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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

मैं सोच में पड़ गयी, मेरे पीठ पीछे अशोक क्या कर रहा हैं. मेरा एक हाथ पेटीकोट को पकड़े था और दूसरा मेरे ब्लाउज को. मेरा एक अकेला हाथ दोनों मम्मो को मुश्किल से ढक पा रहा था, उसने मेरे ब्लाउज में थोड़ी सी ऊँगलीया घुसा साबुन लगाना शुरू कर दिया, मैं उस पर हल्का गुस्सा करते हुए उसको मना करती रही.

मैं एक मम्मा ढकती तो वो दूसरे के तरफ साबुन लगाने लगता. उसके हौंसले बढ़ते रहे और जल्द ही अपना एक पूरा हाथ का पंजा मेरे ब्लाउज में घुसा मेरा एक मम्मा पकड़ लिया और साबुन मलने लगा.

उसकी इस हरकत पर, जिस हाथ से मैंने पेटीकोट पकड़ रखा था उससे मैंने उसको एक घुसा मार हल्का धक्का मारा. इस झटके से मेरा नाड़ा खुला पेटीकोट नीचे गिर गया और मैं पैंटी में आ गयी. मैं एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी.

वो मझ पर हंसने लगा कि मैं खुद अपने कपड़े खोल रही हूँ.

नितिन: “अब रहने भी दो, क्यों इतना शरमा रही हो? पूल में में भी तो बिकिनी पहन कर नहाते ही हैं.”

मैंने अपने दोनों हाथो से अपने ब्लाउज को पकडे रखने पर ध्यान दिया. उसने मेरे ब्लाउज को मेरे एक कंधे से निकाल उस कंधे पर साबुन लगाने लगा.

नितिन: “अब हाथ हटाओ, सिर्फ सीने पर साबुन लगाना बाकि हैं.”

मैं: “देखो, तुम अब अपनी लिमिट पार कर रहे हो. मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा हैं.”

वो मेरे करीब आ मेरे सीने पर साबुन लगाने का प्रयास करने लगा. मैंने अपने दोनों हाथो से उसको धक्का देना चाहा पर उसने मेरे हाथ पकड़ लिए और थोड़ी छीना झपटी में मेरे ब्लाउज के आगे के बाकी हुक भी खुल गए और मेरे मम्मे पुरे दिखने लगे. नितिन ने मेरे दोनों हाथ पकड़ मुझे मेरे मम्मे ढकने नहीं दिए और चिढ़ाने लगा.

नितिन : “ओ, शेम शेम.”

मेरी एक बार तो हंसी छूट गयी पर अपनी हालत देख तुरंत सुधार किया.

मैं: “मेरे हाथ छोडो, और तुरंत बाहर जाओ.”

नितिन: “अच्छा जाता हूँ, पहले तुम्हारे साबुन तो लगा लू, नयी जगह दिख रही हैं जहा साबुन नहीं लगा हैं.”

मैं: “लग गया मेरे साबुन, और नहीं लगवाना, जाओ.”

नितिन: “ठीक हैं तो नहला देता हूँ.”

उसने अब मेरे हाथ छोड़े और मैंने अपना ब्लाउज फिर अपने मम्मो के ऊपर कर दिया और हाथ से ढक दिया.

फिर उसने मेरे ऊपर पानी डालना शुरू कर दिया और मैं अपना सीना दबाये नीचे बैठ गयी.

नितिन: “और नहाना हैं या हो गया?”

मैं: “अब तुम बाहर जाओ, मेरा हो गया.”

नितिन बाथरूम से बाहर गया और मैंने चैन की सांस ली कि कुछ अनहोनी से पहले ही मैं बच गयी.

मैंने टॉवल उठाया अपने बदन को पोंछ गीले कपड़े निकाल दिए. बाथरूम के अंदर पहनने के कोई कपड़े थे नहीं तो मेरे मम्मो से लेकर जांघो तक मैं टॉवल लपेट कर ही बाहर आयी.

नितिन की इन हरकतों की वजह से मेरे हाथ पैर अभी भी कांप रहे थे, और मेरे शरीर पर मैं उसके स्पर्श महसूस कर पा रही थी, ख़ास तौर से जब उसने मेरे मम्मो पर साबुन मला था.

मैं जैसे ही टॉवेल लपेट बाहर आयी सामने थोड़ी दूर नितिन खड़ा हो कुछ खा रहा था. हम दोनों की नज़रे मिली और वो मुस्कराने लगा.

नितिन: “अरे तुमने तो आज होली खेली ही नहीं, देखो कोई रंग ही नहीं लगा.”

वो मेरी तरफ बढ़ता उससे पहले ही मैं चीखते हुए बैडरूम की तरफ भागी और वो मेरे पीछे. मैं बैडरूम का दरवाजा पूरा बंद करती उसके पहले ही वो दरवाजे पर आ गया और बंद नहीं करने दिया.

मैं: “कपड़े पहनने दो, फिर रंग लगा देना, अभी दरवाजा बंद करने दो. जाओ.”

नितिन: “पिछली होली पर भी यही बोलकर कमरे में बंद हो गयी थी. कपड़े बदलने हैं तो मेरे सामने बदलो और फिर होली खेलो.”

वो दरवाजे पर धक्का लगाते हुए अंदर आ गया. मैं मुड़ी और अंदर भागी और उसने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया और बिस्तर पर धक्का दे उल्टा लेटा दिया और खुद पीछे से मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गया. मैं अपने टॉवल को कस कर पकड़े लेटी रही.

वो मेरे बालो को हटा मेरे कानो के पीछे और गर्दन और कंधे पर चूमने लगा. मेरे शरीर में मीठी सी गुदगुदी होने लगी और मैं सब सहती रही. इतनी देर की मस्तियो से उसने कही ना कही मुझे कमजोर कर दिया था.

कई बार हम नितिन के साथ पिकनिक पर भी गए हैं और उसके साथ मेरा मजाक मस्ती काफी चलता था पर इतना ज्यादा होगा ये नहीं सोचा था. हर साल होली पर रंग लगाते वक़्त ऐसी मस्ती करता था पर आज वो अकेला था तो उसने हद कर दी थी, मेरे कपड़े तक खोल दिए थे और अंदर हाथ डाल दिया था.
 
मैं कई बार बिकिनी में उसकी पत्नी पूजा और नितिन के साथ स्विमिंग पूल में तैर चुकी हूँ. मेरे प्रति उसकी ऐसी भावनाये होगी मुझे कभी लगा नहीं था. फिलहाल वो टॉवल के ऊपर से ही मेरी गांड पर अपने लंड को रगड़ रहा था.

थोड़ी देर में वो मेरे ऊपर से उठा और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर मेरे टॉवल के ऊपर के हिस्से में सीने पर चूमने लगा. मैंने टॉवल को और कस के पकड़ लिया. उसको मैं लगातार मना कर हल्का प्रतिरोध कर रही थी.

मैं: “तुम्हे पता भी हैं तुम क्या कर रहे हो? अशोक को पता चलेगा तो क्या होगा पता हैं?”

नितिन: “ठीक हैं उसी से पूछ लेते हैं.”

ये कह कर उसने अपना मोबाइल निकाला और स्पीकर पर रख फोन मिलाने लगा. उसने अशोक को ही फ़ोन मिलाया था.

अशोक (फ़ोन पर): “अबे नितिन मैं तेरे घर पर होली खेलने आया हूँ, तू कहा हैं?”

नितिन: “मैं तेरे नए घर पर हूँ. प्रतिमा होली खेलने से मना कर रही हैं. उसको जरा बोल मुझे मेरे हिसाब से होली खेलने दे, मना ना करे.”

अशोक (फ़ोन पर):”अच्छा फ़ोन दो उसे.”

नितिन ने फ़ोन मेरे हाथ में थमा दिया.

मैं: “हां, हेल्लो..”

नितिन ने मेरे टॉवल को खींचना शुरू कर दिया. मैं एक हाथ से फ़ोन पकड़े और दूसरे से टॉवल पकड़े रखने का प्रयास कर रही थी. जब कि नितिन दोनों हाथों से मेरा टॉवल निकाल रहा था.

मैं: “आउच, छोड़ो, ये नितिन को समझाओ, ये मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा हैं.”

नितिन दूर से ही जोर से चिल्लाने लगा “ये मुझे रंगने नहीं दे रही.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुम्हे पता हैं, वो जबरदस्ती होली खेलाए बिना नहीं छोड़ेगा, तुम बाद में वापिस नहा लेना, उसको जल्दी होली खेला कर यहाँ भेज दो, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.”

