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तभी फोन की घन्टी फिर बजी ।
मैंने रिसीवर उठाकर कान से लगाया और बोला - “हल्लो !”
कोई उत्तर न मिला ।
“हल्लो ।” - मैं फिर बोला ।
एकाएक लाइन कट गयी ।
मैंने फोन को वापिस क्रेडल पर पटक दिया ।
“कौन था ?” - डॉली उत्सुक भाव से बोली ।
“पता नहीं ।” - मैं बोला - “कोई बोला ही नहीं । कहीं मेरी निगरानी करते पुलिसियों ने फोन न किया हो !”
“यानी कि आप की आवाज सुनकर ही उन्हें तसल्ली हो गयी होगी कि आप यहां मौजूद हैं !”
“जाहिर है । तभी तो बिना बोले ही लाइन काट दी ।”
“फिर तो बहुत अच्छा हुआ कि ऐसा फोन आपकी गैरहाजिरी में न आया ।”
“वो तो है ।”
“वो चौकीदार ।” - डॉली धीरे से बोली - “हमेशा तो बेहोश नहीं रहने वाला ।”
“क्या मतलब ?” - मैं उलझनपूर्ण भाव से उसकी तरफ देखता हुआ बोला ।
“अब तक क्या पुलिस को उस वारदात की खबर वो कर नहीं चुका होगा ?”
“तो क्या हुआ ? उसने मेरी सूरत तो देखी नहीं थी । देखी भी होती तो उसे क्या पता मैं कौन था ! ऊपर से खुद पुलिस वाले जो कि मेरी निगरानी के लिये तैनात हैं - मेरे जामिन हैं कि वारदात के वक्त के आसपास मैं यहां अपने आफिस में बैठा अपनी सेक्रेट्री को डिक्टेशन दे रहा था ।”
“फिर भी किसी जायज या नाजायज वजह से अगर पुलिस यहां आ गयी और उन्होंने यहां से ये रिवाल्वर बरामद कर ली तो आप इसकी अपने पास मौजूदगी की बाबत कोई सजता सा जवाब दे पायेंगे !”
“ओह ! डॉली, तू तो बहुत सयानी है ।”
“आप को फौरन इस रिवाल्वर से पीछा छुड़ाना चाहिये ।”
“मैं इसे यहां कहां छुपाऊं ?”
“आप इसे आफिस में कहीं छुपाने की फिराक में हैं ?”
“नहीं, ये तो ठीक नहीं होगा । मैं... मैं इसे अपनी कार में छुपाता हूं । मेरी कार में एक स्पेयर टायर और टयूब पड़ी है । मैं टायर में से टयूब निकाल कर टयूब फाड़ के उसमें रिवाल्वर धकेल कर टयूब वापिस टायर में डाल दूंगा । फिर जब मेरा दांव लगेगा मैं इसको वहां से निकाल कर इसकी ये जांच करवाने की कोशिश करूंगा कि ये मर्डर वैपन है या नहीं ।”
“अगर ये मर्डर वैपन न निकला तो ?”
“तो मैं इसका पार्सल बना कर इसे वापिस अस्थाना के पास भिजवा दूंगा । आ चलें ।”
हमने दफ्तर की बत्तियां बन्द कीं, उसे ताला लगाया और नीचे पहुंचे । पार्किंग में जाकर हम कार में सवार हुए तो मैं बोला – “खाने का क्या करेगी ?”
“घर जाके बनाऊंगी ।” – वो बोली ।
“अगर ऐतराज न हो तो आज खाना मेरे साथ हो जाये ।”
“कहां ?”
“कहीं भी । किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में ।”
“मैं तीन शर्तों पर आपके साथ रेस्टोरेंट में खाना मंजूर कर सकती हूं ।”
“शर्तें ! ठीक है, बोल ।”
“नम्बर एक, वहां अन्धेरा न हो । नम्बर दो, वो रेस्टोरेंट बार भी न हो । नम्बर तीन, बिल मैं चुकाऊंगी ।”
“क्या !”
“बिल मैं चुकाऊगी ।”
“अरी कमबख्त, जहां मैं तुझे ले जाना चाहता हूं, वहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला कोई शख्स नहीं चुका सकता ।”
“तो ऐसी जगह चलिये जहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला शख्स चुका सकता हो ।”
“लेकिन तू बिल चुकाना क्यों चाहती है ?”
