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Fantasy मोहिनी

मैंने भी उसी अंदाज़ में सिर झुकाकर उसका उत्तर दिया। उसके बाद काफिला हमें लेकर चल दिया। हम रियासत की राजधानी में तीन दिन बाद पहुँचे। बीच में तीन पड़ाव डाले गए। यहाँ हमें बहुत ही अच्छा खाना उपलब्ध हुआ। ऐसे शर्बत पीने को मिले कि सफ़र की सारी थकावट पलों में दूर भाग गयी। फिर हमें राजसी महल में ले जाया गया। दरबार भवन में महारानी ने स्वयं हमारा स्वागत किया। महारानी एक लम्बे कद की बहुत ही खूबसूरत औरत थी और मुझे देखकर उनके होंठों पर खिले फूल की ताजगी सी निखर आई। उस शाम एक बड़ा सा जश्न हुआ और हमारा स्वागत हुआ जैसे किसी राजा-महाराजा का होता है। इन्द्र सभा की तरह सुंदर दासियाँ हमारी सेवा में थीं। नाच-गाने की महफ़िल गयी रात तक सजी रही। एक से एक फंकार अपना फन दिखाते इनाम पाते रहे। फिर दासियों ने हमें विश्राम कक्ष में पहुँचा दिया। यहाँ मैं गोरखनाथ से अलग हो गया। एक खूबसूरत शयनागार में मैंने रात बिताई। एक मुद्दत बाद ऐसा बिस्तर नसीब हुआ था अन्यथा मैं काँटों में सोता रहा था। रात सुंदर सपनों में बीत गयी।

सुबह-सुबह महारानी ने स्वयं दर्शन दिए। वह बहुत ही ख़ुश थीं।

“ऐ हमारे मेहमान, ऐसा जान पड़ता है कि सदियों से हमारी आत्मा यहाँ भटक रही थी और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। कितने जमाने, कितनी सदियाँ बीतने के बाद तुम यहाँ आए हो। लेकिन हमने सुना है कि तुम उन वीरान पहाड़ों की तरफ़ जाओगे जहाँ एक वहशी कौम आबाद है और उनका शासन एक बूढ़ी जादूगरनी के हाथ में है जो खुद को पहाड़ों की रानी कहलवाती है।”

“आपने ठीक सुना। हमारी मंज़िल वही पहाड़ है।”

परंतु वहाँ जाकर तुम क्या करोगे। वे ख़तरनाक वहशी भक्षी हैं। उनकी कोई देवी है जिस पर वे इंसानों की बलि चढ़ाते हैं। तुम तो सिर्फ़ हमारे लिए यहाँ आए हो और वह सिर्फ़ बहाना है। हम ही तुम्हारी मंज़िल हैं। हम सदियों से तुम्हें जानते हैं। हमारा प्यार तुम्हें सैकड़ों पहाड़ों के उस पार से खींच लाया है। यहाँ हमारे अलावा कोई भी सुंदरता की देवी नहीं।”

मैं पशोपेश में पड़ गया। कुछ जवाब देते नहीं बन पड़ा। वह आगे बढ़ी और उसने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

“बोलो कौन है वह जिसकी तलाश में तुम यहाँ तक आए हो। नहीं, तुम्हें शायद कुछ याद नहीं। हम ही हैं। हमने तुम्हें बुलाया है। हमें पहचानो, देखो हमारी आँखें, देखो हमारा दिल। क्या हम तुम्हें जाने पहचाने नज़र नहीं आते ?”
 
मैं पशोपेश में पड़ गया। कुछ जवाब देते नहीं बन पड़ा। वह आगे बढ़ी और उसने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

“बोलो कौन है वह जिसकी तलाश में तुम यहाँ तक आए हो। नहीं, तुम्हें शायद कुछ याद नहीं। हम ही हैं। हमने तुम्हें बुलाया है। हमें पहचानो, देखो हमारी आँखें, देखो हमारा दिल। क्या हम तुम्हें जाने पहचाने नज़र नहीं आते ?”

मोहिनी का धुंधला सा चेहरा अब भी मेरे मस्तिष्क में था। वह ऐसा तो न था जैसा कि यह महारानी नज़र आती थी। और वह कहती थी कि उसका प्यार मुझे यहाँ तक खींच लाया है। वह बहुत हसीन थी। अगर वह मोहिनी नहीं थी तो ऐसी बातें क्यों कर रही थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि मोहिनी का शारीरिक रूप ऐसा ही हो।

“चुप क्यों हो कुँवर, क्या हमारी पुकार तुम्हें यहाँ तक खींच कर नहीं लाई ?”

“मैं कुछ ठीक से नहीं कह सकता। क्या तुम मोहिनी हो ?”

“मोहिनी...!” वह तनिक चौंकी और फिर एकदम से सामान्य हो गयी और फिर कहे बिना उल्टे पाँवों बाहर निकल गयी।

अब मेरे लिए यह जानकारी आवश्यक थी कि शारीरिक रूप से मैं मोहिनी को किस तरह पहचानूँगा। वह नन्हीं-मुन्नी छः इंच की लड़की जिसके पंजे छिपकलियों जैसे थे जिसकी देह भी छिपकली जैसी लगती थी। उसे इंसानी रूप में किस तरह पहचाना जाएगा। लेकिन मेरा दिल कहता था कि महारानी मोहिनी देवी नहीं हो सकती। महारानी का प्रभावशाली सौंदर्य और बातें सुन मेरा मस्तिष्क घूमकर रह गया।

दोपहर में गोरखनाथ से मेरी मुलाक़ात हुई और मैंने सारी बातें बताई। गोरखनाथ ने ध्यान लगाने के उपरांत कहा-

“चिंता का विषय है महाराज। यह औरत मोहिनी देवी तो नहीं है परंतु पिछले जन्म में यह तुम्हारी पत्नी थी और इसी कारण वह तुमसे प्रभावित है लेकिन यह अच्छा शगुन नहीं है। यह तुम्हें पहाड़ों की तरफ़ ले जाने से रोकेगी। उसका पति एक ख़तरनाक क़िस्म का जालिम इंसान है। इन दिनों अपने शिकारी कुत्तों के साथ शिकार खेलने गया है। और अगर उसे भनक लग गयी कि महारानी तुम्हारे प्यार के मोह में फँस गयी है तो वह हर क़ीमत पर तुम्हें मार्ग से हटाने का प्रयास करेगा लेकिन उसने यदि कोई ऐसा प्रयास किया तो पहाड़ों की रानी के कोप का भाजन बनेगा। मैं प्रयास करता हूँ कि उसके लौटने से पूर्व ही हम यहाँ से पहाड़ों की तरफ़ रवाना हो जाए लेकिन तुम जरा होशियार रहना।”

“ठीक है!”

उस दिन कोई विशेष बात नहीं हुई रात को मेरी आँखों में नींद नहीं थी। इस महारानी को यह ज्ञात हो चुका था कि मेरी मंज़िल कहाँ है। मोहिनी का नाम सुनकर वह चौंक पड़ी थी फिर कुछ कहे बिना चलती बनी थी। बहुत दिनों बाद आज मैंने दर्पण में अपना चेहरा देखा था तो महसूस किया कि मैं जवान होता जा रहा हूँ। यदि मैं दाढ़ी और बाल काट लूँ तो शानदार जवान दिखायी दूँगा। परंतु मैंने ऐसा नहीं किया।

रात का कोई पहर बीता जा रहा था जब महारानी दबे पाँव मेरे शयनकक्ष में प्रविष्ट हुईं और इसी का मुझे ख़तरा था। मैं जाग रहा था। न जाने क्यों मेरा दिल कहता था कि कुछ न कुछ होकर रहेगा। सोने का नाटक करके मैंने आँखें मूँद रखी थी। महारानी मेरे सिरहाने आकर बैठ गयी। वह काम-वासना की जीती-जागती तस्वीर लग रही थी। कोई मेनका था जो विश्वामित्र का तप भंग करने आई थी। मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा।

“बिल्कुल वही, वही है।” महारानी बुदबुदाने लगी। “मेरा रामोन यह भूल गया है लेकिन मैं कहाँ भूली। मुझे तो आज भी याद है। पिछले जन्म में, नील का वह किनारा। आह, मेरे रामोन! आज भी तुम उसी भटकती हुई बदरूह की तलाश में भटक रहे हो जिसने हमारे शांति पूर्ण दाम्पत्य जीवन में आग लगाई थी। आज भी तुम उन शैतानी ताकतों से मुक्त नहीं हो पाए। लेकिन अब मैं तुम्हें न जाने दूँगी। बचपन से तुम्हारा चेहरा ही तो देखती आ रही हो। सपनों में, नजारों में, मरुस्थल में, नदी-झरनों में। पहाड़ों में दूर-दूर तक। तुम हो और बस मैं हूँ। रात सुरमई है और तुम कितनी मीठी नींद सो रहे हो मेरे राजकुमार। देखो मैं किस तरह सदियों से तड़प रही हूँ। मेरी आँखों में बेकरारी है। नींद आती थी और जब आती थी तो बस तुम्हारे सपनों होते थे।”

वह मुझ पर झुक गयी। उसकी साँसें मुझसे बहुत क़रीब हो गयी। मुझे ऐसा लगा कि मौत कि बाहें मेरे गले का फंदा बनकर कसती जा रही है। सैंकड़ों साँप फुंकार रहे हैं और अचानक एक धमाका सा हुआ। ज़ोरदार गड़गड़ाहट जैसे पास ही कहीं बिजली गिरी हो। हवा के साथ एक शोला खिड़की से भी टकराया और महारानी उछलकर खड़ी हो गयी। मारे दहशत से मेरा दिल तेज-तेज धड़क रहा था।

महारानी खिड़की के पास पहुँची। शीशा टूट चुका था। पर्दे जोर-ज़ोर से हिल रहे थे। सायं-सायं की आवाजें आ रही थी। वह खिड़की के पास खड़ी काँपती रही।

“अपशगुन है...।” वह बड़बड़ाई और तेज कदम रखती हुई शयनकक्ष से बाहर चली गयी।

मारे दहशत के मैं साँस रोक चुपचाप लेटा रहा। इंसान की ज़िंदगी में क्या आँधियाँ इस तरह आती हैं। नील नदी का किनारा और रागोन। क्या सचमुच वैसा ही रहा होगा। फिर यह बिजली किस पर गिरी थी। वह शोला जो खिड़की से टकराकर शीशे को चकनाचूर कर गया। क्या कोई संकेत था या आसमानी बला का संदेश।

