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Adultery Thriller सुराग

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तभी फोन की घन्टी फिर बजी ।

मैंने रिसीवर उठाकर कान से लगाया और बोला - “हल्लो !”

कोई उत्तर न मिला ।

“हल्लो ।” - मैं फिर बोला ।

एकाएक लाइन कट गयी ।

मैंने फोन को वापिस क्रेडल पर पटक दिया ।

“कौन था ?” - डॉली उत्सुक भाव से बोली ।

“पता नहीं ।” - मैं बोला - “कोई बोला ही नहीं । कहीं मेरी निगरानी करते पुलिसियों ने फोन न किया हो !”

“यानी कि आप की आवाज सुनकर ही उन्हें तसल्ली हो गयी होगी कि आप यहां मौजूद हैं !”

“जाहिर है । तभी तो बिना बोले ही लाइन काट दी ।”

“फिर तो बहुत अच्छा हुआ कि ऐसा फोन आपकी गैरहाजिरी में न आया ।”

“वो तो है ।”

“वो चौकीदार ।” - डॉली धीरे से बोली - “हमेशा तो बेहोश नहीं रहने वाला ।”

“क्या मतलब ?” - मैं उलझनपूर्ण भाव से उसकी तरफ देखता हुआ बोला ।

“अब तक क्या पुलिस को उस वारदात की खबर वो कर नहीं चुका होगा ?”

“तो क्या हुआ ? उसने मेरी सूरत तो देखी नहीं थी । देखी भी होती तो उसे क्या पता मैं कौन था ! ऊपर से खुद पुलिस वाले जो कि मेरी निगरानी के लिये तैनात हैं - मेरे जामिन हैं कि वारदात के वक्त के आसपास मैं यहां अपने आफिस में बैठा अपनी सेक्रेट्री को डिक्टेशन दे रहा था ।”

“फिर भी किसी जायज या नाजायज वजह से अगर पुलिस यहां आ गयी और उन्होंने यहां से ये रिवाल्वर बरामद कर ली तो आप इसकी अपने पास मौजूदगी की बाबत कोई सजता सा जवाब दे पायेंगे !”

“ओह ! डॉली, तू तो बहुत सयानी है ।”

“आप को फौरन इस रिवाल्वर से पीछा छुड़ाना चाहिये ।”

“मैं इसे यहां कहां छुपाऊं ?”

“आप इसे आफिस में कहीं छुपाने की फिराक में हैं ?”

“नहीं, ये तो ठीक नहीं होगा । मैं... मैं इसे अपनी कार में छुपाता हूं । मेरी कार में एक स्पेयर टायर और टयूब पड़ी है । मैं टायर में से टयूब निकाल कर टयूब फाड़ के उसमें रिवाल्वर धकेल कर टयूब वापिस टायर में डाल दूंगा । फिर जब मेरा दांव लगेगा मैं इसको वहां से निकाल कर इसकी ये जांच करवाने की कोशिश करूंगा कि ये मर्डर वैपन है या नहीं ।”

“अगर ये मर्डर वैपन न निकला तो ?”

“तो मैं इसका पार्सल बना कर इसे वापिस अस्थाना के पास भिजवा दूंगा । आ चलें ।”

हमने दफ्तर की बत्तियां बन्द कीं, उसे ताला लगाया और नीचे पहुंचे । पार्किंग में जाकर हम कार में सवार हुए तो मैं बोला – “खाने का क्या करेगी ?”

“घर जाके बनाऊंगी ।” – वो बोली ।

“अगर ऐतराज न हो तो आज खाना मेरे साथ हो जाये ।”

“कहां ?”

“कहीं भी । किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में ।”

“मैं तीन शर्तों पर आपके साथ रेस्टोरेंट में खाना मंजूर कर सकती हूं ।”

“शर्तें ! ठीक है, बोल ।”

“नम्बर एक, वहां अन्धेरा न हो । नम्बर दो, वो रेस्टोरेंट बार भी न हो । नम्बर तीन, बिल मैं चुकाऊंगी ।”

“क्या !”

“बिल मैं चुकाऊगी ।”

“अरी कमबख्त, जहां मैं तुझे ले जाना चाहता हूं, वहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला कोई शख्स नहीं चुका सकता ।”

“तो ऐसी जगह चलिये जहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला शख्स चुका सकता हो ।”

“लेकिन तू बिल चुकाना क्यों चाहती है ?”

“क्योंकि मैं चाहती हूं कि आज आप मेरे मेहमान बनें ।”

“लेकिन क्यों ?”

“मेरी इच्छा ।”

“अच्छी बात है ।”

मैंने कार को पार्किंग में से निकालकर आगे बढ़ाया । कार के मेन रोड तक पहुंचने तक मुझे ऐसा न लगा कि कोई मेरे पीछे था लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि मेरा पीछा छोड़ दिया गया था । वो लोग इस मामले में बहुत तजुर्बेकार और मेरी अपेक्षा से ज्यादा चालाक हो सकते थे ।

डॉली लोधी कालोनी रहती थी । इसलिये डिनर के लिये मैंने उसके करीब की जगह एम्बैसेडर होटल चुना ।

मैंने कार को जब एम्बैसेडर की पार्किग में खड़ा किया तो मुझें अपने पीछे कोई वाहन वहां दाखिल होता दिखाई न दिया ।

हम दोनों कार से निकले ।

“सामने निगाह रखना ।” - मैं बोला - “कोई हमारी तरफ आता या दूर से हमें ताड़ता लगे तो बताना ।”

उसने सहमति मे सिर हिलाया ।

मैंने कार के पीछे जाकर डिक्की को चाबी लगायी और उसका ढक्कन उठाया । भीतर पड़े टायर ट्यूब में रिवाल्वर छुपाने में मुझे कुल जमा दो मिनट लगे । फिर डॉली के साथ मैं भीतर होटल के चायनीज रेस्टोरेंट में पहुंचा । डॉली से राय करके मैंने वेटर को आर्डर दिया और फिर बोला - “मैं एक मिनट टायलेट होकर आता हूं ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

मैं वहां से उठा और सीधा बार में पहुंचा । मैं एक बार स्टूल पर बैठ गया और उतावले भाव से बोला – “पीटर स्काट । डबल ।”

बार मैन ने मेरे सामने विस्की का गिलास रखा तो मैं उसे गटागट पी गया ।

“वन मोर ।” - मैं बोला ।

उसको नया पैग बनाता छोड़कर मैं होटल के मुख्यद्वार पर पहुंचा । वहां से मैंने दायें-बायें बाहर झांका तो मुझे कैसा भी कोई आदमी वहां न दिखाई दिया । शायद ये सोचके कि होटल में खाना खाकर तो मैं अब सोने के लिये घर ही जाता, उन्होने मेरा पीछा छोड़ दिया था ।

मैं वापिस बार में पहुंचा । मेरा नया पैग काउन्टर पर मेरा इन्तजार कर रहा था । मैंने उसे भी हलक में उंडेला और बोला - “बिल ।”

“बिल इज पेड, सर ।” - बारमैन अदब से बोला ।

“क्या !”

“अभी एक मैडम यहां आयी थीं, वो पेमेन्ट कर गयीं ।”

“सत्यानाश !”

“साथ में आप के लिये मैसेज भी छोड के गयी हैं ।”

“क्या ?”

“सूप ठण्डा हो रहा है ।”

“ओह !”

मैं रेस्टोरेंट में वापिस डॉली के पास पहुंचा ।

“सॉरी ।” - मैं बोला

“किस बात के लिये ?” - उसने बनावटी हैरानी जाहिर की ।

“तुझे मालूम है किस बात के लिये । लेकिन क्या करूं ! छुटती नहीं है काफिर मुंह की लगी हुई ।”

“मेरी एक शर्त ये भी थी कि जहां हम खाना खाने जायें, वहां बार न हो ।”

“तूने कहा था कि हम जिस रेस्टोरेंट में खाना खाने जायें, वो बार न हो । ये रेस्टोरेंट तो बार नहीं हैं ।”

“जाने दीजिये अब । सूप लीजिये । ठण्डा हो रहा है ।”

मैं खामोशी से सूप पीने लगा ।

“एक बात बताइये ।” – भोजन के दौरान वो बोली– “रिवाल्वर तो, जाहिर है कि, इतफाक से आपके हाथ लगी, असल में आपको अस्थाना के आफिस में किस चीज की तलाश थी ?”

“शबाना के कागजात की ।” - मैं बोला - “लेकिन वो वहां कहीं नहीं थे ।”

“क्या पता उसने वो कागजात हाथ आते आते ही नष्ट कर दिये हों !”

“अक्ल वाला काम तो ये ही है । अगर उसे ये जानने की उत्सुकता रही होगी की कागजात में औरों के बारे में क्या था, मेरे बारे में कुछ था या नहीं तो हो सकता है कि वो उन्हें रखे रहा हो । बहरहाल कागजात उसके दफ्तर में तो नहीं थे ।”

“उसके घर पर होंगे ।”

“जैसी कर्कशा उसकी बीवी है, उस लिहाज से ये बात नहीं जंचती कि अपनी पोल-पट्टी वो अपने घर लेके गया हो जहां कि वो कागजात उसकी बीवी के हत्थे भी चढ़ सकते थे ।”

“या शायद कागजात उसके पास कभी रहे ही न हों ।”

“अब जब कि शबाना की हत्या के वक्त की उसके पास एलीबाई है तो ये भी हो सकता है ।”

“यानी कि अब आपका ये विश्वास डांवाडोल हो रहा है कि सब किया धरा अस्थाना का है ।”

“जो बातें खुल के सामने आ रही हैं उनकी वजह से तो हो रहा है लेकिन मुमकिन है कि वो मेरी उम्मीद से ज्यादा चालाक हो और उसने ऐसी कोई सूरत निकाल ती हो जिससे ये भरम भी बना रहे कि वो कातिल नहीं हो सकता था लेकिन फिर भी कत्ल उसी ने किया हो ।”

“खुद ?”

“हां । ये भाड़े के कातिल वाली बात अब मुझे कमजोर लग रही है । डॉली, जरा सोच । वो शबाना का कत्ल क्यों करना चाहता था ? क्योंकि शबाना उसे ब्लैकमेल कर रही थी । अब अगर वो किसी किराये के कातिल से शबाना का कत्ल करवाता तो ये तो आसमान से गिरकर खजूर में अटकने वाली बात होती ।”

“क्यों ?”

“क्यों ! अरे, ये भी तो हो सकता था कि वो किराये का कातिल शबाना का कत्ल करने के बाद वो कागजात अपने कब्जे में करता और फिर शबाना की तरह खुद सब को ब्लैकमेल की धमकियां जारी करने

लगता । ऊपर से किराये का कातिल उम्र भर अस्थाना का राजदां रहता कि उसने शबाना का कत्ल करवाया था ।”

“उसको एतबार होगा कि ये बात उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती थी । आखिर उसने आपका भी कत्ल करवाने की कोशिश की थी ।”

“अब मैं ठण्डे दिमाग से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि ऐसा कुछ नहीं था । जो तीन दादे उसने मेरे पीछे लगाये थे, जरुर उन का मकसद मुझे धमकाना ही था, धमका कर मेरे से कागजात हासिल करना ही था । मेरे कत्ल से दरअसल, अस्थाना का कोई मकसद तब तक हल नहीं होता था जब तक कि मैं कागजात की बाबत सब कुछ सच-सच न बकता । कागजात के बारे में बिना कुछ कहे मैं मर जाता तो बाद में कागजात कहीं और से सिर उठा सकते सकते थे और पहले से ज्यादा बड़ी विपत्ति बन के सामने आ सकते थे ।”

“आप तो अस्थाना को चौतरफा बरी किये दे रहे है ।”

“वैसे तो मेरा कलेजा फटता है ऐसा करते लेकिन हकीकत तो हकीकत ही है । लगता है मैं अस्थाना के कुछ ज्यादा ही गले पड़ रहा था ।”

“अब अस्थाना का गला छोड़ेंगे तो किस का गला थामेंगे ?”

“अभी कुछ कह नहीं सकता । काफी कुछ पाण्डेय की पड़ताल पर निर्भर करता है ।”

फिर बाकी सारा समय खामोशी से खाना खाते गुजारा ।

आखिरकार जब बिल आया तो मैंने डॉली से हाथ जोड़ कर गुजारिश करने में कसर न छोड़ी कि वो बिल मुझे देने दे लेकिन वो न मानी ।

“अगली बार आप दे दीजियेगा ।” - वो बिल चुका कर उठती हुई बोली - “हिसाब बराबर हो जायेगा ।”

“यानी कि अगली बार होगी ?”

“हो सकती है ।”

हम बाहर आ कर कार में सवार हुए । मैंने कार को उसके घर की ओर दौड़ा दिया ।
 
अब मुझे परवाह नहीं थी कि कोई मेरा पीछा कर रहा था या नहीं । अब तो, जबकि डॉली को ड्राप करने के बाद मेरा आखिरी पड़ाव मेरा अपना घर ही था, मेरे पीछे लगे लोग अपना टाइम ही बरबाद करते ।

रास्ते में मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और मंथर गति से गाड़ी चलाता हुआ पचौरी की बाबत सोचने लगा ।

चाण्डाल चौकड़ी में से वो ही एक इकलौता शख्स था जो शबाना के कत्ल के बाद से मुझे अभी तक नहीं मिला था ।

“क्या सोच रहे हैं ?” – डॉली बोली ।

“सोच नहीं रहा” - मैं अनमने भाव से बोला - “जो ताबूत मेरे पास है और जो अस्थाना को फिट नहीं आ रहा उसके लिये कोई और मुर्दा ट्राई कर रहा था ।”

“कौन ?”

“प्रभात पचौरी । वो भी अस्थाना की ही तरह शबाना की फैन क्लब का चार्टर्ड मेम्बर था । चारों में से यही एक शख्स है जो शादीशुदा नहीं है । इसका मानसी माथुर नाम की एक बहुत बड़े बाप की बेटी से अफेयर है और पचौरी उससे शादी करने के लिये मरा जा रहा है । मानसी के घर वालों की नाक सोसायटी में इतनी ऊंची है कि उनको खबर लग गयी कि उनके भावी दामाद का अफेयर एक कालगर्ल से था वो पचौरी से यूं बिदकेंगे जैसे एकाएक वो एड्स का शिकार हो गया हो । पचौरी ऐसा होने देना अफोर्ड नहीं कर सकता । उसने खुद मुझे बताया था कि शबाना ने उसे साफ धमकी दी थी कि अगर पचौरी ने उसकी मांग कबूल न की तो वो खुद मानसी के घर जाकर उसे और उसके मां बाप को पचौरी से अपने ताल्लुकात की मुकम्मल दास्तान, बमय सबूत, सुना कर आयेगी ।”“ये तो कत्ल का तगड़ा उद्देश्य है ।”

“हां ।” - मैं कार को डॉली के घर वाले ब्लाक में मोड़ता हुआ बोला – “शबाना से पीछा छूटे बिना पचौरी की मानसी से शादी नहीं हो सकती थी । और शबाना थी कि...”

