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कड़ी_68
सतबीर के फ्री होने के बाद वो सुखजीत के नंगे जिश्म से अलग हो जाता है। और सतबीर अपने कपड़े डालकर बाहर आ जाता है। बाहर आता देखकर रंधावा सतबीर की तरफ देखते हुए बोला।
रंधावा- “हाँ भाई, फिर कैसी लगी जट्टी?"
सतबीर- भाई आग है पूरी आग, सच में बहुत ही ज्यादा मस्त है।
रंधावा अपनी मूछों को ताव देते हुए बोला- “चल अब मैं भी हाथ सेंक कर आता हूँ, इस आग में..."
रंधावा अंदर चला जाता है, अंदर सुखजीत पूरी नंगी लंबी लेटी होती है। सुखजीत का नंगा जिश्म देखकर रंधावा मस्त हो जाता है। सुखजीत रंधावा को देखकर हँसती है। इस टाइम सुखजीत की हालत एक बाजार की गश्ती जैसी थी, जिसके साथ दो बंदे पूरी रात चोदने में लगे हुए थे। सुखजीत भी अब पूरी खुली होती है, वो रंधावा के सामने नंगी लेटी हुई, जरा सी भी शर्म नहीं करती।
रंधावा अपनी शर्ट के बटन खोलता है, और अपनी पैंट को ढीली करके वो सुखजीत के ऊपर आ जाता है। फिर वो उसके होंठों को चूसने लगता है। सुखजीत भी गरमी की वजह से उसका पूरा साथ दे रही होती है। सुखजीत की चूत अब फिर से अपना पानी निकालने लगती है।
रंधावा सुखजीत की चूचियों पर दाँत मारकर बोला- "आज अच्छे से एहसान उतार अपने पति की तरक्की का..."
सुखजीत- “आहह... आss एहसान उतारने के लिए तो आई हूँ मैं भाईजी। जो भी आपने करना है कर लो, ये जट्टी आपके नीचे लेटी हुई है...” कहकर सुखजीत रंधावा से लिपट जाती है।
रंधावा का लण्ड भी अब पूरा खड़ा हो जाता है। रंधावा अब बेड के किनारे पर जाकर खड़ा हो जाता है, और सुखजीत की दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लेता है। रंधावा ने हाथ से सुखजीत के चूतड़ों को पकड़ा हुआ था,
और दूसरे हाथ से अपनी पैंट को उतार देता है। पैंट उतारकर वो अपना खड़ा हुआ लण्ड बाहर निकाल लेता है।
सुखजीत रंधावा के लंबे लण्ड को देखकर हैरान हो जाती है। क्योंकी उसने आज से पहले इतना बड़ा लण्ड कभी भी नहीं लिया था। फिर रंधावा सुखजीत की चूत में अपना लण्ड रगड़ने लगता है, और अचानक ही वो अपना पूरा 9” इंच का लण्ड सुखजीत की चूत में उतार देता है। सुखजीत के मुँह से हल्की सी चीख निकलती है, और वो अपने दोनों हाथों से बेड की चादर को कस लेती है।
रंधावा अभी भी धीरे-धीरे सुखजीत को चोद रहा होता है। पर तभी रंधावा सुखजीत को कसकर पकड़ता है, और अपनी पूरी ताकत लगाकर वो एक जोरदार धक्का मारता है। जिससे रंधावा का लण्ड अबकी बार सीधा सुखजीत की बच्चेदानी पर जाकर लगता है, जिससे सुखजीत चिल्लाते हुए बोली।
सुखजीत- “आहह... आहह... हाई मर गई मैं..."
