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छोटी माता अभी मरी नहीं थी, परंतु ली ने बताया कि वह कुछ ही देर की मेहमान हैं। अब उस पर कोई दवा भी कारगर नहीं हो सकती। फौजियों ने उसे बहुत यातनाएँ दी थी। मैं छोटी माता के पास झुककर बैठ गया।
वह बेहोश थी। ली के प्रयासों से वह होश में आयी। इस बीच मैं ली से भी बातें करता रहा। वह मुझे अब भी चमत्कारी व्यक्ति समझता था। उसके लिए यह भी कम हैरत की बात न थी कि मैं यामदरंग की खानकाह से ख़ज़ाने के साथ लौट रहा हूँ और मुझे इसका नेतृत्व सौंपा गया है।
मैं उसे विश्वास दिलाता रहा कि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ। ली ने मुझे यह भी बताया कि कैम्प से मेरे फ़रार होने के बाद क्या हुआ। जिस सैनिक को मेरी पोशाक पहनाकर ली ने खेमे में छोड़ा था उसका चेहरा इस कदर बिगाड़ दिया था कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था। आग के कारण वह और भी झुलस गया था। लेकिन कुंग को संदेह था कि मरने वाला क़ैदी नहीं था। उसने मृतक की डॉक्टरी जाँच और चीर-फाड़ करवायी। यह काम भी ली ने ही किया था। चूँकि ली ने क़ैदी का डॉक्टरी मुआइना भी किया था इसलिए वह आसानी से जान सकता था कि मृतक कौन हो सकता है, क़ैदी या कोई और।
एक चीनी सैनिक कम था इसलिए यह शक़ हो गया था। परंतु ली ने अपनी रिपोर्ट देने में लगभग पाँच दिन लिए। उसने बहाना बनाया था कि उसके पास पोस्टमॉर्टम का जरूरी सामान नहीं है और उसका पोस्टमॉर्टम पीकिंग में हो सकता है। परंतु लाश पीकिंग ले जाने में तो बड़ा विलम्ब हो जाता। अलबत्ता ल्हासा से वह सारा सामान मँगाया गया जिसकी ली ने जरूरत बतायी थी। इसी में तीन दिन निकल गये। उसके बाद ली ने चार दिन अपनी तरफ से लगा दिए। उसे यकीन था कि इतने दिन मेरी फरारी के लिए पर्याप्त होंगे।
क्योंकि वह ग़लत रिपोर्ट नहीं देना चाहता था; अन्यथा बाद में कभी भी भेद खुलने पर स्वयं ली का जीवन संकट में पड़ जाता। उसने सही रिपोर्ट दी और तभी से कुंग उसके प्रति संदिग्ध था। उसका ख्याल था कि डॉक्टर ली ने जानबूझकर विलंब किया था। लेकिन इसका कोई कारण उसके पास नहीं था, और न कोई प्रमाण।
और अब यह घटना कुंग को और भी संदिग्ध कर सकती थी। वह ठीक ही कहता था। उसे जख्मी करके वहाँ बाँध देना लाज़िमी था।
“मैं उन्हें अपने हिसाब से बयान दे दूँगा। मैं उन्हें बताऊँगा कि हमलावर कुछ तिब्बती थे और छोटी माता को छुड़ाने आये थे। वे छोटी माता को जीवित देखना चाहते थे। इसलिए जब मैंने उन्हें बताया कि मैं डॉक्टर हूँ तो उन्होंने इसलिए मुझे छोड़ दिया ताकि मैं छोटी माता को होश में ला सकूँ। उन्होंने मुझसे वादा किया था कि मैंने उसे बचा लिया तो मुझे जीवित छोड़ देंगे और मैंने छोटी माता का उपचार करके उसे जीवित रखने में सफलता प्राप्त की थी। अब तुम्हें सिर्फ यह करना होगा राज ठाकुर कि छोटी माता का शव कहीं दफना दो ताकि मेरा यह बयान सही साबित हो सके।” ली ने मुस्कुराकर कहा।
छोटी माता को जब होश आया तो उस वक़्त रंग लंग लौट चुका था। कल्पना भी उसके साथ थी। छोटी माता कल्पना को देखते ही उसकी बाँहों में टूट सी पड़ी और सुबक-सुबककर बताती रही कि उस पर क्या-क्या जुल्म तोड़े गये थे।
कल्पना भी उससे लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। वह दीवानी सी बार-बार उसके गालों का बोसा ले रही थी। और फिर छोटी माता को अंतिम हिचकी लेने में अधिक समय नहीं लगा।
हमने वैसा ही किया जैसा कि ली चाहता था। छोटी माता का पार्थिव शरीर उस जगह से कुछ दूर बर्फ़ में दफना दिया गया। बर्फ़ का वह टीला एक यादगार टीला था, जहाँ उस महान स्त्री की आत्मा सो रही थी। जिसने अंतिम दम तक खानकाह की वफादारी का सबूत दिया था।
