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Fantasy मोहिनी

छोटी माता अभी मरी नहीं थी, परंतु ली ने बताया कि वह कुछ ही देर की मेहमान हैं। अब उस पर कोई दवा भी कारगर नहीं हो सकती। फौजियों ने उसे बहुत यातनाएँ दी थी। मैं छोटी माता के पास झुककर बैठ गया।

वह बेहोश थी। ली के प्रयासों से वह होश में आयी। इस बीच मैं ली से भी बातें करता रहा। वह मुझे अब भी चमत्कारी व्यक्ति समझता था। उसके लिए यह भी कम हैरत की बात न थी कि मैं यामदरंग की खानकाह से ख़ज़ाने के साथ लौट रहा हूँ और मुझे इसका नेतृत्व सौंपा गया है।

मैं उसे विश्वास दिलाता रहा कि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ। ली ने मुझे यह भी बताया कि कैम्प से मेरे फ़रार होने के बाद क्या हुआ। जिस सैनिक को मेरी पोशाक पहनाकर ली ने खेमे में छोड़ा था उसका चेहरा इस कदर बिगाड़ दिया था कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था। आग के कारण वह और भी झुलस गया था। लेकिन कुंग को संदेह था कि मरने वाला क़ैदी नहीं था। उसने मृतक की डॉक्टरी जाँच और चीर-फाड़ करवायी। यह काम भी ली ने ही किया था। चूँकि ली ने क़ैदी का डॉक्टरी मुआइना भी किया था इसलिए वह आसानी से जान सकता था कि मृतक कौन हो सकता है, क़ैदी या कोई और।

एक चीनी सैनिक कम था इसलिए यह शक़ हो गया था। परंतु ली ने अपनी रिपोर्ट देने में लगभग पाँच दिन लिए। उसने बहाना बनाया था कि उसके पास पोस्टमॉर्टम का जरूरी सामान नहीं है और उसका पोस्टमॉर्टम पीकिंग में हो सकता है। परंतु लाश पीकिंग ले जाने में तो बड़ा विलम्ब हो जाता। अलबत्ता ल्हासा से वह सारा सामान मँगाया गया जिसकी ली ने जरूरत बतायी थी। इसी में तीन दिन निकल गये। उसके बाद ली ने चार दिन अपनी तरफ से लगा दिए। उसे यकीन था कि इतने दिन मेरी फरारी के लिए पर्याप्त होंगे।

क्योंकि वह ग़लत रिपोर्ट नहीं देना चाहता था; अन्यथा बाद में कभी भी भेद खुलने पर स्वयं ली का जीवन संकट में पड़ जाता। उसने सही रिपोर्ट दी और तभी से कुंग उसके प्रति संदिग्ध था। उसका ख्याल था कि डॉक्टर ली ने जानबूझकर विलंब किया था। लेकिन इसका कोई कारण उसके पास नहीं था, और न कोई प्रमाण।

और अब यह घटना कुंग को और भी संदिग्ध कर सकती थी। वह ठीक ही कहता था। उसे जख्मी करके वहाँ बाँध देना लाज़िमी था।

“मैं उन्हें अपने हिसाब से बयान दे दूँगा। मैं उन्हें बताऊँगा कि हमलावर कुछ तिब्बती थे और छोटी माता को छुड़ाने आये थे। वे छोटी माता को जीवित देखना चाहते थे। इसलिए जब मैंने उन्हें बताया कि मैं डॉक्टर हूँ तो उन्होंने इसलिए मुझे छोड़ दिया ताकि मैं छोटी माता को होश में ला सकूँ। उन्होंने मुझसे वादा किया था कि मैंने उसे बचा लिया तो मुझे जीवित छोड़ देंगे और मैंने छोटी माता का उपचार करके उसे जीवित रखने में सफलता प्राप्त की थी। अब तुम्हें सिर्फ यह करना होगा राज ठाकुर कि छोटी माता का शव कहीं दफना दो ताकि मेरा यह बयान सही साबित हो सके।” ली ने मुस्कुराकर कहा।

छोटी माता को जब होश आया तो उस वक़्त रंग लंग लौट चुका था। कल्पना भी उसके साथ थी। छोटी माता कल्पना को देखते ही उसकी बाँहों में टूट सी पड़ी और सुबक-सुबककर बताती रही कि उस पर क्या-क्या जुल्म तोड़े गये थे।

कल्पना भी उससे लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। वह दीवानी सी बार-बार उसके गालों का बोसा ले रही थी। और फिर छोटी माता को अंतिम हिचकी लेने में अधिक समय नहीं लगा।

हमने वैसा ही किया जैसा कि ली चाहता था। छोटी माता का पार्थिव शरीर उस जगह से कुछ दूर बर्फ़ में दफना दिया गया। बर्फ़ का वह टीला एक यादगार टीला था, जहाँ उस महान स्त्री की आत्मा सो रही थी। जिसने अंतिम दम तक खानकाह की वफादारी का सबूत दिया था।

ली को जख्मी करके बाँधकर वहीं डाल दिया गया। ली ने हमें यह भी बताया कि हमें किस-किस जगह चीनियों का खतरा है और बच निकलने के लिए किस रास्ते का प्रयोग करना होगा।

उसके बाद ली को अलविदा कहकर हम चल पड़े।
 
आठ रोज बीत चुके थे और मुझे अपने साथियों के बारे में कुछ नहीं मालूम था कि वे जिंदा हैं या मुर्दा! ली मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे पाया था। वह उसी दिन वहाँ पहुँचा था और उसे सीधा इस जगह भेजा गया था। छोटी माता को भी कुछ मालूम न था। वह उस जगह से निकल भागने में क़ामयाब हो गयी थी, जहाँ जंग हो रही थी। प्रताप ने सभी स्त्रियों को वहाँ से भाग जाने के लिए कहा था। बाकी स्त्रियाँ भी भागी थीं। परंतु सब अलग-अलग दिशाओं में भागी थीं। उनके साथ बच्चे भी थे। उस बात से ऐसा अंदेशा होता था कि वे सब चीनी सैनिकों से मुठभेड़ करते मारे गये थे। यदि उनमें से कोई क़ैद होता तो ली को अवश्य ही पता होता।