अपशगुन, कैसा अपशगुन...!मेरे दिल में आँधियाँ थीं, धूल ही धूल थीं। रेत के गुब्बारे थे और धुआँ, धुआँ।मैं उठ खड़ा हुआ, सहमे हुए कदम रखता खिड़की के पास जा पहुँचा। हवा सायं-सायं चल रही थी। वहाँ से वह पहाड़ नज़र आते थे। और इस समय मैंने एक खौफनाक दृश्य देखा।

एक पहाड़ से आग की एक लकीर सी तनी। वहाँ लालिमा थी। यूँ जैसे ज्वालामुखी फट जाता है। यह रेखा रियासत के शाही महल के ऊपर तक आई थी। रात बेहद गंभीर और सन्नाटे के दामन में पेवस्त थी। फिर वह लकीर धीरे-धीरे खिसकने लगी और पहाड़ों में जज्ब हो गयी।

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दूसरे दिन महारानी मुझे रियासत के चंद स्थानों में घुमाने ले गयीं। एक बहुत ही चौड़ा दरिया वहाँ बहता था जो कि रियासत की सीमा पर था। वहाँ के लोग खूब संपन्न मालूम होते थे। महारानी ने मुझे बताया कि वहाँ फ़सल खूब होती है। कई कल कारख़ाने भी चलते हैं। वह सारी दुनिया से कटा हुआ भू-भाग था परंतु उन्होंने अच्छी-खासी तरक्की की थी। लोग बड़े मेहनती और बहादुर थे। उनके पास तलवार भालों के अलावा गोला-बारूद के हथियार भी थे। महारानी का नाम सानतारा था और उसने बताया कि लगभग साठ हज़ार सैनिक उनकी सेना में हैं। उसने अपना अस्तबल भी दिखाया जहाँ अच्छी नस्ल के घोड़े थे और सौ के करीब कद्दावर कुत्ते थे जो भेड़ियों की तरह ख़तरनाक नज़र आते थे।कदाचित वह मुझे अपनी शक्ति का परिचय दे रही थी।

नदी किनारे छोटे-बड़े द्वीप आबाद थे। कई शिकारगाहें, सैरगाहें थीं। वहाँ की इमारतें बड़ी आलीशान थीं।

“नदी के उस पार एक वहशी कौम आबाद है। दो बार हमारा उनसे युद्ध हुआ है। वे लोग किसी बूढ़ी जादूगरनी के पुजारी हैं जिसे वे पहाड़ों की रानी कहते हैं। पहाड़ों की रानी आज तक पर्दे में रहती आई है। किसी ने उसकी सूरत नहीं देखी। कल तुम किसी मोहिनी की बात कर रहे थे न।”

“हाँ! मैंने सुना है कि वहाँ मोहिनी देवी का मंदिर है।”

“मैं बताती हूँ। वही बूढ़ी जादूगरनी जिसे वे सब पवित्र माँ कहते हैं, आन की देवी मानते हैं, उनका नाम मोहिनी ही है। परंतु जंगली उनके सामने इंसानी बलि चढ़ाते हैं। कई हज़ार साल से यह नाम सुना जाता रहा है और क्या तुम्हें विश्वास है कि हज़ारों साल तक कोई औरत जीवित रह सकती है ? हाँ, कोई भटकती शैतान आत्मा ज़रूर ज़िंदा रह सकती है। देखो राज! तुम उन पहाड़ों का विचार मन से त्याग दो। मैं तुम्हें वहाँ हरगिज नहीं जाने दूँगी। मैं तुम्हें फिर से पाकर खोना नहीं चाहती। पिछले जन्म में तुम मेरे पति थे और एक चुड़ैल आत्मा ने तुम्हें मुझसे छीन लिया था। मैं तुमसे आज भी उतना ही प्रेम करती हूँ और तुमसे शादी करना चाहती हूँ। तुम यहाँ के राजा कहलाओगे और फिर देखो हम किस तरह शासन करते हैं।”

“लेकिन आप तो शादीशुदा हैं और आपका पति सुना है बड़ा जालिम है।”

“चाहे वह जितना जालिम हो लेकिन कोई भी मर्द सुंदर औरत के सामने भुनगा होता है। वह मेरे तलवे चाटता है। उसने धोखे से मुझे हथिया लिया था। वह यहाँ का सबसे बहादुर सरदार था और मैं एक कमसिन राजकुमारी। अगर मैं उससे शादी न करती तो आज महारानी न होती। हाँ वह ज़रूर राजा होता और मैं उसकी बांदी। यहाँ केवल शक्तिशाली इंसान ही शासन कर सकता है। वहशी कौम और हमारे बीच कुछ शर्तों पर संधि हो चुकी है इसलिए अब जंग नहीं होती है लेकिन तुमने अगर उधर का नाम लिया तो संधि की सारी शर्ते टूट जाएँगी।”

हम एक राजसी सैरगाह में ठहरे थे। दो दिन तक मैं वहाँ तबियत ख़राब होने का बहाना लिए पड़ा रहा और महारानी के इश्क़िया रोग से बचता-बचाता रहा। महारानी सानतारा ने जिस तरह छिपे शब्दों में मुझे चेतावनी दी थी वह ख़तरनाक सूरत अख्तियार कर सकती थी। अगले दिन भी वही विषय छिड़ा रहा। वह मुझे समझाती रही कि मैं उस तरफ़ का रुख़ न करूँ।

“यूँ भी यहाँ के लोग तुमसे अधिक ख़ुश नहीं है। यहाँ इस साल सूखा पड़ा है।” महारानी कहती रही। “और वह अशुभ अभी लोगों ने देखी है। जब कभी वह चमक कर यहाँ के आसमान में लकीर खींचती है तो बड़े प्रकोप होते हैं। विपत्तियाँ आती हैं। जल्दी ही लोगों में प्रचलित हो जाएगा कि सब तुम्हारे कारण हुआ है। फिर वे सब तुम्हारे खून के प्यासे हो जाएँगे।”

शायद वह यह चाहती थी कि यह बात प्रचलित कर दी जाएगी।

“लेकिन मैं किस तरह आपसे शादी कर सकता हूँ। तब यहाँ के लोग क्या सोचेंगे। एक अजनबी जो उनके कौम से नहीं है यहाँ का राजा बन गया और फिर आपका पति...।”

“मैं अपने पति को ज़हर देकर मार डालूँगी।” वह हँसी। “तुम्हारे लिए तो सब कुछ कर सकती हूँ। फिर यह तो मेरी इच्छा है कि शासन कौन किस तरह करता है। तुम इसकी फ़िक्र मत करो। वह सब मैं ठीक कर लूँगी।”

महारानी को कदाचित कुछ संदेह हो गया था। वह उठकर पर्दे तक गयी। परदा खींचा परंतु वहाँ कोई नहीं था। अलबत्ता खिड़की ज़रूर खुली थी। महारानी ने बाहर झाँका फिर खिड़की बंद करके लौट आई। मैं महारानी को कोई ठोस उत्तर देकर उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहता था लेकिन उसका दृढ़ इरादा सुनकर पलायन की योजना मन ही मन बनाने लगा।

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शाम को गोरखनाथ के दर्शन हुए जो सांड पर सवारी करते हुए वहाँ तक आ पहुँचा था। महारानी को देखकर बड़ा अचम्भा हुआ परंतु गोरखनाथ के साथ वह कठोरता से पेश नहीं आ सकती थी।

“आप यहाँ कैसे तशरीफ लाए ?” महारानी ने पूछा।

“क्या मेरे लिए कहीं रोक-टोक है ?”

“नहीं, ऐसा तो नहीं महाराज! आपको राजमहल में सारी सुविधाएँ दी गयी हैं। क्या आपको किसी से कोई शिकायत है ?”

“ऐसा कुछ नहीं है देवी जी। दरअसल मेरा कुँवर साहब के बिना मन बचाट हो रहा था सो इधर ही चला आया। मुझे ज्ञात हुआ है कि आप लोगों का यहाँ कई दिन तक ठहरने का इरादा है। मैंने सोचा वहाँ पड़े-पड़े क्या करूँगा। क्यों न मैं भी बुढ़ापे में कमर सीधी कर लूँ।” फिर गोरखनाथ मेरे क़रीब आकर बोला। “कैसे हो महाराज ? यहाँ की आबो-हवा पसंद आई ?”

“बहुत पसंद! बस तुम्हारी कमी खटकती थी।”

महारानी को गोरखनाथ का वहाँ अचानक आना बड़ा नागवार गुजरा और हमें तन्हा छोड़कर चली गयी।”
 
“उसके तेवर अच्छे नहीं है महाराज।”

“देखो कुँवर साहब! देवी का यह भक्त तुम्हारे लिए सिर्फ़ गोरखनाथ है। आज से मुझे महाराज कहने की बजाय सिर्फ़ गोरखनाथ कहा करो।”

“फिर एक विनती मेरी भी है महाराज। तुम भी मुझे महाराज कहना छोड़ दो। मैं तुमसे उम्र में भी छोटा हूँ और ज्ञान-ध्यान में भी। और तुम्हारे मुँह से मेरे लिए महाराज का संबोधन अच्छा नहीं लगता।”

“देवी के सम्मानित अतिथि, मेरी तुम्हारे सामने कुछ भी हैसियत नहीं है।”

“लेकिन मेरे लिए तो तुम्हारी हैसियत है। वह तुम ही हो जो मुझे यहाँ तक लाए हो। अब मुझे वचन दो कि मुझे अपना समझोगे।”

“वचन दिया महाराज।”

“फिर महाराज...।”

“वचन दिया राज।”

“अब हुई कुछ बात गोरखनाथ।”

फिर गोरखनाथ ने मुझे बाजूओं में भर लिया। फिर हम आमने-सामने बैठ गए।

“मैं यहाँ इसलिए आया था कि इस औरत का पति शिकार से लौट आया है और आते ही जब उसे यह खबर मिली कि महारानी एक अजनबी मेहमान के साथ सैरगाह पर गयी हैं तो उसने राज्य ज्योतिषी को तुरंत तलब किया। फिर उसने भविष्य पूछा तो जाने क्या भविष्य पढ़कर सुनाया। सुन कर आग बबूला हो गया और इस तरफ़ आने का फ़ैसला किया। कल प्रातः काल वह कूच करेगा। अपने ख़ूनी दस्ते के साथ इसलिए मुझे यहाँ आना पड़ा कि कहीं तुम किसी तरह की संकट में न फँस जाओ।”

“उसका इरादा क्या है ?”

