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Fantasy मोहिनी

जिस रोज मुझे गिरफ्तार किया गया था, उसी दिन पुलिस ने मुझे एक स्थानीय अदालत में पेश करके एक हफ्ते का रिमांड हासिल कर लिया। उस एक हफ्ते में मेरे ऊपर क्या गुजरी, यह मेरा दिल ही जानता है। एस.पी. और उसके सिपाहियों ने मुझे जिस प्रकार यातनाएँ दीं और जो अत्याचार मेरे ऊपर ढाये, उसे याद करके आज भी भय से काँप उठता हूँ।

बहरहाल मैं अपने निर्णय पर कायम रहा। और अन्तिम समय तक यही कहता रहा कि कमला और चरणदास की हत्या से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। एक सप्ताह बाद मुझे दोबारा अदालत के सामने पेश किया गया। जहाँ से मुझे जेल भेज दिया गया। जेल पहुँचकर मैंने किसी कदर चैन की साँस ली। इसलिए कि यहाँ कम से कम अब मुझे किसी कठोरता का अंदेशा नहीं था। अपने बचाव के लिये मैंने एक की बजाय तीन-तीन वकील खड़े कर दिए थे। वकीलों ने अब मुझसे हालात पूछे तो उन्हें साफ-साफ बता दिया कि आज तक जो कुछ हुआ है उन तमाम घटनाओं की जिम्मेदारी मुझ पर नहीं बल्कि मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व पर है। वह मोहिनी जो मेरे सिर सवार हो गयी थी।

वकीलों ने मोहिनी के वर्णन पर जिस अंदाज में मेरी सूरत देखी इससे यही साबित होता था कि वह मुझे मानसिक रोगी समझ रहे हैं। मैंने उन्हें कसमें खा-खाकर विश्वास दिलाना चाहा तो यह कहकर चले गये कि पेशी पर देखा जाएगा। मगर जब मुकदमा पेश हुआ तो पहले ही दिन पुलिस ने मेरे विरुद्ध जो प्रमाण पेश किए वह अपने आप में ठोस और पक्के थे। कल्लन खां की गवाही ने मेरे वकीलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह मेरे बचाव के लिये क्या करें?

कल्लन खां ने मेरे बारे में विस्तारपूर्वक अदालत को बताया। पुलिस की गवाही खत्म हुई तो मुझे अदालत के सामने पेश किया गया।। मैं सिर झुकाए अपराधियों के कटघरे में आकर खड़ा हो गया। पहले मेरे तीनों वकील मुझसे बारी-बारी प्रश्न करते रहे फिर सरकारी वकील का नम्बर आया तो मैं एक विशेष राय बना चुका था।

“तुम्हारा नाम कुँवर राज ठाकुर है?” सरकारी वकील ने मेरे निकट आते हुए कोमल स्वर में पूछा।

“जी हाँ! मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है।” सरकारी वकील कुछ देर तक मुझसे इधर-उधर के प्रश्न करता रहा। फिर अचानक उसने अपने प्रश्नों का रूप बदला और असली उद्देश्य के ओर आ गया।

“क्या यह गलत है कि शादी से पहले तुम अय्याशी की खातिर हर रात एक औरत या लड़की को अपने मकान पर लाया करते थे?”

मैंने कोई उत्तर देने की बजाय सिर झुका लिया। “तुम्हारी खामोशी इस बात को साबित करती है कि जो कुछ मैंने कहा है, वह गलत नहीं है।” अदालत में आने का यह मेरा पहला अवसर था। मैं बुरी तरह नर्वस हो चुका था। मुझसे बोला नहीं जा रहा था इसलिए मैं चुपचाप खड़ा था।

“कमला भी यकीनन उन लड़कियों में से एक रही होगी। जिसे पहले तुम बहला-फुसलाकर घर लाए। उसे अपनी हवस का निशाना बनाया और बाद में जब तुम्हें इस बात का खतरा पैदा हुआ कि कमला का बयान तुम्हें एक लम्बी सजा दिलवा सकता है तो तुम उसे चौपाटी ले गये। जहाँ उसका गला घोंटकर जान से मार डाला। बोलो! क्या तुम इस बात से इनकार कर सकोगे?”

मुझे इस प्रश्न की आशा थी और इस प्रश्न का उचित उत्तर मेरी जिन्दगी और मौत का कारण बन सकता था। यह प्रश्न कुछ ऐसे चौंका देने वाले भाव में किया गया था कि मैं पहले तो सिटपिटा गया। मैं एक क्षण खामोश खड़ा रहा। अदालत में क्या कहूँ। मगर मेरी लम्बी खामोशी खतरनाक मोड़ पैदा कर सकती थी। कल्लन खां ने मेरे गुजरे हुए दिनों के सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया। कमला की हत्या से मुझे अपना बचाव असम्भव सा लग रहा था तो मैंने हारे हुए जुआरी की तरह सिर झुकाकर कहा –

“मैं इस बात से इंकार नहीं करूँगा। परन्तु जो कुछ भी हुआ है, उसमें मेरे व्यक्तिगत इरादे का कोई हाथ नहीं था।” मैंने अपने बिखरे हुए हवास पर काबू पाने की कोशिश की और पहले से बनाए प्लान के अन्तर्गत ठहरी हुई आवाज में उत्तर दिया।

“क्या तुम अदालत को यह बताना चाहते हो कि कमला की हत्या और चरणदास को जान से मार डालने की साज़िश में तुम्हारे साथ कुछ और भी जरायम पेशा लोग सम्मिलित थे?”

“नहीं!” मैंने नज़र उठाकर अदालत में बैठे लोगों को देखा फिर बोला। “मेरे साथ कोई दूसरा सम्मलित नहीं था।”

“फिर तुमने कमला को किसके कहने पर कत्ल किया था?”

मैंने बड़े स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया – मोहिनी के।”

“मोहिनी! यह कौन है?”

“वही जिसने चरणदास की हत्या की साज़िश में मुझे फँसा दिया है।”

“लेकिन यह है कौन?” सरकारी वकील ने बिगड़े हुए स्वर से पूछा।

“आप विश्वास नहीं करोगे मगर वह एक रहस्यमय अस्तित्व है।” मैंने होंठ चबाते हुए उत्तर दिया फिर कमला की हत्या से लेकर गिरफ्तारी तक कि तमाम घटनाएँ दोहरा डालीं।

डॉली के मंगेतर की हत्या का इकबाल करना इस अवसर पर उचित नहीं था। अपनी दौलत के सम्बन्ध में भी बहुत सी बातें गोल कर गया। मेरा बयान समाप्त हुआ तो अदालत में खुसर-फुसर शुरू हो गयी। हर आदमी मुझे यूँ हैरत से आँखें फाड़े देख रहा था जैसे स्वयं मेरा अस्तित्व भी उनके लिये कोई रहस्यमय महत्व रखता हो। कुछ क्षणों तक सरकारी वकील भी मेरे चेहरे को ताकता रहा फिर ऊँची आवाज में बोला –

“मिस्टर राज, तुमने जिस सफाई से, जिस कुशलता के साथ एक सुंदर कहानी बनायी है, उसकी दाद दी जा सकती है। इस प्रकार तुम अपने-आपको दीवाना या पागल सिद्ध करके अदालत से रहम माँगना चाहते हो।”

“आप जो चाहें निर्णय निकाल सकते हैं। मैं आपसे एकबार फिर यही कहूँगा कि मैंने आपसे मोहिनी के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा है, उसका एक-एक शब्द सच है।” मैं संभलकर बोल रहा था।

“क्या इस समय भी मोहिनी तुम्हारे सिर पर मौजूद है?” सरकारी वकील ने मुस्कुराकर पूछा।

“जी नहीं!”

