुझ पर आ गई है। एक काम करो मुझे और निशा को खाना दे दो..” मेरी सास ने कहा।

भाभी- “देती हूँ..” कहते हुये भाभी दो थाली लेकर आई।

हम खाना खा ही रहे थे कि वीरंग भैया आए. “जल्दी करो पूजा हमें हास्पिटल जाना है...”

सास- “हास्पिटल पूजा नहीं निशा जाएगी...” मेरी सास ने कहा।

वीरंग- “क्यों?” भैया ने पूछा।

सास- “पूजा हास्पिटल जाएगी तो रसोई कौन बनाएगा? निशा मासिक में है...” मेरी सास ने कहा।

मैंने भैया की तरफ देखा। उनका मुँह लटक गया था।

वीरंग- “ऐसा करो ना मम्मी, हम थोड़ी देर के लिये चले जाते हैं बाद में निशा को भेजना, वो बोर हो जाएगी अकेली...”

सास- “निशा अकेली नहीं जाने वाली, तुम जाओगे उसके साथ। अब दो दिन तक निशा ही वहां रहेगी और तुम दोनों भाई बारी-बारी..” मेरी सास ने अपना हुकुम सुना दिया।

थोड़ी देर बाद मैं और भैया हास्पिटल जाने के लिए निकले, रास्ते में भैया ने फोन भी किया- “मैं बाद में ले जाऊँगा..."

मैं समझ गई थी की वो किस चीज की बात कर रहे हैं।

* *

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*

* * *
 
मैंने पांडु के हाथ से उसका मोबाइल छीन लिया और उसके लगाए हुये फोन को सामने से कोई उठाए उसका इंतेजार करने लगी। दो बार रिंग खतम हो गई लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया, लेकिन तीसरी बार की कोशिश में फोन उठा लिया गया।

कृष्णा- “मैंने कहा ना मैं रात को तेरे घर आ जाऊँगी, अभी तुम मुझे परेशान मत करो...” मैं समझ गई वो कृष्णा ही है।

मैं- “रात को अब तुम्हें पांडु के पास जाने की कोई जरूरत नहीं है...” मैंने कहा।

कृष्णा- “आप, आप कौन?” उसने पूछा।

मैं- “मैं जो भी हैं लेकिन मेरी बात सुनो। अब तुम्हें अपनी मर्जी के बिना पांडु से मिलने की कोई जरूरत नहीं है, मैंने तेरी क्लिप डेलिट कर दी है...” मैंने कहा।

कृष्णा- “आप सच कह रही हैं दीदी? मैं आपको दीदी कह सकती हूँ ना?”

मैं- “हाँ... कह सकती हो और मैं तुमसे झूठ क्यों बोलँ?”

कृष्णा- “थॅंक्स दीदी, हम लोगों का बाथरूम कामन है, उसने उसमें छेद करके मेरी वीडियो बना ली और फिर दीदी सबको दिखाने की धमकी देकर उसने मेरा उपभोग किया...” कृष्णा बोलते हुये भावुक हो गई।

मैं- इसमें तुम्हारी भी गलती कम नहीं है कृष्णा...”

कृष्णा- “मेरी गलती?”

मैं- “हाँ... तुम्हारी। जब उसने तुम्हें पहली बार क्लिप दिखाकर ब्लैकमेल किया तब तुम पोलिस में रिपोर्ट कर देती तो तुम्हारी इज़्ज़त बच जाती...”

कृष्णा- “लेकिन दीदी, मैं डर गई थी."

मैं- “इसी डर के करण तो मर्द हमारा मनमानी उपयोग करते हैं, और हमें क्यों डरना चाहिए? डरना तो उसे चाहिए जिसने हमारी क्लिप बनाई है, उसने गैर कानूनी काम किया है, हमने नहीं...” मैंने कहा।

कृष्णा- “लेकिन दीदी हमें हमारी इज्ज़त का भी खयाल करना पड़ता है ना?”

मैं- “सही बात है तेरी। हमें अपनी इज्ज़त का खयाल जरूर करना चाहिए। लेकिन मेरे खयाल से हमें अपनी बाहरी इज्ज़त बचाने के लिए अपनी अंदरूनी इज्ज़त को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए। अगर तुम उसी दिन पोलिस में रिपोर्ट कर देती तो आज तुम बेदाग होती...” मैंने कहा।

कृष्णा- “सही बात है, दीदी आपकी..”

