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Fantasy मोहिनी

रानी आगे-आगे चल रही थी। गुफा के भीतर की सुरंग में सीढ़ियाँ बनी थीं। इन सीढ़ियों को पार करते हुए हम खुले आसमान के नीचे निकले। फिर लगभग एक-दो फर्लांग चलने के उपरांत एक गुफा और पार हुई। दूसरी तरफ़ चंद लोग दिखायी दिए जिन्होंने हमारा स्वागत किया। वे सब के सब लबादे में थे। पहाड़ों की रानी और उनमें अंतर यह था कि रानी के हाथ में त्रिशूल और सिर पर ताज था जबकि उनके पास यह चीज़ें नहीं थीं। उनके हाथों और पैरों में भी पट्टियाँ बँधी थी।

रानी ने उन लोगों से कुछ कहा और स्वयं एक गुफा की ओर बढ़ चली। वहाँ ऐसी बहुत सी गुफाएँ थीं। वे लोग शायद उन्हीं गुफाओं में रहते थे क्योंकि इमारत तो कहीं नज़र नहीं आती थी। स्वयं स्त्री-पुरुष दोनों ही थे। गोरखनाथ ने मुझे बताया कि यह पहाड़ों की रानी के दूत हैं। उनमें से दो दूत हमें लेकर चले। रास्ता बिल्कुल खामोशी से तय हुआ। इस पहाड़ी में बड़ी गंभीर खामोशी थी। चक्करदार रास्ते में हम बढ़ते रहे। छोटी-मोटी पहाड़ियों को पार करते हुए हम बर्फ़पोश चोटियों की ओर बढ़ते रहे। यह यात्रा तीन दिन में संपूर्ण हुई। हमने रात गुफाओं में विश्राम करके बिताई थी और दिन भर बिना रुके यात्रा की थी। तीन दिन बाद हम बर्फ़ के बीच से गुजरते हुए अपनी मंज़िल पर पहुँच गए।

यह मंज़िल भी एक बड़ी गुफा ही थी और यहाँ भी कोई इमारत नहीं थी। अंदर तो गुफाओं और सुरंगों का तिलिस्म मिला और बाहर के दूतों ने हमें अंदर के दूतों के हवाले कर दिया।

अंदर सभी स्त्रियाँ थीं। वहाँ पुरुष और स्त्री की पहचान कद-काठी से ही हो जाती थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि अंदर के दूत भी लबादे पहने थे। परंतु उनके पास छोटे-छोटे त्रिशूल थे जो उन्होंने अपने लबादों में खोस रखे थे। सूरज का प्रकाश शायद ही अंदर झाँकता हो परंतु वह जगह प्रकाशमान थी और यह प्रकाश अलौकिक रूप से गुफा के द्वार से फूटता हुआ प्रतीत होता था। अंदर एक गुफा में हमें जानवरों की खालों के बिछौने मिले। हमें पीने के लिए शर्बत दिया गया और इस शर्बत को पीते ही हमें नींद आने लगी। यह गुफायें बर्फ़पोश पहाड़ियों के भीतर थीं। फिर यहाँ अत्यधिक गर्माहट थी। हम वहाँ आराम से पसर कर सो गए। जब हम जागे तो सारी थकान मिट चुकी थी। एक दूत ने हमें एक दूसरी गुफा में लाकर खड़ा किया। इस जगह चारों तरफ़ लाल पर्दे थे और उन पर्दों के पीछे शोले उठते हुए से महसूस हो रहे थे। वहाँ एक तख्त पर पहाड़ों की रानी बैठी थी। दूत ने हमें वहाँ छोड़ा और खुद वापसी की राह ली।

“क्या यही मोहिनी है ?” मेरे मन का कौतूहल जाग उठा।

“कुँवर राज ठाकुर! अब वह समय आ गया है।” अचानक पहाड़ों की रानी का खनकता स्वर सुनाई पड़ा। “परंतु इससे पहले कि मोहिनी देवी के दर्शन करो। मैं उन रहस्यों से पर्दा उठाती हूँ जो तुम्हारे इल्म में नहीं। तुम कौन हो कुँवर जानते हो ? परंतु नहीं, तुम किस तरह जान सकते हो। परंतु तुम्हें अवश्य याद होगा कि सर्वप्रथम मोहिनी देवी अपनी इच्छा से तुम्हारे सिर पर आई थी।”

“हाँ, मुझे याद है!”

“लेकिन तुम इन चीज़ों पर विश्वास नहीं करते थे। मोहिनी देवी, जिसे पाने के लिए बड़े से बड़ा तांत्रिक अपने प्राण संकट में डालने के लिए तैयार रहता है, वह तुम्हारे पास स्वतः आई थी। जानते हो क्यों ?”

मैं चुप रहा क्योंकि इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं था।

“तो सुनो! आज से हज़ारों साल पहले तुम एक फिराऊन वंश के राजकुमार थे। मिश्र के उस कदीम जमाने में फिराऊन के अत्याचारों का बोलाबाला था। वह स्वयं को ईश्वर मानते थे और मिश्र के लोग इन्हीं की पूजा करते थे। उसी जमाने में पहाड़ों में एक जाति आबाद थी जो बहुत ख़तरनाक लड़ाकू जाति थी। हालाँकि वे फिर उनकी सीमा में आबाद नहीं थे परंतु फिराऊन अपने राज्य का विस्तार करते हुए आ रहे थे और इस जाति से उन्हें कई बार शिकस्त मिल चुकी थी। दक्षिण की ओर साम्राज्य फैलाने में यह जाति दीवार बनकर खड़ी थी। ये लोग मोहिनी देवी की पूजा करते थे। फिराऊन को शैतान मानते थे। मोहिनी देवी को वे लोग छिपकली और स्त्री के शक्ल से मिलती-जुलती मानते थे।

छिपकली उनके लिए पवित्र आत्मा थी और उस जाति का शासन हमेशा किसी स्त्री के हाथों में रहता था जिसे मोहिनी का खिताब दिया जाता था। रानी को मोहिनी का अवतार माना जाता था। एक बार फिर उसने जुल्मों के कारण स्वयं मोहिनी देवी ने मनुष्य रूप में अवतार लिया था और यही वह रानी थी जिसके कारण मिश्री सेनाएँ आगे न बढ़ पाती थीं। फिर मोहिनी की आख़िरी जंग तुम्हारे साथ हुई। पहाड़ी जाति ने तो तुम्हारी सेना को मार गिराया परंतु तुम आख़िरी दम तक लड़ते रहे। फिर तुम्हें क़ैद कर लिया गया। देखो काल चक्र के पीछे क्या हुआ।”

रानी ने त्रिशूल उठाया और फिर उसका रुख़ एक लाल पर्दे की तरफ़ किया। त्रिशूल से एक अग्नि रेखा निकलकर पर्दे से टकराई। फिर वहाँ शोले ही शोले नज़र आने लगे। शोलों के बीच का स्थान धीरे-धीरे दृश्यों में बदलता जा रहा था। जंग हो रही थी और फिर मैं उछल पड़ा। मैंने ध्यानपूर्वक देखा। दृश्य अब बिल्कुल साफ हो गए थे।

मैं ही था। बिल्कुल मेरा ही चेहरा था परंतु वस्त्र कदीम मिश्री जमाने के थे। मैं क़ैदी के समान खड़ा था। हाथ-पाँव में जंजीरें थी। हाथ ऊपर को एक तख्त में फँसे थे और उसी तख्त के एक सुराख में मेरी गर्दन थी। एक प्रकार का जुआ मेरे कंधों पर पड़ा था।कुछ ही दूर पर एक बहुत ही खूबसूरत स्त्री सिंहासन पर बैठी थी। मेरी नज़रें धोखा नहीं खा रही थी। वह मोहिनी ही थी। नन्हीं-मुन्नी जमील मोहिनी। इस समय संपूर्ण नारी के रूप में थी। मैंने उसे देखते ही पहचान लिया।

दरबार में ख़तरनाक काली शक्ल के जंगली थे। मोहिनी कुछ कह रही थी। होंठ मेरे भी हिल रहे थे।

“तुम मोहिनी से बहुत प्रभावित हुए और तुमने फिराऊन के जुल्मों को स्वीकार किया। तुम्हारी आँखें खुल चुकी थीं और विश्वास हो चला था कि फिराऊन ईश्वर नहीं है। वास्तविकता में यह भी थी कि तुम मोहिनी देवी के प्रेम में गिरफ़्तार हो गए थे।”

अगले दृश्य में मोहिनी और मैं तन्हा थे। मैं बंदी न था। हम बहुत क़रीब-क़रीब थे।

“तुमने शपथ उठाई थी कि फिराऊन का सर्वनाश करोगे और मिश्र की धरती पर मोहिनी का राज्य स्थापित होगा।”

दृश्य बदलते रहे और कहानी साफ़ होती रही। तमाम रहस्यों के पर्दे खुलने लगे। फिर मैं अपनी पत्नी के पास दिखायी दिया। मैं चीख पड़ा। यह वही औरत थी जो रियासत की महारानी थी। मुझे ज्ञात हुआ कि महारानी ने झूठ नहीं कहा था। मैं रामोन था। मिश्र के फिराऊन वंश का एक राजकुमार और मैंने बगावत कर दी। मेरे साथ एक फ़ौज़ थी। मोहिनी की फौजें भी मेरा साथ दे रही थीं। मैंने फिराऊन की मंदिर को जला डाला। उनके पुजारियों का कत्लेआम कर डाला। फिराऊन की समस्त सेनाएँ मेरे मुक़ाबले में थी। एक भू-भाग मेरे पास आ गया था। युद्ध और युद्ध। मिश्र के काहन मेरे शत्रु बन गए थे।

