• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Fantasy मोहिनी

“उल्लू! गधे!” मैं अचानक नौकर पर चढ़ दौड़ा। “तुम जानते नहीं मुझे पेपर से पहले चाय की जरूरत होती है!”

“मैं जानता हूँ साहब, लेकिन मैंने सोचा कि शायद आज आपको चाय से पहले पेपर की जरूरत होगी।” नौकर का स्वर कुछ इस तरह चुभता हुआ और रहस्यमय था कि मैं चौंक पड़ा। एक दृष्टि से मैंने उसे गौर से देखा फिर हाथ बढ़ाकर अखबार ले लिया। लेकिन दूसरे ही क्षण मेरी आँखों के नीचे अंधेरा तैरने लगा। मेरा सिर घूम गया और अखबार मेरे हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। नौकर से अखबार लेते ही सबसे पहले मेरी दृष्टि उस हैडिंग पर पड़ी थी। वह कमला की हत्या से सम्बन्धित थी। हैडिंग के नीचे कमला की लाश की तस्वीर भी थी जिसे देखकर मेरे होश तक उड़ गये।

अब मुझे अहसास हो रहा था कि नौकर ने क्यों चाय से पहले मुझे मॉर्निंग पेपर का दूसरा स्पेशल बुलेटिन देने की कोशिश की थी। मगर इससे पहले कि मैं अपने होश-ओ-हवास पर काबू पाकर नौकर से कुछ कहता, वह स्वयं ही बोल पड़ा।

“मुझे रात ही शक हुए था साहब कि आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं है।”

“क्या मतलब?” मैंने धड़कते हुए दिल से पूछा।

“घबराइए नहीं साहब!” नौकर ने दबी-दबी जुबान में कहा। “मुझे अच्छी प्रकार याद है कि रात अपने मुझसे क्या कहा था। इत्मीनान रखिए, यदि पुलिस वाले यहाँ तक पहुँच भी गये तो मैं यही बयान दूँगा कि कमला का और आपका कभी कोई सम्बन्ध नहीं रहा।”

मेरा मस्तिष्क बुरी तरह चकरा रहा था। कुछ समझ में नहीं आता था कि नौकर की बात का क्या उत्तर दूँ। कुछ क्षणों तक मैं खामोश खड़ा समय की नजाकत को महसूस करता रहा फिर नौकर को सम्बोधित करके बड़े स्पष्ट स्वर में बोला – “हो सकता है कि तुमने अखबार में छपने वाली खबरों से जो निर्णय निकाला हो वह ठीक ही हो। लेकिन क्या तुम बात का कोई सबूत दे सकोगे?”

“आप कैसी बातें करते हैं साहब?” नौकर ने जल्दी से कहा। “आपके खिलाफ सबूत पेश करके मैं भला नमक-हरामी कैसे कर सकता हूँ?”

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“ परेशान मत हो साहब! पहले तो पुलिस को अभी तक मिस कमला के हत्यारे के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं मालूम और यदि भगवान न करे उन्हें मालूम हो भी गया तो आप उनकी जुबान पर दौलत की मोहर लगाकर उन्हें खामोश कर सकते हैं। बम्बई में सब चलता है सरकार।”

“ठीक है!” मैंने कुछ सोचकर नौकर को अपने विश्वास में लेते हुए दबी जुबान में कहा। “यदि तुमने वफादारी का प्रमाण दिया तो मैं तुमको खुश कर दूँगा।”

“मैं सदा आपका वफादार रहूँगा सरकार।” नौकर ने खुश होकर उत्तर दिया। फिर रहस्यमय स्वर में बोला। “ऐसी घटनाओं में पच्चीस-पचास हजार का भला क्या महत्व होता है?”

नौकर मुझसे क्या कहना चाहता था, यह महसूस करते ही मैं क्रोध से तिलमिला गया। समय का फेर था कि मैं खामोशी से उसके छुपे शब्दों को स्वीकार कर लेने का वचन दे देता, परन्तु जिस अंदाज में उसने मुझसे सौदेबाजी करनी चाही उससे मेरा बदन शोला बन गया। इसलिए मैं समय की नजाकत भूलकर नौकर पर गरज पड़ा।

“नमक हराम, कमीने! दफा हो जा इसी समय। मैं तुझे एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगा।”

“जैसी आपकी मर्जी साहब।” उसने आँखें बदलकर उत्तर दिया। उसकी नज़रों में मेरे लिये खुला चैलेंज मौजूद था।

कन्धे उचका कर वह जाने के लिये घुमा तो मेरा क्रोध और बढ़ गया। मैं बोला –

“हरामजादे, इस बात को अच्छी तरह याद रखना कि यदि तूने मेरे विरुद्ध कोई बयान देने की चेष्टा की तो पच्चीस-पचास हजार की जगह मैं लाख, दो लाख भी खर्च कर दूँगा। लेकिन तुझे जरूर जेल में सड़वा दूँगा।” नौकर मेरी बात का कोई उत्तर दिए बिना तेज-तेज कदम उठाता बाहर चला गया।

समय और हालत ने जिस तेजी से अपना रूप बदला था, उसने मुझे झकझोककर रख दिया। नौकर के जाने के बाद कुछ क्षणों तक मैं चुपचाप खड़ा अपना निचला होंठ दबाता रहा। फिर मैंने पेपर उठाया और उसको पढ़ने लगा। पेपर में कमला की रहस्यमय हत्या को आवश्यकता से अधिक उछालने की चेष्टा की गयी थी। प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट के अनुसार पुलिस बड़ी सरगर्मी के साथ हत्यारे की खोज में थी।

कमला की हत्या के सिलसिले में पेपर से संवाददाता ने यही विचार प्रकट किया था कि उसे किसी अय्याश किस्म के हत्यारे ने पहले से तय किसी प्रोग्राम के अनुसार मारा है। पुलिस ने इस सम्बन्ध में अपनी ओर से कोई राय स्पष्ट नहीं की थी। मामला चूँकि रात का था इसलिए यह खबर पहले पृष्ठ पर छपी थी।

पेपर को पढ़ने के बाद मैं परेशानी की हालत में हाथ पीठ पर बाँधे बेडरूम में टहल रहा था कि अचानक मुझे मोहिनी का ध्यान आ गया। जो मेरी इन सभी परेशानियों का कारण बनी थी। मोहिनी का ध्यान आते ही मैंने महसूस किया कि वह मेरे सिर पर मौजूद है। दोबारा वह कब और किस समय मेरे सिर पर आ धमकी थी। मुझे इसका कोई इल्म न था। लेकिन उस समय मैं महसूस कर रहा था कि वह मेरे सिर पर बड़े आराम से पाँव पसारे सो रही है। मैंने उसके होंठो पर एक चैन कि मुस्कराहट महसूस की। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मोहिनी को ढील महसूस हो जाने वाली एक रहस्यमय चीज थी। मस्तिष्क ने उसकी एक सूरत बना ली थी। कभी वह भयानक और खौफनाक नज़र आती थी, कभी वह नाजुक बदन हसीन सुन्दरी के रूप में। हाँ, यह बात तो निश्चित थी कि वह कोई बहुत खूबसूरत लड़की थी। कदाचित कमला का खून पी लेने के उपरांत आश्चर्यजनक अस्तित्व को भरपूर शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। मैंने कल्पनावस्था में मोहिनी को सोते हुए पाया तो मैं आग बबूला हो गया।
 
“उल्लू! गधे!” मैं अचानक नौकर पर चढ़ दौड़ा। “तुम जानते नहीं मुझे पेपर से पहले चाय की जरूरत होती है!”

“मैं जानता हूँ साहब, लेकिन मैंने सोचा कि शायद आज आपको चाय से पहले पेपर की जरूरत होगी।” नौकर का स्वर कुछ इस तरह चुभता हुआ और रहस्यमय था कि मैं चौंक पड़ा। एक दृष्टि से मैंने उसे गौर से देखा फिर हाथ बढ़ाकर अखबार ले लिया। लेकिन दूसरे ही क्षण मेरी आँखों के नीचे अंधेरा तैरने लगा। मेरा सिर घूम गया और अखबार मेरे हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ा। नौकर से अखबार लेते ही सबसे पहले मेरी दृष्टि उस हैडिंग पर पड़ी थी। वह कमला की हत्या से सम्बन्धित थी। हैडिंग के नीचे कमला की लाश की तस्वीर भी थी जिसे देखकर मेरे होश तक उड़ गये।

अब मुझे अहसास हो रहा था कि नौकर ने क्यों चाय से पहले मुझे मॉर्निंग पेपर का दूसरा स्पेशल बुलेटिन देने की कोशिश की थी। मगर इससे पहले कि मैं अपने होश-ओ-हवास पर काबू पाकर नौकर से कुछ कहता, वह स्वयं ही बोल पड़ा।

“मुझे रात ही शक हुए था साहब कि आपकी तबियत कुछ ठीक नहीं है।”

“क्या मतलब?” मैंने धड़कते हुए दिल से पूछा।

“घबराइए नहीं साहब!” नौकर ने दबी-दबी जुबान में कहा। “मुझे अच्छी प्रकार याद है कि रात अपने मुझसे क्या कहा था। इत्मीनान रखिए, यदि पुलिस वाले यहाँ तक पहुँच भी गये तो मैं यही बयान दूँगा कि कमला का और आपका कभी कोई सम्बन्ध नहीं रहा।”

मेरा मस्तिष्क बुरी तरह चकरा रहा था। कुछ समझ में नहीं आता था कि नौकर की बात का क्या उत्तर दूँ। कुछ क्षणों तक मैं खामोश खड़ा समय की नजाकत को महसूस करता रहा फिर नौकर को सम्बोधित करके बड़े स्पष्ट स्वर में बोला – “हो सकता है कि तुमने अखबार में छपने वाली खबरों से जो निर्णय निकाला हो वह ठीक ही हो। लेकिन क्या तुम बात का कोई सबूत दे सकोगे?”