मैं- “मर्द हमेशा औरतों की भावुकता और डर का ही गलत उपयोग करता है। कभी भी अपनी मर्जी के बिना किसी की भी गलत इच्छाओं के आधीन हमें नहीं होना चाहिए, ये मैं अपने खुद के अनुभव से कह रही हूँ..”
 
कृष्णा- “थॅंक्स दीदी... आपने मुझे सही रास्ता दिखा दिया, लेकिन दीदी ये तो बताइए कि आपको मेरी क्लिप के बारे में पता कैसे चला?”

मैं- “मैं वोही हास्पिटल में हैं, जहां ये पांडु काम करता है। मैंने उसे कोने में खड़े होकर तेरी क्लिप देखते हुये पकड़ लिया। मैं फोन रख रही हूँ अभी, बाइ..” वो कोई और सवाल पूछे उसके पहले मैंने फोन काट दिया और पांडु को उसका मोबाइल देकर वहां से निकलने को कहा।

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* *

तीन माह हो गये थे हम लोगों को अहमदाबाद आए। इन तीन माह में मैं और मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल । चुकी थी। आज भी मुझे वो दिन बार-बार याद आता है, जब हम राजकोट से निकलने वाले थे और मैंने नीरव के कपबोर्ड में कुछ कागज देखे, जिसने मेरी जिंदगी बदल डाली।

वो कागज मेरी रिपोर्ट के थे, जो पढ़कर मुझे मालूम पड़ा की मैं प्रेगनेंट नहीं हो सकती। मुझमें कुछ ऐसी प्राब्लम है जिसके करण मैं कभी भी माँ नहीं बन सकती। रिपोर्ट पढ़कर मुझ पर बिजली गिर पड़ी थी, मैं पहले तो । इसलिए रोने लगी की मैं अब कभी भी माँ नहीं बन पाऊँगी, और फिर नीरव का खयाल आते ही मेरा रोना बढ़ गया।

कितना प्यार करता है वो मुझे, मुझमें खामी थी लेकिन उसने मुझे कभी कहा नहीं और मैं हमेशा उसे तानेमारती रही, कितनी गिरी हुई हूँ मैं। मैं उसे धोखा देती रही और वो मुझसे इतना प्यार करता रहा। रात को नीरव आया, तब मैं उससे लिपटकर जोरों से रोने लगी।

नीरव ने मुझे बाहों में लेकर मेरे बालों को सहलाते हुये पूछा- “क्या हुवा निशु?”

मैं रोती रही, कोई जवाब दिए बगैर।

नीरव मेरी पीठ थपथपाते हुये बोला- “तेरे पापा की चिंता हो रही है, क्या तुझे?”

मैं उस भोले इंसान की बात सुनकर और जोरों से रोने लगी।

नीरव- “हम कल से अहमदाबाद सिफ्ट हो रहे हैं। फिर तो तुम हर रोज अपने मम्मी-पापा को मिल सकोगी और उन्हें कोई प्राब्लम ना हो तो वो लोग हमारे साथ भी रह सकते हैं। मेरे मम्मी-पापा का साथ तो मुझे नहीं मिला,

लेकिन तुम्हें तो तेरे मम्मी-पापा का साथ मिलेगा.”

कितना खयाल करता है वो मेरा, मैं यही सोचकर उससे लिपटकर और रोने लगी।

इन तीन महीनों में कई अच्छे दिन आए मेरी जिंदगी में, लेकिन इन सब में सबसे बेहतरीन दिन था जब रीता को होश आया। होश में आने को बाद वो बहुत जल्द ठीक होकर अपने घर भी वापस आ गई। मैं हफ्ते में एक बार उससे जरूर मिलने जाया करती थी, वहां अक्सर जावेद मिल जाता था।

नीरव ने भी उसका नया बिजनेस अच्छी तरह से सेट कर लिया था और उसने जीजू को साथ में ले लिया था। जिस वजह से जीजू के फाइनेंसियल प्राब्लम कम हो गये थे। नीरव ने मेरे मम्मी-पापा को हमारे साथ रहने को कह दिया था, लेकिन वो अभी तक आए नहीं थे।
 
नीरव ने भी उसका नया बिजनेस अच्छी तरह से सेट कर लिया था और उसने जीजू को साथ में ले लिया था। जिस वजह से जीजू के फाइनेंसियल प्राब्लम कम हो गये थे। नीरव ने मेरे मम्मी-पापा को हमारे साथ रहने को कह दिया था, लेकिन वो अभी तक आए नहीं थे।

