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कड़ी_13
हरपाल सुखजीत के मोटी-मोटी चूचियों के ऊपर से किस करके बोला- “क्या बात जान आज ब्रा नहीं डाली?"
सुखजीत को अपने पति की ये बात सुनकर याद आता है, की उसकी ब्रा तो पार्क में ही रह गई है। ये सोचकर वो प्यारेलाल वाले कांड को भी याद करती है, और उसको याद करते ही वो गरम हो जाती है। फिर सुखजीत ठरक अंदाज में बोली- “आहह... मैं भी क्या करती... कब से आज अपनी जान का इंतेजार कर रही थी, इसलिए ब्रा खोलकर ही आपका इंतेजार कर रही थी।
हरपाल ये सुनकर सुखजीत की एक चूची को अपने मुँह में भरकर जोर-जोर से चूसने लगता है। सुखजीत भी पूरी गरम होकर हरपाल का सिर पकड़कर अपनी चूचियों में दबाकर उससे अपनी चूचियां चुसवा रही थी। सुखजीत चूचियां चुसवाते-चुसवाते वो सब याद करती है, जो आज सुबह से उसके साथ हो रहा था।
तभी सुखजीत खर्राते की आवाज सुनती है। जब वो हरपाल को देखती है, तो उसे बहुत गुस्सा आता है। क्योंकी हरपाल सुखजीत की चूचियां चूसता-चूसता उसकी चूचियों के ऊपर सिर रखकर ही सो जाता है। उस टाइम सच में सुखजीत को बहुत गुस्सा आता है, और वो अपने मन में कहती है।
सुखजीत- "इस कुत्ते को भी अभी सोना था क्या? हाए अब मेरी चूत का क्या होगा, जो सुबह से पानी पर पानी निकाल रही है, अब वो कैसे शांत होगी? अब मैं क्या करूँ? ये सला नामर्द तो कह रहा था की आज तो मैं तेरी उठा-उठाकर तसल्ली करूँगा। पर आज भी उसका लण्ड चूत में जाने से पहले ही मर गया..” कहकर वो गुस्से में ऊपर से उठाकर बेड पर पटक देती है, और फिर खड़ी होकर बाथरूम में चली जाती है।
बाथरूम में जाते ही वो अपनी लोवर को नीचे खींचती है, और फिर अपनी चूत में जोर-जोर से उंगलियां मारने लगती है। इसमें सुखजीत को बहुत मजा आ रहा होता है। वो ऊपर से लेकर नीचे तक पशीने में भीग जाती है। करीब 5 मिनट बाद उंगलियां चूत में मारने के बाद सुखजीत एकदम अचानक पूरी अकड़ जाती है और उसकी चूत अपना पानी निकल देती है।
फिर वो अपनी उंगलियां अपनी चूत में से निकलती है, और देखती है की उसकी सारी उंगलियां उसकी चूत के अपनी से भेगी हुई थी। ये देखकर वो मस्त हो जाती है, और अपनी उंगलियां अपने मुँह में डालकर वो चूसने लगती है। उसे अपनी चूत के पानी को अच्छे से चूस-चूसकर उसका स्वाद ले रही थी।
फिर सुखजीत नार्मल होती है, और बाहर आकर अपना कुर्ता डालकर ही बेड पर लंबी लेट जाती है। वो सोने की कोशिश करती है पर उसे नींद नहीं आती। सुखजीत को सोने की कोशिश हए एक घंटे से भी ज्यादा हो जाता है। पर उसकी आँखों में नींद का नाम भी नहीं था। सुखजीत फिर अपने मन में बातें करती है।
सुखजीत- “आहह... आज ये सुबह से मेरे साथ क्या हो रहा है। पूरा दिन मैं पूरी गरम होती रही, अंदर ही अंदर मैं गरम होकर उबल रही थी। लेकिन मेरी चूत को जरा भी चैन नहीं मिला। अब तो मैंने उंगली भी कर ली पर अभी भी चैन नहीं मिल रहा है..."
ऐसे ही सोचते-सोचते रात के दो बज जाते है। सुखजीत को अचानक बड़ी तेज प्यास लगती है। वो उठकर किचेन में पानी पीने के लिए जाती है।
तभी पीछे से कोई दबे पाँव आता है, और सुखजीत को पीछे से पकड़ लेता है, और वो सीढ़ियां के नीचे बनी दीवार से उसे चिपका देता है।
जब सुखजीत दीवार से लगती है, और पीछे मुड़कर देखती है तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं, क्योंकी वो और कोई नहीं बिटू होता है। बिटू एक हाथ सुखजीत के मुँह पर रखता है, और दूसरा हाथ उसकी कमर पर रखकर उसे अपने से अच्छे से चिपका लेता है।
सुखजीत बोलने की कोशिश कर रही थी, पर उसकी आवाज उसके मुँह में दम तोड़ रही थी। बिटू सुखजीत से एकदम पूरा चिपका हुआ था, जिससे सुखजीत की चूचियां उसकी छाती से लगी हुई थीं। फिर बिटू इधर-उधर देखता है, तभी उसे सीढ़ियां को नीचे एक स्टोर रूम बना दिखता है।
बिटू सुखजीत को धक्के मारकर स्टोर रूम में लेकर जाता है। फिर वो अंदर जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर
लेता है। बिटू सुखजीत को दरवाजे से लगा देता है। बिटू का एक हाथ सुखजीत के मुंह पर होता है, और दूसरा हाथ उसकी चूचियों पर होता है, जिसे वो मसलने लगता है। सुखजीत मछली की तरह तड़पने लगती है, पर बिट जाट के हाथों से बच निकलना उसके बस की बात नहीं थी।
फिर बिटू सुखजीत की चूचियों को अच्छे से मसलते हुए बोला- "बस कर भाभी मुझे अच्छे से पता है, तेरे अंदर कितनी आग भड़क रही है। मैंने देख लिया था की सरदार कैसे तेरी चूचियां चूसते-चूसते सो गया था..."
