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हम दोनों एक-दूसरे से छेड़छाड़ करते हुए रास्ता तय कर रहे थे। फिर उसी समय चौंककर अलग हुए जब टैक्सी एक झटके के साथ रुकी। मैंने बाहर देखा तो पता चला कि एक पुलिस चौकी के आगे खड़ी है। इससे पहले कि मैं टैक्सी ड्राइवर से कुछ पूछता, वह खुद पलट पड़ा। कड़े स्वर में बोला-
“तुम साला दुनिया की आँख में धूल झोंकना माँगता। अभी तुमको पता चल जाएगा कि यह छोकरी कौन है।”
टैक्सी ड्राइवर ने अंतिम शब्द शकुन्तला की ओर इशारा करते हुए कहा था। इससे पहले कि मैं स्थिति को समझ पाता टैक्सी ड्राइवर नीचे उतर गया। पुलिस चौकी के अंदर जाने से पहले उसने गेट पर खड़े संतरी से कुछ बात की थी लेकिन दूरी के कारण मैं उन दोनों की बातें सुन न सका।
शकुन्तला ने संतरी को टैक्सी की ओर आते देखा तो घबरा कर बोली- “राज, अब क्या होगा ?”
“तुम चुप रहो। जो कुछ होगा देखा जाएगा।”
पुलिस चौकी के ड्यूटी आफिसर ने शकुन्तला को पहली ही नज़र में पहचान लिया। फिर जब उसने बताया कि तमाम पुलिस चौकियों को शकुन्तला के फरार होने की खबर मिल चुकी है तो मेरे पैरों तले की ज़मीन निकल गयी।
फिर भी मैंने स्वयं पर क़ाबू पाते हुए ड्यूटी ऑफिसर को संबोधित किया- “शकुन्तला बालिग़ है और अपनी इच्छा से मेरे साथ जा रही है। हमने कोई अपराध नहीं किया।”
“क्यों देवी जी, क्या यह टूण्टा सही कह रहा है ?” ड्यूटी ऑफ़िसर ने मुझे घूरते हुए शकुन्तला से पूछा।
वह अचानक फूट-फूटकर रोने लगी और उस मक्कार औरत ने हिचकियाँ लेते हुए कहा– “ऑफ़िसर, यही वह कमीना है जो मुझे ज़बरदस्ती अपहरण करके न जाने कहाँ ले जा रहा है। इसने मुझे धमकी दी थी यदि मैंने शोर मचाया तो यह मुझे जान से मार देगा। मुझे मेरे डैडी के पास पहुँचा दो ऑफ़िसर।”
शकुन्तला का बयान मुझे फँसा देने के लिये बहुत काफ़ी था। मैंने अपने बचाव के लिये ड्यूटी ऑफ़िसर से अपनी बेगुनाही साबित करने की बहुत चेष्टा की परंतु मुझे बुरी तरह मारकर लोहे के सलाख़ों के पीछे धकेल दिया गया।
अदालत में पेशी हुई तो वहाँ भी मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई। शकुन्तला का बयान और उसके पिता की शोहरत ने मेरी रही-सही आशाओं पर भी पानी फेर दिया। दूसरी पेशी पर मजिस्ट्रेट ने मुझे चार महीने बामुशक्कत की सजा सुना दी।
पूना जेल में चार माह तक मुझे जिन पीड़ादायक यातनाओं का सामना करना पड़ा उसे बयान करना मेरे वश की बात नहीं। शकुन्तला के बाप ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि जेल की भीतर ही सजा पूरी होने से पहले मुझे मार डाला जाए लेकिन मेरी किस्मत में चूँकि दर-दर कर की ठोकरें खाना लिखा था इसलिए मैं ज़िंदा रहा।
चार माह की मुसीबतें सहने के बाद जब मुझे रिहाई मिली तो मेरी हालत इतनी बदतर थी कि अगर मेरा बाप भी मुझे देखता तो शायद न पहचान पाता। मेरा एक-एक जोड़ फोड़े के मानिंद दुख रहा था। मेरी दाढ़ी बेतहाशा बड़ी हुई थी। जेल में संतरी चूँकि मुझे दो वक्त का खाना नहीं देते थे इसलिए मैं बेहद कमज़ोर हो गया था। मेरे जिस्म पर चार माह के जमे हुए मैल से शायद बदबू फूट रही थीं। रिहाई के वक्त वह मुझे पंद्रह रुपये भी वापस नहीं दिए गए जो गिरफ्तारी के वक्त मेरे ज़ेब से बरामद हुए थे। चुनांचे अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं लोगों के आगे हाथ फैलाकर भीख माँगू और अपना पेट भरूँ।