“तुमने उसे किस प्रकार महसूस किया? मेरा मतलब उसकी सूरत-शक्ल से?”

“एक खूबसूरत जवान और हसीन लड़की की सूरत में, जिसका अस्तित्व केवल उसी स्थिति में बना रह सकता है कि उसे इन्सानी खून प्राप्त होता रहे। मुझे पता है कि कोई भी इस युग में ऐसे रहस्यमय अस्तित्व पर विश्वास नहीं करेगा, परन्तु मैं गीता पर हाथ रखकर यह सब कुछ कह रहा हूँ।”

“बहुत अच्छे! गोया तुमने महज मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को जिंदा रखने की खातिर उसकी इच्छा पर कमला की हत्या की थी?” वकील के स्वर में व्यंग्य था।

“हाँ! यदि मैं ऐसा न करता तो मोहिनी यकीनन मुझे किसी मुसीबत में फँसा देती। मैं उसकी रहस्यमय शक्ति के करिश्में देख चुका था। इसलिए उसके संकेत पर चलने के लिये मजबूर था।”

“चरणदास की हत्या के सिलसिले में भी क्या तुम मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को दोषी ठहराने की कोशिश करोगे?” सरकारी वकील ने कड़वे स्वर में प्रश्न किया।

“हाँ! मुझे विश्वास है कि यह सब कुछ मोहिनी की शरारत है।”

“मीलार्ड!” सरकारी वकील ने अदालत को सम्बोधित करके कहना शुरू किया। “मुजरिम कुँवर राज ठाकुर अदालत के सामने कमला का हत्यारा होने का इकबाल कर चुका है। इसके पास चूँकि पुलिस की तरफ से कोई पेश किए जाने वाले ठोस प्रमाण और गवाहों से बचने का कोई अच्छा तरीका न था, इसलिए मुजरिम एक काल्पनिक रहस्यमय अस्तित्व की आड़ लेकर स्वयं को अदालत से दया का पात्र प्रमाणित करने की चेष्टा कर रहा है। लेकिन मैं अदालत से यह प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम को रियायत या किसी हमदर्दी का पात्र न समझा जाए, इसलिए कि मोहिनी का नाम जो मात्र एक कल्पना है और मुजरिम के मस्तिष्क की पैदावार है। कोई भी गंभीर व्यक्ति इन बेकार की बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मुजरिम कुँवर राज ठाकुर ने कमला की हत्या करने के बाद अपने बयान में जोर करने की खातिर चरणदास की मौत का जिम्मेदार होने से इंकार कर दिया है। जबकि कल्लन खां रंगे हाथ मौका-ए-वारदात पर गिरफ्तार हुआ है। और उसने इस बात का इकबाल भी कर लिया है कि चरणदास की हत्या उसके हाथों से हुई, परन्तु हत्या की उस साज़िश में कुँवर राज भी बराबर का जिम्मेदार है। इसलिए कि उसने हत्यारे कल्लन खां को दस हजार रूपए महज इसलिए दिए कि चरणदास जो कमला के सिलसिले में एकमात्र खतरा था और उसे बीच से सदा-सदा के लिये हटा दिया जाए।

“पुलिस के तमाम सबूतों और गवाहों के बयानात की रोशनी में, मैं अदालत से प्रार्थना करता हूँ कि मुजरिम कुँवर राज ठाकुर को फाँसी का हुक्म दिया जाए।”

सरकारी वकील ने अपनी जोश भरी तकरीर खत्म किए तो मेरे तीनों वकील उठ खड़े हुए। उन्होंने सरकारी वकील के सुझाव पर विरोध प्रकट किया। उन्होंने मुझे हर तरीके से बचाने की कोशिश की; और उन दस हजार रुपयों के बारे में बहस की कि वह कल्लन खां को कब, कहाँ और किस सूरत में अदा किए गये थे। मेरे वकीलों ने इस बात पर भी जोर दिया कि कत्ल का असली उद्देश्य क्या है? उन्होंने लम्बी बहस के बाद अदालत में ये साबित करने पर मजबूर किया कि मेरा मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। हालात ने मेरे मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर डाला है जिसके कारण मैं इधर-उधर की हाँक रहा हूँ। इसलिए सबसे पहले किसी कुशल डॉक्टर से मेरी मानसिक स्थिति की जाँच करवाई जाए और उसके बाद कोई फैसला किया जाए।

मैं एक खामोश दर्शक के समान चुपचाप खड़ा अपने वकीलों द्वारा प्रस्तुत किए हुए तर्क सुनता रहा और दिल ही दिल में इस अत्याचार पर मातम करता रहा। मुझे एक अजीब और परिहासजनक स्थिति में फँसा दिया था। एक बार तो मेरे दिल में आया कि मैं मोहिनी के अस्तित्व से इनकार करके अपना जुर्म मान लूँ और फाँसी के फंदे को खुशी-खुशी अपने गले में डाल लूँ। ताकि इस जीवन से छुटकारा मिल जाए । जो अब मेरे लिये नरक बन चुका है। परन्तु डॉली के विचार ने मुझे उस खतरनाक इरादे से अलग रखा।

सरकारी वकील और मेरे वकीलों के बीच काफी देर तक गरमागरम तकरार होती रही फिर अदालत ने मेरे वकीलों की बात मानते हुए यह हुक्म सुनाया कि पहले मेरे मस्तिष्क की जाँच हो सके कि मैं किसी मस्तिष्क की खराबी की बीमारी में तो नहीं हूँ। या जानबूझकर पागलपन की बातें कर रहा हूँ।

उसके बाद केस दूसरी तारीख को पेश करने का हुक्म मिला। इसलिए दूसरे ही दिन मुझे मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया, जिसमें तीन डॉक्टर थे। उन तीनों में से एक पारसी डॉक्टर काउसजी मेरा जानने वाला भी था, परन्तु मैंने जानबूझकर डॉक्टरों की उपस्थिति में उससे अपनी जान-पहचान करना उचित नहीं समझा| पाँच-छः घंटों तक मुझे डॉक्टरों ने उलझाए रखा। मस्तिष्क के विशेषज्ञों ने नाना प्रकार की मशीन के माध्यम से मेरे दिमाग का जायजा लिया| फिर जब मुझे इन मशीनों से छुटकारा मिला तो विशेषज्ञों ने मुझसे विभिन्न प्रकार के प्रश्न किए जिसका उत्तर मैंने बड़े चैन के साथ दिया। अंत में मैंने उन तीनों को भी यह विश्वास दिलाने कि कोशिश की कि मेरी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक है। लेकिन उसके साथ ही जो कुछ मैंने मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के बारे में कहा, वह भी गलत नहीं है|