नितिन ने मेरा पूरा टॉवल खिंच कर मुझे नंगी कर दिया. मैं पूरी नंगी हो गयी थी और उसने मेरी दोनों टाँगे दबा के रखी थी. मैं एक हाथ से फ़ोन और दूसरे से अपना सीना ढके हुई थी और शरम से सिकुड़ती जा रही थी. मैंने अशोक से फ़ोन पर मदद मांगी.

मैं: “तुम समझ नहीं रहे हो. ये कुछ ज्यादा ही कर रहा हैं. हमेशा के लिए मेरे दामन पर दाग लग जायेगा.”

अशोक (फ़ोन पर): “तुमने वो नयी साड़ी पहन ली क्या! उसको बोलो पहले खोलने दे.”

मैं: “कपड़े तो सब खोल ही चूका हैं.”

अशोक (फ़ोन पर): “फिर क्या टेंशन हैं. होली हैं, थोड़ी मस्ती चलती हैं. तुम फ़ोन दो उसको.”

मैंने फ़ोन नितिन की तरफ बढ़ाया पर उसने अपने हाथों से मेरे पाँव पकड़ रखे थे, तो उसने फ़ोन ना लेकर मुंह आगे फ़ोन के पास बढ़ा कर बात करने लगा.

नितिन: “पूजा घर पर हैं ना, होली खेल ली?”

अशोक (फोन पर): “नहीं वो तेरी छोटी बच्ची को बाहर छोड़ने गयी हैं, उसके सामने पूजा को रंग रगड़ता तो वो बच्ची डर जाती इसलिए वो बाहर छोड़ने गयी हैं.”

नितिन: “हां ठीक किया, पिछली बार रगड़ा था वैसे रगड़ने वाला हैं तो बच्ची डर जाएगी.”

अशोक (फ़ोन पर): “चल पूजा आ गयी हैं, तूने खेलना शुरू किया?”

नितिन: “बस शुरू करने ही वाला हूँ”

मैंने फ़ोन अपने मुँह के पास खिंचा, मेरा एक हाथ अभी भी मेरे सीने पर मम्मो को ढके हुआ था. इस बीच नितिन ने अपनी जेब से एक कंडोम निकाल कर अपने कपड़े नीचे किये और अपने लंड को पहना दिया.

मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि होली के दिन वो कंडॉम लेकर क्यों घूम रहा हैं, या नितिन पहले ही सोच कर आया था कि आज वो मुझे चोदने वाला हैं. वो सचमुच पूरी तैयारी के साथ ही आया था.

मैं: “तुम्हे पता हैं, तुम्हारा दोस्त क्या करने वाला हैं?”

अशोक (फ़ोन पर): “अरे क्या हुआ? होली हैं, उसको रंग लगाने दो. एक मिनट होल्ड करो.”

फ़ोन पर पीछे से फुसफुसाहट हो रही थी और पूजा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी. नितिन ने मेरे पाँव चौड़े किये और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया.

उसको जो चाहिए था वो ले चूका था, अब मेरे विरोध से कोई फायदा नहीं था. मैं फ़ोन पकड़े छत की तरफ शुन्य में निहार रही थी.

अशोक (फ़ोन पर): “अच्छा प्रतिमा अभी तुम ज्यादा मत सोचो, होली के मजे लो, मैं होली खेल कर आता हूँ. जरा नितिन को फोन दो.”

नितिन ने अब मुझे धक्के मार चोदना शुरु कर दिया था. मैंने फ़ोन नितिन को पकड़ा दिया.

नितिन: “हां बोल!”

अशोक (फ़ोन पर): “ज्यादा परेशान मत करना उसको, प्रोटेक्शन का ध्यान रखना.”

नितिन: “चिंता मत कर, वो मान गयी हैं, फ़ोन रख.”

फिर नितिन ने फ़ोन काट दिया और फिर अपने धक्को की गति बढ़ा दी.

उनकी बातें सुनकर मैं सन्न रह गयी, क्या अशोक को पहले से ही पता था. कही ये इन दोनों के बीच कुछ डील तो नहीं हैं कि होली के दिन एक दूसरे की बीवी के मजे लेंगे. ये इन दोनों दोस्तों की मिलीभगत हैं. हालांकि अशोक कोड लैंग्वेज में बात कर रहा था पर उसकी बातो का मतलब मैं समझ सकती थी.

मुझे शायद खुलकर अशोक को नितिन की करतूत बता देनी चाहिए थी, पर मुझे उस वक़्त बिना कपड़ो के इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने सोचा अशोक मेरी इतनी सी बात सुनकर वैसे ही नितिन को रोक देगा. मगर वो तो उसका और भी साथ दे रहा था.

नितिन ने इतनी देर होली खेलते और नहलाते मुझे तैयार कर ही दिया था सिर्फ अशोक का डर था, वो भी इजाजत मिल ही गयी थी. मजे लेने का हक़ क्या सिर्फ पतियों को ही हैं, वो वहा पूजा के मजे ले रहा हैं तो मैं भी ले सकती हूँ.

मैंने अपना हाथ अपने सीने से हटा उसको अपने मम्मे दिखा दिए, ये मेरी सहमति थी.
 
नितिन ने अपनी टीशर्ट निकाल दी थी और अब आगे झूक कर मेरे मम्मो को चूसने लगा. थोड़ी देर चूसने के बाद मुझ पर पूरा लेट गया. उसके वजन से मेरे मम्मे दब गए और उसने मुझे चोदना जारी रखा.

मैं: “तुम जो मेरे साथ कर रहे हो, अशोक भी पूजा के साथ कर रहा होगा तो?”

नितिन: “मेरे हिसाब से तो उन्होंने पिछली होली पर भी किया था.”

मैं: “तुमने फिर अशोक को कुछ नहीं बोला?”

नितिन: “मैं घर पंहुचा तब तक तो वो लोग कर चुके थे.”

मैं: “तो तुम्हे कैसे पता चला?”

नितिन: “बाथरूम अंदर से बंद था. बहुत देर तक नहीं खोला बस आवाजे आ रही थी. तुम्हारी तरह पूजा बचाने के लिए आवाज नहीं लगा रही थी. सिसकियाँ भर रही थी.”

मैं: “तो तुमने उनको बाहर आने के बाद पूछा नहीं!”

नितिन: “अशोक बोला कि वो पूजा को पानी में गीला कर रहा था. शायद बाथरूम के पानी से नहीं उसके लंड के पानी से गीला किया था.”

मैं: “और पूजा ने क्या कहा?”

नितिन: “वो तो टब में पूरी रंगी पड़ी थी. पूरा मुँह रंग से काला हो गया था. सच में मुँह काला करा लिया था उसने. मेरे पास कोई सबूत तो था नहीं तो इल्जाम कैसे लगाता.”

मैं: “सच सच बताओ अशोक ने ही तुम्हे यहाँ भेजा न मुझे चोदने के लिए?”

नितिन: “मुझे तो पूजा ने कहा कि अशोक ने फ़ोन करके मुझे यहाँ बुलाया हैं. वो यहाँ नहीं था. मैं समझ गया पूजा की चाल हैं. एक विकल्प था उन दोनों को घर जाकर रंगे हाथों पकडू लू, दूसरी तरफ तुम थी. जब से तुम्हे बिकिनी में देखा था तब से ही नज़रे थी, मैंने तुम पर ट्राय मारा. उधर अशोक मेरी बीवी पूजा को चोद रहा होगा, तो मैंने सोचा मैं उसकी बीवी को चोद दूं.”

मैं: “तुम तीनो मुझे क्यों फंसा रहे हो?”

नितिन: “मैंने तुम्हारे सामने अशोक को फ़ोन किया, तुम्हारी गुहार के बावजूद उसने खुद ने मुझे इजाजत दी तो मुझे पता चल गया वो उधर क्या कर रहा हैं. अब तुम ज्यादा मत सोचो, मजा नहीं आ रहा क्या?”

मैं: “इतनी देर नहीं आ रहा था, अब आ रहा हैं.”

नितिन: “मैं पूजा को फ़ोन लगाता हूँ और बात नहीं करेंगे, सिर्फ फ़ोन चालू रख छोड़ देंगे. उनको हमारी चुदाई की आवाजे सुना कर जलाते हैं.”

मैं: “इसे कहते हैं बदला, लगाओ फ़ोन.”

नितिन ने फ़ोन लगाया, मैंने उससे फ़ोन लेकर चेक किया तो पूजा को ही कॉल जा रही थी. मैंने फ़ोन अपने पास में ही बिस्तर पर रख दिया.