“क्योंकि मैं चाहती हूं कि आज आप मेरे मेहमान बनें ।”
“लेकिन क्यों ?”
“मेरी इच्छा ।”
“अच्छी बात है ।”
मैंने कार को पार्किंग में से निकालकर आगे बढ़ाया । कार के मेन रोड तक पहुंचने तक मुझे ऐसा न लगा कि कोई मेरे पीछे था लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि मेरा पीछा छोड़ दिया गया था । वो लोग इस मामले में बहुत तजुर्बेकार और मेरी अपेक्षा से ज्यादा चालाक हो सकते थे ।
डॉली लोधी कालोनी रहती थी । इसलिये डिनर के लिये मैंने उसके करीब की जगह एम्बैसेडर होटल चुना ।
मैंने कार को जब एम्बैसेडर की पार्किग में खड़ा किया तो मुझें अपने पीछे कोई वाहन वहां दाखिल होता दिखाई न दिया ।
हम दोनों कार से निकले ।
“सामने निगाह रखना ।” - मैं बोला - “कोई हमारी तरफ आता या दूर से हमें ताड़ता लगे तो बताना ।”
उसने सहमति मे सिर हिलाया ।
मैंने कार के पीछे जाकर डिक्की को चाबी लगायी और उसका ढक्कन उठाया । भीतर पड़े टायर ट्यूब में रिवाल्वर छुपाने में मुझे कुल जमा दो मिनट लगे । फिर डॉली के साथ मैं भीतर होटल के चायनीज रेस्टोरेंट में पहुंचा । डॉली से राय करके मैंने वेटर को आर्डर दिया और फिर बोला - “मैं एक मिनट टायलेट होकर आता हूं ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं वहां से उठा और सीधा बार में पहुंचा । मैं एक बार स्टूल पर बैठ गया और उतावले भाव से बोला – “पीटर स्काट । डबल ।”
बार मैन ने मेरे सामने विस्की का गिलास रखा तो मैं उसे गटागट पी गया ।
“वन मोर ।” - मैं बोला ।
उसको नया पैग बनाता छोड़कर मैं होटल के मुख्यद्वार पर पहुंचा । वहां से मैंने दायें-बायें बाहर झांका तो मुझे कैसा भी कोई आदमी वहां न दिखाई दिया । शायद ये सोचके कि होटल में खाना खाकर तो मैं अब सोने के लिये घर ही जाता, उन्होने मेरा पीछा छोड़ दिया था ।
मैं वापिस बार में पहुंचा । मेरा नया पैग काउन्टर पर मेरा इन्तजार कर रहा था । मैंने उसे भी हलक में उंडेला और बोला - “बिल ।”
“बिल इज पेड, सर ।” - बारमैन अदब से बोला ।
“क्या !”
“अभी एक मैडम यहां आयी थीं, वो पेमेन्ट कर गयीं ।”
“सत्यानाश !”
“साथ में आप के लिये मैसेज भी छोड के गयी हैं ।”
“क्या ?”
“सूप ठण्डा हो रहा है ।”
“ओह !”
मैं रेस्टोरेंट में वापिस डॉली के पास पहुंचा ।
“सॉरी ।” - मैं बोला
“किस बात के लिये ?” - उसने बनावटी हैरानी जाहिर की ।
“तुझे मालूम है किस बात के लिये । लेकिन क्या करूं ! छुटती नहीं है काफिर मुंह की लगी हुई ।”
“मेरी एक शर्त ये भी थी कि जहां हम खाना खाने जायें, वहां बार न हो ।”
“तूने कहा था कि हम जिस रेस्टोरेंट में खाना खाने जायें, वो बार न हो । ये रेस्टोरेंट तो बार नहीं हैं ।”
“जाने दीजिये अब । सूप लीजिये । ठण्डा हो रहा है ।”
मैं खामोशी से सूप पीने लगा ।
“एक बात बताइये ।” – भोजन के दौरान वो बोली– “रिवाल्वर तो, जाहिर है कि, इतफाक से आपके हाथ लगी, असल में आपको अस्थाना के आफिस में किस चीज की तलाश थी ?”
“शबाना के कागजात की ।” - मैं बोला - “लेकिन वो वहां कहीं नहीं थे ।”
“क्या पता उसने वो कागजात हाथ आते आते ही नष्ट कर दिये हों !”