इन सबके बीच फिर से वही हुवा जो हर रोज होता है। उस दिन मम्मी-पापा ने हमें खाने पे बुलाया था तो मैं दोपहर से वहां चली गई। लेकिन मेरे पहुँचने के बाद मम्मी-पापा को चाचा के घर जाने को हुवा। मम्मी-पापा के

जाने के दो ही मिनट बाद घर की डोरबेल बजी तो मैंने दरवाजा खोला तो सामने अब्दुल को पाया।

मैं कुछ सोचूं या बोलूं उसके पहले अब्दुल ने अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया और मुझे बाहों में जकड़ लिया“अरे बुलबुल तू जब से अहमदाबाद में आ गई है, तब से तो मुझे मिलती ही नहीं...”

मैंने अब्दुल की बाहों में से अपने आपको मुक्त करके थोड़ा आगे जाकर कहा- “मुझे छोड़ो, मैं पानी लाती हूँ, तुम्हारे लिए...”

लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और उसकी तरफ खींचते हुये कहा- “प्यास तो लगी है, लेकिन उसके लिए पानी की नहीं तुम्हारी जरूरत है."

मैं- “प्लीज़... अब्दुल अभी नहीं...” मैंने अपना हाथ छुड़ाते हुये कहा। और कोई होता तो मैं उसे मार देती लेकिन अब्दुल ने कुछ ही दिनों पहले मेरी मदद जो की थी वो मैं कैसे भूल जाती।

अब्दुल- “अभी क्या प्राब्लम है?” अब्दुल ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मेरे बालों को सूंघते हुये मेरी गर्दन को चूमने लगा।

मैं- “मेरे मम्मी-पापा आ जाएंगे...” मैंने उसे पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश करते हुये कहा।

अब्दुल हँसते हुये मेरी गर्दन को पागलों की तरह चूमने लगा- “तुम्हारे मम्मी-पापा मुझे नीचे मिले, बुलबुल... वो तो तीन घंटे बाद वापस आने वाले हैं...”
 
उसकी हरकतों से मैं बहकने लगी थी, मेरा ईमान डोलने लगा था, नीरव के प्यार को मैं भूलने लगी थी, लेकिन फिर भी मैंने अपनी हार नहीं मानी- “प्लीज़... अब्दुल, अभी मेरी इच्छा नहीं है, छोड़ो मुझे...”

लेकिन अब्दुल मेरी बात सुनने के मूड में नहीं था, उसका लण्ड मेरी गाण्ड को छू रहा है, वो मुझे महसूस हो रहा था। उसने अपना हाथ मेरी सलवार में डाल दिया था और वो मेरी चूत को पैंटी के साथ सहलाने लगा था और मैं धीमी-धीमी आवाज में- “नहीं अब्दुल, नहीं अब्दुल...” बोले जा रही थी।

लेकिन अब मेरी ना-ना में कुछ हद तक हाँ-हाँ भी शामिल थी। लेकिन तभी मेरा मोबाइल बजा था और उसकी आवाज से डरकर अब्दुल ने मुझे छोड़ दिया था और मैंने आगे बढ़कर टेबल पर से मोबाइल उठाया, वो काल नीरव की थी।

नीरव ने पूछा- “कहां हो?”

मैं- “मैं यहां मम्मी के पास आई हूँ, कुछ काम था क्या?”

नीरव- “हाँ। लेकिन तुम घर पर होती तो हो सकता था, लेकिन कोई बात नहीं...”

मैं- “तो मैं घर आ जाती हूँ ना?”

नीरव- “नहीं, नहीं कोई बात नहीं चलेगा...” नीरव ने कहा।

मैं- “ठीक है...” मैंने कहा और नीरव ने फोन काट दिया लेकिन मैं बोलती रही। यही एक रास्ता था अब्दुल से पीछा छुड़ाने का- “ठीक है, तुम कहते हो तो मैं आ जाती हूँ, इतना जरूरी है तो आना ही पड़ेगा...”

और फिर मैंने अब्दुल की तरफ घूमकर कहा- “मुझे जाना पड़ेगा, नीरव मुझे घर बुला रहा है.”

