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Guest
जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको एक कमरे में पाया। मैं एक बिस्तर पर था। कमरा बहुत छोटा था परंतु सजा-सजाया था। वह मेरे पास ही बैठी थी और उसका जिस्म मुझसे बहुत करीब था।उसके पूरे शरीर पर हरे और सुनहरे रंग का पेंट था। मुझे यह समझते भी देर न लगी कि मैं खानकाह के सातवें हिस्से में हूँ।
वह अब भी अपना भद्दा सा मास्क पहने थी। या तो वह हमेशा इसी मास्क में रहती थी, या जानबूझकर मेरे सामने अपना चेहरा उजागर नहीं करना चाहती थी। परंतु औरत की आवाज़ और शरीर की बनावट बहुत कुछ उसकी खूबसूरती का पता दे देते हैं और फिर इस मामले में तो मुझे ख़ासा अनुभव था।
वह फूल तिब्बत की इस वीरान खानकाह में खिल रहा था।
“मानोसंग!” अचानक महान भिक्षुणी ने सन्नाटा तोड़ा और मुझे संबोधित करके बोली। “मैं दो सौ साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।”
मैंने अपने सूखे अधरों पर जुबान फेरते हुए अटक-अटक कर कहा–“माता देवी! आपको धोखा हुआ है। मेरा वास्तविक नाम तो राज ठाकुर है।”
“धोखा! नहीं, यह नाम तुम्हें इस जन्म में मिला होगा क्योंकि तुम मर चुके थे। तुम्हारा मकबरा मेरे सामने ही बना था। ओह! मैं तुम्हें पहचानने में भला कैसे ग़लती कर सकती हूँ ? तुम वही हो–मानोसंग!”
“अगर बात पुनर्जन्म की है तो...।” मैंने अब कुछ हवास पा लिया था। “तो मुझे तरोलोको का पुनर्जन्म बताया गया है। महान लामाओं का यही विश्वास है कि मैं मानोसंग नहीं हूँ और...।”
परंतु महान भिक्षुणी ने मुझे कुछ कहने न दिया और मेरे मुँह पर हाथ रख दिया।
“मुझे अपने बारे में कुछ बताने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारे होंठों की घरघराहट से मैंने सारी कहानी सुन ली है और ये भी कि भविष्य में क्या होने वाला है।” कहकर उसने निःसंकोच मेरे गले में बाहें डाल दीं।
मुझे यूँ लगा जैसे वह भी मोहिनी की तरह कोई जादूगरनी है और मैं उसके सम्मोहन में फँस चुका हूँ। एक जमाना बीत गया था जब से मैंने स्त्री का स्पर्श महसूस नहीं किया था। और इस लम्बी थका देने वाली यात्रा के कारण मेरी वह भावुकता मर चुकी थी। मैं हैरत के पहाड़ों से गुजरता हुआ यहाँ आया था।
जब उसने मेरे गले में बाहें डालीं तो मुझे अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ। मैंने मुद्दतों से एक हिसार को अपने सीने में क़ैद करके दफ़न कर दिया था। एक बाँध था जो अपनी जगह जमा हुआ था।तब से जब से मैंने मोहिनी देवी के दर्शनों के लिए नया जीवन प्राप्त करके लम्बी यात्रा की थी। वरना पहले तो हर खूबसूरत औरत मेरी कमजोरी थी। औरत हमेशा से ही मर्द की कमजोरी रही है। वह उस पर शासन भी करता है, पर एक समय ऐसा भी आता है जब वह औरत का बेदाम गुलाम बन जाता है।
यह तो प्रकृति का नियम है। और अगर ऐसा न होता कि अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षण न होता तो सृष्टि का निर्माण ही क्योंकर होता ? अगर देखा जाए तो औरत मर्द से कहीं अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उसने हर मर्द को अपनी कोख में जन्म दिया है।
मैंने उसका सर्द हाथ अपने से हटाते हुए कहा–“माता देवी! अब मुझे जाना चाहिए। अब मैंने खानकाह का रास्ता देख लिया है और...।” हक़ीकत यह थी कि उस वक़्त मेरा मस्तिष्क कुछ सोच न पा रहा था।
“ठीक है जाओ।” महान भिक्षुणी ने अपने स्वर में मिठास घोलते हुए कहा। “लेकिन तुम वापसकब आओगे ?”