“अक्ल वाला काम तो ये ही है । अगर उसे ये जानने की उत्सुकता रही होगी की कागजात में औरों के बारे में क्या था, मेरे बारे में कुछ था या नहीं तो हो सकता है कि वो उन्हें रखे रहा हो । बहरहाल कागजात उसके दफ्तर में तो नहीं थे ।”
“उसके घर पर होंगे ।”
“जैसी कर्कशा उसकी बीवी है, उस लिहाज से ये बात नहीं जंचती कि अपनी पोल-पट्टी वो अपने घर लेके गया हो जहां कि वो कागजात उसकी बीवी के हत्थे भी चढ़ सकते थे ।”
“या शायद कागजात उसके पास कभी रहे ही न हों ।”
“अब जब कि शबाना की हत्या के वक्त की उसके पास एलीबाई है तो ये भी हो सकता है ।”
“यानी कि अब आपका ये विश्वास डांवाडोल हो रहा है कि सब किया धरा अस्थाना का है ।”
“जो बातें खुल के सामने आ रही हैं उनकी वजह से तो हो रहा है लेकिन मुमकिन है कि वो मेरी उम्मीद से ज्यादा चालाक हो और उसने ऐसी कोई सूरत निकाल ती हो जिससे ये भरम भी बना रहे कि वो कातिल नहीं हो सकता था लेकिन फिर भी कत्ल उसी ने किया हो ।”
“खुद ?”
“हां । ये भाड़े के कातिल वाली बात अब मुझे कमजोर लग रही है । डॉली, जरा सोच । वो शबाना का कत्ल क्यों करना चाहता था ? क्योंकि शबाना उसे ब्लैकमेल कर रही थी । अब अगर वो किसी किराये के कातिल से शबाना का कत्ल करवाता तो ये तो आसमान से गिरकर खजूर में अटकने वाली बात होती ।”
“क्यों ?”
“क्यों ! अरे, ये भी तो हो सकता था कि वो किराये का कातिल शबाना का कत्ल करने के बाद वो कागजात अपने कब्जे में करता और फिर शबाना की तरह खुद सब को ब्लैकमेल की धमकियां जारी करने
लगता । ऊपर से किराये का कातिल उम्र भर अस्थाना का राजदां रहता कि उसने शबाना का कत्ल करवाया था ।”
“उसको एतबार होगा कि ये बात उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती थी । आखिर उसने आपका भी कत्ल करवाने की कोशिश की थी ।”
“अब मैं ठण्डे दिमाग से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि ऐसा कुछ नहीं था । जो तीन दादे उसने मेरे पीछे लगाये थे, जरुर उन का मकसद मुझे धमकाना ही था, धमका कर मेरे से कागजात हासिल करना ही था । मेरे कत्ल से दरअसल, अस्थाना का कोई मकसद तब तक हल नहीं होता था जब तक कि मैं कागजात की बाबत सब कुछ सच-सच न बकता । कागजात के बारे में बिना कुछ कहे मैं मर जाता तो बाद में कागजात कहीं और से सिर उठा सकते सकते थे और पहले से ज्यादा बड़ी विपत्ति बन के सामने आ सकते थे ।”
“आप तो अस्थाना को चौतरफा बरी किये दे रहे है ।”
“वैसे तो मेरा कलेजा फटता है ऐसा करते लेकिन हकीकत तो हकीकत ही है । लगता है मैं अस्थाना के कुछ ज्यादा ही गले पड़ रहा था ।”
“अब अस्थाना का गला छोड़ेंगे तो किस का गला थामेंगे ?”
“अभी कुछ कह नहीं सकता । काफी कुछ पाण्डेय की पड़ताल पर निर्भर करता है ।”
फिर बाकी सारा समय खामोशी से खाना खाते गुजारा ।
आखिरकार जब बिल आया तो मैंने डॉली से हाथ जोड़ कर गुजारिश करने में कसर न छोड़ी कि वो बिल मुझे देने दे लेकिन वो न मानी ।
“अगली बार आप दे दीजियेगा ।” - वो बिल चुका कर उठती हुई बोली - “हिसाब बराबर हो जायेगा ।”
“यानी कि अगली बार होगी ?”
“हो सकती है ।”
हम बाहर आ कर कार में सवार हुए । मैंने कार को उसके घर की ओर दौड़ा दिया ।
मैंने रिसीवर उठाकर कान से लगाया और बोला - “हल्लो !”