अब्दुल- “ओके मेडम। पहले पातिदेव, फिर हम... कहें तो आपके घर छोड़ दें हम..” अब्दुल ने दरवाजा खोलकर बाहर की तरफ जाते हुये कहा।

मैं- “नहीं, नहीं मैं चली जाऊँगी...” मैंने कहा।

उस दिन के बाद मैं हमेशा सोचती हूँ की मुझे अब उस रास्ते पे नहीं जाना हो तो ज्यादा ध्यान रखना पड़ेगा

और उसमें सबसे खास अब्दुल का खयाल रखना पड़ेगा।

* * * * *
 
आज सुबह के पेपर में मैंने राजकोट की एक खबर पढ़ी- “कृस्णा नाम एक लड़की ने खुदकुशी कर ली, लड़की ने अपनी बीमारी से तंग आकर खुदकुशी की थी और वो एच.आई.वी. पाजिटिव थी...”

खबर पढ़ने के कुछ देर बाद मेरे दिमाग में आया की पांडु जिस लड़की को परेशान कर रहा था, उसका नाम भी कृस्णा था। फिर मैंने सोचा की राजकोट में कई सारी कृस्णा होंगी, यही एक थोड़ी होगी। लेकिन दिमाग में से । बात निकल नहीं रही थी। रह-रहकर एक ही बात दिमाग में आया करती थी की अगर ये कृस्णा वही होगी तो पांडू भी एच.आई.वी. पाजिटिव होगा और उसके साथ तो मैंने भी संभोग किया है।

पूरा दिन यही बात सोचती रही, खाना भी ना के बराबर खाया, पूरी रात बार-बार लगातार जागती रही, दूसरे दिन और रात भी वही हाल रहा।

नीरव ने मुझे कई बार पूछा की- “क्या हुवा?”

लेकिन मैं कोई जवाब दिए बगैर उसी बारे में सोचती रही, हर वक़्त मेरी आँखों के सामने पांडु नाचता हुवा कह रहा था की- “तूने पांडु को गान्डू बनाया था ना तो देख पांडु ने तुझे एच.आई.वी. पाजिटिव बना दिया, हाहाहा..”

और मैं अपने सिर को पकड़ लेती।

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तीसरे दिन रात को मेरी नींद लग गई और सपने में पांडु और करण आए और मेरा मजाक उड़ाने लगे और मैं चीखती हुई खड़ी हो गई- “नहीं... नहीं में एच.आई.वी. पाजिटिव नहीं हो सकती?” मेरा पूरा शरीर पसीने से तरबतर था, मैं हाफ रही थी और नीरव भी मेरे साथ जाग गया था और मुझे बाहों में लेकर मेरी पीठ सहलाने । लगा, मैं रोने लगी।

नीरव- “क्या हुवा निशा, आजकल तुझे क्या हो गया है?”

मैं जोरों से रोने लगी।

कुछ देर नीरव ऐसे ही चुपचाप मेरी पीठ सहलाते रहा और फिर बोला- “क्या हुवा निशा?”

आज मैंने भी सोच लिया था की जो भी है सब सच-सच नीरव को बता देना है, और छुपाकर मैं अब जी नहीं सकती। मैं बोलने लगी, नीरव सुनने लगा, मैंने सारी बात बता दी, करण, रामू, जीजू, अंकल, प्रेम, अब्दुल, । विजय, पांडु और नीरव के पापा के साथ मैंने कब और किस-किस हालत में सेक्स किया वो सारी बातें मैंने नीरव को बता दी।

नीरव के चेहरे पर कई प्रत्याघात आए। फिर भी बीच में कुछ बोले बिना वो चुपचाप सुनता रहा और जैसे ही मेरी बात खतम हुई उसने मेरे गाल पर जोरों से एक थप्पड़ मारा। नीरव ने इतनी जोरों से मेरे गाल पर थप्पड़ मारा

था की मेरे होंठों के कोने से खून निकल आया

नीरव- “अब बताती है ये सब तुम मुझे, तूने उस वक़्त...” वो आगे नहीं बोल सका। वो रोने लगा और साथ में मैं भी रोने लगी। रोते हुये उसका शरीर कांप रहा था।

मैं चाहती थी की वो मुझे और मारे, गालियां दे लेकिन वो रोए ही जा रहा था। मैं रोती हुई बार-बार एक ही बात कह रही थी- “मुझे माफ कर दो नीरव...” लेकिन उसे छूने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, डर लग रहा था की कहीं वो मुझे दुतकार न दे।
 
कुछ देर बाद वो दूसरी तरफ मुँह करके लेट गया लेकिन उसकी सिसकियां बंद नहीं हुई थीं। पूरी रात मुझे नींद नहीं आई और शायद नीरव को भी। दूसरे दिन सुबह वो चुपचाप जल्दी उठकर आफिस चला गया। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था की मैं क्या करूं? मैंने सोच लिया था की नीरव ने मुझे घर से निकल दिया तो मैं किसी अनाथ-आश्रम में चली जाऊँगी और वहां बच्चों की सेवा करूंगी। दोपहर को नीरव का काल आया।

मैंने कंपकंपाती आवाज में उससे बात शुरू की- “हाँ, बोलो...”