एकाएक डॉली के मुंह से घुटी हुई सिसकारी निकली । उसने कस कर मेरी बांह पकड़ ली ।

“क्या हुआ ?” - मैं हड़बड़ा कर बोला ।

“गाड़ी रोकिये । फौरन । यहीं ।”

मैंने जोर से कार को ब्रेक लगायी ।

“हुआ क्या ?” – मैंने फिर पूछा ।

“मेरे घर की बत्तियां जल रही हैं ।” – वो आतंकित भाव से बोली – “मेरे माता पिता लौट आये मालूम होते हैं ।”

“लेकिन वो तो परसों लौटने वाले थे !”

“पता नहीं कैसे जल्दी लौट आये ।” – वो रुंआसे स्वर में बोली – “अब मेरा क्या होगा ?”

“क्यों ? तुझे क्या हुआ है ?”

“पूछते हैं क्या हुआ है ? आधी रात होने को है । इतनी रात गये वो मुझे घर लौटता देखेंगे तो वो क्या सोचेंगे मेरे बारे में ? यही न कि उनकी गैरहाजिरी में मैं ...”

“तू घबरा नहीं ।” – मैंने उसे पुचकारा – “मैं तेरे साथ चलता हूं । मैं तेरे माता पिता को समझा दूंगा ।”

“आपके साथ होने से तो वो और भी गलत सोचेंगे ...”

“नहीं सोचेंगे । अब तू इतना गिरा पड़ा न समझ मुझे । अब हौसला रख और चल मेरे साथ ।”

वो कार से निकली और मन-मन के कदम रखती मेरे साथ आगे बढ़ी ।

उसका फ्लैट पहली मंजिल पर था । सीढ़ियों के रास्ते हम ऊपर पहुंचे तो वहां और ही नजारा मिला ।

दो कमरों के उस फ्लैट का उस घड़ी ये हाल था जैसे भयानक आंधी तूफान ने अपना मुकम्मल जोर वहीं आजमाया हो । हर तरफ अस्त-व्यस्तता का बोलबाला था जो ये जाहिर करता था कि वहां की बड़ी जल्दी में, बड़ी बेरहमी से तलाशी ली गयी थी ।

“लगता है ।” – मैं धीरे से बोला – “तलाशी का ये आलम हमारे आने से कुछ क्षण पहले तक भी जारी था । कोई बड़ी बात नहीं कि मेरी कार के ब्लाक में दाखिल होने पर ही तलाशी लेने वाला – या वाले – यहां से भागा हो । इसी वजह से वो तमाम दरवाजे खुले और बत्तियां जलती छोड़ गया ।”

“लेकिन ।” – डॉली बोली – “इतनी रात गये, बत्तियां जला कर यूं सरेआम तलाशी ...”

“उसे मालूम होगा कि तू कहां थी और तेरे माता पिता कहां थे । उसे मालूम होगा कि एकाएक ऊपर से वहां कोई नहीं आ जाने वाला था ।”

“हम आये तो हैं ।”

“उसे तेरे और भी लेट घर लौटने की उम्मीद होगी ।”

“लेकिन मेरे घर की तलाशी क्यों ?”

“क्योंकि तू मेरी सैक्रेट्री है । मेरे फ्लैट और आफिस के अलावा किसी को ये जगह भी सूझी होगी जहां कि मैं कुछ छुपा सकता था ।”

“कुछ क्या ?”

“इस वक्त तो मुझे शबाना के कागजात ही सूझ रहे हैं ।”

“वो तो आपके पास से पहले ही चोरी जा चुके हैं ।”

“हां । लेकिन यहां घुसे चोर को इस बात की खबर नहीं होंगी न ।”

“अगर ये बात थी तो ऐसी तलाशी पहले आप के घर की और आफिस की होनी चाहिये थी ?”

“घर की क्या पता हुई हो । ग्रेटर कैलाश पहुंचने पर हो सकता है कि मुझे ऐसा ही नजारा अपने भी घर पर देखने को मिले और क्या पता चोर इस घड़ी आफिस ही खंगाल रहा हो ।”

“अब क्या होगा ?”

“अब सब से पहले तो पुलिस को ही फोन करना होगा ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

मैंने पुलिस को फोन किया ।

“यहां की खबर ।” - डॉली बोली - “आपके उस ए सी पी तक भी पहुंचेगी जो कत्ल के दोनों केसों की तफ्तीश कर रहा है ?”

“पहुंच सकती है ।” – मैं बोला – “मेरी यहां मौजूदगी की वजह से पहुंच सकती है ।”

“तब वो आप पर ये शक नहीं करेगा कि आप उससे काफी कुछ छुपाते रहे हैं ? यहां की तलाशी का सीधा मतलब यही नहीं लगायेगा कि यहां आप ही का कोई माल मैंने छुपाकर रखा हुआ था । क्योंकि आपके ख्याल से किसी को इस मामले में मेरे घर का ख्याल नहीं आ सकता था ?”

“वो ये ही सोचेगा । अगर यहां से कुछ चोरी नहीं गया है तो बिल्कुल यही सोचेगा । तू जरा झटपट अपना कीमती सामान चैक तो कर ।”

उसने किया ।

“सब कुछ चाक चौबन्द है ।” – वो बोली ।

“फिर तो हो गया काम ।” – मैं बोला – “अब तो वो मेरे पर ये भी इल्जाम लगा सकता है कि मैं झूठ बोल रहा था कि मेरी रिवाल्वर मेरे फ्लैट से एक डेढ महीना पहले चोरी गयी हो सकती थी । अब तो वो ये दावा करेगा कि जरूर हाल ही में मेरे फ्लैट का भी किसी ने ये ही हाल किया था और तभी रिवाल्वर चुरायी थी जो कि सच भी है । यानी कि कोमलकी लाश के पहलू में अपनी रिवाल्वर पड़ी देखने से पहले ही मुझे मालूम था कि वो चोरी जा चुकी थी ।”

“यानी कि जो हत्यारा है, वही चोर है । यहां वाला भी और आपके फ्लैट में घुसने वाला भी ?”

“हालात का इशारा तो इसी तरफ है ।”

“और तलाश उसे शबाना के कागजात की थी ?”

“और किस चीज की होगी ? और तो किसी कीमती चीज का दख्ल है ही नहीं इस केस में ।”

“उसने ये कैसे सोच लिया कि कागजात आपके अधिकार में थे ?”

“इसका एक जवाब अब मुझे सूझ रहा है । मुझे लगता है कि शबाना के कत्ल के फौरन बाद ही हत्यारा - जैसा कि मैं पहले समझ रहा था - फार्म हाउस से कूच नहीं कर गया था । बाथरूम में मेरी मौजूदगी का अहसास होने पर वो बंगले से जरूर खिसक गया था । लेकिन आसपास ही छुप गया था । जरूर उसने मुझे वहां से कूच करते देखा होगा और यूं मुझे पहचाना भी होगा । मेरे वहां से चले जाने के बाद वो दोबारा बंगले में दाखिले हुआ होगा और उसने शबाना के कागजात की तलाश शुरू की होगी । ये बात यूं भी साबित

होती है कि मैंने शबाना की मेज के दराजों का ताला शबाना के एक हेयर पिन की मदद से खोला या जबकि पुलिस ने ताले के छेद के इर्द गिर्द ऐसी खरोंचे बनी हुई पायी थी जैसे उसे किसी तीखे औजार से जबरन खोला गया हो । जाहिर है कि ताला खोलने के लिये वो तीखा औजार मेरे वहां से चले जाने के बाद हत्यारे ने इस्तेमाल किया था और यूं कागजात के मामले में मेज के तीनों दराजों में झाडू फिरा पाया था । तभी वो समझ गया था कि कागजात मैं ले गया था जो कि पहला मौका हाथ आते ही उसने मेरे फ्लैट में घुस कर बरामद कर लिये थे । उन कागजात के हाथ आये बिना उसका काम मुकम्मल जो नहीं होता था ।”

“उसका मुकम्मल काम शबाना का कत्ल और कागजात हथिया कर उन्हें नष्ट करना था ?”

“बिल्कुल ।”

“दोनों काम कर तो लिये उसने ! फिर भी अभी टिक कर क्यों नहीं बैठता वो ?”

“यही बात तो समझ में नहीं आ रही ।”

तभी पुलिस वहां पहुंची ।

“क्या हुआ ?” - एक सब-इन्स्पेक्टर ने सवाल किया ।

मैंने बताया ।

“फ्लैट आपका है ?”

“नहीं ।” - मैं बोला - “इनका है ।”

“और आप ?”

मैंने उसे अपना परिचय दिया और अपना एक विजिटिंग कार्ड भी पेश किया ।

मेरा प्ररिचय प्राप्त करते ही उसके नेत्र फैले ।

“मैं एक मिनट में आया ।” - वो बोला और फिर लम्बे डग भरता वहां से बाहर निकल गया ।

मैं समझ गया कि वो तलवार को फोन करने गया था ।

पांच मिनट में वो वापिस लौटा ।

“चोरी क्या गया है ?” - उसने सवाल किया ।

“कुछ नहीं ।” - जवाब डॉली ने दिया ।

“आपने चैक किया है ?”

“सरसरी तौर पर चैक किया है ।”

“आपको किस पर शक है ? किसी की निशानदेही करना चाहती हैं आप इस मामले में ?”

“नहीं ।”

वो यूं ही हम से उल्टे सीधे सवाल तब तक पूछता रहा जब तक कि ए सी पी तलवार वहां न पहुंच गया ।
 
उसने हालात का मुआयना किया, सब-इंस्पेक्टर को एक ओर ले जाकर उससे चन्द सवाल किये और फिर मेरे करीब पहुंचा ।

“ये कोई मामूली चोरी की वारदात नहीं, मिस्टर प्राइवेट डिटेक्टिव ।” - वो बोला - “न ही ये किसी मामूली चोर का कारनामा है । यहां जो कुछ हुआ है, उसका सीधा सम्बन्ध शबाना और कोमलके कत्ल से है, तुम्हारी रिवाल्वर से है और खुद तुमसे है । यहां की तलाशी कत्ल की उन दो वारदातों की ही एक्सटेंशन है और ये सिलसिला किसी न किसी रूप में अभी आगे चलेगा और यकीन जानो, तुम्हें अच्छी तरह से लपेटेगा ।”

“उस लपेटे से बचने के लिये” – मैं बोला – “मैं क्या कर सकता हूं ?”

“बहुत कुछ कर सकते हो तुम । मसलन तुम सच बोल सकते हो, तुम पुलिस से जो कुछ अब तक छुपाते चले आ रहे हो, उसे अब बयान कर सकते हो ।”

“मैं कुछ नहीं छुपा रहा ।”

“चलो, न सही । तुम्हारी पुलिस से सहयोग करने की नीयत हो तो मैं एक राय दूं ?”

“दीजिये । पुलिस से सहयोग की मेरी पूरी-पूरी नीयत है ।”

“तुम कहते हो कि पिछले तेरह महीनों से तुम शबाना को जानते थे । मेरी राय ये है कि शबाना से अपने ताल्लुकात को एक बार पूरे का पूरा अपने जेहन में उतारो, और पिछले कुछ महीनों में आयी उसके व्यवहार में कोई तब्दीली, उसके रवैये में आयी कोई खूबी या खामी को याद करने की कोशिश करो । उसने किसी से कोई खतरा महसूस किया हो ! किसी से अपनी किसी अदावत का जिक्र किया हो ! या किसी में कोई खास ही दिलचस्पी दिखाई हो !” – वो एक क्षण ठिठका उसने घूरकर मुझे देखा और फिर बोला – “परसों सुबह मैंने तुमसे एक सवाल किया था कि तुम्हें शबाना के अपने जैसे कितने मेल फ्रेंड्स की वाकफियत थी । तुमने किसी की भी वाकफियत होने से इन्कार किया था । उस सवाल का जवाब मैं अभी भी चाहता हूं । मौजूदा हालात को मद्देनजर रखते हुए तुम्हारी भी दिलचस्पी होनी चाहिये उस सवाल का कोई मुनासिब जवाब मुझे सुझाने में ।”

“है तो सही ।”

“गुड । तो अब कोई नाम याद आया ?”

“नहीं ।”

“पुलिस से ऐसा रवैया अख्तियार करने का नतीजा जानते हो ?”

“जो नतीजा होगा, मैं भुगत लूंगा ।”

“ये भी भुगत लेंगी ?” – वो डॉली की ओर इशारा करता हुआ बोला ।

मेरे मुंह से बोल न फूटा ।

“जब चोर यहां घुसा था, तब ये घर पर नहीं थी । होतीं तो जानते हो क्या होता ? तो इसी बिखरे सामान में कहीं इनकी लाश भी पड़ी होती ।”

डॉली के मुंह से एक घुटी हुई सिसकारी निकली ।

“आप हमें डराने की कोशिश न करें ।” – मैं दिलेरी से बोला – “मुझे जो कुछ मालूम था, वो मैंने बता दिया । आगे कुछ याद आयेगा तो वो भी बता दूंगा ।”

“याद करोगे तो बताओगे न ! तुम्हारी याद करने की नियत होगी तो याद करोगे न !”

“आपकी भी कुछ करने की नीयत होगी तो करेंगे न !”

“क्या मतलब ?”

“तीन दिन में दो कत्ल हो गये । दोनों अभी तक अनसुलझे हैं । जब कि उनकी तफ्तीश आप सरीखा युवा, होनहार उच्चाधिकारी कर रहा है ।”

वो तिलमिलाया । कुछ क्षण वो खा जाने वाली निगाहों से मुझे घूरता रहा, फिर धीरे-धीरे उसने अपने पर काबू पा लिया ।

“पुलिस के पास कोई जादू का डण्डा नहीं होता ।” - वो बड़े सब्र से बोला - “जिसे घुमाया और मन चाहा नतीजा हासिल कर लिया ।”

मैं खामोश रहा । उस घड़ी उसे और भड़काना ठीक जो नहीं था ।

“आप कहती हैं ।” – फिर वो डॉली से सम्बोधित हुआ – “कि यहां से कुछ चोरी नहीं गया है ।”

“कोई कीमती चीज चोरी नहीं गयी है ।” – डॉली बोली ।

“कोई ऐसी चीज चोरी गयी हो सकती है जिसे आप मामूली मानती हों लेकिन चोर के लिये जो बेशकीमती हो !”

“ऐसी क्या चीज हो सकती है ?”

“उस चीज के बारे में क्या ख्याल है जो मिस्टर राज ने आपके घर में छुपा के रखने के लिये सौपी थी ?”

“ऐसी कोई चीज नहीं है । इन्होंने मुझे कुछ नहीं सौंपा !”

“तो फिर यहां की ऐसी तलाशी क्यों हुई ?”

“ये तो चोर ही बेहतर बता सकता है कि उसे यहां किस चीज की तलाश थी ।”

“इतना तो आप भी बता सकती हैं कि उसकी तलाश कामयाब हुई है या नहीं ।”

“अब क्या फर्क पड़ता है !”