“आप कैसी बातें करते हैं साहब?” नौकर ने जल्दी से कहा। “आपके खिलाफ सबूत पेश करके मैं भला नमक-हरामी कैसे कर सकता हूँ?”

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“ परेशान मत हो साहब! पहले तो पुलिस को अभी तक मिस कमला के हत्यारे के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं मालूम और यदि भगवान न करे उन्हें मालूम हो भी गया तो आप उनकी जुबान पर दौलत की मोहर लगाकर उन्हें खामोश कर सकते हैं। बम्बई में सब चलता है सरकार।”

“ठीक है!” मैंने कुछ सोचकर नौकर को अपने विश्वास में लेते हुए दबी जुबान में कहा। “यदि तुमने वफादारी का प्रमाण दिया तो मैं तुमको खुश कर दूँगा।”

“मैं सदा आपका वफादार रहूँगा सरकार।” नौकर ने खुश होकर उत्तर दिया। फिर रहस्यमय स्वर में बोला। “ऐसी घटनाओं में पच्चीस-पचास हजार का भला क्या महत्व होता है?”

नौकर मुझसे क्या कहना चाहता था, यह महसूस करते ही मैं क्रोध से तिलमिला गया। समय का फेर था कि मैं खामोशी से उसके छुपे शब्दों को स्वीकार कर लेने का वचन दे देता, परन्तु जिस अंदाज में उसने मुझसे सौदेबाजी करनी चाही उससे मेरा बदन शोला बन गया। इसलिए मैं समय की नजाकत भूलकर नौकर पर गरज पड़ा।

“नमक हराम, कमीने! दफा हो जा इसी समय। मैं तुझे एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगा।”

“जैसी आपकी मर्जी साहब।” उसने आँखें बदलकर उत्तर दिया। उसकी नज़रों में मेरे लिये खुला चैलेंज मौजूद था।

कन्धे उचका कर वह जाने के लिये घुमा तो मेरा क्रोध और बढ़ गया। मैं बोला –

“हरामजादे, इस बात को अच्छी तरह याद रखना कि यदि तूने मेरे विरुद्ध कोई बयान देने की चेष्टा की तो पच्चीस-पचास हजार की जगह मैं लाख, दो लाख भी खर्च कर दूँगा। लेकिन तुझे जरूर जेल में सड़वा दूँगा।” नौकर मेरी बात का कोई उत्तर दिए बिना तेज-तेज कदम उठाता बाहर चला गया।

समय और हालत ने जिस तेजी से अपना रूप बदला था, उसने मुझे झकझोककर रख दिया। नौकर के जाने के बाद कुछ क्षणों तक मैं चुपचाप खड़ा अपना निचला होंठ दबाता रहा। फिर मैंने पेपर उठाया और उसको पढ़ने लगा। पेपर में कमला की रहस्यमय हत्या को आवश्यकता से अधिक उछालने की चेष्टा की गयी थी। प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट के अनुसार पुलिस बड़ी सरगर्मी के साथ हत्यारे की खोज में थी।

कमला की हत्या के सिलसिले में पेपर से संवाददाता ने यही विचार प्रकट किया था कि उसे किसी अय्याश किस्म के हत्यारे ने पहले से तय किसी प्रोग्राम के अनुसार मारा है। पुलिस ने इस सम्बन्ध में अपनी ओर से कोई राय स्पष्ट नहीं की थी। मामला चूँकि रात का था इसलिए यह खबर पहले पृष्ठ पर छपी थी।

पेपर को पढ़ने के बाद मैं परेशानी की हालत में हाथ पीठ पर बाँधे बेडरूम में टहल रहा था कि अचानक मुझे मोहिनी का ध्यान आ गया। जो मेरी इन सभी परेशानियों का कारण बनी थी। मोहिनी का ध्यान आते ही मैंने महसूस किया कि वह मेरे सिर पर मौजूद है। दोबारा वह कब और किस समय मेरे सिर पर आ धमकी थी। मुझे इसका कोई इल्म न था। लेकिन उस समय मैं महसूस कर रहा था कि वह मेरे सिर पर बड़े आराम से पाँव पसारे सो रही है। मैंने उसके होंठो पर एक चैन कि मुस्कराहट महसूस की। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मोहिनी को ढील महसूस हो जाने वाली एक रहस्यमय चीज थी। मस्तिष्क ने उसकी एक सूरत बना ली थी। कभी वह भयानक और खौफनाक नज़र आती थी, कभी वह नाजुक बदन हसीन सुन्दरी के रूप में। हाँ, यह बात तो निश्चित थी कि वह कोई बहुत खूबसूरत लड़की थी। कदाचित कमला का खून पी लेने के उपरांत आश्चर्यजनक अस्तित्व को भरपूर शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। मैंने कल्पनावस्था में मोहिनी को सोते हुए पाया तो मैं आग बबूला हो गया।
 
मुझे उसके अस्तित्व से अत्यंत घृणा हो रही थी। उस मोहिनी से जिसने मुझे हत्यारों के पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया था और स्वयं बेफिक्री और चैन की नींद सो रही थी। यदि मेरे वश में होता तो मोहिनी के सारे उपकारों को भूलकर उसका गला घोंट डालता। परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में खून का घूँट पीकर रह जाने के सिवा कर भी क्या सकता था? किसी भी अदृश्य शक्ति से टकराना मेरे वश का रोग नहीं था। मैं अपनी उलझन में फँसा था तभी मैंने महसूस किया कि मोहिनी अंगड़ाई लेकर उठ बैठी है और मेरी हालत पर होंठों ही होंठो में मुस्करा रही है। उसकी मुस्कराहट ने उस समय जलते पर तेल का काम किया। मैं तिलमिलाकर रह गया और उस रहस्यमय अस्तित्व को कोई कठोर बात कहने की सोच ही रहा था कि उसने एक क़यामत बयाँ कर देने वाली अंगड़ाई ली। फिर लम्बी जम्हाई लेती हुई बड़ी बेतकल्लुफी से बोली –

“मिस्टर राज! आप कुछ चिन्तित नज़र आ रहे हैं।”

“नहीं!” मैंने जले-कटे स्वर में कहा। “बल्कि इस समय तो मैं बड़े अच्छे मूड में हूँ।”

“तुम कमला के सम्बन्ध में सोच रहे हो।” मोहिनी ने अपने सुर्ख-सुर्ख होंठों पर जुबान फेरते हुए बेतकल्लुफी से उत्तर दिया। “वह वास्तव में बड़े खूबसूरत जिस्म की लड़की थी। उसका खून बहुत अच्छा था। एक युग के बाद मुझे इतना स्वादिष्ट खून नसीब हुआ है।”

“और अब जब मैं फाँसी पर चढ़ जाऊँ तो तुम मेरा खून भी चटखारे ले लेकर पी जाना।” मैं झल्लाकर बोला।

“पता नहीं तुम्हारा खून कैसा हो?” मोहिनी ने बड़े चंचल स्वर में उत्तर दिया। “इससे पहले किसी भोगी आदमी का खून पीने का संयोग नहीं हुआ। वैसे सुना है आवारा लोगों का खून बेहद कड़वा और स्वादिष्ट होता है।”

आज वह बहुत मदमस्त मालूम होती थी।

“मोहिनी!” मैंने बेबसी की हालत में प्रार्थना करते हुए कहा। “ईश्वर के लिये अब तुम मेरा पीछा छोड़ दो। मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगा।”

“बड़े अहसान फरामोश मालूम होते हो राज! क्या तुम भूल चुके हो कि तुम्हें यह सब ऐश-ओ-इशरत किसकी बदौलत प्राप्त हुई?” मोहिनी के स्वर की गंभीरता मैंने विशेष रूप से महसूस की।

“मैं जानता हूँ; लेकिन जब मैं ही न रहूँगा तो फिर यह सब कुछ किस काम आयेगा?” मैं रो देने वाले स्वर में बोला।

“च्च...च्च!” मोहिनी ने मुझे चूमकारते हुए कहा। “तुम सचमुच बहुत भयभीत लगते हो।”

“तुम आखिर चाहती क्या हो?” मैं तुम्हारे लिये बेगुनाह लोगों का लहू बहाता रहूँ?”

“सुनो राज!” मोहिनी अचानक बड़ी गंभीरता से बोली। “जब तक मेरा अस्तित्व तुमसे मिला हुआ है। तुम्हें किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं आ सकता। हाँ, यह अवश्य है कि अस्थाई रूप से तुम्हारे सामने कुछ कठिनाइयाँ पेश आ जायें। परन्तु तुम उन पर सरलतापूर्वक काबू पा सकते हो।”

मोहिनी के स्वर में न जाने कौन सा जादू था कि मुझे चैन मिल गया। फिर भी जब मैंने उसे नौकर के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक बताया तो वह बड़ी लापरवाही से बोली – “मैं जानती हूँ। मुझे यह भी पता है कि वह तुमसे नाराज होकर यहाँ से चला गया है। तुम्हारी जानकारी के लिये यह भी बता दूँ कि वह इस समय पुलिस स्टेशन में बैठा अपना बयान लिखवा रहा है और पुलिस किसी भी क्षण यहाँ पहुँचने वाली है। मगर तुम्हें चिन्ता करने की तनिक आवश्यकता नहीं है तुम पुलिस का मुँह बंद करने के लिये दौलत का प्रयोग खूब अच्छी प्रकार जानते हो।”

“नौकर का क्या होगा?”

