S
StoryPublisher
Guest
जिस रोज मुझे गिरफ्तार किया गया था, उसी दिन पुलिस ने मुझे एक स्थानीय अदालत में पेश करके एक हफ्ते का रिमांड हासिल कर लिया। उस एक हफ्ते में मेरे ऊपर क्या गुजरी, यह मेरा दिल ही जानता है। एस.पी. और उसके सिपाहियों ने मुझे जिस प्रकार यातनाएँ दीं और जो अत्याचार मेरे ऊपर ढाये, उसे याद करके आज भी भय से काँप उठता हूँ।
बहरहाल मैं अपने निर्णय पर कायम रहा। और अन्तिम समय तक यही कहता रहा कि कमला और चरणदास की हत्या से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। एक सप्ताह बाद मुझे दोबारा अदालत के सामने पेश किया गया। जहाँ से मुझे जेल भेज दिया गया। जेल पहुँचकर मैंने किसी कदर चैन की साँस ली। इसलिए कि यहाँ कम से कम अब मुझे किसी कठोरता का अंदेशा नहीं था। अपने बचाव के लिये मैंने एक की बजाय तीन-तीन वकील खड़े कर दिए थे। वकीलों ने अब मुझसे हालात पूछे तो उन्हें साफ-साफ बता दिया कि आज तक जो कुछ हुआ है उन तमाम घटनाओं की जिम्मेदारी मुझ पर नहीं बल्कि मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व पर है। वह मोहिनी जो मेरे सिर सवार हो गयी थी।
वकीलों ने मोहिनी के वर्णन पर जिस अंदाज में मेरी सूरत देखी इससे यही साबित होता था कि वह मुझे मानसिक रोगी समझ रहे हैं। मैंने उन्हें कसमें खा-खाकर विश्वास दिलाना चाहा तो यह कहकर चले गये कि पेशी पर देखा जाएगा। मगर जब मुकदमा पेश हुआ तो पहले ही दिन पुलिस ने मेरे विरुद्ध जो प्रमाण पेश किए वह अपने आप में ठोस और पक्के थे। कल्लन खां की गवाही ने मेरे वकीलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह मेरे बचाव के लिये क्या करें?
कल्लन खां ने मेरे बारे में विस्तारपूर्वक अदालत को बताया। पुलिस की गवाही खत्म हुई तो मुझे अदालत के सामने पेश किया गया।। मैं सिर झुकाए अपराधियों के कटघरे में आकर खड़ा हो गया। पहले मेरे तीनों वकील मुझसे बारी-बारी प्रश्न करते रहे फिर सरकारी वकील का नम्बर आया तो मैं एक विशेष राय बना चुका था।
“तुम्हारा नाम कुँवर राज ठाकुर है?” सरकारी वकील ने मेरे निकट आते हुए कोमल स्वर में पूछा।
“जी हाँ! मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है।” सरकारी वकील कुछ देर तक मुझसे इधर-उधर के प्रश्न करता रहा। फिर अचानक उसने अपने प्रश्नों का रूप बदला और असली उद्देश्य के ओर आ गया।
“क्या यह गलत है कि शादी से पहले तुम अय्याशी की खातिर हर रात एक औरत या लड़की को अपने मकान पर लाया करते थे?”
मैंने कोई उत्तर देने की बजाय सिर झुका लिया। “तुम्हारी खामोशी इस बात को साबित करती है कि जो कुछ मैंने कहा है, वह गलत नहीं है।” अदालत में आने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं बुरी तरह नर्वस हो चुका था। मुझसे बोला नहीं जा रहा था इसलिए मैं चुपचाप खड़ा था।
“कमला भी यकीनन उन लड़कियों में से एक रही होगी। जिसे पहले तुम बहला-फुसलाकर घर लाए। उसे अपनी हवस का निशाना बनाया और बाद में जब तुम्हें इस बात का खतरा पैदा हुआ कि कमला का बयान तुम्हें एक लम्बी सजा दिलवा सकता है तो तुम उसे चौपाटी ले गये। जहाँ उसका गला घोंटकर जान से मार डाला। बोलो! क्या तुम इस बात से इनकार कर सकोगे?”