लेकिन मैं ख़ुद ऐसे आलम में था कि जिंदगी और मौत बेमानी महसूस होने लगी थी।

हम शेष रात भी चलते रहे। मैंने जख्मी रंग लंग और कल्पना को घोड़े पर बिठा दिया था। रंग लंग चूँकि ब्योनेट से घायल हुआ था इसलिए जख्म में जहर फैलने का अंदेशा था। आमतौर पर वार के समय जो ब्योनेट राइफल पर प्रयोग होता है वह जहर बुझा होता है। ली ने मुझसे यह बात कही थी और एक इंजेक्शन भी रंग लंग को लगाया था। परंतु वह संदिग्ध था। उसने मुझसे कहा था कि यदि उसे कष्ट हो तो उसका बाजू काट दूँ, अन्यथा जहर सारे शरीर में फैल जाएगा।

मैं ख़ुद चीनियों के खच्चर पर सवार था। हम थके हुए थे, परंतु रुककर आराम नहीं कर सकते थे।

भोर के झुटपुटे में हम एक ऐसे चट्टानी क्षेत्र से गुजरे जहाँ चारों तरफ बेशुमार चीनी खेमे लगे हुए थे और आग के अलाव अब भी रोशन थे। ठिठुरती ठंड में पहरेदारों के पास इससे उपयुक्त साधन कोई नहीं था। वहाँ छोटे आकार के चंद चीनी विमान भी खड़े थे।

रंग लंग के सुझाव पर मैंने कपड़ों को फाड़कर छोटी गद्दियाँ बनाकर खच्चर और घोड़ों के खुरों पर बाँध दी ताकि चापें न सुनायी दें।

और सुबह की धुंध छँटने से पहले हम उनकी नज़रों से बचकर आगे निकल गये। इसके लिए हमने ली का बताया रास्ता ही चुना था।जब हम काफी फासले पर आ गये तो मेरी आँखें बंद होने लगीं। मैं खच्चर की पुश्त पर ही ऊँघने लगा। एक बार मैं उसकी पीठ से लुढ़क भी गया। रंग लंग ने मुझे झिंझोड़ा परंतु नींद मुझ पर बुरी तरह हावी थी।

जब मैं जागा तो सूरज ख़ासा ऊपर चढ़ चुका था। मैंने खच्चर पर सवार होने की कोशिश की परंतु बेसुध होकर फिर नीचे गिर पड़ा। जब कुछ देर बाद मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि मैं एक झुकी हुई चट्टान के साये में लेटा हुआ हूँ।रंग लंग और कल्पना भी दूसरी तरफ सोये पड़े थे।

हमारा वहाँ अधिक देर तक ठहरना ख़तरे से खाली नहीं था। लेकिन एक-एक जोड़ दुख रहा था। मैंने उठना चाहा, परंतु हिम्मत जवाब दे गयी। मैं एक बार फिर नींद के आगोश में चला गया।

दूसरी तरफ रंग लंग भी बेहोशी की हालत में पड़ा कराह रहा था। अलबत्ता कल्पना ने हैरतअंगेज तरीके से बर्दाश्त का सबूत दिया था।

हमने दूसरा दिन भी उसी चट्टान के नीचे गुजार दिया। यदा कदा मैं रंग लंग के बाजू पर मरहम-पट्टी करता रहता था। ऐसा मालूम पड़ता था कि उसमें जहर भर गया है।

हमने जिन चीनी फौजियों को मारा था उनका सामान अपने साथ समेट लाये थे। अतः फिलहाल हमारे पास खुराक का पूरा भंडार था।

तीसरे रोज हम सुबह-सवेरे वहाँ से निकल पड़े। रंग लंग ने बताया कि वहाँ से कुछ फासले पर एक गार है, जहाँ एक पवित्र लामा रहा करता था। वह क्षेत्र ‘हवाई राक्षस के शरणस्थल’ के नाम से जाना जाता था। स्थानीय लोग उस क्षेत्र को बहुत खतरनाक समझते थे। अतः काफिले उससे कतराकर गुजरते थे। परंतु ली ने हमें उसी रास्ते से जाने का सुझाव दिया था।

हमने उसी तरफ का रुख किया। अगले पड़ाव के लिए उससे बेहतर जगह नहीं हो सकती थी। उसके अलावा सबसे हर्ष की बात यह थी कि वहाँ से दर्रा पार करने के बाद वादी चम्बी का रास्ता सिर्फ छः घंटे का रह जाता था।

हम चलते रहे। आख़िर बिना रुके हम ‘हवाई राक्षस के शरणस्थल’ तक पहुँच गये।

“राज! हवाई राक्षस गुस्से में है।” कल्पना ने वहाँ पहुँचकर आसमान की तरफ देखते हुए कहा।

वहाँ हवा जब चट्टानों से टकराती थी तो यूँ महसूस होता था जैसे एक साथ सैकड़ों दरिन्दे चिंघाड़ रहे हों। शायद इसी कारण इस जगह को ‘हवाई राक्षस का शरणस्थल’ कहा जाता था।

“हवाई राक्षस हमेशा गुस्से में रहते हैं।” रंग लंग ने आँखें खोलते हुए कहा। “लेकिन वह पवित्र बुजुर्ग से खौफ़ खाते हैं। उनकी आत्मा यहाँ मंडराती रहती है। देवी माता भी उन्हें वश में कर सकती है।”

कल्पना ने रंग लंग का वाक्य सुना तो उठी और चट्टान की आड़ से निकलकर खुले आसमान के नीचे पहुँचकर जमीन पर दंडवत हो गयी। वह होंठों ही होंठों में कोई दुआ पढ़ रही थी। थोड़ी देर बाद वह उठी और ख़ामोशी से मेरे करीब आ गयी।

पवित्र बुजुर्ग का स्वर्गवास केवल दो साल पहले हुआ था। गार में उनके प्रयोग की बहुत सी चीज़ें अब भी मौजूद थीं। तेल भी काफी मात्रा में था। मैंने दिया जला दिया और चाय बनाने के लिए बाहर से बर्फ़ उठा लाया।