विशेषज्ञों ने मेरी स्थिति के सम्बन्ध में क्या निर्णय निकाला था इसका इल्म मुझे दूसरी पेशी पर हो गया था। मुझे हर प्रकार से स्वस्थ बताया गया था इसलिए मुक़दमे की कार्यवाही दुबारा शुरू हुई।

मेरे तीनों वकीलों ने मुझे बचाने की जान-तोड़ कोशिश की, परन्तु इस बीच में पुलिस वालों ने दो-चार ऐसे और प्रमाण भी एकत्रित कर लिये जिसके आगे मेरे वकीलों की एक न चली। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं अपने उसी बयान पर कायम रहा कि कमला और चरणदास दोनों की हत्याओं में रहस्यमय शक्ति मोहिनी का हाथ है।

मुक़दमे की पेशियाँ चार महीने तक होती रहीं। इस बीच में डॉली ने कई बार मुझसे मुलाक़ात की और मुझे विश्वास दिलाया कि वह अपनी पहुँच का भी प्रयोग कर रही है। उसे मेरे बचने की पूरी आशा है लेकिन उसकी यह खुशफहमी अधिक दिनों तक न रह सकी। इसलिए कि मुकदमा का फैसला मेरे विरुद्ध सुनाया गया।

मुक़दमे को पेचीदा और अधिक उलझावदार बनाने की कोशिश में मेरे वकील केवल इस सीमा तक सफल हुए कि अदालत ने मेरे साथ रियायत कर दी और फाँसी की बजाय मुझे चौदह साल की बामुशक्कत सज़ा सुना दी।

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जिस दिन मुक़दमे का निर्णय होने वाला था, उस दिन डॉली भी अदालत में मौजूद थी। उसे पूरी आशा थी कि मैं बच जाऊँगा लेकिन जिस समय मुझे सजा का हुक्म सुनाया गया, डॉली की हालत एकदम बिगड़ गयी। मैंने उसे दिलासा देनी चाही, लेकिन सिपाहियों ने मुझे इसकी आज्ञा न दी और मुझे कैदियों वाली लारी में ठूँसकर जेल पहुँचा दिया गया।

जिस कैदखाने में मुझे रात गुजारनी पड़ती थी, वहाँ अधिकतर खतरनाक कैदियों को बंद किया जाता था। दिन भर सन्तरी मुझे कोल्हू के बैल की तरह जोते रहते और रात को मुझे उसी बैरक में गुजारना पड़ा जहाँ पूरी रात रो-रोकर गुजार देता था और दिल ही दिल में मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को गालियाँ बकता था, जिसने मुझे मुसीबत में फँसा दिया था और खुद न जाने कहाँ गायब हो गयी थी। फिर भी मुझे इस बात से ख़ुशी थी कि मोहिनी ने मेरा पीछा छोड़ दिया और जब मैं अपनी क़ैद पूरी करके बाहर जाऊँगा तो वह मुझे दुबारा जुर्म करने पर न उकसाएगी।

जिस रोज मुझे सज़ा सुनायी गयी थी, उसके सातवें दिन डॉली मुझसे मुलाक़ात करने आयी। न जाने उस पतिव्रता स्त्री ने किन-किन कठिनाइयों के बाद मुझसे मिलने की आज्ञा प्राप्त की होगी। हम दोनों आमने-सामने आये तो मैंने शर्मिन्दगी से अपनी दृष्टि झुका ली। एक सन्तरी बराबर हमारे सिर पर मौजूद था।

“चिन्ता मत करो राज!” डॉली ने मुझे रुंधी आवाज़ में दिलासा देते हुए कहा। “मैंने वकीलों से मशविरा किया है, हो सकता है कि अपील में आपकी सजा कुछ कम हो जाए।”

“अपील इत्यादि करने का कोई लाभ न होगा डॉली।” मैंने रुंधी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। “तुम कहाँ-कहाँ धक्के खाती फिरोगी।”

“मायूसी की बात क्यों करते हैं आप? भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा।” डॉली जल्दी से बोली। “आपको यह सुनकर ख़ुशी होगी कि मैंने हर हफ्ते आपसे मुलाक़ात करने की आज्ञा ले ली है।”

“डॉली, एक बात कहूँ?”

“ कहिये! मगर उदास बातें न कीजिए।”

“मेरी मानो तो अब तुम वापिस अपने माता-पिता के पास चली जाओ। यहाँ रहकर तुम्हें मुसीबत ही होगी।”

“क्या आपका दिल चाहेगा कि मैं आपसे दूर हो जाऊँ?” डॉली ने भीगी-भीगी पलकों से जिस प्रार्थना भरी दृष्टि से मेरी तरफ देखा उससे मेरा दिल तड़पकर रह गया। बहुत सहन करने के बावजूद मैं अनायास रो पड़ा।

“आपको मेरी कसम जो रोये...।” डॉली ने अपने आँसू पोंछते हुए जल्दी से कहा। “अब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी गुजरते देर न लगेगी। फिर यह भी तो सोचिये कि आपको छोड़कर भला मैं कहाँ खुश रह सकती हूँ।”

“मुझे दुख है डॉली। मैंने तुम्हें कोई सुख न दे सका।”

“भगवान के लिये मुझे और पापी न बनाइये। आप जैसे भी हैं मेरे हैं।”

ठीक दस मिनट बाद सन्तरी ने हम दोनों को अलग होने का हुक्म दिया, इसलिए कि मुलाक़ात का समय समाप्त हो चुका था। उस समय मेरे दिल पर क्या गुजरी इसका अनुमान मेरे अलावा कोई दूसरा नहीं लगा सकता था। बहरहाल मैं बेबस, मजबूर अपने दिल पर पत्थर रखकर वापिस अपनी बैरक में आ गया जहाँ मेरी ज़िन्दगी की विरानियाँ मेरी प्रतीक्षा में थीं।

उस रात मैं बेहद बेचैन रहा और डॉली को याद कर के आँसू बहाता रहा कि किस समय नींद का झोंका मुझ पर सवार हुआ, मुझे कुछ याद नहीं। हाँ, इतना जरूर याद है कि जब दूसरी बार मेरी आँख खुली तो उस समय मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा था। कदाचित दर्द की तेजी के कारण ही मेरी आँख खुली थी। मैंने फर्श पर बिछे खुरदरे कम्बल पर करवट बदली और दुबारा सो जाने की चेष्टा में आँखें बंद कर लीं परन्तु फिर तुरन्त हड़बड़ाकर उठ बैठा।

इस बार मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई छिपकली मेरे सिर पर रेंग रही हो। मैं चौंक पड़ा। मुझे मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व महसूस हुआ तो जेल की सलाखों में पड़े होने के बावजूद काँप उठा।

