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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

आर्केस्ट्रा की मस्ती भरी धुन पूरे हाल में लहरा रही थी।

लाल और गुलाबी रंग की थिरकती रोशन किरणें खून सी हल्की-हल्की फौहार का सा दृश्य बना कर पेश कर रही थीं। हॉल में बीचों-बीच कुछ जोड़े डांस में मस्त थे।

आज भी दिन भर काम में व्यस्त रहने से राज बहुत थक गया था। हॉल के दरवाजे पर पहुंचकर वो कुछ क्षण के लिए ठिठक गया और उसने पैना करती हुई निगाह हॉल में डाली।

दमकते चेहरों वाले मर्दो के कहकहे और कमसिन औरतों के चेहरों पर बरसते चुम्बनों की आवाजों ने माहौल बड़ा स्वप्निल और सैक्सी बना रखा था। रंगीन, खूबसूरत तितलियों जैसी लड़कियां। हर तरफ जिन्दगी का उल्लास नाच रहा था।

पैन करती हुई राज की निगाह एक मेज पर पड़ी तो वहीं ठिठक गई। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बिजली का नंगा तार उसे छू गया हो। एक झटका सा उसके जिस्म में ठण्डी लहरें दौड़ने लगीं।

उस मेज पर राज का सबसे करीबी और प्यारा दोस्त सतीश बैठा हुआ था और उसके साथ....उसके साथ ज्योति बैठी हुई थी। वही ज्योति, जिसे देख कर ही क्या उसकी कल्पना करके भी राज की रूह तक कांप जाती थी और सहम जाता था और उसके छक्के छूट जाते थे। वो राज के हिसाब से बहुत ज्यादा खतरनाक औरत थी।

जय से राज की मुलाकात पिछले साल ब्लू हैवन क्लब में हुई थी। करीब तीस साल की गुराज बदन वाली ज्योति। चेहरा भी बहुत हसीना था। मगर उसकी शख्सियत में जो सबसे आकर्षक चीज थी, वो थीं उसकी आंखें। जादू भरे नैन, जिनमें न जाने कौन सा ऐसा आकर्षण था कि उस पे निगाह पड़ते ही इन्सान का दिमाग सुन्न होने लगता था।

ज्योति की निगाहों दिल और जिगर को पार करके इन्सान के वजूद की गहराई तक उतर जाती थीं। ऐसा लगता था जैसे कोई अदृश्य शक्ति इन्सान को खींच कर उसकी तरफ ले जा रही हो दिल को।

पहली बार राज जब ज्योति से मिला था तो उसने काले रंग की साही और ब्लाऊज पहन रखा था। उसके गुलाबी रंग पर वह लिबास बहुत मोहक लग रहा था।

राज को ज्योति के पूर वजूद में जादुई आंखों के अलावा जिस चीज ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया था, वो था उसके गले में लिपटा हुआ नेकलेस। उसकी सुराहीदार गर्दन में सांप की डिजाइन का हार पड़ा हुआ था-किसी बहुत ही दक्ष कलाकार ने यह सांप जैसा हार बनाया लगता था, सांप की आंखों की जगह

दो कीमती और चमकते हुए नीलम जड़े हुए थे। दूर से देखने पर ऐसा लगता था जैसे जिन्दा सांप उसकी गर्दन से लिपटा हुआ हो।

राज सांपों से डरने वाला शख्स नहीं था, उसने जिन्दगी में कई खतरनाक सांप पकड़े थे। बरसों के सांपों के जहरों पर शोध और प्रयोग करता रहा था।

लेकिन ज्योति के गले में सांप जैसा वो हर देखकर वो भांप सा गया। पहली मुलाकात में जब एक दोस्त ने राज का परिचय ज्योति से करवाया था तो हाथ मिलाते हुए उसे ऐसा खौफ महसूस हुआ था जैसे ज्योति के गले में लिपटा हुआ सांप उसके हाथ में इस लेगा।

शायद यही वजह थी कि जब उसने ज्योति के नर्म और मुलायम हाथ से हाथ निकाल कर अपने माथे पर फेरा था तो उसे पता चला था कि वह पसीने से तर हो चुका था। हालांकि मौसम गर्म नहीं था।

उसी दिन ब्लू हैवन से निकलने के बाद एक दोस्त ने राज को ज्योति की खूबियों के बारे में बताया था। उसने बताया था कि ज्योति छः साल के पीरियड में चार बार विधवा हो चुकी है, फिर भी हर वक्त प्रसन्न और प्रफुल्ल रहती है। हर पति की मौत के बाद उसका रूप और ज्यादा निखर आता है। और यौवन उफान पर आ जाता है। और वर्तमान में वो शहर के एक जाने-माने शख्स की पत्नी है।

ये बातें सुनकर राज के बदन में फिर सनसनी की लहर दौड़ गई थी और उसके दिल में एक ही ख्याल आया था, क्या ज्योति के चारों पूर्व पति स्वाभाविक मौत मरे हैं? यही सवाल उसने अपने दोस्त से पूछ भी लिया था। उसके दोस्त ने बड़े यकीन से जवाब में कहा था

"जहां तक मेरी जानकारी है, ज्योति के चारों पति स्वाभाविक मौत मरे थे। अस्पताल में जय गुप्ता के इलाज में उन्होंने दम तोड़ा था।"
 
बात खत्म हो गई थी, लेकिन ज्योति का काले लिबास में लिपट गोरा गुलाबी बदन राज के दिलो-दिमाग पर छाता जा रहा था। उसकी सुराहीदार गर्दन में लिपटा वो चांदी का निर्जीव सांप कभी-कभी उसे अपने जिस्म पर रेंगता हुआ महसूस होता था।