“यहाँ आते-आते तो दम ही निकल जाता है।” –मैंने खुश्क स्वर में कहा।
“मैं इससे भी आसान रास्ता बता दूँगी। मैं ख़ुद खानकाह के दूसरे कपाट में आ जाऊँगी। लेकिन तुम बताओ, तुम कब आओगे ?”
“मैं जल्दी आऊँगा।”
“नहीं, कल रात को मानोसंग! मैं प्रतीक्षा करूँगी।”
“और मैं आपसे एक विशेष मसले पर बात करना चाहता था।”
“हाँ, मुझे मालूम है!”
“आपको मालूम है ?” मुझे आश्चर्य हुआ।
“सब कुछ। मैं तुम्हें तब से देख रही हूँ जबसे तुम पैदा हुए। कहो तो तुम्हारे जन्म की सारी दास्तान सुना दूँ।” वह बिल्कुल मोहिनी के अंदाज़ में बोली। “मैं जानती थी जब अपने ही जीवन से तुम निराश हो जाओगे तो यहाँ अवश्य आओगे। यहाँ मेरी शीतल छाँव में तुम्हें नया जीवन प्राप्त होगा। तुम भटक रहे थे। न जाने किन-किन हालात में। लेकिन वह सब होना था। वह तुम्हारे भाग्य में लिखा था और मैं क्या, दुनिया की कोई भी शक्ति होनी को नहीं टाल सकती।”
महान भिक्षुणी भी कोई जादूगरनी मालूम पड़ती थी। वह मुझे देख रही थी और मैं उसकी नज़रों को अपने शरीर की तहों में रेंगता महसूस कर रहा था। एक सनसनी सी मुझे महसूस हो रही थी।
“और ये भी न समझो कि मैंने कोशिश भी नहीं की थी।” वह बोली। “मैंने अपने एक महान भिक्षु को साधू जगदेव के रूप में तुम्हारी सहायता के लिए भेजा था। लेकिन तुम इतने हठधर्मी थे कि तुमने साधू जगदेव का भी मान न रखा। वह तुमसे बहुत नाराज़ था। वह तुम्हें भस्म ही कर डालता, अगर मेरा ख्याल न होता।”
“त...तुम कौन हो ?” मैंने धड़कते दिल से पूछा।
मुझे अचानक यूँ लगा जैसे उसकी आवाज़ पहले भी कहीं सुनी है। क्या सपनों में सुनी है ? क्या वह किसी दूसरे रूप में मेरे जीवन में नहीं आ चुकी है ?