मोहिनी जिसने मुझे दीपक की हत्या पर आमदा करके मेरे जीवन को एक खतरनाक रास्ते पर डाला था। मोहिनी, जिसने मुझे बेहद दहशत की हालत में बम्बई भागने पर विवश किया था। मोहिनी, जिसने बम्बई में मुझे ज़मीन से उठाकर आसमान पर बैठा दिया था और ऐश ही ऐश कराये थे। मोहिनी, जिसने अपने रहस्यमय अस्तित्व को जिंदा रखने की खातिर कमला जैसी हसीन और खूबसूरत लड़की की हत्या मेरे हाथों से कराई थी। मोहिनी, जिसने डॉली से मेरी शादी कराई थी। मोहिनी, जिसने मुझसे नाराज़ होकर चरणदास की हत्या के सिलसिले में मुझे १४ साल के लिये अपनी ज़िन्दगी की खुशियों से बहुत दूर जेलखाने में जा पटका था। वही मोहिनी इस समय मेरे सिर पर सवार थी।

मेरी आँखों में खून उतर आया। मेरा दिल चाहा कि इतनी जोर से अपना सिर पत्थर की दीवार से टकराऊँ कि मेरे सिर के साथ-साथ मोहिनी का मनहूस अस्तित्व टुकड़े-टुकड़े हो जाए। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका। मैं जानता था कि मेरी इस हरकत से मोहिनी को किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। अलबत्ता डॉली जिंदा मर जायेगी। इसलिए मैं दिल को मारकर रह गया। दूसरी ओर मोहिनी बड़े चैन व आराम से मेरे सिर पर विराजमान थी। मैंने महसूस किया कि उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट जाग रही है। उसके चेहरे पर जीवन की समस्त तरंगें उठ रही है। उसकी आँखों में सफलता की चमक बड़ी रहस्यमय लग रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि वह मुझे लगातार घूरे जा रही है। ऐसी दृष्टि से जिस में व्यंग्य था।

कुछ क्षणों तक मैं मोहिनी को महसूस करता रहा फिर मैंने सख्ती से अपनी आँखें बंद कर लीं और दुबारा कम्बल पर लेट गया। मैंने फैसला कर लिया था कि अब उसके नापाक मस्तिष्क से कभी बातचीत नहीं करूँगा। न ही उसकी किसी इच्छा पर अमल करूँगा। वह अगर मेरे सिर पर रहती है तो रहा करे, मुझे क्या।

जब उसे इन्सानी खून की आवश्यकता पेश आएगी तो वह खुद मेरा पीछा छोड़ देगी। चौदह साल तक वह बिना खून लिये कभी अपनी अस्तित्व को जिंदा नहीं रख सकती थी। अभी मैं यह बातें सोच ही रहा था कि मोहिनी रेंगती हुई मेरे कानों के निकट आ गयी फिर उसकी जानी-पहचानी आवाज़ मेरे कानों से टकराई –

“राज जी, क्या नींद बहुत ज्यादा सता रही है?”

मैंने कोई उत्तर नहीं दिया और आँखें बंद किए रहा।
 
“मुझसे नाराज़ हो, क्यों?” मोहिनी दुबारा फुसफुसाई फिर थोड़ा रुककर बोली। “मुझे तुम्हारे ऊपर दया आ रही है। यार, तुम चाहो तो मैं तुम्हें इस क़ैद से छुटकारा दिला सकती हूँ।”

“दफा हो जाओ।” मैं तिलमिलाकर उठ बैठा। “मुझे तुम्हारी कोई शर्त मंजूर नहीं है।”

“क्या चौदह साल तक यहीं रहने का फैसला कर चुके हो?”

“हाँ!” मैं निचला होंठ काटते हुए बोला।

“क्या तुमने यह भी सोचा है कि इन चौदह वर्षों में आभागी डॉली पर क्या बीतेगी? अपने लिये न सही, परन्तु डॉली के लिये तुम्हें कुछ सोचना चाहिए।”

डॉली का नाम सुनते ही मेरा दिल भर आया। घाव ताजा हुए तो मेरी आँखें नम हो चलीं। डॉली, मेरी ज़िन्दगी। मेरी जान। समय की माँग ने मुझे उससे किस क़दर दूर कर दिया है।

“तुम यहाँ से छुटकारा हासिल कर लो तो बम्बई से कहीं दूर जाकर ज़िन्दगी बसर कर सकते हो डॉली के साथ।”

“लेकिन यहाँ से बचाव की सूरत क्या होगी?” मैंने बेचैन होकर पूछा।

“मेरे लिये कोई बात असंभव नहीं। केवल तुम्हारे हुक्म की देर है। जिसके बाद मैं ऐसी स्थिति उत्पन्न करूँगी कि तुम यहाँ से सफलतापूर्वक निकल सकते हो।”

मैंने तुरंत ही कोई उत्तर नहीं दिया। मोहिनी के साथ समझौता कर लेने की सूरत में मुझे कैदखाने से छुटकारा भी मिल सकता था और डॉली को साथ लेकर बम्बई से कहीं दूर, किसी नगर में जाकर बस भी सकता था। परन्तु मैं यह बात भी अच्छी तरह जानता था कि इसके बाद क्या होगा। मुझे मोहिनी के लिये हर माह एक इंसानी ज़िन्दगी को मौत के घाट उतारना होगा। फिर यह भी संभव था कि मुझे भविष्य में भी बंजारों की तरह एक नगर से दूसरे नगर भागे-भागे फिरना हो और फिर एक समय ऐसा भी आएगा जब संसार का कोई भी कोना मेरे लिये शेष न रहेगा।

मैं काफी देर तक मोहिनी की पेशकश के सम्बन्ध में सोचता रहा, फिर अचानक झल्लाकर उससे चरणदास की हत्या के सम्बन्ध में पूछा।

“चरणदास को किसने क़त्ल किया था?”

“कल्लन खां ने, स्पष्ट है।”

“इतना तो मैं भी जानता हूँ कि कल्लन खां रंगे हाथों पकड़ा गया था लेकिन उसने मेरा नाम यूँ ही क्यों ले लिया, जबकि मैंने उस हरामजादे को कभी देखा तक न था।”

“यह बात उसके मस्तिष्क में मैंने बिठाई थी कि वह तुम्हारा नाम ले दे। मैंने उसे तुम्हारे सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया था।”

“मगर तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?” मैंने कठोर स्वर में पूछा।

“तुमने चूँकि मेरे साथ वादाखिलाफी की थी। इसलिए तुम्हें थोड़ा सबक देना जरूरी था।” मोहिनी ने मुस्कुराते हुए कहा। “जिस समय तुम रविशंकर से बात कर रहे थे, उसने कल्लन खां को बुलाया था। उस समय मैं कल्लन खां के सिर पर मौजूद थी। यदि मैं ऐसा न करती तो वह तुम्हें पहचान नहीं सकता था। अदालत में जिस समय वह बयान दे रहा था, उस समय मैं उसके सिर पर मौजूद थी। मुझे भय था कि कहीं वह कोई गलत बयान न दे बैठे। इसलिए मैं इस मुक़दमे में हर समय, हर मौके पर उसे आदेश देती रही। मैंने तुम्हारे साथ इतनी हमदर्दी जरूर की कि तुम्हें फाँसी से बचा लिया।”

“हमदर्दी...!” मैंने कहा। “और मुझसे खूब गद्दारी की कि मुझे इस कैदखाने में पहुँचा दिया।”

“हाँ! अब यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें यहाँ से निकलवा भी सकती हूँ।” मोहिनी बड़ी ढिठाई से बोली।

“और अगर मैं तुमसे वायदा निभाने से इंकार कर दूँ तो?” मैं यूँ ही पूछ बैठा।

“उस स्थिति में प्रकट है कि तुम्हें पूरे चौदह साल तक इसी जेलखाने में एड़ियाँ रगड़नी पड़ेंगी।”

“क्या तुम इस सारी अवधि में बिना खून पिये अपने अस्तित्व को जिंदा रख सकोगी?”