पर रंधावा सुखजीत पर जरा भी दया नहीं करता, वो पूरे जोश से सुखजीत की चूत को चोदने में लगा हुआ था। सुखजीत को भी अब रंधावा के लण्ड से चुदने का मजा आ रहा था। इसलिए वो रंधावा के हर धक्के का जवाब अपनी गाण्ड को हिलाकर दे रही थी। इसी तरह करीब 20 मिनट लगातार चुदाई के बाद अपना लण्ड बाहर निकाल लेता है।
फिर वो सुखजीत का हाथ पकड़कर उसे खींचकर खड़ा कर देता है। सुखजीत इससे पहले कुछ समझ पाती, वो सुखजीत को दीवार से लगा देता है। सुखजीत का मुँह दीवार की साइड होता है, और उसके दोनों हाथ भी दीवार से लगे हुए होते हैं।
सुखजीत- भाईजी ये आप क्या कर रहे हो?
रंधावा कुछ नहीं बोलता, और अपनी दो उंगलियां सुखजीत की चूत में डालकर अपनी उंगलियों को गीली कर देता है। और फिर सुखजीत के चूतरों पर एक जोरदार थप्पड़ मारकर, रंधावा अपनी गीली उंगलियां सुखजीत की गाण्ड की छेद पर रगड़ने लगता है। रंधावा सुखजीत की गाण्ड के छेद को गीला कर रहा होता है। सुखजीत को समझते देर नहीं लगती, की अब आगे उसके साथ क्या होने वाला है।
कुछ पलो में सुखजीत की गाण्ड के छेद गीला हो जाता है। फिर रंधावा सुखजीत के चूतरों को खोलकर अपने लण्ड को उसकी गाण्ड के छेद पर लगाता है। इससे सुखजीत एकदम से चौंक जाती है, और वो पीछे होने लगती है। पर रंधावा उसे कसकर पकड़े हुए थे, जिस वजह से वो चाहकर भी हिल नहीं पा रही थी। अब सुखजीत की गाण्ड में रंधावा के लण्ड का टोपा फँस चुका था।
सुखजीत दर्द से तड़पते हुए बोली- “हाई मर गई मैं प्लीज़्ज़... भाईजी ऐसा ना करो..”
रंधावा थोड़ा सा लण्ड अंदर डालकर सुखजीत के चूतरों पर थप्पड़ मारते हुए बोला- “चुप कर बहनचोद कुट्टी साली गश्ती कहीं की। बहन की लौड़ी तू बड़ा अपनी गाण्ड हिला-हिलाकर चलती थी ना। अब देख आज तेरी गाण्ड मैं कैसे फाड़ता हूँ... और रंधावा किसी को इतनी आसानी से छोड़ता नहीं समझी...”
इतने कहते ही रंधावा अपने लण्ड पर पूरा जोर डालता है, और फिर उसका लण्ड सुखजीत की टाइट गाण्ड को चीरता हुआ पूरा अंदर चला जाता है।
सुखजीत के साँस रुक जाती है और वो गुस्से में बोली- “हाए भाईजी... मैं मर गई आह्ह... आss निकालो प्लीज़्ज़... प्लीज़्ज़... वर्ना मैं इस दर्द से ही मर जाऊँगी.."
सुखजीत घोड़ी बनने की पूरी कोशिश करती है, पर रंधावा उसे जरा सा भी हिलने नहीं देता। और ऊपर से वो अपना पूरा लण्ड उसकी गाण्ड में से निकालकर एक बार फिर से बहुत जोर से धक्का मारता है। और उसके जोरदार धक्के से फिर से उसका
सका लण्ड सुखजीत की गाण्ड को फड़ता हुआ अंदर चला जाता है।
सुखजीत की हालत ऐसी हो जाती है, जैसे किसी मछली को पानी से निकाल दिया हो। सुखजीत के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। पर रंधावा पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ रहा था। वो बिना रुके हुए पूरी ताकत से अपना लण्ड सुखजीत की गाण्ड में अंदर-बाहर कर रहा था।
सुखजीत बस बेहोश होने वाली थी। रंधावा लगातार सुखजीत की गाण्ड को खड़ी करके चोदे जा रहा था। करीब 30 मिनट की चुदाई के बाद रंधावा अपने लण्ड का सारा पानी सुखजीत की गाण्ड के अंदर ही निकाल देता है। रंधावा अब सुखजीत को छोड़ देता है।
सुखजीत एक बार तो नीचे जमीन पर गिरने वाली होती है। पर वो अपने आपको संभालते हुए बेड पर गिर जाती है। सुखजीत की गाण्ड में से रंधावा के लण्ड का पानी निकल रहा था। फिर रंधावा बाहर निकल जाता है।
सतबीर ने रंधावा को बाहर आते देखके बोला- “भाई पूरा एक घंटा तू अंदर रहा क्या बात है?"