भीख माँगने से बेहतर है कि खुदकुशी कर ली जाए। मैं एक फ़ुटपाथ पर बैठे यह सोच रहा था। भूख से मेरी हालत ख़राब थी। मेरी अंतड़ियाँ बाहर निकलने को थीं। मैंने स्वयं को मौत के लिये अमादा कर लिया था। मगर उसी क्षण एक राहगीर मेरे पास आया और मेरी खस्ता हालत पर तरस खाकर मेरे सामने एक चवन्नी डालकर चलता बना।
इस चवन्नी को देखकर मेरा जी मचलाने लगा। मैंने उसे देर तक नहीं उठाया। काश! मैं उसे न उठाता और मर जाता। मगर मेरे पेट ने मेरे जमीर के विरुद्ध फ़ैसला सुना दिया। मैंने वह चार आने उठाये और दौड़कर क़रीब ही चने वाले के थैले पर जा पहुँचा। फिर भीख माँगना मेरे लिये कोई मसला नहीं रहा।
मैं दस-बारह रोज़ तक निरंतर पूना की सड़कों पर भटकता रहा। एक-दो रुपये मिल जाते तो पेट भर रोटी खाता। और जहाँ रात होती वहीं किसी पेड़ के साये में या फ़ुटपाथ पर लेटे रहता।
और यह सब तबाहियाँ मेरे ऊपर उसी रोज़ से नाजिल होनी शुरू हो गईं थी जब मोहिनी मुझसे रुखसत हुई थी। मेरी मोहिनी। काश! त्रिवेणी मुझे मिल जाए। मैं सोचता रहा।
मेरे हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। लेकिन मैं स्वयं को इस उम्मीद में ज़िंदा रखे हुए था कि हो सकता है कि मैं मोहिनी को दोबारा हासिल करने में सफल हो जाऊँ जिसका सीधा रास्ता त्रिवेणी की मौत थी। लेकिन त्रिवेणी मोहिनी को लेकर न जाने कहाँ ग़ायब हो गया था।
एक दिन मैं भीख माँगता हुआ पूना के रेसकोर्स तक चला गया जहाँ मेरे अलावा और भी बहुत से भिखारी मौजूद थे और सेठ-साहूकारों को रेस जीतने की दुआएँ दे-देकर उनके आगे हाथ फैला रहे थे। मैं भी उन भिखारियों में शामिल हो गया।
रेस शुरू होने में चूँकि एक घंटा बाकी था इसलिए रेसकोर्स के बाहर भी लोगों का खासा हूजुम था। मैं भीड़ से परे हटकर उस जगह आ गया जहाँ गाड़ियाँ आकर ठहरती थी। जैसे ही कोई गाड़ी आकर रुकती, मैं लपककर आगे बढ़ता और गाड़ी से उतरने वाले सेठ के सामने हाथ फैला देता। अगर किसी को मेरी हालत पर तरस आता तो वह मेरे हाथ पर आठ आने या रुपया रख देता। किसी को मेरी सूरत पर घिन आती तो वह मुझे दो-चार गालियाँ सुनाकर आगे बढ़ जाता।
मैं अपने धंधे में लगा हुआ था कि एक लम्बी सी कार आकर गेट के सामने रुकी। ड्राइवर ने उतरकर पिछली सीट का दरवाज़ा खोला तो कार से एक लम्बे कद और घुटे हुए शरीर का खूबसूरत व्यक्ति बाहर निकला फिर उसके पीछे एक जवान औरत बाहर निकली जिसकी सुंदर सूरत अय्याशी का मुखौटा लगती थी।
“तुम साला दुनिया की आँख में धूल झोंकना माँगता। अभी तुमको पता चल जाएगा कि यह छोकरी कौन है।”
टैक्सी ड्राइवर ने अंतिम शब्द शकुन्तला की ओर इशारा करते हुए कहा था। इससे पहले कि मैं स्थिति को समझ पाता टैक्सी ड्राइवर नीचे उतर गया। पुलिस चौकी के अंदर जाने से पहले उसने गेट पर खड़े संतरी से कुछ बात की थी लेकिन दूरी के कारण मैं उन दोनों की बातें सुन न सका।
शकुन्तला ने संतरी को टैक्सी की ओर आते देखा तो घबरा कर बोली- “राज, अब क्या होगा ?”