चाय पीने के बाद रंग लंग की हालत क्षण-प्रतिक्षण बिगड़ने लगी और उस पर बार-बार बेहोशी के दौरे पड़ रहे थे। अँधेरा फैलते ही हम गार से बाहर निकले और दर्रे की तरफ जाने वाले रास्ते पर बढ़ चले।

छः घंटे के अन्दर हम दर्रे के करीब पहुँच गये, किन्तु हमें उलटे पैर वापस आना पड़ा क्योंकि दर्रे के रास्ते पर हर तरफ चीनी फौजियों के खेमे नज़र आ रहे थे।

अब एक बार फिर हम पवित्र बुजुर्ग की गार में बैठे हुए थे और चीनी फौजियों से बचकर निकलने की तरकीब सोच रहे थे।

रंग लंग लगातार डेढ़ दिन तक सोता रहा और जो दवा ली ने हमें दी थी, वह समाप्त हो चुकी थी। उसकी तकलीफ बढ़ती जा रही थी। मुझे ली की बात याद थी कि जरूरत पड़ने पर रंग लंग का हाथ काट दूँ, अन्यथा जहर सारे शरीर में फैल जायेगा।

तकलीफ के बावजूद रंग लंग को पहाड़ों से उतरकर एक निकटवर्ती गाँव में जाना पड़ा। यह मालूम करना जरूरी था कि चीनी फ़ौजी कब तक वहाँ कयाम करेंगे। उसकी अनुपस्थिति में मैं बाहर निकलकर सूखी लकड़ियाँ जमा करता रहा। रंग लंग सुबह के वक़्त वापस आया। उसके पास कोई अच्छी ख़बर नहीं थी। स्थानीय लोग चीनियों को पसंद करते थे।
 
“क्या वे जानते हैं कि चीनी कब तक वापस जायेंगे ?” मैंने पूछा।

“उनका कहना है कि वे काफी समय तक वहाँ रहेंगे।”

“उनके ख्याल से बर्फबारी कब शुरू होगी ?”

“शायद दस रोज बाद।”

हम दस रोज तक उस गार में ही पड़े रहे। मैं रोज़ाना बाहर जाकर लकड़ियाँ जमा करता था और कल्पना खाना पकाया करती। रंग लंग पहले से अधिक कमज़ोर और चिड़चिड़ा हो गया था। गाँव से वह अपने लिए कुछ जड़ी-बूटियाँ ले आया था और उनका सेवन कर रहा था, परंतु हालत सुधरने की बजाय बिगड़ ही रही थी।

वह अब अपना बाजू छूने भी नहीं देता था। ख़ुद ही एक तरफ बैठकर जख्म धो लेता। उसे पेट भर खाना भी नहीं मिलता था क्योंकि खुराक का भंडार अब खत्म होने को था।

दसवें रोज बर्फबारी शुरू हो गयी।

“हमें आज यहाँ से निकल जाना चाहिए।” रंग लंग ने बाहर निकलकर आसमान की तरफ देखते हुए कहा। “हमारे लिए आख़िरी मौका होगा।”

मैं उससे सहमत था। हमने रवानगी से पहले पेट भर खाना खाया और खुराक का स्टॉक समाप्त करके आधी रात को गार से बाहर निकल पड़े। जब हम दर्रे के करीब पहुँचे तो बर्फबारी का जोर और भी बढ़ गया था। हमारे लिए चंद मिनट चलना भी कठिन हो गया।

मेरे तो हौसले पस्त हो रहे थे। मैंने भर्राई हुई आवाज़ में रंग लंग से कहा–“अब हम आगे नहीं बढ़ सकते। हम फिर कभी कोशिश करेंगे।”

“नहीं साहब!” रंग लंग चीख उठा। “बर्फबारी खत्म हो जायेगी। जब हम दर्रे में दाख़िल होंगे तो रास्ता इतना कठिन न होगा।”

लेकिन जब हम दर्रे में पहुँचे तो चीनी फ़ौजी पहले की तरह रास्ता घेरे बैठे थे। हमें एक बार फिर वापस लौटना पड़ा। हम तीनों बहुत उदास थे। बर्फपोश पहाड़ हमें डसने को दौड़ रहे थे। वापसी के सफर में कल्पना घोड़े की पीठ पर सोती रही।

जब हम आधा रास्ता तय कर चुके तो रंग लंग ने मुझसे कहा–“साहब! एक बात याद रखें अगर देवी माता को किसी नदी की जरूरत महसूस हो तो गाँव के करीब एक नदी बहती है। उस पर बर्फ़ की मोटी तहें जमी हुई हैं। लेकिन नीचे पानी बह रहा है। आगे जाकर यह नदी सांगपो नदी में मिल जाती है।”

“उसे नदी की आवश्यकता क्यों पड़ेगी ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“आप नहीं जानते।” रंग लंग ने ठंडी साँस भरते हुए जवाब दिया। “लेकिन मैंने जो कुछ कहा है उसे कदापि न भूलें।”

अगले रोज गार के निकट से एक छोटा सा काफिला गुजरा। काफिले वाले हमारा खच्चर खरीदना चाहते थे। रंग लंग उसे बेचने पर तैयार हो गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं उसे पकड़कर एक तरफ ले गया। “तुम यह क्या कर रहे हो ? खच्चर के बिना हम सफर नहीं कर सकते।”

“साहब! मैं तो बीमार हूँ।” रंग लंग ने अर्थहीन मुस्कुराहट के साथ कहा। “खच्चर की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

खच्चर के बदले हमें राहगुजर का कुछ सामान मिल गया। जानवर पकड़ने को चार बड़े फंदे भी मिल गये। तेल और खाद्य सामग्री भी थी। अब रंग लंग को पेट भर खाना भी मिलने लगा और उसकी हालत कुछ सुधरने लगी। वह मेरे साथ बाहर निकल जाता और फंदे से जानवर पकड़ने का तरीका सिखाता रहता।

पाँच रोज बाद फिर बर्फबारी हुई। तेज़ सर्द हवा बर्दाश्त से बाहर थी और उसके साथ ही रंग लंग की तकलीफ और बढ़ गयी। वह हर वक़्त पड़ा कराहता रहता।
 