फिर मुझे मेरी पत्नी नज़र आई जो मुझे कुछ पिला रही थी। मेरी आँखें उस पेय को पीते ही फटने लगीं। मैं तड़प रहा था और वह ठहाके लगा रही थी। फिर मैंने देखा कि वह पागलों की तरह इधर से उधर दौड़ रही है और मैं दम तोड़ रहा हूँ।

“बस यही था तुम्हारा अंत।”

मेरा सिर मोहिनी की गोद में था और वह चारों तरफ़ क्रोध भरी दृष्टि से देख रही थी। उसकी आँखों में शोले दहक रहे थे। अचानक उसका शरीर रौद्र रूप धारण करने लगा। उसकी जीभ बाहर निकलने लगी थी जो किसी विशालकाय छिपकली की जीभ की तरह लपलपा रही थी।बिल्कुल वैसा ही रूप जैसा मैंने मोहिनी को उस वक्त देखा था जब मुझे योगानन्द और हरि आनन्द के जुल्मों का सामना करना पड़ रहा था। जिन्न मुझे मार रहे थे और मैंने मोहिनी को उसकी बुजदिली के लिए ललकारा था।

उसके बाद मैंने मोहिनी को इंसानी लहू पीते देखा। उसके हाथों में नरमुंड होते थे। हर तरफ़ हाहाकार मचा हुआ था। और यह था मोहिनी देवी के उस शरीर का अंत।
 
फिराऊन वंश के काहनों ने अपनी बलि देकर अपने देवताओं को जगाया और मोहिनी देवी को अपना वह शरीर त्यागने पर मजबूर कर दिया। मोहिनी देवी का वह शरीर आज भी किसी अज्ञात मकबरे में रखा हुआ है। उसके बाद मोहिनी देवी की आत्मा भटकती रही। वह फिर से इस संसार में जन्म नहीं ले सकती थी। फिराऊन के सेनाओं ने उस जाति का विनाश प्रारंभ कर दिया और एक शताब्दी तक यह जंग चलती रही।

वे लोग शिकस्त खाते हुए अफ्रीका के मरुस्थलों में भटकते रहे। उनकी ज़िंदगी ख़ानाबदोशों की तरह गुज़र रही थी और फिराऊन की चुनी फौजें उनका पीछा कर रही थी। फिराऊन की सेनाओं से आतंकित होकर इस जाति ने पूरब की ओर पलायन किया और फिराऊन सेनाओं ने फिर उनका पीछा छोड़ दिया। वे लोग अब फिराऊन सेनाओं से सुरक्षित होकर पहाड़ों में जीवन गुजारने लगे।

समय बीतता रहा और फिराऊन भी समाप्त हो गए और फिर वह काल आया जब सिकंदर की फौजों के पूरब की ओर पलायन किया। तब तक यह जाति फिर से अपनी सेनाएँ स्थापित करके एक राज्य स्थापित कर चुकी थी। सिकंदर को इस जाति से लोहा लेना पड़ा और सिकंदर की सेनाओं से घमासान युद्ध हुआ। पहली बार सिकंदर पराजित होकर पीछे हट गया लेकिन दूसरी बार की जंग बड़ी खौफनाक थी।

उसने लाखों की सेना झोंक दी थी और एक बार फिर मोहिनी देवी के पुजारियों को भागना पड़ा। वे तिब्बत की ओर बढ़ चले। उनकी रानी उनके साथ थी और इन बचे खुचे लोगों का पीछा सिकंदर की ख़ूनी फ़ौज़ कर रही थी। उन लोगों ने तिब्बत में एक मठ की शरण ली। मठ में स्त्री जाति का जाना वर्जित था परंतु वह स्त्री अपने आपको परदे में छिपाए थी और उसके एक सरदार ने लामाओं से यह कहकर शरण प्राप्त की थी कि उनके साथ कोई स्त्री नहीं है।

ख़ूनी फ़ौज़ मार-काट मचाती इस मठ तक आ पहुँची। उन्होंने मठ तो घेर लिया परंतु वहाँ मौसम बदल चुका था और बर्फ़ गिरनी शुरू हो गयी थी।रास्ते बंद हो गए और वे लोग जो मठ से बाहर घेरा डाले थे वे वहाँ फँसकर रह गए। उनके पास रसद भी नहीं रही। उनकी सेना भूखी-प्यासी मरने लगी और वे मठ में प्रवेश भी नहीं कर पाते थे। जब लोग मरने लगे तो उन्होंने भी मठ में शरण माँगी और युद्ध न करने की शपथ ली।

इस तरह लामाओं ने इन दोनों सेनाओं में संधि करा दी। इस बीच मठ के बड़े लामा को यह भी ज्ञात हो गया कि उनके साथ एक स्त्री भी है जो उनकी रानी है और जिसका नाम मोहिनी है। लामा ने जब उस स्त्री को देखा तो सारा धर्म तप भंग हो गया। उस वक्त हुआ यह था कि मोहिनी देवी के चमत्कारों के कारण लामा कोई विरोध ही न कर पाया बल्कि उसने मोहिनी को प्रणाम किया और उस समय से ये लामा मोहिनी के पुजारी बन गए।

पूरा एक मौसम बदल गया।सिकंदर की सेना के एक सरदार ने भी मोहिनी देवी के चमत्कारों से प्रभावित होकर अपना शीश झुकाया और वे लोग भी मोहिनी के पुजारी बन गए। अब वे वापस नहीं लौट सकते थे। क्योंकि सिंकदर की सेनाएँ सुदूर किन्हीं पहाड़ों में फँसकर मर-खप गयी थी।

इधर जब दूसरे मठाधीशों को ज्ञात हुआ कि चंद लामाओं ने अपना धर्म त्याग कर मोहिनी की पूजा शुरू कर दी है तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ और यह विरोध तिब्बत के दलाईलामा तक पहुँचा। सैकड़ों, हज़ारों लामा आंदोलन पर उतर आए। तब दलाईलामा ने उस मठ के लामाओं को तिब्बत से निष्कासित करने का आदेश दिया किंतु लामाओं ने इस आज्ञा को न माना। और फिर उन्हें तिब्बत के फ़ौज़ी दस्तों का सामना भी करना पड़ा। इन सेनाओं ने मठ पर कब्जा कर लिया और लामाओं के साथ-साथ सैनिकों को भी मार डाला। मोहिनी फिर अपनी सेना लेकर उत्तर पूर्व की तरफ़ बढ़ गयी। जो लोग मठ में जीवित रह गए थे उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। चंद लामा इस फ़ौज़ के साथ थे।

“मार्ग में लुटेरों के आक्रमण के कारण उनकी सेना आधी भी न रही। और फिर यह लोग भी इस भू-भाग में आकर आबाद हो गए। यहाँ कुछ समय साथ रहने के बाद इन लोगों में शासन चलाने के मामले में झगड़े होने लगे। फिर यह लोग दो रियासतों में बँट गए। मोहिनी देवी के पुजारी इन पहाड़ियों में आ बसे और दूसरी जाति तराई में। परंतु इन लोगों में झगड़े चलते रहे और समय-समय पर संधि होती रही।”

इतना कहकर रानी शांत हो गयी। यह कहानी बड़ी स्तब्धकारी थी।

“अब एक प्रश्न शेष रहता है।” रानी ने कुछ क्षण शांति के उपरांत कहा। “मोहिनी देवी को किस तरह श्राप मिले और किस तरह वह तांत्रिकों के हाथों खिलौना बनकर रह गयी। हाँ तो जब मोहिनी देवी के पुजारी यहाँ आकर बसे तो बहुत से लामा यहाँ आकर मोहिनी देवी के भक्त बनते चले गए। और उन्होंने तिब्बत में मोहिनी देवी की महिमा गानी शुरू कर दी। इसका विरोध पहले से ही चल रहा था और अब हिमालय में बहुत से साधुओं ने लामा धर्म की रक्षा के लिए तप शुरू कर दिया। मोहिनी देवी की रहस्यमय शक्तियों ने उन साधुओं का तप भंग करने का अभियान प्रारंभ कर दिया। परंतु एक सौ एक साधु कैलाश पर्वत पर तप कर रहे थे जहाँ मोहिनी देवी की रहस्यमय शक्तियाँ नहीं पहुँचती थी। काली ने उन्हें शरण देकर एक दीवार खड़ी कर दी थी। मोहिनी देवी काली की शक्तियों से टकराती रही और काली के सामने असफल रही। बस, काली क्रोधित हो उठी और साधुओं को आशीर्वाद दे दिया। इन्हीं साधुओं ने मोहिनी देवी को श्राप दिया था जिनका मान तुमने तोड़ा था और जानते हो हरि आनन्द कौन था। पिछले जन्म में हरि आनन्द मिश्र में फिराऊन का सबसे बड़ा काहन था जिसने अपनी बलि देकर मोहिनी देवी का शरीर नष्ट कर दिया था। उसने अपने देवताओं की बलि दी थी। इस जन्म में मोहिनी देवी ने स्वयं उसका संहार किया। उस वक्त जब साधुओं का मान भंग हो गया था और तुम्हारी चेतना लुप्त हो गयी थी। मोहिनी देवी ने उसका नरमुंड काट कर उसका लहू पी लिया था और यह इस बात का संकेत था कि मोहिनी देवी अब फिर से अपना इंसानी शरीर धारण कर सकती है। और ऐ मेहमान, तुम वह पहले व्यक्ति होगे जो मोहिनी देवी के साक्षात दर्शन करोगे और यह अधिकार भी केवल तुम्हें प्राप्त है।

“आओ मेरे साथ। अब मैं आख़िरी रहस्य से पर्दा उठाती हूँ। गोरख तुम यहीं रुको क्योंकि तुम्हें आगे जाने का अधिकार प्राप्त नहीं है। तुम यही प्रतीक्षा करो गोरख।”