“तुम चुप रहो। जो कुछ होगा देखा जाएगा।”
पुलिस चौकी के ड्यूटी आफिसर ने शकुन्तला को पहली ही नज़र में पहचान लिया। फिर जब उसने बताया कि तमाम पुलिस चौकियों को शकुन्तला के फरार होने की खबर मिल चुकी है तो मेरे पैरों तले की ज़मीन निकल गयी।
फिर भी मैंने स्वयं पर क़ाबू पाते हुए ड्यूटी ऑफिसर को संबोधित किया- “शकुन्तला बालिग़ है और अपनी इच्छा से मेरे साथ जा रही है। हमने कोई अपराध नहीं किया।”
“क्यों देवी जी, क्या यह टूण्टा सही कह रहा है ?” ड्यूटी ऑफ़िसर ने मुझे घूरते हुए शकुन्तला से पूछा।
वह अचानक फूट-फूटकर रोने लगी और उस मक्कार औरत ने हिचकियाँ लेते हुए कहा– “ऑफ़िसर, यही वह कमीना है जो मुझे ज़बरदस्ती अपहरण करके न जाने कहाँ ले जा रहा है। इसने मुझे धमकी दी थी यदि मैंने शोर मचाया तो यह मुझे जान से मार देगा। मुझे मेरे डैडी के पास पहुँचा दो ऑफ़िसर।”
शकुन्तला का बयान मुझे फँसा देने के लिये बहुत काफ़ी था। मैंने अपने बचाव के लिये ड्यूटी ऑफ़िसर से अपनी बेगुनाही साबित करने की बहुत चेष्टा की परंतु मुझे बुरी तरह मारकर लोहे के सलाख़ों के पीछे धकेल दिया गया।
अदालत में पेशी हुई तो वहाँ भी मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई। शकुन्तला का बयान और उसके पिता की शोहरत ने मेरी रही-सही आशाओं पर भी पानी फेर दिया। दूसरी पेशी पर मजिस्ट्रेट ने मुझे चार महीने बामुशक्कत की सजा सुना दी।
पूना जेल में चार माह तक मुझे जिन पीड़ादायक यातनाओं का सामना करना पड़ा उसे बयान करना मेरे वश की बात नहीं। शकुन्तला के बाप ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि जेल की भीतर ही सजा पूरी होने से पहले मुझे मार डाला जाए लेकिन मेरी किस्मत में चूँकि दर-दर कर की ठोकरें खाना लिखा था इसलिए मैं ज़िंदा रहा।
चार माह की मुसीबतें सहने के बाद जब मुझे रिहाई मिली तो मेरी हालत इतनी बदतर थी कि अगर मेरा बाप भी मुझे देखता तो शायद न पहचान पाता। मेरा एक-एक जोड़ फोड़े के मानिंद दुख रहा था। मेरी दाढ़ी बेतहाशा बड़ी हुई थी। जेल में संतरी चूँकि मुझे दो वक्त का खाना नहीं देते थे इसलिए मैं बेहद कमज़ोर हो गया था। मेरे जिस्म पर चार माह के जमे हुए मैल से शायद बदबू फूट रही थीं। रिहाई के वक्त वह मुझे पंद्रह रुपये भी वापस नहीं दिए गए जो गिरफ्तारी के वक्त मेरे ज़ेब से बरामद हुए थे। चुनांचे अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं लोगों के आगे हाथ फैलाकर भीख माँगू और अपना पेट भरूँ।