करीब एक हफ्ते बाद राज को एक रिसर्च के सिलसिले में नेहरू अस्पताल जाना पड़ा। अस्पताल के सर्जन नरेन्द्र गुप्ता राज के अच्छे दोस्त थे। कुछ दिनों पहले वे दोनों विभिन्न प्रकार के जहरों के बारे में प्रयोग और जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहे थे। राज जब सर्जन गुप्ता के कमरे में दाखिल हुआ तो वो किसी मरीज को देख रहे थे।

सर्जन गुप्ता ने हमेशा की तरह एक गम्भीर मुस्कराहट के साथ राज का स्वागत किया। राज खामोशी से कुर्सी पर बैठ गया।

पन्द्रह-बीस मिनट में डॉक्टर गुप्ता तमाम मरीजों से फारिग हो गए। उसके बाद उन्होंने राज की तरफ देखा। काफी देर तक राज उनसे अपनी रिसर्च के बारे में बातें करता रहा। बातचीत के दौरान एक बार टेलीफोन की घंटी बजी। डॉक्टर गुप्ता ने रिसीवर उठाया और किसी से बातें करने लगे।

रिसीवर रखने के बाद वो कुछ देर तक सोचते रहे। फिर अचानक राज की तरफ देखकर बोले

"यार राज, तुम्हारा किस्मत के बारे में क्या विचार है?"

"मेरी राय में तो आदमी जिस जगह हिम्मत हार देता है, उस पड़ाव को किस्मत का नाम दे देता है...।"

"विचार तो मेरे भी कुछ ऐसे ही थे।" डॉक्टर गुप्ता ने पेपर वेट से खेलते हुए कहा, "लेकिन उस औरत को देखते हुए मैं विचार बदलने पर मजबूर हो गया हूं।"

"कौन-सी औरत!" राज ने पूछा।

"अरे कही, मिसेज ज्योति ।” डॉक्टर गुप्ता बोले, "बैरिस्टर आनन्द खोसला की बीवी?"

"ज्योति.....।" राज ने हैरत से पूछा, "क्या आप उसी ज्योति की बात कर रहे हैं जिसके चार पति पहले ही स्वर्ग सिधार चुके हैं?"

"हां यार....वही ज्योति ।" डॉक्टर गुप्ता ने गर्दन हिलाकर कहा,

उसके वो चारों स्वर्गवासी पति मेरे ही इलाज में रहे हैं। लेकिन अफसोस! मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद भी सभी मौत से नहीं बच सके थे। और यह पांचवां पति.....बैरिस्टर खोसला भी मौत की तरफ तेजी से बढ़ रहा हैं।

"क्यों भाई, उन्हें क्या हो गया?" राज ने पूछा।

"मेरी समझ में तो अब तक कुछ नहीं आ रहा..... । उनके शरीर का हर अंग ठीक से काम कर रहा है। उसके बावजूद ऐसा लगता है जैसे कोई चीज अन्दर-ही-अन्दर उसे तिल-तिल करके गला रही है। बगैर किसी प्रत्यक्ष बीमारी के वो दिन-ब-दिन हायों का ढांचा बनता जा रहा है। दर्जनों ताकत के इंजेक्शन दे चुका हूं मैं उसे, ढेरों टॉनिक पिला दिए हैं। लेकिन उस पर किसी दवा का असर ही नहीं हो रहा।"

"और.....उसके पहले पति किस बीमारी से बीमार पड़े थे?" राज ने पूछा।

"यही तो हैरत की बात है कि उनमें से भी किसी में किसी बीमारी के लक्षण नहीं पाए गए थे। वो दिन-ब-दिन कमजोर होते गए थे, यहां तक कि मर गए।"

"कमाल है यार!” राज ने ताज्जुब से कहा।

"हां। इसलिए तो अब मैं सोचने लगा हूं.....कि ये सब किस्मत के खेल हैं।"

"तो तुम्हारा कहना है कि वो चारों स्वाभाविक मौत मरे थे?"

"हां यार! इलाज के दरम्यान मैंने उनके बहुत से टेस्ट करवाये थे, कई बार एक्सरे भी निकलवाए गए थे, लेकिन कहीं भी कोई गड़बड़ नहीं थी। मरने के बाद चारों के पोस्टमार्टम भी हुए थे, सिर्फ यह जानने के लिए कि क्या रहस्य है इसमें कि वो एक बार बीमार होकर दोबारा स्वस्थ ही नहीं हो सके। सिर्फ इतना ही पता चला सका था कि उनका दिल बहुत कमजोर हो गया था, जिसकी वजह से ताजा खून उचित मात्र में नहीं बन पा रहा था। यहां तक कि एक दिन उनका हार्ट फेल हो गया था।"

वो वहां से उठ आया था, लेकिन ज्योति का लुभावना हसीन चेहरा बड़ी मुश्किल से यादों में से उस वक्त राज अपने दिमाग से निकाल पाया था।
 
डॉक्टर गुप्ता ने जाने क्या कहते रहे थे। वो सिर्फ हूं-हां करता रहा। फिर राज ने तंग आकर डॉक्टर गुप्ता से इजाजत ली और घर वापस आ गया। वहां से उठते-उठते इतना जरूर किया था कि वह ज्योति के चारों दिवंगत पतियों के नाम और पते डॉक्टर गुप्ता से लिखवा लाया था।