पूजा (फ़ोन पर): “हेलो, क्या हुआ?… हेलो… हेलो… आउच.. अब इसे तो रहने दो, सारे कपड़े मत खोलो.”

उधर से पूजा की कामुक मदहोश आवाजे आने लगी और हमें उनसे तेज आवाज करनी थी.

मैं: “कम ऑन नितिन, जोर से चोदो मुझे.”

नितिन मेरी तरह आवाज नहीं कर रहा था, पर उसने मेरी आवाज सुनकर और जोश के साथ चोदना शुरू कर दिया. मैंने एक हाथ से उसको उसकी गर्दन के पीछे से पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसकी पीठ झकड़ ली. अपनी टांगे उठा कर उस पर लपेट दी और अब मैं भी चुदने के मजे लेने को तैयार थी.

मैंने आहें जोर जोर से आहें भरना शुरू किया आह्ह, आह्हहह आह्ह ओ नितिन, चोद दे मुझे, हां यही पे, हम्म, आउच, ऊहहह आहह्ह्ह आ मेरी चूत भर दे.

फिर मैंने महसूस किया फ़ोन से आती आवाज लगभग बंद हो गयी थी. जरूर उन्होंने मेरी आवाज सुन ली होगी और अब पछता रहे होंगे. मुझे और जोश आ गया. मैं और भी आवाज कर उन्हें चिढ़ाने लगी.

इस बीच मेरा मजे के मारे पानी छूटना शुरू हो गया था. नितिन का कंडोम लगा लंड मेरी चूत के पानी को चीरते हुए अंदर बाहर हो फच्चाक फच्चाक की आवाजे करने लगा. मैं फ़ोन उठा कर अपनी चूत के पास ले गयी और थोड़ी देर चुप हो कर उनको वो आवाजे सुनाने लगी.

मैं अपनों आहें तो रोक नहीं पा रही थी तो फ़ोन फिर नीचे रख दिया और हम दोनों चीखते हुए चुदने के मजे लेते रहे.

आह्हहह ओआह्ह आ आ आ आ अम्म आईईईई ईईहीहीहीही ऊहूऊऊऊऊ, उसने चोद चोद कर मेरा काफी सारा पानी निकाल दिया और मेरी नशीली आवाज की सिसकियों से वो खुद ही झड़ गया.

झड़ने के बाद भी वो अपना लंड मेरी चूत में डाले रखे हुए मुझ पर लेटा रहा. उसने फिर इसी तरह लेटे लेटे ही अपना मोबाइल उठाया और मैंने उससे छीन कर अपनी आखरी भड़ास निकालते हुए दूसरी तरफ फ़ोन पर लोगो को सुनाया “क्या मस्त चोदा हैं नितिन तुमने”.

पहली बार मेरा ध्यान गया फ़ोन तो म्यूट पर था. मतलब इतनी देर तक चिल्लाने का कोई फायदा ही नहीं हुआ. नितिन ने फ़ोन मुझसे छीना और कॉल काट दिया.

मैं: “ये तुमने म्यूट पर क्यों रखा?”

नितिन: “गलती से दब गया होगा. छोड़ो न, अपना काम तो हो गया न.”

मैं: “सिर्फ तुम्हारा ही हुआ हैं, मेरा नहीं.”

उसने मेरे ऊपर से हटते के बाद अपना इस्तेमाल किया हुआ कंडोम निकाला. फिर घुटनो के बल बैठ मेरे चेहरे के पास आ गया.

नितिन: “चलो मेरा लंड रगड़ कर तैयार करो, मैं तुम्हारा भी पुरा कर देता हूँ.”

मैं: “फ़ालतू मेहनत मत करवाओ, अब ये खड़ा नहीं होने वाला.”

नितिन: “तुम्हे अपने मुँह का जादू पता ही नहीं हैं. तुम्हारा चेहरा देख कर ही लोगो का लंड खड़ा हो जाता हैं, मुँह में लोगी तो मुर्दा लंड भी खड़ा हो जायेगा.”

मैं: “मैं पागल हूँ, इस गंदे लंड को अपने मुँह में लुंगी.”

नितिन: “मुँह में लेकर ही तो साफ़ करना हैं. एक बार लेकर देखो स्वाद पसंद ना आये तो निकाल देना.”

वो आगे बढ़कर अपना लंड मेरे मुँह के पास ले आया. वो नरम पड़ा लंड मेरे मुँह में डालता उसके पहले ही मैंने हाथ से पकड़ लिया और अपनी हथेली से रगड़ कर थोड़ा साफ़ कर लिया और हाथ से खिंच रगड़ने लगी. वो एक बार मुँह में डालने की ज़िद करता रहा तो मैंने उसका लंड अपने मुँह में ले चूसना शुरू किया.

वो सिसकिया भरते हुए मेरे मुँह को ही चोदने लगा. एक हाथ से वो मेरे मम्मे भी दबा रहा था और फिर उसने हाथ लंबा कर मेरी चूत पर अपनी ऊँगली रगड़ने लगा.
 
उसकी उंगलियों के मेरी चूत पर रगड़ से मुझे नशा चढ़ने लगा. मैंने अपने पाँव पुरे खोल अपनी गांड को हिला उसकी ऊँगली अपनी चूत में घुसाने की कोशिश की.

मेरे मुँह में उसका लंड फिर कड़क हो बड़ा हो गया था, क्यों की वो अब मेरे गले तक चोद रहा था. मैंने उसका लंड अपने मुँह से बाहर निकाला.

मैं: “चलो अब जल्दी से ख़त्म करो मेरा काम…”

वो फिर मेरे ऊपर चढ़ गया, और अपना लंड मेरी चूत में घुसा चोदना चालू कर दिया. मेरा काफी सारा काम तो उसकी पिछली चुदाई और ऊँगली करने से ही हो गया था, तो उसक लंड के अंदर घुस चोदते ही मेरे अंदर का पानी आवाज करने लगा. मैं भरी हुई बैठी थी तो मैं झड़ने को हो आयी.

मैं: “मेरा होने वाला हैं, जोर जोर से चोदो, आहहह आहहह..”

मैं खुद नीचे से अपने शरीर को ऊपर नीचे पटकते हुए झटको का वेग बढ़ा रही थी. कुछ ही क्षणों में चीखते चिल्लाते हुए झड़ गयी उह मम्मी, आईईईई उहुँहुँहुँहुँ ओ मम्मी ओ मम्मी, हां कर लो, कर लो, ऊ आ आ आ, ईशश्श्श्श्स ऊअआ.

झड़ने के बाद वही बिना हिले डुले शांत पड़ी रही. पर नितिन तो पूरा तैयार था दूसरी बार झड़ने को, मैंने उसको अपने ऊपर से गिरा दिया. आधा छूटने से उसको अच्छा नहीं लगा.

नितिन: “मेरा भी तो पूरा करने दो.”

मैं: “प्रोटेक्शन किधर हैं? माँ बनाओगे क्या मुझे? जाकर पूजा को माँ बनाना.”

नितिन: “खुद को झड़ना था तब प्रोटेक्शन याद नहीं आया.”

मैं: “तुम्हारा एक बार हो चूका हैं ना? मुझे रिस्क नहीं लेना.”

नितिन: “मैं पहले झड़ने के बाद ही चला जाता तो? तुम्हारा पूरा किया न मैंने?”

मैं: “रो मत, चलो पीछे से कर लो, आगे रिस्क नहीं ले सकती मैं.”

मैंने अब करवट ली और वो मेरे पीछे आकर लेट गया और मेरे गांड में अपना लंड ठूंस कर चोदना शुरू कर दिया. ज्यादा देर नहीं लगी और उसने अपना पानी मेरी गांड में भरते, आहें भरते हुए दूसरी बार झड़ गया.

उसने अपने कपड़े पहन लिए और मैंने भी अपना टॉवेल फिर लपेटा. मेरा शरीर अब थोड़ा हल्का महसूस कर रहा था. वो बाहर गया तो मैंने टॉवेल निकाल अपना गाउन पहन लिया. मेरे बैडरूम से बाहर आने पर वो बाथरूम से निकला और मुझसे जाने की इजाजत मांगने लगा.

मैं: “तुमने जान बूझकर तो म्यूट नहीं किया था न मोबाइल?”

नितिन: “हम दोनों ने किया वो हमारे बीच. अशोक को बताने की जरूरत नहीं इस बारे में.”