वह उठ खड़ी हुई। फिर उसने एक पर्दा हटाया। पर्दे के पीछे एक पतली सुरंग का रास्ता था। रानी उस पर बढ़ चली। सुरंग के दो मोड़ पार करने के बाद एक सुराख दिखायीपड़ा। रानी एक तरफ़ हट गयी। उसने त्रिशूल से मुझे उस सुराख में प्रविष्ट होने का संकेत किया। मैं धड़कते दिल से पेट के बल रेंगता हुआ उस सुरंग में प्रविष्ट हो गया। सुराख के नुकीले पत्थरों से बचता-बचाता मैं दूसरी तरफ़ उतर गया। यहाँ पहुँचते ही मैंने बड़ा भयानक दृश्य देखा। यहाँ एक विशाल गार था। गार में शोले दहक रहे थे और उसके चारों तरफ़ पत्थरों से बना प्लेटफार्म था। मैंने चारों तरफ़ दृष्टि दौड़ाई। वहाँ एक बुत खड़ा नज़र आया। सफ़ेद पट्टियों में लिपटा एक बुत। बुत एक चबूतरे जैसे स्थान पर खड़ा था। मुझे एकाएक पट्टियों में लिपटे उस बुत का स्मरण हो आया जिसने हमें रास्ता दिखाया था।

तो क्या यही मोहिनी देवी का शरीर है। परंतु इस शरीर को तो मैंने गतिमान स्थिति में देखा था या वह कोई ख्वाब था। या यह बुत किसी और का था। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उस बुत के क़रीब जाकर खड़ा हो गया।
 
विशाल गार था। गार में शोले दहक रहे थे और उसके चारों तरफ़ पत्थरों से बना प्लेटफार्म था। मैंने चारों तरफ़ दृष्टि दौड़ाई। वहाँ एक बुत खड़ा नज़र आया। सफ़ेद पट्टियों में लिपटा एक बुत। बुत एक चबूतरे जैसे स्थान पर खड़ा था। मुझे एकाएक पट्टियों में लिपटे उस बुत का स्मरण हो आया जिसने हमें रास्ता दिखाया था।

तो क्या यही मोहिनी देवी का शरीर है। परंतु इस शरीर को तो मैंने गतिमान स्थिति में देखा था या वह कोई ख्वाब था। या यह बुत किसी और का था। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उस बुत के क़रीब जाकर खड़ा हो गया।

मुझे यूँ लगा जैसे धरती लरज रही है। गार से आतिशबाजी फूट रही थी। शोले बुलंद होते और मैं अपने आपको शोलों में खड़ा महसूस करता। यूँ लगता जैसे ज्वालामुखी किसी भी क्षण फट पड़ेगा।

“देख क्या रहे हो कुँवर ?” मैंने अपने पीछे से आवाज़ सुनी। “अपने सामने खड़ी बुत की पट्टियाँ उतार डालो।” यह आवाज़ शोलों से उभर रही थी।

मैं एकदम उछलकर मुड़ा और फिर मेरे कंठ से हैरत भरी चीख निकली। मैंने गार के उस तरफ़ एक अजीब सी मखलूक को खड़े देखा जिसने मेरे संपूर्ण शरीर में सनसनी की लहर दौड़ा दी। वह एक ऐसी मखलूक थी जिसके हाथ-पाँव छिपकली के पंजों के समान थे और शरीर की बनावट इंसानी थी। यह किसी स्त्री का नग्न शरीर था। शरीर भी ऐसा कि बिल्कुल हड्डियों का ढाँचा मालूम पड़ता था जो शोलों के कारण चमक रहा था।

उसका चेहरा छिपकली और इंसानी चेहरे के बीच की चीज़ थी। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं और शरीर में कँपकँपी दौड़ने लगी। उस भयानक मखलूक के हाथ में त्रिशूल था और उसने त्रिशूल सीधा तान रखा था। त्रिशूल बुत की तरफ संकेत कर रहा था। उसकी खनकती आवाज़ मेरे कानों में पिघले हुए शीशे की मानिंद उतर गयी थी।

“हाँ, मैं मोहिनी हूँ राज! तुम्हारी मोहिनी। देखो तुम मुझसे नफ़रत न करना। तुम तो मुझसे बहुत प्यार करते हो न। आज से नहीं, हजारों वर्षों से प्यार करते हो। हम कभी न मिल सके। आज मिलन की वह घड़ी आ गयी है। अरे, मुझसे डरते क्यों हो राज ? देखो तुम्हारी बांदी, तुम्हारी दासी, तुम्हारी कनीज तुम्हारे सामने खड़ी है। अब देर न करो राज। उस बुत कि पट्टियाँ उतार डालो।”

“मोहिनी!” मेरे होंठ थरथरा गए। “यह तुम हो। परंतु तुम्हारा यह रूप।”

“बहुत घिनौना है न ? लेकिन मेरी आत्मा तो ऐसी नहीं राज। यह हमारे प्रेम की अग्नि परीक्षा है। शरीर तो मिट्टी से बनते हैं, मिट्टी में मिल जाते हैं। परंतु आत्मा कभी नहीं मरती राज। चलो वह करो जो मैं कहती हूँ।”

“हाँ मोहिनी, तुम ठीक कहती हो! मैं अपना शरीर तो न जाने कब से मुर्दा मान चुका हूँ। एक लगन, एक आस ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया और आख़िर तुम्हें पा ही लिया। चाहे तुम जिस भी रूप में हो। मैंने तुम्हारे दर्शन कर लिए।”

मैं किसी सम्मोहन जैसी स्थिति में मुड़ा और मैंने उस बुत की पट्टियाँ उतारनी प्रारंभ कर दी।एक के बाद एक पट्टी। बुत पर बेशुमार पट्टियाँ लिपटी थीं और उन पर कोई लेप चढ़ा था जिससे बड़ी दुर्गंध आ रही थी। ठीक उसी प्रकार की दुर्गंध जैसे सड़ी-गली लाश से आती है लेकिन मैं पागलों की तरह पट्टियाँ उतारता चला गया।और फिर यह बुत को पट्टियों सा मालूम पड़ता था। उसका आकार घटने लगा। चबूतरे पर पट्टियाँ ही पट्टियाँ बिखरी थीं। फिर वह बुत केवल तीन फिट का रह गया और जब मैंने आख़िरी कपड़ा हटाया तो देखा सामने एक मुर्दा छिपकली की देह खड़ी थी।

उस छिपकली का मुँह ऊपर की ओर उठा था। मुँह खुला था और जीभ बाहर निकली हुई थी। बड़ी भयानक। आँखों की जगह जैसे दो अंगारे रखे थे परंतु बेजान। फिर मैंने अपने क़रीब कोई चीज़ सरसराती महसूस की। मैंने देखा वह त्रिशूल है।

“इस त्रिशूल की धार पर अपनी कनिष्टा काटकर छिपकली के मुँह में अपना लहू अर्पित कर दो राज। फिर समझ लो कि उन साधुओं का रक्त भेंट चढ़ा दिया है।” आवाज़ आई। “पीछे मुड़कर मत देखना।”

अब मैंने वैसा ही किया जबकि मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वह त्रिशूल इतना लम्बा कैसे हो गया है। जो गार पार करके मेरे पास तक आ गया है। लेकिन मैं मोहिनी की खोह में था जहाँ कोई भी करिश्मा आश्चर्य का विषय नहीं था। मैंने मोहिनी के साथ इससे भी बड़े करिश्मे देखे थे।

लहू की बूँदे मोहिनी के मुँह में टपकने लगीं जो त्रिशूल की नोक से टपक रही थी। फिर इस प्रकार की आवाजें आने लगी जैसे कोई जोर-ज़ोर से फुंकार रहा हो। यह फुंकारें सैकड़ों नागों जैसी फुंकारें थीं। जहरीली, भयंकर।

अचानक छिपकली की देह का रंग बदलने लगा। उसकी त्वचा चमकीली होने लगी और उसकी देह धीरे-धीरे हरकत करने लगी। उसी समय ज़ोरदार कड़कड़ाहट गूँजी। छिपकली बड़ी तेजी से उछली और फिर मैंने देखा कि वह मेरी आँखों के सामने अदृश्य हो गयी। यह देखने के लिए कि छिपकली कहाँ चली गयी मैं एकदम से उलट पड़ा तो एक और दृश्य देखने को आया। मोहिनी का कंकाल दूसरी ओर पड़ा था और छिपकली उसके सीने पर सवार थी अपने पंजों और दाँतों को गढ़ाए हुए। अचानक शोलों ने इतनी शिद्दत से भड़कना शुरू किया कि मेरे कदम लड़खड़ा गए। गार का एक हिस्सा फटने लगा।
 
“राज, डरना नहीं!” मैंने मोहिनी की आवाज़ फिर सुनी लेकिन वह अब नज़र नहीं आ रही थी। अलबत्ता मुझे यह लगा जैसे वह शोलों में जल रही है।

और फिर मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
 
जब मुझे होश आया तो मैं उसी चबूतरे पर पड़ा था और कोई मुझ पर झुका था। मैंने घबराकर देखा तो मोहिनी ही थी। वही जिसने खुद को मोहिनी बताया था। उसकी सूखी हड्डियों का ढाँचा मुझ पर झुका था।

“वह...वह छिपकली!”

“तुम डर गये राज। अरे! वह तो मेरा दूसरा रूप था। छिपकली का रूप...मेरी आत्मा, जो श्राप में जकड़ी यहाँ सिसक रही थी। वह मुझमे जज्ब हो गयी है। अब कुछ गम नहीं। उठकर सीधे हो जाओ। और देखो, क्या तुम मेरे मस्तक पर एक चुम्बन अंकित नहीं करोगे ?”