रंधावा- भाई तुझे पता ही है रंधावा गाण्ड मारने का शौकीन है। आज तक मैं बिना गाण्ड मारे रह सका हूँ।
सतबीर- हाए जरा मैं भी देखकर आऊँ, कैसी फटी पड़ी हुई है गाण्ड साली की।
सतबीर ये कहकर अंदर चला जाता है। सुखजीत बेड पर बिना कोई सुध बुध के उल्टी लेटी हुई थी। सुखजीत के खड़े चूतर देखकर सतबीर का लण्ड एक बार फिर से खड़ा हो जाता है। सतबीर देर ना करते हुए अपने सारे कपड़े निकालकर अपना लण्ड बाहर निकालता है।
सतबीर सुखजीत के ऊपर लेट जाता है, और अपना लण्ड उसकी गाण्ड पर सेट करके वो भी उसकी गाण्ड को मारने लगता है। सुखजीत को कुछ भी पता नहीं होता, की उसके साथ अब क्या हो रहा है? वो वैसे ही बेसुध होकर अपनी गाण्ड की चुदाई करवा रही थी। थोड़ी देर बाद सतबीर अपने लण्ड का सारा पानी सुखजीत की कमर ऊपर निकल देता है।
ऐसे ही सुबह के 4:00 बजे तक रंधावा और सतबीर बेहोश हुई सुखजीत को खूब अच्छे से चोदते हैं। वो कभी उसका मुँह तो कभी उसकी चूत, तो कभी गाण्ड में लण्ड डालकर सुखजीत को काफी जमकर चोदते हैं।
4:00 बजे सुखजीत को होश आता है, और उसकी नींद खुलती है। वो देखती है की वो बेड पर पूरी नंगी लेटी हुई थी। उसके दोनों ओर रंधावा और सतबीर नंगे लेटे हुए थे। उसके पूरे जिश्म पर लण्ड का पानी-पानी हो रखा था। तभी सुखजीत की नजर घड़ी पर पड़ती है। वो टाइम देखकर एकदम उठने वाली होती है, पर उसकी फटी हुई गाण्ड का दर्द उसे उठने नहीं देता।
फिर सुखजीत काफी हिम्मत करके उठती है, और वो अपने कपड़े ढूँढकर बहुत मुश्किल से डालती है। फिर
सुखजीत सीधा बाहर जाकर कार के पास जाती है, कार में वो भईया सोया हुआ होता है।
सुखजीत उसे उठाते हुए बोली- “ओये उठ अब..."
भईया- क्या है सोने दो मुझे।
सुखजीत- “ओ कंजर उठ.. मुझे घर छोड़कर आ अभी..."
फिर वो एकदम से उठता है और सुखजीत को देखकर हँसते हुए बोला- “बीबी जी काम हो गया आपका पूरा?"
सुखजीत- तू चुप कर, और मुझे घर छोड़कर आ।
फिर वो भईया कार स्टार्ट करता है, और सुखजीत कार में बैठ जाती है। करीब 30 मिनट में भईया सुखजीत को घर के बाहर उतार देता है। सुखजीत कार का दरवाजा खोलने ही लगती है। तभी वो भईया सुखजीत की चूचियों को मसल देता है, और अपने दूसरे हाथ से चूत और चूतड़ों को भी मसल देता है। सुखजीत पर एकदम हुए अचानक हमले से वो विचल जाती है। और वो एकदम भईया को धक्का मारकर बोली।
सतबीर के फ्री होने के बाद वो सुखजीत के नंगे जिश्म से अलग हो जाता है। और सतबीर अपने कपड़े डालकर बाहर आ जाता है। बाहर आता देखकर रंधावा सतबीर की तरफ देखते हुए बोला।
रंधावा- “हाँ भाई, फिर कैसी लगी जट्टी?"