“असंभव!” मोहिनी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “यह असंभव है। परन्तु मिस्टर राज! विश्वास रखो, मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूँगी। हाँ, यह दूसरी बात है कि यह मेरे ऊपर निर्भर करता है कि मैं तुम्हें छोड़ूँ या नहीं। जब मुझे खून की आवश्यकता होगी तो मैं कुछ दिनों के लिये तुमसे विदा होकर दुबारा आ जाया करूँगी।”

“आखिर तुम मेरा पीछा छोड़ क्यों नहीं देती?”

“वह मेरी इच्छा पर निर्भर करता है।” मोहिनी ने लापरवाही से उत्तर दिया और रेंगती हुई मेरे सिर पर से चली गयी। फिर बड़े आराम से पाँव पसार कर लेट गयी। मैं उसके चेहरे पर फैली हुई व्यंग्यात्मक मुस्कराहट को महसूस कर रहा था। कितनी शान्ति थी उसके चेहरे पर और किस कदर जानदार मुस्कराहट खिल रही थी उसके होंठों पर, जो गुलाब की नाज़ुक पंखुड़ियों की तरह मुझे सुर्ख-सुर्ख नज़र आ रहे थे।

“मैं अब सारी ज़िन्दगी के लिये क़त्ल नहीं करूँगा। सूना तुमने।”

मोहिनी की आँखों में झलकने वाली शक्ति को देखकर मैं तिलमिला उठा। लेकिन मोहिनी ने बराबर उसी लापरवाही से उत्तर दिया – “न करो किसी का क़त्ल। तुम्हारे अपने इरादे से क्या फर्क पड़ता है।”

“मैं कहता हूँ दफा हो जाओ तुम। मेरा सिर तुम्हारे बाप की जागीर नहीं।” मैं क्रोध से पागल हुआ जा रहा था।

“सो जाओ राज। सुबह आराम से बातें होंगी।” मोहिनी ने एक लम्बी जम्हाई लेते हुए कहा, फिर बायें करवट बदलकर बोली।

“अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”

“अच्छा एक बात तो बताओ।” मोहिनी मेरी बात अनसुनी करती हुई बोली। “तुम्हें पथरीले फर्श पर नींद कैसे आ जाती है? जबकि तुम सदैव से आराम पसंद आदमी रहे हो।”
 
मैं होंठ काटकर खामोश रह गया। जवाब देने का कोई मतलब भी न था। मुझे पता था कि मोहिनी एक ऐसे अदृश्य अस्तित्व का नाम है जिसका मैं कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था। काफी देर तक खामोशी के साथ ख्यालों में मोहिनी को देखता रहा, जो बाएँ करवट लेटी थी। उसने अपने एक हाथ को सिर के नीचे तकिए के रूप में रख छोड़ा था। अपनी नशीली आँखों से वह बराबर मेरी ओर देखे जा रही थी। अचानक मेरे मस्तिष्क में आया कि क्यों न मोहिनी की रहस्यमय शक्ति से लाभ उठाने की कोशिश करूँ। अस्थाई रूप से मैं उसे शीशों में उतारकर अपना उल्लू सीधा कर सकता था। बाद की बात बाद में देखी जाती।

लेकिन कैदखाने में रिहाई के साथ-साथ मैं यह भी चाहता था कि किसी प्रकार से बाइज्ज़त तौर पर बच जाऊँ। ताकि इस समाज में एक बार फिर मैं अपना नया शरीफाना जीवन आरम्भ कर सकूँ। बहुत देर तक मैं अपने प्लान को विभिन्न कोणों से नापता-तौलता रहा, फिर मैंने एक ठण्डी आह भरकर मोहिनी को सम्बोधित किया –

“मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं है। परन्तु अभागी डॉली मुफ्त मेरे कारण ज़िन्दगी बर्बाद कर बैठी।”

“क्यों? डॉली को क्या हुआ?”

“बहुत खूब!” मैं जलकर बोला। “क्या अब भी कुछ होना बाकी रह गया है!”

“अब समझी। तुम्हें शायद यह ख्याल सता रहा है कि वह बम्बई जैसे हंगामों से भरे महानगर में अकेली जीवन कैसे बसर करेगी?”

“हाँ!” मैंने भर्रायी हुई आवाज़ में उत्तर दिया।

“मैं तुम्हारे साथ थोड़ी छूट कर सकती हूँ।” मोहिनी ने इस बार कुछ गंभीर होते हुए कहा। “तुम मेरे लिये हर माह नहीं तो कम-से-कम चार माह में एक इंसानी जान के लहू का प्रबंध कर लो।”

“मैं यह शर्त मानने को तैयार हूँ। मगर यहाँ से रिहाई भला किस प्रकार संभव होगी?” मैंने जल्दी से पूछा।

“यह तुम मेरे ऊपर छोड़ दो। इतनी संगीन परिस्थिति से गुजरने के बाद भी तुम्हें मुझ पर कोई विश्वास नहीं हुआ। राज, मैं तुम्हारी रिहाई के लिये हज़ारों उपाय पैदा कर सकती हूँ।”

“मुझे पता है, परन्तु मैं भगोड़े कैदी की हैसियत से समाज में जीना नहीं चाहता।”

“ठीक है! ऐसा रास्ता पैदा हो जाएगा कि तुम्हें बाइज्ज़त तौर पर रिहाई मिल जाये। लेकिन इतना याद रखो कि राज, यदि बाद में तुमने वादा-खिलाफ़ी की तो फिर तुम मेरे शिकंजे की तबाही से कभी न बच सकोगे।”

“मुझे मंजूर है।”

“यूँ नहीं, तुम्हें डॉली की कसम खाकर वायदा करना होगा कि अपने किए वायदे से नहीं फिरोगे।”

मैंने लाचार होते हुए डॉली की कसम खाकर उससे वायदा कर लिया कि आगे उससे वादा-खिलाफी नहीं करूँगा और चार माह में एक इन्सानी ज़िन्दगी के लहू का प्रबंध उसके लिये इकठ्ठा करूँगा।

मोहिनी मेरी इस बात पर बेहद खुश थी। इस ख़ुशी में वह आधी रात तक मुझसे दुनिया भर की बातें करती रही। फिर हम दोनों ही थककर सोने के इरादे से लेट गये। बातचीत के दौरान मैंने मोहिनी से पूछा था कि वह मेरे बचाव के लिये कौन-सा तरीका अपनाएगी। परन्तु उसने वही जवाब दिया था कि यह सोचना उसका काम है। मुझे अकारण परेशान होने की आवश्यकता नहीं।

