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Fantasy मोहिनी

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको एक कमरे में पाया। मैं एक बिस्तर पर था। कमरा बहुत छोटा था परंतु सजा-सजाया था। वह मेरे पास ही बैठी थी और उसका जिस्म मुझसे बहुत करीब था।उसके पूरे शरीर पर हरे और सुनहरे रंग का पेंट था। मुझे यह समझते भी देर न लगी कि मैं खानकाह के सातवें हिस्से में हूँ।

वह अब भी अपना भद्दा सा मास्क पहने थी। या तो वह हमेशा इसी मास्क में रहती थी, या जानबूझकर मेरे सामने अपना चेहरा उजागर नहीं करना चाहती थी। परंतु औरत की आवाज़ और शरीर की बनावट बहुत कुछ उसकी खूबसूरती का पता दे देते हैं और फिर इस मामले में तो मुझे ख़ासा अनुभव था।

वह फूल तिब्बत की इस वीरान खानकाह में खिल रहा था।

“मानोसंग!” अचानक महान भिक्षुणी ने सन्नाटा तोड़ा और मुझे संबोधित करके बोली। “मैं दो सौ साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।”

मैंने अपने सूखे अधरों पर जुबान फेरते हुए अटक-अटक कर कहा–“माता देवी! आपको धोखा हुआ है। मेरा वास्तविक नाम तो राज ठाकुर है।”

“धोखा! नहीं, यह नाम तुम्हें इस जन्म में मिला होगा क्योंकि तुम मर चुके थे। तुम्हारा मकबरा मेरे सामने ही बना था। ओह! मैं तुम्हें पहचानने में भला कैसे ग़लती कर सकती हूँ ? तुम वही हो–मानोसंग!”

“अगर बात पुनर्जन्म की है तो...।” मैंने अब कुछ हवास पा लिया था। “तो मुझे तरोलोको का पुनर्जन्म बताया गया है। महान लामाओं का यही विश्वास है कि मैं मानोसंग नहीं हूँ और...।”

परंतु महान भिक्षुणी ने मुझे कुछ कहने न दिया और मेरे मुँह पर हाथ रख दिया।

“मुझे अपने बारे में कुछ बताने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारे होंठों की घरघराहट से मैंने सारी कहानी सुन ली है और ये भी कि भविष्य में क्या होने वाला है।” कहकर उसने निःसंकोच मेरे गले में बाहें डाल दीं।

मुझे यूँ लगा जैसे वह भी मोहिनी की तरह कोई जादूगरनी है और मैं उसके सम्मोहन में फँस चुका हूँ। एक जमाना बीत गया था जब से मैंने स्त्री का स्पर्श महसूस नहीं किया था। और इस लम्बी थका देने वाली यात्रा के कारण मेरी वह भावुकता मर चुकी थी। मैं हैरत के पहाड़ों से गुजरता हुआ यहाँ आया था।

जब उसने मेरे गले में बाहें डालीं तो मुझे अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ। मैंने मुद्दतों से एक हिसार को अपने सीने में क़ैद करके दफ़न कर दिया था। एक बाँध था जो अपनी जगह जमा हुआ था।तब से जब से मैंने मोहिनी देवी के दर्शनों के लिए नया जीवन प्राप्त करके लम्बी यात्रा की थी। वरना पहले तो हर खूबसूरत औरत मेरी कमजोरी थी। औरत हमेशा से ही मर्द की कमजोरी रही है। वह उस पर शासन भी करता है, पर एक समय ऐसा भी आता है जब वह औरत का बेदाम गुलाम बन जाता है।

यह तो प्रकृति का नियम है। और अगर ऐसा न होता कि अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षण न होता तो सृष्टि का निर्माण ही क्योंकर होता ? अगर देखा जाए तो औरत मर्द से कहीं अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उसने हर मर्द को अपनी कोख में जन्म दिया है।

मैंने उसका सर्द हाथ अपने से हटाते हुए कहा–“माता देवी! अब मुझे जाना चाहिए। अब मैंने खानकाह का रास्ता देख लिया है और...।” हक़ीकत यह थी कि उस वक़्त मेरा मस्तिष्क कुछ सोच न पा रहा था।

“ठीक है जाओ।” महान भिक्षुणी ने अपने स्वर में मिठास घोलते हुए कहा। “लेकिन तुम वापसकब आओगे ?”

“यहाँ आते-आते तो दम ही निकल जाता है।” –मैंने खुश्क स्वर में कहा।

“मैं इससे भी आसान रास्ता बता दूँगी। मैं ख़ुद खानकाह के दूसरे कपाट में आ जाऊँगी। लेकिन तुम बताओ, तुम कब आओगे ?”

“मैं जल्दी आऊँगा।”

“नहीं, कल रात को मानोसंग! मैं प्रतीक्षा करूँगी।”

“और मैं आपसे एक विशेष मसले पर बात करना चाहता था।”

“हाँ, मुझे मालूम है!”

“आपको मालूम है ?” मुझे आश्चर्य हुआ।

“सब कुछ। मैं तुम्हें तब से देख रही हूँ जबसे तुम पैदा हुए। कहो तो तुम्हारे जन्म की सारी दास्तान सुना दूँ।” वह बिल्कुल मोहिनी के अंदाज़ में बोली। “मैं जानती थी जब अपने ही जीवन से तुम निराश हो जाओगे तो यहाँ अवश्य आओगे। यहाँ मेरी शीतल छाँव में तुम्हें नया जीवन प्राप्त होगा। तुम भटक रहे थे। न जाने किन-किन हालात में। लेकिन वह सब होना था। वह तुम्हारे भाग्य में लिखा था और मैं क्या, दुनिया की कोई भी शक्ति होनी को नहीं टाल सकती।”

महान भिक्षुणी भी कोई जादूगरनी मालूम पड़ती थी। वह मुझे देख रही थी और मैं उसकी नज़रों को अपने शरीर की तहों में रेंगता महसूस कर रहा था। एक सनसनी सी मुझे महसूस हो रही थी।

“और ये भी न समझो कि मैंने कोशिश भी नहीं की थी।” वह बोली। “मैंने अपने एक महान भिक्षु को साधू जगदेव के रूप में तुम्हारी सहायता के लिए भेजा था। लेकिन तुम इतने हठधर्मी थे कि तुमने साधू जगदेव का भी मान न रखा। वह तुमसे बहुत नाराज़ था। वह तुम्हें भस्म ही कर डालता, अगर मेरा ख्याल न होता।”

“त...तुम कौन हो ?” मैंने धड़कते दिल से पूछा।

मुझे अचानक यूँ लगा जैसे उसकी आवाज़ पहले भी कहीं सुनी है। क्या सपनों में सुनी है ? क्या वह किसी दूसरे रूप में मेरे जीवन में नहीं आ चुकी है ?

“यह भी जान जाओगे। जब तुम मेरा चेहरा देखोगे तो स्वयं ही मुझसे प्रेम करने लगोगे और फिर मैं मानोसंग का प्रेम हासिल कर लूँगी। कल रात।”

“अच्छा! मैं कल फिर आऊँगा।”

मैं उससे वादा करके वापस लौट गया। एक तौर से सोचा जाए तो यह मेरी बहुत बड़ी सफलता थी परंतु दूसरी तरफ एक और जी का जंजाल खड़ा हो गया था। इस तरह की प्रेम कहानियाँ किताबों में तो पढ़ी जा सकती हैं, परंतु हक़ीक़त में ऐसी घटनाओं का घटना दुनिया की हैरतअंगेज घटना कहलाती।

एक वह थी जो दो सौ सालों से मेरा इंतज़ार कर रही थी। एक मोहिनी थी जो सदियों से मेरी राह में पलक बिछाए रही थी। और वह महारानी जो मिस्र के क़दीम जमानेमें मेरी पत्नी थी। मेरा जीवन जलता हुआ रेगिस्तान थी। जहाँ सुलगती रेत थी। रेत ही रेत। ऐसी आँधियाँ हज़ार जन्मों में भी इंसान पर से नहीं गुज़रतीं। अगर मुझे दुर्घटना का म्यूजियम कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।

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कैप्टन प्रताप को जब मैंने यह शुभ समाचार दिया तो वह ख़ुशी से झूम उठा। अब हमारे रास्ते खुले थे। ज़रूरत इस बात की थी कि हमें शीघ्र अति शीघ्र वहाँ से पलायन करने की तैयारी करनी चाहिए।

परंतु बड़े लामा से अभी हमने यह भेद छिपाना ही मुनासिब समझा कि हमने खानकाह के अंतिम कपाट तक की पहुँच हासिल कर ली है। वक्त बड़ा नाज़ुक था और इस नाज़ुक वक़्त की डोर अब देवी माता के हाथ में थी। मैं चाहता था कि वही इस मामले का हल तलाश करें। इस संबंध में वह क्या चाहती थी, यह जानना भीआवश्यक था। अंतिम फैसला उसी को करना था।

उस दिन बड़े लामा से मेरी मुलाकात दोपहर ढलने के बाद हुई। मैंने उसे बताया कि मैं होजा से जल्दी ही वापस लौट आया हूँ।

“लेकिन होजा से तो एक दूत हमारे पास आया है। उसने तो तुम्हारे पहुँचने की कोई सूचना नहीं दी।”

मैं चौंका, परंतु शीघ्र ही सामान्य हो गया।

“मैं प्रकृति का वह दृश्य देखने गया था जहाँ फूल ही फूल खिलते हैं। मुझे किसी ने बताया था कि होजा में एक ऐसी घाटी है जहाँ फूल ही फूल खिलते हैं।”

बड़े लामा ने अधिक पूछताछ न करके एक नयी ख़बर सुनायी–“होजा में एक चीनी जासूस पकड़ा गया है और ऐसी सूचना है कि उसके कुछ और साथी भी इस क्षेत्र में प्रविष्ट हो गये हैं।”

“ओह! यह कैसे हो गया ?”

“मालूम नहीं। और अब ख़तरा बढ़ गया है। उन्हें यामदरंग का रास्ता मालूम हो चुका है। वे लोग खानकाह को अपनी संपत्ति मानते हैं।”

“भला ऐसा क्यों मानते हैं ?”