कोई उत्तर न मिला ।
“हल्लो ।” - मैं फिर बोला ।
एकाएक लाइन कट गयी ।
मैंने फोन को वापिस क्रेडल पर पटक दिया ।
“कौन था ?” - डॉली उत्सुक भाव से बोली ।
“पता नहीं ।” - मैं बोला - “कोई बोला ही नहीं । कहीं मेरी निगरानी करते पुलिसियों ने फोन न किया हो !”
“यानी कि आप की आवाज सुनकर ही उन्हें तसल्ली हो गयी होगी कि आप यहां मौजूद हैं !”
“जाहिर है । तभी तो बिना बोले ही लाइन काट दी ।”
“फिर तो बहुत अच्छा हुआ कि ऐसा फोन आपकी गैरहाजिरी में न आया ।”
“वो तो है ।”
“वो चौकीदार ।” - डॉली धीरे से बोली - “हमेशा तो बेहोश नहीं रहने वाला ।”
“क्या मतलब ?” - मैं उलझनपूर्ण भाव से उसकी तरफ देखता हुआ बोला ।
“अब तक क्या पुलिस को उस वारदात की खबर वो कर नहीं चुका होगा ?”
“तो क्या हुआ ? उसने मेरी सूरत तो देखी नहीं थी । देखी भी होती तो उसे क्या पता मैं कौन था ! ऊपर से खुद पुलिस वाले जो कि मेरी निगरानी के लिये तैनात हैं - मेरे जामिन हैं कि वारदात के वक्त के आसपास मैं यहां अपने आफिस में बैठा अपनी सेक्रेट्री को डिक्टेशन दे रहा था ।”
“फिर भी किसी जायज या नाजायज वजह से अगर पुलिस यहां आ गयी और उन्होंने यहां से ये रिवाल्वर बरामद कर ली तो आप इसकी अपने पास मौजूदगी की बाबत कोई सजता सा जवाब दे पायेंगे !”
“ओह ! डॉली, तू तो बहुत सयानी है ।”
“आप को फौरन इस रिवाल्वर से पीछा छुड़ाना चाहिये ।”
“मैं इसे यहां कहां छुपाऊं ?”
“आप इसे आफिस में कहीं छुपाने की फिराक में हैं ?”
“नहीं, ये तो ठीक नहीं होगा । मैं... मैं इसे अपनी कार में छुपाता हूं । मेरी कार में एक स्पेयर टायर और टयूब पड़ी है । मैं टायर में से टयूब निकाल कर टयूब फाड़ के उसमें रिवाल्वर धकेल कर टयूब वापिस टायर में डाल दूंगा । फिर जब मेरा दांव लगेगा मैं इसको वहां से निकाल कर इसकी ये जांच करवाने की कोशिश करूंगा कि ये मर्डर वैपन है या नहीं ।”
“अगर ये मर्डर वैपन न निकला तो ?”
“तो मैं इसका पार्सल बना कर इसे वापिस अस्थाना के पास भिजवा दूंगा । आ चलें ।”
हमने दफ्तर की बत्तियां बन्द कीं, उसे ताला लगाया और नीचे पहुंचे । पार्किंग में जाकर हम कार में सवार हुए तो मैं बोला – “खाने का क्या करेगी ?”
“घर जाके बनाऊंगी ।” – वो बोली ।
“अगर ऐतराज न हो तो आज खाना मेरे साथ हो जाये ।”
“कहां ?”
“कहीं भी । किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में ।”
“मैं तीन शर्तों पर आपके साथ रेस्टोरेंट में खाना मंजूर कर सकती हूं ।”
“शर्तें ! ठीक है, बोल ।”
“नम्बर एक, वहां अन्धेरा न हो । नम्बर दो, वो रेस्टोरेंट बार भी न हो । नम्बर तीन, बिल मैं चुकाऊंगी ।”
“क्या !”
“बिल मैं चुकाऊगी ।”
“अरी कमबख्त, जहां मैं तुझे ले जाना चाहता हूं, वहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला कोई शख्स नहीं चुका सकता ।”
“तो ऐसी जगह चलिये जहां का बिल हर वक्त तनख्वाह का रोना रोने वाला शख्स चुका सकता हो ।”
“लेकिन तू बिल चुकाना क्यों चाहती है ?”