सुबह मैं जागा तो यह महसूस करके चकरा गया कि मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद नहीं थी। रात के किसी हिस्से में वह मेरे सिर से गायब हुई थी। मुझे इसका कोई इल्म नहीं था। न ही मोहिनी ने मुझसे कहा था कि वह यूँ अचानक चली जायेगी। मुझे मोहिनी के इस तरह बिना कुछ कहे-सुने चले जाने से क्रोध भी अधिक आया। मगर मैं यह सोचकर चुप रहा कि देखें अब वह मेरी रिहाई के लिये क्या करती है।
 
उस दिन मुझे रह-रहकर मोहिनी का ख्याल आता रहा कि मोहिनी अवश्य अपना वायदा पूरी करेगी। लेकिन उस दिन वह वापिस नहीं लौटी। दूसरा और तीसरा दिन भी मोहिनी की प्रतीक्षा में गुजर गया। चौथे दिन मैं दोपहर को बैठा दूसरे कैदियों के साथ खाना खाने में लगा था कि एक सन्तरी मेरे निकट आकर बोला –

“जल्दी खा लो! जेलर साहब तुम्हें बुला रहे हैं।”

“क्या उन्हें मुझसे कोई खास काम है?” मैंने यूँ ही पूछ लिया।

“वाह बेटा!” सन्तरी ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए कहा। “अबे तू तो ऐसे पूछ रहा है जैसे जेलर साहब तेरे सुझावों पर ही तो चलते हैं। खाल में रहो वरना चमड़ी उधेड़ दूँगा।”

मैंने उत्तर देने की बजाय खामोशी से जल्दी-जल्दी उल्टा-सीधा हाथ चलाना शुरू कर दिया और कच्चे-पक्के ज़हर मार के पानी पीने के बाद उठकर सन्तरी के संग हो लिया। पाँच मिनट बाद ही मैं जेलर के सामने खड़ा था।

“जानते हो, मैंने तुम्हें किस लिये बुलाया है?” जेलर ने मुझे सिर से पाँव तक घूरते हुए सवाल किया।

“जी नहीं साहब!” मैंने धीमे स्वर में कहा।

“तुम्हारी पत्नी ने तुम्हारे मुक़दमे में होने वाले फैसले के विरुद्ध अपील दायर की है।” मैं खामोश रहा तो जेलर ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा। “कल्लन खां ने तुम्हें कमला और चरणदास की हत्या में फँसवाने की चेष्टा क्यों की थी?”

“यह तो वही बता सकता है हुजूर!” मैंने बड़े अदब से जवाब दिया।

“लेकिन बाद में तो तुमने स्वयं भी तो कमला के सिलसिले में इकबाले-जुर्म किया था।”

“मेरे पास इसके अलावा कोई रास्ता भी तो न था।”

“यह मोहिनी का क्या किस्सा है?” जेलर ने मेज से सिगार उठाकर लगाते हुए पूछा।

“मोहिनी एक अदृश्य शक्ति का नाम है जनाब।” मैंने डरते-डरते कहा। फिर जेलर के अनुरोध पर मैंने मोहिनी की कुछ बातें उसे भी बतायी।

“क्या यह गलत नहीं है कि तुमने एक काल्पनिक कहानी गड़कर खुद को बचाने की कोशिश की थी?”

इस बार मैंने जवाब देना उचित नहीं समझा और सिर झुकाये खामोश खड़ा रहा।

“मुझे ख़ुशी है कि तुम एक बाइज्ज़त शरीफ आदमी साबित हुए।” जेलर ने मुस्कुराते हुए कहा। “कल्लन खां ने उस बात का लिखित रूप में इकबाल कर लिया है कि उसने झूठ बोलकर तुम्हें कमला और चरणदास के सिलसिले में फँसाने की कोशिश की थी।”

“ ज... जी...!” मैं चौंक पड़ा।

“घबराओ नहीं, कल्लन खां का लिखित बयान मेरे पास सुरक्षित है, जो अपील में तुम्हारे लिये कारगर सिद्ध होगा।”

“कमला की हत्या के बारे में उसने क्या बताया जनाब?” मैंने डरते-डरते पूछा।

“कमला को वह अपने लिये सुरक्षित करके दौलत कमाने के सपने देख रहा था। परन्तु जब कमला ने इंकार कर दिया तो कल्लन खां ने उसे ठिकाने लगा दिया।”

जेलर मुझे एक ऐसी बात बता रहा था जो हो ही नहीं सकती थी। असंभव थी इसलिए कि कमला की हत्या स्वयं मैंने अपने हाथों से की थी। मैं हैरान व परेशान खड़ा जेलर के चेहरे को तके जा रहा था। कल्लन खां ने चरणदास की हत्या की थी। यह बात मेरी जानकारी में भी थी, परन्तु कमला की हत्या को उसने क्यों अपने सिर ले लिया। यह बात मेरी समझ में न आ सकी। मुझे जेलर की बातों से इतना आश्चर्य हुआ था कि मैं थोड़ी देर के लिये मोहिनी को भी भूल गया।

“कल्लन खां के बयान के बाद भी मैं तुम्हें एक साधारण कैदी समझने पर मजबूर हूँ। उस समय तक जब तक कि तुम्हारी पत्नी की दायर की हुई अपील का निर्णय नहीं हो जाता। बहरहाल मैं तुम्हारे साथ यह रियायत अवश्य कर सकता हूँ कि कल से तुम्हें कोई सख्त काम न दिया जाए।”

“मैं आपका आभारी रहूँगा जनाब।”

“ठीक है! अब तुम जा सकते हो। मैं आज ही संतरियों को तुम्हारे बारे में विशेष आज्ञा दे दूँगा।”

मैंने एक बार फिर जेलर का शुक्रिया अदा किया और उल्टे कदम बाहर आ गया।
 
रात को मैं अपनी काल कोठरी में पहुँचा तो मेरा दिल आने वाली खुशियों से नाच रहा था। मुझे विश्वास था कि मोहिनी मुझे क़ैद से अवश्य छुटकारा दिला देगी। जिसके बाद मैं डॉली के साथ चैन की वंशी बजा सकूँगा। परन्तु नहीं, मुझे ख़ुशी थी कि कल्लन खां का लिखित बयान मुझे रिहाई दिला देगा। मैं इस बात पर भी बड़ी गंभीरतापूर्वक विचार कर रहा था।

भविष्य में मुझे मोहिनी के सिलसिले में कौन-सा रवैया अख्तियार करना होगा और मैं किस प्रकार उसकी रहस्यमय शक्ति से रिहाई पा सकूँगा। बहरहाल मैंने इस बात का निर्णय कर लिया था कि कैदखाने से रिहाई हासिल होते ही मैं सबसे पहले मोहिनी से रिहाई की चेष्टा अवश्य करूँगा। चाहे उसका अंत कितना ही भयानक क्यों न साबित हो।

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मैं अपनी बैरक के पथरीले फर्श पर लेटा उन बातों पर गौर कर रहा था जो मुझे जेलर ने बतायी थी। यह बात मुझे भी मालूम थी कि डॉली ने मेरी सज़ा के खिलाफ अपील दायर कर दी है। इसके बारे में डॉली मुझे पहले ही बता चुकी थी। लेकिन यह बात कि कल्लन खां ने लिखित तौर पर कमला की हत्या करने का समर्थन कर लिया है, मेरे लिये वास्तव में आश्चर्यजनक थी।