“फर्क पड़ता है । उसकी तलाश कामयाब नहीं हुई तो वो यहां फिर आ सकता है ।”

डॉली ने व्याकुल भाव से मेरी तरफ देखा ।

“वो अपना वक्त ही जाया करेगा ।” - मैं बोला - “मैंने डॉली को यहां छुपा कर रखने के लिये कुछ नहीं सौंपा ।”

उसने मेरी बात की तरफ ध्यान न दिया । वो फिर डॉली से मुखातिब हुआ – “आप यहां अकेली रहती हैं ?”

“नहीं ।” - डॉली बोली - “मेरे माता पिता साथ रहते हैं । लेकिन वो हरिद्वार गये हुए हैं । दो दिन में लौटेंगे ।”

“मेरी राय में आप उन्हें फौरन वापिस बुला लीजिये ।”

“ठीक है ।”

तलवार मेरी तरफ घूमा, वो कुछ क्षण अपलक मुझे देखता रहा और फिर बोला – “चोट कैसे लगी ?”

“सीढ़ियों से फिसल गया था ।” – मैं अपनी कनपटी का गूमड़ और आंख के नीचे की खरोंच सहलाता हुआ बोला ।

“ध्यान से सीढ़ियां उतरा करो, भई ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

उसके बाद तलवार वहां से विदा हो गया ।

और थोड़ी देर बाद अपना फिंगरप्रिंटस वगैरह उठाने का ड्रामा मुकम्मल करके बाकी पुलिसिये भी विदा हो गये ।

तब मैंने और डॉली ने फ्लैट का बिखरा सामान उठाकर ठिकाने लगाने का काम शुरू किया जिससे कि हम आधे घन्टे में फारिग हुए ।

“तलवार की एक बात तो मुझे भी जचं रही है ।” – फिर मैं चिन्तित भाव से बोला – “तुझे यहां अकेला नहीं होना चाहिये ।”

“मैं कल सुबह सवेरे ही पापा मम्मी को एक्सप्रैस टेलीग्राम दे दूंगी ।” – वो बोली – “वो दोपहर तक वापिस पहुंच भी जायेंगे ।”

“लेकिन आज की रात...”

“अब कुछ नहीं होता । जैसे बिजली एक ही बार दो जगह नहीं गिरती” – वो हंसती हुई बोली – “वैसे ही चोर भी एक ही घर में दो बार नहीं आता ।”

“आम चोर नहीं आता होगा । लेकिन यहां आया चोर आम चोर नहीं था । यहां आये चोर की तलाश कामयाब नहीं हुई थी । जैसा कि तलवार ने कहा था कि चोर यहां फिर...”

“अब नहीं आता वो फिर । हर जगह की तलाशी तो वो ले कर गया है । अब आयेगा तो और कौन सी नयी जगह टटोलेगा ?”

“मैं आश्वस्त नहीं ।”

“हो ही जाइये आश्वस्त ।” – वो तत्काल संजीदा हुई । – “क्योकि अगर आपका ये ख्याल है कि मैं आपको यहां रूकने के लिये कहूंगी तो ये ख्याल जेहन से निकाल दीजिये ।”

“अरी, कमबख्त ! मैं तो तेरी भलाई के लिये ऐसा सोच रहा था ।”

“आप मेरी फिक्र न करें ।”

“ठीक है फिर । जाता हूं मैं । और भगवान करे चोर वापिस जरूर लौटे और इस बार तेरे घर के सामान की जगह यहां तेरे हाथ पांव हड्ड गोड्डे हाड़ मास मज्जा छितरा कर जाये ।”

वो हंसी ।

“हंसती है !”

“हां, हंसती हूं । आप बातें ही ऐसी करते हैं ।”

“मैं जाता हूं । सुबह तक जिन्दा बच जाये तो दफ्तर आ जाना । गुड नाइट ।”

“गुड नाइट ।”

***

रात के सन्नाटे में मैं ग्रेटर कैलाश पहुंचा ।

निक्सी गोमेज मुझे अपने फ्लैट के दरवाजे के सामने सीढ़ियों पर बैठी मिली ।

“आप !” - मैं सख्त हैरानी से बोला – “यहां !”

“मैंने कहा था” – वो उठती हुई बोली – “कि आपकी तरफ से मेरा रवैया अगर तब्दील हुआ तो मैं आपसे कान्टैक्ट करूंगी ।”

“लेकिन इस वक्त !”

“अगर आप मेरे आने से खुश नहीं हैं तो मैं वापिस चली जाती हूं ।”

“नहीं नहीं । ऐसी बात नहीं । मैं तो आपकी असुविधा के लिहाज से सोच रहा था । कब से हैं आप यहां ?”

“एक घन्टे से ऊपर तो हो ही गया होगा ।”

“कमाल है ! आप पहले टेलीफोन कर लेती ।”

“मैंने किया था । लेकिन घन्टी ही बजती रही थी, जवाब नहीं मिला था । मैंने सोचा फोन खराब होगा । सो मैं यहां चली आयी । सोचा था इतनी रात गये तो आप घर ही होंगे । लेकिन आप तो नाइट आउटिंग के शौकीन निकले ।”

“मैं तफरीहन घर से बाहर नहीं था ।” – मैं ताला खोलता हुआ बोला – “मेरा कारोबार ही ऐसा है कि कई बार तो मैं सारी-सारी रात घर नहीं लौट पाता ।”

“फिर तो मैं खुशकिस्मत हूं कि कम से कम आज रात ऐसा नहीं हुआ ।”

“तशरीफ लाइये ।”
 
वो मेरे पीछे–पीछे फ्लैट में दाखिल हुई । मैंने ड्राइंगरूम की बत्तियां आन की ।

“मैन ?” – एकाएक वो बोला – “युअर फेस !”

“हैड ऐन एक्सीडेंट ।” – मैं लापरवाही से बोला ।

“यू शुड बी मोर केयरफुल ।”

“आई विल । आई विल । बिराजिये ।”

वो एक सोफे पर बैठ गयी ।

“आप कुछ पियेंगी ?” – मैं बोला ।

वो एक क्षण खामोश रही और फिर संकोचपूर्ण स्वर में बोली – “आई विल कनसिडर ए लिटल ब्रान्डी विद वाटर इफ यू हैव इट ।”

“श्योर । आई हैव कोनियाक ।”

“वन्डरफुल ।”

“वन ब्रांडी कमिंग अप राइट अवे , मैडम ।”

“थैंक्यू ! वो क्या है कि बाहर मैं ठण्ड में बैठी रही न इसलिये...”“आई अन्डरस्टैण्ड ।”

मैं किचन में गया और ब्रान्डी एण्ड वाटर के दो जाम बना कर उनके साथ वापिस लौटा ।

“थैंक्यू ।”– वो गिलास थामती हुई बोली ।

“तो ।” – मैं बोला – “मेरी तरफ से आपका रवैया तब्दील हुआ है ?”

“हां ।”

“ऐसा कैसे हुआ ?”

“पुलिस से नाउम्मीदी की वजह से हुआ । वो मेरी बहन के कातिल की तलाश के सिलसिले में अभी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाये हैं । अब तो मुझे आप से ज्यादा उम्मीदें लग रही हैं । मुझे मालूम हुआ है कि आप तो दिल्ली के बड़े मशहूर प्राइवेट डिटेक्टिव हैं । मुझे यकीन है कि आप पुलिस से पहले, बहुत पहले, मेरी बहन के कातिल को तलाश कर लेंगे ।”

“ये मेरे लिये फख्र की बात है कि आप ऐसा सोचती हैं । पहले तो आपका मेरे से पेश आने का अन्दाज ऐसा था जैसे आप मुझे ही अपनी बहन का कातिल समझती हो ।”

“आई एम सॉरी । सर, आई वाज हैल्पलैस । वो पुलिस वाले ऐसे ही आईडियाज मेरे माइंड में इम्पलांट करते थे । आई एम सॉरी ।”

“यू नीड नाट बी । आई अन्डरस्टैंड ।”

“वैसे हैं तो नहीं न आप मेरी बहन के कातिल ?”

“मैडम । अगर होता तो ये बात मैं अपनी जुबान से कबूल करता ! खुद आप का दिल इस बाबत गवाही दे रहा होता तो आपका हौसला होता इतनी रात गये मेरे सामने यूं बैठे होने का ?”

“यू आर राइट । आई एम सॉरी आल ओवर अगेन ।”

“यू नीड नाट बी । आई सैड आलरेडी ।” - मैंने थोड़ी सी ब्रान्डी चुसकी और फिर बोला - “जब मैं आपसे होटल में मिला था तो आप मेरे खिलाफ थीं क्योंकि पुलिस ने आपको ऐसी पट्टी पढ़ाई हुई थी कि आपने मेरे से सहयोग नहीं करना था । तब आप मेरे किसी भी सवाल का जवाब दे के राजी नहीं थी । अब जबकि पुलिस से आप का भरम टूट गया है तो मैं आपसे चन्द सवाल फिर करना चाहता हूं । आज जवाब देंगी ?”

“जरुर ।”

“आनेस्टली ?”

“यस ।”

“आप अब प्रकाश होटल में नहीं हैं ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“उधर का बिल पुलिस देने को बोला था । उनका मतलब मेरे से हल हो गया तो उन्होंने वो कर्टसी विदड्रा कर ली ।”

“अब आप कहां हैं ?”

“अपनी बहन के फ्लैट में ।”

“वहां कब तक रहने का इरादा है ?”

“तब तक जब तक कि कोमलका कातिल पकड़ा नहीं जाता ।”

“कोमलके अन्तिम संस्कार के बाद से आपकी पुलिस से भेंट हुई ?”

“नहीं ।”

“कोमलसे आखिरी बार आप कब मिली थीं ?”

“कोई एक महीना पहले । जबकि वो मेरे पास आगरा आयी थी ।”

“तब उसका मिजाज कैसा था ? ऐसा लगता था जैसे वो किसी बात से परेशान हो या किसी व्यक्तिविशेष से आतंकित हो ?”

“नहीं । ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगता था । वो तो मेरे पास वैसे ही आयी थी जैसे हमेशा आती थी ।”

“खूब हंसती खेलती ?”

“मिस्टर राज, खिलन्दड़ापन कोमलके मिजाज में नहीं था । वो आदतन बहुत रिजर्व रहने वाली थी । आप उसको जानते थे तो ये बात आपको मालूम होनी चाहिये थी ।”

“मालूम है । लेकिन आप तो उसकी बहन है । आप के साथ तो...”

“उसका व्यवहार सब के साथ एक समान था । रिजर्व्ड । कोल्ड ।”

“बहरहाल उसके व्यवहार में कोई तब्दीली नहीं थी ? जैसा व्यवहार उसका हमेशा होता था, वैसा ही पिछले महीने तक था जब वो आगरे जाकर आप से मिली थी ?”

“हां ।”

“लेकिन अगर कोई बात होती – गैरमामूली, दिमाग पर बोझ बनने वाली, फिक्र में डालने वाली – तो वो आपको बताती ?”

“हां । जरुर । आखिर मैं उसकी बड़ी बहन थी ।”

“इस लिहाज से तो उसके मिजाज में कोई फर्क उसके बिना बताये भी आपकी जानकारी में आ सकता था ?”

“हां । आ सकता था ।”

“ऐसा कुछ नोट करने पर आप उससे उसकी वजह पूछती तो क्या वो आपको बताती ?”

“हां ।”

“लेकिन हकीकतन न आपने जुदा कुछ नोट किया, न कोमलने बताया ?”

“हां ।”

“कभी अपनी एम्पलायर शबाना की कोई बात करती थी वो आप से ? उसकी शख्सियत के बारे में, उसकी आदतों के बारे में, पसन्द-नापसन्द के बारे में, उसके जेरेसाया अपनी एम्पलायमेंट के बारे में ?”

“नहीं, खास कुछ नहीं । सिवाय इसके कि शबाना उससे बड़ी अच्छी तरह पेश आती थी और वो अपनी उस एम्प्लायमेंट से खुश थी ।”

“शबाना का कामकाज - मेरा मतलब है, आय का साधन - क्या बताती थी वो ?”

“यही कि वो सिल्वर मून में कैब्रे डान्सर थी ।”

“आपने कभी सवाल नहीं किया था कि एक कैब्रे डांसर आप की बहन जैसी एक्सपैन्सिव मेड कैसे अफोर्ड कर सकती थी ?”

“जब मुझे शबाना की शानोशौकत की खबर लगी थी तो किया था । तब कोमलने बड़े संकोच से मुझे बताया था कि... कि...”

“वो काल गर्ल थी ?”

“विद कलायन्टेल लिमिटिड टु सलेक्ट फियु ।”

“आल दि सेम शी वाज ए काल गर्ल । आपकी बहन ने आपको साफ ऐसा कहा था ?”

“हां !”

“उस लिहाज से आपको कोमलकी एम्पलायमेंट से एतराज नहीं था ? वो खूबसूरत थी, नौजवान थी, महत्वाकांक्षी थी, शबाना की शानो-शौकत का रोब खाती थी । वो शबाना के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर सकती थी ।”

“मिस्टर राज, इट नैवर अकर्ड तू मी । ऐसा कुछ कभी नहीं सूझा था मुझे ।”

“सूझा नहीं था या आप अपनी दिवंगत बहन का इमेज बनाये रखने के लिए अब ऐसी कोई बात जुबान पर नहीं लाना चाहती ?”

“सूझा नहीं था ।”

“खैर । कोमलने आप से कभी किसी डायरी का, किन्ही चिट्ठियों का, किन्ही कागजात का कोई जिक्र किया था ?”

“नहीं ।”

“मतलब ये हुआ कि वो शबाना की बाबत आप से कुछ ज्यादा बात नहीं करती थी ?”

“हां ।”

“न ही आप ज्यादा सवाल करती थीं ?”

“सवाल तो कभी कभार करना पड़ ही जाता था – आखिर मैं उसकी बड़ी बहन थी – लेकिन कभी कुरेदती नहीं थी मैं उसे । इसकी एक वजह ये भी थी कि वो एक बालिग, खुदमुख्तार लड़की थी, मेरे ज्यादा कुरेदने पर वो मेरे किसी सवाल का जवाब देने से दो टूक इन्कार कर सकती थी ।”

“इसका तो ये मतलब हुआ कि आपकी सगी बहन होने के बावजूद वो आप से उतना नहीं खुली हुई थी जितना कि सगी बहनें आपस में खुली होती हैं ?”

“करैक्ट । मैंने कहा न कि वो बड़ी रिजर्व्ड नेचर की लड़की थी ।”

“अब जबकि पुलिस ने उसके फ्लैट की चाबी आपको सौंप दी है तो आपने वहां मौजूद साजोसामान का कोई जायजा तो लिया होगा ?”

“हां ।”

“क्या पाया आपने वहां ?”