सतबीर- भाई आग है पूरी आग, सच में बहुत ही ज्यादा मस्त है।
रंधावा अपनी मूछों को ताव देते हुए बोला- “चल अब मैं भी हाथ सेंक कर आता हूँ, इस आग में..."
रंधावा अंदर चला जाता है, अंदर सुखजीत पूरी नंगी लंबी लेटी होती है। सुखजीत का नंगा जिश्म देखकर रंधावा मस्त हो जाता है। सुखजीत रंधावा को देखकर हँसती है। इस टाइम सुखजीत की हालत एक बाजार की गश्ती जैसी थी, जिसके साथ दो बंदे पूरी रात चोदने में लगे हुए थे। सुखजीत भी अब पूरी खुली होती है, वो रंधावा के सामने नंगी लेटी हुई, जरा सी भी शर्म नहीं करती।
रंधावा अपनी शर्ट के बटन खोलता है, और अपनी पैंट को ढीली करके वो सुखजीत के ऊपर आ जाता है। फिर वो उसके होंठों को चूसने लगता है। सुखजीत भी गरमी की वजह से उसका पूरा साथ दे रही होती है। सुखजीत की चूत अब फिर से अपना पानी निकालने लगती है।
रंधावा सुखजीत की चूचियों पर दाँत मारकर बोला- "आज अच्छे से एहसान उतार अपने पति की तरक्की का..."
सुखजीत- “आहह... आss एहसान उतारने के लिए तो आई हूँ मैं भाईजी। जो भी आपने करना है कर लो, ये जट्टी आपके नीचे लेटी हुई है...” कहकर सुखजीत रंधावा से लिपट जाती है।
रंधावा का लण्ड भी अब पूरा खड़ा हो जाता है। रंधावा अब बेड के किनारे पर जाकर खड़ा हो जाता है, और सुखजीत की दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लेता है। रंधावा ने हाथ से सुखजीत के चूतड़ों को पकड़ा हुआ था,
और दूसरे हाथ से अपनी पैंट को उतार देता है। पैंट उतारकर वो अपना खड़ा हुआ लण्ड बाहर निकाल लेता है।
सुखजीत रंधावा के लंबे लण्ड को देखकर हैरान हो जाती है। क्योंकी उसने आज से पहले इतना बड़ा लण्ड कभी भी नहीं लिया था। फिर रंधावा सुखजीत की चूत में अपना लण्ड रगड़ने लगता है, और अचानक ही वो अपना पूरा 9” इंच का लण्ड सुखजीत की चूत में उतार देता है। सुखजीत के मुँह से हल्की सी चीख निकलती है, और वो अपने दोनों हाथों से बेड की चादर को कस लेती है।
रंधावा अभी भी धीरे-धीरे सुखजीत को चोद रहा होता है। पर तभी रंधावा सुखजीत को कसकर पकड़ता है, और अपनी पूरी ताकत लगाकर वो एक जोरदार धक्का मारता है। जिससे रंधावा का लण्ड अबकी बार सीधा सुखजीत की बच्चेदानी पर जाकर लगता है, जिससे सुखजीत चिल्लाते हुए बोली।
सुखजीत- “आहह... आहह... हाई मर गई मैं..."