मुझे इस प्रश्न की आशा थी और इस प्रश्न का उचित उत्तर मेरी जिन्दगी और मौत का कारण बन सकता था। यह प्रश्न कुछ ऐसे चौंका देने वाले भाव में किया गया था कि मैं पहले तो सिटपिटा गया। मैं एक क्षण खामोश खड़ा रहा। अदालत में क्या कहूँ। मगर मेरी लम्बी खामोशी खतरनाक मोड़ पैदा कर सकती थी। कल्लन खां ने मेरे गुजरे हुए दिनों के सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया। कमला की हत्या से मुझे अपना बचाव असम्भव सा लग रहा था तो मैंने हारे हुए जुआरी की तरह सिर झुकाकर कहा –
“मैं इस बात से इंकार नहीं करूँगा। परन्तु जो कुछ भी हुआ है, उसमें मेरे व्यक्तिगत इरादे का कोई हाथ नहीं था।” मैंने अपने बिखरे हुए हवास पर काबू पाने की कोशिश की और पहले से बनाए प्लान के अन्तर्गत ठहरी हुई आवाज में उत्तर दिया।
“क्या तुम अदालत को यह बताना चाहते हो कि कमला की हत्या और चरणदास को जान से मार डालने की साज़िश में तुम्हारे साथ कुछ और भी जरायम पेशा लोग सम्मिलित थे?”
“नहीं!” मैंने नज़र उठाकर अदालत में बैठे लोगों को देखा फिर बोला। “मेरे साथ कोई दूसरा सम्मलित नहीं था।”
“फिर तुमने कमला को किसके कहने पर कत्ल किया था?”
मैंने बड़े स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया – मोहिनी के।”
“मोहिनी! यह कौन है?”
“वही जिसने चरणदास की हत्या की साज़िश में मुझे फँसा दिया है।”
“लेकिन यह है कौन?” सरकारी वकील ने बिगड़े हुए स्वर से पूछा।
“आप विश्वास नहीं करोगे मगर वह एक रहस्यमय अस्तित्व है।” मैंने होंठ चबाते हुए उत्तर दिया फिर कमला की हत्या से लेकर गिरफ्तारी तक कि तमाम घटनाएँ दोहरा डालीं।
डॉली के मंगेतर की हत्या का इकबाल करना इस अवसर पर उचित नहीं था। अपनी दौलत के सम्बन्ध में भी बहुत सी बातें गोल कर गया। मेरा बयान समाप्त हुआ तो अदालत में खुसर-फुसर शुरू हो गयी। हर आदमी मुझे यूँ हैरत से आँखें फाड़े देख रहा था जैसे स्वयं मेरा अस्तित्व भी उनके लिये कोई रहस्यमय महत्व रखता हो। कुछ क्षणों तक सरकारी वकील भी मेरे चेहरे को ताकता रहा फिर ऊँची आवाज में बोला –
“मिस्टर राज, तुमने जिस सफाई से, जिस कुशलता के साथ एक सुंदर कहानी बनायी है, उसकी दाद दी जा सकती है। इस प्रकार तुम अपने-आपको दीवाना या पागल सिद्ध करके अदालत से रहम माँगना चाहते हो।”
“आप जो चाहें निर्णय निकाल सकते हैं। मैं आपसे एकबार फिर यही कहूँगा कि मैंने आपसे मोहिनी के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा है, उसका एक-एक शब्द सच है।” मैं संभलकर बोल रहा था।
“क्या इस समय भी मोहिनी तुम्हारे सिर पर मौजूद है?” सरकारी वकील ने मुस्कुराकर पूछा।
“जी नहीं!”
“तुमने उसे किस प्रकार महसूस किया? मेरा मतलब उसकी सूरत-शक्ल से?”