“खास कुछ नहीं । पोशाकों और घरेलू समान के अलावा सिर्फ कुछ पुरानी चिट्ठियां, पुराने बिलों की कापियां, बैंक की चेक बुक, पास बुक वगैरह....”

“बैंक में काफी रकम थी ?”

“न । सात आठ हजार रुपए थे बस ।”

“हैरानी की बात नहीं ये ?”

“वो क्या है, मिस्टर राज, दरअसल अपनी मालकिन की देखादेखी उसने खुद अपना रहन-सहन भी बहुत खर्चीला बना लिया हुआ था । ड्रेसेज पर, ज्वेलरी पर, आउटिंग्स पर वो बहुत ज्यादा खर्चा कर देती थी । फिर गोवा में हमारे पेरेंट्स को भी वह गाहे-बगाहे पैसा भेजती रहती थी । इसलिए वो ज्यादा कुछ बचा नहीं पाती थी ।”

“कोई बॉय फ्रेंड ?”
 
“स्टेडी कोई नहीं । तफरीहन कभी-कभार वो किसी पसंद के लड़के के साथ डेट पर चली जाती थी । लेकिन स्टेडी कोई नहीं था । वो खुद कहती थी कि उसे किसी से मुहब्बत नहीं हुई थी ।”

“यानि कि सिवाय आपके उसका खास करीबी कोई नहीं था ?”

“यही समझ लीजिये ।”

“कोई ऐसी बात जो आपने पुलिस को बताई हो लेकिन मुझे न बतायी हो ?”

“ऐसी कोई बात नहीं । कम से कम अब ऐसी कोई बात नहीं ।”

“आपके ख्याल से कोमलका कत्ल क्यों हुआ ? कोई वजह सूझती है आपको ?”

“नहीं । आप बताइये ।”

“मेरे ख्याल से तो ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि आपकी बहन शबाना की कुछ ज्यादा ही राजदां बन गयी थी । वो या तो शबाना के निजी कागजात चुपचाप पढ़ती रहती थी या कातिल समझता था कि वो ऐसा करती थी । लिहाजा जिस वजह से शबाना का कत्ल हुआ, ऐन उसी वजह से कोमलका कत्ल हुआ ।

“मुंह बंद करने के लिए ?”

“हां । अब हमें ये मालूम हो जाये कि उन दोनों के मुंह खोलने का फौरी खतरा किस को था तो कातिल की शिनाख्त हो सकती है । इसी वजह से मैं आपसे पूछ रहा था कि क्या आपकी बहन ने कभी आपको ऐसा इशारा किया था कि वो शबाना की कोई जाती पोल-पट्टी जानती थी ! या शबाना का करीबी कौन सा शख्स था जिसे अपना कोई पर्दाफाश हो जाने की दहशत थी ।”

उसने तत्काल जवाब न दिया । मैंने उसे न कुरेदा । उसकी सूरत से दिखाई दे रहा था कि अपने दिमाग पर बहुत गहरा जोर देकर वो कुछ याद करने की कोशिश कर रही थी ।

“मिस्टर राज । “ – आखिरकार वो बोली – “इस शख्स का नाम तो उसने मेरे सामने कभी नहीं लिया था लेकिन एक बात आपकी सच है वो शबाना के कागज तो पढ़ती थी ।”

“ऐसा कैसे कह सकती हैं आप ?”

“एक बार जब मैंने उससे सवाल किया था कि शबाना उसे इतनी मोटी तनख्वाह क्यों देती थे और तनख्वाह के अलावा भी उसे इतनी अतिरिक्त सुख-सुविधाएं फ्री क्यों मुहैया कराती थी तो उसने बड़े अभिमान के साथ कहां था कि अच्छा ही था कि करती थी वर्ना ऐसे काम कराये भी जा सकते थे ।”

“ऐसा उसने कहा था ?”

“हां ।”

“आपने पूछा नहीं था कि कराये कैसे जा सकते थे ऐसे काम ?”

“पूछा था लेकिन उसने जवाब को टाल दिया था ।”

“ये तो साफ ब्लैकमेल की तरफ इशारा हुआ । यानि कि शबाना स्वेच्छा से उसकी खास खिदमत न करती रहती तो वो ऐसा जबरन करवा लेती ।”

“तब तो मैंने इस बाबत नहीं सोचा था लेकिन मौजूदा हालात से तो ये ही लगता है कि ऐसा ही कुछ इरादा था ।”

“हैरानी है ।”

वो खामोश रही ।

“ब्लैकमेल एक गंभीर अपराध है ।”

“जरूरी नहीं”- वो जल्दी से बोली – “कि उसका ऐसा इरादा रहा हो ।”

“ऐसा आप इसलिए कह रही हैं क्योंकि अपनी दिवंगत बहन की हिमायत करना, उसके चरित्र पर कोई लांछन आने से रोकना आप अपना इखलाकी फर्ज मानती हैं ।”

वो फिर खामोश हो गयी ।

“कोमलका ब्लैकमेल का इरादा भले ही न रहा हो लेकिन शबाना के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए जो हथियार अनायास ही उसके हाथ लग गया था, उसकी ताकत वो बखूबी पहचानती थी ।” – मैं एक क्षण को ठिठका और फिर बोला – “इस वक्त शबाना और कोमलइस दुनिया में नहीं हैं – भगवान दोनों को जन्नतनशीन करे – लेकिन अगर कोमलमर गयी होती और शबाना जिंदा होती तो सारी कहानी कुछ और ही होती ।”

निक्सी ने बेचैनी से पहलू बदला ।

“अब जरा उस चिट्ठी पर आइये” – मैं बोला – “जो अपनी मौत से पहले कोमलने आपको लिखी थी और जो आपको आगरे में मिली थी । मैडम, क्या उसमें वाकई खास कोई बात नहीं थी ? वाकई ऐसा कोई इशारा नहीं था कि कोमलको अपने सिर पर जान का खतरा मंडराता दिखाई दे रहा था ? वाकई किसी ऐसे शख्स का नहीं था जो कि उस खतरे की वजह हो सकता था ?”

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं था उसमें । सिवाय इसके कि उसमें उसकी एम्प्लायर के कत्ल का जिक्र था, उसमें कोई खास बात नहीं थी ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“फिर भी पुलिस ने आपको उस चिट्ठी का जिक्र किसी से करने से माना किया ? चिट्ठी भी कब्जा ली ?”

“किया तो ऐसा ही उन्होने ।”

“चिट्ठी अभी भी पुलिस के पास है ?”

“हां ।”

“आप मांगिए वापिस ।”

“मांगने से दे देंगे वो ?”

“अगर चिट्ठी वाकई मामूली है तो दे ही देनी चाहिए । फिर भी न दें तो फोटोकोपी मांगिएगा । बल्कि ये कहिएगा कि वो फोटो कापी रखें और चिट्ठी आपको दें । कहिएगा कि वो आपकी दिवंगत बहन की आपको लिखी आखिरी चिट्ठी है इसलिए आपको उस चिट्ठी से सेंटीमेंटल अटेचमेंट है ।”

“ठीक है । मैं कल कोशिश करूंगी ।”

“चिट्ठी या फोटोकापी दोनों में से कोई भी चीज आपको हासिल हो जाये तो मुझे फौरन खबर कीजिएगा । न जाने क्यों मेरा दिल गवाही देता है कि उस चिट्ठी में कोई न कोई ऐसी बात जरूर छुपी हुई है जो कि कातिल कि तरफ उंगली ...”

तभी एकाएक फोन की घंटी बजने लगी ।

मैं तत्काल खामोश हो गया, मैंने हड्बड़ाकर वाल क्लाक पर निगाह डाली और फिर बैडरूम में जाकर फोन रिसीव किया ।

“राज !” – आवाज आई ।

“हां” – मैं सशंक स्वर में बोला – कौन ?”

“जो कहा जाये उसे गौर से सुन क्योंकि कोई बात दोहराई नहीं जाएगी । अभी अपनी कार पर सवार होकर खेलगांव के पिछवाड़े में जो जंगल है, उसके रास्ते पर पहुंच जहां चौबुर्जे के करीब तुझे एक नीली कौंटेसा दिखाई देगी । बाकी बातें फिर होंगी । अगर अपनी सैक्रेट्री को जिंदा देखना चाहता है तो डायरी लेकर जहां कहा है वहां फौरन पहुंच ।”

संबंध-विच्छेद हो गया ।

मेरे छक्के छूट गए ।

ऐन वही हुआ था जिसके बारे में ए सी पी तलवार ने भी इशारा दिया था और जिसका मुझे भी अंदेशा था ।

मैंने रिसीवर क्रेडल पर फटका और लगभग दौड़ता हुआ ड्राइंगरूम में पहुंचा ।

“मैडम” - मैं बदहवास भाव से बोला - “मुझे अफसोस है कि आपको फौरन यहां से रुखसत होना पड़ेगा । एक इमरजेंसी आ गयी है जिस वजह से मुझे फौरन कहीं पहुंचना है । सो मैडम, प्लीज ...”

उसने अपना गिलास खाली किया और सहमति में सिर हिलाती हुई उठ खड़ी हुई । तब इससे पहले कि वो औपचारिकतावश कुछ बोलती, मैंने उसको बांह से पकड़ा और जबरदस्ती फ्लैट से बाहर छोड़ के आया ।

“सॉरी । सॉरी ।” - मैं हांफता हुआ बोला – “बातरतीब माफी फिर मांगूंगा । कल । कल ।”

मैंने उसके पीछे दरवाजा बंद कर लिया ।

अस्थाना का दूसरा वार इतनी जल्दी होगा, इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी – इस तरीके से होगा, इसकी तो कतई उम्मीद नहीं थी ।

मैंने अपनी राइटिंग टेबल में से एक पुरानी डायरी बरामद की जिसमें कि मैं अपने संतुष्ट क्लायंट्स की केस हिस्ट्री लिखा करता था । मैंने उस डायरी को एक मजबूत लिफाफे में बंद किया और लिफाफे का मुंह सेलोटेप चिपका कर अच्छी तरह से बंद कर दिया ।

फ्लैट को ताला लगाकर उस लिफाफे के साथ मैं नीचे पहुंचा, अपनी कार में सवार हुआ और मैंने कार को निर्देशित स्थान की ओर दौड़ाया ।

रास्ते में मैं इस बाबत बहुत चौकन्ना था कि कोई मेरा पीछा कर रहा था या नहीं, लेकिन सुनसान रास्तों पर मुझे अपने पीछे कोई न दिखाई दिया । अस्थाना का कोई दादा तो मेरे पीछे था ही नहीं, तलवार के पुलिसिये भी वाकई छुट्टी कर गए हुए था ।

मैं खेलगांव के पिछवाड़े के जंगल के दहाने पर पहुंचा । मैं कुछ क्षण कोई आहट लेने की कोशिश करता रहा लेकिन मुझे कोई आहट न मिली । मैंने कार को फिर गियर में डाला और उसे धीरे से आगे बढ़ाया । थोड़ा आगे आने पर मैंने सीधे चौबुर्जे के रास्ते पर जाने के स्थान पर कार को दायें मोड़ दिया । आगे घने पेड़ों की छांव में मैंने उसे रोका और पीछे डिकी में पड़े टायर ट्यूब में से अस्थाना वाली रिवाल्वर बरामद की । मैंने रिवाल्वर वाला हाथ अपने कोट की जेब में डाल लिया और गाड़ी वहीं छोड़ कर दबे पांव वापिस लौटा ।

राहदारी पर चलने के स्थान पर पेड़ों के झुरमुट से होता हुआ मैं आगे चौबुर्जे की दिशा में बढ़ा । रास्ते में रिवाल्वर निकाल कर मैंने अपने हाथ में ले ली ।

थोड़ी देर बाद चांद की रोशनी में मुझे आगे चौबुर्जा दिखाई देने लगा ।

फिर उसके करीब खड़ी कोंटेसा भी मुझे दिखाई दी । उसके सब शीशे उठे हुए थे और बत्तियां बुझी हुई थीं । शीशे काले थे इसलिए इस बात का कतई आभास नहीं मिल रहा था कि भीतर कोई था या नहीं ।

चौबुर्जा एक खुले मैदान में था इसलिए कार तक पहुंचने के लिए पेड़ों की ओट छोड़ना जरूरी था जो कि खतरनाक काम साबित हो सकता था । मुझे फोन करने वाला मेरे वहां तक कार पर पहुंचने की अपेक्षा कर रहा था, वो मुझे पैदल कार की ओर बढ़ता पाता तो मुझे पहचाने बिना भी आशंकित हो उठता । फिर या तो वो मेरे पर आक्रमण कर देता या कार वहां से भागकर के ले जाता ।

मैं चुपचाप कार के करीब पहुंचने की कोई तरकीब सोचने लगा ।

तभी मैंने अपनी गर्दन पर ठंडे लोहे का स्पर्श महसूस किया और फिर कोई मेरे कान में बोला – “हिलना नहीं ।”

मेरे सारे शरीर में झुरझुरी दौड़ गयी । वो मेरे से भी होशियार निकला था जो यूं प्रेत की तरह मेरे सिर पर पहुंच गया था ।”

“कंधे पर से रिवाल्वर मुझे पकड़ा ।” – आदेश मिला ।

तब वो आवाज मैंने साफ पहचानी ।

वो पिछली रात वाले खलीफा रघुवीर कि आवाज थी ।

मेरे वाली रिवाल्वर उसके हाथ में पहुंच गयी तो मैं उसकी तरफ घूमा ।

वो रघुवीर ही था ।

“फोन पर तो” – मैं बोला – “मैंने तेरी आवाज न पहचानी, रघुवीर खलीफा ।”

“होशियारी दिखाने से बाज नहीं आया न ?” – वो दांत पीसता हुआ बोला ।

“काम तो न आई होशियारी ।”

“डायरी कहां है ?”

“अकेला दिखाई दे रहा है । कटलरी कहां है ?”

“डायरी – कहां – है ?”

“मेरे पास है ।”

“निकाल ।”

“ऐसे कैसे निकालूं ? पहले बता मेरी सैक्रेट्री कहां है ?”

“तू डायरी दिखा मेरे को । मैं तुझे तेरी सैक्रेट्री दिखाता हूं ।”

मैंने जेब से डायरी वाला लिफाफा निकाल कर उसे दिखाया ।

“कार की तरफ चल ।”

मैंने आदेश का पालन किया ।

हम दोनों कार के करीब पहुंचे तो उसने कार का पिछला दरवाजा खोल कर मुझे भीतर झांकने का अवसर दिया ।

भीतर पिछली सीट पर मुझे डॉली की परछाई सी दिखाई दी । उसके हाथ उसकी पीठ पीछे बंधे हुए थे और मुंह पर रुमाल बंधा हुआ था । उसने आतंकित भाव से मेरी तरफ देखा ।

तभी रघुवीर ने पांव की ठोकर से दरवाजा बंद कर दिया ।

“हो गयी तसल्ली !” – वो बोला ।

“तेरा बाप कहां है ?” – मैं बोला ।

“बकवास बंद ।”

“अस्थाना का खास ही आदमी मालूम होता है तू जो ...”

