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रानी आगे-आगे चल रही थी। गुफा के भीतर की सुरंग में सीढ़ियाँ बनी थीं। इन सीढ़ियों को पार करते हुए हम खुले आसमान के नीचे निकले। फिर लगभग एक-दो फर्लांग चलने के उपरांत एक गुफा और पार हुई। दूसरी तरफ़ चंद लोग दिखायी दिए जिन्होंने हमारा स्वागत किया। वे सब के सब लबादे में थे। पहाड़ों की रानी और उनमें अंतर यह था कि रानी के हाथ में त्रिशूल और सिर पर ताज था जबकि उनके पास यह चीज़ें नहीं थीं। उनके हाथों और पैरों में भी पट्टियाँ बँधी थी।
रानी ने उन लोगों से कुछ कहा और स्वयं एक गुफा की ओर बढ़ चली। वहाँ ऐसी बहुत सी गुफाएँ थीं। वे लोग शायद उन्हीं गुफाओं में रहते थे क्योंकि इमारत तो कहीं नज़र नहीं आती थी। स्वयं स्त्री-पुरुष दोनों ही थे। गोरखनाथ ने मुझे बताया कि यह पहाड़ों की रानी के दूत हैं। उनमें से दो दूत हमें लेकर चले। रास्ता बिल्कुल खामोशी से तय हुआ। इस पहाड़ी में बड़ी गंभीर खामोशी थी। चक्करदार रास्ते में हम बढ़ते रहे। छोटी-मोटी पहाड़ियों को पार करते हुए हम बर्फ़पोश चोटियों की ओर बढ़ते रहे। यह यात्रा तीन दिन में संपूर्ण हुई। हमने रात गुफाओं में विश्राम करके बिताई थी और दिन भर बिना रुके यात्रा की थी। तीन दिन बाद हम बर्फ़ के बीच से गुजरते हुए अपनी मंज़िल पर पहुँच गए।
यह मंज़िल भी एक बड़ी गुफा ही थी और यहाँ भी कोई इमारत नहीं थी। अंदर तो गुफाओं और सुरंगों का तिलिस्म मिला और बाहर के दूतों ने हमें अंदर के दूतों के हवाले कर दिया।
अंदर सभी स्त्रियाँ थीं। वहाँ पुरुष और स्त्री की पहचान कद-काठी से ही हो जाती थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि अंदर के दूत भी लबादे पहने थे। परंतु उनके पास छोटे-छोटे त्रिशूल थे जो उन्होंने अपने लबादों में खोस रखे थे। सूरज का प्रकाश शायद ही अंदर झाँकता हो परंतु वह जगह प्रकाशमान थी और यह प्रकाश अलौकिक रूप से गुफा के द्वार से फूटता हुआ प्रतीत होता था। अंदर एक गुफा में हमें जानवरों की खालों के बिछौने मिले। हमें पीने के लिए शर्बत दिया गया और इस शर्बत को पीते ही हमें नींद आने लगी। यह गुफायें बर्फ़पोश पहाड़ियों के भीतर थीं। फिर यहाँ अत्यधिक गर्माहट थी। हम वहाँ आराम से पसर कर सो गए। जब हम जागे तो सारी थकान मिट चुकी थी। एक दूत ने हमें एक दूसरी गुफा में लाकर खड़ा किया। इस जगह चारों तरफ़ लाल पर्दे थे और उन पर्दों के पीछे शोले उठते हुए से महसूस हो रहे थे। वहाँ एक तख्त पर पहाड़ों की रानी बैठी थी। दूत ने हमें वहाँ छोड़ा और खुद वापसी की राह ली।
“क्या यही मोहिनी है ?” मेरे मन का कौतूहल जाग उठा।
“कुँवर राज ठाकुर! अब वह समय आ गया है।” अचानक पहाड़ों की रानी का खनकता स्वर सुनाई पड़ा। “परंतु इससे पहले कि मोहिनी देवी के दर्शन करो। मैं उन रहस्यों से पर्दा उठाती हूँ जो तुम्हारे इल्म में नहीं। तुम कौन हो कुँवर जानते हो ? परंतु नहीं, तुम किस तरह जान सकते हो। परंतु तुम्हें अवश्य याद होगा कि सर्वप्रथम मोहिनी देवी अपनी इच्छा से तुम्हारे सिर पर आई थी।”
“हाँ, मुझे याद है!”