वो वहा से चला गया और मैं एक पहेली में उलझ गयी. अगर नितिन यहाँ पर पूजा के कहने पर गलती से आया था तो वो अपने साथ कंडोम लेकर क्यों आया.

अब झूठ कौन बोल रहा हैं ये पता करना मुश्किल था. हो सकता हैं अशोक ने पूजा के साथ कुछ किया ही ना हो, नितिन ने मुझे झूठ बोलकर अपने जाल में फंसाया हो.

मुझे पूजा पर भी शक था, वो नितिन के साथ मिली हो सकती हैं. दूसरी बार फ़ोन उसी ने उठाया था, अशोक की आवाज तो आयी ही नहीं. पहले भी मैं उसकी हरकते देख चुकी थी और वो मुझसे नंगी नंगी बातें करती थी.

पर एक सच तो ये भी था कि मेरी गुहार के बावजूद अशोक यही कहता रहा कि नितिन को मस्ती करने दूँ.

शाम को अशोक घर लौटा और मैंने उससे थोड़ी शंका समाधान करने की कोशिश की.

मैं: “तुम फ़ोन पर पूजा को रगड़ने की क्या बात कर रहे थे?”

अशोक: “मुझे कुछ याद नहीं मैंने क्या बोला, वो पूजा ने इस साल भी भांग पिला दी धोखे से.”

मैं: “इस साल भी मतलब, पिछले साल भी…”

अशोक: “पिछले साल पकोड़े में भांग मिलाई थी, मेरी हालत ख़राब हुई तो वो मुझे बाथरूम में ले गयी ताकि गीला होने से नशा उतर जाए, पर मुझे कुछ ज्यादा याद नहीं. उठा तब टब में था और नितिन मुझ पर पानी डाल उठा रहा था.”

मैं :”तो इस साल क्यों खाया भांग का पकोड़ा?”

अशोक: “मैंने नहीं खाया, पूजा ने मिठाई खिलाई ये बोलकर कि बाजार की हैं, पर उसमे भी भांग थी.”

मैं: “तुम तो नितिन को फ़ोन पर मेरे साथ कुछ भी मस्ती करने की छूट दे रहे थे, वो मेरे साथ कितनी जबरदस्ती कर रहा था पता हैं?”

अशोक: “क्या बदतमीजी की बताओ?”

मैं: “मेरे कपड़े फाड़ दिए थे, और नंगी कर दिया था.”

अशोक: “क्या! अभी फ़ोन लगता हूँ उस हरामी को.”

मैं: “नहीं, कोई जरुरत नहीं झगड़ा करने की.”

अशोक: “तुम झूठ तो नहीं नहीं बोल रही, बताओ फटे कपड़े.”

मैं: “कपड़े नहीं फाड़े, छीना झपटी में ब्लाउज का हुक टूट गया था. उसने मेरे साथ कुछ कर लिया होता तो?”

अशोक: “ऐसे कैसे कर लेता, बाप का माल हैं क्या. तुम बताओ क्या किया उसने, मैं उसको देख लूंगा.”

मैं: “मैं उसको कुछ करने थोड़े ही देती, उस दिन हिल स्टेशन पर डीपू को भी नहीं करने दिया था याद हैं?”

अशोक: “मैं फिर भी उससे बात करूँगा. अगली बार से वो यहाँ नहीं आएगा.”

उस वक्त तो बात आयी गयी हो गयी. कभी कभी मौन ही सबसे अच्छा उपाय होता हैं. मैंने इस होली के दिन को भुला आगे बढ़ने में ही भलाई समझी, हो सकता हैं ऐसा कुछ ना हो जो मैं समझ रही थी.

मगर अब अशोक पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा था. मैं इस दुनिया से बाहर आना चाहती थी और अपने जीवन की एक नयी शुरुआत चाहती थी. मैंने शपथ ले ली कि अब मै किसी गैर मर्द के चक्कर में बिलकुल नहीं फँसूँगी.
 
आपने मेरी पिछली सहेली की चुदाई की कहानी में पढ़ा, की हम पति पत्नी दो दिन के लिए हिल स्टेशन घूमने गए. जहा उनके दोस्त डीपू अपनी बीवी पायल के साथ आये थे.

इन दो दिनों में मैंने डीपू के साथ कई बार असुरक्षित चुदाई करवाई और मेरे सर पर गर्भवती होने का भय मंडरा रहा था.

उस बात को अब एक सप्ताह हो चूका था और अभी भी मेरे संभावित पीरियड आने में दो सप्ताह बाकी थे, जो कि मेरा भविष्य तय करने वाले थे.

मैं इस बीच प्रार्थना के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी. सासुजी अभी भी हमारे साथ ही थे और दो दिन बाद अपने घर लौटने वाले थे.

रविवार की सुबह थी, छुट्टी का वो दिन जब देर तक सोने को मिलता हैं. 9 बज चुके थे और मैंने उठने का फैसला किया. बच्चा और पति अभी भी सो रहे थे. मैंने उठ कर नित्य कर्म करके रोजमर्रा सफाई में जुट गयी.

अब बच्चा उठ चुका था, तो मैंने सबके लिए नाश्ता तैयार कर दिया. दस बज चुके थे और बाजार के कुछ काम निपटाने थे, तो मैं नहाने चली गयी. पति अभी भी सो रहे थे, देर रात तीन बजे तक मैच देख रहे थे तो उनको उठाना ठीक नहीं समझा.

वैसे भी जब से हिल स्टेशन से हम लौटे थे, वो मुझे अवॉयड कर रहे थे. शायद मेरी आँखों के सामने जिस तरह उन्होंने पायल के साथ जो कुछ किया था, उस वजह से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे.

डीपू को तो मैं पायल के पास लाने में कामयाब हो गयी थी, पर मेरा खुद का पति मुझसे जैसे दूर हो गया था.

मैं अकेले ही बाहर जाने को तैयार हो गई. जाते हुए टीवी देख रहे सासुजी को बोल दिया कि पति उठ जाए तो बता देना नाश्ता रखा हैं खा ले, मैं दो घंटे में वापिस आ जाउंगी.

मैंने अपनी स्कूटी निकाली और बाजार की तरफ चल पड़ी. महिलाए स्वतंत्र हो तो अच्छा हैं किसी पर छोटे मोटे कामो के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता.

छुट्टी के दिन शायद सब लोग ज्यादा ही आलसी हो जाते हैं, सड़के लगभग खाली थी और बाजार में भी भीड़ नहीं थी.

घंटे भर में ही मैं सारे काम निपटा चुकी थी. वापिस घर निकलने के लिए फिर से स्कूटी के पास आयी, तभी ख्याल आया मैं जिस इलाके में हूँ वही पास में मेरी कॉलेज की सहेली मैना का फ्लैट हैं. महीने भर से ज्यादा हो गया था उससे मिले और बात किये.

अपना फ़ोन निकाला उसको फ़ोन करके पूछने के लिए और फिर यह सोच कर रख दिया की सीधा घर पहुंच कर ही उसको सरप्राइज देती हूँ, वो बहुत खुश हो जाएगी. मैं स्कूटी लेकर उसके घर की तरफ निकल पड़ी.

साल भर पहले की ही बात थी जब वो इस नए फ्लैट में शिफ्ट हुई थी. आये दिन उसकी ससुराल वालों से झड़प हो जाती थी, इसलिए वो अपने पति के साथ इस फ्लैट में अलग रहने आयी थी.

अब उसके फ्लैट की बिल्डिंग सामने ही नज़र आ रही थी, कि तभी अचानक से तेज बारिश शुरू हो गयी. बादल तो सुबह से ही छा रहे थे, पर अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.

मैं कुछ बचाव कर पाती उससे पहले ही अगले कुछ सेकंड में मैं पूरी भीग चुकी थी.

उसकी बिल्डिंग के अहाते में पहुंच कर वहां स्कूटी पार्क करते ही बारिश धीमी पढ़ गयी, जैसे सिर्फ मुझे भिगोने ही आयी थी.

मेरा सफ़ेद कुर्ता भीग कर मेरे शरीर से चिपक चूका था और अंदर से मेरा ब्रा साफ़ दिखाई दे रहा था. ऊपर से मैंने आज दुपट्टा भी नहीं डाला था, जिसका की आजकल फैशन ही नहीं हैं पर आज बड़ी जरुरत थी.

एक बार सोचा इस हालत में उसके घर कैसे जाऊ, वापिस अपने घर चली जाती हूँ. फिर सोचा इस हालत में आधा घंटा गाडी चलाना भी ठीक नहीं. मैना से उसके कपडे लेकर एक बार बदल लुंगी.