“राज्य ज्योतिषी ने मुझे सब कुछ बता दिया था क्योंकि वह खुद भयभीत है। आग के पहाड़ों से अशुभ अग्नि रेखा नज़र आई थी। वह मोहिनी देवी की नाराज़गी का संकेत है।

“सरमोन ने मुझसे कहा कि तुम्हें लेकर तुरंत पहाड़ों की तरफ़ कूच कर जाऊँ। यहाँ तुम्हारी जान को ख़तरा है और अगर तुम्हें इन लोगों से हानि पहुँची तो इस धरती के टुकड़े पर क़यामत टूट पड़ेगी।”

“इसके बावजूद भी वे लोग मुझे हानि पहुँचाने का इरादा रखते हैं।”

“इस रियासत का राजा एक पागल इंसान है। किसी जमाने में वह यहाँ का सर्वशक्तिमान योद्धा था और अपनी बहादुरी से ही उसने राजगद्दी प्राप्त किया था परंतु बाद में महारानी ने उसे विष दे-देकर पागल बना दिया और वह अत्याचारी हो गया। महारानी चाहती हैं कि वह मर जाए और फिर राज-पाट अपने ढंग से चलाए। अब उसे भी इसका संदेह हो गया है और उसका संदेह तुम्हारे बारे में राज ज्योतिषियों से सुनकर और भी ठोस हुआ होगा। राज ज्योतिषी ने यह अवश्य बताया होगा कि तुम पर देवी की कृपा है और राजा की मौत का कारण तुम्हीं बनोगे।” गोरखनाथ ने सारी बातें स्पष्ट की।

गोरखनाथ कुछ क्षण मौन रहने के बाद बोला- “हाँ राज, यहाँ की ज्योतिष पुस्तक में यही लिखा है कि कोई अजनबी आएगा। यह अजनबी सुदूर पहाड़ों को पार करता हुआ हज़ारों मील से आएगा। और फिर रियासत में खूनी क्रांति होगी। सबसे पहले वर्तमान शासक मारा जाएगा और फिर मोहिनी देवी इस संपूर्ण धरती में नया संविधान, नया कानून बनाएगी।” गोरखनाथ की बात सुनकर मैंने गहरी साँस ली। अगर वे लोग ज्योतिष पर विश्वास रखते थे तो निश्चय ही मुझे वह अजनबी समझा जाएगा। और यही बात मेरे लिए ख़तरनाक थी।

यूँ 'खतरा' शब्द मेरी ज़िंदगी में अर्थहीन होकर रह गया था। लेकिन यहाँ आने के बाद मैं एक सुकून की मौत मरना चाहता था। मैं मोहिनी को सशरीर देखना चाहता था। उसका एक चुम्बन लेकर ही मौत के गले लगना चाहता था। इसलिए सोचना ज़रूरी था कि इस मुसीबत से किस तरह निजात मिले।

“यहाँ से सरहद कितनी दूर है गोरखनाथ ?”

“नदी से कुछ दूर सफ़र करने के बाद हमें एक द्वीप पर उतरना होगा और फिर हम पहाड़ी रानी की सीमा में होंगे। एक बार वहाँ पहुँचने के बाद यह लोग वहाँ प्रवेश नहीं करेंगे। ऐसा विधान है।”

“उस जगह तक पहुँचने में हमें कितना समय लगेगा ?”

“हम नौका से यात्रा करेंगे तो हमें दो दिन लग जाएँगे। नौका को मेरा सांड खींचकर ले जाएगा।”

“तो फिर क्यों न हम आधे घंटे में तैयार होकर चलते बने ?”

“लेकिन यह किस तरह संभव है। महारानी की निगाह तो तुम्हीं पर है। हाँ, रात के किसी पहर फरार हो सकते हैं।”

“गोरखनाथ, तुम एक जादूगर हो! तुम्हारे लिए एक महारानी की नज़रें बाँधना कौन सा मुश्किल काम है।”

“हाँ राज, तुम ठीक कहते हो! क्योंकि मार्ग में तुमने मेरे जादुई करिश्मे देखे हैं। परंतु जिस संसार में हम इस समय है यहाँ मोहिनी देवी के अलावा किसी का जादू नहीं चल सकता। यही कारण है जो यहाँ पहले भी बहुत से तांत्रिक जादूगर आए और मर गए।

“अतः मेरी शक्तियाँ वही होगी जो मनुष्य रूप में मुझे प्राप्त है। अन्यथा मेरी चिंता का विषय क्या हो सकता था। आज रात के अंधकार में हम यह स्थान छोड़ देंगे। आगे का मार्ग जहाँ पहाड़ों की सीमा शुरू होती है उस स्थान तक मैं तुम्हें ले जा सकता हूँ। इससे आगे का मार्ग तो मैं भी नहीं जानता।”
 
रात का भोजन करने के उपरांत मैं फिर सोने चला गया। सैरगाह की यह इमारत बिल्कुल उसी तरह की थी जिस तरह के रेस्टहाउस हुआ करते हैं। उसकी देखरेख एक सैनिक दस्ता करता था। महारानी ने अभी तक दस्ते को मेरे बारे में कोई निर्देश नहीं दिए थे। परंतु यदि इल्म हो जाता तो निश्चय ही अपने सभी सैनिक दस्तों को मेरी निगरानी की आज्ञा दे देती।

औरत जब भी इस तरह का अंधा प्रेम करती है तो अच्छे-बुरे का ख़्याल ही नहीं रहता। उसकी हालत बस एक पागल के समान होती है। वह अपनी हदों से गुज़र जाती है और यदि ऐसी औरत कोई महारानी हो तो इतिहास के पन्ने खून से रंग दिए जाते हैं।

मैं कोई ऐसा आदमी तो न था जो सुंदरियों से दूर रहता हो मैंने अपनी ज़िंदगी तमामतर अय्याशियों में गुजारी थी। मोहिनी थी इसलिए भोग-विलास में डूबा रहा।

किंतु अब इन सब चीज़ों से दूर हो गया था। मुझे यह सब कुछ एक वक्ती ख़ुशी का साधन मात्र लगता था। और इस वक्ती ख़ुशी के पीछे ज़िंदगी के कितने अंधेरे छिपे थे। प्रेम तो कोई और ही चीज होती है। अय्याशियाँ जीव का हृआस करती हैं।

मार्ग में मैंने जो कुछ ज्ञान प्राप्त किया था उससे मेरे भीतर का वह इंसान मर चुका था और मैं संपूर्ण रूप से एक वैरागी पुरुष बनता जा रहा था। कदाचित यही चीज़ें होती हैं जो किसी वैरागी के मार्ग में बाधक बनकर आती हैं। फरेब पाप के अंधकारों से दूर सच्चाई के प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। और इस प्रकाश में कितना आनन्द था, यह मैं अनुभव करता जा रहा था।

रात के समय महारानी मेरे पास नहीं आई क्योंकि गोरखनाथ मेरे साथ ठहरा था। महारानी यह तजवीज कर रही थी कि किसी तरह गोरखनाथ को राजमहल भेजा जाए। मुझे यहाँ लाने का अर्थ भी यही था। पर आज की रात इस रियासत में अंतिम रात थी। आवश्यक तैयारियाँ करनी भी क्या थी। बस चलना ही था और हम किसी भी वक्त चल सकते थे।

रात का कोई पहर था जब गोरखनाथ ने मुझे चलने का संकेत दिया। मैं दबे कदम बाहर निकला। गलियारा सन्नाटे से डूबा था। फिर गोरखनाथ के साथ सावधानी से चलते हुए इमारत से बाहर आ गया। आश्चर्य की बात थी कि कोई पहरेदार जाग नहीं रहा था। किसी ने हमें नहीं रोका, किसी ने नहीं टोका और हम बाहर आ गए।

सांड अस्तबल में बंद था। गोरखनाथ उसे लेकर बाहर आया और फिर हम दोनों उस सांड पर सवार होकर चल पड़े। सड़कों पर रात का वीराना छाया हुआ था। हमने एक रास्ता पकड़ा जो सुनसान था। सांड अब तेज दौड़ रहा था। मैंने गोरखनाथ को कमर से पकड़े रखा। अन्यथा सांड के दौड़ने से उछल-उछल जाता था। मुड़-मुड़ कर पीछे देख रहा था कि कहीं कोई पीछा तो नहीं कर रहा। परंतु मेरा यह संशय निरर्थक ही था।

आख़िर हम नदी किनारे एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ नौकाएँ खड़ी थी। यहाँ भी पहरेदार सो रहे थे। हमने सांड को नौका पर जोत दिया और फिर उसपर सवार हो गए।

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अगले दिन शाम का समय रहा होगा। मैंने पहली बार हवा में गंध महसूस की। मैंने एकदम खड़े होकर पीछे देखा। दूर बहुत दूर एक धूल का गुब्बार उठता दिखायी पड़ता था। गोरखनाथ भी एक परिस्थिति से अपरिचित था। उसने सांड को और तेज भगाने का उपक्रम शुरू कर दिया। किंतु सांड, घोड़ों और कुत्तों की रफ्तार में तो बहुत अंतर होता है। उस वक्त पहली बार यह विचार मस्तिष्क में आया कि हमसे भूल हो गयी। हमें सांड की जगह घोड़ों का प्रयोग करना चाहिए था।यूँ सांड की रफ्तार भी कुछ कम नहीं थी। और थकान का लक्षण उसमें नज़र नहीं आता था। फिर भी वह घोड़ों और कुत्तों का मुक़ाबला तो कर ही नहीं सकता था।

शीघ्र ही धूल उड़ाता वह ख़ूनी दस्ता हमारे सिर पर आ गया। उन्होंने कोई शार्टकट रास्ता अपनाया था और मैदान की ढलान से उतर रहे थे।

इस ख़ूनी दस्ते के साथ कुत्तों की फ़ौज़ भी थी। भेड़ियों जैसी शक्ल के ख़तरनाक कुत्ते। घुड़सवार तो चार ही थे। इन चारों में सबसे आगे जो लम्बा तगड़ा सवार था उसके शरीर पर राजसी वस्त्र थे। निकट आते ही गोरखनाथ ने उसे पहचान लिया।

“यह पागल राजा है। और उसके ख़ूनी दस्ते के तीन जनरल साथ में हैं।”

मैं समझ गया कि गोरखनाथ ने उनमें से किसे राजा कहा था।

“वे लोग हमारा पीछा क्यों कर रहे हैं ?” मैंने पूछा। फिर ख़्याल आया मेरा यह प्रश्न तो बच्चों जैसा है। यह हमारी कुशलता पूछने तो आ नहीं रहा है।

“भाला संभाल लो राज। कुत्तों को नौका से दूर रखना। मैं किसी द्वीप पर पहुँचने की कोशिश करता हूँ।”