इसलिए कि कमला को मैंने अपने हाथों से चौपाटी के सुनसान समुद्र तट पर बड़ी निर्दयता के साथ गला घोटकर मारा था। जहाँ एक ओर मेरा मस्तिष्क कल्लन खां के लिखित बयान पर उलझा हुआ था वहीं दूसरी तरफ मुझे इस बात की ख़ुशी थी कि अब मैं बहुत जल्दी जेल से मुक्ति पा जाऊँगा। परन्तु इन बातों के अतिरिक्त एक तीसरी चिन्ता भी मेरे मस्तिष्क पर सवार थी। और वह थी मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व।

मोहिनी का अदृश्य रहस्यमय अस्तित्व एक ऐसा अजीबो-गरीब अस्तित्व था जिसे न मैं देख सकता था, न ही अपनी इच्छा से अलग कर सकता था। उसका अस्तित्व एक खूबसूरत सुंदरी के अस्तित्व जैसा मेरी कल्पना से उभरा था। जिसके जिस्म के उतार-चढ़ाव मैं अपने सिर पर महसूस करता था। उस रहस्यमय हस्ती ने मेरे सिर पर पूर्णरूप से अधिकार करके मुझे बिल्कुल बेबस कर दिया था। वही मोहिनी अब रहस्यमय तमाशे दिखाने के बाद एक और खेल खेल रही थी।

मैंने मोहिनी से यह वायदा अवश्य कर लिया था कि मैं उसके अस्तित्व को जिंदा रखने के लिये हर चार महीने बाद उसे हट्टे-कट्टे इन्सान के खून का प्रबंध करूँगा, लेकिन सच पूछिये तो मैंने यह वायदा केवल अपनी जेल से मुक्ति और डॉली की चिन्ताओं के कारण किया था। वरना वास्तविकता बिल्कुल इसके विपरीत थी।

मैंने निर्णय कर लिया था कि जेल से मुक्ति प्राप्त करते ही मैं मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व से छुटकारा प्राप्त करने का कोई न कोई उपाय अवश्य खोजूँगा। मुझे पता था कि मेरी बदनियती मोहिनी से छुपी न रहेगी, परन्तु मोहिनी से छुटकारा प्राप्त करने के लिये मुझे कुछ न कुछ तो सोचना ही था। मैं अपने-आपको मोहिनी के रहम-ओ-करम पर किसी तरह भी नहीं छोड़ सकता था।

पूरी रात मैं यूँ ही दिमाग की जिम्नास्टिक करता रहा। मुझे कब नींद आयी और कब सब कुछ भूलकर बेखबर हो गया, मुझे इसकी खबर न थी।

प्रातःकाल जब सन्तरी ने मुझे जगाया तो मेरे सिर में हल्का दर्द हो रहा था, और उस दर्द कर कारण यही था कि मैं रात देर तक जागता रहा था। लेकिन सन्तरी की खौफनाक मूँछें और उसके भयानक चहरे पर नज़र पड़ते ही मैं तेजी से उठ खड़ा हुआ। दूसरी स्थिति में संभव था कि वह अपने भारी बूटों की ठोकर से मेरी कुशलता पूछ बैठता, जैसा कि वह पहले कई बार मेरी कमर दोहरी कर चुका था। खतरनाक किस्म के कैदियों के साथ जेलखाने का रवैया कुछ ऐसा ही हुआ करता था। इससे पहले की सन्तरी मुझे उठाने के लिये कोई बड़ा कदम उठाता, मैं स्वयं उठ खड़ा हो गया।

“क्यों बे, क्या आज तेरा नाश्ते को दिल नहीं कर रहा?” सन्तरी ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए मुझे टेढ़ी नज़रों से घूरा तो मेरी रूह फ़ना हो गयी।

मैंने थूक निगलकर जल्दी से कहा – “माफ़ कर दो जमादार साहब! फिर कभी देर से नहीं उठूँगा।”

“देर से उठेगा तो चमड़ी न उधेड़कर रख दूँगा साले। पंद्रह साल हो गये मुझे तुम जैसों से निपटते हुए। बड़े-बड़े शूरमाओं को अटेंशन करके रख दिया है। तू क्या बेचता है!”

“गलती हो गयी सन्तरी साहब!” मैं भयभीत आवाज़ में बोला। “रात आँख देर से लगी थी इसलिए।”

“बंद कर बकवास।” सन्तरी मेरी बात बीच में काटकर गुर्राया। “चल सीधी तरह उगल दे कि तू कल अपने जेलर साहब से क्यों मिला था?”

“मैं उनसे स्वयं नहीं मिला, बल्कि जेलर साहब ने मुझे एक जरूरी काम से बुलाया था।” मैंने कुछ सोचकर जवाब दिया।

मेरा कल्लन खां के लिखित बयान के सिलसिले में किसी और से कुछ कहना ठीक नहीं था। इसलिए मैंने सन्तरी को गोल-मोल जवाब दिया। मगर मेरा जवाब सुनकर उसने जिन खूंखार निगाहों से घूरा, उसमें दया की कोई गुंजाइश नहीं थी।
 
कुछ देर तक वह मुझे निर्दयता भरी दृष्टि से घूरता रहा फिर गुर्राकर बोला – “सीधी तरह नहीं बताओगे, क्यों ठाकुर साहब? तुम गये थे या जेलर साहब ने बुलाया था?”

“यह बात नहीं सन्तरी जी। मुझे जेलर साहब ने ही बुलाया था।” मैंने जल्दी से बात बनायी। “जेलर साहब ने मुझे मना किया था कि जो बातें मेरे और उनके बीच हुई हैं, उनका जिक्र किसी और से न करूँ।”

“मुझे सब पता है।” सन्तरी ने मुझे गन्दी सी गाली बकते हुए कहा। “तूने जरूर अपने बाप से यही कहा होगा कि हम तुझे पूरा चाय-पानी नहीं देते। क्यों, हैं न यही बात?”

“कसम भगवान की सन्तरी जी, ऐसी कोई बात नहीं है!”

“फिर सोच लो ठाकुर साहब!” सन्तरी कठोर स्वर में बोला। “यदि यह सच है तो हम तुम्हारी सारी ठकुराई निकालकर रख देंगे।”

मेरे पास अब इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था कि मैं सन्तरी को वह तमाम बातें बता दूँ जो मेरे तथा जेलर के बीच में हुई थीं। जितनी देर मैं उसे विस्तारपूर्वक सारी बातें बताता रहा, वह मुझे अपनी खूंखार निगाहों से यूँ घूरता रहा, जैसे बयान की सच्चाई को अपनी आँखों में तैरती हुई सुर्खी से जाँच रहा हो। फिर जब खामोश हुआ तो वह कुछ देर बाद मुस्कुराकर बोला –

“मुझे पहले ही पता था। चौहान सिंह की शिकायत करने वाला दुनिया में पैदा नहीं हुआ।”

मैंने इत्मीनान की साँस ली। सन्तरी यही इत्मीनान करना चाहता था कि मैं जेलर से किस सिलसिले में मिला था। उसके जाने के बाद मैंने नाश्ते को स्वीकार किया।

अभी मैं नाश्ते से निपट भी न पाया था कि दूसरा सन्तरी आया जो मुझे जानवरों की तरह हाँकता हुआ उस खुले मैदान में लाया जहाँ बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़ने का कम हमारे सुपुर्द था। यहाँ पर सिपाहियों का हथियारबंद दस्ता हर समय हमारे सिरों पर मौजूद रहता। मैंने मैदान में आकर खामोशी से एक हथौड़ा उठाया और एक ओर बढ़ ही रहा था कि तीन फीते वाले एक सिपाही ने मेरे निकट आकर घृणा भरे स्वर में कहा –

“आज तुमसे पत्थर तोड़ने का काम नहीं लिया जाएगा।”

“फिर...?”