“लेकिन तुम इन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते थे। मोहिनी देवी, जिसे पाने के लिए बड़े से बड़ा तांत्रिक अपने प्राण संकट में डालने के लिए तैयार रहता है, वह तुम्हारे पास स्वतः आई थी। जानते हो क्यों ?”
मैं चुप रहा क्योंकि इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं था।
“तो सुनो! आज से हज़ारों साल पहले तुम एक फिराऊन वंश के राजकुमार थे। मिश्र के उस कदीम जमाने में फिराऊन के अत्याचारों का बोलाबाला था। वह स्वयं को ईश्वर मानते थे और मिश्र के लोग इन्हीं की पूजा करते थे। उसी जमाने में पहाड़ों में एक जाति आबाद थी जो बहुत ख़तरनाक लड़ाकू जाति थी। हालाँकि वे फिर उनकी सीमा में आबाद नहीं थे परंतु फिराऊन अपने राज्य का विस्तार करते हुए आ रहे थे और इस जाति से उन्हें कई बार शिकस्त मिल चुकी थी। दक्षिण की ओर साम्राज्य फैलाने में यह जाति दीवार बनकर खड़ी थी। ये लोग मोहिनी देवी की पूजा करते थे। फिराऊन को शैतान मानते थे। मोहिनी देवी को वे लोग छिपकली और स्त्री के शक्ल से मिलती-जुलती मानते थे।
छिपकली उनके लिए पवित्र आत्मा थी और उस जाति का शासन हमेशा किसी स्त्री के हाथों में रहता था जिसे मोहिनी का खिताब दिया जाता था। रानी को मोहिनी का अवतार माना जाता था। एक बार फिर उसने जुल्मों के कारण स्वयं मोहिनी देवी ने मनुष्य रूप में अवतार लिया था और यही वह रानी थी जिसके कारण मिश्री सेनाएँ आगे न बढ़ पाती थीं। फिर मोहिनी की आख़िरी जंग तुम्हारे साथ हुई। पहाड़ी जाति ने तो तुम्हारी सेना को मार गिराया परंतु तुम आख़िरी दम तक लड़ते रहे। फिर तुम्हें क़ैद कर लिया गया। देखो काल चक्र के पीछे क्या हुआ।”
रानी ने त्रिशूल उठाया और फिर उसका रुख़ एक लाल पर्दे की तरफ़ किया। त्रिशूल से एक अग्नि रेखा निकलकर पर्दे से टकराई। फिर वहाँ शोले ही शोले नज़र आने लगे। शोलों के बीच का स्थान धीरे-धीरे दृश्यों में बदलता जा रहा था। जंग हो रही थी और फिर मैं उछल पड़ा। मैंने ध्यानपूर्वक देखा। दृश्य अब बिल्कुल साफ हो गए थे।
मैं ही था। बिल्कुल मेरा ही चेहरा था परंतु वस्त्र कदीम मिश्री जमाने के थे। मैं क़ैदी के समान खड़ा था। हाथ-पाँव में जंजीरें थी। हाथ ऊपर को एक तख्त में फँसे थे और उसी तख्त के एक सुराख में मेरी गर्दन थी। एक प्रकार का जुआ मेरे कंधों पर पड़ा था।कुछ ही दूर पर एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री सिंहासन पर बैठी थी। मेरी नज़रें धोखा नहीं खा रही थी। वह मोहिनी ही थी। नन्हीं-मुन्नी जमील मोहिनी। इस समय संपूर्ण नारी के रूप में थी। मैंने उसे देखते ही पहचान लिया।
दरबार में ख़तरनाक काली शक्ल के जंगली थे। मोहिनी कुछ कह रही थी। होंठ मेरे भी हिल रहे थे।
“तुम मोहिनी से बहुत प्रभावित हुए और तुमने फिराऊन के जुल्मों को स्वीकार किया। तुम्हारी आँखें खुल चुकी थीं और विश्वास हो चला था कि फिराऊन ईश्वर नहीं है। वास्तविकता में यह भी थी कि तुम मोहिनी देवी के प्रेम में गिरफ़्तार हो गए थे।”
अगले दृश्य में मोहिनी और मैं तन्हा थे। मैं बंदी न था। हम बहुत क़रीब-क़रीब थे।