“एक खूबसूरत जवान और हसीन लड़की की सूरत में, जिसका अस्तित्व केवल उसी स्थिति में बना रह सकता है कि उसे इन्सानी खून प्राप्त होता रहे। मुझे पता है कि कोई भी इस युग में ऐसे रहस्यमय अस्तित्व पर विश्वास नहीं करेगा, परन्तु मैं गीता पर हाथ रखकर यह सब कुछ कह रहा हूँ।”
“बहुत अच्छे! गोया तुमने महज मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को जिंदा रखने की खातिर उसकी इच्छा पर कमला की हत्या की थी?” वकील के स्वर में व्यंग्य था।
“हाँ! यदि मैं ऐसा न करता तो मोहिनी यकीनन मुझे किसी मुसीबत में फँसा देती। मैं उसकी रहस्यमय शक्ति के करिश्में देख चुका था। इसलिए उसके संकेत पर चलने के लिये मजबूर था।”
“चरणदास की हत्या के सिलसिले में भी क्या तुम मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को दोषी ठहराने की कोशिश करोगे?” सरकारी वकील ने कड़वे स्वर में प्रश्न किया।
“हाँ! मुझे विश्वास है कि यह सब कुछ मोहिनी की शरारत है।”
“मीलार्ड!” सरकारी वकील ने अदालत को सम्बोधित करके कहना शुरू किया। “मुजरिम कुँवर राज ठाकुर अदालत के सामने कमला का हत्यारा होने का इकबाल कर चुका है। इसके पास चूँकि पुलिस की तरफ से कोई पेश किए जाने वाले ठोस प्रमाण और गवाहों से बचने का कोई अच्छा तरीका न था, इसलिए मुजरिम एक काल्पनिक रहस्यमय अस्तित्व की आड़ लेकर स्वयं को अदालत से दया का पात्र प्रमाणित करने की चेष्टा कर रहा है। लेकिन मैं अदालत से यह प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम को रियायत या किसी हमदर्दी का पात्र न समझा जाए, इसलिए कि मोहिनी का नाम जो मात्र एक कल्पना है और मुजरिम के मस्तिष्क की पैदावार है। कोई भी गंभीर व्यक्ति इन बेकार की बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मुजरिम कुँवर राज ठाकुर ने कमला की हत्या करने के बाद अपने बयान में जोर करने की खातिर चरणदास की मौत का जिम्मेदार होने से इंकार कर दिया है। जबकि कल्लन खां रंगे हाथ मौका-ए-वारदात पर गिरफ्तार हुआ है। और उसने इस बात का इकबाल भी कर लिया है कि चरणदास की हत्या उसके हाथों से हुई, परन्तु हत्या की उस साज़िश में कुँवर राज भी बराबर का जिम्मेदार है। इसलिए कि उसने हत्यारे कल्लन खां को दस हजार रूपए महज इसलिए दिए कि चरणदास जो कमला के सिलसिले में एकमात्र खतरा था और उसे बीच से सदा-सदा के लिये हटा दिया जाए।
“पुलिस के तमाम सबूतों और गवाहों के बयानात की रोशनी में, मैं अदालत से प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम कुँवर राज ठाकुर को फाँसी का हुक्म दिया जाए।”
सरकारी वकील ने अपनी जोश भरी तकरीर खत्म किए तो मेरे तीनों वकील उठ खड़े हुए। उन्होंने सरकारी वकील के सुझाव पर विरोध प्रकट किया। उन्होंने मुझे हर तरीके से बचाने की कोशिश की; और उन दस हजार रुपयों के बारे में बहस की कि वह कल्लन खां को कब, कहाँ और किस सूरत में अदा किए गये थे। मेरे वकीलों ने इस बात पर भी जोर दिया कि कत्ल का असली उद्देश्य क्या है? उन्होंने लम्बी बहस के बाद अदालत में ये साबित करने पर मजबूर किया कि मेरा मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। हालात ने मेरे मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर डाला है जिसके कारण मैं इधर-उधर की हाँक रहा हूँ। इसलिए सबसे पहले किसी कुशल डॉक्टर से मेरी मानसिक स्थिति की जाँच करवाई जाए और उसके बाद कोई फैसला किया जाए।
