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Guest
मैंने भी उसी अंदाज़ में सिर झुकाकर उसका उत्तर दिया। उसके बाद काफिला हमें लेकर चल दिया। हम रियासत की राजधानी में तीन दिन बाद पहुँचे। बीच में तीन पड़ाव डाले गए। यहाँ हमें बहुत ही अच्छा खाना उपलब्ध हुआ। ऐसे शर्बत पीने को मिले कि सफ़र की सारी थकावट पलों में दूर भाग गयी। फिर हमें राजसी महल में ले जाया गया। दरबार भवन में महारानी ने स्वयं हमारा स्वागत किया। महारानी एक लम्बे कद की बहुत ही खूबसूरत औरत थी और मुझे देखकर उनके होंठों पर खिले फूल की ताजगी सी निखर आई। उस शाम एक बड़ा सा जश्न हुआ और हमारा स्वागत हुआ जैसे किसी राजा-महाराजा का होता है। इन्द्र सभा की तरह सुंदर दासियाँ हमारी सेवा में थीं। नाच-गाने की महफ़िल गयी रात तक सजी रही। एक से एक फंकार अपना फन दिखाते इनाम पाते रहे। फिर दासियों ने हमें विश्राम कक्ष में पहुँचा दिया। यहाँ मैं गोरखनाथ से अलग हो गया। एक खूबसूरत शयनागार में मैंने रात बिताई। एक मुद्दत बाद ऐसा बिस्तर नसीब हुआ था अन्यथा मैं काँटों में सोता रहा था। रात सुंदर सपनों में बीत गयी।
सुबह-सुबह महारानी ने स्वयं दर्शन दिए। वह बहुत ही ख़ुश थीं।
“ऐ हमारे मेहमान, ऐसा जान पड़ता है कि सदियों से हमारी आत्मा यहाँ भटक रही थी और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। कितने जमाने, कितनी सदियाँ बीतने के बाद तुम यहाँ आए हो। लेकिन हमने सुना है कि तुम उन वीरान पहाड़ों की तरफ़ जाओगे जहाँ एक वहशी कौम आबाद है और उनका शासन एक बूढ़ी जादूगरनी के हाथ में है जो खुद को पहाड़ों की रानी कहलवाती है।”
“आपने ठीक सुना। हमारी मंज़िल वही पहाड़ है।”
परंतु वहाँ जाकर तुम क्या करोगे। वे ख़तरनाक वहशी भक्षी हैं। उनकी कोई देवी है जिस पर वे इंसानों की बलि चढ़ाते हैं। तुम तो सिर्फ़ हमारे लिए यहाँ आए हो और वह सिर्फ़ बहाना है। हम ही तुम्हारी मंज़िल हैं। हम सदियों से तुम्हें जानते हैं। हमारा प्यार तुम्हें सैकड़ों पहाड़ों के उस पार से खींच लाया है। यहाँ हमारे अलावा कोई भी सुंदरता की देवी नहीं।”
मैं पशोपेश में पड़ गया। कुछ जवाब देते नहीं बन पड़ा। वह आगे बढ़ी और उसने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।
“बोलो कौन है वह जिसकी तलाश में तुम यहाँ तक आए हो। नहीं, तुम्हें शायद कुछ याद नहीं। हम ही हैं। हमने तुम्हें बुलाया है। हमें पहचानो, देखो हमारी आँखें, देखो हमारा दिल। क्या हम तुम्हें जाने पहचाने नज़र नहीं आते ?”
सुबह-सुबह महारानी ने स्वयं दर्शन दिए। वह बहुत ही ख़ुश थीं।
“ऐ हमारे मेहमान, ऐसा जान पड़ता है कि सदियों से हमारी आत्मा यहाँ भटक रही थी और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। कितने जमाने, कितनी सदियाँ बीतने के बाद तुम यहाँ आए हो। लेकिन हमने सुना है कि तुम उन वीरान पहाड़ों की तरफ़ जाओगे जहाँ एक वहशी कौम आबाद है और उनका शासन एक बूढ़ी जादूगरनी के हाथ में है जो खुद को पहाड़ों की रानी कहलवाती है।”
“आपने ठीक सुना। हमारी मंज़िल वही पहाड़ है।”
परंतु वहाँ जाकर तुम क्या करोगे। वे ख़तरनाक वहशी भक्षी हैं। उनकी कोई देवी है जिस पर वे इंसानों की बलि चढ़ाते हैं। तुम तो सिर्फ़ हमारे लिए यहाँ आए हो और वह सिर्फ़ बहाना है। हम ही तुम्हारी मंज़िल हैं। हम सदियों से तुम्हें जानते हैं। हमारा प्यार तुम्हें सैकड़ों पहाड़ों के उस पार से खींच लाया है। यहाँ हमारे अलावा कोई भी सुंदरता की देवी नहीं।”
मैं पशोपेश में पड़ गया। कुछ जवाब देते नहीं बन पड़ा। वह आगे बढ़ी और उसने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।
“बोलो कौन है वह जिसकी तलाश में तुम यहाँ तक आए हो। नहीं, तुम्हें शायद कुछ याद नहीं। हम ही हैं। हमने तुम्हें बुलाया है। हमें पहचानो, देखो हमारी आँखें, देखो हमारा दिल। क्या हम तुम्हें जाने पहचाने नज़र नहीं आते ?”