एक रात मैं सो रहा था कि रंग लंग की चीख सुनकर मेरी आँख खुल गयी। मैं जल्दी से उठकर उसके पास गया। रंग लंग बुरी तरह चीख रहा था और पागलों की तरह चाकू से अपना बाजू काटने की कोशिश कर रहा था।

“साहब! इसे काट डालिए, वरना मैं मर जाऊँगा। अब मैं अधिक तकलीफ बर्दाश्त नहीं कर सकता।” वह मेरा हाथ पकड़ते हुए गिड़गिड़ाने लगा।

लेकिन मेरी हिम्मत न पड़ी। बड़ी अजीब सी कैफियत में मैंने उसका चाकू छीनकर एक तरफ फेंक दिया और उसे सहारा देकर लिटा दिया।

रंग लंग निरंतर चीखता रहा। मैं अपने होंठ काट रहा था। ली की बातें जेहन में घूमने लगीं। अब अगर उसका बाजू न काटा तो उसकी जान चली जाएगी। रंग लंग मुझसे यही विनती कर रहा था।

फिर रंग लंग चीखता-चिल्लाता बेहोश हो गया।

कल्पना ने उसका बाजू स्पर्श करते हुए ठंडी साँस खींची–“वक़्त बीत चुका है राज। अब हम रंग लंग को नहीं बचा सकते। उसकी मौत आ चुकी है।”

“नहीं...!” मैं चीख पड़ा। “मैं इसे बचा लूँगा। इसका बाजू काट दूँगा।” –और फिर मैं पागलों की तरह चाकू पर झपट पड़ा।

परंतु मेरे हाथों में कंपकंपी छूटने लगी। इस तरह का ऑपरेशन करना हिम्मत का काम था और मैं हिम्मत बटोर रहा था। आख़िर मैंने अपने दिल-गुर्दे को मज़बूत किया और उसके बाजू पर झुक गया।

जैसे ही मैं बाजू काटने को हुआ रंग लंग ने एक चीत्कार मारी। क्षण भर के लिए उसकी बेहोशी टूटी। उसकी आँखों में साफ-साफ मौत की परछाइयाँ डोल रही थीं। और फिर बाजू काटने की नौबत नहीं आयी। चाकू मेरे हाथ से छूट गया और मैं फफक-फफक कर रो पड़ा।

रंग लंग की देह निर्जीव हो चुकी थी।

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कल्पना ने भर्राए स्वर में कहा–“हमें इसके लिए नदी तलाश करनी पड़ेगी राज क्योंकि इस लड़के का शव बहाना होगा।”

मुझे याद आया। रंग लंग पहले ही मुझे नदी के बारे में बता चुका था। तो क्या उसे अपनी मौत की आहट मिल गयी थी ? उसने कितना सब्र किया था! रंग लंग एक महान इंसान था। उसे खोकर मुझे बड़ा सदमा पहुँचा था।

नदी तलाश करने में हमें अधिक कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। नदी पर जमी बर्फ़ को तोड़कर उसमें सुराख किया। कल्पना ने बताया कि रंग लंग का परिवार हिंदुस्तान से संबंध रखता था। उसके पुरखे हिंदुस्तानी थे जो तिब्बत में आकर बसे थे इसलिए उसका शव नदी में बहाकर ही उसकी अंतिम क्रिया की जा सकती थी। वहाँ हम उसके लिए चिता नहीं बना सकते थे।

रंग लंग की लाश का अंतिम संस्कार नदी में बहाकर कर दिया। कल्पना ने कुछ श्लोक पढ़े और क्रिया संपन्न हो गयी।

“राज यह नदी किस तरफ जाती है ?” कल्पना ने पूछा।

“यह आगे जाकर सांगपो नदी से मिल जाती है।” मैंने बताया।

“वह भाग्यवान है।” कल्पना ने ठंडी साँस भरते हुए कहा। “वह अपने घर पहुँच गया।”

कल्पना ने उसके बालों की एक लट काटकर उसके सीने पर रख दी थी। रंग लंग को अलविदा कहकर हम बोझिल क़दमों से गार की तरफ लौट पड़े।

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रंग लंग ने मुझसे कहा था कि हमें सर्दियों का मौसम गार में व्यतीत करना पड़ेगा क्योंकि इस बीच सारे रास्ते बंद हो जायेंगे और हम किसी तरह सफर नहीं कर सकते।

उसने कहा था कि अप्रैल के अंत में बर्फबारी समाप्त हो जाएगी और तुरंत ही हमें सफर शुरू करना होगा क्योंकि बर्फबारी समाप्त होते ही चीनी फ़ौजी फिर से दर्रे का रास्ता घेर लेंगे।

मैं रोज़ाना लकड़ियाँ जमा करने में व्यस्त रहता। आग के बिना हम सर्दी का मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। खुराक का भंडार पर्याप्त था लेकिन यह बात निश्चित थी कि अप्रैल से पहले वह भंडार समाप्त हो जाएगा।

मैं रोज़ाना दीवार पर लकीरें खींच देता था ताकि महीने की तारीखें याद रखी जा सकें। हम निरंतर चार माह तक गार में बंद रहे और हमारे रोज के दिन एक से ही गुजरते थे।

रोज सुबह उठकर मुँह-हाथ धोते, मिलकर नाश्ता करते। कल्पना अलग बैठकर पूजा में व्यस्त हो जाती और मैं लकड़ियाँ जमा करने, जानवर पकड़ने बाहर निकल जाता।काफिले वालों से जो फंदे हमने खरीदे थे वह बहुत काम आये, वरना हम कब के मर खप चुके होते। जब हम रोजमर्रा के कामों से फ़ारिग हो जाते तो आग से गरम गार में बैठकर दुनिया जहान की बातें करते रहते।मैंने गार की दीवारों पर कल्पना की बहुत सी तस्वीरें बना दी थीं। जली हुई लकड़ियों के कोयले से मैं अपने जीवन की विभिन्न यादों को वहाँ उतारा करता। मैंने वहाँ मोहिनी की तस्वीर भी बनायी जिसकी धुंधली सी याद अब भी जेहन में थी। मैंने आग का वह गार भी बनाया जहाँ जलकर वह भस्म हुई थी। वह तालाब भी बनाया जिसके इर्द-गिर्द लामाओं के कंकाल बैठे थे।