अगर वह मोहिनी न होती तो मैं हरगिज ऐसा विचार मन में भी नहीं ला सकता था। या तो दहशत से मेरा दम निकल जाता या मैं उस नरक की आग में छलाँग लगा देता। उसके पँजे जाने-पहचाने लगते थे।

“लेकिन मोहिनी! क्या तुम्हारा असली रूप ऐसा ही है ?”

“क्यों तुम्हें पसन्द नहीं मेरा यह रूप ?”

“नहीं, यह बात नहीं, लेकिन तुम्हारी वह नन्हीं सी सूरत...कुछ याद नहीं आता कैसी थी, परन्तु थी तो बहुत सुन्दर! तुम क्या वैसी ही नहीं बन सकती ?”

“इसका मतलब तुम्हें केवल नारी के सुन्दर शरीर से प्यार है, मुझसे नहीं।” मोहिनी ने कुछ नाराजगी से कहा।

“नहीं मोहिनी, अगर तुम ऐसी ही हो तो भी मैं तुम्हें प्यार करूँगा।” मेरे बोलने का ढंग कुछ हिस्टीरियाई था।

“तो उठो और अपनी मोहब्बत की छाप मेरे मस्तक पर छोड़ दो।”

मैं उठा और फिर मैंने वैसा ही किया। मेरा ख्याल था कि वह मस्तक बहुत ठंडा होगा। एक खोपड़ी का मस्तक ठंडा ही तो हो सकता है, परन्तु वह गरम था बिल्कुल तपती भट्टी की तरह। मुझे अपने होंठों पर एक आग सी तैरती महसूस हुई जो मेरे सम्पूर्ण शरीर में बिजली के करंट की तरह उतरती चली गयी।

मैंने झट अपने होंठ उसके मस्तक से हटा लिए।

मोहिनी हँस पड़ी।

“तुममें खौफ है राज और वह शक्ति भी नहीं जो मेरा मस्तक चूम सको। खैर ऐसा होता ही है और मैं तुम्हें उस योग्य बनाऊँगी कि तुम अपनी मोहिनी से उस तरह प्यार कर सको जैसा उस जन्म में किया करते थे।”

मोहिनी ने कहा और पीछे हट गयी।

फिर वह गार के ठीक दहाने पर जा खड़ी हुई। उसने अपना त्रिशूल सीधा किया। लपटें त्रिशूल को छूने लगीं। फिर त्रिशूल के जरिये एक लपट सी मोहिनी के शरीर पर गिरी और फिर मुझे यूँ लगा जैसे मोहिनी आग में स्नान कर रही है। मैंने चीखकर उसे रोकना चाहा; परन्तु मेरी चीख हलक में ही फँसकर रह गयी। पाँव उठाने चाहे तो पाँव जमीन पर चिपक गये और मैं बुत बना खड़ा रहा।

फिर यूँ लगा जैसे सैकड़ों आत्मायें वहाँ चीख-पुकार मचा रही हैं।

मोहिनी अब भी आग की लपटों में खड़ी थी।

फिर मैंने मोहिनी को पलटते देखा तो साक्षात मेनका मेरे सामने खड़ी थी। एक अनुपम सुन्दरी जिसके चेहरे पर तेज था और आँखों में बिजली कौंधती थी। उसके हाथ-पाँव भी इँसानी हो गये थे और वह सम्पूर्ण स्त्री के रूप में खड़ी थी। उस वक्त वह मुस्कुरा रही थी। उसने अब भी आग के वस्त्र धारण कर रखे थे।

“मोहिनी!” मैंने बेतहाशा उसकी ओर लपकना चाहा, परन्तु पाँव जड़ थे। मेरा दिल चाहता था कि उसे बाँहों में भर लूँ और सदा के लिए उसकी बाँहों में सो जाऊँ।

“राज!” एक आवाज गूँजी जैसे हर तरफ से वह आवाज गूँज रही थी। “तुमने मोहिनी के दर्शन कर लिए। उसका रूप, उसका सौंदर्य देख लिया। मैं जानती थी जब तुम मुझे इस रूप में देखोगे तो अपने आप पर काबू न रख सकोगे और जब तक तुममें वह शक्ति नहीं आ जाती, जो मुझे स्पर्श कर सके, तब तक मैं चाहती हूँ कि तुम मुझसे दूर ही रहो। हाँ मेरे प्रेमी! तुम्हें दोबारा पाकर मैं खोना नहीं चाहती। मैं तुम्हें वह मार्ग दिखाऊँगी जिस पर चलकर तुम यह शक्ति प्राप्त कर सको। तुमने मेरा माथा चूमकर भली प्रकार देख लिया होगा कि तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करने योग्य नहीं हो। जाओ, अब उसी मार्ग से वापस लौट जाओ और वह करना जो पहाड़ों की रानी तुम्हें कहे। जाओ राज, मैं अब तुमसे दूर नहीं हूँ। देखो, मेरे करीब मत आना...।”

अब मेरे पाँव चलने के लिए स्वतंत्र हो गये थे।

जिस आग में मोहिनी खड़ी थी मैं उसकी गर्मी को बर्दाश्त भी नहीं कर सकता था। एक बार उसके करीब से गुजरते हुए मैं ठिठका तो वह बोली–“नहीं राज, आग में कूदने का ख्याल जेहन से निकाल दो। जाओ, मैं अब तुमसे दूर कहाँ हूँ और तुम शीघ्र ही वह शक्ति प्राप्त कर लोगे।”

मैं चुपचाप मायूसी के आलम में उसी सुराख से बाहर निकल गया। मैंने एक बार पलटकर देखा।

मोहिनी मुस्कुराकर मुझे विदा कर रही थी।

❑❑❑
 
जिस जगह मैं गोरखनाथ को छोड़कर गया था वह वहाँ नहीं था। अलबत्ता एक दासी खड़ी थी जो उसी तरह के लबादे में थी। पहाड़ों की रानी भी वहाँ नहीं थी। दासी ने मुझसे कहा कि अब मेरे भोजन का समय हो गया है, अतः मैं भोजन पर चलूँ। मैंने उससे कोई सवाल नहीं किया और चुपचाप चल पड़ा।

जिन हैरतअंगेज घटनाओं से मैं गुजर रहा था उस पर कौन विश्वास करेगा। लोग तो मुझे पागल ही समझेंगे लेकिन मैं किसी को विवश भी नहीं करता कि वह मेरी आपबीती पर विश्वास ही करे। ऐसी बातें किसी को भी सुनाने की नहीं होतीं। इसलिए मैंने आज तक अपनी आपबीती किसी को सुनायी भी नहीं थी।

मैं लोगों को बता देना चाहता हूँ। तांत्रिकों या काले जादूगरों को भी समझा देना चाहता हूँ कि मोहिनी को प्राप्त करने का बीड़ा कोई न उठाये अन्यथा उसकी जिंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी। मोहिनी मेरी है, सिर्फ मेरी।

मेरी बात भी आम आदमी से अलग हटकर है। मैं मोहिनी के साक्षात दर्शन कर पाने में यूँ ही सफल नहीं हो गया। उसके लिए मैंने सारी जिंदगी खंडहर बना दी थी और मोहिनी की इच्छा के कारण ही मैं उसके दर्शन कर पाने में सफल हो पाया था; परन्तु मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि ईश्वर किसी को इस मार्ग पर न जाने दे।

मैं उन्हीं गुफाओं में अपने दिन व्यतीत कर रहा था। दासियाँ मेरी सेवा किया करतीं और पहाड़ों की रानी के निर्देश पर मुझे जड़ी-बूटियों का सेवन कराया जा रहा था, परन्तु पहाड़ों की रानी के दर्शन भी एक मुद्दत तक मुझे नहीं हो पाए।

उन तिलिस्मी गुफाओं के भीतर मुझे एक महल के अवशेष नजर आते। मोहिनी के दर्शनोपरान्त मुझे जिस भाग में ठहराया गया था, वहाँ बड़े-बड़े कमरे थे। पत्थरों के स्तम्भ खड़े थे। दीवारों पर कारीगरी थी और एक बड़ा दरबार हाल था जिस पर सभासदों के बैठने के लिए कुर्सियाँ थीं और उनसे कुछ फासले पर एक मंच पर स्वर्णजड़ित सिंहासन रखा था। न जाने यह मार्ग कितना लम्बा-चौड़ा था। हकीकत यह थी कि वहाँ के तिलिस्मी रास्तों पर बिना दूत के सहारे मैं चल भी नहीं सकता था। मुझे बताया गया कि पहाड़ों की रानी युद्ध की रूपरेखा तैयार करने में व्यस्त है। गोरखनाथ भी अब मेरे पास नहीं रहा था। मेरे लिए वहाँ सभी व्यवस्थायें आला दर्जे की थीं जैसे कि एक शाही मेहमान के लिए की जाती हैं। एक डोर के खींचते ही सेविका हाजिर हो जाती थी।

और दिन इसी प्रकार व्यतीत हो रहे थे। मोहिनी को देखने के लिए मन विह्वल हो उठता था। एकान्त अब बुरी तरह खल रहा था।

एक दिन मैं यूँ ही अकेला उस रहस्यमयी किले का भ्रमण करने निकल पड़ा। मेरे आने-जाने में कहीं भी रोक-टोक नहीं थी; अतः मैं एक दूसरे रास्ते पर भटकता-भटकता एक ऐसी जगह पहुँच गया जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। यह एक मीनार थी जिसके ऊपर बर्फ आच्छादित थी।

इस मीनार में प्रविष्ट होने का रास्ता उस वक्त खुला था। वहाँ कोई पहरा नहीं था, परन्तु मुझे यूँ लगा जैसे बहुत से साये मीनार के द्वार में प्रविष्ट होते ही मेरे इर्द-गिर्द मँडराने लगे हैं। लगता जैसे वहाँ भटकती आत्माएँ कैद हैं जो मुझे भयभीत करके मीनार से बाहर खदेड़ देना चाहती हैं। एक-दो बार तो मुझे धक्का भी दिया गया और मैं लड़खड़ाकर गिरा भी, लेकिन मैं भयभीत नहीं हुआ। अपने जीवन में मैंने जितने रहस्यों का और जितनी मुसीबतों का सामना किया था, उसने मुझे बहुत मजबूत बना दिया था। यूँ भी उन दिनों मैं अपने आप में अपरम्पार शक्ति महसूस करता था।

वह मिन्नतें करने लगे कि मैं आगे न बढ़ूँ। इनकी भिनभिनाती आवाजें सुनायी पड़ रही थीं। मेरा दृढ़ इरादा देखकर उन्होंने मिन्नत करनी भी छोड़ दी और मेरे मन की उत्सुकता जो कि इँसानी फितरत है, बढ़ती चली गयी कि आखिर वे मुझे वहाँ जाने से क्यों रोक रहे हैं ?