“अब इसका क्या किया जाए ? वे तो तिब्बत के प्रत्येक भाग को ही अपनी संपत्ति मानते हैं। देखो यह एक चीनी समाचारपत्र, जो पकड़े गये जासूस से बरामद हुआ था।”

उसने एक समाचारपत्र का पृष्ठ मुझे थमा दिया। परंतु मैं चीनी भाषा नहीं पढ़ सकता था।

“क्या लिखा है इसमें ?” मैंने उसी से पूछा।

“उन्होंने इसी जगह के बारे में लिखा है।” लामा ने बताया। “वे लिखते हैं कि खानकाह में देवी माता शुरू से ही चीनी औरत रही है। इसलिए उसकी संतानें भी चीनी नस्ल की मानी जायेंगी और उनकी सम्पत्ति भी चीनी होगी।”

“क्या खानकाह की देवी माता चीनी औरत होती है ?” मैंने हैरत से पूछा।

“नहीं! परंतु वर्तमान माता का जन्म चीन में ही हुआ था। एक भिक्षु ने वहाँ जाकर विवाह किया था, तब वह लड़की पैदा हुई थी। हम उसे भिक्षु की संतान ही मानते हैं, भले ही उसकी माँ चीनी थी। जब मेहुआ बच्ची थी तभी उसे यहाँ लाया गया था और देवी माता के रूप में उसे स्वीकार कर लिया गया था।”

“मेहुआ कौन ?” मैंने पूछा।

“देवी माता का नाम मेहुआ ही था। यह उनका चीनी नाम था। न जाने कैसे उन लोगों को यह राज पता लग गया है और इस तरह उनकी नज़र तिब्बत के सबसे बड़े ख़ज़ाने पर है। उधर होजा के गवर्नर भी बीमार पड़ गये हैं। मृत्यु शैय्या पर पड़े हैं। उन्होंने अपना शरीर त्याग करने का समय बता दिया है।”

“क्या ?” मैं बुरी तरह उछल पड़ा। “ओह नहीं! न जाने आज तुम कैसी बुरी-बुरी ख़बरें सुना रहे हो।”

“मैं जो सुना रहा हूँ वह सच्चाई है। कुल पाँच दिन शेष रह गये हैं और भविष्यवाणी के अनुसार होजा के महान लामा गवर्नर की मृत्यु होते ही खानकाह पर चीनी विपत्ति आ पड़ेगी।”

“ओह! क्या मैं उनके दर्शन कर सकता हूँ ?”

“नहीं!वे मृत्यु शैय्या पर जा चुके हैं और वहाँ तब तक कोई नहीं जा सकताजब तक वह अपना शरीर न त्याग दें।”

“वैद्य, हकीम, डॉक्टर भी नहीं ?”

“नहीं! महान लामा जब शरीर त्यागते हैं तो वैद्य, हकीम उनके पास भी नहीं फटक सकते, क्योंकि लामाओं के लिए वैद्य कोई अर्थ नहीं रखते। उनकी आयु पूरी हो चुकी है।”

“और तुम इस तरह सुना रहे हो जैसे खुशख़बरी सुनाते हैं!”

“इसमें दुःख की कोई बात नहीं है। शरीर त्यागना अच्छी बात होती है, बुरी नहीं। यह ख़बर उसके लिए अवश्य बुरी होती है जो पापी होता है। महान लामा तो सीधे देवलोक सिधारते हैं और उन्हें ऊँचा स्थान प्राप्त होता है।”

वह साधू जगदेव महाराज की मृत्यु का समाचार सुनाकर चला गया और मुझे दुःख के सागर में छोड़ गया। उसके लिए यह ख़ुशी की बात हो सकती थी, परंतु मैं एक बार साधू जगदेव महाराज से मिलना चाहता था। वह एक महान आत्मा थीजिसने मुझे नेकी का सूरज दिखाया था।

लेकिन मैं क्या करता ? अब तो सिर्फ जगदेव महाराज के पार्थिव शरीर के ही दर्शन कर सकता था।

उस रात मैं मेहुआ से मिलने चला गया। हालाँकि मेरा मन नहीं चाह रहा था। मैं अपने को बहुत टूटा-टूटा सा महसूस कर रहा था। लेकिन मैंने मेहुआ से वादा भी किया था कि मैं अवश्य आऊँगा।

जब मैं दूसरे कपाट पर पहुँचा तो हॉल में एक दरवाज़ा खुला पाया। मुझे उसने बताया था कि वह यहीं मेरा इंतज़ार करेगी।

मैं धड़कते दिल से उस कमरे में पहुँचाऔर अचानक मैं बुरी तरह चौंककर उछल पड़ा।मेरे सामने एक ख़ूबसूरत परीज़ात लड़की खड़ी थी, जो कल्पना के अलावा कोई नहीं थी।

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मेरी आँखें कल्पना पर जमकर साकित हो गयी थींऔर कल्पना ने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया।

“कल्पना!” मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।

“हाँ, मैं कल्पना हूँ राज! अब तो तुमने मुझे पहचान लिया न ?”

“कल्पना तुम! तुम यहाँ कैसे ?”

“मैं ही महान भिक्षुणी हूँ। मैं ही देवी माता हूँ और मैं ही मेहुआ हूँ।”

हे भगवान! मैं क्या सुन रहा था। मेरी तो अक्ल ही ठप्प होकर रह गयी थी। कल्पना की तो इस रूप में मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था। हालाँकि वह मेरे लिए हमेशा एक पहेली ही बनकर रही थी। उसने कई मुसीबतों से मुझे बचाया था। वह मेरे सपनों तक में आ जाया करती थी। परंतु लन्दन से लौटने के बाद मैंने फिर कभी उसे नहीं देखा था।जिस तरह साधू जगदेव अंतर्ध्यान हो गये थे, उसी तरह कल्पना भी एक पहेली बनकर गायब हो गयी थी।

जिस रूप में मैंने कल्पना की अपरम्पार शक्तियाँ देखी थीं, मोहिनी की शक्तियाँ तो उसके सामने कुछ हैसियत ही नहीं रखती थीं।

“लेकिन कल्पना, तुमने पहले तो यह सब कुछ नहीं बताया था ?”

“वह वक़्त और था, जब तुम मोहिनी के दीवाने थे और विडंबना यह थी कि तुम पर मोहिनी के सिवा किसी का रंग चढ़ ही नहीं सकता था। मोहिनी का जादू तुम्हारे सिर पर बोलता था राज। पहले मैंने साधू जगदेव को भेजा कि वह तुम्हें सही मार्ग दिखाए। मैं चाहती थी कि तुम साधारण इंसान न रहो और जब तुम्हें बहुत से साधुओं का आशीर्वाद प्राप्त होगा तो तुम्हें ख़ुद ज्ञान हो जाएगा और तुम अपनी महबूबा की तलाश में आ पहुँचोगे। जब साधू जगदेव वहाँ पहुँचे तो तुम भारी मुसीबतों में घिरे हुए थे और तुम्हारा जीवन संकट में था। वहाँ धर्म सिर्फ आडम्बर रह गया था और तुम इतने जिद्दी थे कि अपना वह मार्ग त्याग नहीं सकते थे। साधू जगदेव का भी उन लोगों ने अपमान किया था। अतः तुम्हें एक मार्ग दिखाया गया ताकि धर्म की रक्षा करने वाली सभी शक्तियाँ तुम्हारे साथ आ जाएँ। चूँकि तुम मोहिनी के बिना पागल हो जाते थे, इसलिए साधू जगदेव ने स्वयं मोहिनी को प्राप्त करके तुम्हें दान दे दिया। हरी आनंद का संहार तुम्हारे हाथों होना लाज़िमी था। परंतु वे शक्तियाँ कम बड़ी नहीं थीं जो तुम्हारे विरुद्ध एकत्र हो गयी थीं। तुम्हारी सहायता के लिए मुझे अपने शरीर से निकलकर वहाँ पहुँचना पड़ा। मैसूर की पहाड़ियों में जो कुलवंत तुम्हारे लिए तप कर रही थी, उसे यह इल्म हो चुका था कि तुम मेरी अमानत हो। उस वक़्त अगर तुम्हें यह सब बता भी दिया जाता तो एक तो तुम्हें विश्वास न होता, दूसरे मोहिनी तुम्हें हरगिज़ यहाँ न आने देती। और नहीं तुम मुझे प्राप्त कर सकते थे।”

“लेकिन मोहिनी ने आग में जलते समय मुझे यामदरंग की खानकाह में जाने की बात कही थी।”

“हाँ राज, क्योंकि वह आत्मदाह कर चुकी थी! उसने मेरा प्रेम मुझसे छीन लिया था, इसकी सज़ा उसे मिलनी ही थी। वह जानती थी कि एक बार उस अग्नि में शरीर को नष्ट करने के उपरांत फिर कभी वह इंसानी जून में न आ सकेगी और तुम्हें प्राप्त न कर सकेगी। उसके लिए यही उचित था कि मेरी अमानत मुझे लौटा दे। इसी में उसे शांति प्राप्त हो सकती थी। आख़िर वह एक पवित्र नारी की राह में कब तक रुकावट बनती ? परंतु राज, जो मैं चाहती थीवह तुम न बन सके। तुमने तो मेरा और साधू जगदेव महाराज का सिर नीचा कर दिया था। तुमने पाप की राहें पकड़ लीं और इसी का प्रायश्चित तुम्हें करना था। कुलवंत ने तुम्हारे लिए महान शक्तियों का वरदान प्राप्त कर लिया था। यहाँ तक कि उनमें एक मैं भी थी। मेरा आशीर्वाद भी कुलवंत को प्राप्त था और तुमने हम में से किसी का भी मान न रखा।”

“हाँ कल्पना, मैं बहुत बड़ा पापी हूँ! मुझे इसका इल्म है और मैं क्या करता ? मैं तो अपने जीवन की बर्बादी के कारण पागल ही हो गया था। बहुत से निर्दोष मेरे हाथों मारे गये। मैं बहुत देर बाद यहाँ पहुँचा कल्पना। मुझे क्षमा कर दो!”

“राज, मेरे प्रिय! मेरे दिल में आज भी प्रेम की ज्योति जल रही है और मैंने इसका इज़हार कभी किसी के सामने भी नहीं किया। यहाँ तक कि तुम्हारे प्रेम के लिए मैं एक साधारण नारी मात्र बन गयी। हरी आनंद की वज़ह से मेरी शक्तियाँ भी मुझसे छीन ली गयीं। पूरे दो सौ साल तक मैं यहाँ तुम्हारी याद में आँसू बहाती रही। छोटी माता, बड़े लामा ने मुझे रोते देखा था। वे यही समझते थे कि मैं अपने पति बंदर की याद में रोती हूँजैसा कि मुझसे पहले देवी माताएँ रोया करती थीं। रोते-रोते मेरे आँसू पत्थर बन गये और मैंने वह पत्थर अपनी विरह की याद में संभालकर रखे। ताकि एक दिन जब तुम यहाँ आओ तो तुम्हें वह आँसू दे दूँ।”

“आँसू ?”