मैंने भाला संभाल लिया। यूँ भी मैं एक हाथ से लड़ नहीं सकता था और ऐसी लड़ाई तो मैंने कभी लड़ी भी नहीं थी। परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मैं उन चार आदमियों के सामने बिल्कुल पंगु था। मैंने मजबूती के साथ भाला संभाल लिया।
 
मैंने भाला संभाल लिया। यूँ भी मैं एक हाथ से लड़ नहीं सकता था और ऐसी लड़ाई तो मैंने कभी लड़ी भी नहीं थी। परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मैं उन चार आदमियों के सामने बिल्कुल पंगु था। मैंने मजबूती के साथ भाला संभाल लिया।

नौका में दो तलवारें और एक भाला और पड़ा था। इसके अलावा गोरखनाथ का त्रिशूल था। और त्रिशूल के अग्रिम हिस्से में एक निशान बँधा था। गोरखनाथ ने वही त्रिशूल उठाया और हम दोनों तैयार हो गए। ख़ूनी दस्ता क्षण प्रतिक्षण हमारे निकट आते जा रहा था। शीघ्र ही वह दस्ता हमारे सिर पर था। कुत्ते खौफनाक अंदाज़ में भौंक रहे थे।

“रुक जाओ!” पागल बादशाह चिल्लाया। “अपने आपको हमारे हवाले कर दो। बहुत सस्ते में छूट जाओगे।”

लेकिन हम उसके इरादों से अनभिज्ञ थे। उसके दिमाग़ में दो ही बातें थी। एक ज्योतिष पुस्तक की बात कि मैं वह अजनबी हूँ जो वर्तमान शासक की मौत का कारण बनेगा। दूसरे उसे संदेह था कि महारानी मुझसे प्यार करती है। महारानी का मुझे साथ लेकर गेस्ट हाउस में ठहरना यही साबित करता था।

“वापस लौट जाओ शासक!” गोरखनाथ गुर्राया। “अगर तुम्हारे इस ख़ूनी दस्ते ने हमें रोकते की कोशिश की तो तुम पर देवी का कहर टूटेगा। और तुम उस कहर की ताब भी न सह सकोगे।”

“गोरखनाथ, तुम्हें महल में राज पुरोहित का दर्जा हासिल है लेकिन तुमने रियासत का कानून तोड़ा है।”

“कानून तुम लोगों ने तोड़ा है, मैंने नहीं। कानून यह कहता है कि पहाड़ी रानी के मेहमान को वहाँ पहुँचाया जाए लेकिन तुम्हारी रानी की नीयत में खोट आ चुका है। और खोट तुम में भी है। मैं मेहमान को वहाँ पहुँचाने जा रहा हूँ। ख़बरदार मेरे रास्ते में मत आना, अन्यथा पछताओगे।”

“यह सब बातें महल में होंगी। दरबार इसका फ़ैसला करेगा कि कानून किसने तोड़ा है। मैं तो शिकार से ही खबर पाकर लौटा था। मालूम हुआ कि पहाड़ी रानी का मेहमान महारानी के साथ ऐश करने गया है और मेरी हत्या के षड्यंत्र में भाग ले रहा है। इन सब बातों का फ़ैसला होना है। रुक जाओ।”

उसका घोड़ा हमारे बहुत निकट था। कुत्ते भी आ गए थे। परंतु अभी तक हमला नहीं हुआ था। हम एक द्वीप के समीप होते जा रहे थे और शाम भी ढलने को आ गयी थी।

“अगर इसका कोई फ़ैसला होना होगा तो पहाड़ों की रानी के दरबार में होगा।”

“ठीक है! तो मैं देखता हूँ मेरी रियासत का कानून तोड़कर कौन यहाँ से भागता है।”

और यह जंग का ऐलान था। राजा ने कुत्तों को संदेश दे दिया। उसके बाद तो ख़ूनी दस्ता हम पर चढ़ गया।

मैंने एक कुत्ते को हलाल कर दिया। गोरखनाथ ने भी दो कुत्तों को ढेर कर दिया था। तब मुझे मालूम हुआ कि गोरखनाथ न केवल शक्तिशाली है बल्कि शस्त्र चलाने का भी माहिर जंगजू है।

वह ख़तरनाक अंदाज़ में लड़ रहा था। द्वीप पर जाते ही हम नौका ले कूद गए। गोरखनाथ ने अपने सांड को भी आज़ाद कर दिया। सांड की उपयोगिता का पहली बार आभास हुआ। यह कोई साधारण क़िस्म का सांड नहीं था। इतना लम्बा सफ़र तय करने के बाद भी वह जंग में कूद पड़ा। उसने खूरों से धूल उड़ाकर अपना क्रोध ज़ाहिर किया और सिर झुकाकर जनरल पर झपटा। फिर उसने जनरल के घोड़ों पर पीछे से सींगों पर उठाकर पलट दिया और उस पर चढ़ दौड़ा। मिनटों में जनरल का काम तमाम करके वह कुत्तों के मुक़ाबले में खड़ा हुआ। मैंने एक और कुत्ते को मौत के घाट उतार दिया था। वह चारों तरफ़ से मुझपर चढ़े जा रहे थे और अभी तक पागल बादशाह अलग ही खड़ा था। उसके शेष दोनों जनरल गोरखनाथ से लड़ रहे थे। गोरखनाथ एक हाथ से त्रिशूल और दूसरे हाथ से तलवार चला रहा था। फिर एक जनरल को गोरखनाथ ने धराशायी कर दिया। सांड भी कुत्तों से घिरा हुआ था। एक कुत्ता उसके सींगों में फँसा था और दो उसके पीठ पर थे। परंतु शीघ्र ही पीठ वाले कुत्ते ज़मीन पर गिरे और सींगों वाले को एक चट्टान पर पटक कर सांड ने गजबनाक हुंकार भरी। कुत्ते उसे छोड़कर भाग खड़े हुए।

कुत्तों ने मेरा लिबास भी तार-तार कर दिया था। सांड ने तुरंत मुझे मदद पहुँचाई। वह भी जख्मी हो गया था परंतु उसकी शक्ति और फुर्ती में कोई कमी नहीं आई थी। जब कुत्तों ने यहाँ भी मैदान छोड़ दिया तो राजा पागल हो उठा। वह घोड़ा दौड़ाता हुआ मुझ पर चढ़ बैठा। तब तक गोरखनाथ ने दूसरे जनरल का भी खात्मा कर दिया था। धरती खून से रंग गयी थी। सांड की एक ही हुंकार से घोड़ा हिनहिनाया और भड़क गया। उसने अपने सवार को पटक दिया और फिर मैं एक छलांग लगाकर सवार के सीने पर था। मैंने उसे अधिक अवसर नहीं दिया। अपना ख़ूनी भाला उसके सीने में उतार दिया। खून का फव्वारा उसके सीने से फट गया और मैंने तब तक अपना भाला नहीं खींचा जब तक वह बेहरकत नहीं हो गया।

उधर कुत्तों को सांड ने दौड़ा दिया था और गोरखनाथ दो कुत्तों से लड़ रहा था। शीघ्र ही वह कुत्ते भी भाग गए। फिर हमने राहत की साँस ली। बहुत खून बह चुका था और भविष्य की पुस्तक में जो लिखा था वह हो चुका था।

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फिर हम उस द्वीप पर पहुँचे जहाँ से पहाड़ियाँ शुरू हो गयी थीं। यहाँ महारानी और बूढ़ा राज-ज्योतिष नज़र आए जिनके साथ एक शाही दस्ता भी था।

“रुक जाओ रामोन!” महारानी ने कहा। “वहाँ तुम्हें कष्टदायक मौत के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। वे लोग तुम्हारी बलि चढ़ा देंगे और तुम्हारा माँस भूनकर खा जाएँगे।”

“सुनो महारानी! मैं तुम्हारा रामोन नहीं हूँ। मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है। तुम भी मुझे रोकने की कोशिश मत करना अन्यथा परिणाम वही होगा जो तुम्हारे पति का हुआ है।”

महारानी काँप गयी। काँपते हुए मेरी तरफ़ उँगली उठाकर बोली-”तुमने मेरे पति की हत्या की लेकिन मैं तुम्हें इसके लिए भी क्षमा कर सकती हूँ। इस बूढ़े पुरोहित की बातों में मत आओ। यह तुम्हें मौत की वादियों में ले जा रहा है। वहाँ कोई खूबसूरत मोहिनी नहीं रहती। किसी भटकती हुई शैतानी आत्मा का राज है। जो सिर्फ़ इंसानी लहू पीती है।”

“अपनी मोहिनी को मैं तुमसे अधिक जानता हूँ महारानी और यह भी मानता हूँ कि वह खून पीती है। लेकिन विश्वास रखो, वह मेरा खून नहीं पिएगी।”

“तो फिर याद रखो रामोन, तुमने जो खून-खराबा यहाँ किया है। मैं तुमसे उसका हिसाब ज़रूर लूँगी अगर तुम वापस लौटने में सफल हो गए। और मैं पहाड़ों के उस चुड़ैल को भी बताऊँगी कि हक़ीक़त क्या है।” महारानी क्रोधित स्वर में बोली।

राज ज्योतिषी ने तुरंत ही महारानी को समझाया। “ऐसी बातें जुबान पर मत लाइए महारानी। आप जानती है पहाड़ों की रानी आपसे बहुत शक्तिशाली है। और वहाँ का विधान भी उसी का बनाया हुआ है। आप उसकी सीमा में खड़ी है। हमें यहाँ आना ही नहीं चाहिए था।”

“ख़ामोश रह ऐ बूढ़े ज्योतिषी। तेरी ज्योतिष प्रेम की आग के बारे में कुछ नहीं जान सकती क्योंकि यह वह आग है जो बुझाए नहीं बुझती। न वह किसी के लगाने से हवा पाती और न इसका अंजाम भविष्य में जाना जा सकता है।”

राज ज्योतिषी कुछ बुदबुदाकर चुप हो गया और महारानी पाँव पटकती हुई पलट गयी। उसके सैनिक दस्ते ने हमें नहीं रोका।

पहाड़ों की तैराई में विश्राम करने के बाद हमने अगले दिन यात्रा शुरू की। रास्ते में गोरखनाथ ने बताया कि उसने किस तरह गेस्ट हाउस में सभी पहरेदारों और महारानी को एक बूटी सुँघाकर बेहोशी की नींद सुला दिया था। अपनी सुंदरता की यह शिकस्त वह सारे जीवन याद रखेगी।