“उसकी चिन्ता मत करो। मैं सब ठीक कर लूँगी।” मोहिनी ने इत्मीनान दिलाते हुए कहा। फिर बहुत विश्वास के साथ बोली। “जब तक तुम मेरे साथ किए हुए वायदे पर कायम रहोगे और मुझसे छुटकारा प्राप्त करने की चेष्टा न करोगे, मैं बराबर तुम्हारी रक्षा करती रहूँगी। लेकिन जिस दिन भी तुमने ऐसा किया, उस दिन मैं तुम्हें ऐसी मुसीबत के सामने खड़ा कर दूँगी कि तुम्हें भागने का रास्ता न मिलेगा।”

मुझे पता था कि मोहिनी जो कुछ कह रही है उसे कर गुजारने की शक्ति भी रखती है, इसलिए मैंने कोई उत्तर नहीं दिया; और दिल ही दिल में सोचने लगा कि देखते हैं यह मुसीबत कब तक मेरे सिर पर मौजूद रहती है।

“राज, तुम्हें एक खुशखबरी सुनाऊँ?” कुछ देर बाद मोहिनी ने मुस्कराते हुए मेरे कानों में सरगोशी की। “तुम्हारी डॉली कल तक तुम्हारे पास आ जाएगी।”

“तुम्हें कैसे मालूम हुआ?” मैंने चौंकते हुए पूछा। डॉली का नाम सुनकर मैं अपनी सारी परेशानियाँ भूल गया था। अपनी प्रेमिका का नाम सुनते ही मेरा दिल खुशी से झूम उठा।
 
“मुझे क्या नहीं मालूम मिस्टर राज?” मोहिनी ने मेरे सिर पर खड़े होकर कहा। फिर अपनी आँखें मटकाने लगी। “मैं यह भी जानती हूँ कि डॉली यहाँ आते ही तुमसे शादी करने की प्रार्थना करेगी। जिसे तुम तुरन्त स्वीकार कर लोगे।”

“सच!” मेरे ज़हन में शहनाइयाँ बजने लगीं। लेकिन बाहर से उभरने वाले क़दमों की आवाज ने शहनाइयों की आवाज को दबा दिया और फिर वही हुआ जिसके सम्बन्ध में अभी कुछ क्षण पहले मोहिनी मुझे बता चुकी थी। पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर दो सिपाहियों और मेरे नौकर के साथ मेरे कमरे में प्रविष्ट हुए। मेरा दिल दहलकर रह गया। मोहिनी ने उस अवसर पर एक बार फिर मेरी ढाढस बँधा दी।

“देखो राज, पुलिस वालों के सामने किसी प्रकार की कायरता का प्रमाण मत देना। हिम्मत से काम लेना और इस बात को मानने से साफ इंकार कर देना कि तुम कमला नाम की किसी लड़की को जानते हो। हाँ, जब पुलिस अधीक्षक परेशान करे तो तुम इन परेशानियों से छुटकारा पाने के लिये इंस्पेक्टर की मुट्ठी गरम कर देना।”

मोहिनी की बात सुनकर मैं अपने स्थान पर सावधान हो गया और अपने दिल की धड़कनों पर काबू पाकर इंस्पेक्टर को यूँ घूरने लगा जैसे मुझे उसका बिना आज्ञा अंदर प्रविष्ट होना नागवार गुजरा हो।

इंस्पेक्टर कुछ क्षण तक खामोश खड़ा मेरे चेहरे के उतार-चढ़ाव का जायजा लेता रहा फिर बिना किसी घुमाव-फिराव के असल मामले की ओर आ गया। वह मुझसे कमला के बारे में कुछ मालूम करने की जान तोड़ चेष्टा कर रहा था। मेरा नमक हराम नौकर निकट ही खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। परन्तु मुझे उसकी उपस्थिति की भी ऐसी कोई विशेष चिन्ता नहीं थी। मोहिनी के सुझाव पर मैंने इंस्पेक्टर को अपना यही बयान दिया कि मैं कमला नाम की किसी लड़की को नहीं जानता और न ही मैंने इस नाम को पहले कभी सुना है। इंस्पेक्टर जो इस ख्याल से मेरे कमरे में दनदनाता घुस आया था कि मुझे नौकर के दिए गये बयान के अनुसार मुझे धमकाएगा, मुझे एक ठोस चट्टान की तरह अटल देखकर मेरे सामने मायूसी का शिकार नज़र आ रहा था। लेकिन उसने हिम्मत न हारी और मुझे घूरते हुए बोला –

“मिस्टर राज!”

“जी!” मैं उसे घूरता हुआ बोला।

“क्या आप इस व्यक्ति से परिचित हैं?”

“जी हाँ!” मैंने बड़ी लापरवाही से कहा। “अपना नौकर रह चुका है।”

“यानी आप यह बात स्वीकार करते हैं कि सवेरे तक यह आपकी नौकरी में था?”

“जी हाँ!”

“क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आपने किस कारणवश इसे अपनी सर्विस से अलग कर दिया?” इंस्पेक्टर ने तनिक व्यंग्य के साथ पूछा।

“ऑफिसर!” मैं जरा झुंझलाकर बोला। “मैं बेहूदा किस्म के नौकरों को सहन करने का आदी नहीं हूँ। वैसे भी किसी नौकर को सर्विस से अलग कर देना कोई जुर्म नहीं है।”

“मिस्टर राज!” वह इंस्पेक्टर पहले की तरह बेरुखी से बोला। “क्या कमला की हत्या की कहानी आप न्यूज पेपर पर पढ़ चुके हैं?”

“महज सुर्खी की हद तक। विवरण में जाने के लिये इसलिए समय नष्ट नहीं किया कि मुझे जराम से कभी दिलचस्पी नहीं रही।”

“लेकिन आपके नौकर का बयान है कि मरने वाली पिछली रात आपके बेडरूम में आपके साथ मौजूद थीं!”

“यदि आप मेरे नौकर के बयान को इस सीमा तक महत्व दे रहे हैं तो बड़े शोक से इसकी छानबीन कर लें।” मैंने इस बार भी लापरवाही से कहा। “मुझे कोई आपत्ती नहीं होगी।”

“हूँ!” इंस्पेक्टर मुझे घूरता हुआ बोला। “यानी आपको इस सच्चाई से इंकार है कि चौपाटी पर पायी जाने वाली लाश जिस युवती की है, वह काफी रात तक आपके पास थी।”

“यह सरासर झूठ हैं ऑफिसर। मेरे ऊपर एक झूठा आरोप है।” मैंने किसी कदर झुंझलाहट का प्रदर्शन किया। “महज एक नौकर के झुठे बयान पर मुझे कत्ल का मुजरिम समझने का कोई हक नहीं रखते।”

“बहुत खूब!” पुलिस इंस्पेक्टर इस बार न जाने क्यों मुस्करा दिया। उसकी तेज निगाहें किसी भूखे गिद्ध के समान मेरे चेहरे पर जमी थीं। कुछ देर के बाद उसने सपाट स्वर में पूछा। “मिस्टर राज, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आपकी कार इस वक़्त कहाँ है?”

“गैराज में।” मैंने जल्दी से उत्तर दिया।

“मैं एक नज़र उस देखना चाहूँगा!”

“बड़े शौक से देखिए।” मैंने नाराजगी से कहा। फिर इंस्पेक्टर को साथ लिये हुए बाहर की ओर लपका ही था कि मोहिनी, जो बड़ी गंभीरता के साथ मेरे सिर पर बैठी हालात का जायजा ले रही थी मुझसे बोली –

“राज, अब समय आ गया है कि तुम इंस्पेक्टर को खरीदने की कोशिश करो। कार के भीतर समुन्द्र के किनारे की जो थोड़ी बहुत रेत मौजूद है, वह तुम्हारे फँसाने के लिये इंस्पेक्टर का मार्ग दर्शन भी कर सकती है।”

मोहिनी ने जिस खतरे की ओर संकेत किया था उसे महसूस करके मैं अचानक रुक गया। इंस्पेक्टर भी मेरे साथ रुक गया था। वह बोला –

“क्यों मिस्टर राज, आप रुक क्यों गये? क्या गाड़ी का निरीक्षण कराने में आपको किसी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस हो रही है।”

“नहीं।” मैंने जल्दी से कहा और स्वयं पर अधिकार पाता हुआ बड़ी नरमी से बोला। “इंस्पेक्टर, मुझे आपसे कुछ आवश्यक बातें करनी है!”