घर आकर उसके जेहन में एक ख्याल उभरा, और वा फोन के करीब जाकर अपने दोस्तों, मित्र से फोन करने लगा। करीब डेढ़ घंटे तक फोन पर बातें करने के बाद राज को जो जानकारी मिली, उससे उसके क्षीण से सन्देह और ज्यादा बड़े और पक्के हो गए।

उससे अपने कई दोस्तों से ज्योति के दिवंगत पतियों के हालात मालूम किए थे तो उसे मालूम हुआ था कि ज्योति के चारों दिवंगत पति अच्छी शख्सियत वाले थे और सारे ही ऐसे थे कि उनके मरने के बाद उनकी दौलत और जायदाद का ज्योति के अलावा कोई वारिस नहीं था। ज्योति इस वक्त करोड़ों रूपये की मालिक थी और अब शायद पांचवे पति के मरने के बाद उसकी अमीरी कुछ और बढ़ जाने वाली थी।

राज ने लगे हाथ बैरिस्टर खोसला के बारे में भी पूछ लिया और उसका अन्दाजा दुरूस्त निकला। बैरिस्टर खोसला भी बेऔलाद था और मरने के बाद ज्योति ही उसकी जायदाद की इकलौती वारिस थी।

ये तमाम जानकारियां हासिल करके राज को यकीन हो चला कि ज्योति के चारों पतियों की मौत स्वाभाविक रूप से नहीं हुई थी-बल्कि कोई जबर्दस्त गड़बड़ थी उनकी मौतों के पीछे।

जादू वगैरह का राज कायल नहीं था, जिससे यह समझ लेता कि ज्योति कोई खून पीने वाली तान्त्रिक है। राज तो एक डॉक्टर था। उसे मालूम था कि इन्सानी जिस्म में जब तक कोई खास पूर्जा ही खराब ने हो जाए, वह मर नहीं सकता। चाहे कितनी ही खतरनाक बीमारी क्यों ने हो, आज के आधुनिक युग में अगर वक्त पर इलाज शुरू हो जाए तो रोगी के बच जाने की निन्यानवे प्रतिशत सम्भावना हो जाती है। बशर्ते कि बीमारी इलाज की सीमा से बाहर ही न पहुंच गई हो।

कभी-कभी तो राज को यकीन होने लगता था कि जादू टोना, तंत्र-मंत्र वाकई कोई चीज हैं और ज्योति एक पहुंची हुई जादूगरनी या तान्त्रिक है जिसकी वजह से उसका हर पति डेढ़ दो साल में मर जाता है। फिर उसने सोचा कि अगर ज्योति जादूगरनी नहीं है तो उसके गले में पड़ा वो सांप जैसा नेकलेस जरूर कोई भयानक जादू अपने में समेटे हुए होगा, क्योंकि उसकी कल्पना करते ही राज के जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती थी-वर्ना क्या वजह थी कि जहरों का स्पेशलिस्ट एक डॉक्टर सिर्फ चांदी के बने सांप जैसे नेकलेस से खौफ खाता हो, जिसे नर्म और नाजुक एक हसीना गर्दन से लपेटे फिरती थी?

उस साल भर पहले की मुलाकात के बाद भी ज्योति कई बार राज से ब्लू हैवन क्लब में मिली थी, लेकिन राज हर बार उसे देखते ही आंखें चुरा लिया करता था।

जब कभी भी ज्योति राज को नजर आ जाती, काफी देर तक उसका और उसके नेकलेस का ख्याल राज को सताता रहता था, कभी-कभी तो राज उस खतरनाक हसीना का ख्याल दिमाग से निकालने के लिए स्कॉच का सहारा भी लेने लगा था, स्कॉच परेशानी और खौफ के मौकों पर हमेशा उसमें नई जान भर देती थी।

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यही वजह थी कि उस वक्त तो ज्योति को अपने दोस्त सतीश के साथ देख कर उसका दिल धक से रह गया था, खौफ और दहशत से वो ठिठक गया था। उसे अपनी रीढ़ की हाी में च्यूटियां सी दौड़ती महसूस होने लगी थीं। सारी दुनिया में एक ही तो ऐसा शख्त था जिससे राज को सबसे ज्यादा लगाव था। वो शख्स सतीश था। सबसे ज्यादा खतरा राज को इसलिए महसूस हो रहा था क्योंकि सतीश खुद भी एक बड़ी जायदाद का अकेला मालिक था। इसका कोई वारिस भी नहीं था।

राज के बहुत अनुरोध के बावजूद सतीश ने अभी तक शादी भी नहीं की थी। सतीश में ज्योति का पति बनने की तमाम योग्यताएं मौजूद थीं। ज्योति जिस तरह के पतियों की तलाश में रहती थी, सतीश उसकी तरफ शर्तों पर खरा उतरता था। यही वो आशंकाएं थीं जो ज्योति और सतीश को एक साथ देखकर राज के दिल में उठ खड़ी हुई थीं।

राज धीर-धीरे चलाता हुआ हॉल में दाखिल हुआ और एक खाली मेज देख कर जा बैठा। इस वक्त क्योंकि सतीश से कोई खास बातचीत नहीं की जा सकती थी और ज्योति से वो मिलना नहीं चाहता था, इसलिए वेटर को बुला कर राज ने एक लार्ज पैग का आर्डर दिया।

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दूसरे दिन राज ने सतीश को फोन किया और उससे कहा कि वह उसके घर चला आए या वहीं उसका इन्तजार करे। सतीश ने जवाब दिया

"तुम आ जाओ.... "