“कार में बैठ । स्टियरिंग के पीछे ।”

“क्यों ?”

“यूं ही जुबानदराजी करता रहेगा तो मैं अभी तेरी आंखों के सामने तेरी छोकरी को शूट कर दूंगा ।”

मैं तत्काल कार का दरवाजा खोलकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया ।

कार का सामने से घेरा काट कर वो पारली तरफ पहुंचा और मेरे पहलू में पैसेंजर सीट पर आ बैठा ।

तब कार की चाबी उसने मुझे दी ।

“चल ।”

“किधर ?” – मैं इग्नीशन में चाबी लगता हुआ बोला ।

“अभी तो जंगल से बाहर निकल । आगे बताता हूं ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“और” - वो अपनी रिवाल्वर की नाल मेरी पसलियों में चुभोता हुआ बोला - “कोई होशियारी दिखाने की कोशिश न करना । तेरी एक होशियारी मैंने माफ कर दी है, दूसरी नहीं करूंगा ।”

“खलीफा । तेरे जोड़ीदार तेरे साथ क्यों नहीं हैं ?”

“बकवास न कर । गाड़ी चला ।”

मैंने गाड़ी को होले से गियर में डाल कर आगे बढ़ाया ।

तभी एकाएक मेरे जेहन में जैसे बिजली सी कौंधी ।

तत्काल मेरी समझ में आने लगा कि रघुवीर अकेला क्यों था ।
 
अस्थाना का रघुवीर की उस करतूत से कुछ लेना-देना नहीं था । उसे तो शायद खबर भी नहीं थी कि उसने मेरे खिलाफ डॉली को हथियार बनाया था । अगवा रघुवीर का खुद का आइडिया था और इस संदर्भ में वो जो कुछ भी कर रहा था, अपनी जिम्मेदारी पर अपने फायदे के लिए कर रहा था ।

यानि कि अस्थाना ने जिसे अपना राजदां बनाया था, वही उसे धोखा देने पर आमादा था ।

“तू गलती कर रहा है, खलीफा ।” – मैं बोला – “ब्लैकमेल तेरे काबू में आने वाला खेल नहीं । डायरी को काबू में कर भी लेगा तो अस्थाना को काबू नहीं कर सकेगा । वो तेरे जैसे छत्तीस खलीफाओं पर भारी पड़ने वाला महाखलीफा है । तेरी कोई बिसात नहीं उसके आगे ।”

“क्या बक रहा है !” – वो मुंह बिगाड़ कर बोला – “मुझे तेरी कोई बात नहीं समझ में आ रही है । तू जो जुबानदराजी करना, बॉस से करना ।”

“किसे उल्लू बना रहा है । खलीफा, इस घड़ी तू ही बॉस है । इस घड़ी जो कुछ भी तू कर रहा है, किसी और के लिए नहीं, खुद अपने लिए कर रहा है ।”

“गाड़ी चला, गाड़ी ।”

“वो तो मैं चला ही रहा हूं । देख, अक्ल की बात सुन । डायरी तो मैं तुझे दे ही दूंगा लेकिन तेरे अकेले से कुछ नहीं होने वाला । तुझे ऐसे कामों का कोई तजुर्बा नहीं लेकिन मुझे है । एक और एक ग्यारह होते हैं, खलीफा । हम दोनों मिल के काम करें तो हम अस्थाना की दुक्की पीट देंगे । और फिर तेरी निगाह में एक अस्थाना ही है जब कि मेरी निगाह में अस्थाना जैसे कई हैं ।”

“मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा, भई । तूने जो कहना है अस्थाना को कहना ।”

“तू मुझे अस्थाना के पास ले जा रहा है ?”

“यही समझ ले ।”

“समझ लेने से सब कुछ थोड़े ही हो जाता है । उस ऊपर वाले की भी तो मर्जी होती है जो कि सब से ऊपर होती है । अभी स्टियरिंग के पीछे बैठे-बैठे तेरा हार्टफेल हो जाये तो तू मुझे क्या ले जाएगा अस्थाना के सामने । अभी” - मेरी निगाह रियरव्यू मिरर में से डॉली से मिली - “कार के आगे से बिल्ली रास्ता काट जाये, मुझे एकाएक ब्रेक लगानी पड़ जाये तो हम दोनों विंडस्क्रीन तोड़ते हुए कार से बाहर जाकर गिरेंगे ।”

मैंने रियरव्यू मिरर में से देखा कि पिछली सीट पर लुड़की पड़ी डॉली एकाएक सीधी हुई थी और संभल कर बैठ गयी थी ।

“पता नहीं क्या बक रहा है तू ।” - वो फिर मेरी पसलियों में रिवाल्वर की नाल चुभोता हुआ बोला – “तुझे कथा करने का शौक है तो कर ले लेकिन गाड़ी ध्यान से चला । कोई बेजा हरकत की तो गोली ।”

तभी मुझे आगे सड़क पर एक ट्रक दिखाई दिया ।

“अब मुझे क्या पता तुझे मेरी कौन सी हरकत बेजा लगेगी ।”

वो खामोश रहा ।

“आगे ट्रक है, खलीफा । इसके पीछे ही लगा रहूं या इसे ओवेरटेक करूं ?”

“ओवेरटेक कर ।”

मैंने कार की रफ्तार बढाई । ट्रक को ओवेरटेक करने की कोशिश में कार सत्तर की स्पीड पर पहुंच गयी । मैंने एक्सिलेटर पर दबाव फिर भी बनाए रखा ।

अब आगे सड़क खाली थी और ट्रक बहुत पीछे रह गया था । अब रिवाल्वर की नाल भी मेरी पसलियों में नहीं चुभ रही थी ।

आगे मुझे बाबाएं मुड़ती एक पतली सी सड़क दिखाई दी ।

मैंने रियरव्यू मिरर में से आंखों-आंखों में डॉली को इशारा किया ।

डॉली का सिर सहमति में हिला ।

पतली सड़क के करीब पहुंचते ही मैं कार को एकाएक इतनी तेजी से उस पर मोड़ा कि कार के दायीं ओर के दोनों पहिये उठ गए । फिर मैं पूरी शक्ति से कार को ब्रेक लगाई और अपना जिस्म ड्राइविंग सीट की पीठ और पंजों के बीच अकडा लिया ।

कार एक बिजली के खंबे से टकराई, उसकी विंडस्क्रीन चूर-चूर हो गयी, रघुवीर के कंधों के बीच डॉली ने किसी मेंढ़े की तरह सिर झुका कर वार किया, रघुवीर का शरीर गेंद की तरह मेरे पहलू से उछला और चटकी हुई विंडस्क्रीन को तोड़ता हुआ सिर के बल उसके आर-पार निकल गया ।

“शाबाश ।” – मैं हर्षनाद किया ।

गाड़ी रुकी ।

तब सबसे पहले मैंने रघुवीर के हाथ से छिटककर नीचे जा गिरी रिवाल्वर उठाई और उसकी जेब से निकालकर अस्थाना वाली कोल्ट रिवाल्वर को अपने काबू में किया ।

फिर मैंने डॉली को बंधनमुक्त किया ।

“तू ठीक है न ?” – मैं बोला ।

“हां ।” – वो हांफती हुई बोली – “आप ?”

“मैं भी ठीक हूं । डॉली, तूने तो कमाल कर दिया । बहुत ही पर्फेक्ट टाइमिंग से कमीने को टक्कर मारी ।”

वो खामोश रही । फिर वो रक्त संचार व्यवस्थित करने के लिए अपने हाथ पांव मसलने लगी ।

मैंने आधे गाड़ी के भीतर आधे टूटे शीशे के पार बोनट पर पड़े रघुवीर के अचेत शरीर को वापिस गाड़ी के भीतर पहुंचाया ।

“मर गया ?” – डॉली व्यग्र भाव से बोली ।

“नहीं ।” – मैं बोला – “बेहोश है । ज्यादा जख्मी नहीं है । जल्दी होश में आ जाएगा । तू चलने की तैयारी कर । इसके होश में आने से पहले हमें पुलिस में रिपोर्ट करनी होगी ।”

“पुलिस ! पुलिस !” – वो घबरा कर बोली – “किस बात की ?”

“तेरे अगवा की और किस बात की ?”

“नहीं, नहीं । ऐसा मत करना ।”

“क्यों ?”

“बोला न नहीं । मुझे कुछ हुआ थोड़े ही है ? पुलिस में रिपोर्ट से मेरी बहुत बदनामी होगी । मेरी मां को इस बात की खबर लगी तो उसका तो हार्टफेल ही हो जाएगा । नहीं, नहीं । कोई रिपोर्ट-विपोर्ट नहीं करनी ।”

“यूं तो इस कमीने को इसकी करतूत की सजा नहीं मिलेगी ।”

“आप समझते क्यों नहीं । इसकी सजा मेरी सजा बन जाएगी ।”

“अच्छी बात है ।”

“आप अब मुझे जल्दी से घर पहुंचाइए ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया, फिर मैंने उसकी रिवाल्वर में से - जो कि कोई लोकल माल मालूम होता था - गोलियां निकाल कर परे झाड़ियों में उछाल दी और रिवाल्वर पर से फिंगरप्रिंट को पोंछ कर उसे कार के भीतर डाल दिया ।

मेरी कार तक पहुंचने के लिए हमें पैदल चलना पड़ा ।

इतनी रात गए उजाड़ सड़कों पर चलते हम किसी नयी वारदात के शिकार न भी होते तो गश्ती पुलिस की गिरफ्त में आ सकते थे जोकि मेरे पास मौजूद कोल्ट रिवाल्वर की वजह से ठीक न होता । लेकिन सौभाग्यवश हम निर्विध्न मेरी कार तक पहुंच गए ।

वहां उस घड़ी मुकम्मल सन्नाटा था । दूर-दूर तक कहीं परिंदा भी पर नहीं मार रहा था ।

एक काम जो अस्थाना के ऑफिस से रिवाल्वर की बरामदी के बाद से ही मेरे जेहन में था, उसको अंजाम देने के लिए वो बड़ा मुफीद मौका था ।

मैंने अस्थाना वाली कोल्ट रिवाल्वर में से एक गोली एक पेड़ के तने में दागी और फिर वो गोली मैंने एक पेचकस की सहायता से तने में से खोद निकाली ।

रिवाल्वर को मैंने वापिस डिकी में पड़े टायर ट्यूब में दफन कर दिया ।

डॉली अपलक सब कुछ देखती रही लेकिन उसने उस बाबत कोई सवाल न किया ।

फिर हम कार में सवार हुए और मैंने कार को लोधी कालोनी की तरफ दौड़ा दिया ।

“देखा !” – आखिरकार मैं बोला – “वही हुआ जिसका मुझे अन्देशा था !”

“आप भी तो” – वो भुनभुनाई – “बढ़ बढ़ के भगवान से दुआ मांग रहे थे कि चोर वापिस जरूर लौटे और इस बार मेरे घर के सामान की जगह मेरे पीछे पड़े ।”

“यानी कि मेरी दुआ कबूल हुई !”

“और नहीं तो क्या ?”

“दुआ करने से दुआ कबूल हो जाती है ?”

“बिल्कुल हो जाती है ।”

“जैसे मैं ये दुआ मांगू कि डॉली शर्मा सुबह होने से पहले मिसेज राज बन जाये तो कबूल हो जायेगी ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि एक टाइम मे एक ही काम होता है । या दुआ कबूल होती है या सजा तजवीज होती है ।”

“क्या मतलब ?”

“आपकी दुआ मेरे लिये सजा होगी, ये क्या भगवान से छुपा हुआ है ?”

“मैं इतना गया बीता हूं ?”

“अब मैं अपनी जुबानी क्या कहूं ?”

“कह ले । कह ले । कहने से कौन-सी पुलिस पकड़ कर ले जायेगी तुझे !”

वो हंसी ।

“अब ये तो बता कि हुआ क्या था ? मैं तुझे इतना सावधान करके आया था, फिर भी तेरे घर में घुसकर वो कमीना तेरे पर काबिज होने में कैसे कामयाब हो गया ?”

“वो... वो पुलिस की वर्दी पहने था । मैं समझी थी कि पुलिस वापिस लौटी थी । इसीलिये धोखा खा गयी और उसके लिये दरवाजा खोल बैठी । कमीना बाज की तरह झपटा मेरे पर ।”

“अकेला था ?”

“हां ।”

“मुझे तो वो पुलिस की वर्दी में नहीं मिला था !”

“वो तो उसने मेरी मुश्कें कसने के बाद ही उतार दी थी । वो वर्दी अभी भी उसकी कार की पिछली सीट पर पड़ी थी ।”

“ओह !”

“वो चाहता क्या था ?”

“डायरी ही चाहता था ।”

“जो कि आपके पास थी नहीं ।”

“हां । भगवान का शुक है कि कार के साथ मेरी चाल चल गयी वर्ना कम्बख्त पता नहीं हमें कहां ले जाता ओर क्या दुर्गत करता हमारी ।”

वो खामोश रही ।

“डॉली, एक बात सच-सच बता ।” – एकाएक मैं बोला – “तेरी ये जिद क्यों थी के होटल का बिल तू चुकायेगी ?”

“छोड़िये वो किस्सा !” – वो बोली ।

“डॉली, प्लीज । तू मेरा ये सस्पैंस दूर कर । सोच-सोच के मेरा भेजा भन्नाया जा रहा है ।”

“जवाब आप को पसन्द नहीं आयेगा ।”

“तू फिर भी दे ।”

“ठीक है । सुनिये । मैंने आपको बहुत बार ये कहते सुना है कि खाने-पीने में बहनजियों पर खर्च हुए पैसे को आप कभी पैसे की बरबादी नहीं मानते क्योंकि सब कुछ बमय ब्याज वसूल हो जाता है । मैं नहीं चाहती थी कि पहले आप खाने-पीने का बिल चुकाते और फिर इसकी वसूली की जुगत भिड़ाने लगते ।”

“तौबा !”

“आपकी जानकारी के लिये मेरे दिल का रास्ता मेरे पेट से होकर नहीं गुजरता ।”

“बड़ी गहरी मार कर रही है, डॉली ।”

“मैंने पहले ही कहा था कि मेरा जवाब आपको पसन्द नहीं आयेगा ।”

“गोया आज ये मसल मेरे पर ही सच हो गयी कि बद भला बदनाम बुरा !”

उसने उत्तर न दिया ।

मैंने कार को लोधी कालोनी ले जाकर उसके घर के सामने रोका ।

“अब क्या इरादा है ?” – मैं बोला – “इस बार फौजी वर्दी का रोब खा के दरवाजा खोलेगी ?”

“आप क्यों डरा रहे हैं मुझे ?” – वो बोली ।

“मैं तुझे डरा नहीं रहा, मैं ये कहने की कोशिश कर रहा हूं कि कम से कम आज की रात तेरा अकेले रहना ठीक नहीं । अब या तो मुझे अपने घर में रहने दे या मेरे घर पर चल ।”

“आप...आप यहीं ठहर जाइये ।”

“ये की न अक्ल की बात !”