“फरमाइए!” इंस्पेक्टर मुझे नरम पड़ता देख मुस्करा दिया।

“बात वास्तव में यह है इंस्पेक्टर कि मेरे नौकर ने समय की नजाकत का लाभ उठाकर मुझे फँसाने को कोशिश की है।”

“क्या मतलब?” इंस्पेक्टर ने मुझे घूरा।

“उसे मेरे व्यक्तिगत मामलों के बारे में थोड़ा-बहुत पता चल गया है, जिसके कारण वह कई बार मुझे ब्लैकमेल कर चुका है।” मैंने मेरे मस्तिष्क में एक खाका तैयार करके उसमे रंग भरना शुरू कर दिया। “आज सुबह भी उसने मुझसे एक लम्बी रकम की माँग की थी। मेरे इंकार करने पर उसने मुझे धमकी देते हुए कहा कि वह मुझे कमला के केस में फँसा सकता है। इसी ने मुझे सुबह का समाचार-पत्र दिखया था।”

“मैं समझा नहीं कि आखिर वह आपको कमला की हत्या में किस प्रकार फँसा सकता था?”
 
“इसलिए कि...।” मैं एक क्षण के लिये गड़बड़ा सा गया। फिर जल्दी से अपनी बौखलाहट पर काबू पाकर बोला। “दरअसल बात वास्तव में यह है इंस्पेक्टर कि कमला भी एक-दो बार पहले मेरे मकान पर आ चुकी है। कमला की एक सहेली जो आजकल मुझसे नाराज है, उस भेद से वाकिफ है जिसका इल्म मेरे नौकर को भी है। इस नमक हराम ने यही कहा था कि अगर मैंने दूसरी बार मुँह माँगी रकम से इंकार किया तो वह कमला की सहेली से मेरे विरुद्ध बयान दिलवाकर मुझे फँसवा देगा।”

“यदि यह वास्तविकता है मिस्टर राज, तो मुझे आपके नौकर की चालाकी की दाद देनी पड़ेगी। उसने वास्तव में आपकी दुखती रग पर हाथ रखा है।”

“इंस्पेक्टर!” मैंने हाथ मलते हुए कहा। “मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि कमला की हत्या से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।”

“हो सकता है कि आप ठीक कह रहे हों; लेकिन क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आपके नौकर ने आज सुबह आपसे कितनी रकम की माँग की थी?” इंस्पेक्टर ने अपना आखिरी वाक्य जरा दबी जुबान में बड़े ही रहस्यमय स्वर में पूरा किया था।

“पच्चीस हजार।” मैंने तिलमिलाने की बड़ी शानदार एक्टिंग करते हुए कहा। “पहले भी वह मरदूद कई बार मुझसे हजार-पाँच सौ ठगता रहा है।”

“समय को देखते हुए आपको बुद्धिमानी से कम लेना चाहिए मिस्टर राज। “इंस्पेक्टर ने होंठो ही होंठो में मुस्कराते हुए कहा। “ऐसे अवसर पर यदि लाख, डेढ़ लाख खर्च करके भी आप अपने-आपको बचा लें तो सौदा महँगा नहीं रहेगा।”

मैं समझ गया कि मेरा शिकार मेरे बिछाए हुए जल में फँस चुका है इसलिए थोड़ी हिचकिचाहट के बाद मैंने खुलकर इंस्पेक्टर से सौदा कर लिया और उसकी माँग की हुई रकम उसे दे दी।

जब वह वहाँ से जाने लगा तो मैंने कहा – “ऑफिसर! कहीं मरदूद किसी और बढ़े ऑफिसर से सम्बन्ध कायम करके, मुझे परेशान करने की कोशिश तो न करेगा?”

“कैसी बातें करते हैं आप मिस्टर राज?” इंस्पेक्टर ने इस बार बड़े अपनत्व से उत्तर दिया। “मजाल है साले की जो एक जुबान भी आपके खिलाफ निकाल सके। क्या मैं मर गया हूँ? मैं आपके साथ हूँ।”

इंस्पेक्टर के जाने के बाद मैंने इत्मीनान की एक लम्बी साँस ली। फिर सबसे पहला काम मैंने यह किया कि गाड़ी को गैराज से निकाल कर सर्विसिंग स्टेशन छोड़ आया ताकि कोई जर्रा बराबर भी प्रमाण शेष न रह जाए।

जिस समय मैं वापिस घर आया, मोहिनी ने मुझे बताया कि इंस्पेक्टर ने डेढ़ लाख की रकम में से डेढ़ हजार रूपए नौकर को देते हुए सख्ती से हिदायत कर दी है कि यदि उसने इस सिलसिले में जुबान से एक शब्द भी निकाला तो अच्छा न होगा। मैं मोहिनी की बात सुनकर चुप रहा तो उसने कहा।

“यह अब तुम्हारा मुँह किस लिये फुला हुआ है? क्या अब भी तुम्हें किसी प्रकार का खतरा महसूस हो रहा है?”

“खतरा तो नहीं है। हाँ, यह अवश्य सोचता हूँ कि आखिर इस तरह कब तक फाँसी के तख्ते से बचता रहूँगा।” मैंने मुर्दा सी आवाज में उत्तर दिया।

“जब तक तुम अपने किए वायदे को निभाते रहोगे।”

“क्या तुम अपने अस्तित्व को जिंदा रखने के लिये इन्सानी लहू की बजाय कोई और उपाय नहीं सोच सकती?” मैंने कुछ सोचकर पूछा। मैंने महसूस किया कि उसे मेरा प्रश्न बहुत बुरा लगा। जैसे मैं उसे किसी दर्पण में देखा रहा हूँ। वह अपने निचले होंठो को बड़ी झल्लाहट में काटते हुए मुझे खा जानेवाली दृष्टि से घूरे जा रही थी। मैंने उसे क्रोधित हालत में देखा तो खामोशी से अपने कमरे में आया और थकान उतरने के लिये बिस्तर पर ढेर हो गया।

“राज!” मोहिनी ने कठोर शब्दों में सम्बोधित किया। “यदि तुम चाहते हो कि तुम पर कोई मुसीबत न टूटे तो भविष्य में कभी भी मेरी आज्ञा मानने से इंकार न करना। इन्सानी लहू ही गीजा है मुझे, तुम्हारे सुझावों की आवश्यकता नहीं। यह सब क्यों है, इसके जानने की आवश्यकता तुम्हें नहीं।”

“अच्छा!” मैंने संक्षिप्त में स्वीकार कर लिया। फिर ठंडी आह भरकर आँखें मूँद लीं और मन ही मन में सोचने लगा कि देखें भविष्य में मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व क्या गुल खिलाता है।

कुछ क्षणों तक मैं आँखें बंद किए पड़ा। अपने विचारों में उलझता रहा। फिर जब मैंने महसूस किया कि मोहिनी मेरे सिर पर लेटकर दोबारा निद्रा में खो चुकी है तो मैं धीरे से उठा और नहाने के लिये बाथरूम की ओर चल पड़ा।
 
कुछ क्षणों तक मैं आँखें बंद किए पड़ा। अपने विचारों में उलझता रहा। फिर जब मैंने महसूस किया कि मोहिनी मेरे सिर पर लेटकर दोबारा निद्रा में खो चुकी है तो मैं धीरे से उठा और नहाने के लिये बाथरूम की ओर चल पड़ा।

उस दिन मैं घर पर ही पड़ा रहा। मिलने-जुलने वाले लोग आए तो मेरी आज्ञा के अनुसार चौकीदार ने यह कह कर टाल दिया कि मैं घर में उपस्थित नहीं हूँ। शाम को वस्त्र बदलकर मैं बाहर निकला। सर्विसिंग स्टेशन जाकर मैंने अपनी कार ली। फिर एक चक्कर शहर का लगाकर वापिस घर लौट आया। उसके बाद अपने बेडरूम में बन्द हो गया। बम्बई में पहला दिन था जो मैंने बिल्कुल अकेले गुजरा था। मुझे मोहिनी पर रह-रहकर क्रोध आ रहा था जो बजाय मुझे दिलासा देने के, खुद मुझसे नाराज हो गयी थी। शायद इसलिए कि मैंने उसको इन्सानी खून न पीने का सुझाव दिया था। मैं महसूस कर रहा था कि वह मेरे सिर पर लेटी अपनी कोहनी पर ठोढ़ी टिकाये किसी गहरी सोच में लीन है। मुझे उसके चेहरे पर आज सदैव से अलग बहुत अधिक गंभीरता दिखायी दे रही थी। एक-दो बार मेरे जी में आया कि मोहिनी से कोई बात करूँ, लेकिन फिर मैंने अपना इरादा त्याग दिया।

रात आयी तो मुझे तन्हाई का अहसास जोरों से सताने लगा। मैंने दिल को बहलाने की खातिर शराब का सहारा तलाश कर लिया और उस समय तक पीता रहा जब तक मेरा मस्तिष्क मेरे काबू में रहा। फिर सिलसिला उस समय समाप्त हुआ जब कदाचित मैं बेहोश हो गया था, या फिर सम्भव है कि मुझमें अधिक पीने की शक्ति शेष नहीं थी। बहरहाल वह रात किस तरह गुजरी मुझे इल्म नहीं, लेकिन दूसरे दिन मेरी सारी उलझने ख़त्म हो गयीं और इसका कारण डॉली थी। जिसे मैं दिलो-जान से चाहता था; और जिसको प्राप्त करने के लिये मैंने पहली बार मोहिनी के उकसाने पर दीपक को मौत के घाट उतारा था।

डॉली अचानक मेरे सामने आयी तो सारी चिन्तायें एकदम से भूलकर मैं उसकी मोहब्बत में गुम हो गया। फिर मेरी और डॉली की बातों का सिलसिला चल निकला। उसने बताया था कि वह केवल मेरी खातिर अपने घर वालों और अपनी करोड़ों की जायदाद से मुँह फेरकर वहाँ चली आयी है। डॉली के इस प्रेम और बलिदान की भावना का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था।

“डॉली, तुम्हें प्राप्त करने के बाद मैं यूँ महसूस कर रहा हूँ जैसे मैं संसार का सबसे भाग्यशाली इन्सान हूँ। अब हम कभी भी एक-दूसरे से जुदा न होंगे। तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा था।” मैंने भावनाओं में बहते हुए कहा।

“यह केवल इसी सूरत में सम्भव है कि हम सदा के लिये एक हो जायें।” डॉली ने दबी जुबान में उत्तर दिया।

“मैं इसे अपना भाग्य समझूँगा। लेकिन इतनी जल्दी क्या है?”