राज ने फौरन कपड़े बदले और सतीश की कोठी की तरफ चल पड़ा। उस एक साल के अर्से में ज्योति के पांचवें पति का भी देहांद हो चुका था, जिसके बारे में अपने सन्देह को मिटाने के लिए बैरिस्टर खोसला का पोस्टमार्टम राज और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता ने मिल कर किया था कि बैरिस्टर खोसला की मौत प्राकृतिक थी। और अब ज्योति आज़ाद थी। ज्योति, सात साल में जिसके पांच पति मौत के मुंह में समा गए थे और वो अपना छठा शिकार फांसने के लिए बढ़ रही थी।

ख्यालों में डूबे राज को पता ही नहीं चला कि रास्ता कब कट गया। कोठी में दाखिल होते है नौकर ने बताया कि सतीश लाईब्रेरी में उसका इन्तजार कर रहा है। राज लम्बी राहदारी में से होता हुआ, सतीश के बेडरूम के सामने से गुजर कर स्टडी में पहुंच गया।

कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर राज ने देखा कि सतीश उसकी तरफ पीठ किए मेज के पास कुर्सी पर बैठा कुछ लिख रहा है। राज ने कमरे में दाखिल होते हुए कहा

" सतीश!"

"राज, तुम आ गए?" सतीश ने राज की तरफ देखे बगैर पूछा, "खैरियत तो है? आज इतने घबराए हुए क्यों हो?"

राज कोई जवाब दिए बगैर उसकी पीठ पीछे जा खड़ा हुआ। इत्तेफाक से सतीश उस वक्त ज्योति को पत्र लिख रहा था। राज ने शुरूआती दो-तीन लाईनें पढ़ लीं। पत्र में वह ज्योति से बाकायदा इश्क का इजहार कर रहा था। साफ लफ्जों में।

"तुम ज्योति को कब से जानते हो?" राज ने उसके कंधों पर जोर डालते हुए पूछा।

"काफी दिनों से!"

"इस तरह के संबंध कब से हैं?" राज ने पत्र की तरफ इशारा किया।

"अभी कुछ ही दिनों से। लेकिन तुम ये सब बातें इतनी बेताबी से क्यों पूछ रहे हो?" सतीश बोला-"शायद तुम्हें मालूम नहीं दोस्त कि निकट भविष्य में मैं ज्योति से शादी करने जा रहा हूँ

"शादी !" राज करीब-करीब चीख ही उठा था। खौफ और दहशत से चौंककर वो एक कदम पीछे हट गया। उसने हकलाते हुए कहा

"तुम शादी करोगे सतीश....उस खतरनाक हसीन औरत से....?"

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"हां! क्यों इसमें ताज्जुब की क्या बात है?" उसने राज की तरफ हैरत से देखते हुए पूछा।

राज बोला

" सतीश, क्या तुम जानते नहीं, वो कितनी खतरनाक औरत है?"

"खतरनाक....?" वो हंस पड़ा, "कैसी बच्चों जैसी बातें कर रहे हो राज ? वो नाजुक सी, मासूम सी औरत, भला खतरनाक कैसे हो सकती है?"

"लेकिन भले आदमी, क्या ज्योति से बढ़िया लड़की तुम्हें नहीं मिल सकती?” राज ने कहा, "तुम जबान दो, खूबसूरत हो, दौलतमंद हो। तुम्हारे लिए तो अच्छी से अच्छी लड़की मिल सकती है।"

"पहले मैंने भी यहीं सोचा था। लेकिन पिछले कुछ दिनों में ज्योति से मेरे सम्बंध इतने गहरे हो गए हैं कि हमारे बीच अब किसी तरह की दूरी नहीं रही.... । हमें एक-दूसरे से मोहब्बत हो गई है....।" उसने मुस्कराते हुए कहा।

"क्या तुम्हें मालूम है कि ज्योति तुमने पहले पांच पतियों को मौत के घाट उतार चुकी है?"

"क्यों बेचारी पर इल्जाम लगाते हो दोस्त? उसके पति अगर मर गए तो इससे उस मासूम का क्या दोष है? मर्द भी तो कई-कई शादियां करते हैं और उनकी पत्नियां मरती भी रहती हैं। जरा सोचो, मौत पर भी किसी का कभी बस चलता है....कि बेचारी ज्योति का चलेगा?"
 
"लेकिन यार, तुम यह भी तो सोचो कि तुम उम्र में भी उससे पांच-छः साल छोटे हो।"

"अरे मेरे दोस्त । मोहब्बत मोहब्त उम्रों का फर्क नहीं देखा करती। सुना नहीं, अभी अमरीका में बीस साल के एक लड़के ने पैंतालीस साल के औरत से शादी की है?" सतीश ने हंस कर जवाब दिया।

"तो तुमने शादी का पक्का फैसला कर लिया है?" राज ने उसे गौर से देखते हुए पूछा।

"बिल्कुल सॉलिड फैसला।"

"अफसोस सतीश! मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि तुम तबाही की खाई की तरफ भाग रहे हो....।'' राज ने हाथ मलते हुए कहा-"यकीन करो, मैं इस शादी के सख्त खिलाफ हूं। मैं ज्योति को बिल्कुल पसन्द नहीं करता। तुम्हारी पत्नी के रूप में तो मैं उसे बिल्कुल भी बर्दाशत नहीं कर सकता।"

"तुम किसी गलतफहमी का शिकार हो गए हो राज ।” सतीश ने उठ कर राज का हाथ थाम लिया और सोफे पर ला बिठाया, फिर खुद भी उसके करीब बैठते हुए बोला, "तुम फिक्र न करो। जब ज्योति तुम्हारी भाभी बन जाएगी तो मैं तमाम गलतफहमियां दूर करवा दूंगा।"