नीरव- “तुम पीरामल लबोरेटरी आ जाओ...” नीरव ने कहा।

मैं- “क्यों?”

नीरव- “तुम्हारा वहम दूर करने के लिए, तुम्हारी एच.आई.वी. का रिपोर्ट निकालने के लिए..”

मैं जल्दी से तैयार होकर पीरामल लबोरेटरी पहुँची। वहां पहले से ही नीरव मोजूद था। वो इस वक़्त कुछ नार्मल दिख रहा था। वहां मेरा ब्लड देकर हम घर वापस आए, उसके बाद नीरव आफिस नहीं गया। रात तक तो नीरव पूरी तरह से नार्मल हो गया था। मेरी धारणा के विपरीत उसने पूरे दिन में एक भी बार पुरानी बातों को याद नहीं किया था।

मैं घर का सारा काम निपटाकर बेडरूम में गई। तब नीरव नहाकर नया नाइट-सूट पहनकर बैठा था। उसने मुझे बाहों में जकड़ लिया और मेरे होंठ चूमने लगा। मेरी सोच के विपरीत उसकी ये हरकत देखकर मेरी आँखें भर

आईं। नीरव ने मुझे बेड पर लेटाकर साड़ी को मेरी गाण्ड तक ऊपर उठाई और फिर वो मेरे होंठों को चूमते हुये मेरी दो टांगों के बीच में आ गया और अपना पाजामा नीचे करके मेरी चूत पर अपना लण्ड घिसने लगा।

मैंने मेरी टांगों को एक के ऊपर दूसरी को चढ़ा दी, नीरव को अपने ऊपर से धक्का देते हुये कहा- “अभी नहीं...”

नीरव- “क्यों?”

मैं- “जब तक रिपोर्ट न आए तब तक नहीं...”

नीरव- “क्या फर्क पड़ता है निशु रिपोर्ट से? तू चाहे एच.आई.वी. हो या ना हो, मैं जीना सिर्फ तेरे साथ और तेरे लिए चाहता हूँ..” उसने भावुक होकर कहा।



मैं- “फिर भी रिपोर्ट न आए तब तक नहीं..” मैं रोने लगी।

नीरव- “मैं तेरे बिना जी नहीं सकता निशु, तू नहीं जानती मैं तुझसे कितना प्यार करता हूँ...”

मैं- “मैं अब जान चुकी हैं नीरव, और अब चाहे जो भी हो जाय मैं हर पल तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ.."

नीरव- “तूने मुझे पहले ये सब बता दिया होता तो मैं उस वक़्त सेक्शोलोजिस्ट को दिखा देता जो आज सुबह मैं बताकर आया हूँ..”

मैं- “क्या तुम डाक्टर को दिखा आए?”

नीरव- “हाँ... मुझे कभी तेरी बातों से भी पता नहीं चला था की तू मुझसे अतृप्त है, मालूम है आज डाक्टर ने मुझे क्या कहा?"

मैं- “क्या कहा?”

नीरव- “मेरे जल्दी फारिग होने का करण बताया, उन्होंने कहा की मैं तुमसे बहुत ज्यादा प्यार करता हूँ इसलिए तुम्हारे पास आते ही फारिग हो जाता हूँ...”

मैं- “वो तो तुम करते ही हो...”

नीरव- “उन्होंने उसका इलाज भी बताया की सेक्स करते वक़्त मैं तुम्हारे बारे में न सोचते हुये अपने बिजनेस के बारे में सोचूं, जिससे समय बढ़ सकता है, कुछ दवाइया भी दी हैं..” उसके बाद नीरव फिर से सेक्स करने की जिद करने लगा।
 
नीरव- “उन्होंने उसका इलाज भी बताया की सेक्स करते वक़्त मैं तुम्हारे बारे में न सोचते हुये अपने बिजनेस के बारे में सोचूं, जिससे समय बढ़ सकता है, कुछ दवाइया भी दी हैं..” उसके बाद नीरव फिर से सेक्स करने की जिद करने लगा।

लेकिन मैंने उसकी एक भी ना सुनी, सारी रात हम बातें करते रहे। लेकिन सुबह मुझे जरा सी भी थकान महसूस नहीं हो रही थी। क्योंकि अब मैं नीरव के प्यार के रंग में रंग चुकी थी।

मैं- “नीरव रिपोर्ट कब आयेगी..” नाश्ता करते हुये मैंने नीरव से पूछा।

नीरव- “वैसे तो आज आ जाती, लेकिन सनई है इसलिए कल आएगी...”