“हाँ!आओ मैं तुम्हें दिखाती हूँ। यहाँ अब तुम मेरे हो, इसलिए डरो नहीं। मैं तुम्हारी वज़ह से त्यौहार के दिन से पहले ही बड़े लामा से मिलने मंदिर में पहुँचूँगी। फिर तुम्हें कहीं भी आने-जाने की छूट दे दी जायेगी और मैं तुम्हें खानकाह में अपने पास रखूँगी।”

कल्पना मुझे एक और कमरे में ले गयीजहाँ एक मसहरी बिछी थी। उसने मसहरी के नीचे से एक थैला निकाला और मेरे सामने खोल दिया।हीरे-जवाहरात की चकाचौंध से कमरा जगमगा उठा। यह हीरे-जवाहरात करोड़ों रुपये के थे।

“ये वे आँसू हैं जो मैंने बहाए हैं।” कल्पना बोली। “और मैंने इन्हें तुम्हारे लिए संभालकर रखा था। जबकि मुझसे पहले जो देवी माताएँ आँसू बहा चुकी हैं, वह खानकाह के ख़ज़ाने में रख दिए हैं। जहाँ से दरिया का स्रोत बहता है।मेरी मृत्यु के बाद ये भी उन्हीं में रख दिए जाते।”

“फिर तो वह खज़ाना अरबों रुपये का होगा ?”

“हाँ राज, अरबों-खरबों का और जब तिब्बत पर विपत्तियाँ आती हैंतो देवी के आँसुओं से विपत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। इसलिए खानकाह का मार्ग किसी को नहीं बताया जाता और जो भक्त यामदरंग आते हैं उन्हें भी यह शपथ उठानी पड़ती है कि वे किसी को यामदरंग के बारे में नहीं बताएँगे। वे लोग विभिन्न मठों से यहाँ देवी माता के दर्शन करने आते हैं।”

“तुम्हें मालूम है कि मैं यहाँ किस उद्देश्य से आया था ?”

“जानती हूँ राज। यह स्थान अब सुरक्षित न रहा। यहाँ कभी भी चीनी फौजें उतर सकती हैं। इसलिए तय किया गया था कि खानकाह के ख़ज़ाने को कहीं सुरक्षित पहुँचाकर लामा दूसरी खानकाह की स्थापना करें।”

“एक बात समझ में नहीं आती कल्पना कि जब तुम लोगों को इतनी महान शक्तियाँ प्राप्त हैं तो इसकी आवश्यकता ही क्या थी ? क्या चीनी फौजों को रोका नहीं जा सकता ?”

“खज़ाना तो हर सूरत में सुरक्षित रह जाता, पर इसका परिणाम यह होता कि यहाँ सैकड़ों भिक्षु मारे जाते। तुम इस बात को यूँ समझ सकते हो राज कि सब कुछ होते हुए भी हम नरसंहार नहीं कर सकते। हम शांति के दूत हैं। अच्छी आत्मायें कभी नरसंहार नहीं करतीं। इसलिए हम इससे बचना चाहते हैं।”

“अगर यही बात थी तो खज़ाना यहाँ से दूसरी जगह पहुँचाना तुम लोगों के लिए कौन सा मुश्किल काम था ? मैंने तुम्हारी और जगदेव महाराज की शक्तियाँ देखी हैं।”

“मेरी वह शक्तियाँ तो समाप्त हो चुकीं राज, जो तुमने देखी थीं। मैंने तो उन्हें कुलवंत को तुम्हारे लिए दान दे दिया था। रहा जगदेव महाराज का प्रश्न, तो उन्हें इसी मौसम में शरीर त्यागना था। वे इतने निर्बल हो चुके थे कि इतनी लम्बी यात्रा नहीं कर सकते थे। उसके अलावा मेरी भी एक जिद थी।मुझे ख़ज़ाने से कोई सारोकार नहीं था। मैं तो इसी जगह तुम्हारी प्रतीक्षा में जीवन व्यतीत करना चाहती थी। और जब तक तुम यहाँ न आते मैं इस खानकाह से बाहर जाने की बात सोच भी नहीं सकती थी। भले ही चीनियों की हाथों मारी जाती। और उन लोगों के लिए ख़ज़ाने से अधिक महत्व मेरा था। अगर मैं यहाँ रहती तो देवी माताओं के आँसू भी यहीं रहते।क्योंकि मेरा विश्वास था कि तुम्हारा मेरा मिलन एक दिन इसी जगह होगा। जगदेव महाराज इस बात को जानते थे।”

कल्पना ने मुझे बताया कि जिस तरह यहाँ उसका नाम मेहुआ है उसी तरह जगदेव महाराज लामा जोग के नाम से यहाँ जाने जाते हैं। हम दोनों बैठे घंटों तक बातें करते रहे।

कल्पना मेरे बहुत निकट थी। उसने मेरे गले में बाहें डालकर मेरे होंठों को चूम लिया और अपने दो सौ साल की विरह-वेदना की बातें सुनाती रही। फिर मैंने कल्पना को बताया कि जगदेव महाराज अपना शरीर पाँच दिन के भीतर त्यागने वाले हैं।

“मैं जानती हूँ।” कल्पना ने कहा। “मैं तुम्हें पहले ही बता चुकी हूँ कि इस मौसम में उन्हें शरीर त्यागना था। जगदेव महाराज की मृत्यु के उपरांत तो यूँ भी कोई दैवीय शक्ति मेरे साथ न रहेगी। हाँ राज, मैं अब एक साधारण सी नारी बनकर रह गयी हूँ! लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैंने तुम्हें पा लिया। मेरी बरसों की साध पूरी हो गयी। अब सब कुछ साथ-साथ है। हम यहाँ से रवाना हो जायेंगे और फिर एक लम्बा सफर साथ-साथ तय करेंगे। हमारे साथ कुछ और लोग भी होंगे। एक मधुर समय हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।”

एक मुद्दत बाद मैंने किसी स्त्री को आगोश में लिया था।मैं बेखुदी के आलम में था। कल्पना में कुछ ऐसी बात थी जो किसी नारी में मैंने नहीं देखी थी। मोहिनी को तो खैर मैं स्पर्श भी नहीं कर पाया था। मोहिनी भी विश्व की महान सुन्दरी थी, परंतु कल्पना फानी दुनिया की ही नारी थी, जिसके दिल में सभी भावनायें होती हैं। जबकि मोहिनी किसी ग़ैरफानी दुनिया की थी जो इंसानी जून में आ गयी थी। इससे पहले संसार की अनन्य सुंदरियों से मेरा वास्ता पड़ चुका था, परंतु उनमें सर्वोपरि कुलवंत थी और कल्पना उसका दूसरा रूप लगती थी। मेहुआ गुलाब को कहते हैं तो कल्पना इस नाम को सार्थक करती थी।

मुझे यूँ लगा जैसे मैंने अपना जीवन फिर से प्राप्त कर लिया। शायद इसी जीवन की तलाश में यह भटकाव आया था। कुछ खोने के बाद ही इंसान कुछ पाता है; परंतु मैंने तो कल्पना के लिए अपना सब कुछ खोया था। यह मेरी मंज़िल थी। कितनी दूर। कितना फासला था यहाँ तक पहुँचने का!

बाकी सब धोखा था, फरेब था और धोखे या फरेब के पाँव नहीं होते। वह ठहरता नहीं जिस तरह मेरी जिंदगी में ठहराव नहीं आया था।जब मैं वहाँ से बाहर निकला तो जेहन साफ़ था। ज़िस्म हल्का, तरोताज़ा था और मन में उमंगें जाग रही थीं।उसके बाद तो मैं रोज़ ही कल्पना से मिला करता। उमंगें लौट आने के बाद इंसान ख़ुद को भरपूर जवान समझने लगता है। ऐसा ही हाल मेरा था। पुरानी यादें कल्पना की धुंध में खो गयी थीं और मैं बीते हुए कल को अब याद भी नहीं करना चाहता था। बहुत दुःख सह चुका था।

कल्पना से मैंने शैतान के मकबरे के बारे में पूछा, तो कल्पना ने हँसते हुए बताया कि ऐसा कोई मकबरा वहाँ नहीं है। यह सब पुराने लोगों ने किताबों में इसलिए लिख दिया था ताकि ख़ज़ाने को चोरों से सुरक्षित रखा जा सके। किताबों में लिखा गया कि देवी माता ने खानकाह का सारा खज़ाना मानोसंग को दे दिया था जिसे मानोसंग ने अपने मकबरे में रखवाया था। इस तरह लोग खज़ाने के चक्कर में शैतान के मकबरे को खोजते मर जाते परंतु मकबरा न मिलता।

कल्पना ने बताया कि मानोसंग को एक पहाड़ी में चुपचाप दफनाया गया था। ख़ुद देवी माता और तरोलोको ने यह काम किया था। तरोलोको बाद में लामा बनकर वहीं रहा और उसने अंतिम समय वहीं गुज़ारा।

कल्पना ने मुझे वह स्थान भी दिखाया, जहाँ खज़ाना रखा गया था। वहाँ सब तिलिस्मी दरवाज़े थेजिन्हें खोलना इंसानी बूते से बाहर की बात थी। वहाँ एक पानी के तालाब से मीठे जल का एक सोता फूटता था। यह जल अमृत समान था। आगे चलकर यही जल दरिया का रूप धारण करता था।

और फिर वह समय भी आया जब देवी माता ने बाहर निकलने का फैसला किया।मैंने वहाँ रहकर बड़े अच्छे दिन बिताये थे और मेरे लिए अब कहीं आने-जाने की रोक-टोक नहीं थी। कल्पना ने छोटी माता को खानकाह के प्रथम कपाट में बुलाकर सब कुछ समझा दिया था और छोटी माता ने बड़े लामा को सन्देश दे दिया था।

प्रताप इस बीच मेरा गहरा दोस्त बन गया था। मैंने उससे कुछ भी नहीं छिपाया था। वह मेरे जीवन की बहुत सी आश्चर्यजनक बातें जान चुका थाऔर उसे इसका सम्पूर्ण आभास था कि अगर मैं नहीं होता तो वह अपने मिशन में कभी सफल न हो सकता था।रंग लंग भी खूब तंदुरुस्त हो गया था। वह भी मेरा सम्मान पहले से अधिक करने लगा था।

मुझे हर जगह घूमने-फिरने की आज़ादी प्राप्त थी।और फिर वह समय भी आया जब देवी माता ने समय से पहले ही दर्शन देने की घोषणा कर दी। बड़ा लामा तैयारियों में लग गया। देवी माता का दर्शन देने का मतलब था पूरा त्यौहार मनाया जाना।

यामदरंग के उस कस्बे में फिर से दीपावली का सा त्यौहार मनाया जाने लगा। दूर-दूर से भक्तगण आने लगे। देवी माता का इस तरह बीच में ही दर्शन देने का अर्थ साफ था। इसका अर्थ यह होता था कि देवी माता या तो शरीर त्याग रही है, या खानकाह छोड़ रही है।

चीनी हमले की उड़ती-उड़ती ख़बरें अब यहाँ पहुँचने लगी थीं। सैनिक चौकियों और गश्ती टोलियों को यामदरंग के आस-पास देखा गया था। वातावरण में इस बार त्यौहार जैसी चमक-दमक और ख़ुशी न थी; बल्कि एक अजीब सी दहशत और ख़ामोशी व्याप्त थी।