“लेकिन मर्यादा से ।”

“डाल दी न खीर में मक्खी !”

“आइये ।”

मैं खामोशी से उसके साथ हो लिया ।
 
Chapter 4

सुबह ठीक आठ बजे मैं गुड़गांवा रोड पर एक नयी बनती कालोनी में था जहां कि सतीश बैक्टर की स्वीमिंग पूल और टेनिस कोर्ट से सुसज्जित नयी बनी कोठी थी ।

वहां उस घड़ी पहुंचने के लिए मुझे दो बातों ने प्रेरित किया था ।

बैक्टर के बीवी बच्चे आजकल दिल्ली में नहीं थे ।

बैक्टर की पक्की दिनचर्या थी कि वो सुबह आठ से नौ बजे तक अपने पड़ोसी के साथ टेनिस खेलता था ।

वहां मैं इस पक्की गारन्टी के साथ पहुंचा था कि कोई मेरे पीछे नहीं लगा हुआ था । अब ये कहना मुहाल था कि तलवार ने मेरी निगरानी एक ही दिन किये जाने का इन्तजाम किया था या अभी निगरानी करने वालों का दिन शुरू नहीं हुआ था ।

मैंने कोठी से परे अपनी कार खड़ी की और पेड़ों की ओट लेता उस तक पहुंचा ।

टेनिस कोर्ट कोठी के एक पहलू में था जहां कि मेरी अपेक्षा के अनुसार गेम में मशगूल बैक्टर मौजूद था ।

मैं कोठी के दूसरे पहलू में पहुंचा और उधर से दीवार फांदकर भीतर दाखिल हुआ ।

जैसा की अपेक्षित था, उधर के दरवाजे को ताला लगा हुआ था लेकिन आपके खादिम ने वो ताला पांच मिनट में खोल लिया ।

दबे पांव मैं भीतर दाखिल हुआ ।

मैंने वो कोठी कभी देखी नहीं थी लेकिन शबाना से - जो कि उसकी खूबसूरती अक्सर बयान करती रहती थी - मैं इतना कुछ इतनी बार सुन चुका था कि बिना देखे ही वहां के जुगराफिये से मैं पूरी तरह वाकिफ था । लिहाजा सबसे पहले मैं बैक्टर की स्टडी में पहुंचा ।

स्टडी की तीन दीवारों में शैल्फ थे जो पुस्तकों से भरे पड़े थे । एक तरफ एक तीन गुणा पांच की टेबल लगी हुई थी । चौथी दीवार में वो दरवाजा था जिससे मैं भीतर दाखिल हुआ था । उसकी बगल में एक दीवान था और फिर एक ड्रिंक्स की कैबिनेट थी ।

अपनी तलाश की शुरूआत मैंने टेबल से की ।

वहां कुछ न था ।

ड्रिंक्स की कैबिनेट टटोलना भी बेकार गया ।

मैं पुस्तकों के सामने पहुंचा ।

एक-एक पुस्तक टटोलने का न तो मेरे पास वक्त था और न ही वो मुझे जरूरी लग रहा था इसलिए मैंने दोनों हाथों में एकबारगी कई-कई पुस्तकें थाम कर उनके पीछे झांकना आरम्भ किया ।

इस बार मुझे अपनी मेहनत का फल मिला ।

मैं दूसरी दीवार के शैल्फ टटोल रहा था तो मुझे एक बहुत मोटे ग्रन्थ के पीछे कुछ कागजात दिखायी दिये । तत्काल मैंने उन्हें वहां से निकाल कर उनका मुआयना किया ।

वो कागजात शबाना के चोरी गये कागजात का एक हिस्सा निकले ।

उनमे कुछ तो वो पत्र थे जो बकौल बैक्टर, उसने शबाना को लन्दन से लिखे थे और कुछ शबाना की डायरी से फाड़े गये पन्ने थे ।

डायरी के पन्नों में शबाना का हैंडराइटिंग मैंने साफ पहचाना ।

“कौन है ?”

आवाज चाबुक की फटकार की तरह मेरी चेतना से टकराई ।

मैं हौले से आवाज की दिशा में घूमा ।

दरवाजे पर हाथ में टेनिस का रैकेट थामे रजनीश खड़ा था ।

“तुम !” - वो भौंचक्का सा मेरा मुंह देखता हुआ बोला - “तुम यहां क्या कर रहे हो ? भीतर कैसे आये ? तुम्हारे हाथ में क्या है ?”

तत्काल मैंने कागजात को मोड़कर अपने कोट की जेब में डाल दिया ।

वो दनदनाता हुआ मेरी तरफ लपका ।

“मैं यहां तुम से मिलने आया हूं ।” - वो करीब पहुंचा तो मैं बोला - “दरवाजा खुला दिखा सो भीतर आ गया । और मेरे हाथ” – मैंने अपने दोनों हाथ उसे दिखाये – “खाली हैं ।”

वो हकबकाया सा कभी मेरे हाथों को और कभी मेरी सूरत को देखने लगा ।

“स्टडी बढ़िया है तुम्हारी ।” – मैं बोला ।

“क्यों मिलना चाहते थे तुम मेरे से ?” – वो मुझे घूरता हुआ हुआ बोला ।

“शबाना की बाबत कुछ बात करनी थी !”

“फोन क्यों नहीं किया ? आने की खबर क्यों नहीं की ? शहर से बाहर इतनी दूर यहां आना क्यों जरूरी समझा जबकि तुम मेरे से मेरे आफिस भी मिल सकते थे ?”

“ये तो कुछ भी फासला नहीं ।” – मैं छाती फुलाकर बोला – “अपने क्लायंटस की खिदमत की खातिर तो मैं माउंट एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ सकता हूं, साउथ पोल पर पहुंच सकता हूं, सहारा रेगिस्तान की खाक छान सकता हूं..”

“बकवास बन्द !” – वो दहाड़ा ।

“ओके, बॉस ।”

“बेवकूफ बनाते हो ! तुम चोरों की तरह यहां घुसे हो । चोरों की तरह चोरी की खातिर ही घुसा जाता है । बोलो, क्या चुराया है तुमने यहां से ? अभी अपनी जेब में क्या रखा है तुमने ?”

“कुछ नहीं ।”

“अन्धा नहीं हूं मैं, राज । कुछ कागजात की झलक मुझे साफ मिली थी । अभी जो कागजात जेब में रखे हैं, उन्हें वापिस निकालो वर्ना तुम्हारी खैर नहीं ।”

“निकालता हूं ।” – मैं बड़ी शराफत से बोला – “लेकिन कम से कम बैठ तो जाओ । यूं रैकेट थामे मेरे सिर पर खड़े रहोगे तो वैसे ही मेरा हार्टफेल हो जायेगा ।”

“कोई चालाकी करने की कोशिश की तो पछताओगे ।”

“कोई चालाकी नहीं होगी ।”

वो मेज के पीछे जाकर अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर बैठने के स्थान पर विजिटर्स चेयर्स में से ही एक पर बैठ गया । मैं भी उसके पहलू में एक कुर्सी पर ढ़ेर हुआ और मैंने अपनी जेब से कागजात वापिस निकाले । उसमें से एक चिट्ठी मैंने अलग की और उस पर सरसरी निगाह डाली ।

“वाह !” – मैं बोला – “इसमें तो ये भी दर्ज है कि कौन-कौन से सुख तुमने अपनी बीवी से नहीं सिर्फ शबाना से पाये है, जैसे...”

उसका चेहरा पीला पड़ गया । उसने चिट्ठी मेरे हाथ से झपट ली । उसने एक आतंकित निगाह चिट्ठी पर डाली और फिर उसका पुर्जा-पुर्जा कर दिया ।

“अभी तो कई और हैं ।” – मैं बोला – “जैसे ये जिसमें तुमने लिखा है कि...”

“सब मुझे दो ।” - वो सख्ती से बोला ।

“अच्छा !”

“अपनी कीमत खुद बोलो । मैं जानता हूं कि मैं शबाना के कातिल से सौदा कर रहा हूं लेकिन इस घड़ी मैं इस बात को नजरअन्दाज करने को तैयार हूं ।”

“तुम समझते हो कि शबाना का कत्ल मैंने किया है !”

“और किसी तरीके से ये चिट्ठियां तुम्हारे कब्जे में नहीं आ सकती थीं । लेकिन मुझे क्या ! तुम अपनी कीमत बोलो ।”

“काम इतना आसान नहीं ।”

“मुझे और ज्यादा निचोड़ने की भूमिका बना रहे हो तो...”

“मैंने शबाना का कत्ल नहीं किया । अलबत्ता बहुत लोग मुझे इस जंजाल में फंसाने की जी तोड़ कोशिशें कर रहे हैं । उनमें एक अब तुम भी शामिल हो जाओगे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । और फिर तुम्हारे कहने भर से ही मैं कातिल नहीं हो जाऊंगा ।”

“तुम इस बात को झुठला सकते हो कि तुम यहां चोरों की तरह घुसे हो ?”

“झुठला सकता हूं लेकिन नहीं झुठलाता । मैं कबूल करता हूं कि मैं यहां चोरों की तरह घुसा था लेकिन इसलिये नहीं क्योंकि मैं कातिल हूं बल्कि इसलिये क्योंकि मैं ये साबित करके दिखाना चाहता हूं कि मैं कातिल नहीं हूं । मैं असली कातिल की तलाश में हूं ताकि ये स्थापित हो सके कि कातिल मैं नहीं हूं । मैं असली कातिल का कोई सुराग पाने की कोशिश में हूं ।”

“वो सुराग तुम्हें यहां मिलने वाला था ?”

“मुझे नहीं पता था कि मुझे यहां क्या मिलने वाला था । अपनी तलाश की कामयाबी की गारन्टी के साथ मैं यहां नहीं आया था । मुझे मालूम था कि मेरी तलाश नाकाम भी जा सकती थी । लेकिन नाकामी का पाठ एडवांस में पढ लेने से कामयाबी हासिल नहीं होती ।”

“मुझ पर कृपादृष्टि क्यों ?”

“क्योंकि तुम्हारे शबाना से अवैध सम्बन्ध थे । क्योंकि शबाना तुम्हें ब्लैकमेल कर रही थी । क्योंकि ब्लैकमेल से भड़के शख्स की पनाह कत्ल में ही होती है । ये तमाम बातें तुम्हारे कातिल होने की तरफ बड़ा मजबूत इशारा करती हैं । शबाना के कागजात गायब थे जो कि मेरी निगाह में कातिल के कब्जे में हो सकते थे । उन कागजात की तलाश में मैं यहां आया था । उन कागजात का एक हिस्सा यहां मौजूद था ।”

“ये... ये कागजात” - वो मेरे हाथ में थमे कागजात की ओर इशारा करता हुआ हैरानी से बोला – “तुम्हें यहां से मिले हैं ?”

“हां ।”

“यहां से कहां से ?”

“उस शैल्फ की उन किताबों के पीछे से ।”

“राज ।” - वो तिरस्कारपूर्ण स्वर में बोला - “मैं तो तुम्हें बड़ा काबिल जासूस समझता था । लेकिन तुम तो निरे गावदी निकले । मुझे तो अफसोस हो रहा है मैंने तुमसे कोई उम्मीद बांधी । अब एक तकलीफ करो, मेरी फीस मुझे वापिस कर दो ।”

“क्या कहना चाहते हो ?”

“अरे, अगर मैंने अपनी चिट्ठियां वापिस हासिल करने के लिए शबाना का कत्ल किया होता तो मैं उन्हें यहां लाकर ऐसी जगह - खुलेआम किताबों के पीछे - रखता जहां से कि कोई बच्चा भी उन्हें तलाश कर लेता । तुम खुद गावदी हो या मुझे समझ गावदी रहे हो ? अरे, मैंने कत्ल किया होता तो मैं इन कागजात को अब तक तक सम्भाल कर रखता ! मैं इन्हें कत्ल के फौरन बाद ही फूंक-फांक न चुका होता !”

“ये एक अच्छा सवाल है । इसका कोई मैच करता अच्छा जवाब भी तुम्हारे ही पास होगा बॉस ।”

“इसका जवाब ये है कि ये कागजात मैंने यहां नहीं छुपाये । ये कागजात तुम यहां अपने साथ लाये हो और अगर मैं एकाएक ऊपर से न आ गया होता तो इन्हें तुम मुझे फंसाने की नीयत से यहां प्लांट करके जाने का इरादा रखते थे । मैं ऊपर से आ गया इसलिये तुम ये जाहिर कर रहे हो कि इन्हें तुमने यहां से बरामद किया है । राज, यूं अपनी बला मेरे सिर पर मंढने का तुम्हारा मंसूबा पूरा नहीं हो सकता । अपना गुनाह किसी और के सिर थोपना चाहते हो तो वो सिर कहीं और जा के तलाश करो । लेकिन अगर कागजात तुम्हारे पास हैं तो उनका ग्राहक मैं अभी भी हूं । तुम्हारे हाथ में जो कागजात हैं, ये सब अगर मेरी बाबत हैं और अगर ये मुकम्मल कागजात हैं, जिनमें कि मेरा जिक्र है, तो सौदा अभी भी हो सकता है ।”

“मौजूदा हालात में तुम्हारे से ऐसा कोई सौदा करना तुम्हारे इस ख्याल की तसदीक करना होगा कि मैं कातिल हूं । बॉस न मैं कातिल हूं न मेरे पास कागजात हैं, न कभी थे । मैं यहां ये कागजात प्लांट करने आया होता तो इस डेढ़ मिनट के काम को अन्जाम देकर मैं कब का यहां से रुख्सत हो चुका होता ।”

“ये सब लिफाफेबाजी है । मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं ।”

“नहीं है तो न सही ।” – मैं लापरवाही से कन्धे झटकाता हुआ उठ खडा हुआ – “फिर मुलाकात होगी, बॉस ।”

मैंने कागजात को वापिस अपने कोट की जेब में रखा और दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया ।

“कहां चल दिये ?” – वो पीछे से बोला ।

“घर ?” – मैं बोला ।

“ऐसे कैसे चले जाओगे ?”

“क्यों ? बैण्डबाजे के साथ भेजने का इरादा है ?”

“शहनाई का भी इन्तजाम हो सकता है !”

“गाने वाली का ?”

“क्या ?”

“मैंने कहा साथ में गाना भी हो जाये तो कैसा रहे !”

“गाना !”

“कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना ।”

उसके चेहरे पर क्रोध के भाव आये । उसने अपनी भैंगी आंखें मेरे पर फोकस करके मुझे घूरा, घूरा क्या गाने के बोल सार्थक किए ।

“मसखरी बातों का मैं बहुत कद्रदान हूं ।” – मैं बोला – “लेकिन सारी बॉस, इस वक्त मूड नहीं हैं । सो बैटर लक नेक्स्ट टाइम ।”

वो केवल मुस्कराया ।

मैं दरवाजे के करीब पहुंचा तो एक पहाड़ जैसा आदमी वहां प्रकट हुआ और पूरे का पूरा दरवाजा घेर कर खड़ा हो गया । उसका हाथ इतना बड़ा था कि उसमे थमी रिवाल्वर बच्चे का खिलौना लग रही थी । रिवाल्वर की नाल का रुख मेरी छाती की तरफ था ।

“केयरटेकर ।” – बैक्टर सहज भाव से बोला – “हाल ही में रखा है । लगता है बाकी बातों की तरह इसकी खबर नहीं थी तुम्हें ।”

“सच में ही खबर नहीं थी ।” – मैं पहाड़ से सम्बोधित हुआ – “रास्ता छोड़ो, भाई । मुझे जरा जल्दी कहीं पहुंचना है ।”

केयरटेकर अपने स्थान से टस से मस भी न हुआ । उसके विकराल चेहरे पर बड़ी कमीनी मुस्कराहट आयी और फिर वो बोला – “अभी आप कैसे जा सकते हैं । आपकी कोई खातिर तो अभी हुई ही नहीं ।”

“देखा राज !” – बैक्टर बोला – “अपने जोरावर को भी इस बात की फिक्र है कि यहां तुम्हारी कोई खातिर नहीं हुई ।”

“क्या चाहते हो, भई ?” – मैं चिन्तित भाव से बोला ।

“मैं तो कुछ नहीं चाहता । शायद जोरावर चाहता हो । जोरावर, तू साहब को चपाती खिलाना पसन्द करेगा या परांठा ?”

“परांठा !” – जोरावर बोला – “तन्दूरी ।”

“साहब को हजम न हुआ तो ?”

“तो साहब की किस्मत ।”

“परांठा साहब पहले ही कहीं से खा के आये मालूम होते हैं ।” – वो मेरे चेहरे की चोटों की ओर इशारा करता हुआ बोला – “कहीं हाजमा खराब न हो जाये ?”

“साहब का हाजमा सच में खराब है ।” – मैं जल्दी से बोला – “इसलिये परांठा फिर कभी...”

“अभी आपका हाजमा ठीक करता हूं, मालिक ।” – जोरावर बोला । उसने रिवाल्वर को अपने बायें हाथ में स्थानान्तरित किया और दायें से हाथ से मेरा गिरहबान जमकर यूं जमीन से दो फुट ऊंचा उठा दिया जैसे मैं कोई भारहीन वस्तु था ।

मैं उसकी पकड़ में छटपटाने लगा ।

उसने थोड़ी देर मुझे पेंडुलम की तरह दायें-बायें हिलाया और फिर छोड़ दिया ।

मैं धड़ाम से फर्श पर जा कर गिरा ।

“हाजमा ठीक हुआ, राज ?” – बैक्टर व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।

“हां, हुआ ।” – मैं उठकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और हांफता हुआ बोला – “बिल्कुल ठीक हो गया । शुक्रिया ।”

“सोच लो ।”

“सोच लिया ।”

“तो फिर...”

मैंने जेब से कागजात निकाल कर उसके सामने मेज पर रख दिये ।
 
बैक्टर उनका मुआयना करने लगा । जितनी देर वो कागजात देखता रहा उतनी देर जोरावर पहाड़ की तरह मेरे सिर पर खड़ा रहा ।

आखिरकार बैक्टर ने मेज पर से एक सिगरेट लाइटर बरामद किया और उन कागजात को आग लगा दी ।

“मुझे लगता है” - वो बोला - “कि मेरे से ताल्लुक रखते कागजात इतने ही थे । शबाना इन्हीं की धमकी से मुझे ब्लैकमेल करना चाहती थी और साथ में अपने पट्ठे की भी, राज की भी, यूं धमकी देती थी जैसे तुम सुपरमैन हो, फैन्टम हो । मैंने उसकी बातों को गम्भीरता से नहीं लिया था क्योंकि मुझे ऐतबार नहीं आता था कि तुम्हारे जैसा आदमी इतना नीचे गिर सकता था कि एक रण्डी के ब्लैकमेल जैसे घिनौने कारोबार में उसका जोड़ीदार बन सकता था । कितना गलत सोचा था मैंने तुम्हारे बारे में ! तुम तो मेरी सोच से भी ज्यादा खराब निकले । इन कागजात को यहां प्लांट करने पहुंच गये ।”

तब तक कागजात से उठती लपट उसके हाथ तक पहुंचने लगी थी । उसने उन्हें एक बड़ी-सी ऐश ट्रे में झोंक दिया और जेब से रूमाल निकाल कर अपने हाथ पोंछने लगा ।

“इन कागजात को राख करके अच्छा नहीं किया तुमने ।” – मैं बोला – “इनमें कत्ल का कोई सुराग छुपा हो सकता था और वो सुराग शबाना के कातिल की गिरफ्तारी में मददगार साबित हो सकता था ?”

“मैंने क्या लेना-देना है शबाना के कातिल से और उसकी गिरफ्तारी से !” – वो लापरवाही से बोला – “मेरी तरफ से तो अच्छा होता कि शबाना के साथ-साथ तुम्हारा भी काम हो गया होता ।”

“मैं शबाना के ब्लैकमेल रैकेट में शरीक नहीं था ।”

“अब तुम्हे कुछ भी कहने का अख्तियार है ।”

“तुम्हारा टेनिस का खेल आज जल्दी कैसे खत्म हो गया ?”

“जोरावर को घर आये बिन बुलाये मेहमान की खबर लग गयी थी । वो मुझे बुलाने टेनिस कोर्ट पर पहुंच गया था ।”

“ये अपने आप में सबूत है कि कागजात मैं यहां प्लांट करने नहीं आया था । इसके मुझे देखने, तुम्हें बुलाने जाने और तुम्हारे यहां पहुंचने के वक्फे तो मैं यंहा तीन बार आ जा सकता था ।”

“अब छोड़ो वो किस्सा ।”

“जब असल इरादा तुम्हारा ये था ।” – मैंने ऐश ट्रे की ओर इशारा किया – “तो कागजात की कीमत क्यों पूछ रहे थे ?”

“अगर तुम कोई कीमत बोलते तो ये अपने आप में सबूत होता कि ये कागजात तुम्हीं यहां लाये थे और अब तुम शबाना का ब्लैकमेल रैकेट खुद चलाने के ख्वाहिसमन्द थे ।”

“मैं कोई कीमत बोलता तो तुम मुझे गलत आदमी समझते लेकिन इसका उलट तुम्हे मंजूर नहीं ! कीमत न बोलने का कोई क्रेडिट तुम मुझे नहीं देना चाहते ?”

“तुम बड़े टॉप के हरामी हो, राज । तुम्हारी कौन सी मूव के पीछे क्या मकसद छुपा है, ये तो कोई तुम से बड़ा हरामी ही भांप सकता है जो की मैं नहीं हूं ।”

“कोशिश करते रहो । कभी न कभी तो पहुंच ही जाओगे हरामपन्ती के शिखर पर ।”

“बॉस ।” – जोरावर आशापूर्ण स्वर में बोला – “मैं इसकी जुबान कुतर दूं ?”

“जाने दे ।” – बैक्टर बड़ी दयानतदारी से बोला – “मेहमान है ।”

जोरावर के चेहरे पर निराशा के भाव आये ।

“राज !” – बैक्टर बोला – “मौके का फायदा उठ और फूट ले वर्ना ऐसा न हो कि उतावला हो रहा जोरावर मेरी इजाजत के बिना ही तेरा परांठा सेक दे । तन्दूरी । बड़े वाला ।”

पराजय और अपमान के बोझ के नीचे दबा मैं वंहा से रुखसत हुआ ।

आपके खादिम की तकदीर तो वाकई उससे रूठ गयी थी, तभी तो कदम – कदम पर हत्तक, कदम – कदम पर नाकामी के रूबरू होना पड़ रहा था ।

***
 
मैं गोल मार्केट पहुंचा ।

पुलिस के आदमियो से खबरदार तब भी मैं बहुत सावधानी से वंहा पहुंचा और मुझे यकीन था कि अव्वल तो कोई मेरे पीछे लगा नही हुआ था, लगा हुआ था तो मैंने उसे अपने पीछे से झटक दिया था ।

अमोलकराम की आर्म्स एंड अम्युनिशन शॉप खुल चुकी थी लेकिन वो खुद वहां मौजूद नहीं था । वहां काउंटर के पीछे मेरा एक जाना पहचाना सेल्समैन मौजूद था ।

“बाउजी कंहा गए ।” – मैंने उससे पूछा ।

“उन्हें तो” – वो घबराया सा बोला – “पुलिस पकड़ कर ले गयी ।”

“क्यों ?”

“अभी दुकान खुली ही थी तो वो लोग यहां आ धमके थे । उन्होंने बाउजी को आननफानन जीप पर बिठाया और ये जा वो जा ।”

“वजह कुछ नहीं बतायी ?”

“बाउजी को बतायी होगी । मुझे तो मालूम नहीं ।”

“कमाल है । जरा फोन दिखाओ ।”

उसने फोन मेरे सामने सरकाया तो मैंने पुलिस हैडक्वार्टर यादव के लिए फोन किया ।

वो वहां नहीं था ।

मैंने अपने ऑफिस फोन किया ।

“मैं बोल रहा हूं ।” – डॉली लाइन पर आई तो मैं बोला ।

“कंहा से बोल रहे हैं ?” – वो व्यग्र भाव से बोली ।

“गोल मार्केट से । क्यों ?”

“आपके लिए पुलिस का बुलावा है । आपके लिए पुलिस का हुक्म है कि आप फौरन पुलिस हैडक्वार्टर में ए सी पी तलवार के हुजूर में पेश हों । मैंने उन्हें कहा था कि मेरा आप से सम्पर्क होते ही मैं तलवार साहब का सन्देशा आपको दे दूंगी लेकिन उनको तसल्ली नहीं । पांच-पांच मिनट में फोन आ रहा है और हर बार एक ही बात पूछी जा रही है । आप आये या नहीं ! आपसे सम्पर्क हुआ या नहीं !”

“ऐसी क्या आफत आ गयी है ?”

“उन्होंने कुछ नहीं बताया लेकिन कोई आफत ही आ गयी मालूम होती है जो .....”

“ठीक है, मैं पहुंचता हूं तलवार के पास ।”

“कहीं आप फिर गिरफ्तार तो नहीं होने वाले ?”

“पता नहीं । जैसे हालात होंगे, मैं तुझे खबर करूंगा ।”

फिर मैंने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।

मैं पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचा ।

बद्हवास सा अमोलकराम मुझे ए सी पी तलवार के ऑफिस में बैठा मिला ।

मैंने तलवार का अभिवादन किया और अमोलकराम से हाथ मिलाया ।

“बैठो ।” - तलवार गम्भीरता से बोला ।

“शुक्रिया ।” – मैं अमोलकराम के पहलू में एक कुर्सी पर बैठ गया ।

“मैसेज मिला ?”

“जी हां, मिला । तभी तो दौड़ा चला आया । सिर के बल ।” – मैंने एक उड़ती निगाह अमोलकराम की परेशानहाल सूरत पर डाली और फिर बोला - “माजरा क्या है, जनाब ?”

“माजरा इन साहब की मौजूदगी से ही तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा ?”

“राज ।” – अमोलकराम दबे स्वर में बोला – “मुझे सब कुछ बताना पड़ा था ।”

“तो क्या हो गया ?” – मैं आश्वासन भरे स्वर में बोला – “तुमने कोई गैरकानूनी काम थोड़े ही किया है ?”

“पुलिस से” - तलवार सख्ती से बोला - “कोई जानकारी छुपाकर रखना भी गैरकानूनी काम होता है ।”

“ए सी पी साहब” - अमोलकराम बोला - “मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूं कि मुझे नहीं मालूम था कि वो गोली किसी कत्ल के केस में चली थी । अब मुझे क्या सपना आना था कि .....”

“इसे आपको उस गोली की बैकग्राउंड बतानी चाहिए थी । आपको पूछना चाहिये था उस गोली की बाबत ?”

“खामखाह ! मुझे एक गोली दिखाई जाती है और सवाल किया जाता है कि वो कैसी रिवाल्वर में फिट आने वाली गोली थी ! मैंने सवाल का जवाब दे दिया और गोली लौटा दी । इसमें क्या गैरकानूनी काम कर दिया मैंने ?”

“वो गोली सबूत है ।”

“किस बात का ?”

“उसने उत्तर न दिया ।”

“किस बात का ?” - मैंने भी अमोलक राम का सवाल दोहराया ।

“जब गोली बरामद होगी तो मालूम पड़ जायेगा ।” – तलवार बोला – “कहां है वो गोली ?”

“कौन सी गोली ?”

“वो गोली जो तुमने तीन दिन पहले मंगलवार को जांच के लिये इन्हें सौंपी थी ।”

“आपको कैसे खबर लगी, जनाब ?”

“ये मेरे सवाल का जवाव नहीं है ।” – वो गला फाड़कर चिल्लाया ।

“मेरे पास है ।” - मैं दबे स्वर में बोला ।

“निकालो ।”

मैंने जेब से अपना बटुवा निकाला ।

शबाना के पलंग की मैट्रेस से निकली, अमोलकराम की लिफाफे में रख कर लौटाई गोली तब भी लिफाफे में ही थी लेकिन पिछली रात अस्थाना की रिवाल्वर से पेड़ में चलाई गोली मैंने वैसे ही बटुवे के एक कोने में धकेल दी थी । मैंने वहां से गोली निकल कर तलवार के सामने मेज पर रख दी ।

तलवार ने गौर से उसका मुआयना किया । फिर उसने अपनी मेज की दराज से एक लिफाफा निकाला जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था: शबाना की लाश से निकाली गयी गोली ।

उसने लिफाफे में से गोली निकाली, लिफाफे को मेरे वाली गोली के पहलू में रखा और लिफाफे पर गोली रखी ।

“क्या फर्क है ?” – वो बोला ।

“देखने में तो कोई फर्क नहीं लगता ।” - मैं दबे स्वर में बोला ।

“दोनों हू-ब-हू एक जैसी गोलियां हैं जो कि एक ही हथियार से चलाई गयी हैं ।”

“एक जैसे हथियार से, जनाब । दोनों पैंतालिस कैलिबर की कोल्ट रिवाल्वर से चली गोलियां हैं लेकिन ये दो जुदा रिवाल्वरों से नहीं, बल्कि एक ही रिवाल्वर से चली हैं, ये बात इन पर एक निगाह - नंगी निगाह - डाल कर ही नहीं कही जा सकती ।”
 
“ये” - वो जिदभरे स्वर में बोला - “शबाना के कत्ल के दौरान मौकायेवारदात पर चली गोली ही है । वहां दो गोलियां चली थीं । एक शबाना की छाती में लगी थी जिस ने उसकी जान ली थी । दूसरी उसके जिस्म के करीब मैट्रेस में धंस गयी थी । हमें पलंग पर बिछी चादर में और चादर के नीचे मैट्रेस में गोली का सुराख मिला था लेकिन गोली नहीं मिली थी । किसी ने गोली उस सुराख में से निकाल ली थी । जरुर कोई पुलिस से पहले ये जानने का इच्छुक था कि वो गोली कैसी रिवाल्वर से चलायी गयी थी ताकि फिर वो ऐसे शख्स को ट्रेस कर सकता जो कि शबाना का करीबी था, उसका कातिल हो सकता था और वैसी रिवाल्वर का मालिक था । वो ‘कोई’ तुम हो, मिस्टर प्राइवेट डिटेक्टिव । ऐसा खुरापाती आदमी मुझे इस केस में एक ही दिखाई दे रहा है जो कि तुम हो । फिर जब हमने चुपचाप ये मालूम करवाया कि क्या तुम्हारी जानकारी के दायरे में कोई आर्म्स एण्ड अम्युनिशन डीलर भी था तो इन साहब का नाम सामने आया । इन्हें पकड़ कर यहां मंगवाया गया तो इन्होंने जल्दी ही सारी कहानी कह दी । अब बोलो तुमने मैट्रेस में से गोली क्यों निकाली ?”