मीनार के भीतर चक्करदार सीढ़ियाँ थीं। मैं उन पर चढ़ता रहा। फिर एक कक्ष के दरवाजे पर जाकर मेरे कदम रुके। मुझे वहाँ रोशनी का एक दायरा दिखायी दिया और फिर मैंने देखा कि रोशनी के उस दायरे में विश्व सुन्दरी मोहिनी बैठी है। उसकी आँखें बन्द थीं और उसके लम्बे बाल सम्पूर्ण सीने पर फैले हुए थे। उसके मस्तक से शक्ति का प्रकाश बह रहा था। वह कुछ बुदबुदा रही थी।

मैं छिपकर मोहिनी को देखने लगा।

मीनार के उस हिस्से में एक चौड़ी खिड़की थी। प्रकाश वहीं से आ रहा था और मोहिनी उसमें स्नान करती प्रतीत हो रही थी। उसके एक हाथ में अब भी त्रिशूल था। फिर मैंने असँख्य साँपों को मोहिनी के सामने शीश नवाते देखा। जैसे मोहिनी उन आत्माओं से बातें कर रही थी। उन्हें हुक्म सुना रही थी। वे सभी साये आते रहे और अदृश्य होते रहे। फिर मोहिनी ने धीरे-धीरे गुनगुनाते हुए आँख खोल दिए और एक पुस्तक का अध्ययन करने में लीन हो गयी। उसे मेरी कोई खबर नहीं थी।

कुछ समय अध्ययन में व्यतीत करने के उपरान्त वह उठी। उसने करीब रखा लबादा ओढ़ा और मैं बुरी तरह चौंका। अब मैंने उसे सिर पर पहाड़ों की रानी वाला ताज रखते देखा। अब वह पहाड़ों की रानी के रूप में मेरे समक्ष थी।

हे भगवान, क्या पहाड़ों की रानी मोहिनी थी ?

अचानक मोहिनी ठिठक पड़ी। जैसे उसे किसी की उपस्थिति का आभास हुआ हो।

“राज! तुम और यहाँ ?” मोहिनी के स्वर में हल्का आश्चर्य था।

पहाड़ों की रानी की आवाज अब पहले की तरह खनकती हुई नहीं थी; बल्कि उसका स्वर सुरीला हो गया था और यह मोहिनी की ही आवाज थी।

मैंने छिपना निरर्थक समझा और मोहिनी के सामने आ गया।

“हाँ, मैं यहाँ।”

“मेरे प्रिय, यह तुमने अच्छा नहीं किया।”

“क्यों मोहिनी, तुमने अब तक यह बात मुझसे छिपाकर क्यों रखी कि तुम ही पहाड़ों की रानी हो ? अगर मैं आज अपनी आँखों से न देख लेता तो न जाने कब तक इस दुविधा में रहता! यह भेद तुमने मुझसे क्यों छिपाकर रखा ?”

“उसके लिए अभी समय नहीं आया था राज। खैर, अगर तुम जान ही गये हो तो इस भेद को अपने तक ही सीमित रखना। राज, अगर मैं तुम्हें समय आने पर यह भेद बताती तो उचित रहता।”

“यह तुम बार-बार कौन से समय की बात करती हो ?”

“जब तुम अपनी मोहिनी को स्पर्श कर सको। उससे प्रेम कर सको। बस कुछ मास ही शेष हैं, जब आकाश की बेटी आकाश के बेटे से जा मिलेगी। फिर हमें कोई एक-दूसरे से जुदा न कर सकेगा।”

“मोहिनी, सच बताओ, तुम कोई आत्मा तो नहीं हो ?”

“राज! हम सब आत्मायें हैं। मगर मैं इन सबसे भिन्न हूँ। वैसे यह निर्णय करना बहुत कठिन है कि वास्तव में हम कौन हैं ? यदि मेरा मस्तिष्क भूल नहीं करता तो वह पुस्तक जिसका अध्ययन मैं कर रही हूँ, उसमें लिखा हुआ है कि आकाश के बेटे इस धरती पर आये और उन्होंने देखा कि इँसान की बेटियाँ नहीं हैं। तो फिर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आकाश की एक बेटी धरती पर आयी हो और वह एक पुरुष की सुन्दरता पर मोहित हो गयी हो और उसे इस प्यार की सजा जीवन भर भोगनी पड़ी हो। अच्छा हो राज, तुम ऐसे प्रश्न न करो और जो देख रहे हो उसे बस देखते रहो।”

मोहिनी की बातें अब मुझे संदिग्ध करने वाली थीं। रियासत की महारानी ने कहा था कि पहाड़ों की रानी एक भटकती रूह है। वहाँ गंदी आत्मायें रहती हैं जो इँसानी लहू पीती हैं और यदि मोहिनी इँसानी देह नहीं तो फिर मेरा यह प्रेम कैसा ? मैं किस तरह उसे पा सकता हूँ ? वह एक आत्मा थी या औरत ? यह फैसला करना कठिन था। मैंने इस मन्दिर में जिस तरह उसे शरीर धारण करते देखा था, वह आश्चर्य केवल आत्मायें ही दिखा सकती थीं।

पहाड़ों की रानी शायद इसलिए अपना सम्पूर्ण शरीर छिपाकर रखती थी क्योंकि उसकी देह में एक छिपकली और औरत के मिले-जुले कँकाल के सिवा कुछ नहीं था। उसकी आवाज भी खोखली और खनकती हुई थी। फिर मेरे सामने ही उसने आग में स्नान करके इँसानी देह धारण कर ली तो वह औरत किस तरह हो सकती थी ? उसका कोई अस्तित्व नहीं था। मैं उसे छू नहीं सकता था। शायद इसी कारण कि उसका अस्तित्व था ही नहीं। जिस तरह मैं उस मोहिनी को नहीं छू सकता था जो मेरे सिर पर आया करती थी।

किन्तु फिर भी मैं उसके प्रेम में गिरफ्तार था। अपनी इच्छा तो जैसे मर चुकी थी। उसका एक भेद तो मेरे सामने खुल चुका था और मैं जानना चाहता था कि वहाँ जो दूसरे दूत रहते हैं, क्या वे भी इँसानों और छिपकली के मिले-जुले ढांचे हैं ?

हम दोनों मीनार से साथ-साथ आये।
 
एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह सारी दुनियाँ का राजा मुझे बनाएगी और स्वयं मेरी रानी होगी। हमारी जोड़ी सितारों की जोड़ी की भाँति आकाश पर सदा चमकेगी। हम दोनों सारे संसार पर विजय पा लेंगे।

यह शब्द कहते-कहते मोहिनी के माथे का प्रकाश चौड़ा होकर फैल गया था। उसकी काली आँखें विचित्र ढंग से चमकने लगी थीं।

मैं उसकी बात सुनकर घबरा गया।

“मोहिनी! ये कैसे होगा ?”

“सब कुछ मेरी इच्छाओं के अनुरूप होगा। मैंने संसार भर के समस्त मानचित्रों का अध्ययन किया है। हम छोटे-मोटे देशों को जीतते हुए बड़ी शक्तियों के सामने आयेंगे।”

“मोहिनी! मैं बेगुनाहों की हत्या करके विश्व सम्राट नहीं बनना चाहता।”

“राज! यदि तुम इँसानों की हत्या नहीं करना चाहते तो मैं ऐसा मार्ग भी ढूँढ लूँगी, जिससे हम शांतिप्रिय ढंग से सारे संसार पर शासन करेंगे।”

अभी हम यह बातें कर ही रहे थे कि एक दूत भीतर आया और सिर झुकाकर खड़ा हो गया।

“क्या काम है ?” मोहिनी ने बड़े रोबीले स्वर में पूछा।

“पवित्र माँ! हमारे सब जासूस वापस आ गये हैं।”

“अच्छा, तो उन्होंने क्या सूचना लाकर दी है ?”