कल्पना अब सचमुच इस स्थान को छोड़ने की सम्पूर्ण तैयारियाँ कर चुकी थी और बड़े लामा को इसकी ख़बर थी।त्यौहार के चौथे रोज़ लामा ने मुझे सवेरे-सवेरे जगाया और अपने साथ ले गया। खानकाह के पहले हिस्से में महान भिक्षु मेरा इंतज़ार कर रहा था।जवाहरात के भरे हुए थैले उसके सामने रखे हुए थे। खज़ाना उसमें भर दिया गया था। दूसरे कमरे में बहुत से भिक्षु बैठे पूजा कर रहे थे। फिर जोर-जोर से घंटे बजने लगे और उसके साथ ही चार भिक्षु महान भिक्षुणी की पालकी उठाये सामने आये।उन्होंने पालकी दरवाज़े के बाहर नीचे रख दी और चुपचाप चले गये।छोटी माता और भिक्षु पालकी उठाये भीतर आये। कल्पना उस समय अपना मास्क पहने हुई थी।

उन्होंने कल्पना का लिबास पहले उतार दिया और अब वह मादरजाद बरहना थी।मैं चकराए अंदाज़ में यह सब देख रहा था। मुझे इस रस्म के बारे में पहले कुछ भी नहीं बताया गया था। फिर वह पत्थर के बने हुए बहुत बड़े प्याले में जाकर बैठ गयीजिसका आधा हिस्सा गुलाब के फूलों से भरा हुआ था।

महान भिक्षु ने कुछ श्लोक पढ़े और एक सुनहरे खंज़र से जवाहरात के थैलों पर बँधी रस्सियाँ काटने लगा। जब तमाम थैले खुल गयेतो वह और उसका सहयोगी फूलों से जवाहरात उड़ेल प्याले में डालने लगे।यहाँ तक कि कल्पना का सुंदर कुंदन जैसा शरीर उसमें छिप गया।

फिर प्याले में किसी प्रकार के इत्र का छिड़काव होने लगा। श्लोक पढ़े जाते रहे और इत्र छिड़का जाता रहा।बड़ी देर तक यह रस्म चलती रही फिर इत्र छिड़कना बंद हो गया और महान लामा आगे बढ़ा। उसने हाथ पकड़कर कल्पना को बाहर निकाला। उसके शरीर पर गुलाब के फूल चिपके हुए थे और वह सम्पूर्ण रूप से फूलों की रानी नज़र आती थी।

उसके बाद छोटी माता फूलों की उस रानी को दूसरे कमरे में ले गयी।
 
महान भिक्षु ने कुछ श्लोक पढ़े और एक सुनहरे खंज़र से जवाहरात के थैलों पर बँधी रस्सियाँ काटने लगा। जब तमाम थैले खुल गयेतो वह और उसका सहयोगी फूलों से जवाहरात उड़ेल प्याले में डालने लगे।यहाँ तक कि कल्पना का सुंदर कुंदन जैसा शरीर उसमें छिप गया।

फिर प्याले में किसी प्रकार के इत्र का छिड़काव होने लगा। श्लोक पढ़े जाते रहे और इत्र छिड़का जाता रहा।बड़ी देर तक यह रस्म चलती रही फिर इत्र छिड़कना बंद हो गया और महान लामा आगे बढ़ा। उसने हाथ पकड़कर कल्पना को बाहर निकाला। उसके शरीर पर गुलाब के फूल चिपके हुए थे और वह सम्पूर्ण रूप से फूलों की रानी नज़र आती थी।

उसके बाद छोटी माता फूलों की उस रानी को दूसरे कमरे में ले गयी।

“देवी माता स्नान कर चुकीं, अब यात्रा की तैयारियाँ की जायें।” बड़े लामा ने अपने सहयोगी से कहा और वह सिर झुकाकर बाहर चला गया।

उसके बाद बड़े लामा के साथ मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ बहुत से भक्तगण और भिक्षु कतार में खड़े थे। ये सब लामाओं के वफादार लोग थे। इस बार ऐसे ही लोगों को त्यौहार की ख़बर दी गयी थी और यामदरंग के कस्बे में दाख़िल होने से पहले प्रत्येक की जाँच कर ली गयी थी।बड़े लामा ने उनके सम्मुख एक छोटा सा भाषण दियाजिसे सुनने के बाद भक्तों ने देवी माता की जयनाद की।

बड़े लामा के भाषण का सार यह था कि चूँकि चीनी फौजें किसी भी समय यामदरंग में प्रविष्ट हो सकती हैं, इसलिए देवी माता को यहाँ से सुरक्षित सुदूर भेजा जा रहा है। और उनके साथ शाही घराने के कुछ स्त्री-बच्चे भी जायेंगे। एक सुरक्षा दस्ता भी होगा। शेष लोग यामदरंग में एकत्रित होंगे और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध लड़ेंगे। जो लोग देवी माता के साथ जायेंगे वे दूसरी खानकाह की स्थापना करेंगे और इस तरह तिब्बत का धर्म सदैव जीवित रहेगा।

उसके बाद तो दूर-दूर तक जय-जयकार गूँजती रही और फिर यूँ लगा जैसे वह सारा द्वीप एक विहंगम शोर से लरज़ उठा हो।लामाओं का त्यौहार युद्ध की तैयारियों का त्यौहार था।

अगले तीन रोज़ तक जोर-शोर से तैयारियाँ होती रहीं। होजा का ड्यूक स्वयं यामदरंग आ गया था। उसका पूरा परिवार साथ था, परंतु ड्यूक ख़ुद हमारे साथ बाहर नहीं आ रहा था। उसके राजपरिवार के दूसरे लोगों को हमारे साथ जाना थाजिसमें स्त्रियाँ और बच्चे थे।

लामाओं ने सुरक्षा दल की एक कमेटी बनायी और उनमें नयी खानकाह की स्थापना के संबंध में वार्ता का लम्बा दौर चलता रहा। कुछ लामाओं को नियुक्त कर दिया गया जो यह फ़र्ज़ अंजाम देंगे।

इस बीच मेरी मुलाक़ात कल्पना से नहीं हो सकीक्योंकि वह स्वयं बहुत व्यस्त थी और बड़े लामा को निर्देश देती रहती थी।युद्ध का वातावरण बनते ही किस तरह हवा में दहशत की बू फैल जाती है।इसका मुझे पहले भी अनुभव प्राप्त था।

❑❑❑

इसके साथ ही जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो गया। योजना का स्वरुप यह था कि मैं, प्रताप, रंग लंग एक छोटे से दस्ते को साथ लेकर यामदरंग से कूच करेंगे। पहले सिक्किम, फिर हिंदुस्तान की तरफ पलायन करेंगे। सिक्किम से आगे एक हिंदुस्तानी फ़ौजी टुकड़ी हमारी हिफ़ाज़त के लिए तैयार थी। सिक्किम का राजपरिवार भी चीनियों का विरोधी था और उन पर भी ख़तरा मंडरा रहा था। इसलिए वे हर प्रकार का सहयोग देने के लिए तैयार थे।

खज़ाना हमारे साथ जाता और हमें सिर्फ दो चीज़ों की सुरक्षा अपनी जान देकर भी करनी थी–खज़ाना और देवी माता। दूसरे राजपरिवार के लोगों की रक्षा के लिए रक्षक दस्ता था। इस तरह उन्होंने चीनी फौजों को करारी शिक़स्त देने की तैयारी की थी; ताकि युद्ध जीतने के बाद भी चीनियों के हाथ कुछ न लगे। परंतु यह यात्रा भी कम ख़तरनाक न थी। हमें चीनी बिलों में से निकलकर सिक्किम पहुँचना था और मार्ग में लातादाद ख़तरे थे। अगर चीनियों को जरा भी भनक लग जाती तो वे पाताल तक हमारा पीछा न छोड़ते।

मुझे कुंग की खौफ़नाक दरिंदगी याद आ रही थी और वह खानकाह के ख़ज़ाने तक पहुँचने की बड़ी हसरत रखता था।मेरे लिए यह सुनहरा अवसर था। अतः एक सुबह जबकि पूरा क़स्बा सोया हुआ था, महान भिक्षुणी कल्पना या मेहुआ, रंग लंग, छोटी माता, होजो शाही घराने के लोग, एक रक्षक दस्ता और दूसरे लोगों के साथ मैं यामदरंग से निकल गया।

प्रताप ने रक्षा की बागडोर सँभाली। रंग लंग उसके साथ-साथ थाजो बहुत उत्साही नज़र आता था। काफिला घोड़ों पर सवार था।हमारे साथ जवाहरातों से भरे थैले थे जिनकी कीमत अरबों रुपये थी। मुझे इस काफिले का नेता नियुक्त किया गया था और लामाओं ने बाक़ायदा तिलक की रस्म अदा करके मुझे भाव-भीनी विदाई दी थी।

मेरे लिए यह कतई नया अनुभव था। वहाँ के रास्ते भी अजनबी थे और इतनी बड़ी दौलत हमारे साथ थीजो किसी का भी ईमान ख़राब कर सकती थी। मुझे प्रत्येक व्यक्ति पर ध्यान रखना था,भले ही इसकी संभावना नहीं थी। वे सब चुने हुए लोग थे और जान देकर भी उस ख़ज़ाने की रक्षा करने से गुरेज़ न करते। परंतु फिर भी मुझे हर पल सावधान रहना था।

मेरे लिए तो कल्पना ही सबसे बड़ी दौलत थीजो मेरे साथ जा रही थी।

रंग लंग उस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे का जानकार था। मैं उस पर और प्रताप पर भरोसा कर सकता था। रंग लंग तो हमारे लिए एक बेहतरीन गाइड था जो हवा में भी किसी ख़तरे की बू सूँघ सकता था।तय हुआ कि पहले पच्चीस मील का फासला बिना रुके तय किया जाए और उसके बाद वह रास्ता तलाश किया जाए जो काफिलों का सुरक्षित मार्ग हो।

हमने अभी मुश्किल से बीस मील का फासला तय किया होगा कि एक उफनती नदी ने हमारा रास्ता रोक लिया। शाम के अँधेरे गहरे हो चले थे। अतः मैंने रंग लंग की मदद से पहाड़ के अन्दर दो गार ढूँढ़ निकाले और सबने वहाँ डेरे डाल दिए।जिस मार्ग से हम लौट रहे थे, यह वह मार्ग नहीं था जो गाप सोंग की तरफ जाता था। यह ऐसा रास्ता था जो हमें सीधा सिक्किम की सरहदों में पहुँचा सकता था।