“नहीं राज! जब तक तुम मुझे अपना नहीं लेते, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। दुनिया वाले क्या कहेंगे?”

मैंने डॉली को समझाने की कोशिश की कि वह कुछ दिनों तक रुक जाए ताकि शादी कि रस्म बड़ी धूमधाम से पूरी की जा सके। परन्तु डॉली किसी भी तरह मेरी यह बात मानने पर तैयार न हुई। उसने यही कहा कि वह किसी प्रकार की हंगामे को पसन्द नहीं करेगी। उसने कहा कि देर होने की सूरत में यह भी भय है कि उसके माँ-बाप आ जायें; और वह उसे वापस ले जाने की कोशिश करें।

उसकी बात अपने स्थान पर उचित थी इसलिए मैंने और तर्क नहीं किया और उसी शाम को एक पंडित को बुलाकर कुछ लोगों की उपस्थिति में हमारे फेरे हो गये। डॉली के विवाह करने के बाद मैंने अपनी तमाम दौड़-धूप जैसे अचानक कम कर दी थी। अगर कोई विशेष आदमी मिलने के लिये आता तो उसे रोक लिया जाता वरना अधिकतर लोगों को यह कहकर दरवाजे से ही वापिस कर दिया जाता कि साहब घर में नहीं है। मेरे दिन-रात डॉली की बाँहों में गुजारने लगे थे। हर समय मैं उसकी जुल्फों की छाँव तले लेटा एक अनोखी दुनिया में गुम रहता। सच पूछिए तो मेरा दिल एक क्षण के लिये भी डॉली से दूर होने को नहीं चाहता था। उसके नाजुक अंदाज और खूबसूरत बालों ने मुझे इस कदर मदहोश कर रखा था कि मुझे समय का अंदाजा ही नहीं हुआ। रात कब आयी और सुबह कब दोपहर के हंगामों में गुम हो जाती थी। मुझे इन बातों का न तो कोई ध्यान रहता और न ही मेरे पास फुर्सत का कोई क्षण था जो मैं इन बातों पर गौर कर सकता।

डॉली को अपना बना लेने के बाद मेरे भीतर एक नयी क्रांति आती जा रही थी। अब मैंने सट्टा और रेस खेलना छोड़ दिया था। रहा दौलत का प्रश्न तो पहले मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व मेरे काम आता था और अब डॉली की चरणों की बरकत से मुझे दुनिया का सारा एशो-आराम हासिल था। मेरे कारोबार में आश्चर्यजनक रूप से प्रगति हो रही थी। मैं इन बदलते हुए हालात से संतुष्ट था। मुझे विश्वास हो चला था कि अब हमारा जीवन चैन ओ शांति से गुजर सकता है। मैंने मन ही मन पक्का इरादा कर लिया था कि मैं कभी बुरे कामों की ओर ध्यान नहीं दूँगा। परन्तु कभी-कभी मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व जो बराबर मेरे सिर पर मौजूद था मुझे चिन्तित कर देता था।

मैं यह सोचकर चिन्तित हो जाता कि कहीं किए हुए वायदे के अनुसार मुझे फिर उसके लिये इन्सानी लहू का प्रबंध न करना पड़े। कई बार मैंने बड़ी गंभीरता से इस बात पर गौर किया था कि डॉली को, जो अब मेरी जीवन संगिनी थी, मोहिनी के सम्बन्ध में सब कुछ बता देता हूँ। उससे कोई सुझाव माँगू। परन्तु कमला की हत्या के समय मोहिनी ने जो मुझे धमकी दी थी, मैं उससे कुछ इस कदर भयभीत था कि चाहने के बावजूद विवाह के बीस-पच्चीस दिन तक भी डॉली ने मोहिनी के सम्बन्ध में कुछ न कह सका। मुझे इस बात का अच्छी प्रकार इल्म था कि जो बात मेरी जुबान से निकलती थी उसका इल्म मोहिनी को हो जाता था। अलबत्ता जो बात मैं दिल में सोचा करता था, अभी तक मुझे यह सन्देह था कि मोहिनी उसके बारे में नहीं जान सकती है।
 
मेरे विवाह को लगभग एक माह बीत चुका था। इस तमाम समय में मोहिनी बराबर मेरे सिर पर मौजूद रही थी। लेकिन रूठी-रूठी सी। न तो उसने मुझसे कोई बात कही थी और न ही मैंने उसे सम्बोधित करने की आवश्यकता महसूस की थी। मैं सदा ही यह महसूस करता था जैसे मोहिनी मुझसे बेहद नाराज है।

कभी-कभी जब यूँ महसूस होता कि वह क्रोधित आँखों से मुझे घुर रही है तो जल्दी से अपनी आँखें बन्द कर लेता। फिर डॉली की बातों में उलझकर मोहिनी के अस्तित्व को अस्थाई रूप से भुला देने कि चेष्टा करता। वैसे दिल ही दिल से सदा यही प्रार्थना करता रहा था कि भगवान करे मोहिनी मुझसे सदा यूँ ही रूठी रहे। हमारे बीच बातचीत का सिलसिला दोबारा कायम न हो। कहीं मुझे फिर उसके लिये किसी बेगुनाह का खून न करना पड़े।

मोहिनी ने मुझसे कहा था कि उसे अपने रहस्यमय अस्तित्व को जिन्दा रखने के लिये हर महीने किसी इन्सानी खून की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन इस बार कमला का खून पिए उसे एक महीने से कुछ अधिक दिन गुजर चुके थे मगर अभी तक उसने मुझसे किसी प्रकार की फरमाइश नहीं की थी। न जाने क्यों मुझे यह आशा हो गयी थी कि कदाचित मोहिनी मेरा पीछा छोड़ देगी और किसी दूसरे को अपना माध्यम बना लेगी। मुझे इस मुसीबत से छुटकारा मिल जाता।

लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। हुआ यूँ कि एक दिन जब मैं डॉली को घर छोड़कर एक आवश्यक काम को निपटाने के लिये ऑफिस की ओर रवाना हुआ तो मोहिनी ने मुझे अकेले में पाकर सम्बोधित किया।

“राज, मैं तुम्हारे भीतर कुछ परिवर्तन देख रही हूँ!” मोहिनी की फुसफुसाहट मेरे कानों में उभरी तो मेरा चैन छिन्न-भिन्न हो गया। मैंने महसूस किया जैसे यह वाक्य अदा करते समय मोहिनी के चेहरे पर एक दर्द था। वह अपनी नशीली निगाहों से, जिनमें उस समय शिकायत ही शिकायत भरी हुई थी, मुझे टिकटिकी बाँधे देख रही थी। उसके चेहरे पर आज वह लाली भी मौजूद नहीं थी जो इन्सानी खून पीने के बाद पैदा हो जाती थी।

“तुम भी तो आज तक मुझसे नाराज हो।” मैंने सम्भलकर कहा।

“हाँ, परन्तु मेरी नाराजगी का कारण तुम्हें पता है!” मोहिनी बोली। “तुमने अभी तक इस नाराजगी को दूर करने का ख्याल भी नहीं किया।”

“मैं समझा नहीं तुम्हारा मतलब।” मैंने अनजान बनते हुए कहा। वरना मैं खूब जानता था कि मोहिनी की नाराजगी का कारण क्या है? वह मुझसे उसी दिन से नाराज़ थी जब मैंने उसे लहू न पीने का सुझाव दिया था।

“तुम्हें अब इतनी फुर्सत कहाँ है जो तुम अब मेरी बात का मतलब समझने की चेष्टा करो।” मोहिनी ने शिकायत भरे स्वर में कहा।

“यह बात नहीं है मोहिनी। बल्कि वास्तविकता यह है कि मैं...!”