सुखजीत ये सुनते ही पानी-पानी हो जाती है। वो सोचने लगती है की बिटू की इस बारे में कैसे पता चल गया? कहीं इसने हरपाल और मुझे वो सब करते देख तो नहीं लिया। हाए राम... तभी सुखजीत को याद आता है, की वो दरवाजे को लाक करना तो भूल गई थी उस टाइम। अब सखजीत नखरे करना कम कर देती है।
बिटू जब उसकी चूचियां मसल रहा था, तब उसकी सोई हुई ठरक फिर से जाग जाती है। और सुखजीत फिर से
मजे लेने लगती है। फिर सुखजीत अपने ठरकी मन में सोचती है।
सुखजीत- “चल साला सरदार नहीं तो सरदार का यार ही सही आज रात के लिए। कम से कम मेरे ऊपर चढ़कर मेरी आग को तो शांत करेगा.” ये सोचते ही सुखजीत हिलना बिल्कुल ही बंद कर देती है।
बिटू ये देखकर समझ जाता है की सुखजीत पूरी गरम हो चुकी है। फिर बिटू अपना हाथ सुखजीत के मुँह से हटा देता है, और फिर अपने दोनों हाथ उसके चूतरों पर रखकर उसके चूतरों को मसलने लगता है।
सुखजीत बिटू को धक्का देकर बोली- “अफफ्फ... भाईजी आप ये मेरे साथ क्या कर रहे हो?"
बिटू सुखजीत के चूतरों को मसलते हुए बोला- “आहह... सच्ची भाभी बहुत मस्त गाण्ड है तेरी, जब आप चलती
हो तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आज तो मैं आपको चूसकर रख दूँगा..."
हरपाल सुखजीत के मोटी-मोटी चूचियों के ऊपर से किस करके बोला- “क्या बात जान आज ब्रा नहीं डाली?"
सुखजीत को अपने पति की ये बात सुनकर याद आता है, की उसकी ब्रा तो पार्क में ही रह गई है। ये सोचकर वो प्यारेलाल वाले कांड को भी याद करती है, और उसको याद करते ही वो गरम हो जाती है। फिर सुखजीत ठरक अंदाज में बोली- “आहह... मैं भी क्या करती... कब से आज अपनी जान का इंतेजार कर रही थी, इसलिए ब्रा खोलकर ही आपका इंतेजार कर रही थी।
हरपाल ये सुनकर सुखजीत की एक चूची को अपने मुँह में भरकर जोर-जोर से चूसने लगता है। सुखजीत भी पूरी गरम होकर हरपाल का सिर पकड़कर अपनी चूचियों में दबाकर उससे अपनी चूचियां चुसवा रही थी। सुखजीत चूचियां चुसवाते-चुसवाते वो सब याद करती है, जो आज सुबह से उसके साथ हो रहा था।
तभी सुखजीत खर्राते की आवाज सुनती है। जब वो हरपाल को देखती है, तो उसे बहुत गुस्सा आता है। क्योंकी हरपाल सुखजीत की चूचियां चूसता-चूसता उसकी चूचियों के ऊपर सिर रखकर ही सो जाता है। उस टाइम सच में सुखजीत को बहुत गुस्सा आता है, और वो अपने मन में कहती है।
सुखजीत- "इस कुत्ते को भी अभी सोना था क्या? हाए अब मेरी चूत का क्या होगा, जो सुबह से पानी पर पानी निकाल रही है, अब वो कैसे शांत होगी? अब मैं क्या करूँ? ये सला नामर्द तो कह रहा था की आज तो मैं तेरी उठा-उठाकर तसल्ली करूँगा। पर आज भी उसका लण्ड चूत में जाने से पहले ही मर गया..” कहकर वो गुस्से में ऊपर से उठाकर बेड पर पटक देती है, और फिर खड़ी होकर बाथरूम में चली जाती है।
बाथरूम में जाते ही वो अपनी लोवर को नीचे खींचती है, और फिर अपनी चूत में जोर-जोर से उंगलियां मारने लगती है। इसमें सुखजीत को बहुत मजा आ रहा होता है। वो ऊपर से लेकर नीचे तक पशीने में भीग जाती है। करीब 5 मिनट बाद उंगलियां चूत में मारने के बाद सुखजीत एकदम अचानक पूरी अकड़ जाती है और उसकी चूत अपना पानी निकल देती है।
फिर वो अपनी उंगलियां अपनी चूत में से निकलती है, और देखती है की उसकी सारी उंगलियां उसकी चूत के अपनी से भेगी हुई थी। ये देखकर वो मस्त हो जाती है, और अपनी उंगलियां अपने मुँह में डालकर वो चूसने लगती है। उसे अपनी चूत के पानी को अच्छे से चूस-चूसकर उसका स्वाद ले रही थी।
फिर सुखजीत नार्मल होती है, और बाहर आकर अपना कुर्ता डालकर ही बेड पर लंबी लेट जाती है। वो सोने की कोशिश करती है पर उसे नींद नहीं आती। सुखजीत को सोने की कोशिश हए एक घंटे से भी ज्यादा हो जाता है। पर उसकी आँखों में नींद का नाम भी नहीं था। सुखजीत फिर अपने मन में बातें करती है।
सुखजीत- “आहह... आज ये सुबह से मेरे साथ क्या हो रहा है। पूरा दिन मैं पूरी गरम होती रही, अंदर ही अंदर मैं गरम होकर उबल रही थी। लेकिन मेरी चूत को जरा भी चैन नहीं मिला। अब तो मैंने उंगली भी कर ली पर अभी भी चैन नहीं मिल रहा है..."