अगले रोज हम किश्तियों पर सवार होकर आगे की तरफ चल पड़े। लेकिन कुछ ही देर बाद मुझे एहसास हो गया कि नदी हमें पूरब की ओर ले जा रही है। बूढ़े लामा ने हमें जो नक्शा दिया था, वह तकरीबन बेकार हो चुका था। जिस जगह हम पहुँच चुके थे, वहाँ से नक़्शे की सहायता लेना निरर्थक था।

शाम के समय रंग लंग को पश्चिम की तरफ नानगा पर्वत और चवा देव की चोटियाँ नज़र आईं तो उसने चीखकर कहा–“साहब, हमें उन पहाड़ों के पूरब में होना चाहिए था। ग़लत दिशा में आ निकले हैं।”

अतः मैंने किश्ती चालकों को हुक्म दिया कि वे किश्तियाँ किनारे पर लगा दें।

वह रात हमने खुले आसमान के नीचे गुजारी।

❑❑❑
 
अगले रोज़ हम घोड़ों पर सवार होकर पूरब की ओर रवाना हो गये।चट्टानी रास्ता बड़ा दुश्वार गुज़रा था। शाम होते-होते ड्यूक की बीवियाँ और बच्चे थकान से रोने लगे। महान भिक्षुणी के पालकी-बरदारों का भी बुरा हाल था। वह सबसे बुरी तरह थक गये थे।

बहरहाल हम अब नानगा पर्वत और चवा देव के पूरब में निकल आये थे। मैं सबको दिलासा देता रहा, लेकिन मैं स्वयं भी अधिक आशावान नहीं था।दो रोज बाद मैं रंग लंग के सुझाव के अनुसार अपने काफिले के साथ पहाड़ के ऊपर चढ़ रहा था। हमने अपना रुख पश्चिम की तरफ रखा, लेकिन बहुत जल्द रंग लंग रास्तों की भूल-भुलैया में फँसकर रह गया। दो दिन तक वह इस भ्रम में रहा कि वह काफिले का सही मार्गदर्शन कर रहा है, लेकिन तीसरे रोज उसने स्वीकार कर लिया कि वह रास्ता भूल गया है।

और फिर मुझे एक और खानकाह नज़र आयी।इस खानकाह की छतें दूर से नज़र आती थीं। परंतु मैं यह नहीं जानता था कि खानकाह किस मठ की है और इस जगह कौन सी खानकाह है। जिस नक़्शे पर हम चले थे उसमें इसका कोई वर्णन नहीं था।बहरहाल खानकाह से हमें सही मार्ग मालूम हो सकता था। मैंने दो रक्षकों को खानकाह की तरफ रवाना कर दिया ताकि वहाँ से मदद हासिल करने की कोशिश करें।

जब वह चले गये तो मैंने उनके पीछे रंग लंग को भी भेज दिया ताकि वह चुपके से उन दोनों रक्षकों की निगरानी करता रहे।तकरीबन तीन बजे रंग लंग हाँफता-काँपता वापस आया। उसकी रिपोर्ट सुनकर मैं एकदम चौकन्ना हो गया।

रंग लंग ने बताया कि दोनों रक्षक जब खानकाह के द्वार पर पहुँचे तो भिक्षुओं ने बाहर निकलकर उनका स्वागत किया और संकेत से उन्हें बताया कि सही रास्ता कौन सा है। रंग लंग दूर खड़ा उनकी हरकतें देख रहा था। दोनों रक्षकों ने रंग लंग को देख लिया था, परंतु वे उसके पास वापस नहीं आये और खानकाह के अंदर चले गये। अतः रंग लंग को लाचार अकेले वापस आना पड़ा।

मुझे तुरंत ही ख़तरे का एहसास हो गया; लेकिन उस समय तक चारों ओर अँधेरा फ़ैल चुका था। अँधेरे में काफिले को आगे बढ़ाना ख़तरनाक था। हम फिर किसी दिशा में भटक सकते थे। अतः विवशता के कारण मैंने वहीं पड़ाव डालने का हुक्म दिया। रात के समय टीलों पर पहरेदार तैनात कर दिए गये जिन्हें बारी-बारी ड्यूटी बदलकर पहरा देना था।

सुबह-सवेरे मैंने प्रताप को जगाया जो हल्की आहट से ही जाग जाता था। जिस वक़्त मैं सोया था प्रताप तब भी जाग रहा था। मुझे यह नहीं मालूम था कि वह कितनी रात गये सोया था।

उठते ही हमने कूच की तैयारियाँ शुरू कर दीं। मुश्किल यह भी थी कि बर्फबारी शुरू हो गयी थी और हमारे लिए तेज़ रफ़्तार से सफर करना आसान नहीं था।

“क्या दोनों रक्षक वापस आ गये हैं ?” प्रताप ने पूछा।

“नहीं!” मैंने उत्तर दिया। “और उनके लौटने की अब कोई संभावना भी नहीं है। रंग लंग का संदेह दुरुस्त था।”

“ख़तरा किस रूप में हो सकता है ?” प्रताप ने पूछा।

“जिस काफिले के साथ अरबों रुपयों का खज़ाना जा रहा हो, उसके लिए तो खतरा किसी भी रूप में सामने आ सकता है। ईश्वर न करे हमारा मुक़ाबला चीनी फौजों से हो। लुटेरों से तो हम निपटने की क्षमता रखते हैं।”

फिर मैंने छोटी माता को अपने पास बुलाते हुए कहा–“मैं ख़तरे की बू सूँघ रहा हूँ। अब हमें अपनी रफ़्तार भी बढ़ानी होगी। देवी माता को अपनी पालकी यहीं छोड़नी पड़ेगी।”

“असंभव! ये असंभव है!” छोटी माता बड़बड़ायी। “माता ने आज तक घोड़े की सवारी नहीं की।”

“लेकिन तुम मेरा संदेशा उन तक पहुँचा दो।”

फिर जब मैंने उसे सारी परिस्थिति समझायी तो उसने कोई ऐतराज़ नहीं किया। वह सीधे पालकी के पास पहुँची, जिसमें कल्पना अब भी मास्क की जगह चेहरे पर नक़ाब लगाये विराजमान थी। किसी को उसकी सूरत देखने का अधिकार नहीं था।कल्पना ने सारी बात सुनते ही पालकी त्याग दी और फ़ौरन घोड़े पर सवार हो गयी।

हम जिस रास्ते से जा रहे थे वह खानकाह के निकट से गुजरता था। देवी माता के रूप में कल्पना इस काफिले में मेरे साथ-साथ चल रही थी; परंतु विडंबना यह थी कि मैं प्रेम भरी बातें नहीं कर सकता था। उसकी हैसियत ही ऐसी थी कि छोटी माता के सिवाय उससे कोई बात भी न कर सकता था।

जब हम खानकाह के करीब पहुँचे तो हमने देखा कि बाईं ओर दो भिक्षुक और रक्षक हाथ हिलाते हुए आवाज़ दे रहे हैं। वे एक बहुत ऊँची चट्टान पर खड़े हुए थे।

“ये लोग क्या चाहते हैं ?” मैंने रंग लंग से पूछा।

“साहब!” रंगलंग आश्चर्यचकित होकर दुविधाजनक स्वर में बोला। “शायद वे यह बता रहे हैं कि हम ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं, जबकि सही रास्ता ऊपर की तरफ है।”

मैं ख़ुद भी दुविधा का शिकार था। जब हमें ख़ुद ही सही रास्ते का पता न था तो इन हालात में हम कर भी क्या सकते थे ? और न ही अब तक ख़तरे की कोई बात सामने आयी थी। क्या जाने वे यूँ ही खानकाह में रुक गये हों और अगली सुबह लौटने का इरादा रखते हों।

मैंने बाईं तरफ मुड़ने का फैसला किया। लेकिन मैंने जिस तरह काफिले को बढ़ाया उसमें कुछ तब्दीली की थी। प्रताप को काफिले के पीछे रखा था। आगे रंग लंग के साथ मैं था और मेरे पीछे कल्पना घोड़े पर सवार थी। उसके पीछे छोटी माता।जिस घोड़े पर ख़जाना था उसे मैंने रंग लंग और अपने बीच में रखा था। इस प्रकार काफिला आगे बढ़ रहा था।

आड़ी चट्टानों पर घोड़ों सहित चढ़ना बड़ा कठिन कार्य था। फिर भी हम किसी न किसी तरह ऊपर पहुँचने में सफल हो गये।दोनों भिक्षुक और रक्षक अब भी हमसे खासी दूरी पर थे और निरंतर हमें आवाजें देते जा रहे थे।

मेरी छठी इन्द्रिय अब पूरी तरह जाग चुकी थी। मैं हर संभव ख़तरे से निपटने के लिए तैयार था। जाने क्यों मुझे यह संदेह हो रहा था कि वे दोनों भिक्षु और रक्षक हमें किसी जाल में फँसाने की कोशिश कर रहे हैं।

बाद में इस संदेह की पुष्टि भी हो गयी।जब हम आगे बढ़े तो वे दोनों भिक्षु और रक्षक रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे।चट्टानों के नीचे एक पुरजोर दरिया लहरें मार रहा था और दोनों भिक्षु और रक्षक तेज़ी के साथ दरिया की तरफ दौड़े जा रहे थे।

रंग लंग ने मुझसे कहा–“यह दरिया-ए-लीचो है साहब! अब हम काफिले वाले रास्ते के करीब पहुँच चुके हैं। शायद वे लोग इसी दिशा में हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।”

लेकिन मुझे मालूम था उसका उत्साह जल्दी ही ठंडा होने वाला है। मुझे विश्वास था कि हम किसी जाल में फँस गये हैं। हमारे पास अब इतना वक़्त नहीं था कि वापस मुड़ सकते। अतः हम तेज़ी से दरिया की तरफ बढ़े ताकि उसे पार करके दूसरी ओर निकल जाएँ।

और फिर बर्फीली धुंध को चीरते हुए हरे रंग की वादियों की झलकें मारती हुई नज़र आईं। मैंने तेज़ी से पलकें झपकाईं। यह धोखा तो नहीं! नहीं, वह धोखा हरगिज़ नहीं था। वे चीनी सैनिक थे जो मुझे अपनी तरफ बढ़ते नज़र आ रहे थे।

प्रताप जोर से चीखा और उसने अपना हथियार संभालकर घोड़े को एड़ लगा दी।चीनी सैनिकों ने अपने हाथों में बंदूकें उठा रखी थीं।

मैं स्तब्धता के आलम में चुपचाप खड़ा उन्हें देख रहा था कि एकाएक प्रताप की आवाजों ने मुझे झिंझोड़ डाला। वह मेरे करीब आ गया था।अब हर आदमी उधर ही देख रहा था और उनके चेहरों पर आतंक की छाया डोलने लगी थी। स्त्रियाँ सिसकियाँ लेने लगी थीं। अलबत्ता कल्पना पर इस आतंक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। वह अपने घोड़े पर तनकर बैठी थी।