मैंने तरह-तरह की तस्वीरों से गार को रंग दिया। सारी-सारी रात कल्पना मेरे आगोश में होती। ये दिन सचमुच बड़े सुहाने थे। तिब्बत के इस गार से हमारी प्रेम कहानी लिखी जा रही थी। हमारी जिंदगी का यह खुशगवार दौर था। कल्पना को मेरे प्यार ने दीवानी बना दिया था और मैं भी उसके इश्क में इस तरह गिरफ़्तार हो रहा था कि अपने माज़ी का हौलनाक दौर भूल चुका था। कल्पना भी आत्मा की गहराइयों के साथ मुझ पर जान न्योछावर करती थी। कल्पना पूरी कायनात से मोहब्बत करती थी। कभी-कभी उसकी बातें बड़ी अजीब होती थीं। मैं चाहता था कि वह कायनात से मोहब्बत न करे, सिर्फ मुझसे प्यार करती रहे। उस वक़्त मैं ख़ुद को कायनात से अलग समझता था।

“राज! मैं कायनात की हर चीज़ से प्यार करती हूँ।” वह मेरे बालों में उंगलियाँ फेरती रहती। “कायनात की हर चीज़ मुझे ख़ुशी प्रदान करती है।”

मैं झुंझला जाता। “लेकिन सबसे अधिक ख़ुशी तो मैं प्रदान करता हूँ।”

“अच्छा! तुम कहते हो तो ऐसा ही होगा।” वह मुस्कुराते हुए जवाब देती

“और ये भी कहो कि हम एक-दूसरे से कभी जुदा न होंगे।”

“मैं ये कैसे कह सकती हूँ ? एक रोज तो हमें मरना है। हम सब फानी हैं।” वह मुझसे लिपटकर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख देती।‘

“लेकिन देवी माता तो कभी नहीं मरती।”

“उसकी आत्मा अवश्य नहीं मरती पर उसका शरीर तो नश्वर है।”

“तो क्या उस वक़्त हम साथ नहीं रह सकते ?” मैं आशावान नज़रों से उसे देखता हुआ बच्चों की तरह पूछता।

“हम कहाँ रहेंगे ?”

“जहाँ तुम चाहो। सिक्किम में रह लेंगे। अब खानकाह तो रही नहीं, न तुम्हारी खानकाह के लामा लोग। फिर हम आज़ाद हैं।”

“सिक्किम में ? वहाँ तो मैं फिर महान भिक्षुणी बन जाऊँगी। हम वहाँ इस तरह साथ नहीं रह सकते, जिस तरह यहाँ हैं। वहाँ भी लामाओं की एक खानकाह है और हमारा सफर वहीं तक होना था। उसके बाद जब तक दूसरी खानकाह की स्थापना नहीं हो जाती हमें वहीं रहना था। फिर तुम हिंदुस्तान भी जाना चाहोगे।”

“मैं जहाँ जाऊँगा तुम्हें साथ लेकर जाऊँगा। मैं तुमसे कभी जुदा न होऊँगा। मैं रोज़ाना तुम्हारी तस्वीर बनाता रहूँगा।”

“लेकिन कब तक ? मैं तो जवानी में ही यह शरीर त्याग दूँगी।”

“तुम यह बात कैसे कह सकती हो ?” मैंने अपने होंठ काटते हुए पूछा।

“मुझे मालूम है।” कल्पना के चेहरे पर उदासी बिखर जाती। “यह लिखा जा चुका है।”

“क्या तुम्हें मालूम है कि तुम अपने शरीर को कब त्यागोगी ?”

“हाँ, मुझे साल और महीना तक मालूम है! लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं बताऊँगी।”

और फिर वह अपने होंठ मेरे होंठों में पैवस्त कर देती ताकि मैं उससे और अधिक प्रश्न न कर सकूँ।

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फ़रवरी के मध्य में एक बार फिर हम पर मुसीबतों के साये मंडराने लगे। अब मुझे शिकार आसानी से नहीं मिलता था। हमारे पास अब भी चाय और मक्खन खासी मात्रा में मौज़ूद था लेकिन इन चीज़ों से पेट नहीं भरा जा सकता था। थोड़ा सा ख़ुश्क माँस बचा था इसलिए हम उसे बड़ी एहतियात और किफायत से इस्तेमाल करते थे।

मार्च के महीने में नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि हमें कई-कई वक़्त भूखा रहना पड़ता। मैं दिन भर फंदों के पास छिपकर बैठा रहता लेकिन उनमें कोई जानवर न फँसता। सारे जानवर वहाँ से जा चुके थे। फिर नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि मैंने जो फंदे लगाये थे वह बर्फ़ के अंदर धँसकर गायब हो गये। हमारे पास जो खुराक बची थी, बस चंद रोज के लिए थी। हमारे पास अरबों रुपये का खज़ाना था; फिर भी भूख मौत बनकर हमारे सिरों पर मंडरा रही थी।

कई बार मेरे जी में आया कि गाँव में जाकर खाने-पीने की चीज़ें प्राप्त कर लें लेकिन ऐसा करना आत्महत्या का सामान जुटाना था। गाँववासी चीनियों के दोस्त थे और चीनी हमें तलाश कर रहे थे। गाँव वाले हमें पकड़कर उनके हवाले कर सकते थे। यह भी संभव था कि बर्फबारी के कारण चीनियों ने गाँव में शरण ले रखी हो।

थक हारकर 17 मार्च को मैं इस इरादे से बाहर निकला कि आज किसी न किसी जानवर का शिकार करके अवश्य लाऊँगा। एक हाथ से बंदूक चलाना हरचंद मुश्किल काम है। निशाना भी सही नहीं बैठ सकता। फिर भी मैं इसका ख़ासा अभ्यस्त हो गया था। बंदूक के अलावा मैंने एक चाकू भी सँभाल कर रख लिया था।