मैं- “क्या होगा नीरव?” मैं रोने लगी।

नीरव- “पगली है तू, तुझे कुछ नहीं होगा...” नीरव ने कहा।

मैं- “नहीं नीरव मैंने बहुत पाप किए हैं, तुम जैसे देवता को धोखा दिया है.”

नीरव- “निशा तूने जो भी किया ना उसमें तू जितनी जिम्मेदार है ना, उतना ही मैं जिम्मेदार हूँ। तुम्हारे साथ । रामू ने जबदस्ती की तब तूने मुझे बता दिया होता तो तुम इतना आगे नहीं बढ़ती, और अनिल जीजू ने तेरे से सेक्स करने की जिद की तब तुम लोगों ने मुझे बताया होता तो मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता और हो । सकता है वो मान भी जाते...”

मैं- “लेकिन ये सब वो करण की वजह से हुवा है, उसी ने सबसे पहले मुझे बहकाया है...” मैंने उसे याद दिलाया।

नीरव- “करण कोई है ही नहीं निशा, वो तुम्हारा वहम है...”

मैं- “क्या?” उसकी बात से मैं चौंक उठी- “वो मुझे बस में मिला था...”

नीरव- “नहीं उस वक़्त भी वो तुम्हारे सपनों में आया था..."

मैं- “ये कैसे हो सकता है?”

नीरव- “यही हुवा है निशा, मैंने कल डाक्टर (सेक्शोलोजिस्ट) से भी इस बारे में बात की थी, उनका कहना भी यही है...”

मैं- “मुझे समझ में नहीं आती तुम्हारी बात...” मैं सोच में पड़ गई।

नीरव- “मैं समझाता हूँ... पहली बार तुझे करण मिला तो उसने तेरे साथ उंगली से सेक्स किया, क्योंकी हम लोग हर रोज वैसे सेक्स करते थे। फिर तूने उसका लिंग चूसा तो वीर्य निकलने से पहले उसने तेरा मुँह वहां से हटा दिया। कोई मर्द ऐसा नहीं करता लेकिन तुम्हारे सपनों में, कल्पनाओं में तो वोही आएगा ना जो तुम्हें पसंद होगा

और फिर तुम जब संभोग से परिचित हो गई तब तुमने करण से संभोग किया...”

मुझे नीरव की बात कुछ-कुछ समझ में आ रही थी, मैंने कहा- “इसलिए वो बार-बार आकर मुझे ताने मारता था क्या? ये सब मैं करती थी तब मेरे अंतरमन को कहीं ना कहीं चुभता था, जो करण के रूप में बाहर आता था क्या?"

नीरव- “अब तू समझी... यही हो रहा था। चलो अब सब कुछ भूल जाओ। आज सनडे है, हमें तुम्हारी फ्रेंड रीता को भी मिलने जाना है...” नीरव ने कहा।

मैं- “नहीं नीरव, आज कहीं नहीं जाना, मेरा मूड नहीं है...”

नीरव- “जाना है क्योंकि एक खास बात तू कहने वाली है अपनी फ्रेंड से...”

मैं- "क्या ?"

नीरव- “वो मैं तुझे रास्ते में बताऊँगा.." मुश्कुराते हुये नीरव बोला।

रीता के घर जाते हुये मैंने रास्ते में नीरव से पूछा- “रीता के घर हमें क्या काम है?”

नीरव- “कई दिन से मेरे दिमाग को एक बात खाए जा रही है..” नीरव ने कहा।

मैं- “क्या ?"

नीरव- “यही की जावेद और रीता की शादी हो जाय तो दोनों की लाइफ में जो प्राब्लम चल रही है, वो सोल्व हो सकती है...”

मैं और नीरव जब भी रीता के घर जाते थे तब जावेद हमें वहां मिलता था और उन दोनों के बीच अच्छी दोस्ती भी हो गई थी। मुझे नीरव की बात जंच गई और मैंने रीता के घर पहुँचते ही उससे ये बात कह दी।
 
रीता ने तुरंत 'हाँ' कह दी- “मैं तो कालेज में ही उससे प्यार करने लगी थी, पर वो तो तेरा दीवाना था इसलिए मैं कभी बोली नहीं...”