“हम तुम्हें तलाश करते हुए यहाँ पहुँचे हैं।” एक चीनी ने दूर से चिल्लाकर कहा। “अपनी बंदूकें नीचे फेंक दो। हम तुम्हारे दोस्त हैं और तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते।

उसका यह वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि उसी क्षण प्रताप की राइफल गरज उठी थी और वह चीनी फौजी चट्टान से नीचे लुढ़कता दिखायी दिया।

“हमला...!” मैंने हाथ उठाकर हुक्म दे दिया। इसके साथ ही दोनों तरफ से गोलियाँ चलने लगीं।

“मैं यहाँ इन्हें रोकता हूँ।” प्रताप ने जल्दी से कहा। “तुम उधर निकल जाओ...। जल्दी। रंग लंग तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। देवी माता और ख़ज़ाने को अपने साथ लेकर तुरंत यह जगह छोड़ दो।”

“नहीं प्रताप हम सब साथ जायेंगे।”

“जज़्बाती मत बनो राज ठाकुर।तुम्हें जंग का तजुर्बा नहीं है। इससे कोई लाभ न होगा। हम सब मारे जायेंगे।”

प्रताप एक बहादुर सिपाही था। उसने इतनी देर में चार चीनियों को ढेर कर दिया था। दोनों तरफ के लोगों ने पोजीशन ले ली थी और गोलियों के धमाकों से पर्वत की वादी गूँजने लगी थी।

मुझे इस लड़ाई का अंजाम मालूम था। परंतु प्रताप ने ठीक ही कहा था, यह वक़्त भावनाओं में बहने का नहीं था।

“मैं अगर जिंदा रहा तो सिक्किम पहुँच जाऊँगा या रास्ते में तुमसे आ मिलूँगा।” ये उसके आख़िरी शब्द थे जो उसने विदाई के समय मुझसे कहे।

मैंने अपने होश दुरुस्त किये और फिर रंग लंग को इशारा किया। पलक झपकते ही मैंने कल्पना के घोड़े पर छलाँग लगा दी और रंग लंग ने उस घोड़े पर जिसमें खज़ाना लदा हुआ था। फिर मैंने घोड़े को एड़ लगायी और सरपट दरिया की ओर दौड़ पड़ा।
 
कुछ चीनी फौजियों ने हमारा पीछा करना चाहा, परंतु प्रताप उनके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। गोलियाँ हमारे सिरों पर से गुज़र रही थीं। उन्होंने हमें भागते हुए देख लिया थालेकिन इससे पहले ही हालात मेरे काबू से बाहर हो चुके थे। मेरा घोड़ा दरिया के बजाय एक ऐसे रास्ते पर भड़ककर भागा जिसका सिलसिला एक सपाट तिरछी चट्टान पर जाकर समाप्त होता था।

मैंने पूरी शक्ति से अपने इकलौते हाथ की ताकत का इस्तेमाल करते हुए घोड़े की बांग खींच ली लेकिन वक़्त गुज़र चुका था।

घोड़ा चट्टान के छोर पर जा पहुँचा था और दूसरे ही लम्हे वह सौ फुट की ऊँचाई से कलाबाजियाँ खाता हुआ तेज़ी से नीचे गिर रहा था।कल्पना की एक चीख गूँजी और वह बुरी तरह मुझसे लिपट गयी। हमारे शरीर एक जान होकर लिपटे हुए हवा में कलाबाजियाँ खा रहे थे।अगर यह कोई गहरी खाई होती तो हमारी हड्डियों का चूरा-चूरा हो गया होता।

घोड़ा नीचे एक चट्टान पर गिरा और वहाँ से लुढ़कता हुआ एक दूसरी चट्टान पर गिरा और एक बार फिर हवा में कलाबाजियाँ खाने लगा।उसकी दोनों टाँगें टूट चुकी थीं और उसके पूरे शरीर से खून के फव्वारे फूट रहे थे।

बस यह आख़िरी दृश्य था जो मेरी आखों का काजल बनता चला गया।

❑❑❑
 
जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको बर्फ़ में धँसा पाया, जो खून से सुर्ख हो चुकी थी।मैं कराह कर उठने की कोशिश करने लगा। मैंने इधर-उधर नज़रें दौड़ायीं। कल्पना कहीं नज़र नहीं आ रही थी। एक धुंध सी हर तरफ छाई हुई थी और चारों तरफ सन्नाटे का साम्राज्य था।

मैं पूरी शक्ति लगाकर चीखा–“कल्पना...!कल्पना...! कल्पना…!” वादियों ने मेरी आवाज़ को एक छोर से दूसरे छोर तक गूँजा दिया। कोई जवाब न पाकर मैंने पागलों की तरह अपने शरीर से बर्फ़ हटाना शुरू कियाक्योंकि मेरा जिस्म तो बर्फ़ में ही धँसा था। अचानक मेरे हाथों में एक टाँग आकर रह गयी। यह टाँग मेरी नहीं थी।

“हे भगवान!” मैंने राहत की साँस ली। निश्चय ही वह टाँग कल्पना की थी जो मेरे बराबर में ही बर्फ़ में धँसी थी। उसकी टाँग स्पर्श करने में ही मुझे अंदाज़ा हो गया कि वह मेरी तरह जीवित है।

मैंने जल्दी से उसे और अपने आप को बाहर खींच लिया।कल्पना का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। वह अभी तक बेहोश थी। फिर मेरे लिए उस वक़्त यही ख़ुशी क्या कम थी कि वह जिंदा थी। हालत मेरी भी कुछ ठीक न थी। यह तो हवा का एक झटका था जिसने शायद मुझे और कल्पना को मौत के मुँह में जाने से बेदार किया था, वरना कल्पना तो पूरी की पूरी बर्फ़ में समा गयी थी और वह अधिक देर तक जीवित नहीं रह सकती थी।

फिर न जाने कब तक मैं कल्पना की देह को बच्चों की तरह चिपकाए वहीं बर्फ़ पर बेसुध होकर पड़ा रहा। मौत आये तो यूँ ही आये।हमारे चारों ओर बर्फ़ पर खून बिखरा हुआ था और हम दोनों ही बुरी तरह जख्मी थे। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि हमारी हड्डियाँ सलामत थीं और किसी की हड्डी नहीं टूटी थी। कल्पना को अब होश आ चुका था और वह उसी तरह बेसुध मुझसे लिपटी हुई थी।

जब मेरे शरीर में कुछ शक्ति लौटी और पूरी तरह होश में आया तो सबसे पहले मैं भागकर उस जगह पहुँचा जहाँ घोड़ा गिरा था, लेकिन वहाँ घोड़े की सिर्फ लाश पड़ी थी। मैं निराश होकर वापस लौटा और मायूसी से चारों तरफ देखने लगा। किसी भी जानदार जीव का अस्तित्व दूर-दूर तक नज़र न आता था।हताश होकर मैं कल्पना के पास वापस आ गया।

इस वक़्त ख़ज़ाने की कौन परवाह करता था। हो सकता था खज़ाना चीनियों के हाथ आ गया हो; या रंग लंग उसे निकाल ले जाने में सफल हो गया हो। न जाने काफिले के दूसरे लोगों का क्या अंजाम हुआ होगा ?यह सारे सवाल अंधकार में थे। फिलहाल तो हमें अपनी जान बचानी थी।

कल्पना में अभी इतनी शक्ति नहीं थी कि वह चल फिर सके। वह एक क़दम चलती और लड़खड़ा कर गिर पड़ती। फिर मैं घोड़े की जीनें और उस पर रखा थोड़ा बहुत सामान ले आया। मैंने कल्पना को जीन पर कम्बल बिछाकर बिठाया और उस पर घोड़े की बाग बाँधकर अपनी कमर से कसी और इस तरह उसे खींचता हुआ बर्फ़ पर फिसलने लगा। हम लीचो नदी की तरफ बढ़ रहे थे।

मैं शीघ्र अति शीघ्र यहाँ से दूर निकल जाना चाहता था। यदि खज़ाना चीनियों के हाथ नहीं आया होता तो चंद घंटों में वे नीचे उतर आयेंगे और उनकी दूसरी टुकड़ियाँ भी आ सकती थीं और फिर हमारा पकड़ा जाना निश्चित था।

हम निरंतर तीन घंटे तक घिसट-घिसट कर आगे बढ़ते रहे।

❑❑❑
 
लगभग चार बजे मुझे ऊपर पहाड़ पर चीनी फौजी दिखायी दिए और मैं जल्दी से कल्पना को साथ लेकर एक चट्टान की आड़ में छिप गया।

आधे घंटे बाद मुझे ऐन अपने सिर के ऊपर लगभग पचास फिट की बुलंदी पर चीनी फौजियों की एक टोली दिखायी दी। मैं दम साधे चट्टान पर चिपका खड़ा था। चीनी फौजी इधर-उधर झाँकते रहे, फिर वापस चले गये। लेकिन मुझे मालूम था कि वे आसानी से पीछा नहीं छोड़ेंगे।जब चारों तरफ अँधेरा छाने लगा तो हम एक बार फिर विपरीत दिशा की ओर अग्रसर होने लगे। कल्पना बार-बार जीन के ऊपर से फिसल कर गिर जाती थी। आख़िरकार मुझे उसकी कमर के गिर्द रस्सी लपेटनी पड़ी। जब हम दरिया के समीप पहुँचे तो मैंने देखा कि एक घुड़सवार तेज़ी के साथ हमारी तरफ बढ़ा आ रहा है। मैंने अपना चाकू निकाल लिया, लेकिन उसे इस्तेमाल करने की नौबत नहीं आयी। घुड़सवार रंग लंग था।

मुझे एक ख़ुशी महसूस हुई।

रंग लंग की वफादारी का ये सबसे बड़ा सबूत था। शायद दुनिया में ऐसा वफादार शख्स किसी को ही नसीब हो, जो अरबों रुपये के ख़ज़ाने के साथ वापस लौट रहा था। वह चाहता तो कहीं भी निकल जाता और उसकी पुश्त दर पुश्त शहंशाहों की तरह जीवन गुजार सकती थी।परंतु रंग लंग लौट रहा था; या वादी में हमें खोजता-खोजता यहाँ आ पहुँचा था। मैंने उससे काफिले के दूसरे लोगों के बारे में पूछताछ शुरू कर दी। लेकिन रंग लंग उनके बारे में मुझे कुछ न बता सका क्योंकि वह मेरे साथ-साथ ही वहाँ से फ़रार हुआ था और उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा था।

और यूँ भी अब मैं उन लोगों के प्रति आशावान न रहा था। मैंने अपने आप पर सब्र कर लिया था। निःसंदेह उनके जीवित रहने का तो प्रश्न नहीं उठता था और यदि उनमें से कोई जिंदा हुआ भी तो वह चीनियों की क़ैद में सिसक-सिसक कर दम तोड़ने के लिए जा चुका होगा।