"मेरी गलतफहमी दूर नहीं हो सकती, क्योंकि यह गलत फहमी नहीं हकीकत है, जो मुझे मजबूर कर रही है कि मैं तुम्हें इस शादी से रोकू।"

"लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता राज।' सतीश ने गहन गम्भीर लहजे में कहा, "मैं ज्योति को वचन दे चुका हूं। तुम मेरे दोस्त हो। तुम अगर हुकम करो तो मैं शादी से मना कर सकता हूं। लेकिन मुझे यकीन है कि तुम मुझे बचन-भंग करने वाले अपराधी के रूप में उस हसीन औरत के सामने शार्मिदा नहीं होने दोगे।"

वो कुछ सोच कर फिर आगे बोला

"चलो, तुम्हारे कहने पर मैं उसे ख़तरनाक भी मान लेता हूं राज, लेकिन तुम्हारी कसम कि ज्योति मेरे दिल और दिमाग पर बुरी तरह छा गई है। अब उसका ख्याल दिल से निकाल देना नामुमकिन है। उसकी निगाहों में न जाने क्या सम्मोहन है....कि वो थोड़े से अर्से में ही मेरी रंग-रंग में रच-बस गई है। मुझे याद नहीं कि जिन्दगी में कभी किसी औरत या लड़की ने मेरे ऊपर ऐसा असर डाला हो। राज, भगवान के लिए मेरी हालत पर दया करो और खुशी-खुशी मुझे शादी करने दो। तुमने मुझे शादी ने करने दी तो मैं उससे भी खौफनाक हालात का शिकार हो जाऊंगा, जिसका कि तुम्हें खौफ सता रहा है।" अब राज इस हालात में ने कुछ कह सकता था, न कर सकता था। उसे सतीश की जिद माननी पड़ी। राज ने सोचा था कि अगर ज्योति इस तरह सतीश के होशो-हवास पर छा चुकी है तो फिर ज्योति इस तरह सतीश के होशो-हवास पा छा चुकी है तो फिर ज्योति की जुदाई भी सतीश के लिए उतनी ही खतरनाक साबित होगी। वो पागल भी हो सकता था। हो सकता है सतीश के इन्कार से ज्योति ही उसकी दुश्मन बन जाए....और उसे कोई नुकसान पहुंचा दे।
 
यह ख्याल राज के जेहन में इसलिए आया, क्योंकि अब वो ज्योति की असाधारण शक्तियों का कायल होता जा रहा था। बल्कि अब वो उसे एक हसीन जादूगरनी समझने लगा था। जिसके चंगुल में फंस जाने के बाद किसी का भी सही सलामत निकल आना नामुमकिन था। राज ने कहा

"अच्छा सतीश....अगर तुम जिद पर ही अड़े हुए हो तो मैं तुम्हें मना नहीं करूंगा। भगवान करे तुम्हारी शादी कामयाब रहे....।"

"थैक्यू....थैक्यू मेरे दोस्त ।” सतीश खुश होकर बोला, "यकीन करो, ज्योति से मिलने के बाद तुम्हारी सारी आशंकाएं और सन्देह दूर हो जाएंगे। वो बहुत अच्छी और नेक औरत है।"

ज्योति का जादू उसके सिर चढ़कर बोल रहा था।

"भगवान करे ऐसा ही हो।" राज ने कहा और उठ कर चला आया।

उस बातचीत के ठीक एक महीने के बाद सतीश और ज्योति की शादी हो गई। शादी के बाद राज को ज्योति से जबरन मिलना पड़ा, क्योंकि सतीश उनका करीबी दोस्त था। और ज्योति सबसे करीबी दोस्त की पत्नी।यानि राज की भाभी।

तीन मुलाकातों के बाद ही ज्योति राज से भी काफी घुल-मिल गई थी। राज को लगा कि ज्योति आदत और शालीनता की बुरी नहीं है। फिर भी न जाने क्यों राज उससे सहमा-सहमा रहता था।

और वो नेकलेस, जो सांप जैसा चांदी का था, अब भी काफी गर्दन में लिपटा रहता था, जिसे देखकर राज की आत्मा कांप जाती थी।

बाद में राज को सतीश से पता चला कि ज्योति उस नेकलेस को कभी अपनी गर्दन से अलग नहीं करती। सोते-जागते हर वक्त उसे पहने रहती थी।

वक्त गुजरता रहा। ज्योति अपनी व्यवहार कुशलता से सबको खुश और संतुष्ट किए हुए थी। राज की आशकाएं भी निर्मूल सिद्ध होने लगीं, जो उसके मन में कुण्डली मारे बैठी रहती थीं और बक्त-बेवक्त फन उठा लेती थीं। ज्योति एक बड़ी शिष्ट और शालीन पत्नी साबित हो रही थी।

उसी तरह दो महीने गुजर गए। इन दो महीनों में ज्योति ने राज को किसी किस्म की शिकायत का मौका नहीं दिया था, वो राज से इस तरह मिलती थी, जैसे वो वाईक उनके परिवार का कोई करीबी परिजन हो।

मध्यम कद की यह हसीन औरत, जिसे किस्मत ने राज की भाभी बना दिया था, बड़ी खुशमिजाज और मिलनसार औरत थी। उसकी बातों में कुछ ऐसी मिठास होती थी कि एक बार उससे मिलने वाला उससे दोबारा मिलने की इच्छा जरूर कराता था।

खखन

खनन

इतने दिनों तक ज्योति से मिलने-जुलने और उसके व्यवहार में कोई असामान्य बात न देखकर अब राज का खौफ बिल्कुल खत्म हो गया था और उसे यकीन हो चला था कि ज्योति के पूर्व पति वाकई स्वभाविक मौत मरे थे। क्योंकि राज की समझ में ऐसे मीठे स्वभाव की औरत किसी को कत्ल नहीं कर सकती थी।

अब राज को दिली अफसोस होता था कि उसने खामखां एक भी और सचचित्र औरत के बारे में न जाने क्या-क्या राय कायम कर ली थी। कभी-कभी वो सोचता कि अगर ज्योति को मालूम हो जाए कि उसने ज्योति से सतीश की शादी में क्या-क्या अड़चनें डालने की कोशिश की थीं तो क्या ज्योति के बारे में अपने दोस्त से क्या-क्या बातें की थीं तो क्या ज्योति तब भी उसकी इतनी ही इज्जत कर पाएगी जैसी कि अब कर रही है?