और फिर मुझे शिकार नज़र भी आ गया।

वह रीछ बेख़ौफ वहाँ मंडरा रहा था और पहली ही नजर में मैंने भाँप लिया कि वह मेरी तरह भूखा है और शिकार की गंध सूँघता फिर रहा है। ऐसे जानवर का शिकार करना बड़ा ही खतरनाक काम होता है क्योंकि ऐसा जानवर भयभीत नहीं होता, बल्कि स्वयं हमला कर बैठता है।

निश्चित रूप से उसे मेरी गंध मिल गयी थी। वह रुककर हवा में थूथनी उठाये सूँघ रहा था। फिर वह जमीन सूँघता मेरी तरफ पलट पड़ा।मैं अधिक विलम्ब नहीं कर सकता था। बड़ी मुश्किल से वह शिकार हाथ आया था और मैं हर कीमत पर उसका शिकार करना चाहता था। पेट का जहन्नुम भरने के लिए रीछ का माँस भी मेरे लिए नियामत से कम न था।

मैंने निशाना साधकर फायर किया। पहली गोली चूक गयी और दूसरी, तीसरी मिस हो गयी। इस बीच रीछ ने भी मुझे देख लिया था। उसने मेरी तरफ छलाँग भरी। अगली गोली चलाने का अवसर नहीं था क्योंकि वह भी मिस हो सकती थी। मैंने बंदूक नीचे फेंक दी और चाकू निकाल लिया। रीछ ऐन मेरे सिर पर आ चुका था। और फिर उसने मुझ पर छलाँग लगाकर अपने नुकीले दाँत मेरे सिर पर गाड़ दिए। मेरी चीखें निकल गयीं परंतु अपने हवास पर काबू रखते हुए उस पर चाकू के हमले शुरू कर दिए।

रीछ की गिरफ़्त क्षण भर के लिए कमज़ोर हो गयी तो मैंने उसके चेहरे पर वार कर दिया और इसके साथ ही हम दोनों एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो गये।

रीछ के शरीर से उठने वाली दुर्गंध से मुझे चक्कर सा आने लगा। रीछ के लिए यह सुनहरा अवसर था। उसने गुर्राते हुए मेरी एक टांग अपने जबड़े में फँसा ली और बुरी तरह झिंझोड़ने लगा।

मैं निरंतर उस पर वार करता रहा लेकिन अब मेरे अन्दर शक्ति नहीं रही थी। मैं बुरी तरह चीखें मारता रहा। मेरे शरीर में आग सी भर गयी थी और मैं पागलों की तरह चट्टान पर अपना सिर पटक रहा रहा था और उसके साथ ही हर तरफ अँधेरा छा गया।

जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि मेरी टांग अब भी रीछ के मुँह में दबी हुई है और वह धीरे-धीरे उसे चबा रहा है। लेकिन दूसरे ही क्षण रीछ का सिर एक तरफ लुढ़क गया। वह मर चुका था और उसके पूरे शरीर से खून रिस रहा था।

मैं वहाँ पड़ा एक घंटे तक चीखें मारता रहा। मेरी लहूलुहान टांग बेसहारा सी होकर झूल रही थी और उसकी तमाम हड्डियाँ बाहर निकल आयी थीं। पूरा जिस्म सर्द पड़ चुका था। मुझे आभास हुआ कि अगर वहीं पड़ा रहा तो ठिठुर कर मर जाऊँगा। मैं उठा और गिरता-पड़ता गार की तरफ चल पड़ा।

मेरी आँखों के सामने तारे नाच रहे थे और मैं बेसुधी के आलम में केवल अंदाज़े से आगे बढ़ रहा था।गार के बाहर कल्पना मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। उसने दूर ही से मुझे देख लिया था। मैं घिसटता हुआ उसकी तरफ बढ़ रहा था। वह तेज़ी से मेरी तरफ दौड़ पड़ी।

“ओह राज...!” उसने सिसकते हुए कहा। “यह तुम्हें क्या हो गया है ?”

वह मुझे सहारा देकर गार के अंदर ले आयी और अब वह मेरी टांग का जख्म देख रही थी। मैंने उसे रोक दिया। भूख से हम बेहाल थे। मुझे रीछ का माँस लाने के लिए एक बार फिर बाहर जाना था। बस उससे पहले मैं थोड़ा आराम करना चाहता था।

कल्पना ने जब यह सब सुना कि मैंने रीछ का शिकार किया है तो दहशत से उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं।

“राज!” उसने मुझे झिंझोड़ डाला। “तुम यह क्या कह रहे हो ? यह झूठ है। नहीं, कह दो कि तुमने रीछ को नहीं मारा! तुमने सपना देखा होगा।”

“नहीं, यह सच है!” पीड़ा के कारण मेरे दाँत बजने लगे। “मुझे जाना है, वरना हम भूखे मर जायेंगे। तुम्हें उसका माँस लाने में मेरी मदद करनी है।”

कल्पना भयभीत होकर पीछे हटने लगी।

“राज! यह तुमने क्या कर दिया ? रीछ तो एक पवित्र जानवर है और मैं रीछों की रक्षक हूँ। मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकती।”

थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं बाहर निकल गया। कल्पना मेरे पीछे मुझे रोकने के लिए भागती रही और मुझसे विनती करती रही कि मैं रुक जाऊँ। यह घोर पाप होगा। वह मेरी मदद नहीं कर सकती। लेकिन मैंने उसका एक भी शब्द नहीं सुना। मेरे जेहन में तो सिर्फ एक ही बात गूँज रही थी। भूख से मरने से बेहतर है कि रीछ के माँस से अपने पेट का जहन्नुम भर लिया जाए। मैंने अपनी जान पर खेलकर उसका शिकार किया था। मेरी एक टांग इसकी साक्षी थी। फिर मैं उसे किस तरह छोड़ सकता था ?