“तुमने शपथ उठाई थी कि फिराऊन का सर्वनाश करोगे और मिश्र की धरती पर मोहिनी का राज्य स्थापित होगा।”
दृश्य बदलते रहे और कहानी साफ़ होती रही। तमाम रहस्यों के पर्दे खुलने लगे। फिर मैं अपनी पत्नी के पास दिखायी दिया। मैं चीख पड़ा। यह वही औरत थी जो रियासत की महारानी थी। मुझे ज्ञात हुआ कि महारानी ने झूठ नहीं कहा था। मैं रामोन था। मिश्र के फिराऊन वंश का एक राजकुमार और मैंने बगावत कर दी। मेरे साथ एक फ़ौज़ थी। मोहिनी की फौजें भी मेरा साथ दे रही थीं। मैंने फिराऊन की मंदिर को जला डाला। उनके पुजारियों का कत्लेआम कर डाला। फिराऊन की समस्त सेनाएँ मेरे मुक़ाबले में थी। एक भू-भाग मेरे पास आ गया था। युद्ध और युद्ध। मिश्र के काहन मेरे शत्रु बन गए थे।
फिर मुझे मेरी पत्नी नज़र आई जो मुझे कुछ पिला रही थी। मेरी आँखें उस पेय को पीते ही फटने लगीं। मैं तड़प रहा था और वह ठहाके लगा रही थी। फिर मैंने देखा कि वह पागलों की तरह इधर से उधर दौड़ रही है और मैं दम तोड़ रहा हूँ।
“बस यही था तुम्हारा अंत।”
मेरा सिर मोहिनी की गोद में था और वह चारों तरफ़ क्रोध भरी दृष्टि से देख रही थी। उसकी आँखों में शोले दहक रहे थे। अचानक उसका शरीर रौद्र रूप धारण करने लगा। उसकी जीभ बाहर निकलने लगी थी जो किसी विशालकाय छिपकली की जीभ की तरह लपलपा रही थी।बिल्कुल वैसा ही रूप जैसा मैंने मोहिनी को उस वक्त देखा था जब मुझे योगानन्द और हरि आनन्द के जुल्मों का सामना करना पड़ रहा था। जिन्न मुझे मार रहे थे और मैंने मोहिनी को उसकी बुजदिली के लिए ललकारा था।
उसके बाद मैंने मोहिनी को इंसानी लहू पीते देखा। उसके हाथों में नरमुंड होते थे। हर तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। और यह था मोहिनी देवी के उस शरीर का अंत।
रानी ने उन लोगों से कुछ कहा और स्वयं एक गुफा की ओर बढ़ चली। वहाँ ऐसी बहुत सी गुफाएँ थीं। वे लोग शायद उन्हीं गुफाओं में रहते थे क्योंकि इमारत तो कहीं नज़र नहीं आती थी। स्वयं स्त्री-पुरुष दोनों ही थे। गोरखनाथ ने मुझे बताया कि यह पहाड़ों की रानी के दूत हैं। उनमें से दो दूत हमें लेकर चले। रास्ता बिल्कुल खामोशी से तय हुआ। इस पहाड़ी में बड़ी गंभीर खामोशी थी। चक्करदार रास्ते में हम बढ़ते रहे। छोटी-मोटी पहाड़ियों को पार करते हुए हम बर्फ़पोश चोटियों की ओर बढ़ते रहे। यह यात्रा तीन दिन में संपूर्ण हुई। हमने रात गुफाओं में विश्राम करके बिताई थी और दिन भर बिना रुके यात्रा की थी। तीन दिन बाद हम बर्फ़ के बीच से गुजरते हुए अपनी मंज़िल पर पहुँच गए।
यह मंज़िल भी एक बड़ी गुफा ही थी और यहाँ भी कोई इमारत नहीं थी। अंदर तो गुफाओं और सुरंगों का तिलिस्म मिला और बाहर के दूतों ने हमें अंदर के दूतों के हवाले कर दिया।