नीरव ने जावेद को मोबाइल करके बुलाया और हम उसे दूसरे कमरे में ले गये और वहां उसने नीरव ने रीता से शादी करने के बारे में कहा।

लेकिन जावेद ने 'ना' कहा।

तभी नीरव के मोबाइल पर काल आया, वो बात करने के लिए बाहर गया।

मैंने जावेद से पूछा- “तुम्हें रीता से शादी करने में क्या आपत्ति है?”

जावेद ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। तब मैंने अपना सवाल दोहराया- “तुम्हें रीता से शादी करने में क्या आपत्ति है जावेद?”

नीरव- “निशा इस वक़्त तुम्हारा पति यहां होता तो मैं ये बात नहीं कहता..." जावेद ने सोचने वाले अंदाज से कहा।

मैं- “क्या?”

नीरव- “कालेज के दिनों में मैं तुमसे प्यार का नाटक करते-करते सच्चा प्यार करने लगा था। फिर मैंने नगमा से शादी की लेकिन मैं कभी उसे प्यार नहीं दे पाया। वो खुदा को प्यारी हो गई। उसके बाद मुझे मेरी गलती का अहसास हुवा, यही रीता के साथ होगा...”

मैं- “लेकिन बाद में तो तुझे तुम्हारी गलती का अहसास हुवा था ना?”

नीरव- “लेकिन मैं उसे क्या दूंगा? प्यार मैंने तुमसे किया है, शादी नगमा से, रीता को मैं क्या हँगा?”

मैं- “इज़्ज़त दोगे तुम रीता को...” मैंने एक-एक शब्द को अलग-अलग करते हुये कहा- “रीता के साथ अब कौन शादी करेगा? और तुम्हें बीवी मिले या ना मिले तुम्हारे बच्चे को माँ जरूर मिल जाएगी रीता के रूप में..."

नीरव- “सारी निशा, मैं रीता से शादी नहीं करना चाहता...'

मैं- “तुम मानते हो ना की रीता के साथ जो हुवा वो तुम्हारी गलती की वजह से हुवा है, तो अपनी गलती सुधारने के लिए रीता से शादी कर लो.." मैं किसी भी तरह जावेद से अपनी बात मनवाना चाहती थी।

नीरव- “प्लीज़... निशा, अब मैं उस बारे में कोई भी बात नहीं करना चाहता..." जावेद चिढ़ गया।

मैं- “मेरे प्यार की खातिर भी नहीं? तुम अगर मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो रीता से शादी कर लो..” मैं भी चिढ़ गई और गुस्सा होकर रूम से निकल गई।

बाहर आकर देखा तो नीरव अभी भी मोबाइल पे बात कर रहा था। मैं उसके पास जाकर खड़ी हो गई।

कुछ देर बाद जावेद बाहर आया और मुझसे कहा- “मैं तैयार हूँ..”

मैं- “सारी... मैंने तुमसे जबरदस्ती की। अगर तुम्हारी मर्जी न हो तो तुम शादी मत करना, ऐसे काम जोरजबरदस्ती से नहीं होते...” मैंने उसका मन टटोलने के लिए कहा।

नीरव- “ऐसा नहीं है। मैंने सोचा तुम्हारी बात सही है, हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है." जावेद ने कहा।

फिर मैंने अंदर जाकर रीता और उसकी भाभी को बताया की जावेद मेरे जीजू बनने को तैयार है, और फिर हम सबने पूरा दिन साथ में बिताया, रात का खाना खाकर हम घर लौटे।
 
मैं- “सारी... मैंने तुमसे जबरदस्ती की। अगर तुम्हारी मर्जी न हो तो तुम शादी मत करना, ऐसे काम जोरजबरदस्ती से नहीं होते...” मैंने उसका मन टटोलने के लिए कहा।

नीरव- “ऐसा नहीं है। मैंने सोचा तुम्हारी बात सही है, हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है." जावेद ने कहा।

फिर मैंने अंदर जाकर रीता और उसकी भाभी को बताया की जावेद मेरे जीजू बनने को तैयार है, और फिर हम सबने पूरा दिन साथ में बिताया, रात का खाना खाकर हम घर लौटे।