“यह भी जान जाओगे। जब तुम मेरा चेहरा देखोगे तो स्वयं ही मुझसे प्रेम करने लगोगे और फिर मैं मानोसंग का प्रेम हासिल कर लूँगी। कल रात।”
“अच्छा! मैं कल फिर आऊँगा।”
मैं उससे वादा करके वापस लौट गया। एक तौर से सोचा जाए तो यह मेरी बहुत बड़ी सफलता थी परंतु दूसरी तरफ एक और जी का जंजाल खड़ा हो गया था। इस तरह की प्रेम कहानियाँ किताबों में तो पढ़ी जा सकती हैं, परंतु हक़ीक़त में ऐसी घटनाओं का घटना दुनिया की हैरतअंगेज घटना कहलाती।
एक वह थी जो दो सौ सालों से मेरा इंतज़ार कर रही थी। एक मोहिनी थी जो सदियों से मेरी राह में पलक बिछाए रही थी। और वह महारानी जो मिस्र के क़दीम जमानेमें मेरी पत्नी थी। मेरा जीवन जलता हुआ रेगिस्तान थी। जहाँ सुलगती रेत थी। रेत ही रेत। ऐसी आँधियाँ हज़ार जन्मों में भी इंसान पर से नहीं गुज़रतीं। अगर मुझे दुर्घटना का म्यूजियम कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।
❑❑❑
वह अब भी अपना भद्दा सा मास्क पहने थी। या तो वह हमेशा इसी मास्क में रहती थी, या जानबूझकर मेरे सामने अपना चेहरा उजागर नहीं करना चाहती थी। परंतु औरत की आवाज़ और शरीर की बनावट बहुत कुछ उसकी खूबसूरती का पता दे देते हैं और फिर इस मामले में तो मुझे ख़ासा अनुभव था।
वह फूल तिब्बत की इस वीरान खानकाह में खिल रहा था।
“मानोसंग!” अचानक महान भिक्षुणी ने सन्नाटा तोड़ा और मुझे संबोधित करके बोली। “मैं दो सौ साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।”
मैंने अपने सूखे अधरों पर जुबान फेरते हुए अटक-अटक कर कहा–“माता देवी! आपको धोखा हुआ है। मेरा वास्तविक नाम तो राज ठाकुर है।”
“धोखा! नहीं, यह नाम तुम्हें इस जन्म में मिला होगा क्योंकि तुम मर चुके थे। तुम्हारा मकबरा मेरे सामने ही बना था। ओह! मैं तुम्हें पहचानने में भला कैसे ग़लती कर सकती हूँ ? तुम वही हो–मानोसंग!”
“अगर बात पुनर्जन्म की है तो...।” मैंने अब कुछ हवास पा लिया था। “तो मुझे तरोलोको का पुनर्जन्म बताया गया है। महान लामाओं का यही विश्वास है कि मैं मानोसंग नहीं हूँ और...।”
परंतु महान भिक्षुणी ने मुझे कुछ कहने न दिया और मेरे मुँह पर हाथ रख दिया।
“मुझे अपने बारे में कुछ बताने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारे होंठों की घरघराहट से मैंने सारी कहानी सुन ली है और ये भी कि भविष्य में क्या होने वाला है।” कहकर उसने निःसंकोच मेरे गले में बाहें डाल दीं।
मुझे यूँ लगा जैसे वह भी मोहिनी की तरह कोई जादूगरनी है और मैं उसके सम्मोहन में फँस चुका हूँ। एक जमाना बीत गया था जब से मैंने स्त्री का स्पर्श महसूस नहीं किया था। और इस लम्बी थका देने वाली यात्रा के कारण मेरी वह भावुकता मर चुकी थी। मैं हैरत के पहाड़ों से गुजरता हुआ यहाँ आया था।
जब उसने मेरे गले में बाहें डालीं तो मुझे अपना दम घुटता सा प्रतीत हुआ। मैंने मुद्दतों से एक हिसार को अपने सीने में क़ैद करके दफ़न कर दिया था। एक बाँध था जो अपनी जगह जमा हुआ था।तब से जब से मैंने मोहिनी देवी के दर्शनों के लिए नया जीवन प्राप्त करके लम्बी यात्रा की थी। वरना पहले तो हर खूबसूरत औरत मेरी कमजोरी थी। औरत हमेशा से ही मर्द की कमजोरी रही है। वह उस पर शासन भी करता है, पर एक समय ऐसा भी आता है जब वह औरत का बेदाम गुलाम बन जाता है।
यह तो प्रकृति का नियम है। और अगर ऐसा न होता कि अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षण न होता तो सृष्टि का निर्माण ही क्योंकर होता ? अगर देखा जाए तो औरत मर्द से कहीं अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उसने हर मर्द को अपनी कोख में जन्म दिया है।
मैंने उसका सर्द हाथ अपने से हटाते हुए कहा–“माता देवी! अब मुझे जाना चाहिए। अब मैंने खानकाह का रास्ता देख लिया है और...।” हक़ीकत यह थी कि उस वक़्त मेरा मस्तिष्क कुछ सोच न पा रहा था।
“ठीक है जाओ।” महान भिक्षुणी ने अपने स्वर में मिठास घोलते हुए कहा। “लेकिन तुम वापसकब आओगे ?”