“पवित्र माँ! उन्होंने बताया है कि कानून के वासी लोगों की रियासत में सूखे के कारण भुखमरी पड़ गयी है। उनके खेत जल गये हैं। महारानी ने कहा है कि यह सब कुछ आप ही कारण हुआ है। इसलिए वह अपनी सेनाओं को इकट्ठा करके हमारे ऊपर आक्रमण की तैयारियाँ कर रही है।”

“मैं समझ गयी। उस औरत के सीने की जलन उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है। राज! अभी तुम कह रहे थे कि हमें बेगुनाहों का खून नहीं बहाना चाहिए। मगर देख लिया इन लोगों का हाल! यही लोग मुझे इस बात के लिए विवश करते हैं कि मैं इनका बलिदान स्वीकार करूँ। महामंत्री! तुम जाओ, मैं स्वयं देख लूँगी कि कहीं यह जासूस मुझे धोखा तो नहीं दे रहे हैं।”

उसके बाद मोहिनी ने ध्यान तोड़ा और अपनी पूर्वस्थिति में आ गयी।

फिर सामान्य स्वर में बोली–“जासूसों की सूचना सही है। राज देखो, यह औरत तुम्हारे प्रेम में किस तरह खून बहाने पर उतर आयी है। तुमने खुद अपनी आँखों से देख लिया कि किस तरह उसने तुम्हें पिछले जन्म में खोया था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा राज। वह तुम्हारी छाया भी न पा सकेगी। मेरे सरदार! क्या तुम भी यह युद्ध देखोगे ? नहीं...नहीं...तुम यहीं रहोगे! उस चुड़ैल से मुकाबला करने के लिए मैं अकेली ही काफी हूँ। मैं अपने प्रेमी के निकट दुःख की छाया तक न आने दूँगी। उस औरत के हृदय में ईर्ष्या की आग जल रही है और मैं उस आग को सदैव के लिए ठंडा कर दूँगी।” मोहिनी क्रोध भरे स्वर में बोली।

मोहिनी क्रोध में टहल रही थी। वह किसी सोच में डूबी हुई थी।

थोड़ी देर पश्चात वह बोली–“मैंने तुम्हें कहा था न कि मैं सारे विश्व पर विजय प्राप्त करना चाहती हूँ। मगर वह शक्ति मैंने तुम्हें दिखायी कहाँ ? आओ, आज वह यंत्र भी तुम्हें दिखाती हूँ जो मैंने तैयार किए हैं।”

और वह मुझे साथ लेकर चल पड़ी।

वह मुझे ऐसे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से लेकर चली जहाँ से हम पहले कभी नहीं गुजरे थे। एक द्वार पर जाकर हम रुके जिसे खोलने के लिए उसने मुझसे कहा। मैंने बढ़कर द्वार खोला। अन्दर गुफा में तेज प्रकाश था। उसे देखते ही मेरी बुद्धि चकरा गयी। वह मोहिनी की प्रयोगशाला थी। क्योंकि उसमें बहुत सी चीजें ऐसी थीं, जो किसी वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में ही हो सकती थीं।

अब हम वहाँ प्रविष्ट हुए तो मैंने देखा कि वहाँ पहले से कुछ लोग काम कर रहे थे। सभी लबादों में थे। उन्होंने पहाड़ों की रानी को झुककर प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

मोहिनी आगे बढ़ी और एक यन्त्र मुझे दिखाने लगी। विज्ञान की इतनी उन्नति तो हमारी दुनियाँ में कहीं भी नहीं हुई थी जितनी मोहिनी इन पहाड़ों में लिए बैठी थी। सोने के बड़े-बड़े ढेर पड़े थे; जिस तरह किसी कारखाने में बेकार का लोहा पड़ा हो। उसे मोहिनी की वैज्ञानिक शक्ति ने तैयार किया था।

“क्या इतना सोना इन पहाड़ों से निकाला गया है ?” मैंने उससे पूछा।

मोहिनी इस प्रश्न पर हँस दी।

“क्या तुम आशा करते हो कि इतना सोना पहाड़ों से निकल सकता है ? मेरे प्रेमी यह सब कच्चा लोहा है जिसे मैंने अपने विज्ञान की शक्ति से सोना बना दिया है। ये सब ढेर सोने के हैं। तुम लोग इसे जादू समझते हो। मैं तुम्हें फिर कहती हूँ कि ये जादू नहीं विद्या का खेल है। विज्ञान का मैंने बहुत अध्ययन किया है। एक लम्बे समय तक मैं चोटी के वैज्ञानिकों के सिरों पर घूमती रही हूँ। ये उसी का फल है कि मैं संसार की सबसे शक्तिशाली स्त्री हूँ।”

“मोहिनी, मुझे डर है कि कहीं विज्ञान की इतनी बड़ी उन्नति जिससे तुमने भयंकर हथियार तैयार किये हैं, सारे विश्व का सर्वनाश न कर दें।” मैंने डरकर कहा।

“तुम इसकी चिंता न करो, मेरे प्यारे राज। मैंने जो कुछ भी किया है यह सब तुम्हारे लिए है। तुम्हारे बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ।”

❑❑❑
 
मोहिनी के रहते यूँ मैंने खूब दौलत का नशा देखा था; परन्तु ऐसा करिश्मा तो मोहिनी ने कभी नहीं दिखाया था कि कच्चे लोहे को सोना बनाकर रख दे। यह कोई ऐसी बात नहीं थी जिसे आसानी से भुलाया जा सके।

इस बीच गोरखनाथ से मेरी मुलाकात एक बार भी नहीं हो सकी। मोहिनी से पूछने पर उसने बताया कि गोरख अब उसकी रणनीति तय करने में व्यस्त है और तराई की ओर युद्ध के लिए मोर्चे बनवा रहा है।

“गोरख को मैं महामंत्री बनाऊँगी।” मोहिनी ने कहा।

मैंने मोहिनी के खतरनाक रॉकेट देखे। वह एटमी युग से आगे के शस्त्र बना रही थी और सूरज की ऊर्जा से विनाश की किरणें तैयार कर रही थी।

अगर सिर्फ लोहे से सोना बनाने की बात ली जाए तो वह सारी दुनियाँ को खरीदने का दमखम रखती थी। छोटे-मोटे देश तो उसके साधारण चमत्कारों द्वारा प्रभावित होकर उसकी अधीनता स्वीकार कर लेते। वह चाहती तो सारी पृथ्वी में सोने का ढेर लगा सकती थी।

जब मैं मोहिनी के करीब होता तो कभी-कभी वह न जाने किन सोचो में गुम हो जाया करती थी। बात करते-करते रुक जाती, कुछ सोचने लगती। कभी-कभी वह बहुत ही रूखे स्वर में बात करती। कभी स्वयं ही हँसने लगती, तो कभी अपने स्थान से उठकर गंभीरता से आकाश की ओर देखने लगती।

प्यार में मनुष्य अन्धा होता है। उसे प्रेमिका की हर अदा से प्यार टपकता नजर आता है; भले ही वह उसे गाली दे रही हो। ऐसी ही हालत कुछ मेरी थी।

मैं चाहता था कि वह हमेशा मेरे करीब रहे। मेरी आँखों में आँखें डाले प्रेम का अमृत पान करती रहे। सदा के लिए उसकी नशीली आँखों में मैं खो जाऊँ। जैसे मेरे सदियों के प्यासे होंठ अपनी प्यास बुझाने के लिए मचल रहे थे। मैं अपने धड़कते दिल से उसकी धड़कनें गिनना चाहता था। मैं मोहिनी का प्रेम पुजारी था।

परन्तु उस पर मेरी इस कैफियत का जरा भी असर नहीं होता था। वह हमेशा ही मुझे अपने आप से दूर रहने को कहती थी। मैं मन के घरौंदों में उससे बात किया करता और वह आकाश से बातें करती रहती।

प्रेम की आग बहुत बुरी होती है। इसमें संसार के हजारों लाखों लोग जलकर राख हो चुके हैं। यह दास्तान हम दोनों पर ही आकर समाप्त नहीं होती। यह कहानी तो सदियों से दोहराई जा रही है और प्रलय के दिन तक दोहराई जाएगी। यह रिश्ते तो जन्म-जन्म के होते हैं। लाख चाहो पर रिश्तों की डोर टूटती नहीं। प्रेम को मिटाने के लिए इस संसार ने कितने जतन किए, मगर आज तक यह प्रेम नहीं मिट सका। आज भी प्रेम जीवित है और हर प्रेमी भली-भाँति जानता है कि इससे पूर्व प्रेम करने वालों का क्या हाल हुआ। मगर किसी भी प्रेमी ने उस भयंकर अंत को देखते हुए प्रेम करना नहीं छोड़ा। संसार ने कई रंग बदले। करोड़ों लोग यहाँ से चले गये और फिर वापस भी आये। यह आवागमन का चक्कर समाप्त नहीं हुआ और न होगा।

मोहिनी ने ढेर सारी पुस्तकें मुझे लाकर दी थीं और वह चाहती थी कि मैं ज्ञान प्राप्त करता रहूँ। जब तक वह छोटे-मोटे युद्ध जीतती है, मैं ज्ञान का प्रकाश बढ़ाता रहूँ। वह मुझे संसार का सबसे ज्ञानी पुरुष बनाना चाहती थी।

कभी-कभी यूँ लगता कि मैं मोहिनी का कैदी हूँ। वह मुझ पर बाहर की हवा का स्पर्श भी नहीं होने देना चाहती थी। शायद वह कोई बहुत बड़ी जादूगरनी है जिसके जादू ने मुझे पागल बनाकर रख छोड़ा था। इस संसार में अब मोहिनी के सिवाय किसी चीज से प्यार न रहा था। मेरा संसार ही मोहिनी थी। उसके बिना तो मैं साँस भी नहीं ले सकता था। जब वह एक-दो दिन तक मुझसे न मिलती तो मैं पागल सा हो जाता था और उसकी एक झलक देखने के लिए व्याकुल हो जाता था।

जादू! जादू! मोहिनी की सुन्दरता का जादू! मोहिनी के करिश्मों का जादू!