पहाड़ों के उस तिलिस्म में हम कई दिनों तक भटकते रहे। परंतु वहाँ गोरखनाथ का कोई जादू काम न कर सकता था और न वहाँ कोई मार्ग दिखायी पड़ता था जो मोहिनी देवी के मंदिर तक हमें ले जाता। जगह-जगह कंकालों के ढेर पड़े रहते। कहीं इंसानों की हड्डियाँ तो कहीं जानवरों की। बड़ी ही भयानक जगह थी। और पहाड़ियों का ऐसा तिलिस्म था कि कई बार हम जहाँ से चले वहीं लौट आए। निरंतर सात दिनों तक हम उन्हीं पहाड़ियों में इसी प्रकार भटकते रहें। और मुझे बार-बार महारानी के शब्द याद आ जाते। वहाँ कोई वहशी कौम रहती है जो इंसानों का माँस खाती है और एक शैतानी आत्मा उनपर राज करती है।

बहरहाल जो कुछ भी वहाँ था उस रहस्य को जाने बिना अब मेरा लौटना भी मुनासिब न था और लौटकर जाता भी कहाँ। गोरखनाथ के चेहरे पर किसी प्रकार की निराशा नहीं थी। दिन के उजाले में हम सफ़र करते और रात के अंधेरे में हम कहीं भी पड़े रहते।

एक रात हम इसी तरह एक गुफा में पड़े थे कि मुझे बाहर एक शोला दिखायी दिया। ऐसा मालूम पड़ता था जैसे आग का कोई पिंड बाहर चकरा रहा है। मैंने तुरंत गोरखनाथ को झिंझोड़कर जगाया और धड़कते दिल से गुफा के बाहर कदम रखा।

बाहर कंकाल बिखरे पड़े थे, इंसानी कंकाल। और आग का यह पिंड उन्हीं कंकालों पर चकराता फिर रहा था। बड़ा ही भयंकर दृश्य था। फिर वह पिंड एक सफेद सी नज़र आने वाली चीज़ से टकराया और उसकी रोशनी एकदम से समाप्त हो गयी। मेरी सोच ने अब तकरीबन मेरा साथ छोड़ दिया था। अचानक मेरे कंठ से हल्की सी चीख निकली। तुरंत ही मैंने गोरखनाथ का दबाव अपने कंधे पर महसूस किया। कदाचित वह मुझे शांत रहने के लिए ढाँढस बँधा रहा था।

मैंने देखा वह एक सफ़ेद बुत था जो कंकालों के मध्य लड़खड़ाता हुआ उठ बैठा था। फिर वह सीधा होकर खड़ा हो गया। उसके सारे शरीर पर पट्टियाँ लिपटी हुई थीं। वह कुछ देर तक यूँ ही मुझे घूरता रहा। उसकी आँखें दो सुर्ख बिंदुओं की तरह चमक रही थी। फिर वह आगे बढ़ा और आगे हमारे क़रीब आकर बैठ गया। लगभग आठ गज के फासले पर वह खड़ा था। फिर उसने अपना एक हाथ उठाया। वह एक ओर संकेत कर रहा था। मैंने उस तरफ़ देखा जिधर वह संकेत कर रहा था। वह एक दरार थी जो दो पहाड़ों के बीच नज़र आ रही थी। फिर वह सफ़ेद आत्मा उसी दरार की तरफ़ बढ़ गयी। उसने हमें अपने पीछे आने का संकेत किया।

“चलो! यह कोई दूत है। देवी का दूत। हमें रास्ता दिखाने आया है।” गोरखनाथ ने उत्साहित स्वर में कहा।

“हमारा सांड भी गुफा में आराम कर रहा है।” गोरखनाथ ने उसे पुकारा तो वह भी उठकर खड़ा हो गया। अब हम सफ़ेद आत्मा के पीछे चल पड़े। सांड और गोरखनाथ बड़ी मुश्किल से दरार में समा पाए। दरार आगे चलकर चौड़ी हो गयी थी।

परंतु कुछ ही कदम चलने के बाद मैंने एक अद्भुत नजारा देखा। सफ़ेद आत्मा एक बंद जगह रुक गयी। आगे कोई रास्ता नहीं था। फिर वह छोटी आकृति में बदलने लगी और देखते ही देखते उसने एक छिपकली का रूप धारण कर लिया। इतनी बड़ी छिपकली मैंने जीवन में कभी नहीं देखी थी। वह लगभग तीन फुट लम्बी थी और उसके शरीर पर रंग-बिंरगी चमकीली धारियाँ थी जिसके कारण वह साफ दिखायी देती थी। वह एक रोशन सुराख में दाख़िल होकर नज़रों से ग़ायब हो गयी। पहाड़ी गोह के बारे में तो मैंने सुना था कि वह इतनी बड़ी हो सकती है परंतु गोह और छिपकली में बहुत सी भिन्नताएँ पाई जाती हैं। गोह कुछ-कुछ नेवले की शक्ल की होती है जिसका पिछला हिस्सा छिपकली की तरह होता है। गोह की नस्ल की ही एक ऐसी गोह भी होती है जो रंग-बिरंगी होती है और वह नस्ल बहुत कम मिलती है। वह इतनी जहरीली होती है कि साँसों की फुंकार से फिजा में ज़हर घोलकर आसपास के जीवधारियों को बेहोश कर सकती है। लेकिन वह गोह नहीं होती। देखने में छिपकली ही लगती है। बस उसकी देह बड़ी थी और देह पर रंग-बिरंगी धारियाँ थीं लेकिन उसे छिपकली कैसे माना जाता। उसे तो सफ़ेद आत्मा कहा जाएगा जिसने छिपकली का रूप धर लिया था और वह हमारी दृष्टि से ग़ायब हो गयी थी। न जाने क्यों मुझे मोहिनी याद आ गयी थी।

अधिक देर नहीं हुई जब हमने गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनी। सामने की चट्टान अपने स्थान से हट रही थी और उसके हटते ही शीलों का प्रकाश फैलता चला गया। दूसरी तरफ़ जाते हुए टाँगे काँपती थी। हमें वह सफ़ेद आत्मा अब नज़र नहीं आती थी। परंतु एक रास्ता ज़रूर दिखायी पड़ रहा था लेकिन दूसरी तरफ़ की आवाजें आ रही थीं। निश्चय ही उसकी कल्पना ज्वालामुखी के भीतर की हो सकती है जहाँ चट्टान लावा बनकर पिघलती है। सफ़ेद आत्मा ने हमारे लिए ज्वालामुखी का द्वार खोल दिया था और उस मार्ग पर चलने का साहस भला दिल मुरदे वाले इंसान का होता। हर चंद कि मैं मौत से नहीं डरता था परंतु दुनिया में मुझसे भी बहादुर होंगे जो मौत से डरते होंगे। वे भी इस मार्ग से गुजरने में गुरेज करेंगे।

“आगे बढ़ो!” गोरखनाथ ने कहा। “हमारा मार्ग खुला है।”

और मैं किसी मशीनी इंसान की तरह चल पड़ा। वहाँ का तापक्रम खासा बढ़ा हुआ था। जिस रास्ते पर हम चल रहे थे उसके एक ओर तो चट्टानों का बुलंद सिलसिला था परंतु दूसरी तरफ़ खाई थी और इस खाई में आग का समुद्र तैर रहा था। आग के इस समुद्र की तरफ़ देखा भी नहीं जा सकता था। लावा पिघल रहा था और जोर से पड़-पड़ की आवाज़ें उभर रही थीं जैसे कुछ पक रहा हो। बड़ा ही खौफनाक दृश्य था। रास्ता इतना ख़तरनाक था कि जरा सा पाँव फिसलते ही हम आग के समुद्र में होते।
 
एक बार एक पत्थर ऊपर से गिरा तो बड़ी ही भयानक आवाज़ें पैदा हुई। देर तक यह गूँज पहाड़ियों से टकराकर गूँजती रहीं और मैं गोरखनाथ से लिपट कर खड़ा-खड़ा काँपता रहा। यहाँ आकर गोरखनाथ की हालत भी कुछ अच्छी न थी। जब मैं उससे लिपटा तो उसका दिल धक-धक बजते सुना। सांड खुर-खुर कर रहा था। कदाचित वह भी आगे चलने से इनकार कर रहा था। पगडंडी पहाड़ी दामन में घुसती दूर चली गयी थी और हम शोलों की धरती पर एक बार फिर साहस जुटाकर आगे बढ़ने लगे। दूसरा कोई रास्ता वहाँ नहीं था। बस वह इकलौता मार्ग था। पगडंडी भी कोई ख़ास चौड़ी नहीं थी इसलिए पाँव काँप-काँप जाते। एक-दो बार ऐसा भी महसूस हुआ जैसे धरती लरज रही हो।

शोलों की वह घाटी पार करने के बाद हम बुरी तरह थककर चूर हो गए। अब हम एकदम शीत लहरों से जूझ रहे थे। बर्फ़ की सफ़ेदपोश चोटियाँ नज़र आ रही थीं। हम वहीं थक कर बैठ गए। दिन निकल आया था और निकट ही एक पहाड़ी झरना बह रहा था जिसके नीचे पानी की झील सी बन गयी थी जिसके साफ़ पानी में जगह-जगह बर्फ़ के तोंदे तैर रहे थे। यह बर्फ़ ऊपर से पिघल-पिघलकर आ रही थी। हमने झील के किनारे विश्राम किया।

कोई तीन घंटे बीते होंगे कि हमने कुछ आवाज़ें सुनी। हमें नींद आ गयी थी। इन आवाज़ों के कारण हमारी आँखें खुल गयी थीं। देखते क्या है कि हमें चारों तरफ़ से जंगलियों ने घेर रखा है। जंगलियों के नेजे हमारी ओर तने हुए थे और वे खौफनाक अंदाज़ में घूर रहे थे। उनका घेरा तोड़ने और उनसे लड़ने की हिम्मत हम में कहाँ थी। अगर हम जरा भी उनका विरोध करते तो वे हमारे टुकड़े-टुकड़े कर देते। न जाने वे कहाँ से प्रकट हुए थे। मैंने गोरखनाथ की तरफ़ देखा जो बिल्कुल शांत बैठा हुआ था।

“क्या तुम्हें इनकी भाषा आती है गोरखनाथ ?” मैंने गोरखनाथ से पूछा।

“मैं कोशिश करता हूँ।”

“जल्दी कोशिश करो। मुझे तो इनके इरादे अच्छे नहीं लगते।”

“देवी जो चाहेंगी, वही होगा।”

जब जंगलियों ने देखा कि हम किसी प्रकार का विरोध नहीं कर रहे हैं तो उनका सरदार आगे बढ़ा और उसने हमें संबोधित करते हुए कुछ कहा। उनकी भाषा रियासत की भाषा से बहुत मिलती-जुलती थी।

गोरखनाथ ने अपना त्रिशूल सीधा किया तो सरदार उस पर लहराता निशान देखकर कुछ घबराता हुआ सा पीछे हटा। अब गोरखनाथ खड़ा हो गया। उसके साथ-साथ सांड भी सीधा हो गया और खुरों से ज़मीन खोदने लगा। वह लड़ाकू सांड था जो जंगलियों से लड़ने के लिए बिल्कुल तैयार था और जंगली उसे आश्चर्यचकित दृष्टि से घूर रहे थे। गोरखनाथ जंगलियों के सरदार से न जाने क्या बातें करता रहा और फिर आग के पहाड़ों की तरफ़ संकेत किया। साथ ही अपने सांड की ओर भी। जंगलियों का सरदार एकदम से गोरखनाथ के क़दमों में दंडवत हो गया और मैंने राहत की साँस ली।

जंगलियों के सरदार के दंडवत होते ही शेष जंगली भी लम्बे-लम्बे हो गए। फिर गोरखनाथ ने जंगलियों के सरदार को कंधे से पकड़कर उठाया और उसकी पेशानी पर एक बोसा दिया। कुछ क्षण बाद ही सरदार ने घूमकर अपने साथियों से कुछ कहा और वे सभी उठ खड़े हुए। उनके हथियार झुके थे। फिर उन्होंने हमें शाही सलाम किया और अपने शस्त्र हमारे क़दमों की ओर में झुका दिए। अब गोरखनाथ मेरी ओर मुड़ा।

“चलो, अब कुछ विशेष कठिनाइयाँ शेष नहीं रही।”

“तुमने उन पर क्या जादू चलाया ?”