बिल्डिंग का वॉचमन अपने रजिस्टर में मेरी एंट्री करने लगा, बीच-बीच में वो मुझे घूर रहा था. क्योकि मेरे कपडे भीग कर मेरे बदन से चिपके हुए थे. मुझे उस पर बड़ा गुस्सा आया, ऐसे लोग औरतो की इज्जत नहीं करते और गलत नजरो से देखते हैं.

उसे थप्पड़ मारने की इच्छा हुई, पर अपने आप को नियंत्रित किया. मैं अब लिफ्ट की तरफ बढ़ी और दूसरे माले पर पहुंची जहा मैना का फ्लैट था. डोरबेल बजायी, घंटी पूरी बजी भी नहीं थी की दरवाज़ा खुल गया और उसकी छोटी बच्ची बाहर निकली.

मैं उससे कुछ कहती उससे पहले ही वह भाग कर सीढ़ियों से ऊपर के माले पे चली गयी, उसके हाथ में खिलोने भी थे. शायद छुट्टी के दिन अपने पड़ोस की सहेली के यहाँ जा रही थी. अब दरवाज़ा खुला था तो मैं अंदर चली गयी, दरवाज़ा बंद कर दिया.

अंदर कोई दिखाई नहीं दे रहा था. सामने रसोईघर भी खाली था. मैंने उसको आवाज़ लगाई. दूसरी आवाज़ देने ही वाली थी कि उसके पति संजीव बैडरूम से बाहर आये और मुस्करा कर अभिवादन किया. मैंने भी मुस्करा कर जवाब दिया.

मुझे इस भीगी हालत में देख कर चिंतित हुए और कहाँ “शायद बारिश बहुत जोर की हुई हैं”.

मैंने हां में सर हिला दिया. मुझे अब थोड़ी ठंड लगने लगी थी. मैंने हल्का ठिठुरते हुए पूछा “मैना कहा हैं”

उन्होंने जवाब दिया वो “घर पर नहीं हैं.” और मैं अवाक रह गयी.

काश सरप्राइज को छोड़ कर फ़ोन ही कर दिया होता आने से पहले. पर अब क्या हो सकता था, मैं फंस चुकी थी. मैंने अगला सवाल दागा, “वो कहा गई और कितने देर में आ जाएगी?”

उन्होंने कहाँ “सब इत्मीनान से बताता हूँ, पहले आप कपडे बदल लीजिये.”

मैंने ना मैं सर हिला दिया, उनसे कैसे कहु की मुझे कपडे बदलने हैं. मैं उनसे इजाजत लेकर वापिस जाने लगी तो उन्होंने मुझे रोका. “इस तरह आप बाहर ना जाये, सर्दी लग सकती हैं”.
 
बैडरूम की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहाँ उस अलमारी में मैना के कपडे पड़े हैं, उनमे से कुछ पहन लू. वो मेरे कपडे ड्रायर में डाल कर सूखा लेंगे और वापिस पहनने को दे देंगे.

मैं भी यही चाहती थी पर थोड़ा हिचकिचाई. उन्होंने मुझे आश्वश्त किया की यही ठीक हैं और ज्यादा समय नहीं लगेगा. मैंने अपने सैंडल उतारे और स्टैंड पर रख दिए.

लिविंग रूम में कारपेट बिछा था. अब मैं बैडरूम की तरफ जाने लगी जहा कारपेट नहीं था. जैसे ही चिकने फर्श पर गीले पैर पड़े मैं फिसल कर बैठ गयी. मुझे बहुत शर्म आयी और तुरंत उठ कर खड़ी हो हुई.

उन्होने मुझे ध्यान से चलने के लिए कहाँ. मैं बिना पीछे मुड़े बैडरूम में प्रवेश कर गयी और तेजी से सामने रखी अलमारी की तरफ बढ़ गयी.

अलमारी खोली तो कुछ साड़ियां और सूट करीने से रखे थे, मैंने उन्हें बिगाड़ना ठीक नहीं समझा, आखिर कुछ देर के लिए ही तो पहनना था.

मैंने कोने में पड़े एक गाउन को उठा लिया. अब मैंने अपना लेगिंग और कुर्ता उतारा और एक तरफ रख दिया.

अंदर के कपडे भी भीग चुके थे तो उन्हें भी उतार दिया. एक तौलिया लेकर अपने बदन को पोंछने लगी. फिर तौलिया पास में रखी कुर्सी पे रखा, तभी मैंने थोड़ी रौशनी आते हुए महसूस की.

याद आया फिसलने के बाद शर्म के मारे जल्दबाजी में मैंने दरवाज़ा ही बंद नहीं किया था. मैंने दरवाज़े के उस ओर देखना मुनासिब नहीं समझा और आँखों के एक कोने से देखने की कोशिश की तो एक साया हिलता हुआ दिखा.

मैंने अनजान बने रहने का नाटक करने में ही भला समझा. बिना समय गवाए मैंने वो गुलाबी गाउन पहन लिया. वह बहुत नरम और मुलायम था, शायद अंदर कुछ नहीं पहने होने के कारण मुझे और भी नरम लगा.

मैं अपने गीले अंतवस्त्रों को कुर्ता लेगिंग के अंदर छुपाते हुए बाहर आयी. हॉल में वो नहीं थे, शायद मुझे आते हुआ देख कही अंदर चले गए, यह जताने के लिए की वो साया वह नहीं थे.

वह रसोई से बाहर निकले और बोले चाय चढ़ा दी हैं मुझे चाय पीकर थोड़ी राहत मिलेगी. मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पा रही थी.

फिसलने की वजह से ज्यादा मेरे उस अनचाहे अंगप्रदशन की वजह से. मुझे वह अब बाथरूम की ओर ले गए जहां ड्रायर लगा था. और ड्रायर का ढक्कन खोल कर मुझे कपडे अंदर डालने को कहाँ.

मैंने बड़ी सावधानी बरती कि कपडे डालते वक़्त छुपाये हुए अंतवस्त्र बाहर न निकल जाये, किस्मत फूटी थी, मेरी उंगली में ब्रा का स्ट्रैप फंसा और मेरे हाथ के साथ बाहर आ गया और फर्श पर गिर गया.

मेरे हाथ कांप रहे थे. मैं झेप गयी और तुरन्त उठा कर उसे भी अंदर डाल दिया और ड्रायर का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब उन्होंने कुछ बटन घुमा कर मशीन को सेट कर दिया.

अब हम लोग बाहर हॉल में आ गए, मैं वही सोफे पर बैठ गयी और वो रसोई में चाय लेने चले गए. मै जहां बैठी थी वहाँ से वो जगह साफ़ दिख रही थी जहां मैंने कपडे बदले थे, मैं अब और हिल गयी थी.

मैं उनकी पत्नी की सहेली हूँ, इन्हे इस तरह नहीं घूरना चाहिए था चोरी से. मन में कही न कही यह भी सोच रही थी कि शायद वो साया मेरा भ्रम हो तो अच्छा है. वो अंदर से चाय के दो कप में लेकर आ गए.

एक के बाद एक होती इन गलतियों की वजह से मैं अब भी नजरे नहीं मिला पा रही थी. मैंने चाय की चुस्किया ली और मुझे बहुत आराम मिला. मैंने नीची नजरो से ही उनसे पूछा “आप मैना के बारे में बता रहे थे”.

उन्होंने अब अपनी कहानी बतानी शुरू की जिसे सुन कर मुझे सदमा लगा. मैना महीने भर पहले ही उनको छोड़ कर अलग रहने लगी थी.

उन्होंने बताया कि पहले मैना के मेरी माँ से झगडे होते थे तो हम अलग हो गए. मैं अपनी माँ की मदद के लिए थोड़ी आर्थिक सहायता देता था जो मैना को पसंद नहीं था. मेरी माँ की कोई आय नहीं, बड़े भाई मदद नहीं करते इसलिए मैं ही उनको रूपये देता था.

इसी वजह से मैना से आये दिन झगडे होते थे. एक दिन यह इतना बढ़ गया कि वो बच्चों को लेकर चली गयी. जाने के बाद आज पहली बार वो छोटी बच्ची को मुझसे कुछ समय के लिए मिलाने के लिए सुबह घर पर छोड़ गयी थी.

बच्ची भी शायद पापा की बजाय अपने पुराने मित्रो के साथ खेलने आयी थी. इनके प्रति मेरे मन में अभी तक जितनी भी नफरत थी वो अब सम्मान में बदल चुकी थी. मुझे उन पर तरस आने लगा था और मैना पर गुस्सा.