“क्योंकि मैं चाहती हूं कि आज आप मेरे मेहमान बनें ।”
“लेकिन क्यों ?”
“मेरी इच्छा ।”
“अच्छी बात है ।”
मैंने कार को पार्किंग में से निकालकर आगे बढ़ाया । कार के मेन रोड तक पहुंचने तक मुझे ऐसा न लगा कि कोई मेरे पीछे था लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि मेरा पीछा छोड़ दिया गया था । वो लोग इस मामले में बहुत तजुर्बेकार और मेरी अपेक्षा से ज्यादा चालाक हो सकते थे ।
डॉली लोधी कालोनी रहती थी । इसलिये डिनर के लिये मैंने उसके करीब की जगह एम्बैसेडर होटल चुना ।
मैंने कार को जब एम्बैसेडर की पार्किग में खड़ा किया तो मुझें अपने पीछे कोई वाहन वहां दाखिल होता दिखाई न दिया ।
हम दोनों कार से निकले ।
“सामने निगाह रखना ।” - मैं बोला - “कोई हमारी तरफ आता या दूर से हमें ताड़ता लगे तो बताना ।”
उसने सहमति मे सिर हिलाया ।
मैंने कार के पीछे जाकर डिक्की को चाबी लगायी और उसका ढक्कन उठाया । भीतर पड़े टायर ट्यूब में रिवाल्वर छुपाने में मुझे कुल जमा दो मिनट लगे । फिर डॉली के साथ मैं भीतर होटल के चायनीज रेस्टोरेंट में पहुंचा । डॉली से राय करके मैंने वेटर को आर्डर दिया और फिर बोला - “मैं एक मिनट टायलेट होकर आता हूं ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं वहां से उठा और सीधा बार में पहुंचा । मैं एक बार स्टूल पर बैठ गया और उतावले भाव से बोला – “पीटर स्काट । डबल ।”
बार मैन ने मेरे सामने विस्की का गिलास रखा तो मैं उसे गटागट पी गया ।
“वन मोर ।” - मैं बोला ।
उसको नया पैग बनाता छोड़कर मैं होटल के मुख्यद्वार पर पहुंचा । वहां से मैंने दायें-बायें बाहर झांका तो मुझे कैसा भी कोई आदमी वहां न दिखाई दिया । शायद ये सोचके कि होटल में खाना खाकर तो मैं अब सोने के लिये घर ही जाता, उन्होने मेरा पीछा छोड़ दिया था ।
मैं वापिस बार में पहुंचा । मेरा नया पैग काउन्टर पर मेरा इन्तजार कर रहा था । मैंने उसे भी हलक में उंडेला और बोला - “बिल ।”
“बिल इज पेड, सर ।” - बारमैन अदब से बोला ।
“क्या !”
“अभी एक मैडम यहां आयी थीं, वो पेमेन्ट कर गयीं ।”
“सत्यानाश !”
“साथ में आप के लिये मैसेज भी छोड के गयी हैं ।”
“क्या ?”
“सूप ठण्डा हो रहा है ।”
“ओह !”
मैं रेस्टोरेंट में वापिस डॉली के पास पहुंचा ।
“सॉरी ।” - मैं बोला
“किस बात के लिये ?” - उसने बनावटी हैरानी जाहिर की ।
“तुझे मालूम है किस बात के लिये । लेकिन क्या करूं ! छुटती नहीं है काफिर मुंह की लगी हुई ।”
“मेरी एक शर्त ये भी थी कि जहां हम खाना खाने जायें, वहां बार न हो ।”
“तूने कहा था कि हम जिस रेस्टोरेंट में खाना खाने जायें, वो बार न हो । ये रेस्टोरेंट तो बार नहीं हैं ।”
“जाने दीजिये अब । सूप लीजिये । ठण्डा हो रहा है ।”
मैं खामोशी से सूप पीने लगा ।
“एक बात बताइये ।” – भोजन के दौरान वो बोली– “रिवाल्वर तो, जाहिर है कि, इतफाक से आपके हाथ लगी, असल में आपको अस्थाना के आफिस में किस चीज की तलाश थी ?”
“शबाना के कागजात की ।” - मैं बोला - “लेकिन वो वहां कहीं नहीं थे ।”
“क्या पता उसने वो कागजात हाथ आते आते ही नष्ट कर दिये हों !”