“दरअसल वे हम ही लोगों की खोज में भटक रहे थे। उन्हें बताया गया था कि देवी के दो भक्त इन पहाड़ियों में रास्ता भटक गए है। वे इस सांड के कारण परेशानी में पड़ गए थे। उन्होंने हमें कोई शैतानी बला समझकर घेर लिया था। क्योंकि सांड को यह लोग अशुभ समझते हैं और मार-काट कर खा जाते हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि हम देवी के भक्त हैं और मेरे त्रिशूल ने यह बात साबित कर दी। मैंने उन्हें यह भी बताया कि हमने आग का पहाड़ देवी की कृपा से पार किया है। स्वयं देवी ने हमारे लिए पहाड़ी के दरवाज़े खोले थे और वही हमें यहाँ तक लाई है। जब उसने सांड के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि यह हमारी सवारी है और इसे हम देवी के चरणों में अर्पित करने आए हैं ताकि भविष्य में किसी सांड को अशुभ न समझा जाए। मैंने उसे बताया कि यह आम क़िस्म का सांड नहीं है। यह हाथियों की तरह बलवान है। चाहे तो अपनी पूरी फ़ौज़ को इससे लड़वाकर देख लो। इस पर सभी जंगली दहशतजदा हो गए। यह लोग बैलों की जगह भी भैंसों का प्रयोग करते हैं। सांडों को अशुभ मानते हैं और भैंसों को शक्ति का प्रतीक मानते हैं। मैंने इनके सबसे शक्तिशाली भैंसे को चैलेंज भी किया।

“तो क्या यह लोग हमारे इस प्यारे दोस्त को भैंसे से लड़वाएँगे ?”

“हाँ! उनके कबीले का सबसे शक्तिशाली भैंसा हमारे दोस्त से लड़ेगा और मैंने यह चैलेंज कबूल कर लिया। अगर सांड ने भैंसे को पराजित कर दिया तो इसे देवी के चरणों में अर्पित कर दिया जाएगा और भविष्य में इसे देवी की सवारी मान लिया जाएगा।

“आज तक भैंसा देवी की सवारी माना जाता रहा है। इसके भैंसे बड़े ख़तरनाक होते हैं। और खूंखार जंगली जानवर भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते।”

“यह अच्छा नहीं हुआ। कालू ने हमारा बहुत साथ दिया है। वह न होता तो शायद ही हम जीवित रहते।”

गोरखनाथ उसे कालू ही कहता था। वह बिल्कुल काला था। एक भी सफ़ेद दाग़ उसके जिस्म पर नहीं था।

“नहीं राज! मेरा विश्वास है कि सांड इनके भैंसे को फाड़ डालेगा। तुमने एक जंग में ही इसे देख लिया है। उसकी फुर्ती का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता। इनका भैंसा शक्ति में भले बलवान हो परंतु लड़ाई में शक्ति से अधिक बुद्धि और फुर्ती काम करती है जो कि कालू के पास भरपूर है।

“कालू ने अपनी लड़ाकू ज़िंदगी में कामागारू जंगल के जानवरों में भारी दहशत बिठा दी। कोई हमारी तरफ़ का रुख़ नहीं करता था। वे सब कालू से डरते थे। एक बार कालू का मुक़ाबला ख़तरनाक चीते से हुआ था और कालू ने चीते को बचकर भागने का मौका भी नहीं दिया।”

कालू ने अंदर विशेषताएँ तो अवश्य थीं परंतु वह इतना खौफनाक होगा मैंने सोचा भी नहीं था। जंगली भैंसों के बारे में मैंने सुना था कि शेर भी उनसे दूर ही दूर रहता है। निश्चय ही इन जंगलियों के भैंसे भी जंगली ही होंगे।

रात का अंधकार फैलते ही हम उनके कबीले में पहुँच गए। कबीले में उन्होंने पहले ही एक हरकारा दौड़ा दिया था और कबीलेवासी स्वागत के लिए बीड़ के मैदान में उमड़ आए थे। सांड को वे लोग नफ़रत भरी दृष्टि से देख रहे थे। उनका बस चलता तो अब तक सांड के टुकड़े-टुकड़े कर देते परंतु सरदार के एक ज़ोरदार भाषण ने उन्हें शांत कर दिया था।

स्नान के लिए हमें गर्म पानी दिया गया जिससे सुगंध आती थी। मालूम पड़ता था कि उसमें कोई सुगंधित तेल या जड़ी-बूटी घोली गयी है। इस पानी से स्नान करते ही मैंने अपने आपको एकदम तरोताजा महसूस किया। उन्होंने हमें कुछ ऊनी कपड़े पहनने को दिए जो किसी जानवर की ख़ाल से बने थे। मुझे हैरानी हुई कि इस वस्त्र के फर जैसे मूल्यवान जानवर की ख़ाल जैसे थे। वैसे ही रोयेदार लाल और इस तरह के कोट अगर विश्व की किसी मंडी में पहुँच जाए तो फर के मूल्यों में ही बेचे। बाद में मुझे मालूम हुआ कि इस तरह का जानवर वहाँ पाला जाता है और उसका उपयोग वस्त्रों के लिए ही होता है। यूँ उसका दूध भी बहुत पौष्टिक होता था। वे लोग दूध के लिए या तो भैंस या उसी जानवर का प्रयोग करते थे। उसकी कद-काठी भी गाय जितनी थी और बालों से वह भारी ख़ाल में बड़ा खूबसूरत लगता था।

कबीले की रात कत्ल की रात थी। ढोल-नगाड़े पहाड़ियों में गूँजते रहे। यहाँ तक किसी इंसान या सेना का पहुँचना असंभव था। शायद यही कारण था कि लोग संसार की दृष्टि में नहीं आए थे। उन पहाड़ियों और तिलस्मी दर्रों को पार करके कौन यहाँ आ सकता था। बहरहाल कुँवर राज ठाकुर इस रहस्यमय प्रदेश में पहुँचा था और वह मोहिनी थी जिसके कारण यह भू-भाग देखने को मिला था।
 
कबीले की रात कत्ल की रात थी। ढोल-नगाड़े पहाड़ियों में गूँजते रहे। यहाँ तक किसी इंसान या सेना का पहुँचना असंभव था। शायद यही कारण था कि लोग संसार की दृष्टि में नहीं आए थे। उन पहाड़ियों और तिलस्मी दर्रों को पार करके कौन यहाँ आ सकता था। बहरहाल कुँवर राज ठाकुर इस रहस्यमय प्रदेश में पहुँचा था और वह मोहिनी थी जिसके कारण यह भू-भाग देखने को मिला था।

दो दिन कबीले में विश्राम करने के बाद एक बड़े जुलूस के साथ चंद पहाड़ियाँ और चढ़कर हम एक विशाल मैदान में पहुँचे। मैंने देखा कि पहाड़ियों के तराई से जैसे ही कई जुलूस आ रहे थे। उनके हाथों में पताकाएँ थी और उनके आगे-आगे रस्सियों से जकड़े भैंसे दौड़ रहे थे। भैंसे को रस्सियों से नियंत्रित किया जा रहा था। इसी से मालूम पड़ता था कि वे कितने ख़तरनाक हैं।

गोरखनाथ ने मुझे बताया कि चार भैंसे वहाँ से देवी के मैदान में लाए जा रहे हैं और उसी जगह देवी का मंदिर है। वहाँ चारों में यह फ़ैसला किया जाएगा कि उनमें कौन सा शक्तिशाली है और फिर जो उनमें सबसे शक्तिशाली होगा उससे कालू को लड़ना होगा।

“लेकिन इसका फ़ैसला कैसे होगा कि उन चारों में शक्तिशाली कौन सा है ?”

“उन चारों को एक रास्ते पर दौड़ाया जाएगा। वहाँ एक पहाड़ी है जिसपर देवी का मंदिर है। चारों भैंसे उस पूरी पहाड़ी की परिक्रमा करेंगे और जो सबसे पहले परिक्रमा करके लौटेगा वह शक्तिशाली मान लिया जाएगा। ये भैंसे आपस में लड़-झगड़कर आगे बढ़ते हैं। संभव है उनमें से एक-दो मर भी जाए।” गोरखनाथ ने मुझे बताया।

“फिर तो वह थका हुआ होगा।”

“यह तुम्हारा ख़्याल है। उसे अगले दिन लड़ाया जाएगा। रात भर देवी का नाच होगा। ऐसा मुक़ाबला पहली बार यहाँ देखने में आएगा इसलिए सभी कबीले वाले भरपूर संख्या में यहाँ आएँगे। वैसे भी देवी का वार्षिक उत्सव शुरू होने में दो दिन बाकी है और शायद इसी से उत्सव का प्रारंभ होगा।”

“ओह! क्या पहाड़ों की रानी भी वहाँ आएगी ?”