पर रंधावा सुखजीत पर जरा भी दया नहीं करता, वो पूरे जोश से सुखजीत की चूत को चोदने में लगा हुआ था। सुखजीत को भी अब रंधावा के लण्ड से चुदने का मजा आ रहा था। इसलिए वो रंधावा के हर धक्के का जवाब अपनी गाण्ड को हिलाकर दे रही थी। इसी तरह करीब 20 मिनट लगातार चुदाई के बाद अपना लण्ड बाहर निकाल लेता है।
फिर वो सुखजीत का हाथ पकड़कर उसे खींचकर खड़ा कर देता है। सुखजीत इससे पहले कुछ समझ पाती, वो सुखजीत को दीवार से लगा देता है। सुखजीत का मुँह दीवार की साइड होता है, और उसके दोनों हाथ भी दीवार से लगे हुए होते हैं।
सुखजीत- भाईजी ये आप क्या कर रहे हो?
रंधावा कुछ नहीं बोलता, और अपनी दो उंगलियां सुखजीत की चूत में डालकर अपनी उंगलियों को गीली कर देता है। और फिर सुखजीत के चूतरों पर एक जोरदार थप्पड़ मारकर, रंधावा अपनी गीली उंगलियां सुखजीत की गाण्ड की छेद पर रगड़ने लगता है। रंधावा सुखजीत की गाण्ड के छेद को गीला कर रहा होता है। सुखजीत को समझते देर नहीं लगती, की अब आगे उसके साथ क्या होने वाला है।
कुछ पलो में सुखजीत की गाण्ड के छेद गीला हो जाता है। फिर रंधावा सुखजीत के चूतरों को खोलकर अपने लण्ड को उसकी गाण्ड के छेद पर लगाता है। इससे सुखजीत एकदम से चौंक जाती है, और वो पीछे होने लगती है। पर रंधावा उसे कसकर पकड़े हुए थे, जिस वजह से वो चाहकर भी हिल नहीं पा रही थी। अब सुखजीत की गाण्ड में रंधावा के लण्ड का टोपा फँस चुका था।
सुखजीत दर्द से तड़पते हुए बोली- “हाई मर गई मैं प्लीज़्ज़... भाईजी ऐसा ना करो..”
रंधावा थोड़ा सा लण्ड अंदर डालकर सुखजीत के चूतरों पर थप्पड़ मारते हुए बोला- “चुप कर बहनचोद कुट्टी साली गश्ती कहीं की। बहन की लौड़ी तू बड़ा अपनी गाण्ड हिला-हिलाकर चलती थी ना। अब देख आज तेरी गाण्ड मैं कैसे फाड़ता हूँ... और रंधावा किसी को इतनी आसानी से छोड़ता नहीं समझी...”
इतने कहते ही रंधावा अपने लण्ड पर पूरा जोर डालता है, और फिर उसका लण्ड सुखजीत की टाइट गाण्ड को चीरता हुआ पूरा अंदर चला जाता है।
सुखजीत के साँस रुक जाती है और वो गुस्से में बोली- “हाए भाईजी... मैं मर गई आह्ह... आss निकालो प्लीज़्ज़... प्लीज़्ज़... वर्ना मैं इस दर्द से ही मर जाऊँगी.."
सुखजीत घोड़ी बनने की पूरी कोशिश करती है, पर रंधावा उसे जरा सा भी हिलने नहीं देता। और ऊपर से वो अपना पूरा लण्ड उसकी गाण्ड में से निकालकर एक बार फिर से बहुत जोर से धक्का मारता है। और उसके जोरदार धक्के से फिर से उसका
सका लण्ड सुखजीत की गाण्ड को फड़ता हुआ अंदर चला जाता है।
सुखजीत की हालत ऐसी हो जाती है, जैसे किसी मछली को पानी से निकाल दिया हो। सुखजीत के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। पर रंधावा पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ रहा था। वो बिना रुके हुए पूरी ताकत से अपना लण्ड सुखजीत की गाण्ड में अंदर-बाहर कर रहा था।
सुखजीत बस बेहोश होने वाली थी। रंधावा लगातार सुखजीत की गाण्ड को खड़ी करके चोदे जा रहा था। करीब 30 मिनट की चुदाई के बाद रंधावा अपने लण्ड का सारा पानी सुखजीत की गाण्ड के अंदर ही निकाल देता है। रंधावा अब सुखजीत को छोड़ देता है।
सुखजीत एक बार तो नीचे जमीन पर गिरने वाली होती है। पर वो अपने आपको संभालते हुए बेड पर गिर जाती है। सुखजीत की गाण्ड में से रंधावा के लण्ड का पानी निकल रहा था। फिर रंधावा बाहर निकल जाता है।
सतबीर ने रंधावा को बाहर आते देखके बोला- “भाई पूरा एक घंटा तू अंदर रहा क्या बात है?"