लेकिन उसे इत्मीनान हुआ जब सतीश ने इस बारे में ज्योति से कभी जिक्र तक नहीं किया था। एक तरह से अब उसे ज्योति पर पूरा विश्वास हो गया था।
 
लेकिन उसी दौरान एक अजीब सी घटना घट गई और राज ने बड़ी मुश्किल से अपने दिलो-दिमाग से उतार फेंका था-फिर वही तेजी और सख्ती के साथ उस पर सवार हो गया। उसके मुर्दा हो चुके सन्देह फिर से जी उठे। उस दिन ज्योति फिर से उसे एक भोली और मासूम औरत के बजाय पांच-पांच पतियों को खा जाने वाली एक भयानक डायन दिखाई देने लगी थी। सतीश की एक छोटी-सी बात ने उसकी खुशफहमियों की इमारत को धराशाही कर दिया था।

सतीश के अनुसार यह बात महज इत्तेफाक थी और मामूली भी। लेकिन यही मामूली सी बात राज के लिये किसी जुल्म से कम साबित नहीं हुई थी।

उसने राज को बताया कि एक रात अचानक सतीश की आंख खुल गई थी, ज्योति बैड पर उसकी बगल में बेसुध सो रही थी और उसके खुले हुए स्वच्छ सीने पर वही....गर्दन वाला नेकलेस कुण्डली मारे बैठा हुआ था। दूर से उसे ऐसा लगा था जैसे नेकलेस का वो सिरा, जहां सांप का फन था, वहां कोई गठरी सी बनी चीज हिल रही हो। बिल्कुल इस तरह जैसे वो चांदी का सांप जिन्दा हो गया और उसकी दोमुंही जुबान लपलपा रही हो। लेकिन जब सतीश ने करीब जाकर देखा तो नेकलेस बिल्कुल ठीक था, वो हिलने वाली चीज गायब थी।

बस इतनी सी बात थी जिसन राज का वहम बढ़ा दिया था। जबकि सतीश को यकीन था कि वो उसकी नजरों का धोखा था।

जिसे सतीश मामूली बात समझ रहा था, वही राज के लिए एक खौफनाक सवाल बन गई थी। राज सोचता रहा था कि आखिर सतीश ने उस चांदी के फन पर क्या चीज हरकत करते देखी ली थी? क्या वो वाकई उसकी नजरों का धोखा था या उस चांदी के सांप में कोई भयानक रहस्य हुपा हुआ था?

सतीश ने यह बात राज को सिर्फ इसलिए बताई थी, क्योंकि उसे मालूम थी, क्योंकि उसे मालूम था कि राज ज्योति के उस सांप जैसे नेकलेस से बहुत खौफ खाता है। यह कह कर उसने राज की हिम्मत और हौसले का मजाक उड़ाया था, ताकि राज उस नेकलेस से और ज्यादा डरने लगे और सतीश उसके डर से मजे ले सके।

हुआ भी ऐसा ही था, उस बात से राज बहुत डर गया था।

लेकिन उसने अपना खौफ और दहशत सतीश पर प्रकट नहीं किया था। वो बात को टाल गया था, चुप रह कर।

उसके बाद उसने मौका पाकर सतीश से पूछा

" सतीश, तुमने कभी ज्योति से यह भी पूछा था कि वो चांदी का वह नेकलेस हर वक्त क्यों पहने रहती हैं?" सतीश ने हंसते हुए कहा था

"पूछा था मैंने। उसने जवाब दिया था कि वो नेकलेस उसकी मां ने उसे मरते हुए दिया था, इसलिए वो नेकलेस को जान से प्यारा समझती है और खो जाने के खौफ से उसे कभी नहीं उतारती। उसकी मां को किसी महापुरूष ने वहा तोहफा दिया था, जो दबर्दस्त गुप्त और ऊपरी ताकतों के मालिक थे।"

राज उसका जवाब सुनकर खामोश रह गया था और बात आई-गई हो गई थी। उस घटनाओं को भी कई दिन गुजर गए।

उसके बाद एक महीने तक कोई सी साधारण या असाधारण घटना नहीं घटी। लेकिन राज के सन्देह खत्म नहीं हुए। लेकिन न जाने क्यों ज्योति और सतीश का ख्याल आते ही राज के दिल में खतरे की घंटियां बजने लगती थीं।

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वक्त का पहिया अपने नियम से घूम रहा था। न जाने क्यों इन दिनों राज पर एक अजीब सी उकताहट और आदमी सी छाई रहती थी।

हालांकि सतीश जैसे बच्चे दोस्त का साथ, ज्योति जैसी हसीन भाभी की रेशमी मुस्कराहटें और क्रिस्टल के गिलासों में भरी सुनहरी स्कॉच उसे उपलब्ध रहते थे। लेकिन उसका मन बेचैन रहता था।

उस स्थिति से तंग आकर राज ने सोचा कि वो कुछ दिनों के लिए कहीं दूर चला जाए। जहां की हर चीज और हर इन्सान उसके लिए अजनबी हो। जहां उसे पूर्ण शांति मिल सके।

लेकिन किसी जगह का चुनाव भी तो उसके लिए मुश्किल हो रहा था, वो किसी होटल या पब में बैठा शराब पीता रहता। यह समस्या भी राज की जल्दी ही हल हो गई। एक दिन जब वो कमरे से निकल कर किसी शराबखाने में जाने का प्रोग्राम बना ही रहा था कि डॉक्टर गुप्ता की फोन कॉल मिली उसे। राज ने बढ़कर रिसीवर उठाया

"हैलो, डॉक्टर राज!"