“पहाड़ों की रानी उत्सव के अंतिम दिन दर्शन देती है और तभी पहाड़ी पर स्थापित मंदिर के कपाट वह स्वयं खोलेगी। लोग देवी के दर्शन करके लौट जाएँगे। इन लोगों ने सांड को लड़ाने के लिए वही स्थान उपयुक्त समझा है। ताकि अधिक से अधिक लोग इस तमाशे को देख सके।”

मुझे यह सब बातें अजीब लग रही थीं और बेचारे कालू पर भी तरस आ रहा था। उस मूक जानवर को क्या खबर कि उस पर क्या आफत टूटने वाली है।

हमारा जलूस उस मैदान में पहुँच गया। बहुत से छोटे-बड़े जानवर भी जलूस में थे जिनकी बलि चढ़ाई जानी थी। हो सकता था कि इस सलाना त्यौहार में नर बलि भी दी जाती क्योंकि ऐसा उन लोगों के बारे में मैं सुन चुका था। कालू बड़े शांत भाव से चल रहा था। आख़िर हम उस मैदान में पहुँच गए जहाँ का वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ।

इस मैदान में मेला सा भरता जा रहा था। ऊपर वह ऊँची पहाड़ी थी जिसकी चोटी बर्फ़ से ढकी थी। परंतु मंदिर के कोई चिह्न नज़र नहीं आते थे। अलबत्ता एक चौड़ा रास्ता ऊपर की ओर जाता दिखायी दे रहा था और यह रास्ता एक गुफा से निकलता था।इसी गुफा के द्वार को देवी के मंदिर का कपाट कहा जाता था जिसका बाहरी भाग किसी छिपकली के जबड़े की शक्ल का बना था। कदाचित अंदर का रास्ता बंद था। और उसके चारों तरफ़ की सपाट चट्टानें खड़ी थी कि उन्हें किसी सुरक्षित दुर्ग की चारदीवारी कहा जाए तो उत्तम होगा। जंगलियों के पुजारी गुफा के द्वार के सामने एकत्रित होते जा रहे थे। उसी जगह एक चबूतरा था जहाँ विभिन्न दिशाओं से लायी गयी ध्वजाएँ रखी जा रही थीं। इन ध्वजाओं की बाँसों पर कोई जोड़ नहीं था। और कोशिश यह रहती थी कि लम्बी से लम्बी ध्वजा लाई जाए। क्योंकि जिसकी ध्वजा सबसे लम्बी होती थी वह पहले देवी का प्रसाद पाने का हक़ रखता था। सभी ध्वजाओं पर देवी का निशान फहरा रहा था और उस पर कबीलों के निशान भी थे जो नीचे बँधे थे।

एक कबीले से एक ही ध्वजा आती थी। ढील, तासे और नगाड़े गूँज रहे थे। बड़ा ही अजीब नजारा था। मैं पहाड़ी की उस चोटी की तरफ़ देख रहा था जहाँ मोहिनी देवी का मंदिर था। मैं उसके कितने क़रीब आ गया था। मेरी मोहिनी मुझे सशरीर दर्शन देने वाली थी वह मोहिनी जो मेरी बांदी रही थी। मेरी कनीज। कितनी शोख बातें हुआ करती थीं। कितनी हंगामा ज़िंदगी थी। मोहिनी के साथ बीती एक-एक घड़ी मुझे याद आ रही थी।

दूर जहाँ तक नज़र जाती थी इंसानों के सिर ही सिर नज़र आते थे। बूढ़े, बच्चे, जवान, स्त्री और पुरुष सभी उसमें सम्मिलित थे। जगह-जगह नृत्य हो रहा था। रात को मशालों का प्रकाश फैल रहा था। हमने मशालों का खौफनाक नाच भी देखा। और मुँह से आग निकालने वालों की उछल-कूद भी। लेकिन इस उत्सव का सबसे अहम समय तब आया जब कालू की पीठ गोरखनाथ ने थपथपाकर जंग के मैदान में उतारा। लोग टीलों पर चढ़-चढ़कर यह नजारा देख रहे थे।

एक छोटा सा मैदान रस्सी से बाँधकर तैयार किया गया जो गुफा के द्वार के ठीक सामने तैयार किया गया था। लोग अब भी कालू सांड को नफ़रत की दृष्टि से देख रहे थे। भैंस को अब भी दस-पंद्रह आदमियों ने रस्सियों से जकड़ रखा था।अचानक मैंने देखा कि भैंसे को कुछ पिलाया जा रहा है और वह रस्सियाँ तोड़कर भागने की चेष्टा कर रहा था। जबकि कालू सांड बिल्कुल शांत खड़ा था। फिर एक और खौफनाक दृश्य दिखायी दिया। भैंसे की पीठ पर एक जंगली ने किसी धारदार शस्त्र को घोंपा और भैंसा चिंघाड़ने लगा। उसकी पीठ से खून बहने लगा। ज़ख़्म पर कोई चीज़ डाली गयी और भैंसा जैसे पागल हो उठा। भैंसे की आँखें जैसे क्रोध से दहक रही थीं। भैंसे को उस मैदान की तरफ़ हाँका गया और रस्सियाँ खोल दी गईं।

भैंसा अपना सिर झुकाकर झोंक में आगे दौड़ता चला गया। वह रस्सियों के जाल से टकराकर रुक गया फिर पलटा और अपने सींग ज़मीन पर मारकर उसने ढेर सारी मिट्टी उखाड़ फेंकी। इसी से उसके क्रोध का पता लगता था। जिस रास्ते उसे अंदर दौड़ाया गया था उसे भी बंद कर दिया गया। रस्सी के बाहर खड़े लोग चिल्ला-चिल्ला कर शोर मचा रहे थे। अचानक भैंसे ने एक दहशतअंगेज हुंकार भरी और इधर-उधर देखने लगा। अब उसकी नज़र एक कोने में खड़े सांड पर पड़ी तो भैंसे की आँखें उस पर जमकर रह गयी। उसने खुरों से धूल उड़ानी शुरू कर दी जो जंग का ऐलान था।

कालू के शरीर में मैंने झुरझुरी सी दौड़ती देखी और फिर वह भी भैंसे की तरह खुरों से धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ने लगा। वे शायद अपने पैंतरे बना रहे थे। अचानक भैंसा दौड़ पड़ा फिर कालू ने भी दौड़ लगाई और धड़ाम की आवाज़ के साथ दोनों के सिर टकरा गए। सिर टकराते ही दोनों एक-दूसरे को धकेलने का प्रयास करने लगे। लेकिन भैंसे की शक्ति के सामने कालू के पाँव उखड़ गए और कालू पीछे हटता चला गया। यहाँ तक कि उसका पिछला भाग रस्सी से जा लगा। कालू अब भी अपने पाँव जमाने की पूरी कोशिश कर रहा था। भैंसा कालू को ज़मीन चटाना चाहता था। रस्से चड़चड़ाने लगे तो दर्शकों ने उन्हें कोंच-कोंच कर पीछे हटाना शुरू कर दिया। इस चक्कर में कालू को थोड़ा सा अवसर मिल गया और वह बड़ी फुर्ती के साथ भैंसे के सामने से निकलकर दूसरी दिशा में दौड़ लगा दी।

भैंसा अपनी ही रो में रस्सों से टकराया। दर्शकों ने उसे खदेड़ा तो वह पलटकर सांड के पीछे भागा। अब हालत यह थी कि सांड आगे-आगे था और भैंसा पीछे-पीछे। एक-दो बार भैंसे का खाली वार रस्सों से टकराया और एक बार तो उसके सींग ही रस्सों में उलझ गए। भैंसे के सींगों को फँसा देखकर कालू ने पैंतरा बदला और भैंसें की पुश्त पर हमला कर दिया। उसने भैंसे को ज़मीन से उठाकर पटक दिया। दर्शकों ने झटपट भैंसे के सींगों को मुक्त किया। तब तक कालू ने उस पर कई जानदार हमले बोले और जब भैंसा सीधा हुआ तो वह फिर ज़मीन से धूल उड़ाता बड़े भयानक अंदाज़ में सांड से जा भिड़ा।

इस बार कालू की शामत आ गयी। भैंसे ने उसे सींगों पर उठा लिया था और इसी स्थिति में चकराता फिर रहा था। उसने कालू के शरीर में सींग पेवस्त कर दिए थे। फिर उसने कालू को जमीन पर पटका और उसे रौंदने के अंदाज़ में सींगों से ही ज़मीन पर रगड़ता चला गया। कालू ने उठने का प्रयास किया। वह बुरी तरह जख्मी हो गया था और उसका अंत क़रीब आ गया था। भैंसे ने उसे दबाए रखने की भरपूर चेष्टा की इसीलिए उसने पेवस्त सींगों को बाहर नहीं खींचा और कालू जैसे ही कलाबाजी खाकर सीधा हुआ तो भैंसे का एक सींग उसके सीने में ही फँसा रह गया। उसका एक सींग टूट गया था। पीड़ा के कारण भैंसा बिलबिलाकर अपने इकलौते सींग को लेकर पीछे हटा। खून-खच्चर हो गया था और अब कालू बड़े ही भयंकर क्रोध में खड़ा हो गया। उसने उछलकर एक जबरदस्त टक्कर भैंसे के दूसरे सींग पर मारी और यह प्रहार कालू का इतना जानदार था कि भैंसे का दूसरा सींग भी टूटकर अलग जा गिरा।

अब कालू ने अपना सिर तिरछा किया और भैंसे की एक आँख अपने सींग से फोड़ दी। भैंसे का सारा मुँह लहूलुहान हो गया। भैंसे ने अब अंधों की तरह लड़ना शुरू किया और कालू को एक-दो बार पटकने में सफल भी हुआ। परंतु भैंसे के पास अब कालू को जख्मी करने के हथियार नहीं रहे थे। फिर कालू को एक और अवसर मिला। उसने भैंसे की दूसरी आँख भी फोड़ दी। भैंसा अब डकराने लगा और आक्रमण की बजाय जान बचाने की कोशिश करने लगा। अब कालू फुर्ती से उसे घेर-घेरकर मार रहा था। उसके सींग किसी धारदार हथियार की तरह काम कर रहे थे। हालाँकि उसके सीने में अब भी एक सींग फँसा हुआ था। दर्शकों का जोश अब ठंडा हो गया था। भैंसे पर पड़ने वाली हर चोट पर उनकी आह निकलती। भैंसा अब पस्त होता जा रहा था। कालू उसे घेर-घेरकर चारों तरफ़ से मार रहा था। एक बार कालू ने उसकी गर्दन में सींग पेवस्त किए और फिर उसे दबाता चला गया। भैंसा अब चारों खाने चित्त पड़ा था।