वो ऐसे कैसे घर छोड़ कर जा सकती हैं, इतनी छोटी बात पर. मैंने उनको सांत्वना देते हुए कहा कि मैं मैना से बात करुँगी और मनाने का प्रयास करूंगी.

उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने में हमारे सारे रिश्तेदारों और मित्रो ने बहुत समझाने का प्रयास किया, पर वो समझने को तैयार ही नहीं हैं.

कुछ मिनट इसी तरह वह अपनी दुःख भरी दास्ताँ बताते रहे और मैं और भी द्रवित हुए जा रही थी. मैना के लौटने की शर्त यह थी कि संजीव और उनकी माँ उससे माफ़ी मांगे, जिसके लिए संजीव तैयार नहीं थे, और वो ठीक भी थे.
 
जब मैं इस शहर में कुछ समय पहले आयी थी, तब इन दोनों ने मेरी बहुत सहायता की थी. मैं भी उनकी कोई सहायता करना चाहती थी, पर जानती थी की मैना बहुत ज़िद्दी हैं और किसी की नहीं सुनेगी.

फिर मैं क्या मदद कर सकती थी. पत्नी विरह क्या होता हैं वो अब मैं जान चुकी थी. यह व्यक्ति इतने समय से विरह में था फिर भी मुझे उस अवस्था में देख कर मेरा फायदा उठाने का प्रयास नहीं किया.

यह बताते हुए उनका गला रूंध गया, कि मैना अब तलाक के बारे में सोच रही हैं और उनकी आँखें भर आयी. मैंने मन ही मन निश्चय किया मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए. क्या मुझे उन्हें कुछ समय के लिए ही सही पत्नी सुख देना चाहिए.

तुरंत मैंने अपने आप को डांट दिया. यह मैं क्या सोच रही हूँ? इनकी शादीशुदा ज़िन्दगी अच्छी नहीं चल रही, पर मेरी तो बिलकुल सही हैं. मैं क्यों अपनी अच्छी चलती ज़िन्दगी को खराब करना चाह रही हूँ.

वो अब उठे और मेरे पास पड़े टेबल से मेरा खाली कप उठाने के लिए बढे. मेरे अंदर अब दया और करुणा की देवी प्रवेश कर चुकी थी. जिसने मुझे मजबूर कर दिया और मैं भी उठ खड़ी हुई.

मुझ पर से मेरा नियंत्रण हट चूका था. मैंने तुरंत अपने दोनों हाथों से उनकी कलाइयां पकड़ ली, ओर कुछ नहीं सुझा और उनके दोनों हाथों को अपने दोनों वक्षो के ऊपर रख दिया.

मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ पड़ी. काफी समय के बाद उन्होंने किसी स्त्री के नाजुक अंगो को छुआ था, तो वो भी पूरा हिल चुके थे.

मैंने अंदर कुछ नहीं पहना था और वो गाउन बहुत मुलायम और पतला था. वो मेरे अंगो को बिना वस्त्रो के जितना ही महसूस कर सकते थे.

जानिए आरती की कहानी की कैसे उसने अपनी सहेली की चुदाई देखी और खुद भी चुदाई करवाना सिख गयी.

अगले कुछ पलों में उनकी उंगलिया मेरे वक्षो पर अठखेलिया कर रही थी. तुरंत दया की देवी मुझ से बाहर आ गयी. मैं अपने होश में आ चुकी थी, और सोच रही थी की यह मैंने क्या अनर्थ कर दिया.

अपने आप को पर पुरुष के हवाले कर दिया. अब मैं क्या करूँ.

अब उन्होंने मेरे वक्षो को दबाना और मलना शुरू कर दिया था. एक औरत होने के नाते मुझे कुछ आनंद तो आ रहा था साथ ही डर भी लग रहा था.

मैं अब इस मुसीबत से कैसे बच सकती हूँ. मुझे कुछ उपाय सूझता उससे पहले ही उन्होंने मुझे पलट कर सोफे पर धकेल दिया. अब मैं घुटनो और हाथों के बल सोफे पर थी. उन्होंने मेरे गाउन को नीचे से उठाते हुए कमर के ऊपर तक उठा दिया.

अब मेरे नीचे का भाग पूरा नग्न था और उनकी तरफ खुला था. मुझे अहसास हो गया था कि आज मेरी इज्जत मेरे पति के अलावा किसी और के हाथों में भी जाने वाली थी.

मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा था. मैं स्तब्ध हो उसी हालत में बैठी रही और सोच रही थी कि अब क्या करू.

तब तक उन्होंने अपने कपडे उतार लिए थे और अपने लिंग को मेरे नितंबो के बीच रगड़ने लगे.

क्या मैं चिल्लाऊं? मगर मैंने ही तो उनके हाथों को पकड़ कर यह सब करने की शुरुआत की थी. गलती तो सारी मेरी ही थी. वो तो विश्वामित्र बन के बैठा था. मैंने ही मेनका बनके उसकी तपस्या भंग की थी.

मेनका की तरह अब मुझे भी एक श्राप तो भुगतना ही था. ऐसा श्राप जो एक शादीशुदा औरत नहीं झेलना चाहेगी. मैं अपनी मूर्खता और किस्मत को कोसने के अलावा अब कुछ और नहीं कर सकती थी.

मैं अब तक सुन्न हो चुकी थी. अभी भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा था. मैं कुछ हरकत करती उससे पहले ही वो मेरे पीछे आ चुके थे और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया. उनके मुँह से एक जोर की आह निकली.

भीग कर ठंड लगने की वजह से अब तक जो शरीर में कपकपी हो रही थी. अचानक अपनी चूत में उस गरमा गरम लंड के जाते ही मेरे शरीर में दौड़ता लहू गरम हो गया.

मेरी तो साँसे ही थम गयी उन कुछ सेकण्ड्स के लिए और मेरे मुँह से सिर्फ एक गहरी आहह्ह्ह निकली.

शायद काफी समय से यह सुख नहीं मिलने पर पुरुषो का यही हाल होता होगा. अब मुझे मेरे प्रतिरोध करने का कोई फायदा नजर नहीं आया. मैं अब सब कुछ लुटा चुकी थी. अब वह आगे पीछे होकर गति करने लगे धीरे धीरे यह गति बढ़ती जा रही थी.

वो प्रेमानंद में डूबते जा रहे थे और सिसकिया निकाले जा रहे थे. मैं इस बीच अपने पति के बारे में सोच रही थी. मेरी एक छोटी सी गलती की वजह से अब मैं उनको मुँह नहीं दिखा पाऊँगी.

अब पछताये हो तो क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत. मैंने अब बाकी सब बातों के बारे में सोचना बंद कर दिया और सकारात्मक सोचने लगी.

मेरे इस कदम से मैंने एक पुरुष को जैसे नया जीवन दिया, एक तड़पते पुरुष को वो ख़ुशी दी जो वो ज़िन्दगी भर याद रखेगा.
 
आखिर औरत होती भी त्याग की मूर्ति हैं. मैंने अपनी आबरू का त्याग कर किसी की खुशिया खरीदी थी. वह लगातार मुझे पीछे से धक्का मारते हुए चोदने का आनंद लिए जा रहे थे, उनकी आहें और सिसकिया सुनकर मुझे अच्छा लग रहा था. जैसे कोई पुण्य कर दिया हो.

अब आखिर मैं भी कब तक अपने शरीर को रोकती. कुछ ही समय में मेरा सब्र भी टूट गया और मेरी भी आहें निकलनी लगी. उससे उनका जोश भी बढ़ गया तथा ओर भी लगन से अपना कार्य करने लगे.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और वो रुक गए.

बाहर से उनकी बच्ची की आवाज आ रही थी. उन्होंने अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाल दिया और खड़े हो अपना पाजामा फिर ऊपर कर लिया. मैंने भी खड़े हो अपना गाउन नीचे कर दिया.

मुझे खुश होना चाहिए था पर थोड़ा बुरा लगा कि ऐसे में मुझे अधूरा नहीं छोड़ना था. मुझे अपनीं मम्मी के गाउन में देख बच्ची क्या सोचेगी इसलिए मैं बाथरूम की तरफ चली गयी.

तो मेरी सहेली के पति पर उसकी पत्नी की सहेली की चुदाई का क्या असर होगा. आगे क्या होगा वो आपको अब से कुछ ही देर में पता चल जायेगा!

संजीव ने दरवाजा खोला और बच्ची दौड़ते हुए अंदर गयी और थोड़ी देर में एक नया खिलौना हाथ में ले वापिस दरवाजे से बाहर निकल गयी. उन्होंने फिर से दरवाजा बंद किया. मैं बाथरूम से निकल कर फिर हॉल में आ गयी.