मैं एक खामोश दर्शक के समान चुपचाप खड़ा अपने वकीलों द्वारा प्रस्तुत किए हुए तर्क सुनता रहा और दिल ही दिल में इस अत्याचार पर मातम करता रहा। मुझे एक अजीब और परिहासजनक स्थिति में फँसा दिया था। एक बार तो मेरे दिल में आया कि मैं मोहिनी के अस्तित्व से इनकार करके अपना जुर्म मान लूँ और फाँसी के फंदे को खुशी-खुशी अपने गले में डाल लूँ। ताकि इस जीवन से छुटकारा मिल जाए । जो अब मेरे लिये नरक बन चुका है। परन्तु डॉली के विचार ने मुझे उस खतरनाक इरादे से अलग रखा।
सरकारी वकील और मेरे वकीलों के बीच काफी देर तक गरमागरम तकरार होती रही फिर अदालत ने मेरे वकीलों की बात मानते हुए यह हुक्म सुनाया कि पहले मेरे मस्तिष्क की जाँच हो सके कि मैं किसी मस्तिष्क की खराबी की बीमारी में तो नहीं हूँ। या जानबूझकर पागलपन की बातें कर रहा हूँ।
उसके बाद केस दूसरी तारीख को पेश करने का हुक्म मिला। इसलिए दूसरे ही दिन मुझे मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया, जिसमें तीन डॉक्टर थे। उन तीनों में से एक पारसी डॉक्टर काउसजी मेरा जानने वाला भी था, परन्तु मैंने जानबूझकर डॉक्टरों की उपस्थिति में उससे अपनी जान-पहचान करना उचित नहीं समझा| पाँच-छः घंटों तक मुझे डॉक्टरों ने उलझाए रखा। मस्तिष्क के विशेषज्ञों ने नाना प्रकार की मशीन के माध्यम से मेरे दिमाग का जायजा लिया| फिर जब मुझे इन मशीनों से छुटकारा मिला तो विशेषज्ञों ने मुझसे विभिन्न प्रकार के प्रश्न किए जिसका उत्तर मैंने बड़े चैन के साथ दिया। अंत में मैंने उन तीनों को भी यह विश्वास दिलाने कि कोशिश की कि मेरी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक है। लेकिन उसके साथ ही जो कुछ मैंने मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के बारे में कहा, वह भी गलत नहीं है|
विशेषज्ञों ने मेरी स्थिति के सम्बन्ध में क्या निर्णय निकाला था इसका इल्म मुझे दूसरी पेशी पर हो गया था। मुझे हर प्रकार से स्वस्थ बताया गया था इसलिए मुक़दमे की कार्यवाही दुबारा शुरू हुई।
मेरे तीनों वकीलों ने मुझे बचाने की जान-तोड़ कोशिश की, परन्तु इस बीच में पुलिस वालों ने दो-चार ऐसे और प्रमाण भी एकत्रित कर लिये जिसके आगे मेरे वकीलों की एक न चली। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं अपने उसी बयान पर कायम रहा कि कमला और चरणदास दोनों की हत्याओं में रहस्यमय शक्ति मोहिनी का हाथ है।
मुक़दमे की पेशियाँ चार महीने तक होती रहीं। इस बीच में डॉली ने कई बार मुझसे मुलाक़ात की और मुझे विश्वास दिलाया कि वह अपनी पहुँच का भी प्रयोग कर रही है। उसे मेरे बचने की पूरी आशा है लेकिन उसकी यह खुशफहमी अधिक दिनों तक न रह सकी। इसलिए कि मुकदमा का फैसला मेरे विरुद्ध सुनाया गया।