“मैंने नहीं निकाली ।” – मैं दिलेरी से बोला – “और मैं अभी भी कहता हूं कि ये जरुरी नहीं है कि ये गोली मर्डर वैपन से ही चली हो ।”

“तलवार ने कोई सख्त बात कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर कुछ सोचकर खामोश हो गया । फिर उसने दराज में से एक खाली लिफाफा निकाला, उस पर पहले लिफाफे जैसे ही मोटे मोटे अक्षरों में ‘राज से बरामद हुई गोली’ लिखा और मेरे वाली गोली उठाकर उस लिफाफे में बंद किया और फिर कॉलबैल बजायी ।”

“तत्काल एक हवलदार भीतर आया ।”

“ये दोनों लिफाफे” – तलवार ने आदेश दिया – “बैलेस्टिक एक्सपर्ट के पास ले जाओ और कम्पेरिजन की रिपोर्ट लेकर उलटे पांव वापिस आओ ।”

“जी, जनाब ।” – हवलदार तत्पर स्वर में बोला, उसने मेज पर से लिफाफे उठाये और वहां से रुख्सत हो गया ।”

“अगर ये दोनों गोलियां” – तलवार मुझे घूरता हुआ बोला – “आपस में मिलती पायी गयीं तो जानते हो इसका मतलब क्या होगा ?”

“यही” - मैं बोला - “कि दोनों गोलियां एक ही रिवाल्वर से चली थीं ।”

“उस रिवाल्वर से, शबाना के कत्ल के केस में जिस से घातक गोली चली थी ।”

“कबूल । लेकिन इससे ये कैसे साबित हो जायेगा कि दूसरी गोली मैट्रेस में से निकली थी ?”

“और कहां से निकलेगी जब मौकायेवारदातपर दो ही गोलियां चली थी तो ....”

“मौकायेवारदात पर दो गोलियां चली थी लेकिन उन गोलियों को चलाने वाली रिवाल्वर से, कथित मर्डर वैपन से, दर्जनों गोलियां कहीं और, कभी और चली हो सकती हैं । दूसरी गोली उन्हीं कहीं और, चली गोलियों में से एक हो सकती है । जनाब, घातक गोली की शिनाख्त तो ये है कि वो पोस्टमार्टम के दौरान लाश में से निकली । दूसरी गोली घातक गोली से मिलती भी पायी गयी तो ये कैसे स्थापित होगा कि वो उस मैट्रेस में दागी गयी थी जिस पर कि शबाना की लाश पड़ी पायी गयी थी ?”

वो हड़बड़ाया । मुझे घूरती उसकी निगाह एक क्षण को विचलित हुई और फिर वो पूर्ववत कठोर स्वर में बोला - “ये तुम अपनी जुबानी कबूल करोगे कि वो गोली तुम ने मैट्रेस में से निकाली थी ।”

“अच्छा ! जबरदस्ती ?”

“फिर तुम्हें ये भी कबूल करना पड़ेगा कि वारदात के वक्त तुम मौकायेवारदात पर मौजूद थे ।”

“जनाब, अगर मैं वारदात के वक्त मौकायेवारदात पर मौजूद रहा होता तो ये गोली वहां मैट्रेस में से नहीं, शबाना की बगल में लुढकी पड़ी मेरी लाश में से बरामद हुई होती । आप कातिल के ऐसा अक्ल का अन्धा होने की कल्पना क्योंकर कर सकते हैं कि वो अपने पीछे अपनी करतूत का एक चश्मदीद गवाह जिन्दा छोड़ जाता ।”

“तुम तब कहीं इधर-उधर रहे होगे और कातिल को वहां तुम्हारी मौजूदगी की खबर नहीं लगी होगी ?”

“इधर-उधर कहां ? पलंग के नीचे ?”

“शटअप ।”

“मैं सुबह पांच बजे वहां कैसे मौजूद था ?”

“शबाना से तुम्हारा अफेयर था – तुम अपनी जुबानी मानो या न मानो, हमारी तफ्तीश यही कहती है कि तुम्हारा उससे अफेयर था – तुम पिछली रात से ही वहां मौजूद रहे हो सकते हो ।”

“किसलिये ?”

“मौजमेले के लिए और किसलिए ?”

“आप ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आप नहीं जानते कि शबाना कैसी फायरब्रांड औरत थी ! आप ये भी नहीं जानते कि इस पंजाबी पुत्तर की रगों में खून की जगह नाइन्टी थ्री ओक्टेन दौड़ती है । मेरी वो रात शबाना के पहलू में गुजरी होती तो अगली दोपहर तक मैं उठकर पैरों पर खड़ा न हो पाया होता । यानी कि जैसे शबाना की सोते में जान गयी थी, वैसे ही मेरी भी सोते में ही उसके पहलू में जान चली गयी होती ।”

“नेचर काल के लिये हर किसी को उठना पड़ता है । तुम्हारी खुशकिस्मती ये रही होगी कि तुम कातिल के बैडरूम में पहुंचने से बस जरा ही पहले टॉयलेट में गए होगे ।”

“और कातिल को टॉयलेट में मेरी मौजूदगी की खबर नहीं लगी होगी ?”

“हां ।”

हकीकत तो वही थी जो वो बयान कर रहा था लेकिन फिर भी दिखावे के लिए मैं एक फरमायशी हंसी हंसा ।

तभी हवलदार वापस लौटा । उसने दोनों लिफाफे तलवार के सामने मेज पर रख दिए और बोला – “जनाब जी, पराशर साहब बोलते हैं कि दोनों गोलियां एक ही रिवाल्वर से चलायी गयी हैं ।”

वो बात सुनते ही मुझे जैसे सांप सूंघ गया ।

यानी कि मर्डर वैपन मेरे अधिकार में था ।

अब जैसे उस काईयां पुलिस वाले ने अमोलकराम को खोज निकाला था, वैसे ही वो मेरी कार में से अस्थाना वाली फोर्टी फाइव कोल्ट रिवाल्वर बरामद कर लेता तो दिल्ली शहर में मौजूद मेरे सारे हिमायती मिल कर भी मुझे उस संकट से नहीं उबार सकते थे ।

जरुर यूयर्स ट्रूली की फेमस लक को किसी कलमुहें की नजर लग गयी थी ।

मेरा दिमाग तेजी से उस दुशवारी से निकलने के लिये कोई विश्वसनीय कहानी सोचने लगा ।

तलवार ने भुकुटि के एक इशारे से हवलदार को डिसमिस किया और फिर अमोलक राम की तरफ घूमा – “आप भी जाइये ।”

“शुक्रिया ।” - अमोलक राम तत्काल उछल कर खड़ा हुआ ।

“आपको आपके अपने हित में राय दी जाती है कि आइंदा ऐसे बखेड़ों से बच कर रहें । यारी दोस्ती दिखाने के और भी जरिये होते हैं, आइंदा ऐसा जरिया अख्तियार न करें जो आप और आप के कारोबार दोनों के लिए नुकसानदेय साबित हो सकता हो ।”

“मैं आइंदा ध्यान रखूंगा ।”

“जाइये ।”

मेरी तरफ हाथ हिलाता वो वहां से रुख्सत हो गया ।

फिर तलवार मेरी तरफ आकर्षित हुआ । उसने यूं मेरी तरफ देखा जैसे कसाई बकरे को देखता है ।

“अब बोलो ।” – वो मेरे से हासिल हुई गोली वाला लिफाफा अपनी एक उंगली से ठकठाता हुआ बोला – “ये गोली तुम्हारे पास कहां से आयी ?”

“कोमलने दी ।” – मैं यूं बोला जैसे वो बात मजबूरन मुझे अपनी जुबान पर लानी पड़ रही हो ।

“किसने ?” – वो अचकचा कर बोला ।

“कोमलने ? कोमलगोमज ने । शबाना की मेड ।”

“कब ? कब दी ?”

“मंगलवार । जब मैं उसके घर पर उससे मिला था । उस मुलाकात की बाबत मैंने बताया तो था आपको ।”

“मुलाकात की बाबत बताया था । गोली की बाबत नहीं बताया था ।”

“जनाब, तब गोली की बाबत बताने लायक कोई बात तो होती ! तब उस गोली की बाबत अभी कुछ मुझे भी कहां मालूम था ! उस रोज तो वो गोली मैंने अमोलकराम को सौंपी थी जिसकी बाबत उसने मुझे अगले रोज यानी की परसों बताया था कि वो कैसे हथियार से चली गोली थी ।”

“तो परसों इस बात की खबर पुलिस को की होती ?”

“किस बात की खबर पुलिस को की होती, जनाब ? मुझे क्या सपना आया था कि उस गोली का रिश्ता कत्ल के केस से निकल सकता था ? मेरे पास ये जानने का था कोई साधन कि शबाना का कत्ल पैंतालीस कैलिबर की रिवाल्वर से निकली गोली से हुआ था ? मेरे को तो यहां कदम रखने से पहले तक नहीं मालूम थी ये बात ।”

“कोमलके पास वो गोली कहां से आयी ?”

“वो कहती थी कि जब वो मंगलवार सुबह शबाना के फर्म हाउस पर पहुंची थी तो वो गोली उसे बैडरूम के फर्श पर पड़ी मिली थी ।”

“फर्श पर ?”

“जरुर वो मैट्रेस से पार किसी सख्त चीज से, किसी कब्जे या स्प्रिंग वगेरा से टकरायी होगी और छिटक कर छेद से बाहर आ गिरी होगी ।”

“नॉनसेंस ।”

“मैं आपको वो ही बता रहा हूं जो मुझे कोमलने बताया था । उसने गोली फर्श पर पड़ी पायी थी और कोई अजीब सी चीज जानकर उठा कर अपनी जेब में रख ली थी ।”

“अजीब सी चीज जानकर !”

“क्या बड़ी बात है ! जनाब, सौ में से निन्यानवे, बल्कि हजार में से नौ सौ निन्यानवे लोगों ने गोली नहीं देखी होती ।”

“फिर उसे सूझा कैसे कि वो गोली थी ?”

“उसने गोली मुझे दिखायी थी । तब मैंने उसे बताया था कि वो तो रिवाल्वर की गोली थी ।”

“जो कि उसे मौकायेवारदात पर पड़ी मिली थी ?”

“हां ।”

“फिर भी तुमने इस बात को पुलिस की जानकारी में लाने के काबिल न समझा !”

“मैं जरुर लाता लेकिन जब तक मुझे उस गोली की बाबत कुछ मालूम हुआ, तब तक कोमलमर गयी । तब मुझे ये खतरा सताने लगा कि पता नहीं अब कोई मेरी बात पर विश्वास करेगा या नहीं कि वो गोली मुझे कोमलने दी थी ।”

“मुझे तो बिल्कुल विश्वास नहीं तुम्हारी इस बात पर ।”

“देख लीजिये अब आप ही । यानी कि मेरा अन्देशा सही था ।”

“फिर भी इस बात की खबर तुम्हे पुलिस को करनी चाहिए थी ।”

“मेरा पूरा इरादा था ऐसा करने का लेकिन उस सूरत में जबकि मुझे शबाना के कत्ल में इस्तेमाल हुये मर्डर वैपन की बाबत पता चल जाता । अगर वो मर्डर वैपन पैंतालीस कैलिबर की कोल्ट रिवाल्वर पाया जाता तो मैं जरुर-जरुर इस गोली के साथ आपके पास पहुंचता । लेकिन आप जानते हैं कि मर्डर वैपन के बारे में तो अखबारों में कुछ छपा नहीं हैं ।”

“आज के अखबारों में छपा है ।”

“बदकिस्मती से आज का अखबार पढ़ने का मुझे मौका नहीं लगा ।”

“क्यों ?”

गोली से सम्बंधित अपना बड़ा नुक्स छिपाने के लिये पिछली रात डॉली के साथ बीती घटना का तब जिक्र करना आपके खादिम को बड़ी डीलक्स स्ट्रेटेजी लगी ।

“जनाब, परसों से ही मैं ऐसे हालत के हवाले हूं” – मैं अपने स्वर को भरसक दयनीय बनाता हुआ बोला – “कि मेरा दिमाग भन्नाया हुआ है । परसों रात मुझे गुंडों ने पीट दिया जिसका सर्टिफिकेट ये देखिये ये मेरी कनपटी पर बना गूमड़ और आंख के नीचे बना जख्म है । उससे पहले मेरी पता नहीं कब चोरी गयी रिवाल्वर कत्ल के मुकाम से बरामद हुई । कल रात को मेरी सैक्रेट्री के घर चोर घुस आये । फिर उसका अपने घर से अगवा हो गया ।”

“क्या !”

“कल रात ही, जनाब । चोरों के जाने के बाद । आपके जाने के बाद । पुलिस के जाने के बाद । मेरे जाने के बाद ।”

“क्या किस्सा है ?”

मैंने किस्सा सुनाया ।

“इतना बड़ा वाक्या छुपा के बैठे हुए हो ?” – वो हैरानी से बोला – “पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाई ?”

“एक कुलीन परिवार की इज्जतदार कुमारी कन्या की आबरू का सवाल था, जनाब ।”

“लेकिन फिर भी... परसों रात खुद पर हुए हमले की रपट लिखाई ?”

“नहीं ।”

“वो भी नहीं !”

“जनाब, मेरी जान को खतरा है । मुझे हर क्षण लगता है कि जैसे शबाना और कोमलका कत्ल हुआ है, वैसे ही मेरा भी कत्ल होने वाला है । ऐसे माहौल में दादा लोगों की दादागिरी से डर जाना क्या स्वाभाविक नहीं मेरे लिए ?”

“वैसे तो बड़े साहसी बनते हो !”

“अधिक साहस ही कभी-कभी विडम्बना बन जाता है, जनाब ।”

“अब तुम्हारी सैकेट्री कहां है ?”
 
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