"राज, मैं नरेन्द्र गुप्ता बोल रहा हूं। क्या तुम एक अर्ध सरकारी खोज अभियान में मिस्र जाना चाहोगे।" डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता ने संक्षेप में कह दिया।

"मिस्र?" राज ने हैरत और खुशी से कहा, "गुप्ता जी, मैं मिस्र जरूर जाऊंगा। तुम मेरा इन्तजार करो, मैं अभी तुम्हारे पास पहुंच रहा हूं।"

राज रिसीवर रख कर नेहरू अस्पताल की तरफ पैदल ही चल पड़ा था। इतने दिनों से कहीं जाने की सोच रहा था, लेकिन कहां जाए, यह फैसला नहीं कर पा रहा था। अब अचानक ही उसे मिस्र जाने की दावत मिल रही थी, वो भी सरकारी खर्च पर।

राज की खुशी की हद न रही और वो अपने दिल में एक नया उत्साह महसूस करने लगा। जीवन की उमंग, जो इन दिनों हालात ने उससे छीन ली थी।

चलते-चलते उसकी कल्पना मिस्र की रहस्यमय और आकर्षक सरजमीन पर उड़ान भरने लगी। भव्य पिरामिड उसकी आंखों के सामने नाचने लगे और मिस्र के बारे में पढ़ी हुई कहानियों और देखी हुई फिल्मों की यादें ताजा होने लगीं। हजारों साल पहले के बादशाहों और मलिकाओं की ममियां उसके दिमाग में तैरने लगीं।

महारेगिस्तान के तपते हुए पिंड और ठण्डी रातें। मिस्र जैसे प्राचीन देश के ख्याल ने उसकी तमाम उदासियां खत्म कर दी और वो अपने आप को शांत महसूस करने लगा। उसके दिल की बेचैनी भी दूर हो गई।
 
इन्हीं ख्यालों में ही रास्ता कट गया और राज नेहरू अस्पताल पहुंच गया। डॉक्टर गुप्ता अपनी गम्भीर मुस्कराहट के साथ उसका प्रतीक्षक था।

"हेलो राज, आ गए। बैठो, कहो, क्या हाल-चाल है? अच्छे हो गए हैं।" नीलकण्इठ एक कुर्सी खींच कर बैठ गया।

"बहुत उत्सुक हो मिस्र जाने के लिए?" डॉक्टर गुप्ता ने गम्भीर मुस्कराहट के साथ पूछा।

"हां, आजकल मूड कुछ उखड़ गया है यहां से। मैं कहीं दूर जाने के लिए कई दिनों से सोच रहा था....कि तुमने मेरी बहुत बड़ी उलझन आसान कर दी है।"

डॉक्टर गुप्ता जवाब में मुस्कराया और बोला

"प्रोफेसर एम. के. दुर्रानी से कभी मिले हो तुम?"

"वही तो नहीं जो प्राचीन लिपियों को पढ़ने के माहिर है?" राज ने पूछा, "और जिनका घर पुरानी और दुर्लभ चीजों का अजायबघर लगता है।"

"वही!" डॉक्टर गुप्ता ने सहमति से सिर हिलाया।

"एक दो बार सरसरी सी मुलाकात हुई है....और उससे ज्यादा वाकफियत नहीं है।" राज ने जवाब दिया।

"वो कल मेरे पास आए थे। कुछ प्राचीन ऐतिहासिक तहकीकात के लिए वो मिस्र जा रहे हैं। इस मिशन में दर्शनिक, डॉक्टर, फिजिशियन, साइंटिस्ट सभी तरह के लोग शामिल हैं। वो मेरे पास भी इसीलिए पधारे थे कि मैं उनके साथ मिस्र चलूं। लेकिन तुम तो जानते हो कि मुझे इस अस्पताल से मरने तक की फुसत नहीं होती, इसलिए मैंने उनसे क्षमा मांग ली थी, लेकिन उन्हें अपने बदले एक दूसरा डॉक्टर देने की पेशकश की थी। इन्होंने जब तुम्हारा नाम सुना था तो खुश हो गए थे और जाते-जाते कह गए थे कि कैसे भी हो, मैं तुम्हें उस मिशन के लिए तैयार कर लूं। जब तुम तैयार हो तो मैं उन्हें फोन कर देता हूं।"

प्रोफेसर दुर्रानी से राज की एक-दो मुलाकातों हो चुकी थीं, इसलिए उसने बड़ तपाक से राज का स्वागत किया और मिशन पर जाने के लिए राज को धन्यवाद दिया।

काफी देर तक वो दोनों बैठे मिस्र जाने के बारे में प्रोग्राम बनाते रहे और दूसरे विषयों पर चर्चा करते रहे। प्रोफेसर ने राज से पूरा समझा दिया और यह भी कह दिया कि मिशन में अपने साथ क्या ले जाना चाहिए। सारी बातें तय हो जाने के बाद राज प्रोफेसर से विदा होकर घर वापिस लौट आया।