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“तुम यहीं रहोगे राज। मैं अपनी सेना के साथ युद्ध में जाऊँगी। पहले इस महारानी की फौजों से मेरा मुकाबला होगा; परन्तु जब मैं अपनी सेनाओं के साथ रहूँगी तो उनकी शक्तियाँ कई गुना बढ़ जायेंगी।”

“नहीं मोहिनी, मैं यहाँ तुम्हारे बिना नहीं रहूँगा। तुम जहाँ होगी, मैं साथ होऊँगा, तुम्हारा साया बनकर। वह औरत बड़ी चालाक और खतरनाक है। मेरा तुम्हारे साथ युद्ध में भाग लेना आवश्यक है। आखिर मैं एक मर्द होकर किस तरह घर में बैठा रह सकता हूँ।” मैंने बड़े जोशीले स्वर में कहा।

“मेरे राज! तुम कितने बुद्धिमान हो। तुम तो अब मेरे बारे में इतना कुछ सोचने लगे हो। आज मैं कितनी खुश हूँ, यह कोई नहीं जान सकता, कोई नहीं मेरे राज। मेरे अच्छे राज! इस संसार में कोई नहीं जानता कि मेरा तुम्हारा प्रेम सदियों पुराना है। हमारे प्रेम को कोई नहीं मिटा सकता राज, कोई नहीं। आओ, मैं तुम्हें दिखाती हूँ कि मैंने क्या तैयारियाँ की हैं।”

वह एक कमरे में मुझे ले गयी जहाँ संसार भर के मानचित्र फैले हुए थे। उसने कई मानचित्रों को दिखाते हुए कहा–“सबसे पहले मैं मिस्र को जीतूँगी, लेकिन यहाँ से हजारों मील दूर मिस्र को जीतने के लिए कई मुल्क रुकावट बनेंगे। या तो मुझे उन मुल्कों से संधि करनी होगी या फिर उन्हें फतह करती हुई आगे बढ़ूँगी और जानते हो सारे विश्व कि राजधानी मैं कहाँ बनाऊँगी ? यह रही राजधानी–पीकिंग...चीनी मुल्क तक पहुँचना मेरे लिए कुछ मुश्किल न होगा। वह इस स्थान से जुड़ा है। मुझे इस कौम से बड़ी हमदर्दी है और मैं इनकी तमाम भाषाओं और सभ्यता का अध्ययन कर चुकी हूँ।”

मैं सोच रहा था इससे पहले भी बहुत से लोगों ने ऐसा सपना देखा है; परन्तु किसी का सपना पूरा नहीं हुआ। सिवाय तबाही के कुछ भी हासिल न हो सका। दो–चार देशों को जीतने की बात तो अलग, परन्तु सारा विश्व! और वह मुझे विश्व सम्राट बनाना चाहती थी, लेकिन आज का विश्व वैसा न रहा था। हथियारों की दौड़ में बड़ी–बड़ी महाशक्तियाँ एक दूसरे को पछाड़ने में लगी थीं।

“मुझे तुम्हारी बात भी याद है–बेशुमार बेगुनाहों की हत्या वाली बात। नहीं...मैं इस मामले को युद्ध से नहीं शांति से सुलझाऊँगी! उन्हें बताऊँगी कि वे मेरी शक्ति के सामने कुछ भी नहीं हैं। मिस्र और चीन दो शेष पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के देशों को विवश कर देंगे कि वे बिना खून बहाए एक झंडे के नीचे आ जायें। मैं एक नया धर्म बनाऊँगी। ऐसा धर्म जो ईश्वर की आराधना नहीं करेगा। वहाँ सिर्फ मोहिनी की ही पूजा होगी। मोहिनी का धर्म होगा, क्योंकि ईश्वर कोई चीज नहीं है। पूजा उसकी की जाती है जिसका कोई अस्तित्व हो और तुम मोहिनी पर भी शासन करोगे।

“राज! अब थोड़े समय की बात है। केवल कुछ मास शेष हैं। तैयारी का युग बीत गया है। फिर मैं तुम्हें अपनी तरह अमर बनाऊँगी और हमारे सामने पहाड़ घास की एक पत्ती और सागर पानी की एक बूँद के समान होंगे। फिर हमारी नयी जिंदगी प्रारंभ होगी। ओह! मेरे दिल में इस समय किस कदर प्रतीक्षा है, जब हम सितारों की एक जोड़ी की भाँति इस संसार के सामने अपनी अमिट सुन्दरता का प्रदर्शन करेंगे और सारा संसार आश्चर्य से हमें देखेगा। राज! मैं कहती हूँ कि इससे मुझे बहुत खुशी होगी। वह दिन कितना भाग्यशाली होगा जब इस संसार के बड़े-बड़े सारे राजा-महाराजा इकट्ठे होकर हमारे सामने हाथ जोड़े खड़े होंगे और हमारे दास बनकर हमारी आज्ञा का पालन करेंगे और तुम विश्व सम्राट बने तख्त पर बैठे होगे। मैं विश्व की महारानी बनकर तुम्हारे साथ बैठी होऊँगी। क्यों मेरे राज ?”

यह भाषण करते हुए उसके माथे पर चारों ओर प्रकाश फैल गया और उसकी आँखें इस प्रकाश को प्राप्त करके इस तरह चमकने लगीं कि मुझे उसमें अलौकिक शक्ति नजर आने लगी।

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यह उन दिनों की बात है जब तिब्बत में चीनी शासन लागू हो चुका था और ल्हासा से दलाई लामा को कूच करके किसी मठ में शरण लेनी पड़ी थी। तिब्बत पर चीनी शासकों का यह पहला हमला नहीं था। इससे पूर्व भी उस ओर से सेनाओं ने हमले किये थे।

चंगेजी खानदान का हलाकू खान भी चीन की ओर से आया था। मंगोलियन सरदारों ने वहाँ बहुत लूटमार मचाई थी। बहुत सी पौराणिक कथायें वहाँ प्रचलित थीं और मिस्र की तरह यह प्रदेश भी रहस्यमयी धरती कहा जाता था। लुटेरे सरदार वहाँ तिब्बत की खानकाहों में छिपे खजानों को लूटने आते थे और यहाँ तक कहा जाता है कि तिब्बत में इँसान अमरत्व प्राप्त कर सकता है। इससे बड़ा खजाना हो भी क्या सकता है।

किन्तु तिब्बत के जिस भू-भाग में मैं उन दिनों रह रहा था वहाँ की भूमि किसी भी विदेशी हमले से सुरक्षित थी। सदियों से ये लोग सारी दुनियाँ से कटे हुए अलग-थलग जीवन व्यतीत कर रहे थे। उन्हें सीमाओं पर चौकसी की आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी। आपस में वे भले ही लड़-मर लेते पर बाहरी आक्रमण की कोई गुंजाइश नहीं थी।

यूँ तो मेरी जिंदगी एक दलदल की मानिंद है। जवानी की प्रारम्भिक स्टेज तक तो मैं साधारण सा इँसान था जो एक छोटी सी बाबूगिरी की नौकरी करके जीवन की तन्हाइयों में भी खुश रहता है। उसके दिल में छोटा सा घर बसाने के अलावा बड़ी महत्वाकांक्षायें भी नहीं होती। वह राजाओं के सपने नहीं देखता और उसकी दुनियाँ छोटी सी होती है। अपने शहर के भीतर या यूँ कहिये शहर के उस मोहल्ले के अन्दर जहाँ वह रहता है, वहीं तक उसकी जिंदगी का दायरा होता है। इस छोटे से मोहल्ले में वह शान से जीने तक की कल्पना कर सकता है।

और ऐसे ही इँसान को यदि कोई विश्व सम्राट का तख्त दे दे तो क्या हाल होगा उसका ? शायद तख्तनशीन होने से पहले ही उसका दम निकल जाए। लेकिन यह जीवन है जो करवटें लेता है। वक्त की धाराओं में बहता है। और अगर ऐसी ही घटनाएँ न घटें तो जिंदगी को एक रहस्यमय पहेली क्यों कहा जाता ?

मैं वह आदमी था जिसने जिंदगी की इतनी मंजिल जरा से अरसे में तय की थी। और इसकी शुरुआत उस वक्त हुई थी जब मोहिनी मेरे सिर आयी थी। बेशुमार दौलत आती रही, आती रही। दौलत आती है तो अय्याशियाँ खुद ही चली आती हैं। एक जमाना था जब पूना के रेस मैदान की बादशाहत मैंने प्राप्त कर ली थी। फिर वह वक्त भी आया जब ताँत्रिकों के एक गोल से मेरा मुकाबला हुआ और मुसीबतों का पहाड़ मुझ पर टूट पड़ा। मेरी जिंदगी अँधेरों से घिर गयी। मैंने क्या खोया क्या पाया इसका लेखा-जोखा बहुत लम्बा है और इसे दोहराने से कोई लाभ नहीं। मेरा माजी एक दलदल है। जिंदगी के इतने उतार- चढ़ाव, इतनी मुसीबतें, इतनी दौलत, ऐसे करिश्मे शायद ही किसी के हिस्से में आये हों। मुझे तो अब खुद से भी धोखा होता था। यूँ लगता जैसे मैं किसी गैर दुनियाँ की कोई आत्मा हूँ जिसने इँसानी जिस्म का चोगा पहन रखा है। कौन हूँ मैं ? कहाँ से आया हूँ ? और क्यों ? क्या मैं इस दुनियाँ का इँसान नहीं हूँ ? अगर होता तो मर चुका होता। क्यों मेरा नाम सुनकर बड़े से बड़ा ताँत्रिक थर्राने लगता है ?