ली को जख्मी करके बाँधकर वहीं डाल दिया गया। ली ने हमें यह भी बताया कि हमें किस-किस जगह चीनियों का खतरा है और बच निकलने के लिए किस रास्ते का प्रयोग करना होगा।
उसके बाद ली को अलविदा कहकर हम चल पड़े।
वह बेहोश थी। ली के प्रयासों से वह होश में आयी। इस बीच मैं ली से भी बातें करता रहा। वह मुझे अब भी चमत्कारी व्यक्ति समझता था। उसके लिए यह भी कम हैरत की बात न थी कि मैं यामदरंग की खानकाह से ख़ज़ाने के साथ लौट रहा हूँ और मुझे इसका नेतृत्व सौंपा गया है।
मैं उसे विश्वास दिलाता रहा कि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ। ली ने मुझे यह भी बताया कि कैम्प से मेरे फ़रार होने के बाद क्या हुआ। जिस सैनिक को मेरी पोशाक पहनाकर ली ने खेमे में छोड़ा था उसका चेहरा इस कदर बिगाड़ दिया था कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था। आग के कारण वह और भी झुलस गया था। लेकिन कुंग को संदेह था कि मरने वाला क़ैदी नहीं था। उसने मृतक की डॉक्टरी जाँच और चीर-फाड़ करवायी। यह काम भी ली ने ही किया था। चूँकि ली ने क़ैदी का डॉक्टरी मुआइना भी किया था इसलिए वह आसानी से जान सकता था कि मृतक कौन हो सकता है, क़ैदी या कोई और।
एक चीनी सैनिक कम था इसलिए यह शक़ हो गया था। परंतु ली ने अपनी रिपोर्ट देने में लगभग पाँच दिन लिए। उसने बहाना बनाया था कि उसके पास पोस्टमॉर्टम का जरूरी सामान नहीं है और उसका पोस्टमॉर्टम पीकिंग में हो सकता है। परंतु लाश पीकिंग ले जाने में तो बड़ा विलम्ब हो जाता। अलबत्ता ल्हासा से वह सारा सामान मँगाया गया जिसकी ली ने जरूरत बतायी थी। इसी में तीन दिन निकल गये। उसके बाद ली ने चार दिन अपनी तरफ से लगा दिए। उसे यकीन था कि इतने दिन मेरी फरारी के लिए पर्याप्त होंगे।
क्योंकि वह ग़लत रिपोर्ट नहीं देना चाहता था; अन्यथा बाद में कभी भी भेद खुलने पर स्वयं ली का जीवन संकट में पड़ जाता। उसने सही रिपोर्ट दी और तभी से कुंग उसके प्रति संदिग्ध था। उसका ख्याल था कि डॉक्टर ली ने जानबूझकर विलंब किया था। लेकिन इसका कोई कारण उसके पास नहीं था, और न कोई प्रमाण।
और अब यह घटना कुंग को और भी संदिग्ध कर सकती थी। वह ठीक ही कहता था। उसे जख्मी करके वहाँ बाँध देना लाज़िमी था।
“मैं उन्हें अपने हिसाब से बयान दे दूँगा। मैं उन्हें बताऊँगा कि हमलावर कुछ तिब्बती थे और छोटी माता को छुड़ाने आये थे। वे छोटी माता को जीवित देखना चाहते थे। इसलिए जब मैंने उन्हें बताया कि मैं डॉक्टर हूँ तो उन्होंने इसलिए मुझे छोड़ दिया ताकि मैं छोटी माता को होश में ला सकूँ। उन्होंने मुझसे वादा किया था कि मैंने उसे बचा लिया तो मुझे जीवित छोड़ देंगे और मैंने छोटी माता का उपचार करके उसे जीवित रखने में सफलता प्राप्त की थी। अब तुम्हें सिर्फ यह करना होगा राज ठाकुर कि छोटी माता का शव कहीं दफना दो ताकि मेरा यह बयान सही साबित हो सके।” ली ने मुस्कुराकर कहा।
छोटी माता को जब होश आया तो उस वक़्त रंग लंग लौट चुका था। कल्पना भी उसके साथ थी। छोटी माता कल्पना को देखते ही उसकी बाँहों में टूट सी पड़ी और सुबक-सुबककर बताती रही कि उस पर क्या-क्या जुल्म तोड़े गये थे।
कल्पना भी उससे लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। वह दीवानी सी बार-बार उसके गालों का बोसा ले रही थी। और फिर छोटी माता को अंतिम हिचकी लेने में अधिक समय नहीं लगा।
हमने वैसा ही किया जैसा कि ली चाहता था। छोटी माता का पार्थिव शरीर उस जगह से कुछ दूर बर्फ़ में दफना दिया गया। बर्फ़ का वह टीला एक यादगार टीला था, जहाँ उस महान स्त्री की आत्मा सो रही थी। जिसने अंतिम दम तक खानकाह की वफादारी का सबूत दिया था।
ली को जख्मी करके बाँधकर वहीं डाल दिया गया। ली ने हमें यह भी बताया कि हमें किस-किस जगह चीनियों का खतरा है और बच निकलने के लिए किस रास्ते का प्रयोग करना होगा।
उसके बाद ली को अलविदा कहकर हम चल पड़े।