हम दोनों की नजरे फिर से मिली और अभी जो कुछ भी हुआ था, ये सोच मैंने अपनी नजरे नीचे झुका ली. मैंने सोचा शायद इनका जमीर भी जाग जाए और अपना इरादा बदल ले.

पर एक महीने भर से तड़पते हुए मर्द को अगर मौका मिला हो तो वो भला कैसे छोड़ेगा.

उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था. वो मुझे बेडरूम में ले गए. मुझे आईने के सामने खडी किया और नीचे से गाउन पकड़ कर उठाते हुए मेरे सर से बाहर निकाल दिया. उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर उल्टी लेटा दिया.

उन्होंने एक दराज से कुछ सामान निकाल लिया. अब वो मेरे करीब आये और मेरी दोनों नाजुक कलाइयां पकड़ी और उनको पीठ पर ले जाकर उन पर एक हथकड़ी बाँध ली. उस पर मखमल का कपडा चढ़ा था तो चुभ नहीं रही थी.

मुझे समझ नहीं आया वो करना क्या चाह रहे थे. मैं कोई विरोध नहीं कर थी फिर इस हथकड़ी का क्या फायदा.

उन्होंने मुझे अब सीधा लेटा दिया और अपने हाथ में एक लंबी सी पंखनुमा चीज पकड़ ली. मुझे लग गया वो मुझे गुदगुदी करने वाला हैं.

वो अब उस पंखे को मेरे निप्पल के घेरो के चारो तरफ हलके से फेरने लगा. मजे के मारे मेरी सिसकियाँ निकलने लगी. मेरी चूंचिया एकदम से तन गयी और फुल कर और बड़ी हो गयी.

मैना ने मुझसे एक दो बार जिक्र भी किया था, कि उसके पति सेक्स से पहले कुछ गेम खेल कर तड़पाते हैं, आज पता चला वो खेल क्या हैं. जो भी हो आज उसके हिस्से का खेल मैं खेल रही थी.

अब वो पंख घेरा बढ़ाते हुए मेरे पुरे मम्मो को गुदगुदी कर तड़पाने लगा. इतना रोमांटिक पति होते हुए उसको छोड़ कर जाने वाली कोई बेवकूफ पत्नी ही हो सकती हैं. पंख घूमते हुए अब मेरे नाभी और पतली कमर को गुदगुदाने लगा.

मैं अब इंतज़ार कर रही थी कि जब ये मेरी चूत पर अठखेलियां करेगा तब कैसा लगेगा.

इससे पहले की मैं उस उन्माद में सो जाऊ, डोरबेल एक बार फिर बजी और मैं उस नशे से बाहर आयी.

संजीव ने अपने सारे सामान फिर से दराज में डाले और मुझ पर एक रजाई पूरी डाल दी. ऐ.सी. से वैसे ही हलकी ठंड थी तो रजाई से थोड़ी गर्माहट मिली.

संजीव बाहर जा चुके थे और किसी महिला से बात कर रहे थे. थोड़ी देर में वो दोनों बैडरूम की तरफ बढ़ रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी, कही किसी को शक तो नहीं हो गया.

मुझे वो आवाज पहचानते देर नहीं लगी, वो मैना की ही आवाज ही थी. बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने बचे हुए कपडे लेने ही आयी थी. मेरी हालत उस वक्त क्या थी ये कोई सोच भी नहीं सकता.

मैं अपनी सहेली की गैरमौजूदगी में उसके बैड पर नंगी लेटी हुई थी, और उसके छोड़े हुए पति के साथ कुछ अनैतिक काम कर चुकी थी.

मैं सोच में पड़ गयी, क्या मुझे आवाज लगा देनी चाहिए. इससे मैं तो बच जाउंगी इस पाप को और आगे बढ़ने से पहले. पर फिर सोचा मैना पर क्या बीतेगी. उसका अपने पति पर रहा सहा भरोसा भी टूट जायेगा. उसके दोनों बच्चो का क्या होगा.

किसी और को अपने बिस्तर पर सोया हुआ देख उसने संजीव को पूछा भी था, पर संजीव ने झूठ बोल दिया कि वो उसकी माँ हैं, सो रही हैं.

मैना का तो वैसे भी उसकी माँ से छत्तीस का आंकड़ा था, तो शायद वो थोड़ी ही देर में वहा से चली गयी थी. क्यों कि आवाजे आना बंद हो गयी थी.

मैं रजाई के नीचे अभी भी इंतज़ार कर रही थी, कि अचानक मेरे ऊपर से वो रजाई हटा दी गयी. मैं डर गयी, कही सामने मैना न खड़ी हो. पर सामने संजीव को देख थोड़ी शांती मिली.

उसने बताया कि मैना आई थी अपने कपडे लेने और मेरा पहना हुआ गाउन भी लेके चली गयी. जो संजीव ने नीचे से उठा कर अंदर अलमारी में छुपा दिया था बाहर जाने से पहले.
 
मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब और वहा नहीं रुकने वाली. तब तक वो एक बार फिर वो पंख ले आया और मेरे शरीर पर फेरने लगे. उसमे पता नहीं क्या जादू था कि मुझे अपना फैसला फिर से बदलना पड़ा.

शायद संजीव के पास भी ज्यादा समय नहीं था, मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. वो नाजुक पंख मेरी चूत को सहला रहा था और मेरी चूत मजे के मारे कांप रही थी. मेरे मुँह से आह आह की आवाजे आने लगी.

मेरे पैर अपने आप ही एक दूसरे से दूर होते गए और मैंने अपनी चूत के दरवाजे खोल दिए. मुझे बस ये अहसास हो रहा था कि मैं किसी मसाज पार्लर में हूँ और सुकून भरी मसाज करवा रही हूँ. मेरी चूत में बूंद बूंद पानी भरने लगा था और छलकने को उतारू था.

इससे पहले की मेरी चूत का जाम छलक जाए, वो रुक गए और मुझे पलटी मार कर उल्टी लेटा दिया. वो अब दराज से कुछ और निकालने लगे.

तभी एक जोर की चटाक आवाज सुनाई दी और मैंने अपनी गांड पर किसी ने मारा हो ऐसा महसूस किया. उसके कुछ सेकंड्स बाद मुझे वहा हलकी जलन होने लगी जो कुछ सेकंड रही.

मैंने सर पीछे कर देखा संजीव के हाथ में एक पतली छड़ी जैसा था जिस के आगे के सिरे पर चमड़े का छोटा टुकड़ा लगा था.

अब उन्होंने मेरे गांड के दूसरे गाल पर मारा, फिर वही चटाक की आवाज और हलकी जलन. जिसके बाद पुरे शरीर में कंपन सा हुआ.

मेरे पुरे शरीर में रोंगटे खड़े हो गए और खास तौर से मेरी चूत में एक अजीब सी खुजली मचने लगी. ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई आये और मेरे अंगो को हाथ लगा कर सहलाये.

थोड़ी थोड़ी देर से वो मुझे ऐसे ही चटाके मारता रहा और मेरे मुंह से कराहने की आवाज के साथ एक प्यास भरी आह निकलती.

एक लड़के ने अपने दोस्त की मम्मी यही की अपनी रीता चाची की चुदाई कैसे करी. यह आप उसकी सेक्स की स्टोरी में जान सकते है.

जब उसने चटाके मारना पूरा बंद कर दिया, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी गांड पर जहा जहा पड़ी एक साथ हल्का दर्द सा हो रहा था.

वो दर्द थोड़ी देर बाद सामान्य हो गया, क्यों कि वो इतनी जोर से भी नहीं मारा था कि बहुत ज्यादा देर तक रहे. उसने मेरे हाथों से हथकड़ी खोल दी.

मुझे लगा कही इसी कारण से तो मैना इसको छोड़ कर नहीं चली गयी. पर इसमें इतना बुरा भी नहीं था. अगर ज्यादा जोर से ना मारा जाए तो ये औरत को और भी ज्यादा उकसाने के काम आ सकता हैं. मैंने तो सोच लिया था कि मैं भी अपने पति को ऐसी चीज लाने को बोलूंगी, वरना हाथ से भी चांटे मार कर काम चला सकते हैं.

मेरी चूत अब फड़फड़ा रही थी. कभी चूत की पंखुडिया सिकुड़ती तो कभी फूल कर खुल जाती.