“राज!” उसने चीखकर कहा। “रुक जाओ, अन्यथा बड़ा अनर्थ हो जाएगा। अगर तुमने रीछ का माँस खाया तो...तो तुम मेरे जीवन से हाथ धो बैठोगे। तुम मुझे कभी न पा सकोगे मेरे जीते जी। मैं जान दे दूँगी राज क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ।”

कल्पना की इस धमकी ने मुझे रोक दिया क्योंकि सचमुच वह एक बुलंद टीले पर जा खड़ी हुई थी। हताश और मायूस सा मैं वापस लौट पड़ा।

फिर टांग के जख्म ने मेरे शरीर में अंगारे भरने शुरू कर दिए। मैं गार में आकर बेहाल हो गिर पड़ा। कल्पना मेरे पास आयी। उसने मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया और मेरे बालों को सहलाने लगी।

“तो क्या हम यूँ ही भूखे मर जायेंगे कल्पना ?” मैंने कराह कर कहा।

“नहीं राज, हमारी मौत आसान नहीं है! और फिर अगर हम मर भी गये तो क्या हुआ ? हम एक-दूसरे की बाहों में मरेंगे।” वह सिसक पड़ी।“जानते हो वह रीछ कौन था ? वह एक पवित्र आत्मा थी जो इस गार की हिफ़ाज़त करती थी। जो बुजुर्ग यहाँ रहा करते थे, उनके साथ यह रीछ रहा करता था। बुजुर्ग की मौत के बाद रीछ भी यहाँ से चला गया। फिर न जाने क्यों वह रास्ता भटककर इधर आ निकला था। तुमने उसे मारकर अच्छा नहीं किया।”

“और अगर वह मुझे मार डालता तो ?”

“हाँ, आत्मरक्षा पाप नहीं कहलाती इसलिए तुमने इतना बड़ा पाप नहीं किया! परंतु उसका माँस खाने का अर्थ जानते हो क्या होगा ? इस गार में रहने वाले पवित्र बुजुर्ग की आत्मा की क्रोधित दृष्टि हम पर टिकी है। आज रात मैं उनसे निवेदन करूँगी कि वह तुम्हें क्षमा कर दें। अन्यथा वह तुम्हें श्राप दे डालेंगे और तुम्हारा सारा जीवन तबाह हो जाएगा।”

कल्पना की बातें मेरी समझ से परे थीं। इस तरह की बातों से मैं बुरी तरह उकता गया था। यहाँ जिंदगी के लाले पड़ रहे थे और यह न जाने किस युग की बातें कर रही थी।

फिर कल्पना पूजा-पाठ में व्यस्त हो गयी और मैं अंगारों पर लोटता हुआ बेहोशी की नींद सो गया।
 
जब मेरी आँख खुली तो रात का घटाटोप अँधेरा गार को डस रहा था। कल्पना सोई हुई थी।भूख से आतें बुरी तरह कुलबुलाने लगीं और मैं होंठों पर जीभ फिराता रहा। जैसे-जैसे मुझे ख्याल आता कि कुछ ही दूर एक शिकार पड़ा है और पेट की आग बुझाई जा सकती है, मेरी भूख और बढ़ जाती।

आख़िर मेरे सब्र का पैमाना भी छलक गया और मैंने हल्की करवट ली और उठकर बैठ गया। जब मैंने महसूस किया कि कल्पना गहरी नींद में है तो उठ खड़ा हुआ और लंगड़ाते हुए गार से बाहर निकल आया। मेरे पास एक चाकू था।

मैं धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ता रहा जहाँ वह शिकार पड़ा था।

आकाश आज साफ था। सितारे झिलमिला रहे थे और आधा चाँद इक्का-दुक्का बादलों की ओट से गुजरता हुआ अपना सफर तय कर रहा था। इस मद्धम उजाले में मैं बढ़ता हुआ उस जगह पहुँचा, जहाँ मेरा शिकार पड़ा था।

मैं चाकू लेकर रीछ पर झुक गया। मैंने उसका बाजू उखाड़ना चाहा परंतु क़ामयाब न हो सका क्योंकि मेरा हाथ काँप रहा था और शरीर में शक्ति भी न रही थी। आख़िर मैंने थक-हार कर उसकी पुश्त पर एक जगह से उसके बालों को काट डाला और फिर माँस का एक टुकड़ा उतार लिया।

अब मैं इस टुकड़े को हाथ में लेकर इधर-उधर देखने लगा। स्पष्ट था कि मैं गार में आकर उसे भून नहीं सकता था क्योंकि कल्पना वहाँ थी और बाहर आग जलाने का कोई इंतज़ाम नहीं था। यह भी हो सकता था कि जब तक मैं इसका प्रबंध करता कल्पना जाग जाती।

माँस का टुकड़ा सामने था। सो भूख और भी शिद्दत से भड़क उठी और मैंने वहशियों की तरह उस पर दाँत गड़ा दिए।

एक उबकाई सी आयी परंतु पेट ने उसे सह लिया और फिर मुझे वह माँस भी स्वादिष्ट महसूस होने लगा। देर तक मैं चप-चप करता रहा। गोश्त का पूरा टुकड़ा मैंने साफ कर दिया। मेरा मुँह खून से सन गया था।

अचानक मैंने आहट सी सुनी।

वह कल्पना ही थी जो मुझसे कुछ फासले पर खड़ी थी। उसके मुँह से एक सिसकारी सी निकली और जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा और उठकर कुछ कहना चाहा कि वह पलटी और तेज़ी से एक ओर दौड़ पड़ी।

वह गार से विपरीत दिशा में दौड़ रही थी।

“कल्पना!” मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा। “रुक जाओ....कल्पना...!”

लेकिन उस पर मेरी आवाज़ का कोई प्रभाव न पड़ा। मैं उसके पीछे दीवानों की तरह दौड़ने लगा।

“देखो, मुझे छोड़कर मत जाओ! कल्पना मेरी बात सुनो...मेरी हालत पर रहम खाओ...कल्पना!”