कालू ने जिस समय सींग उसकी गर्दन से बाहर निकालें तो ढेर सारा खून बह गया और अब भैंसा उठने योग्य भी नहीं रह गया था। लेकिन कालू के हमले तब तक नहीं रुके जब तक कि भैंसा निर्जीव नहीं हो गया। अब कालू किसी शराबी की तरह झूम रहा था। बाड़ा खुलते ही सबसे पहले गोरखनाथ अंदर दाख़िल हुआ और उसने कालू को थपथपाया। फिर उसके सीने में पेवस्त सींग को बाहर खींच लिया और जल्दी से कालू के जख्मों पर कोई चीज़ मलनी शुरू कर दी। लोगों के चेहरों पर अब भय और आश्चर्य के मिले-जुले भाव थे। फिर गोरखनाथ ने ज़ोरदार आवाज़ में भाषण सा दिया और जंगलियों का बड़ा पुजारी तुरंत आगे बढ़ा। उसने सांड के मस्तिष्क पर एक टीका लगाया और उसके गले में देवी का एक निशान बाँध दिया।

उसके बाद पुजारी ने एक ऐलान किया और लोगों ने नारे लगाने शुरू कर दिए। उनके चेहरों पर ख़ुशी की चमक थी। बहुत से लोगों ने अब कालू पर फूलों की वर्षा की।

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मेला चलता रहा। हमारा हर तरफ़ सम्मान किया जाता और सबसे अधिक सम्मान तो अब कालू को मिल रहा था। कालू चार रोज़ तक तो उपचार में ही पड़ा रहा। वह बहुत घायल हो चुका था परंतु चार दिन बाद वह उठकर खड़ा हो गया। मेले में किस-किस तरह की बलियाँ चढ़ाई गयी इसका वर्णन फिजूल ही है क्योंकि गुफा के रास्ते पर तो खून का तालाब ही बन गया था जो निश्चय ही टखनों से ऊपर ही रहा होगा।

कबीलें वाले अपनी-अपनी भेंटें चढ़ाते। जानवरों के सिर कटते रहे, खून बहता रहा। बलि चढ़ाए गए जानवरों की तुरंत खालें निकाल ली जाती और उनका माल भूनकर खा लिया जाता। बहुत से लोगों ने अपना खून भी दान किया था। उन खौफनाक दृश्यों को तो मैं देख भी नहीं पाता था। परंतु गोरखनाथ ने मुझे बताया कि वहाँ दो इंसानों की भी बलि चढ़ाई जा चुकी है।

वार्षिक त्योहार का अंतिम दिन भी आ गया। गुफा के सामने दूर-दूर तक लोगों की कतारें थीं। सभी की आँखें खून में डूबी गुफा की ओर जमी थी। कबीलों के सरदारों की पंक्ति सबसे आगे थी और उनसे आगे पुजारीगण थे। जहाँ बड़ा पुजारी था, वहीं गोरखनाथ खड़ा था और उसके पीछे मैं खड़ा था। गुफा के कपाट खोलने का समय आ गया। कपाट के खुलते ही वहाँ जमा खून अंदर बह जाना था जिसका अर्थ था देवी ने भेंट स्वीकार कर ली है। और परंपरा के अनुसार उसी गुफा से पहाड़ी रानी को बाहर आना था जो देवी का प्रतिरूप मानी जाती थी। उसके दर्शन ही देवी के दर्शन थे। फिर बचे हुए खून से लोग अपना पाँव भिगोकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते।

मेरा दिल तेज-तेज धड़क रहा था। क्या पहाड़ों की रानी ही मोहिनी है ? किंतु एक प्रश्न ऐसा था जिसका जवाब न मिलता था। मैंने सुना था जब से यह धरती बनी है, तब से लोग यहाँ बसे हैं। पहाड़ों की रानी भी तभी से बसी है। क्या कोई इंसान हज़ारों वर्ष तक जीवित रह सकता है और अगर वही मोहिनी थी तो फिर गोरखनाथ का कथन कितना सत्य था। या फिर उस साधु का जिसने मुझे जीवनदान दिया था। यह कि मोहिनी का शरीर मात्र वहाँ क़ैद है और उसकी आत्मा को श्राप प्राप्त था। उसकी रूह यहाँ नहीं आ सकती थी। न ही अपना शरीर धारण कर सकती थी। जबकि पहाड़ों की रानी सशरीर थी और सदियों से वहाँ थी। यह ऐसे सवाल थे जिसका जवाब आने वाले वक्त के अंधेरे में छिपा था और मैं उसी वक्त का इंतज़ार कर रहा था।

फिर वह भी समय आया जब एक विचित्र सा गायन पुजारियों ने शुरू किया। ढोल-ताशे बजने लगे। फिर उस गायन की आवाज़ चारों तरफ़ गुँजने लगी। इतनी तेज आवाज़ कि सारी पहाड़ियाँ गूँज उठी। मालूम पड़ता था जर्रा-जर्रा वही गायन गा रहा हो।आवाज़ें बुलंद होती गयीं और फिर अचानक ज़ोरदार गड़गड़ाहट गुफा में पैदा हुई। इस गड़गड़ाहट के साथ ही बड़े पुजारी ने देवी का जयघोष किया और गायन एकदम समाप्त हो गया। अब सिर्फ़ जयनाथ गूँज रहा था।

और फिर मैंने धड़कते दिल से गुफा के मुख पर एक स्त्री को बरामद होते देखा। उसके पाँव खून से रंगे थे बल्कि पाँव तो नज़र ही नहीं आ रहे थे। उसके हाथ में एक त्रिशूल था जिस पर खून के कतरे टपकते नज़र आ रहे थे। वह सिर से पाँव तक एक लबादे में छिपी थी। सिर्फ़ उसकी चमकती आँखें ही देखी जा सकती थी। उसके सिर पर एक जगमगाता सोने का ताज था। ताज की जगमगाहट से उसका सिर अलौकिक लग रहा था। लोगों के सिर उसके आगे झुकने लगे और एक गहरी खामोशी छा गयी। मालूम ही नहीं पड़ता था कि कुछ देर पहले वहाँ शोर का तूफ़ान हिलोरें ले रहा था। अब वहाँ इतना सन्नाटा था कि किसी की साँस भी न सुनाई देती थी।

अगली कतारें तो बिल्कुल दंडवत लम्बी हो गयी थी। पीछे के लोग एक-दूसरे पर गिर से गए थे। कोई चू-चपड़ नहीं कर रहा था। गोरखनाथ के साथ मैं भी झुक गया। पहाड़ों की रानी ने एक नज़र पूरी भीड़ पर डाली और फिर अपना त्रिशूल बुलंद किया। साथ ही उसके कंठ से एक खनकती हुई आवाज़ फिजा में गूँजने लगी। उसकी आवाज़ इतनी बुलंद थी कि शायद वहाँ हर व्यक्ति को सुनाई पड़ रही थी। जैसे हर तरफ़ लाउडस्पीकर लगे हों और वह माइक पर बोल रही हो।

मैं पहले ही रियासत की भाषा कम जानता था और यह भाषा उससे मिलती-जुलती थी। चंद शब्द ज़रूर मेरे पल्ले पड़ जाते। इसलिए मैं यहाँ यह बताने में असमर्थ हूँ कि पहाड़ी रानी ने क्या कहा और वे लोग क्या कहते थे। पहले की बातें तो मुझे गोरखनाथ से मालूम हो गयी थी। वह विशेष उल्लेखनीय नहीं है। इतना ही उल्लेखनीय है कि हमें पुजारियों की हैसियत प्राप्त हो गयी थी। उन्होंने कालू को देवी की सवारी मान लिया था। कालू उस वक्त वहाँ नहीं था।

पहाड़ों की रानी लगभग दस मिनट तक बोलती रही। फिर वह गुफा के क़रीब ही बनी पत्थरों की एक इमारत की तरफ़ बढ़ चली। इस इमारत में बड़ा पुजारी रह करता था। उसके पीछे-पीछे बड़ा पुजारी और कबीलों के सरदार भी चलते बने। हम वहीं खड़े रहे। लोग गुफा में फैले रक्त के तालाब में पाँव भिगो-भिगोकर लौटने लगे। यह क्रम घंटों का था और चलता रहा। पहाड़ों की रानी उसी इमारत में थी। फिर हमें वहाँ बुलाया गया।

पहाड़ों की रानी एक तख्त पर विराजमान थी। सरदार और पुजारी उसके समक्ष फर्श पर बैठे थे।

“ऐ देवी के भक्त गोरखनाथ!” रानी ने गोरखनाथ को संबोधित किया और यह भाषा ऐसी थी कि मैं भी समझ सकता था। “तेरा कर्तव्य पूरा हुआ। तूने देवी की चरणों की बहुत सेवा की और देवी के विशेष अतिथि को यहाँ तक पहुँचाया। बोल तुझे क्या चाहिए ?”

“कुछ नहीं महामाया। मैं देवी के दर्शन करके मुक्तिपथ चाहता हूँ। मेरा जीवनकाल भी अब अधिक शेष नहीं रहा। मुझे किसी माया-मोह की इच्छा नहीं है।” गोरखनाथ ने कहा।

“तो फिर तुम लोग तैयारी करो। तुम दोनों हमारे साथ ही चलोगे। मैदानी रियासत की रानी ने जो कष्ट तुम्हें पहुँचाया उसका साथ वह ज़रूर मानेंगे। मैंने सरदारों से कह दिया है कि वह युद्ध की तैयारियाँ प्रारंभ कर दें।”

फिर वह मेरी तरफ़ आकर्षित हुई- “और ऐ विशिष्ट अतिथि, तुम्हें जो कष्ट भोगने थे अब उसका अंत हो चुका। तुम कितने महान हो इसका ज्ञान अभी तुम्हें नहीं है। मुझे अधिक कुछ नहीं कहना। तुम भी तैयार हो जाओ। और तुम्हारा वह सांड नहीं रहेगा। तुमने उसे देवी की सवारी के लिए भेंट किया है। देवी अवश्य उस पर सवारी करेगी। वह बहुत प्रसन्न है।”

अंतिम शब्द पहाड़ों की रानी ने गोरखनाथ से कहे थे। उसके बाद पहाड़ों की रानी उठ खड़ी हुई।

पहाड़ों की रानी अब भी सिर से पाँव तक सशरीर छिपी थी। उसका कोई भी अंग नज़र नहीं आता था। पाँवों और हाथों पर भी पट्टियाँ सी बँधी थी। रानी की वापसी उसी गुफा से होनी थी।

थोड़ी देर बाद हम चल पड़े। गुफा का खून अब खुश्क हो गया था। एक पपड़ी सी उसकी सतह पन जमी थी जिस समय हम वहाँ प्रविष्ट हुए गुफा के पास से भीड़ छँट चुकी थी और वहाँ बड़े पुजारी के सिवाय कोई नहीं था।

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