रंग लंग भी मेरी तरह चीनियों को डॉज देकर फ़रार होने में क़ामयाब हो गया था और पूरी वफादारी का परिचय देकर यहाँ पहुँचा था। अगर मैं किसी मुल्क का बादशाह होता और यह खज़ाना मेरा होता तो निःसंदेह रंग लंग को पूरा खज़ाना देकर भी उसकी वफादारी का पुरस्कार न अदा कर पाता।

रंग लंग इस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ था। उसने मुझे विश्वास दिलाया कि चीनी पहाड़ से नीचे नहीं उतरेंगे, बल्कि यहाँ से चंद मील दूर जो पुल है वहाँ पहुँचकर वे हमारी तलाश करेंगे।

चीनियों से बचने के लिए हमने पुल का रास्ता अख्तियार करने की बजाय दरिया को बीच से पार किया।दरिया बहुत गहरा और तेज़ उफनती लहरों के जोश में बह रहा था। लेकिन रंग लंग ने येन-केन घोड़े पर सवार कराकर हमें बारी-बारी पार लगा दिया। जवाहरात के थैले घोड़े की पीठ पर बाँध दिए गये थे।किनारे पर पहुँचकर हमने थोड़ी देर आराम किया। फिर काफिले वालों के निश्चित मार्ग की तरफ चल पड़े।

रंग लंग ने हम दोनों को एक जगह छोड़ा और परिस्थितियों का जायजा लेने अकेले आगे चला गया। अब यह आवश्यक था कि आगे बढ़ने से पहले हम एक-एक क़दम फूँक-फूँक कर रखें। एक तरह से रंग लंग स्काउट का काम कर रहा था।

जब वह वापस आया तो उसने बताया कि चीनी फौजी चारों तरफ फैले हुए हैं। उन्होंने आगे अलाव रोशन कर रखे हैं और टोलियों में बँटे हुए वे हँसी-ठहाकों में मशगूल हैं।

रंग लंग ने मुझसे कहा–“हमें रात भर सफर करना है ताकि हम उनके हाथ न आयें। रात भर में हम यहाँ से जितनी दूर निकल जाएँ उतना ही बेहतर है।”

हम असल रास्ते से हटकर पश्चिम की तरफ एक छोटे रास्ते पर हो लिए। आगे जाकर यह रास्ता चौड़ा हो गया। पौ फटने तक हमने ख़ासा फासला तय कर लिया था। रंग लंग ने एक पहाड़ी के ऊपर एक गार ढूँढ़ निकाला और तीनों उसके अन्दर जाकर गिर पड़े।

हमारे शरीर थकान से चूर-चूर थे और हमारे अंदर अब एक क़दम भी आगे बढ़ने की क्षमता नहीं रही थी।

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मैं सो रहा था कि अचानक किसी की चीखों से मेरी आँख खुल गयी। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। कल्पना अब तक सो रही थी।मैं जल्दी से गार से बाहर निकला।रंग लंग पहाड़ी के किनारे की तरफ से दौड़ता हुआ मेरे पास आया। उसकी साँस फूली हुई थी।

“साहब! हमारे बिल्कुल नीचे एक गार में चीनी मौजूद हैं। उन्होंने किसी औरत को पकड़ रखा है और उसे यातना दे रहे हैं। उन्होंने उसके पाँव आग से जला दिए हैं ताकि वह दोबारा भागने की कोशिश न करे।”

“तुम्हारा घोड़ा कहाँ है ?” मैंने पूछा।

“मैंने उसे यहाँ से कुछ दूर एक चट्टान के पीछे बाँध दिया है और...।” उसने अपना जुमला अधूरा छोड़ दिया।

वह मेरा मतलब समझ गया था। अगर चीनियों ने घोड़े की हिनहिनाहट सुन ली; या उसे देख लिया तो यक़ीनन हम तक आ पहुचेंगे।

मैं और रंग लंग एक चट्टान की आड़ में बैठे नीचे झाँकने लगे। थोड़ी देर बाद कल्पना भी हमें ढूँढ़ती हुई वहाँ आ पहुँची।

अब चीखों की आवाजें बंद हो गयी थीं।नीचे दो चीनी आग पर खाना पका रहे थे। एक चीनी सैनिक जीप पर बैठा हुआ वायरलेस पर किसी से बातें कर रहा था और दोएक मोटी औरत को पकड़े हुए थे और ये औरत छोटी माता थी।

मैं अन्दर ही अन्दर खौल कर रह गया। अगर मेरा वश चलता तो वहीं से उनके ऊपर छलाँग लगा देता, जो एक कमज़ोर और बेबस औरत पर ज़ुल्म कर रहे थे। यह तो निश्चित था कि वे क्यों उसे यातना दे रहे थे। कदाचित वे यह मालूम करना चाहते थे कि महान भिक्षुणी और खानकाह का खज़ाना कहाँ है ? महान भिक्षुणी की शक्ल-सूरत कैसी है और खानकाह का खज़ाना किस रूप में है ?

स्पष्ट था कि छोटी माता ने अब तक उन्हें कुछ नहीं बताया था। ऐसा वह कर भी नहीं सकती थी। वह अपना जीवन त्याग देती, परंतु अपना धर्म भ्रष्ट न करती।

जीप में बैठा हुआ चीनी निरंतर वायरलेस पर बातचीत कर रहा था। चूँकि उसकी आवाज़ तेज़ थी इसलिए उसके शब्द साफ सुनायी दे रहे थे। कल्पना को चीनी भाषा अच्छी तरह आती थी। वह उन शब्दों का अर्थ हमें बता रही थी। एक तरह से चीनी वायरलेस रिकॉर्ड हो रहा था।

नदी के चारों तरफ चीनी फौजी फैले हुए थे। नीचे वाली टोली आगे बढ़ने से लाचार थी क्योंकि जीप के लिए अब बर्फबारी के कारण रास्ता बहुत तंग हो गया था। अतः वे वायरलेस से खच्चर भेजने का अनुरोध कर रहे थे। उनसे कहा गया था कि वे जहाँ हैं, वहीं रुके रहें। उनकी मदद के लिए एक और पार्टी रवाना की जा रही है।

यह पार्टी सिर्फ एक खच्चर और एक डॉक्टर पर निर्भर थी जोसूरज डूबने के बाद वहाँ पहुँची। इससे डॉक्टर का रेडक्रॉस निशान नज़र आ गया था और जब वह पार्टी करीब आयी तो मैं बुरी तरह उछल पड़ा। डॉक्टर का चेहरा मुझे जाना-पहचाना लग रहा था। निश्चय ही वह चीनी डॉक्टर ली था। ली, जिसका एक बड़ा एहसान मुझ पर था और डॉक्टर होने के साथ-साथ एक शक्तिशाली चतुर लड़का भी था।

ली के वहाँ आने का मतलब था कि कुंग भी वहीं आस-पास होना चाहिए। मेरी रगें फड़कने लगीं। कुंग जैसे दरिंदों को मारने के लिए अक्सर मैं इंतकामी बन जाता था। कुंग भी हरी आनंद जैसे साथियों में से एक था।

मुझे यूँ लगा जैसे एक बार फिर ली को क़ुदरत ने फ़रिश्ता बनाकर मेरी मदद के लिए वहाँ भेजा है।उनकी आवाजें हमारे कानों में धीमी-धीमी टकरा रही थीं। कल्पना उनकी बातों पर ध्यान लगाये थी। कल्पना ने बताया कि दूसरे खच्चर वहाँ कब तक पहुँचेंगे, यह आने वालों ने बताया था। और जीप के लिए यह हुक्म है कि वह वापस चली जाए। जीप वाले ने हुक्म सुनते ही जीप स्टार्ट कर दी थी।

चूँकि अँधेरी धुंध उतर आयी थी इसलिए केवल जीप के इंजन का शोर ही सुनायी देता था। यह मालूम नहीं पड़ता था कि जीप के साथ कितने आदमी वापस लौट रहे हैं। वह पीछे की ओर मुड़ गयी थी।अब मुझे ली की आवाज़ सुनायी दे रही थी। वह छोटी माता के पास झुका हुआ था। कल्पना ने बताया कि वह क्या कह रहा है।

“मेरी बहन जो तुमसे पूछा जा रहा है, उसका जवाब दे दो। आख़िर तुम क्यों इतनी यातनाएँ बर्दाश्त कर रही हो ?” ली ने छोटी माता से कहा।

परंतु छोटी माता ने कोई उत्तर नहीं दिया। सिर्फ कराहती रही। वे लोग छोटी माता की जुबान खुलवाने में नाकाम हो रहे थे।परिणाम यह निकला कि चीनियों ने एक बार फिर उसे यातनाएँ पहुँचानी शुरू कर दी और फिजाँ चीखों से गूँज उठी। उसकी अधिक चीखें सुनना और छोटी माता की यातनाओं का दर्दनाक दृश्य देखना हमारी आँखों के वश से बाहर की बात थी। हम तीनों वापस अपने गार के लिए चल पड़े।

लगभग नौ बजे जब हम तीनों गार में बैठे बातें कर रहे थे तबहमने घोड़े की हिनहिनाहट सुनी। शायद वह भूखा था। रंग लंग उसे चारा डालने के लिए बाहर निकल गया।

वह लगभग डेढ़ घंटे बाद वापस आया। उसका जिस्म नीला पड़ चुका था और सर्दी के मारे थर-थर काँप रहा था।

“मुझे चारा नहीं मिला साहब।” उसने मुझे बताया। “मैं गोली मारकर उसे हलाक कर देता। लेकिन गोली चलने की आवाज़ से चीनी चौकन्ना हो जाते। घोड़ा बिफरा हुआ है और वह बहुत जल्द अपनी रस्सी तुड़ाने में क़ामयाब हो जाएगा। उसके बाद चीनियों को सब कुछ मालूम हो जाएगा। हमें जल्द से जल्द यहाँ से निकल भागना चाहिए।”

“यह कैसे संभव है ?” मैंने कहा। “रास्ते में तो उन लोगों ने पड़ाव डाल रखा है। और फिर घोड़ा भूखा रहकर किस तरह काबू में रहेगा ?”