रंधावा- भाई तुझे पता ही है रंधावा गाण्ड मारने का शौकीन है। आज तक मैं बिना गाण्ड मारे रह सका हूँ।
सतबीर- हाए जरा मैं भी देखकर आऊँ, कैसी फटी पड़ी हुई है गाण्ड साली की।
सतबीर ये कहकर अंदर चला जाता है। सुखजीत बेड पर बिना कोई सुध बुध के उल्टी लेटी हुई थी। सुखजीत के खड़े चूतर देखकर सतबीर का लण्ड एक बार फिर से खड़ा हो जाता है। सतबीर देर ना करते हुए अपने सारे कपड़े निकालकर अपना लण्ड बाहर निकालता है।
सतबीर सुखजीत के ऊपर लेट जाता है, और अपना लण्ड उसकी गाण्ड पर सेट करके वो भी उसकी गाण्ड को मारने लगता है। सुखजीत को कुछ भी पता नहीं होता, की उसके साथ अब क्या हो रहा है? वो वैसे ही बेसुध होकर अपनी गाण्ड की चुदाई करवा रही थी। थोड़ी देर बाद सतबीर अपने लण्ड का सारा पानी सुखजीत की कमर ऊपर निकल देता है।
ऐसे ही सुबह के 4:00 बजे तक रंधावा और सतबीर बेहोश हुई सुखजीत को खूब अच्छे से चोदते हैं। वो कभी उसका मुँह तो कभी उसकी चूत, तो कभी गाण्ड में लण्ड डालकर सुखजीत को काफी जमकर चोदते हैं।
4:00 बजे सुखजीत को होश आता है, और उसकी नींद खुलती है। वो देखती है की वो बेड पर पूरी नंगी लेटी हुई थी। उसके दोनों ओर रंधावा और सतबीर नंगे लेटे हुए थे। उसके पूरे जिश्म पर लण्ड का पानी-पानी हो रखा था। तभी सुखजीत की नजर घड़ी पर पड़ती है। वो टाइम देखकर एकदम उठने वाली होती है, पर उसकी फटी हुई गाण्ड का दर्द उसे उठने नहीं देता।
फिर सुखजीत काफी हिम्मत करके उठती है, और वो अपने कपड़े ढूँढकर बहुत मुश्किल से डालती है। फिर
सुखजीत सीधा बाहर जाकर कार के पास जाती है, कार में वो भईया सोया हुआ होता है।
सुखजीत उसे उठाते हुए बोली- “ओये उठ अब..."
भईया- क्या है सोने दो मुझे।
सुखजीत- “ओ कंजर उठ.. मुझे घर छोड़कर आ अभी..."
फिर वो एकदम से उठता है और सुखजीत को देखकर हँसते हुए बोला- “बीबी जी काम हो गया आपका पूरा?"
सुखजीत- तू चुप कर, और मुझे घर छोड़कर आ।
फिर वो भईया कार स्टार्ट करता है, और सुखजीत कार में बैठ जाती है। करीब 30 मिनट में भईया सुखजीत को घर के बाहर उतार देता है। सुखजीत कार का दरवाजा खोलने ही लगती है। तभी वो भईया सुखजीत की चूचियों को मसल देता है, और अपने दूसरे हाथ से चूत और चूतड़ों को भी मसल देता है। सुखजीत पर एकदम हुए अचानक हमले से वो विचल जाती है। और वो एकदम भईया को धक्का मारकर बोली।