“यहाँ आते-आते तो दम ही निकल जाता है।” –मैंने खुश्क स्वर में कहा।
“मैं इससे भी आसान रास्ता बता दूँगी। मैं ख़ुद खानकाह के दूसरे कपाट में आ जाऊँगी। लेकिन तुम बताओ, तुम कब आओगे ?”
“मैं जल्दी आऊँगा।”
“नहीं, कल रात को मानोसंग! मैं प्रतीक्षा करूँगी।”
“और मैं आपसे एक विशेष मसले पर बात करना चाहता था।”
“हाँ, मुझे मालूम है!”
“आपको मालूम है ?” मुझे आश्चर्य हुआ।
“सब कुछ। मैं तुम्हें तब से देख रही हूँ जबसे तुम पैदा हुए। कहो तो तुम्हारे जन्म की सारी दास्तान सुना दूँ।” वह बिल्कुल मोहिनी के अंदाज़ में बोली। “मैं जानती थी जब अपने ही जीवन से तुम निराश हो जाओगे तो यहाँ अवश्य आओगे। यहाँ मेरी शीतल छाँव में तुम्हें नया जीवन प्राप्त होगा। तुम भटक रहे थे। न जाने किन-किन हालात में। लेकिन वह सब होना था। वह तुम्हारे भाग्य में लिखा था और मैं क्या, दुनिया की कोई भी शक्ति होनी को नहीं टाल सकती।”
महान भिक्षुणी भी कोई जादूगरनी मालूम पड़ती थी। वह मुझे देख रही थी और मैं उसकी नज़रों को अपने शरीर की तहों में रेंगता महसूस कर रहा था। एक सनसनी सी मुझे महसूस हो रही थी।
“और ये भी न समझो कि मैंने कोशिश भी नहीं की थी।” वह बोली। “मैंने अपने एक महान भिक्षु को साधू जगदेव के रूप में तुम्हारी सहायता के लिए भेजा था। लेकिन तुम इतने हठधर्मी थे कि तुमने साधू जगदेव का भी मान न रखा। वह तुमसे बहुत नाराज़ था। वह तुम्हें भस्म ही कर डालता, अगर मेरा ख्याल न होता।”
“त...तुम कौन हो ?” मैंने धड़कते दिल से पूछा।
मुझे अचानक यूँ लगा जैसे उसकी आवाज़ पहले भी कहीं सुनी है। क्या सपनों में सुनी है ? क्या वह किसी दूसरे रूप में मेरे जीवन में नहीं आ चुकी है ?
“यह भी जान जाओगे। जब तुम मेरा चेहरा देखोगे तो स्वयं ही मुझसे प्रेम करने लगोगे और फिर मैं मानोसंग का प्रेम हासिल कर लूँगी। कल रात।”
“अच्छा! मैं कल फिर आऊँगा।”
मैं उससे वादा करके वापस लौट गया। एक तौर से सोचा जाए तो यह मेरी बहुत बड़ी सफलता थी परंतु दूसरी तरफ एक और जी का जंजाल खड़ा हो गया था। इस तरह की प्रेम कहानियाँ किताबों में तो पढ़ी जा सकती हैं, परंतु हक़ीक़त में ऐसी घटनाओं का घटना दुनिया की हैरतअंगेज घटना कहलाती।
एक वह थी जो दो सौ सालों से मेरा इंतज़ार कर रही थी। एक मोहिनी थी जो सदियों से मेरी राह में पलक बिछाए रही थी। और वह महारानी जो मिस्र के क़दीम जमानेमें मेरी पत्नी थी। मेरा जीवन जलता हुआ रेगिस्तान थी। जहाँ सुलगती रेत थी। रेत ही रेत। ऐसी आँधियाँ हज़ार जन्मों में भी इंसान पर से नहीं गुज़रतीं। अगर मुझे दुर्घटना का म्यूजियम कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।
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