मैं अब आबरू, नफरत, दया सब भूल चुकी थी, मैं अपने शरीर की जरुरत के आगे लाचार हो चुकी थी. पति ने वैसे भी पिछले एक सप्ताह से मुझे कोई शारीरिक सुख नहीं दिया था.

वो अपने कपडे उतार कर मेरे पास में लेट गए. शायद इतनी मेहनत के बाद थोड़ा आराम करना चाहते थे. मैंने देखा उनका लंड फुँफकार मार रहा था और रह रह ऊपर नीचे हो सलामी दे रहा था.

उनके हाथ में एक कंडोम का पैकेट था. उन्होंने वो कंडोम खोल अपने लंड को पहना दिया.

फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ खिंच कर मुझे अपने आप पर झुका दिया. मैं जैसे उन पर सवार हो गयी. मेरा थोड़ा शरीर उन पर झुका हुआ था. मेरे दोनों मम्मे उनके मुख पर थे.

वह अब मेरी चूँचियो को धीरे धीरे चूसने लगे. साथ ही साथ वो अपने दोनों हाथ मेरे कमर और नितंबो पर फेरने लगे.

उनका लंड नीचे से बार बार खड़ा हो कर मेरी चूत पर चांटे मार रहा था, जिसके छूते ही मुझे करंट सा लगता. मेरे शरीर में झुरझुरी छूट जाती.

थोड़ी देर इसी तरह चलता रहा. अब उन्होंने अपना लंड पकड़ कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मेरे कूल्हे पकड़ कर मुझे आगे पीछे हिलाते हुए मेरी धक्का मशीन चालू कर रहे थे.

एक बार मजा आना चालू हुआ तो मैं उनके हाथ छोड़ने के बावजूद अब खुद ही झटके मारने लगी. अब मैं तेजी से आगे पीछे होते हुए अपने बदन से उनके बदन को रगड़ रही थी.

मेरे मम्मे उनके सीने से रगड़ खाकर और मजा दे रहे थे. थोड़ी ही देर में हम दोनों की आहें एक साथ निकलने लगी. मैं अपने चरम की और बढ़ रही थी. मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया था.

आह्ह्ह आह्ह आह्ह ओह्ह्ह यस्स्स्स उम्म उँह उँहह्ह्ह्ह आह्ह्ह आईईईइ हम्म्म्म की आवाज के साथ और कुछ हल्के धक्को के साथ अपना काम पूरा किया.

उनका अभी भी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए थकी होने के बावजुद मैंने करना जारी रखा. पर थोड़ी ही देर में मैं थक कर रुक गयी.
 
अब वो नीचे लेटे लेटे ही अपने लंड को मेरे शरीर में अंदर बाहर करने लगे. मुझे फिर मजा आने लगा. थोड़ी देर में मैंने भी साथ देते हुए थोड़ा जोर लगाया.

जिससे मेरा मूड एक बार फिर बनने लगा. शायद ये सारा जादू उस खेल का हैं जो उन्होंने मेरे साथ खेला था. मैं वो पंख अभी भी अपने मम्मो और चूत पर फिरते हुए महसूस कर पा रही थी.

मैंने रुक रुक कर जोर से झटके मारने शुरू किये. मेरा थोड़ा पानी तो पहले ही निकल चूका था तो उन झटको से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी.

हम दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में एक साथ झटके मार रहे थे, जिससे उनका लंड और मेरी चूत एक दूसरे की तरफ तेजी से बढ़ते हुए एक दूजे में समा रहे थे, और झटको का वेग और भी बढ़ने से लंड गहराई में उतर रहा था.

उनकी आहें अब और भी लंबी होने लगी और आवाज भी बढ़ने लगी. अब उन्होंने जोर लगाना बंद कर दिया था शायद उनका होने वाला था. इसलिए मैंने अपना पूरा जोर लगाते हुए करना जारी रखा.

जल्द ही उनकी चीख निकली और मुझे अपने सीने से चिपका कर अंदर की ओर कुछ हलके धक्के देने लगे.

अब तूफ़ान शांत हो चूका था. मैं अपनी चूत से थोड़ा पानी रिसता हुआ महसूस कर रही थी. शायद मैंने ही दूसरी बार झड़ने के करीब होने से पानी छोड़ा होगा.

शारीरिक जरुरत पूरी होने के बाद ही इंसान को अपने सारे गुनाह नजर आते हैं. हम दोनों का हो तो गया, पर मन ही मन में पता था कि हमने क्या गलती कर दी हैं जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हैं.

थोड़ी देर उसी मुद्रा में सोये रहने के बाद मैं उनसे नीचे उतर गयी. जो मैंने देखा उस पर यकीन नहीं कर पायी. मैंने देखा उनका कंडोम फट चूका था. इसका मतलब उनका सारा वीर्य मेरी चूत में जा चूका था. वो जो पानी रिसा था वो मेरा नहीं संजीव का था.

ये मेरे महीने के सबसे खतरनाक दिन चल रहे थे, जब बच्चा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती हैं. शायद वो कंडोम नहीं मेरी किस्मत फटी थी.

वो उठे और कपडे पहन कर बाहर चले गए. मेरा गाउन तो जा चूका था, मेरे कपडे बाहर ड्रायर में थे तो ऐसे ही बैठ मैं इंतज़ार करने लगी. थोड़ी ही देर में वो लौट आये, उनके हाथ में मेरी ड्रायर में सुख चुकी लेगिंग कुर्ता थे. मैंने उनसे वो कपडे ले लिए.

कपड़ो के बीच में वो मेरे अंतवस्त्र छुपा कर लाये थे मेरी ही स्टाइल में. जो की मेरी लापरवाही से फिर नीचे गिर पड़े. मैं एक बार फिर शर्मिंदा हुई. उन्होंने झुककर तुरंत वो कपडे उठाये और मुझे थमा दिए.

अब उनको यह अधिकार था कि वो इन वस्त्र को भी छु सकते थे. वो बाहर चले गए और मैं फिर उसी अलमारी के पास खड़ी हो कपडे पहनने लगी.

दरवाज़ा अभी भी खुला था, पर अब मुझे परवाह नहीं थी. छुपाती भी क्या? सब कुछ तो दे ही चुकी थी. बाहर देखा तो वो सोफे पर बैठे मुझे ही कपडे पहनते देख रहे थे. शायद वो पहले वाला साया सच्चाई ही था.

मैं अब बाहर हॉल में आ गयी थी और उनसे जाने की इजाजत मांगी. वो मेरे पास आये और अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे धन्यवाद करने लगे. अपनी आदत के अनुसार मेरे मुँह से वेलकम निकल गया.

अपनी इस आखिरी गलती पर मैंने अपनी जुबान दाँतों से काट ली. तुरंत मुड़ कर उनसे विदा लेते हुए दरवाज़े के बाहर चली गयी.

नीचे उतरते हुए यही सोच रही थी कि क्या मैंने जो भी किया सही था? मैना के पति के लिए निश्चित रूप से सही किया था.

शायद मेरे खुद के लिए भी ठीक ही किया था. मुझे आज एक नया अनुभव हुआ. मैंने कही मैना का घोंसला तो नहीं तोड़ दिया या फिर वो घोसला पहले से ही टुटा हुआ था.

फटे कंडोम को याद कर मेरा मदद करने का हौंसला भी टूट चूका था. पहले ही हिल स्टेशन पर जो डीपू के साथ किया वो काफी नहीं था जो अब ये कांड भी कर बैठी.

चार दिन के बाद मैना का फ़ोन आया, एक बार तो मैंने डर के मारे उठाया ही नहीं, कि कही उसको सब मालुम तो नहीं चल गया.

दूसरी बार आने पर मैंने उठाया, वो मुझे शुक्रिया बोल रही थी. उसके हिसाब से मैंने उसके पति को अच्छे से समझाया जिससे वो माफ़ी मांग कर उसको फिर अपने घर ले आये थे मैना की शर्तो पर.

मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी इज्जत की कुर्बानी मेरी सहेली के कुछ तो काम आयी. मन में एक अपराध-बोध था वो थोड़ा कम हुआ.

पर मेरी मुसीबत अब दोहरी हो चुकी थी. अगर माँ बनी तो बच्चे का बाप कौन होगा, डीपू या संजीव !

उससे बड़ी मुसीबत अपने पति को क्या जवाब दूंगी कि ये बच्चा किसका हैं? आने वाले दो सप्ताह का इंतज़ार मेरे लिए भारी पड़ने वाला था.

उस वक्त मुझे नहीं पता था कि रंजन की हमारे ज़िन्दगी में वापसी होने वाली थी.

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