अंदर सभी स्त्रियाँ थीं। वहाँ पुरुष और स्त्री की पहचान कद-काठी से ही हो जाती थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि अंदर के दूत भी लबादे पहने थे। परंतु उनके पास छोटे-छोटे त्रिशूल थे जो उन्होंने अपने लबादों में खोस रखे थे। सूरज का प्रकाश शायद ही अंदर झाँकता हो परंतु वह जगह प्रकाशमान थी और यह प्रकाश अलौकिक रूप से गुफा के द्वार से फूटता हुआ प्रतीत होता था। अंदर एक गुफा में हमें जानवरों की खालों के बिछौने मिले। हमें पीने के लिए शर्बत दिया गया और इस शर्बत को पीते ही हमें नींद आने लगी। यह गुफायें बर्फ़पोश पहाड़ियों के भीतर थीं। फिर यहाँ अत्यधिक गर्माहट थी। हम वहाँ आराम से पसर कर सो गए। जब हम जागे तो सारी थकान मिट चुकी थी। एक दूत ने हमें एक दूसरी गुफा में लाकर खड़ा किया। इस जगह चारों तरफ़ लाल पर्दे थे और उन पर्दों के पीछे शोले उठते हुए से महसूस हो रहे थे। वहाँ एक तख्त पर पहाड़ों की रानी बैठी थी। दूत ने हमें वहाँ छोड़ा और खुद वापसी की राह ली।
“क्या यही मोहिनी है ?” मेरे मन का कौतूहल जाग उठा।
“कुँवर राज ठाकुर! अब वह समय आ गया है।” अचानक पहाड़ों की रानी का खनकता स्वर सुनाई पड़ा। “परंतु इससे पहले कि मोहिनी देवी के दर्शन करो। मैं उन रहस्यों से पर्दा उठाती हूँ जो तुम्हारे इल्म में नहीं। तुम कौन हो कुँवर जानते हो ? परंतु नहीं, तुम किस तरह जान सकते हो। परंतु तुम्हें अवश्य याद होगा कि सर्वप्रथम मोहिनी देवी अपनी इच्छा से तुम्हारे सिर पर आई थी।”
“हाँ, मुझे याद है!”
“लेकिन तुम इन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते थे। मोहिनी देवी, जिसे पाने के लिए बड़े से बड़ा तांत्रिक अपने प्राण संकट में डालने के लिए तैयार रहता है, वह तुम्हारे पास स्वतः आई थी। जानते हो क्यों ?”
मैं चुप रहा क्योंकि इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं था।
“तो सुनो! आज से हज़ारों साल पहले तुम एक फिराऊन वंश के राजकुमार थे। मिश्र के उस कदीम जमाने में फिराऊन के अत्याचारों का बोलाबाला था। वह स्वयं को ईश्वर मानते थे और मिश्र के लोग इन्हीं की पूजा करते थे। उसी जमाने में पहाड़ों में एक जाति आबाद थी जो बहुत ख़तरनाक लड़ाकू जाति थी। हालाँकि वे फिर उनकी सीमा में आबाद नहीं थे परंतु फिराऊन अपने राज्य का विस्तार करते हुए आ रहे थे और इस जाति से उन्हें कई बार शिकस्त मिल चुकी थी। दक्षिण की ओर साम्राज्य फैलाने में यह जाति दीवार बनकर खड़ी थी। ये लोग मोहिनी देवी की पूजा करते थे। फिराऊन को शैतान मानते थे। मोहिनी देवी को वे लोग छिपकली और स्त्री के शक्ल से मिलती-जुलती मानते थे।
छिपकली उनके लिए पवित्र आत्मा थी और उस जाति का शासन हमेशा किसी स्त्री के हाथों में रहता था जिसे मोहिनी का खिताब दिया जाता था। रानी को मोहिनी का अवतार माना जाता था। एक बार फिर उसने जुल्मों के कारण स्वयं मोहिनी देवी ने मनुष्य रूप में अवतार लिया था और यही वह रानी थी जिसके कारण मिश्री सेनाएँ आगे न बढ़ पाती थीं। फिर मोहिनी की आख़िरी जंग तुम्हारे साथ हुई। पहाड़ी जाति ने तो तुम्हारी सेना को मार गिराया परंतु तुम आख़िरी दम तक लड़ते रहे। फिर तुम्हें क़ैद कर लिया गया। देखो काल चक्र के पीछे क्या हुआ।”