ऐसे ही सोचते-सोचते रात के दो बज जाते है। सुखजीत को अचानक बड़ी तेज प्यास लगती है। वो उठकर किचेन में पानी पीने के लिए जाती है।
तभी पीछे से कोई दबे पाँव आता है, और सुखजीत को पीछे से पकड़ लेता है, और वो सीढ़ियां के नीचे बनी दीवार से उसे चिपका देता है।
जब सुखजीत दीवार से लगती है, और पीछे मुड़कर देखती है तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं, क्योंकी वो और कोई नहीं बिटू होता है। बिटू एक हाथ सुखजीत के मुँह पर रखता है, और दूसरा हाथ उसकी कमर पर रखकर उसे अपने से अच्छे से चिपका लेता है।
सुखजीत बोलने की कोशिश कर रही थी, पर उसकी आवाज उसके मुँह में दम तोड़ रही थी। बिटू सुखजीत से एकदम पूरा चिपका हुआ था, जिससे सुखजीत की चूचियां उसकी छाती से लगी हुई थीं। फिर बिटू इधर-उधर देखता है, तभी उसे सीढ़ियां को नीचे एक स्टोर रूम बना दिखता है।
बिटू सुखजीत को धक्के मारकर स्टोर रूम में लेकर जाता है। फिर वो अंदर जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर
लेता है। बिटू सुखजीत को दरवाजे से लगा देता है। बिटू का एक हाथ सुखजीत के मुंह पर होता है, और दूसरा हाथ उसकी चूचियों पर होता है, जिसे वो मसलने लगता है। सुखजीत मछली की तरह तड़पने लगती है, पर बिट जाट के हाथों से बच निकलना उसके बस की बात नहीं थी।
फिर बिटू सुखजीत की चूचियों को अच्छे से मसलते हुए बोला- "बस कर भाभी मुझे अच्छे से पता है, तेरे अंदर कितनी आग भड़क रही है। मैंने देख लिया था की सरदार कैसे तेरी चूचियां चूसते-चूसते सो गया था..."
सुखजीत ये सुनते ही पानी-पानी हो जाती है। वो सोचने लगती है की बिटू की इस बारे में कैसे पता चल गया? कहीं इसने हरपाल और मुझे वो सब करते देख तो नहीं लिया। हाए राम... तभी सुखजीत को याद आता है, की वो दरवाजे को लाक करना तो भूल गई थी उस टाइम। अब सखजीत नखरे करना कम कर देती है।
बिटू जब उसकी चूचियां मसल रहा था, तब उसकी सोई हुई ठरक फिर से जाग जाती है। और सुखजीत फिर से
मजे लेने लगती है। फिर सुखजीत अपने ठरकी मन में सोचती है।
सुखजीत- “चल साला सरदार नहीं तो सरदार का यार ही सही आज रात के लिए। कम से कम मेरे ऊपर चढ़कर मेरी आग को तो शांत करेगा.” ये सोचते ही सुखजीत हिलना बिल्कुल ही बंद कर देती है।
बिटू ये देखकर समझ जाता है की सुखजीत पूरी गरम हो चुकी है। फिर बिटू अपना हाथ सुखजीत के मुँह से हटा देता है, और फिर अपने दोनों हाथ उसके चूतरों पर रखकर उसके चूतरों को मसलने लगता है।
सुखजीत बिटू को धक्का देकर बोली- “अफफ्फ... भाईजी आप ये मेरे साथ क्या कर रहे हो?"
बिटू सुखजीत के चूतरों को मसलते हुए बोला- “आहह... सच्ची भाभी बहुत मस्त गाण्ड है तेरी, जब आप चलती
हो तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आज तो मैं आपको चूसकर रख दूँगा..."