हरी आनन्द मेरा सबसे बड़ा दुश्मन था। इंतकाम का एक खौफनाक रिश्ता मुझसे आ जुड़ा था और बस यही एक उद्देश्य जीवन का रह गया था कि जिस हरी आनन्द ने मेरी दुनियाँ वीरान कर दी थी, उसे अपने हाथों से समाप्त कर दूँ। हरी आनन्द मोहिनी के हाथों मारा जा चुका था।

मेरी जिंदगी की सबसे अहम धारणा यह थी कि मैंने मोहिनी देवी के दर्शन कर लिए थे। पहाड़ों की रानी के रूप में वह सशरीर मेरे पास में थी। मेरे सिवा किसी ने पहाड़ों की रानी का चेहरा नहीं देखा। पहाड़ी आदिवासी उसकी पूजा करते थे और उनका कहना था कि जब से यह धरती है तब से पहाड़ों की रानी है। वह सबसे पहले वहाँ आयी थी। जबकि वे लोग सदियों से वहाँ आबाद थे।

तिब्बत के इस भू-भाग में आने के बाद बहुत सी रहस्यमयी गुत्थियाँ मेरे सामने थीं, जिन्हें सुलझा पाने में मेरा दिमाग असमर्थ था। मैं तो जैसे जादुई संसार में पहुँच गया था, जहाँ जादू है– मोहिनी का जादू

!

मोहिनी ने मुझे बताया था कि कदीम जमाने में जब मिस्र में फिरऔन का बोलबाला था, उसने पहली बार इँसानी रूप में अवतार लिया। तब मैं वहाँ एक फिरऔन राजकुमार था और मोहिनी से युद्ध करने गया था। वहाँ एक जाति थी जो मोहिनी की पूजा करती थी। वे मोहिनी देवी को छिपकली की शक्ल में मानते थे और उन पर कोई औरत ही राज करती थी। जो भी औरत उनकी रानी होती वह भी मोहिनी कहलाती थी। यह जाति नील के किनारे पहाड़ों में आबाद थी। फिरऔन सेनाओं से उनका युद्ध एक वर्ष तक चलता रहा, परन्तु फिरऔन जो स्वयं को मिस्र का देवता कहलाता था, वह इस बात को कब बर्दाश्त करता कि मोहिनी नामक औरत खुद को देवी कहलाये। जंग का आखिरी हिस्सा रामोज द्वितीय के जमाने में आया और तब मोहिनी के प्रेम में रामोज द्वितीय के अनगिनत पुत्रों में से एक बहादुर राजकुमार रोमान को जंग पर भेजा गया। मोहिनी उस समय पहली बार स्वयं इँसानी जून में आयी थी और दोनों में प्रेम हो गया था।

फिरऔन राजकुमार ने बगावत कर दी, जिसकी सजा उसे यह मिली कि खुद उसकी बीवी ने उसे जहर देकर मार डाला था।

मोहिनी उस जन्म में कैसे मरी यह मुझे ठीक से ज्ञात न था, न ही मोहिनी ने स्पष्ट बताया था।

मोहिनी कई सदियों बाद तिब्बत में प्रकट हुई। कदाचित यह उसका दूसरा जन्म था। वह एक सेना के साथ तिब्बत में प्रविष्ट हुई थी और बहुत से भिक्षुक लामा उसके भक्त बन गये थे। इसी जमाने में मोहिनी को साधुओं ने तप करके श्राप दिया था कि वह अपने ही मन्दिर में कैद होकर रहेगी और उसे कोई भी इँसान अपना गुलाम बनाकर रख सकेगा। मोहिनी तभी से एक सिर से दूसरे सिर पर गुजरती रही। ताँत्रिक उसे जाप करके प्राप्त कर लेते और वह उसकी गुलाम बन जाती।

लेकिन इन साधुओं का मान भंग हो गया था और मोहिनी अब श्राप से मुक्त हो चुकी थी और इधर तराई की जंग समाप्त हो चुकी थी। परन्तु चीनी सेना के हमले का काँटा बुरी तरह खटक रहा था। और मोहिनी वहाँ न थी। गोरखनाथ मेरे सामने एक विजेता की तरह था।

मैं गोरख से पूछ रहा था।

“क्या पहले उसे वह शक्तियाँ प्राप्त न थीं ?”

“थीं, परन्तु मोहिनी देवी को श्राप जो मिला हुआ था। महाराज! इस दुनियाँ में किसी न किसी कोने में एक स्त्री हर युग में ऐसी होती है जिसे वह शक्ति प्राप्त होती है कि वह मोहिनी देवी का रूप धारण कर सके। एक समय में ऐसी एक ही स्त्री होती है; परन्तु सदियों से यह शक्ति समाप्त हो गयी थी। जिस स्त्री ने तिब्बत में शरण ली थी उसे भी यह शक्ति प्राप्त हुई थी।

“क्या पहाड़ों की रानी वही स्त्री है ?”

“हाँ महाराज! पहाड़ों की रानी वही है।”

“आश्चर्य की बात है! इतनी आयु तक कौन इँसान जीवित रह सकता है ?”

“यहाँ आकर उसने अमरतत्त्व प्राप्त कर लिया था महाराज। परन्तु श्राप होने के बाद वह अपना शरीर खो बैठी थी। वह अमर तो थी पर हड्डियों का पंजर बनकर रह गयी थी और उसका जादू सिर्फ इसी देह तक सीमित होकर रह गया था। मोहिनी रूपी शक्तियाँ कुंद हो चुकी थीं। वह बड़ा दुःख भोग रही थी। वह न तो अपना पिंजर त्याग सकती थी, न मोहिनी बन सकती थी। किन्तु अब वह सब उसी रूप में लौट आया है। जैसा सदियों पहले था और पृथ्वी पर बस एक यही स्त्री है जो मोहिनी देवी का साकार रूप रख सकती है।”

गोरखनाथ के बारे में मेरा अनुमान गलत साबित हुआ। मेरा ख्याल था कि वह इन सब बातों की जानकारी न रखता होगा, पर ऐसा न था। गोरखनाथ मोहिनी देवी का बहुत बड़ा पुजारी था और वह सब कुछ जानता था।

मुझे वह दृश्य याद आ गया जब मैंने औरत का पिंजर देखा था और मेरे देखते-देखते वह एक सुन्दर नारी के रूप में अवतरित हो गयी थी। यह सब कुछ एक डरावने ख्वाब जैसा था।

अब मैं गोरखनाथ से चंद बातों की जानकारी और प्राप्त करना चाहता था।

“परन्तु गोरख, क्या मोहिनी देवी का शरीर कोई इँसान स्पर्श नहीं कर सकता ?”

“हाँ, महाराज ऐसा ही है। उन्हें केवल अदृश्य आत्मायें स्पर्श कर सकती हैं...जो गैर फानी हैं। या फिर वह स्पर्श कर सकता है जिसने अमरत्व प्राप्त किया हो।”

“अमरत्व! यह किस तरह प्राप्त हो सकता है ?”

“इसके बारे में तो देवी ही कुछ जानती होगी। मुझे इसका ज्ञान प्राप्त नहीं।”

“यामदरेग की खानकाह क्या चीज है गोरख ?”

“तिब्बत की एक घाटी में छोटा सा एक टापू आबाद है जो यहाँ का सबसे पौराणिक पवित्र स्थल माना जाता है। बौद्ध भिक्षुओं का बहुत बड़ा मठ, जहाँ तिब्बत की देवी माता का निवास स्थल माना जाता है। कहा जाता है कि इसी देवी माता ने यहाँ इँसानों की नस्ल पैदा की थी। एक बंदर उसका पति था और तिब्बतवासी उन्हीं की सँतानें हैं।”

“ओह! क्या कभी वहाँ कोई चीनी लुटेरा आया था ?”

“यूँ तो उस खानकाह के खजाने की तलाश में बहुत से लुटेरे तिब्बत आये और दूसरे मठों को ही लूटकर चले गये। परन्तु इस खानकाह तक एक ही लुटेरा पहुँच पाया था। उस लुटेरे का नाम मानोसंग था। यहाँ पहुँचकर वह देवी के प्रेम में गिरफ्तार होकर रह गया और फिर उसी वादी में उसकी मृत्यु हुई। वह वापस न लौट सका। उस जगह एक मकबरा भी है जो मानोसंग का मकबरा है, परन्तु भिक्षु उस मकबरे के बारे में यदि जानते भी हैं तो किसी को उसके बारे में नहीं बताते और वे उसे शैतान का मकबरा समझकर नफरत करते हैं। यह मकबरा उन्हीं पहाड़ियों में कहीं दबा है।” गोरख ने बताया।

“क्या उस स्थान पर भी कोई देवी रहती है ?”

“हाँ...जब उनका त्योहार होता है तो देवी दर्शन देती है; लेकिन वह साल में सिर्फ एक बार दर्शन देती है। फिर अपनी खानकाह में चली जाती है। तिब्बत में तीन भविष्यवाणियाँ बड़ी प्रचलित हैं। एक तो यह कि लुटेरा मानोसंग इस धरती पर दूसरा जन्म लेकर फिर खानकाह तक पहुँचेगा। दूसरी यह कि उसी सदी में चीनी फौजों का हमला होगा और दलाई लामा को शासन छोड़ना पड़ेगा। तीसरी यह कि एक बहुत बड़ा जलजला आएगा और वह पहाड़ ढँक जायेगा जहाँ शैतान का मकबरा छिपा है। यह तीनों घटनाएँ थोड़े समय के अंतराल से घटेंगी। इनमें से एक तो घट ही चुकी है, यानी चीनी फौजों का हमला और तराई की महारानी ने यही बात दोहराकर मोहिनी देवी को भयभीत करने की कोशिश की थी; यानी वह यह साबित करना चाहती थी कि तुम उस चीनी सरदार का कोई दूसरा जन्म हो।”

“हो भी सकता है।” मैंने मुस्कुराकर कहा। “जब मैं मिस्री राजकुमार हो सकता हूँ, तो बेचारे मानोसंग ने ही मेरा क्या बिगाड़ा है।”

मेरे इस व्यंग्य पर गोरखनाथ भी मुस्कुरा दिया।
 
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