मुक़दमे को पेचीदा और अधिक उलझावदार बनाने की कोशिश में मेरे वकील केवल इस सीमा तक सफल हुए कि अदालत ने मेरे साथ रियायत कर दी और फाँसी की बजाय मुझे चौदह साल की बामुशक्कत सज़ा सुना दी।
☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
बहरहाल मैं अपने निर्णय पर कायम रहा। और अन्तिम समय तक यही कहता रहा कि कमला और चरणदास की हत्या से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। एक सप्ताह बाद मुझे दोबारा अदालत के सामने पेश किया गया। जहाँ से मुझे जेल भेज दिया गया। जेल पहुँचकर मैंने किसी कदर चैन की साँस ली। इसलिए कि यहाँ कम से कम अब मुझे किसी कठोरता का अंदेशा नहीं था। अपने बचाव के लिये मैंने एक की बजाय तीन-तीन वकील खड़े कर दिए थे। वकीलों ने अब मुझसे हालात पूछे तो उन्हें साफ-साफ बता दिया कि आज तक जो कुछ हुआ है उन तमाम घटनाओं की जिम्मेदारी मुझ पर नहीं बल्कि मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व पर है। वह मोहिनी जो मेरे सिर सवार हो गयी थी।
वकीलों ने मोहिनी के वर्णन पर जिस अंदाज में मेरी सूरत देखी इससे यही साबित होता था कि वह मुझे मानसिक रोगी समझ रहे हैं। मैंने उन्हें कसमें खा-खाकर विश्वास दिलाना चाहा तो यह कहकर चले गये कि पेशी पर देखा जाएगा। मगर जब मुकदमा पेश हुआ तो पहले ही दिन पुलिस ने मेरे विरुद्ध जो प्रमाण पेश किए वह अपने आप में ठोस और पक्के थे। कल्लन खां की गवाही ने मेरे वकीलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह मेरे बचाव के लिये क्या करें?
कल्लन खां ने मेरे बारे में विस्तारपूर्वक अदालत को बताया। पुलिस की गवाही खत्म हुई तो मुझे अदालत के सामने पेश किया गया।। मैं सिर झुकाए अपराधियों के कटघरे में आकर खड़ा हो गया। पहले मेरे तीनों वकील मुझसे बारी-बारी प्रश्न करते रहे फिर सरकारी वकील का नम्बर आया तो मैं एक विशेष राय बना चुका था।
“तुम्हारा नाम कुँवर राज ठाकुर है?” सरकारी वकील ने मेरे निकट आते हुए कोमल स्वर में पूछा।
“जी हाँ! मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है।” सरकारी वकील कुछ देर तक मुझसे इधर-उधर के प्रश्न करता रहा। फिर अचानक उसने अपने प्रश्नों का रूप बदला और असली उद्देश्य के ओर आ गया।
“क्या यह गलत है कि शादी से पहले तुम अय्याशी की खातिर हर रात एक औरत या लड़की को अपने मकान पर लाया करते थे?”
मैंने कोई उत्तर देने की बजाय सिर झुका लिया। “तुम्हारी खामोशी इस बात को साबित करती है कि जो कुछ मैंने कहा है, वह गलत नहीं है।” अदालत में आने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं बुरी तरह नर्वस हो चुका था। मुझसे बोला नहीं जा रहा था इसलिए मैं चुपचाप खड़ा था।
“कमला भी यकीनन उन लड़कियों में से एक रही होगी। जिसे पहले तुम बहला-फुसलाकर घर लाए। उसे अपनी हवस का निशाना बनाया और बाद में जब तुम्हें इस बात का खतरा पैदा हुआ कि कमला का बयान तुम्हें एक लम्बी सजा दिलवा सकता है तो तुम उसे चौपाटी ले गये। जहाँ उसका गला घोंटकर जान से मार डाला। बोलो! क्या तुम इस बात से इनकार कर सकोगे?”