दूसरे दिन सुबह मैंने नीरव से रिपोर्ट के बारे में पूछा तो उसने मुझे शाम को पाँच बजे आएगा ऐसा कहा। नीरव के आफिस जाने के बाद मैंने अपना कुछ जरूरी सामान एक बैग में भरा, मैंने सोच रखा था की मैं रिपोर्ट लेने चार बजे पहुँच जाऊँगी और मेरा एच.आई.वी. का रिपोर्ट पाजिटिव आएगा तो मैं नीरव को मालूम पड़े उसके पहले कहीं दूर चली जाऊँगी।

साढ़े तीन बज चुके थे, मैं रिपोर्ट लेने के लिए घर से निकल रही थी। मैंने दोपहर का खाना भी नहीं खाया था, बाहर आकर मैंने आटो किया और परिमल लेबोरेटरी पहुँची। अंदर जाते हुये मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, । एसी चालू होने के बावजूद पशीना हो रहा था। मैंने रिसेप्शन काउंटर पर जाकर पर्ची दी, मेरी किश्मत अच्छी थी कि रिपोर्ट आ गई थी।

रिपोर्ट हाथ में लेते ही मेरा दिल और जोरों से धड़कने लगा। कंपकंपाते हाथों से मैंने रिपोर्ट निकाला की मालूम नहीं क्या होगा? कुछ ही पलों में मेरी जिंदगी का फैसला होने वाला था। लेकिन रिपोर्ट पढ़ते ही मेरा टेन्शन दूर हो गया। जिंदगी में नेगेटिव बातें भी अच्छी होती है वो मुझे रिपोर्ट पढ़कर मालूम पड़ा। हाँ मेरा एच.आई.वी. का रिपोर्ट नेगेटिव आया था। रिपोर्ट पढ़कर मेरे चेहरे पर खुशी छलक आई। मैंने मोबाइल निकालकर तुरंत नीरव को काल लगाया। वो भी रिपोर्ट के नेगेटिव आने की बात सुनकर खुश हो गया। मैंने उसे ना बोल दिया की अब यहां मत आना, और मैं अपने मम्मी-पापा के घर चली गई।

मैं अपने मम्मी-पापा से मिलने इसलिए गई थी की मैं चाहती थी कि वो अब हमारे साथ रहने आ जायें। कुछ देर उनके साथ बिताकर निकल रही थी तो पापा ने कहा की- “मैं तुम्हारे साथ आ जाता हूँ, मुझे तुम्हारे घर के पहले बैंक आता है, वहां जाना है...”

मैं और पापा लिफ्ट से नीचे उतरकर सड़क पर आए, तभी सामने से कार में अब्दुल आया, और पूछा- “कहां जाना है, शर्माजी?”

पापा- "मैं बैंक जा रहा हूँ और फिर निशा उसके घर."

अब्दुल- “बैठ जाइए, मैं उसी तरफ जा रहा हूँ...”

मैं- “नहीं, नहीं अब्दुल भाई हम चले जाएंगे, खामखा आपको तकलीफ देकर क्या फायदा?”

अब्दुल- “उसमें तकलीफ काहे की? ये तो मेरा फर्ज है और मैं उसी तरफ जा रहा हूँ...” अब्दुल ने आगे का दरवाजा खोलते हुये कहा।

मैं- “नहीं, नहीं हम आटो में चले जाएंगे.” मैंने कहा।

अब्दुल- “बिटिया आजकल तुम ज्यादा ही अपनी कीमत लगा रही है, हमें पराया बना दिया है तुमने...” अब्दुल ने मुँह फुलाकर कहा।

पापा- “बैठ जाओ निशा, इतना कह रहे हैं तो...” पापा ने पीछे का दरवाजा खोलकर अंदर बैठते हुये कहा।

मैं भी उनके साथ पिछली सीट में बैठने गई तो अब्दुल ने कहा- “बिटिया तुम आगे बैठ जाओ, नहीं तो सब हमें आपका मुजाहिब समझेंगे...”

उनकी बात सुनकर पापा हँसने लगे और मुझे आगे बैठने को कहा। मैं क्या करती, चुपचाप जाकर आगे की सीट में अब्दुल के पास बैठ गई। अब्दुल मेरे पापा से बात करने लगा लेकिन मैं चुपचाप खिड़की से बाहर का नजारा देखने लगी। पापा का बैंक आया तो उन्होंने अब्दुल को मुझे सही सलामत घर छोड़ने को कहकर उतर गये।
 
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