“रहने दो राज!” मोहिनी ने मेरे वाक्य को बीच में काटते हुए कहा। “मैं देख रही हूँ कि जब से तुमने डॉली से शादी की है, तुम्हारी रुचि मेरी ओर से कम होती जा रही है। तुम मुझे नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हो। जबकि तुम यह भी खूब अच्छी तरह जानते हो कि मैं तुम्हारे लिये बड़ी महत्वपूर्ण हैसियत रखती हूँ। डॉली से भी अधिक।”

“परन्तु डॉली से शादी करने का सुझाव तो तुमने ही दिया था।” मैं थूक निगलकर बोला। मोहिनी की बात ने मुझे उलझन में डाल दिया था।

“मैं इससे इंकार नहीं करूँगी। परन्तु तुम मेरा मतलब नहीं समझ सकते।” मोहिनी ने जल्दी से कहा। “मैं तुमसे किसी शारीरिक मिलाप की इच्छा नहीं रखती। मैं तो चाहती हूँ कि तुम अपने वायदे पर कायम रहो।”

‘वायदा’ शब्द मेरे मस्तिष्क पर बम जैसा फटा।

मोहिनी ने बड़ी गंभीरता से कहा। “राज यदि तुम्हारा ख्याल है कि मैं तुम्हारा पीछा छोड़ दूँगी तो उसे अपने मन से निकाल दो। जितना तुम मुझसे दूर भागने की चेष्टा करोगे उतना ही मैं तुमसे और निकट होती जाऊँगी।”

“परन्तु अब तुम्हारे लिये किसी के खून से अपने हाथ नहीं रंग सकता।” अचानक मैंने बदले हुए तेवर से जवाब दिया। मैंने महसूस किया था कि तभी मोहिनी मेरा उत्तर सुनकर यूँ बोली।

“मैं तुमको सोचने के लिये एक अवसर और दे सकती हूँ।”

“दफा हो जाओ।” मैं चीख पड़ा। “मुझे किसी अवसर की आवश्यकता नहीं है। डॉली के साथ मैं किसी झोंपड़ी में भी खुशी से रह सकता हूँ। तुम यदि चाहो तो अपनी दी हुई दौलत और शोहरत छीन सकती हो।”

इस बार मोहिनी ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मैं महसूस कर रहा था कि मेरे वर्तमान व्यवहार ने उसे हैरान कर दिया है। उसके बावजूद उसका पूरा चेहरा दहकते हुए तंदूर की तरह सुर्ख हो रहा था। कुछ देर तक वह क्रोधित भाव में खड़ी अपने होंठ चबाती रही। फिर मैंने महसूस किया कि उसका रहस्यमय अस्तित्व मेरे सिर पर से रेंगता हुआ ठीक एक पहाड़ी छिपकली की तरह नीचे उतर गया। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह दीपक और कमला की हत्या के बाद हुआ था। एक क्षण के लिये मेरा दिल खुशी से उछल पड़ा कि मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व से मुझे छुटकारा मिल चुका है। परन्तु दूसरे ही क्षण उस रहस्यमय अस्तित्व की आशाजनक शक्तियों का विचार मेरे मस्तिष्क में उभरा तो किसी अनजाने भय से मेरे जिस्म के तमाम रोंयें खड़े हो गये।

मेरे ज़हन में एक ही ख्याल बड़ी तेजी से उभरा। कहीं ऐसा तो नहीं कि मोहिनी मुझे किसी नयी मुसीबत में फँसा दे। इस विचार के आते ही मैंने बड़ी तेजी के साथ गाड़ी का रुख घर की ओर वापिस मोड़ दिया। मैंने फैसला कर लिया था कि इससे पहले कि मोहिनी मुझे किसी मुसीबत में फँसाए, मैं डॉली को तमाम बात बता दूँगा और फिर वहीं करूँगा जिसका सुझाव मुझे डॉली देगी।
 
गाड़ी हवा से बातें करती घर की ओर भाग रही थी। रास्ते में कई जगह दुर्घटना होते-होते बची। बहरहाल मैं किसी तरह घर पहुँच गया और फिर मैंने डॉली को आरम्भ से अन्त तक की सारी बातें बता दी। जिसे सुनकर वह यूँ मेरे चेहरे को घूरने लगी जैसे उसे मेरे पागल होने का भय हो। अथवा वह यह जानने की कोशिश कर रही थी कि मुझ पर किसी प्रकार का दौरा तो नहीं चढ़ गया। उसे मेरी बातों पर विश्वास नहीं आया था।

“डॉली, मेरी जिंदगी!” मैंने उसे अपनी बाँहों में लेकर उसके माथे को चूमते हुए ठहरे स्वर में कहना शुरू किया। “मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं आया। तुम्हें क्या, यदि कोई दूसरा भी सुनेगा तो यही कहेगा कि मेरा मानसिक सन्तुलन खराब हो गया है। लेकिन विश्वास करो मेरी जान, इस समय मैंने तुम्हें जो कुछ बताया है उसका एक-एक शब्द हकीकत है और अब मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए?”

डॉली काफी देर तक आश्चर्य और उलझन में फँसी खाली-खाली नज़रों से मेरा चेहरे तकती रही। लेकिन जब मैंने कसमें खाकर विश्वास दिलाया तो उसे मेरी बातों पर विश्वास आ गया। परन्तु बावजूद उसके वह स्थायी रूप से जैसे उस पर सकता सा जारी हो गया हो। कुछ देर बाद उसकी हालत सुधरी तो उसने कहा।

“क्या आपको विश्वास है कि मोहिनी आपको किसी मुसीबत में फँसा देगी?”

“हाँ!” मैं तिलमिलाकर बोला। “वह कमबख्त बड़ी रहस्यमय शक्तियों की स्वामी है। उसने मुझसे कई अवसरों पर यह बात कही थी कि यदि मैंने कभी उसके साथ वायदा खिलाफी की तो वह मेरे लिये नयी मुसीबतों का पहाड़ तक खड़ा कर सकती है।”

“मेरा सुझाव है कि आप किसी तांत्रिक से मिलें।” डॉली ने जल्दी से कहा। “मुझे तो मोहिनी का अस्तित्व किसी छलावा या गंदी आत्मा का मालूम होता है। जिसका तोड़ कोई तांत्रिक ही कर सकता है। आप तुरंत किसी तांत्रिक से मिलकर जान की सलामती के लिये कोई ताबीज प्राप्त कर लें। भगवान ने चाहा तो मोहिनी आपका कुछ न बिगाड़ सकेगी।”

डॉली का सुझाव कुछ इस कदर उचित था कि मुझे अपने आप पर क्रोध आ गया। जो बात डॉली ने मुझे इस समय बतायी थी, वह आजतक मेरे मस्तिष्क में क्यों नहीं आयी। वरना मैं किसी तांत्रिक से सम्बन्ध स्थापित कर चुका होता और सम्भव था कि इन तमाम मुसीबतों से सुरक्षित भी रहता, जो अब मुझे चारों ओर से घेर चुकी थीं।

इन्हीं सब विचारों में फँसा था कि डॉली ने बड़े प्यार से कहा।

“किस सोच में गुम हैं आप? मेरी मानिए तो इसी समय किसी तांत्रिक से ताबीज हासिल कर लीजिए।”

“मेरा विचार भी यही है। मगर मैं किसी तांत्रिक को नहीं जानता।”

“चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।” डॉली बोली। “बाहर जाकर अपने दोस्तों और मिलने-जुलने वालों से पूछें। हो सकता है कोई आपकी मदद कर दे।”

डॉली के सुझाव पर मैंने उसी समय अपने तमाम दोस्तों को फोन खड़खड़ाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों से सम्बन्ध स्थापित न हो सका। जो लोग मिले थे, उन्होंने पहले तो इस बात पर मेरा परिहास उड़ाया कि मुझे अचानक किसी तांत्रिक की आवश्यकता क्यों आ पड़ी? फिर यह कहकर मुझे मायूस कर दिया कि वे किसी ऐसे तांत्रिक से वाकिफ नहीं हैं जो मेरी चिन्ताओं को दूर कर सके। लगभग तीन घंटे तक मैं अपने मित्रों से फोन पर सम्बन्ध स्थापित करता रहा, परन्तु मुझे अपने इरादे में कामयाबी न मिल सकी। फिर सोचा कि दफ्तर जा कर क्यों न अपने नौकरों से मालूम किया जाए। हो सकता है उनमें कोई मेरी सहायता कर सके। डॉली ने भी मेरे विचार का समर्थन किया। इसलिए मैं परेशानी की हालत में दो-चार था। इसी हालत में उठ खड़ा हुआ। डॉली बाहर मेरे साथ-साथ आयी थी। इस बीच वह लगातार मुझे तसल्ली देती रही थी और हिम्मत न हारने की तहकीद करती रही थी।

जिस समय मैंने गाड़ी में बैठकर इंजन स्टार्ट किया, उस वक़्त भी डॉली मुस्कुराती हुई आशा भरी निगाहों से मुझे विदा कर रही था। परन्तु इससे पहले कि मैं लॉन से बाहर निकल पाता, पुलिस की एक पेट्रोल कार तेजी से अंदर दाखिल हुई और उनमें से छह-सात वर्दीधारी सिपाहियों ने कूदकर मुझे अपने घेरे में ले लिया। उसके बाद वही पुलिस इंस्पेक्टर मेरी तरफ रिवॉल्वर ताने आया जिसे कमला के सिलसिले में मैंने डेढ़ लाख रुपए दिए थे।

“क्या बात है ऑफिसर?” मैंने घबराते हुए स्वर में पूछा।

“मिस्टर राज, हम आपको चरणदास (मेरे उस नौकर का नाम था जिसे मैं निकाल चुका था) की हत्या के अपराध गिरफ्तार करते हैं।” इंस्पेक्टर ने ठंडे स्वर में कहा और फिर उसके संकेत पर दो पुलिस वालों ने मुझे बाहर घसीटकर मेरे हाथों में हथकड़ियाँ डाल दीं। डॉली दरवाजे पर खड़ी स्तब्ध सी हालत में देख रही थी। परिस्थितियों ने इतनी तेजी से रुख बदला था कि मैं स्वयं भी परेशान हो गया और मामले की तह तक न पहुँच सका।

“इंस्पेक्टर!” कुछ देर के बाद मैंने आश्चर्य से कहा।

“मैं कसम खाता हूँ कि चरणदास की हत्या के सम्बन्ध में मुझे कुछ नहीं पता।”

“इसका प्रमाण आप अदालत में दीजियेगा।”

“लेकिन इंस्पेक्टर जब मैं बेगुनाह हूँ तो फिर मुझे किस लिये गिरफ्तार किया जा रहा है?”