मुझे इस प्रश्न की आशा थी और इस प्रश्न का उचित उत्तर मेरी जिन्दगी और मौत का कारण बन सकता था। यह प्रश्न कुछ ऐसे चौंका देने वाले भाव में किया गया था कि मैं पहले तो सिटपिटा गया। मैं एक क्षण खामोश खड़ा रहा। अदालत में क्या कहूँ। मगर मेरी लम्बी खामोशी खतरनाक मोड़ पैदा कर सकती थी। कल्लन खां ने मेरे गुजरे हुए दिनों के सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया। कमला की हत्या से मुझे अपना बचाव असम्भव सा लग रहा था तो मैंने हारे हुए जुआरी की तरह सिर झुकाकर कहा –
“मैं इस बात से इंकार नहीं करूँगा। परन्तु जो कुछ भी हुआ है, उसमें मेरे व्यक्तिगत इरादे का कोई हाथ नहीं था।” मैंने अपने बिखरे हुए हवास पर काबू पाने की कोशिश की और पहले से बनाए प्लान के अन्तर्गत ठहरी हुई आवाज में उत्तर दिया।
“क्या तुम अदालत को यह बताना चाहते हो कि कमला की हत्या और चरणदास को जान से मार डालने की साज़िश में तुम्हारे साथ कुछ और भी जरायम पेशा लोग सम्मिलित थे?”
“नहीं!” मैंने नज़र उठाकर अदालत में बैठे लोगों को देखा फिर बोला। “मेरे साथ कोई दूसरा सम्मलित नहीं था।”
“फिर तुमने कमला को किसके कहने पर कत्ल किया था?”
मैंने बड़े स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया – मोहिनी के।”
“मोहिनी! यह कौन है?”
“वही जिसने चरणदास की हत्या की साज़िश में मुझे फँसा दिया है।”
“लेकिन यह है कौन?” सरकारी वकील ने बिगड़े हुए स्वर से पूछा।
“आप विश्वास नहीं करोगे मगर वह एक रहस्यमय अस्तित्व है।” मैंने होंठ चबाते हुए उत्तर दिया फिर कमला की हत्या से लेकर गिरफ्तारी तक कि तमाम घटनाएँ दोहरा डालीं।
डॉली के मंगेतर की हत्या का इकबाल करना इस अवसर पर उचित नहीं था। अपनी दौलत के सम्बन्ध में भी बहुत सी बातें गोल कर गया। मेरा बयान समाप्त हुआ तो अदालत में खुसर-फुसर शुरू हो गयी। हर आदमी मुझे यूँ हैरत से आँखें फाड़े देख रहा था जैसे स्वयं मेरा अस्तित्व भी उनके लिये कोई रहस्यमय महत्व रखता हो। कुछ क्षणों तक सरकारी वकील भी मेरे चेहरे को ताकता रहा फिर ऊँची आवाज में बोला –
“मिस्टर राज, तुमने जिस सफाई से, जिस कुशलता के साथ एक सुंदर कहानी बनायी है, उसकी दाद दी जा सकती है। इस प्रकार तुम अपने-आपको दीवाना या पागल सिद्ध करके अदालत से रहम माँगना चाहते हो।”
“आप जो चाहें निर्णय निकाल सकते हैं। मैं आपसे एकबार फिर यही कहूँगा कि मैंने आपसे मोहिनी के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा है, उसका एक-एक शब्द सच है।” मैं संभलकर बोल रहा था।
“क्या इस समय भी मोहिनी तुम्हारे सिर पर मौजूद है?” सरकारी वकील ने मुस्कुराकर पूछा।
“जी नहीं!”
“तुमने उसे किस प्रकार महसूस किया? मेरा मतलब उसकी सूरत-शक्ल से?”