रानी ने त्रिशूल उठाया और फिर उसका रुख़ एक लाल पर्दे की तरफ़ किया। त्रिशूल से एक अग्नि रेखा निकलकर पर्दे से टकराई। फिर वहाँ शोले ही शोले नज़र आने लगे। शोलों के बीच का स्थान धीरे-धीरे दृश्यों में बदलता जा रहा था। जंग हो रही थी और फिर मैं उछल पड़ा। मैंने ध्यानपूर्वक देखा। दृश्य अब बिल्कुल साफ हो गए थे।
मैं ही था। बिल्कुल मेरा ही चेहरा था परंतु वस्त्र कदीम मिश्री जमाने के थे। मैं क़ैदी के समान खड़ा था। हाथ-पाँव में जंजीरें थी। हाथ ऊपर को एक तख्त में फँसे थे और उसी तख्त के एक सुराख में मेरी गर्दन थी। एक प्रकार का जुआ मेरे कंधों पर पड़ा था।कुछ ही दूर पर एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री सिंहासन पर बैठी थी। मेरी नज़रें धोखा नहीं खा रही थी। वह मोहिनी ही थी। नन्हीं-मुन्नी जमील मोहिनी। इस समय संपूर्ण नारी के रूप में थी। मैंने उसे देखते ही पहचान लिया।
दरबार में ख़तरनाक काली शक्ल के जंगली थे। मोहिनी कुछ कह रही थी। होंठ मेरे भी हिल रहे थे।
“तुम मोहिनी से बहुत प्रभावित हुए और तुमने फिराऊन के जुल्मों को स्वीकार किया। तुम्हारी आँखें खुल चुकी थीं और विश्वास हो चला था कि फिराऊन ईश्वर नहीं है। वास्तविकता में यह भी थी कि तुम मोहिनी देवी के प्रेम में गिरफ़्तार हो गए थे।”
अगले दृश्य में मोहिनी और मैं तन्हा थे। मैं बंदी न था। हम बहुत क़रीब-क़रीब थे।
“तुमने शपथ उठाई थी कि फिराऊन का सर्वनाश करोगे और मिश्र की धरती पर मोहिनी का राज्य स्थापित होगा।”
दृश्य बदलते रहे और कहानी साफ़ होती रही। तमाम रहस्यों के पर्दे खुलने लगे। फिर मैं अपनी पत्नी के पास दिखायी दिया। मैं चीख पड़ा। यह वही औरत थी जो रियासत की महारानी थी। मुझे ज्ञात हुआ कि महारानी ने झूठ नहीं कहा था। मैं रामोन था। मिश्र के फिराऊन वंश का एक राजकुमार और मैंने बगावत कर दी। मेरे साथ एक फ़ौज़ थी। मोहिनी की फौजें भी मेरा साथ दे रही थीं। मैंने फिराऊन की मंदिर को जला डाला। उनके पुजारियों का कत्लेआम कर डाला। फिराऊन की समस्त सेनाएँ मेरे मुक़ाबले में थी। एक भू-भाग मेरे पास आ गया था। युद्ध और युद्ध। मिश्र के काहन मेरे शत्रु बन गए थे।
फिर मुझे मेरी पत्नी नज़र आई जो मुझे कुछ पिला रही थी। मेरी आँखें उस पेय को पीते ही फटने लगीं। मैं तड़प रहा था और वह ठहाके लगा रही थी। फिर मैंने देखा कि वह पागलों की तरह इधर से उधर दौड़ रही है और मैं दम तोड़ रहा हूँ।
“बस यही था तुम्हारा अंत।”
मेरा सिर मोहिनी की गोद में था और वह चारों तरफ़ क्रोध भरी दृष्टि से देख रही थी। उसकी आँखों में शोले दहक रहे थे। अचानक उसका शरीर रौद्र रूप धारण करने लगा। उसकी जीभ बाहर निकलने लगी थी जो किसी विशालकाय छिपकली की जीभ की तरह लपलपा रही थी।बिल्कुल वैसा ही रूप जैसा मैंने मोहिनी को उस वक्त देखा था जब मुझे योगानन्द और हरि आनन्द के जुल्मों का सामना करना पड़ रहा था। जिन्न मुझे मार रहे थे और मैंने मोहिनी को उसकी बुजदिली के लिए ललकारा था।
उसके बाद मैंने मोहिनी को इंसानी लहू पीते देखा। उसके हाथों में नरमुंड होते थे। हर तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। और यह था मोहिनी देवी के उस शरीर का अंत।