“अब यह मक्कारी नहीं चलेगी मिस्टर राज।” इंस्पेक्टर मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरता हुआ बोला। “सम्भव है आपने सोचा हो कि चरणदास की हत्या कर देने के बाद कमला के सिलसिले में तमाम प्रमाण खत्म कर देंगे। लेकिन आपने इस काम के लिये गलत आदमी का चुनाव किया है। कल्लन खां पहले भी कई बार सजा काट चुका है। उसके रंगे हाथों गिरफ्तार होने के बाद बड़ी आसानी से हमें सब कुछ बता दिया।”

“क्या बता दिया इंस्पेक्टर?” मैंने डूबती हुई आवाज में पूछा।

“यही कि आपने उसे दस हजार रूपए देकर चरणदास की हत्या करवायी थी!”

“यह सरासर झूठ है। मैं किसी कल्लन खां को नहीं जानता।” मैं चीख उठा।

“कमला के सिलसिले में भी पहले आपने यहीं कहा था।” पुलिस इंस्पेक्टर का स्वर इस कदर ठंडा और रहस्यमय था कि मैं गूँगा होकर रह गया।

फिर अचानक मेरे मस्तिष्क पर मोहिनी की सूरत उभरी। यकीनन यह सब कुछ उसी की इंतकामी कार्यवाही थी। उस मोहिनी की जिसने मुझे गले तक हालात के दलदल में फँसा दिया था। मेरे पास अपने बचाव के लिये इसके अतिरिक्त कोई चारा न था कि मैं चीखता-चिल्लाता और कसमें खाकर अपनी बेगुनाही का विश्वास दिलाता। लेकिन इंस्पेक्टर ने मेरी एक न सुनी। मेरी इस प्रार्थना को भी रद्द कर दिया कि मैं दो बातें डॉली से पर लूँ। फिर इसके बाद वही हुआ जो ऐसे अवसरों पर होता है।
 
पुलिस वाले मुझे किसी प्रकार का अवसर दिए बिना धक्के देते हुए और घसीटते हुए जीप तक लाए। फिर मुझे उठाकर पिछली सीट पर फेंक दिया गया। डॉली के दिल पर उस समय क्या बीत रही होगी, मुझे इसका कोई ख्याल न था। मेरा मस्तिष्क प्रत्येक पल विक्षिप्त होता जा रहा था। जैसे-जैसे थाना नजदीक आता जा रहा था, मेरे दिल की धड़कनें बढ़ती जाती थीं। मैं जीप की पिछली सीट पर पुलिस वालों के घेरे में बैठा अपने अंजाम पर गौर कर रहा था। हालाँकि चरणदास की हत्या के पीछे मेरा कोई सम्बन्ध न था और न ही मैं किसी कल्लन खां को जानता था। इसके बावजूद भी मेरी हालत उस बेजुबान बकरे से अलग न थी जिसे खरीद लेने के बाद उसके मालिक को इस बात का पूरा-पूरा अधिकार होता है कि जिस प्रकार चाहे उसे हलाल कर दे।

बात यदि चरणदास की हत्या की सीमा तक सीमित रहती तो सम्भव था मैं अपने बचाव के लिये हाथ-पाँव मारता लेकिन उस समय जिस पुलिस इंस्पेक्टर ने गिरफ्तार किया था, मैं कमला के सिलसिले में उससे सौदा कर चुका था और खूब जानता था कि कमला के सिलसिले में मैंने उसे डेढ़ लाख की रकम महज यूँ ही मनोरंजन के लिये न दी होगी। स्वयं मेरी आत्मा भी मुझे आत्मग्लानि के लिये विवश कर रही थी, पर बावजूद इन तमाम बातों के मैं यह सोच रहा था कि किस प्रकार हत्या के अभियोग से छुटकारा प्राप्त हो सकता है? यदि पुलिस इंस्पेक्टर एक-दो सिपाहियों के साथ होता तो मैं एक बार फिर उसे खरीदने की कोशिश करता लेकिन सात-आठ पुलिस वालों की उपस्थिति में तो रिश्वत का लेन-देन होना संभव न था। दूसरे यह कि वह यकीनन मुझसे दस-बारह लाख माँगता जो इतनी जल्दी अदा करना करना मेरे वश में नहीं था। मेरा अधिकतर रुपया विभिन्न बैंकों में जमा था जिसे निकलवाने के लिये मुझे कम-से-कम एक दिन चाहिए था। जबकि पुलिस इंस्पेक्टर के व्यवहार से यह बात प्रकट हो चुकी थी कि वह मुझे एक पल की भी मोहलत देने को तैयार न होता।

कमबख्त ने मेरी पत्नी डॉली से भी दो पल की बात करने की आज्ञा न दी थी। बहरहाल उस समय मैं बड़ी बेबसी की हालत में फँसा था। वैसे मैंने इस बात का निर्णय कर लिया था कि चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, मैं जुर्म कभी इकबाल न करूँगा। और बम्बई के बड़े-बड़े वकीलों को अपनी ओर से खड़ा करके अपनी रिहाई की हर संभव कोशिश करूँगा। आगे जो भाग्य में लिखा हो।

रास्ते मे पुलिस इंस्पेक्टर ने मुझे परेशान करने की गरज से दो-चार व्यंग्यात्मक वाक्य भी कहे। कड़े स्वर में बुरा-भला भी कहा। परन्तु मैं चुपचाप बैठा रहा। थाने पहुँचकर मुझे एक ऐसे कमरे में ले जाया गया जहाँ एक एस.पी. पहले से मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर तनाव पैदा हो गया और वह यूँ खूंखार नज़रों से मुझे घूरने लगा जैसे कच्चा चबा जाने की संभावनाओं पर विचार कर रहा हो। एक क्षण के लिये तो मैं उसकी नज़रों का सामना न कर सका। फिर मेरे दिल ने कहा – यदि आज मैंने उस कमीने के सामने जरा भी कमजोरी का प्रदर्शन किया तो गले तक फँस जाऊँगा। जो होना है होकर रहेगा फिर डरने से क्या लाभ?

दिल का यह सुझाव मेरे लिये उपयुक्त ही था। इसलिए कि बचाव का फिलहाल कोई दूसरा रास्ता भी न था। इसलिए मैंने स्वयं पर काबू पाते हुए नज़र उठाकर एस.पी. के खूंखार चेहरे पर नज़र डाली और कड़वे स्वर में पूछा –

“मुझे किस अपराध के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है?”

“तुम्हारा अपना क्या विचार है?” एस.पी. ने भवें चढ़ाकर कुछ ऐसे ठंडे स्वर में उत्तर दिया कि मैं एक बार फिर गड़बड़ा गया। पर जल्दी ही दिल की धड़कनों पर काबू पाते हुए बोला –

“यदि मुझे परिस्थिति का पता होता तो आपसे क्यों पूछता?”

“चरणदास का नाम सुना है कभी तुमने? एस.पी. ने बिगड़े हुए तेवर से प्रश्न किया। उसका चेहरा खून की लाली सा दहकता नज़र आ रहा था। आँखों का तीखापन जाहिर करता था कि वह कठोर प्रकृति का आदमी है।

“चरणदास मेरा नौकर था। जिसे मैंने कुछ दिन पहले अपनी नौकरी से निकाल दिया था।”

“क्यों?”

“यह मेरा व्यक्तिगत मामला है।”

“हूँ!” एस.पी. ने मेरे निकट आते हुए कड़े स्वर में कहा। “तुमने यकीनन अपने उसी व्यक्तिगत मामले को दबाने की खातिर चरणदास को रास्ते से हटा दिया होगा।”

“मैं समझा नहीं कि आप क्या कह रहे हैं?” मैंने दिखावे में अपने-आपको अंजान बनाते हुए पूछा।

“बको मत!” एस.पी. एकदम गरज पड़ा। “सीधी तरह अपने जुर्म का इकबाल कर लो। इसी में तुम्हारी भलाई है। वरना मुजरिमों की जुबान खुलवाने के और भी तरीकों का मैं विशेषज्ञ हूँ।”

“मैं गीता उठाने के लिये तैयार हूँ कि चरणदास की हत्या से मेरा कोई वास्ता नहीं।”

“क्या कमला के विषय में भी तुम पवित्र गीता उठा सकते हो कि तुमने उसे नहीं मरा था?” एस.पी. ने दाँत पिसते हुए मुझे खा जाने वाले कठोर स्वर में सम्बोधित किया तो एक पल के लिये मैं सहम गया।

जहाँ तक चरणदास का प्रश्न था तो उसके लिये मैं गीता की शपथ लेने को तैयार था। इसलिए की हत्या की साज़िश में मैं कतई बेगुनाह था। परन्तु कमला के लिये वैसा करना मेरे वश की बात न थी। अभी मेरी आत्मा मर नहीं गयी थी कि में महज अपनी ज़िंदगी बचाने की खातिर अपना धर्म बेच देता। यूँ भी मुझे पता था कि झूठी कसम खाने के बावजूद वहाँ से मैं छुटकारा न पा सकूँगा, इसलिए मै एस.पी. की बात का उत्तर देने के बजाय तिलमिलाकर अपना निचला होंठ चबाने लगा। एस.पी. ने मुझे खामोश पाया तो किसी कटखने कुत्ते की तरह गुर्राया –

“क्यों? अब तुम चुप क्यों खड़े हो? बोलो, क्या कमला की हत्या में भी तुम्हारा हाथ नहीं था?”

“मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि कमला की हत्या में मेरा कोई व्यक्तिगत हाथ न था।” मैंने दबी जुबान में उत्तर दिया। एस.पी. की आँखें चमक उठीं।

“तो गोया तुम लोगों का बाकायदा कोई गिरोह है?”

“यह सरासर आरोप है। मेरा सम्बन्ध किसी गिरोह से नहीं है और न ही मैंने किसी की हत्या की है।”

“अभी मालूम हुआ जाता है।” एस.पी. ने खौफनाक निगाहों से मुझे घूरा फिर इंस्पेक्टर की ओर सम्बोधित होकर बोला। “कल्लन खां को ले आओ।”

इंस्पेक्टर तेजी से एड़ी के बल घूमकर कमरे से बाहर चला गया। मैं पहले के समान खामोश खड़ा रहा। कल्लन खां के बारे में मुझे पुलिस इंस्पेक्टर की जुबानी से केवल इतना मालूम हुआ था कि उसकी गिनती शातिर मुजरिमों में होती है। वह कौन था, क्या था और क्यों कर उसने चरणदास के सिलसिले में मेरा नाम लिया था? इन सब विषयों में मुझे कोई जानकारी न थी। मुझे विश्वास था कि यह सब मोहिनी की शरारत है। इन्सानी खून का प्रबन्ध करने के सिलसिले में मेरा खरा-खरा उत्तर सुनकर वह क्रोधित हो उठी थी। फिर वह मेरे सिर पर से रेंगकर उतर गयी और अब तक लापता थी। यह भी हो सकता था कि उस समय जब मै एस.पी. के सामने दम साधे खड़ा हूँ, वह अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये चरणदास का खून पीने में मस्त हो।

एक बार मुझे मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व पर बहुत क्रोध आया। मेरे पास इस समय जो दौलत और इमारत थी, ऐशो-आराम के साधन थे, वह मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के दम पर थे। परन्तु अब जबकि मैं हत्या के अभियोग में गिरफ्तार हो चुका था। वह दौलत भला मेरे किस काम की थी। यदि मोहिनी ने मेरी प्रार्थना पर गौर कर लिया होता तो मैं इस नौबत तक कभी न पहुँचता। अभी मैं इन्हीं बातों पर गौर कर रहा था कि इंस्पेक्टर दोबारा कमरे में दाखिल हुआ। इस बार वह अकेला नहीं था। उसके साथ एक नाटे कद का हट्टा-कट्टा और दोहरे जिस्म का ऐसा व्यक्ति भी था जिसके भरे-भरे मगर खुरदरे चेहरे पर घनी मूँछें बेहद खतरनाक और डरावनी लग रही थी। उसकी आँखों की खौफनाक चमक इस बात की ओर संकेत कर रही थी कि वह यकीनन एक खतरनाक हत्यारा होगा। कमरे में दाखिल होकर उसने एक सरसरी नज़र मुझ पर डाली और फिर एस.पी. की ओर सम्बोधित होकर बोला –

“कुशल तो है, रवि साहब।”

रविशंकर उस एस.पी. का नाम था जो मुझे बाद में मालूम हुआ।

“कैसे याद किया है कल्लन खां को?”

“कल्लन खां!” एस.पी. रविशंकर ने मुझे घूरते हुए पूछा। “इन साहब को जानते हो?”

“खूब जानता हूँ जनाब! यह कुँवर राज है।”

कल्लन खां ने कुछ ऐसे स्वर में उत्तर दिया जैसे वह एक जमाने से मुझसे वाकिफ रहा हो। उसके इस सफेद झूठ पर मेरा खून खौल उठा। लेकिन मैं खामोशी से खड़ा बराबर उसे क्रोधित दृष्टि से घूरता रहा।

“चरणदास की हत्या किसने की थी?” एस.पी. ने पूछा।

“बम्बई में कल्लन खां के सिवा और कौन माई का लाल है जो इन्सानी खून से होली खेलने की जुर्रत महसूस कर सके।” कल्लन खां ने गर्दन अकड़कर कहा। “बाकी है साले तो टिकिया चोट्टे हैं। हिजड़ों की औलाद, हरामी की औलाद।”

“चरणदास से तुम्हारी क्या दुश्मनी थी?”

“दौलत के अलावा कभी किसी और से अपनी यारी नहीं रही।” कल्लन खां लगातार बड़ी लापरवाही से बोलता रहा। “तुम अगर मुँह माँगे दाम चुकाने पर तैयार हो जाओ तो मैं तुम्हारे हुक्म पर भी जिसे कहो कत्ल कर सकता हूँ।”

“चरणदास की हत्या पर तुम्हें किसने मजबूर किया था?”

इस बार कल्लन खां ने उत्तर देने की बजाय मेरी ओर देखा। फिर मुस्कराया और कहने लगा।

“सुनो है तुम ठाकुर हो। लेकिन तुम मुझे कोई कागजी ठाकुर मालूम देते हो कुँवर साहब। तभी तो तुम्हारा दम निकला जा रहा है। वरना मैं तो जब भी पुलिस के चंगुल में फँसता हूँ। बराबर सीना ठोककर मुकाबले पर डटा रहता हूँ। तुम भी फिक्र मत करो। सरकारी मेहमानखाने में दोनों वक्त बड़ी पाबन्दी से राशन मिलता है। रहा मेहनत-मशक्कत का काम तो वह मेरी मर्जी पर होता है। जेल के सारे संतरी मुझे देखकर काँप जाते हैं।”
 
“तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?” एस.पी. ने उसी खुरदरे स्वर में पूछा। “चरणदास की हत्या करने के लिये तुम्हें किसने तैयार किया था?”

“एक सिगरेट मिलेगी साहब!” कल्लन खां एस.पी. के सवाल को नजरंदाज करते हुए ढीठपन से कहा। “कसम नीली छतरी वाले की। सुबह से दो-चार दम लगाने को टान्टा भी नहीं मिला।”

मेरा ख्याल था कि रविशंकर कल्लन खां का उत्तर सुनकर उस पर जूतों और लातों की बारिश कर देगा। परन्तु मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब रविशंकर ने स्वयं अपनी जेब से सिगरेट निकालकर उसे दी और जलाने के लिये पुराने स्टाइल का अपना लाइटर भी दिया। कल्लन खां ने सिगरेट जलाकर जल्दी-जल्दी पाँच-सात लम्बे-लम्बे कश्त खिंचे और फिर इत्मीनान की साँस लेकर बोला।

“अब तुम जो चाहो पूछ सकते हो।”

“चरणदास की हत्या तुमने किसके कहने पर की थी?”

“माया देवी के हुक्म पर।” कल्लन खां ने सिगरेट का कश खींचते हुए कहा। “इन दयालु साहूकार ने मुझे दस हजार रुपये महज इस लिये दिए थे कि मैं चरणदास को ठिकाने लगा दूँ। सो मैंने एक ही वार में उसके पेट से अंतड़िययाँ बाहर कर दी।”

“यह सरासर झूठ है।” मैं चीख उठा। “मैंने इसे कोई रकम नहीं दी थी। न ही मैंने पहले कभी इसकी सूरत देखी है।”

“मर्द बनो राज ठाकुर!” कल्लन खां ने कड़ककर कहा। “यदि तुम्हारे भीतर पुलिस कि सख्ती पहन करने की हिम्मत नहीं थी तो फिर अय्याशी क्यों की थी?”

“तुम झूठे हो। मैं तुम्हें नहीं जानता।” मैंने सीधे कल्लन खां को सम्बोधित किया।

“कमला को तो जानते होगे? जिसे तुमने चौपाटी पर कत्ल किया था और फिर उसी छोकरी की खातिर ही तुमने मुझे चरणदास की हत्या पर तैयार किया था। इतनी जल्दी हिजड़ों की तरह क्यों रोने लगे? मर्द बनो राज ठाकुर! अब जब सारी बात पुलिस को मालूम हो गयी है तो अधिक छिपाने से मामला और बढ़ जायेगा।”

एस.पी. रविशंकर मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहा था; और मेरी हालत यह थी कि मारे भय से मेरा तन बदन काँप रहा था। कल्लन खां ने जिस तरह मुझ पर चरणदास का हत्यारा होने का अभियोग लगाया था। इसमें मेरे बचाव का कोई रास्ता नज़र न आता था। सबसे अधिक आश्चर्य तो मुझे इस बात पर हो रहा था कि आखिर उसने मुझे किस प्रकार पहचान लिया और उसने मेरी बिगड़ी हुई आदतों के बारे में इतनी जानकारी कैसे प्राप्त कर ली।

कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। फिर एस.पी. के संकेत पर कल्लन खां को बाहर ले जाया गया। मैं और एस.पी. अकेले रह गये तो एस.पी. ने मुझे घूरते हुए ठंडे स्वर में सम्बोधित किया।

“क्या अब भी तुम कमला और चरणदास के हत्यारे होने से इंकार करोगे?”

“मैं निर्दोष हूँ। मैंने किसी की हत्या नहीं की।” मैंने काँपती हुई आवाज में उत्तर दिया।

“हूँ! तो अब मुझे तुम्हारी जुबान खुलवाने के लिये कोई दूसरा रास्ता देखना पड़ेगा।” रविशंकर ने बड़े शुष्क लहजे में कहा और फिर क्रोध में बल खाता हुआ कमरे से बाहर चला गया।
 
Back
Top