“एक खूबसूरत जवान और हसीन लड़की की सूरत में, जिसका अस्तित्व केवल उसी स्थिति में बना रह सकता है कि उसे इन्सानी खून प्राप्त होता रहे। मुझे पता है कि कोई भी इस युग में ऐसे रहस्यमय अस्तित्व पर विश्वास नहीं करेगा, परन्तु मैं गीता पर हाथ रखकर यह सब कुछ कह रहा हूँ।”
“बहुत अच्छे! गोया तुमने महज मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को जिंदा रखने की खातिर उसकी इच्छा पर कमला की हत्या की थी?” वकील के स्वर में व्यंग्य था।
“हाँ! यदि मैं ऐसा न करता तो मोहिनी यकीनन मुझे किसी मुसीबत में फँसा देती। मैं उसकी रहस्यमय शक्ति के करिश्में देख चुका था। इसलिए उसके संकेत पर चलने के लिये मजबूर था।”
“चरणदास की हत्या के सिलसिले में भी क्या तुम मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को दोषी ठहराने की कोशिश करोगे?” सरकारी वकील ने कड़वे स्वर में प्रश्न किया।
“हाँ! मुझे विश्वास है कि यह सब कुछ मोहिनी की शरारत है।”
“मीलार्ड!” सरकारी वकील ने अदालत को सम्बोधित करके कहना शुरू किया। “मुजरिम कुँवर राज ठाकुर अदालत के सामने कमला का हत्यारा होने का इकबाल कर चुका है। इसके पास चूँकि पुलिस की तरफ से कोई पेश किए जाने वाले ठोस प्रमाण और गवाहों से बचने का कोई अच्छा तरीका न था, इसलिए मुजरिम एक काल्पनिक रहस्यमय अस्तित्व की आड़ लेकर स्वयं को अदालत से दया का पात्र प्रमाणित करने की चेष्टा कर रहा है। लेकिन मैं अदालत से यह प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम को रियायत या किसी हमदर्दी का पात्र न समझा जाए, इसलिए कि मोहिनी का नाम जो मात्र एक कल्पना है और मुजरिम के मस्तिष्क की पैदावार है। कोई भी गंभीर व्यक्ति इन बेकार की बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मुजरिम कुँवर राज ठाकुर ने कमला की हत्या करने के बाद अपने बयान में जोर करने की खातिर चरणदास की मौत का जिम्मेदार होने से इंकार कर दिया है। जबकि कल्लन खां रंगे हाथ मौका-ए-वारदात पर गिरफ्तार हुआ है। और उसने इस बात का इकबाल भी कर लिया है कि चरणदास की हत्या उसके हाथों से हुई, परन्तु हत्या की उस साज़िश में कुँवर राज भी बराबर का जिम्मेदार है। इसलिए कि उसने हत्यारे कल्लन खां को दस हजार रूपए महज इसलिए दिए कि चरणदास जो कमला के सिलसिले में एकमात्र खतरा था और उसे बीच से सदा-सदा के लिये हटा दिया जाए।
“पुलिस के तमाम सबूतों और गवाहों के बयानात की रोशनी में, मैं अदालत से प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम कुँवर राज ठाकुर को फाँसी का हुक्म दिया जाए।”
सरकारी वकील ने अपनी जोश भरी तकरीर खत्म किए तो मेरे तीनों वकील उठ खड़े हुए। उन्होंने सरकारी वकील के सुझाव पर विरोध प्रकट किया। उन्होंने मुझे हर तरीके से बचाने की कोशिश की; और उन दस हजार रुपयों के बारे में बहस की कि वह कल्लन खां को कब, कहाँ और किस सूरत में अदा किए गये थे। मेरे वकीलों ने इस बात पर भी जोर दिया कि कत्ल का असली उद्देश्य क्या है? उन्होंने लम्बी बहस के बाद अदालत में ये साबित करने पर मजबूर किया कि मेरा मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। हालात ने मेरे मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर डाला है जिसके कारण मैं इधर-उधर की हाँक रहा हूँ। इसलिए सबसे पहले किसी कुशल डॉक्टर से मेरी मानसिक स्थिति की जाँच करवाई जाए और उसके बाद कोई फैसला किया जाए।