दूसरे दिन जब राज ने सतीश और ज्योति को बताया कि वो पन्द्रह दिन के अन्दर-अन्दर मिस्र जा रहा है तो वो दोनों हैरान रह गए थे।

"यह अचानक क्या दौरा पड़ा है तुम्हें?" सतीश ने पूछा ।

"एक अन्वेषक पार्टी के साथ जा रहा हूं।” राज ने बताया-"दरअसल आजकल मैं कुछ परेशान सा था। मैं खुद भी कहीं बाहर जाने की सोच रहा था....कि अचानक यह सुनहरी मौका मिल गया।"

"वापसी कब तक होगी?' ज्योति ने चिंतित लहजे में पूछा था।

"ज्यादा से ज्यादा पांच छ: महीने लगेंगे।"

"छ: महीने....हे भगवान! तुम छ: महीने बाद वापिस आआगे?" ज्योति के कुछ ज्यादा ही फिक्रमंदी से कहा-"अचानक मिस्र जाने का फैसला कर लिया? भले मानुष, तुम्हारी तबीयत घबरा रही थी तो भारत में ही कहीं शिमला....श्रीनगर जाने का प्रोग्राम बना लो-भला उस रेगिस्तानी देश में क्या रखा है जी बहलाने को?"

"हां, अगर किसी हिल स्टेशन पर जाने का प्रोग्नाम बनाते तो हम भी तुम्हारे साथ चलते । अब इतने लम्बे अर्से की जुदाई खामखां सहन करनी होगी.....।"

"इसमें दिक्कत ही क्या है? अरे भाई, मैं छ: महीने बाद तो वापस आ ही जाऊंगा।"

"आपके लिए चाहे कुछ भी न हो, लेकिन मेरे लिए तो है न!"

ज्योति ने जल्दी से कहा, "मेरी तो हमेशा से आदत रही है कि जिस शख्स से मैं जरा भी घुल-मिल जाती हूं, उसकी जरा सी जुदाई से बेचैन हो जाती हूं।"
 
"अच्छा!" राज ने कहा और ज्योति की जादूभरी आंखों में झांका । वो दरअसल इस तरह उसकी आंखों के जरिये उसके दिल का हाल मालूम करना चाहता था। क्या वो वाकई ये शब्द ऊपरी दिल से कह रही है? या फिर वाकई उसे अपने साथियों से बिछड़ने पर दुख होता था?

राज ने सोचा-अगर यह बात है तो फिर उसे अपने पांच पतियों से बिछड़ने का दुख क्यों नहीं होता, जो इसके जीवन-साथी थे और जिनसे कभी न कभी इसने मोहब्बत की थी?

लेकिन राज के इन सवालों के जवाब ज्योति की जादूभरी आंखों में कहीं नहीं थे। उनकी आंखों में तो तेज चमक थी, जैसे बिजलियां कौंध रही हों।

"क्यों, क्या आपको हैरानी है मेरे इस स्वभाव पर?" ज्योति ने राज को लगातार अपनी तरफ घूरते हुए पाकर, उसने सामान्य लहजे में पूछा।

"नहीं, हैरानी की तो कोई बात नहीं। आप जैसी हसीन और शालीन भाभी का स्नेह पाकर हैरानी क्यों होगी? यह तो मेरी खुशकिस्मती है।" राज ने जवाब दिया।

ज्योति मुस्कराई और उसकी चुम्बकीय आंखों की चमक कुछ और बढ़ गई। राज सोचने लगा कि ज्योति की आंखों में आम हसीन औरतों से बहुत ज्यादा चमक क्यों मौजूद है? कहीं वो वाकई किस्से-कहानियों जैसी कोई जादूगरनी तो नहीं? साथ ही वो ज्योति के चेहरे पर दुख के भाव भी देख रहा था और सोच रहा था कि ये भाव क्या उसकी जुदाई की वजह से थे?

बहुत देर तक राज और ज्योति उसी विषय में बातें करते रहे और सतीश उसी तरह गमसूम बैठ रहा। चलते वक्त सतीश राज के साथ कोठी के बाहर उसे छोड़ने आया। दरवाजे पर जब राज हाथ मिला कर विदा होने लगा तो सतीश ने अप्रिय लहजे में कहा

"राज, मुझे तुम्हारी इतनी लम्बी जुदाई जरा भी पन्सद नहीं है। कितनी अच्छा हो, अगर तुम मिस्र जाने का इरादा कैंसिल कर दो....।"

"तुम इतने फिक्रमंद क्यों हो रहे हो यार? मैं कोई हमेशा के लिए थोड़े ही जा रहा हूं। पांच-छ: महीने तो देखते ही देखते गुजर जाएंगे।" राज ने उसे तसल्ली दी-"और अब तो तुम्हारा दिल बहलाने के लिए एक खूबसूरत गुडियां भी मौजूद है। मुझे यकीन दिल बहलाने के लिए एक खूबसूरत गुड़िया भी मौजूद है। मुझे यकीन है कि ज्योति तुम्हें मेरा ख्याल भी न आने देगी।”

सतीश कंधे हिला कर फीकी सी हंसी हंसा और बोला

"कुछ भी हो, मुझे तुम्हारा अचानक चले जाना अच्छा नहीं लग रहा। लेकिन क्योंकि तुम अब प्रोग्राम बना ही चुके हो तो ज्यादा जोर नहीं दूंगा। खैर....कल तो आओगे न?'

"जरूर, यह भी कोई पूछने की बात है!"

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