भीख माँगने से बेहतर है कि खुदकुशी कर ली जाए। मैं एक फ़ुटपाथ पर बैठे यह सोच रहा था। भूख से मेरी हालत ख़राब थी। मेरी अंतड़ियाँ बाहर निकलने को थीं। मैंने स्वयं को मौत के लिये अमादा कर लिया था। मगर उसी क्षण एक राहगीर मेरे पास आया और मेरी खस्ता हालत पर तरस खाकर मेरे सामने एक चवन्नी डालकर चलता बना।
इस चवन्नी को देखकर मेरा जी मचलाने लगा। मैंने उसे देर तक नहीं उठाया। काश! मैं उसे न उठाता और मर जाता। मगर मेरे पेट ने मेरे जमीर के विरुद्ध फ़ैसला सुना दिया। मैंने वह चार आने उठाये और दौड़कर क़रीब ही चने वाले के थैले पर जा पहुँचा। फिर भीख माँगना मेरे लिये कोई मसला नहीं रहा।
मैं दस-बारह रोज़ तक निरंतर पूना की सड़कों पर भटकता रहा। एक-दो रुपये मिल जाते तो पेट भर रोटी खाता। और जहाँ रात होती वहीं किसी पेड़ के साये में या फ़ुटपाथ पर लेटे रहता।
और यह सब तबाहियाँ मेरे ऊपर उसी रोज़ से नाजिल होनी शुरू हो गईं थी जब मोहिनी मुझसे रुखसत हुई थी। मेरी मोहिनी। काश! त्रिवेणी मुझे मिल जाए। मैं सोचता रहा।
मेरे हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। लेकिन मैं स्वयं को इस उम्मीद में ज़िंदा रखे हुए था कि हो सकता है कि मैं मोहिनी को दोबारा हासिल करने में सफल हो जाऊँ जिसका सीधा रास्ता त्रिवेणी की मौत थी। लेकिन त्रिवेणी मोहिनी को लेकर न जाने कहाँ ग़ायब हो गया था।
एक दिन मैं भीख माँगता हुआ पूना के रेसकोर्स तक चला गया जहाँ मेरे अलावा और भी बहुत से भिखारी मौजूद थे और सेठ-साहूकारों को रेस जीतने की दुआएँ दे-देकर उनके आगे हाथ फैला रहे थे। मैं भी उन भिखारियों में शामिल हो गया।
रेस शुरू होने में चूँकि एक घंटा बाकी था इसलिए रेसकोर्स के बाहर भी लोगों का खासा हूजुम था। मैं भीड़ से परे हटकर उस जगह आ गया जहाँ गाड़ियाँ आकर ठहरती थी। जैसे ही कोई गाड़ी आकर रुकती, मैं लपककर आगे बढ़ता और गाड़ी से उतरने वाले सेठ के सामने हाथ फैला देता। अगर किसी को मेरी हालत पर तरस आता तो वह मेरे हाथ पर आठ आने या रुपया रख देता। किसी को मेरी सूरत पर घिन आती तो वह मुझे दो-चार गालियाँ सुनाकर आगे बढ़ जाता।
मैं अपने धंधे में लगा हुआ था कि एक लम्बी सी कार आकर गेट के सामने रुकी। ड्राइवर ने उतरकर पिछली सीट का दरवाज़ा खोला तो कार से एक लम्बे कद और घुटे हुए शरीर का खूबसूरत व्यक्ति बाहर निकला फिर उसके पीछे एक जवान औरत बाहर निकली जिसकी सुंदर सूरत अय्याशी का मुखौटा लगती थी।