इस सवाल के जवाब में रंग लंग के पास एक योजना थी। और जब उसने मुझे अपनी योजना बतायी तो मुझे बहुत गुस्सा आया।

“तुम शायद पागल हो गये हो।” मैंने झुंझलाकर कहा। “वे पाँच हैं और हम कुल दो। फिर हमारी हालत भी बदतर है।”

“और कल ?” रंग लंग को भी गुस्सा आ गया। “कल तक उनकी संख्या पाँच सौ तक पहुँच जायेगी। यह हमारे लिए सुनहरा अवसर है। उनमें से दो तो सो चुके हैं और तीन बाहर बैठे हुए हैं। उनमें से भी दो जल्द गार में चले जायेंगे। मैंने वहाँ का अच्छी प्रकार मुआइना कर लिया है इसलिए योजना बनायी है। जहाँ कुल पाँच आदमी हों, वहाँ पहरेदार सिर्फ एक ही हो सकता है। हम चुपके से उस एक पहरेदार को दबोच लेंगे। फिर गार वालों से निपटना शायद इतना मुश्किल न होगा। इसके अलावा साहब! यह भी तो सोचें कि हम यहाँ कब तक गार में छिपे बैठे रहेंगे ? हमारे पास खुराक का ज़खीरा बिल्कुल समाप्त हो चुका है। अगर आज हिम्मत से काम नहीं लेंगे तो कल चूहों की तरह मारे जायेंगे।”

रंग लंग की योजना में सिर्फ पाँच आदमी थे। उसकी सूचना ग़लत भी नहीं हो सकती थी क्योंकि जो पार्टी वहाँ आयी थी उसमें कुल तीन आदमी थे। मैं एक बार ख़ुद इस निरीक्षण के लिए गार से बाहर निकला और काफी देर तक बाहर ही मंडराता रहा।

बारह बजे के करीब वहाँ एक पहरेदार के अलावा कोई बाहर नहीं रहा। सब गार में जा चुके थे। पहरेदार बाहर अलाव के पास बैठा आग ताप रहा था। जब मैं रंग लंग को साथ लेकर नीचे उतर रहा था तो एक बार फिर हमारा घोड़ा जोर से हिनहिनाने लगा। हम और भी तेज़ रफ़्तार से नीचे उतरते चले गये क्योंकि वह चौकन्ना होकर खड़ा हो गया था और इधर-उधर देख रहा था।

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घोड़े की हिनहिनाहट एक बार फिर शांत हो गयी थी। पहरेदार ने अपनी राइफल तान ली थी और वह दबे क़दम उस दिशा में बढ़ रहा था जिधर से घोड़े की हिनहिनाहट गूँजी थी। परिणाम यह हुआ कि उसे हमारे निकट से गुजरना पड़ा। और यही क्षण उसके लिए मौत का क्षण बनकर रह गया।

रंग लंग ने तुरंत एक जुस्त भरी और पहरेदार को समेटे हुए लुढ़कता चला गया। अगले ही पल उसका दुधारी खंज़र चमका और फिर पहरेदार के कंठ से धीमी कराह निकली। उसकी चीख को रंग लंग ने अपने हाथ से दबा दिया था।

रंग लंग ने उसे तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि उसका शरीर बेहरकत न हो गया। फिर उसने मुझे संकेत दिया और हम अलाव की तरफ बढ़ गये। अलाव के पास सन्नाटा छाया हुआ था और किसी को भी इस हलचल का पता न था।गार अधिक बड़ा नहीं था। वह सब सो रहे थे। हम धीरे-धीरे सावधानी के साथ अंदर क़दम रख रहे थे। भीतर अँधेरा था। अचानक मैं किसी की टांग से टकरा गया। वह शख्स हड़बड़ाकर उठ बैठा और अँधेरे में आँखें फाड़-फाड़ कर इधर-उधर देखने लगा।मैं दम साधे एक तरफ दुबक गया और प्रतीक्षा करता रहा कि वह शख्स दुबारा कब सोता है। लेकिन वह शख्स नहीं सोया।अचानक गार में तेज़ रोशनी फ़ैल गयी। यह टॉर्च की रोशनी थी। दूसरे ही क्षण रंग लंग ने चीते की तरह छलाँग लगा दी और टॉर्च उसके हाथ से छूटकर नीचे जा गिरी। वह मेरे करीब आकर गिरा। मैंने अपने बाजू को उसकी गर्दन पर लपेटा और हाथ उसके मुँह पर रख दिया। इस बीच रंग लंग को अवसर मिल गया। उसने पूरी शक्ति से खंज़र उसके पहलू में पैवस्त कर दिया।

इतने में उसका दूसरा साथी भी जाग गया था। मैं उस पर झपट पड़ा।वह उनींदी हालत में था इसलिए एक ही झटके में उसके पाँव उखड़ गये। मैं अपने एकमात्र हाथ की शक्ति से पहले भी बड़े करिश्मे दिखा चुका था। इस हाथ ने न जाने कितनों की गर्दनें तोड़ीं। लेकिन वह व्यक्ति काफी शक्तिशाली था। अगर मेरे पाँवों की कैंची जानदार न होती तो वह मेरे बंधन से निकल गया होता।वह अपने आपको मेरी गिरफ़्त से आज़ाद करने के लिए जी तोड़ संघर्ष कर रहा था। उसने बहुतेरे हाथ-पाँव चलाये, परंतु मैंने उसका विरोध समाप्त करने के लिए सम्पूर्ण शक्ति लगा दी और आख़िर वह निढाल हो ही गया। इतने में ही मेरे पसीने छूटने लगे थे।

रंग लंग डॉक्टर की तरफ बढ़ रहा था।

“नहीं! उसे छोड़ दो!” मैंने चीखकर कहा और रंग लंग ठिठक गया।

डॉक्टर भी जाग चुका था और आँखें फाड़-फाड़ कर हमें घूर रहा था। टॉर्च की रोशनी जमीन से लहरा रही थी जिसके कारण वहाँ थोड़ा-बहुत प्रकाश फैल चुका था।ली के अलावा अब एक ही चीनी बचा था। इससे पहले कि वह राइफल खोजकर सीधी करता मैंने उस पर छलाँग लगा दी जबकि रंग लंग ली पर राइफल ताने खड़ा था। उसने गोली नहीं चलायी थी और हम चलाना भी नहीं चाहते थे। उससे धमाके की गूँज से रात के सन्नाटे में दूर तक आवाज़ जा सकती थी।रंग लंग के हाथ खून से तर-ब-तर थे।

जब मैं आख़िरी चीनी की गर्दन तोड़कर सीधा खड़ा हुआ तो ली ने मुझे पहली ही नज़र में पहचान लिया था। उसने मेरी आवाज़ भी सुन ली थी और वह स्तब्धता के आलम में खामोश खड़ा था। अगर हमारी जगह आक्रमणकारी कोई और होता तो शायद ली इस तरह न खड़ा होता। वह दो-चार पर तो अकेला ही भारी पड़ सकता था।

“मुझे पहचाना डॉक्टर ली ?” मैंने उसे संबोधित किया।

“हाँ, कुँवर राज ठाकुर! मैंने आपको पहचान लिया।” ली के स्वर में अब भी आश्चर्य था और रंग लंग हम दोनों के मुँह तक रहा था।

रंग लंग ख़ुद भी जख्मी था। उसके बाजू से खून टपक रहा था। अभी तक उसने बड़े साहस का परिचय दिया था। इसी लड़ाई के दौरान किसी चीनी का ब्योनेट उसके बाजू में उतर गया था। लेकिन रंग लंग आख़िरी दुश्मन को मौत के घाट उतारने से पहले तकलीफ जाहिर नहीं करना चाहता था।

जब उसने देखा कि हम दोनों एक दूसरे से परिचित हैं तो वह राइफल झुकाकर एक तरफ बैठ गया और अपने जख्म को बाँधने के लिए पट्टियाँ तलाश करने लगा।

“ठहरो! यह काम मैं बखूबी कर सकता हूँ।” ली ने उसे तिब्बती भाषा में संबोधित किया। “लेकिन तुम लोगों को मुझे जीवित नहीं छोड़ना चाहिये था।”

“यह कैसे हो सकता था ली ? तुम्हारा एक एहसान मेरे ऊपर था। चाहकर भी मैं उसका क़र्ज़ नहीं उतार सकता।” मैंने कहा। “मुझे आशा थी कि जिंदगी में कभी न कभी तुमसे एक बार फिर मुलाक़ात होगी। शायद यह क़र्ज़ मैं उतार सकूँ।”

डॉक्टर ली ने रंग लंग के बाजू का जख्म साफ करना शुरू कर दिया था।

“आश्चर्य है कि आप लोग एक दूसरे को जानते हैं।” रंग लंग ने कहा।

“हाँ रंग लंग, हमारी जान-पहचान उस वक़्त की है जब मैं चीनी कैम्प में क़ैद था और डॉक्टर ली वहाँ डॉक्टर थे।” फिर मैंने रंग लंग को बताया कि किस तरह ली ने मेरी जान बचायी थी।

रंग लंग की बाजू पर पट्टी बाँधने के बाद ली उठ खड़ा हुआ और मुझे संबोधित करके बोला–“शायद आप लोग यहीं आस-पास कहीं पड़ाव डाले हुए हैं और चीनी फौजें हर जगह आप लोगों को तलाश करती फिर रही हैं। आप कमांडिंग ऑफिसर कुंग को भूले न होंगे। वह यहीं दूसरे पड़ाव पर मौजूद है और ख़ज़ाने को प्राप्त करने के लिए सिर तोड़ कोशिश कर रहा है।

“कुंग से मुलाक़ात करने की मेरी बहुत इच्छा थी।” मैंने कहा। “परंतु इस वक़्त हालात अच्छे नहीं हैं।”

“तुम्हारे साथ यामदरंग की खानकाह की महान भिक्षुणी भी होगी ?”

“हाँ, वह भी हमारे साथ है!”

“ईश्वर तुम्हारी सहायता करे!” ली बड़बड़ाया। “तुम्हें फ़ौरन यहाँ से निकल जाना चाहिए और मेरे लिए एक मेहरबानी करते जाओ। सुबह होते ही वे लोग इस तरफ फैल जायेंगे और जब इन लाशों को देखेंगे तो तुम्हारी तलाश में जमीन-आसमान एक कर देंगे। उन्हें मुझ पर संदेह न हो इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम लोग मुझे यहीं बाँध डालो; वरना कुंग बड़ा शक्की मिजाज का व्यक्ति है। वह मुझ पर पहले भी संदेह करता आया है। जब तुम कैम्प से फ़रार से हुए थे तो उसे न जाने कैसे मुझ पर शक़ हो गया था। परंतु प्रमाण नहीं था इसलिए सलामत हूँ, वरना अब तक मुझे बंदी बनाकर पीकिंग भेज दिया गया होता और मेरा कोर्टमार्शल कर दिया गया होता। अब देर मत करो।”

रंग लंग मेरी सूरत देखने लगा। फिर वह बोला–“डॉक्टर ली ठीक ही फरमाते हैं। आप यहीं ठहरिये, मैं घोड़ा लेकर आता हूँ। साथ में दूसरा सामान और देवी माता को भी लाना होगा। हमें अब वक़्त जाया नहीं करना चाहिए।”

“नहीं! तुम यहीं रुको। तुम जख्मी हो।”

मैंने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, परंतु वह नहीं माना और घोड़ा लेने चला गया।
 
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