“अक्ल वाला काम तो ये ही है । अगर उसे ये जानने की उत्सुकता रही होगी की कागजात में औरों के बारे में क्या था, मेरे बारे में कुछ था या नहीं तो हो सकता है कि वो उन्हें रखे रहा हो । बहरहाल कागजात उसके दफ्तर में तो नहीं थे ।”
“उसके घर पर होंगे ।”
“जैसी कर्कशा उसकी बीवी है, उस लिहाज से ये बात नहीं जंचती कि अपनी पोल-पट्टी वो अपने घर लेके गया हो जहां कि वो कागजात उसकी बीवी के हत्थे भी चढ़ सकते थे ।”
“या शायद कागजात उसके पास कभी रहे ही न हों ।”
“अब जब कि शबाना की हत्या के वक्त की उसके पास एलीबाई है तो ये भी हो सकता है ।”
“यानी कि अब आपका ये विश्वास डांवाडोल हो रहा है कि सब किया धरा अस्थाना का है ।”
“जो बातें खुल के सामने आ रही हैं उनकी वजह से तो हो रहा है लेकिन मुमकिन है कि वो मेरी उम्मीद से ज्यादा चालाक हो और उसने ऐसी कोई सूरत निकाल ती हो जिससे ये भरम भी बना रहे कि वो कातिल नहीं हो सकता था लेकिन फिर भी कत्ल उसी ने किया हो ।”
“खुद ?”
“हां । ये भाड़े के कातिल वाली बात अब मुझे कमजोर लग रही है । डॉली, जरा सोच । वो शबाना का कत्ल क्यों करना चाहता था ? क्योंकि शबाना उसे ब्लैकमेल कर रही थी । अब अगर वो किसी किराये के कातिल से शबाना का कत्ल करवाता तो ये तो आसमान से गिरकर खजूर में अटकने वाली बात होती ।”
“क्यों ?”
“क्यों ! अरे, ये भी तो हो सकता था कि वो किराये का कातिल शबाना का कत्ल करने के बाद वो कागजात अपने कब्जे में करता और फिर शबाना की तरह खुद सब को ब्लैकमेल की धमकियां जारी करने
लगता । ऊपर से किराये का कातिल उम्र भर अस्थाना का राजदां रहता कि उसने शबाना का कत्ल करवाया था ।”
“उसको एतबार होगा कि ये बात उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती थी । आखिर उसने आपका भी कत्ल करवाने की कोशिश की थी ।”
“अब मैं ठण्डे दिमाग से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि ऐसा कुछ नहीं था । जो तीन दादे उसने मेरे पीछे लगाये थे, जरुर उन का मकसद मुझे धमकाना ही था, धमका कर मेरे से कागजात हासिल करना ही था । मेरे कत्ल से दरअसल, अस्थाना का कोई मकसद तब तक हल नहीं होता था जब तक कि मैं कागजात की बाबत सब कुछ सच-सच न बकता । कागजात के बारे में बिना कुछ कहे मैं मर जाता तो बाद में कागजात कहीं और से सिर उठा सकते सकते थे और पहले से ज्यादा बड़ी विपत्ति बन के सामने आ सकते थे ।”
“आप तो अस्थाना को चौतरफा बरी किये दे रहे है ।”
“वैसे तो मेरा कलेजा फटता है ऐसा करते लेकिन हकीकत तो हकीकत ही है । लगता है मैं अस्थाना के कुछ ज्यादा ही गले पड़ रहा था ।”
“अब अस्थाना का गला छोड़ेंगे तो किस का गला थामेंगे ?”
“अभी कुछ कह नहीं सकता । काफी कुछ पाण्डेय की पड़ताल पर निर्भर करता है ।”
फिर बाकी सारा समय खामोशी से खाना खाते गुजारा ।
आखिरकार जब बिल आया तो मैंने डॉली से हाथ जोड़ कर गुजारिश करने में कसर न छोड़ी कि वो बिल मुझे देने दे लेकिन वो न मानी ।
“अगली बार आप दे दीजियेगा ।” - वो बिल चुका कर उठती हुई बोली - “हिसाब बराबर हो जायेगा ।”
“यानी कि अगली बार होगी ?”
“हो सकती है ।”
हम बाहर आ कर कार में सवार हुए । मैंने कार को उसके घर की ओर दौड़ा दिया ।