अचानक कल्पना को मैंने उछलते देखा। फिर यूँ लगा जैसे वह हवा में ओझल हो गयी हो। सारी वादी शांत पड़ी थी। या तो वह ठोकर खाकर किसी गार में गिर पड़ी थी...या...नहीं...नहीं...! मैं पागलों की तरह भागता हुआ उस स्थान पर पहुँचाजहाँ कल्पना गायब हुई थी।

अँधेरा था, परंतु इतना नहीं कि मेरी आँखें कुछ भी न देख पातीं। वहाँ कोई गड्ढा न था। उसी समय आसमान पर चाँद बादल से बाहर आ गया और चाँदनी में मैंने साफ-साफ वह मंज़र देखा कि मेरा सारा शरीर लरज़ उठा।

वह एक खौफ़नाक खाई थी जिसमें बहुत दूर नीचे एक चट्टान पर कोई चीज़ पड़ी थी। बेहरकत। बेहरकत वस्तु कल्पना के सिवाय हो भी क्या सकती थी और इतनी ऊँचाई से गिरने के बाद किसी इंसान के जीवित रहने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

“कल्पना!” मैं चीख पड़ा। “मैं भी तुम्हारे पास आ रहा हूँ। आ रहा हूँ। ये देखो।”

और मैंने खाई में छलाँग लगानी चाही। मेरी समझ में नहीं आया कि उसे दुर्घटना समझता या आत्महत्या ? बहरहाल एक ही बात जो मेरी समझ में आती थी वह यह कि कल्पना अब जिंदा नहीं थी और मेरे जीवन का अंतिम सहारा भी मुझ से छिन चुका था इसलिए कल्पना के बिना मैं जी भी नहीं सकता था।

मैं खाई में कूदने के लिए पाँव बढ़ाना ही चाहता था कि अचानक मुझे अपने सिर में जोर का दर्द महसूस हुआ और मेरी आँखों के आगे अंधकार छाता चला गया।

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको अजीब सी स्थिति में पाया। मैं सफर कर रहा था। तनहा सफर कर रहा था। खज़ाना घोड़े पर लदा था और मैं उस दर्रे को पार कर चुका थाजहाँ चीनियों ने रास्ता रोक रखा था। कोई भी चीनी वहाँ नहीं था, बस मैं अकेला पथिक जिंदगी के काँटों भरे रास्ते में सफर कर रहा था।

मुझे कौन ले जा रहा था,न मालूम। परंतु यह हकीक़त थी कि मैं ख़ुद अपनी इच्छा से नहीं चल रहा था। फिर एक दिन मैंने अपने आपको सिक्किम की सरहद पर खड़ा पाया। मैं ठीक उस रास्ते पर बढ़ रहा था जिसका कि मुझे इल्म भी नहीं था। और फिर कुछ लोगों ने मेरा स्वागत किया। वे कौन-कौन लोग थे,न मालूम। कुछ फौजी वर्दियों वाले थे तो कुछ भिक्षु। उन्होंने मेरा जोरदार स्वागत किया क्योंकि मैं खज़ाना लेकर सही सलामत पहुँच गया था।

मेरा शरीर जख्मी था इसलिए मुझे तुरंत अस्पताल में पहुँचा दिया गयाजहाँ मेरा उपचार होने लगा। मैंने उनमें से किसी के सवाल का भी जवाब नहीं दिया, बल्कि गूँगा सा बना रहा। मुझे ख़ुद अपने पर हैरत होती थी।

अस्पताल की तन्हाईयाँ भरी रात। मैं अकेला बेड पर लेटा सोच की दुनिया में गुम था। सिर में अब भी भारीपन महसूस कर रहा था। अचानक एक धमाका सा हुआ और यूँ लगा जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे अपने चंगुल से आज़ाद कर दिया हो।

“राज!” किसी की फुसफुसाहट सुनायी पड़ी। “मैं कभी तुम्हारे पास न आती क्योंकि मैं जहाँ जाती हूँ, दुःख ही दुःख होते हैं। लेकिन मुझे देवलोक से विवश किया गया कि तुम्हारी सहायता करूँ। कल्पना की मौत के बाद अगर तुम भी मर जाते तो यह पवित्र खजाना चीनियों के हाथ पड़ जाता। यह मैं थी जो तुम्हारी जिंदगी का बोझ यहाँ तक ले आयी।”

“मोहिनी!” मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला। वह मोहिनी की ही आवाज़ थीजो मुझे सुनायी दे रही थी।

“यह तुम हो मोहिनी ?”

“हाँ, मैं हूँ तुम्हारी मोहिनी!”

“लेकिन तुम मुझे नज़र क्यों नहीं आ रही हो ? कहाँ हो तुम ?”

“मैं तुम्हें नज़र नहीं आ सकती, राज। यह मेरी विवशता है। अब मुझे देवलोक में बुलाया जा रहा है। मैं चाहती तो तुमसे बिना बात किए चली जाती और तुम्हें पता भी न लगता। परंतु मेरा दिल न माना। रीछ का माँस खाकर तुमने कल्पना के प्रेम मंदिर में आग लगा दी। वह बर्दाश्त न कर सकी और उसने जान दे दी। फिर जगदेव महाराज ने तुरंत तुम्हारी सहायता के लिए मुझे भेजा। होनी को कौन टाल सकता हैराज ? लेकिन देखो, तुमने बहुत दुःख भोग लिए। अब तुम मुजरिम भी न रहे। कल तुम्हें देशभक्ति और बहादुरी का बहुत बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा और तुम एक सम्मानित व्यक्ति कहलाओगे। जीवन यापन के लिए तुम्हें उस ख़ज़ाने से कुछ दौलत भी हासिल होगी। इसलिए अपने जीवन के माजी का हर वर्का मिटा दो और जिंदगी की एक नयी राह पर चल पड़ोजो तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। देखो, अपनी मोहिनी की यह बात तो मानोगे न ?”

थोड़ी देर तक तो मैं गुमसुम बैठा रहा; फिर कराह कर बोल उठा–“तुम्हें देवलोक जाना है तो जाओ। मैं अपना जीवन चाहे जिस तरह चलाऊँ। अब उसमें मैं किसी मोहिनी का दख़ल पसंद नहीं करूँगा। जाओ मोहिनी, चली जाओ। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। मुझे न कोई दौलत चाहिए, न कोई पदक। भगवान के लिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”

“ठीक है, राज, मैं जाती हूँ।” मोहिनी का स्वर बुझा-बुझा सा था। “और मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी। मैं तुम्हें फिर कभी न कभी मिलूँगी और तब तुम जिंदगी के हर झमेले से मुक्त हो चुके होगे। अच्छा राज, अलविदा!”

और मोहिनी चली गयी। सदैव के लिए।

*** समाप्त ***

प्रिय पाठकों, तो इस तरह सम्पूर्ण मोहिनी समाप्त हुई।
 
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