मैं एक खामोश दर्शक के समान चुपचाप खड़ा अपने वकीलों द्वारा प्रस्तुत किए हुए तर्क सुनता रहा और दिल ही दिल में इस अत्याचार पर मातम करता रहा। मुझे एक अजीब और परिहासजनक स्थिति में फँसा दिया था। एक बार तो मेरे दिल में आया कि मैं मोहिनी के अस्तित्व से इनकार करके अपना जुर्म मान लूँ और फाँसी के फंदे को खुशी-खुशी अपने गले में डाल लूँ। ताकि इस जीवन से छुटकारा मिल जाए । जो अब मेरे लिये नरक बन चुका है। परन्तु डॉली के विचार ने मुझे उस खतरनाक इरादे से अलग रखा।
सरकारी वकील और मेरे वकीलों के बीच काफी देर तक गरमागरम तकरार होती रही फिर अदालत ने मेरे वकीलों की बात मानते हुए यह हुक्म सुनाया कि पहले मेरे मस्तिष्क की जाँच हो सके कि मैं किसी मस्तिष्क की खराबी की बीमारी में तो नहीं हूँ। या जानबूझकर पागलपन की बातें कर रहा हूँ।
उसके बाद केस दूसरी तारीख को पेश करने का हुक्म मिला। इसलिए दूसरे ही दिन मुझे मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया, जिसमें तीन डॉक्टर थे। उन तीनों में से एक पारसी डॉक्टर काउसजी मेरा जानने वाला भी था, परन्तु मैंने जानबूझकर डॉक्टरों की उपस्थिति में उससे अपनी जान-पहचान करना उचित नहीं समझा| पाँच-छः घंटों तक मुझे डॉक्टरों ने उलझाए रखा। मस्तिष्क के विशेषज्ञों ने नाना प्रकार की मशीन के माध्यम से मेरे दिमाग का जायजा लिया| फिर जब मुझे इन मशीनों से छुटकारा मिला तो विशेषज्ञों ने मुझसे विभिन्न प्रकार के प्रश्न किए जिसका उत्तर मैंने बड़े चैन के साथ दिया। अंत में मैंने उन तीनों को भी यह विश्वास दिलाने कि कोशिश की कि मेरी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक है। लेकिन उसके साथ ही जो कुछ मैंने मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के बारे में कहा, वह भी गलत नहीं है|
विशेषज्ञों ने मेरी स्थिति के सम्बन्ध में क्या निर्णय निकाला था इसका इल्म मुझे दूसरी पेशी पर हो गया था। मुझे हर प्रकार से स्वस्थ बताया गया था इसलिए मुक़दमे की कार्यवाही दुबारा शुरू हुई।
मेरे तीनों वकीलों ने मुझे बचाने की जान-तोड़ कोशिश की, परन्तु इस बीच में पुलिस वालों ने दो-चार ऐसे और प्रमाण भी एकत्रित कर लिये जिसके आगे मेरे वकीलों की एक न चली। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं अपने उसी बयान पर कायम रहा कि कमला और चरणदास दोनों की हत्याओं में रहस्यमय शक्ति मोहिनी का हाथ है।
मुक़दमे की पेशियाँ चार महीने तक होती रहीं। इस बीच में डॉली ने कई बार मुझसे मुलाक़ात की और मुझे विश्वास दिलाया कि वह अपनी पहुँच का भी प्रयोग कर रही है। उसे मेरे बचने की पूरी आशा है लेकिन उसकी यह खुशफहमी अधिक दिनों तक न रह सकी। इसलिए कि मुकदमा का फैसला मेरे विरुद्ध सुनाया गया।
मुक़दमे को पेचीदा और अधिक उलझावदार बनाने की कोशिश में मेरे वकील केवल इस सीमा तक सफल हुए कि अदालत ने मेरे साथ रियायत कर दी और फाँसी की बजाय मुझे चौदह साल की बामुशक्कत सज़ा सुना दी।
☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