“तुम आज बाकी हरामखोरों की निगरानी करोगे। यह जेलर साहब की आज्ञा है।”

जिस भाव में मुझे उस छूट का हुक्म सुनाया गया था, वह बहुत अजीब था। लेकिन करता तो क्या करता। खून के घूँट पीकर रह गया और उन कैदियों की निगरानी करने लगा जो पत्थर तोड़ने में व्यस्त थे।

दो दिन इसी तरह गुजर गये। इस बीच न तो डॉली ही मुझसे मिलने आयी और न ही मोहिनी वापिस लौटी। उन दोनों की राह तकते-तकते मेरे दिल की जो हालत थी, उसका अंदाजा केवल मैं ही लगा सकता हूँ। लेकिन तीसरे दिन मुझे प्रतीक्षा की घड़ियाँ नहीं गिननी पड़ीं। डॉली मुझसे मिलने आ गयी।

जब मैं उससे मिलने के लिये मुलाक़ात करने वाले कमरे में गया तो वह बड़ी बेचैनी की हालत में टहल रही थी। मुझे देखते ही उसका चेहरा ख़ुशी से तमतमा उठा। वह तेजी से लपकती हुई लोहे की सलाखों के दूसरी ओर मेरे निकट आ गयी। उसकी पलकों पर आँसुओं के कतरे झिलमिला रहे थे। मगर मैं जानता था, वह कौन से आँसू थे।

“राज डियर! भगवान ने हमारी सुन ली। अब हमारे दुखों के दिन बहुत जल्द ख़त्म होने वाले हैं।”

“मुझे पता है, कल्लन खां ने क्या बयान दिया है।”

“आपको कैसे पता हुआ?”

“मुझे जेलर ने सब कुछ बता दिया है।” मैंने विस्तारपूर्वक सारी बात दोहराते हुए कहा। “अपील की तारीख कब पड़ रही है?”

“परसों!” डॉली ख़ुशी भरे स्वर में बोली। “भगवान ने चाहा तो आप पहली या दूसरी पेशी में ही छूट जायेंगे।”

“यह सब तुम्हारी प्रार्थनाओं का असर है डॉली। मगर जानती हो कि कल्लन खां ने कमला की हत्या का जुर्म अपने सिर क्यों ले लिया?”

“मैं तो उसे भी भगवान की कृपा समझती हूँ जिसने उस पत्थर का दिल दिमाग पलट दिया। वरना अपनी ओर से तो उस कमीने ने कोई कसर न उठा रखी थी। हैरत कि इतनी जल्दी यह सब कैसे हो गया?”

“यह सब मोहिनी की दया है डॉली।” मैंने कहा।

“मोहिनी की दया? क्या मतलब?” डॉली ने चौंककर पूछा। वह मेरे चेहरे को आश्चर्य से घूरती हुई बोली। “क्या मोहिनी आपके सिर पर आ गयी है?”

“मैंने जो कुछ भी किया है, वह हालात से मजबूर होकर किया है।” मैंने प्यार से डॉली की सुन्दर आँखों में झाँकते हुए कहा। फिर वो सब बातें डॉली को बता दी जो मेरे तथा मोहिनी के बीच हो चुकी थी।

“तो क्या आप फिर उसी मुसीबत में फँसने का निर्णय कर चुके हैं?” डॉली ने भर्राये स्वर में पूछा।

“नहीं मेरी डॉली, ऐसा बिल्कुल नहीं है।” मैंने उसे समझाते हुए उत्तर दिया। “मोहिनी से मैं यहाँ से छुटकारा प्राप्त करने के लिये कुछ न कुछ वायदा तो जरूर करता। पहले यहाँ से छुट्टी तो मिले। उसके बाद मोहिनी के सम्बन्ध में विचार करेंगे।”

“लेकिन, आखिर उससे छुटकारे का क्या उपाय होगा?”

“इस समय मेरे ज़हन में कोई स्कीम नहीं है, परन्तु रिहाई के बाद कुछ न कुछ तो करना ही होगा।”

“क्या आपके विचार में कल्लन खां ने मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के कारण वह बयान दिया है?”

“हाँ!” मैंने सरगोशी में कहा। “वह आश्चर्यजनक शक्तियों की मालकिन है।”

डॉली मोहिनी का जिक्र सुनकर उदास हो गयी। मोहिनी की बात ने उसके चेहरे की सारी ख़ुशियाँ जैसे छीन ली थी। कुछ देर तक वह किसी सोच-विचार में डूबी रही फिर बोली – “मेरे वश में होता तो मैं अपनी जान देकर आपको मोहिनी के नापाक अस्तित्व से छुटकारा दिला देती।”

“भगवान के लिये ऐसी बातें मत करो डॉली।” मैंने उसे समझाने की कोशिश की।

मुलाक़ात का समय समाप्त हो चुका था। हमारे बीच अधिक बातें न हो सकीं, परन्तु डॉली ने चलते-चलते कहा था कि वह कोशिश करके मेरे लिये जरूर किसी तांत्रिक से ताबीज हासिल करेगी। जब तक डॉली मेरी दृष्टि से ओझल न हो गयी, मैं जंगले में लगा उसे देखता रहा। उसके बाद थके-थके कदम उठाता मुलाकाती कमरे से बाहर आया फिर अपनी ड्यूटी पर लग गया।
 
मुलाक़ात का समय समाप्त हो चुका था। हमारे बीच अधिक बातें न हो सकीं, परन्तु डॉली ने चलते-चलते कहा था कि वह कोशिश करके मेरे लिये जरूर किसी तांत्रिक से ताबीज हासिल करेगी। जब तक डॉली मेरी दृष्टि से ओझल न हो गयी, मैं जंगले में लगा उसे देखता रहा। उसके बाद थके-थके कदम उठाता मुलाकाती कमरे से बाहर आया फिर अपनी ड्यूटी पर लग गया।

मगर डॉली की मुलाक़ात के बाद मेरी उलझनों में और अधिक बढ़ावा हो गया। मैं हर समय डॉली के सम्बन्ध में सोचता रहता, जो केवल मेरे लिये अकेली इतने सारे दुखों को झेल रही थी। यदि वह न होती तो शायद मैं उस जेल से बाहर जाना स्वयं पसंद न करता। मेरी उलझनों का दूसरा कारण मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व था जो किसी जोंक की तरह मुझसे चिपककर रह गयी थी, जिसने मेरे जीवन को इतने दुखों में डाला था। मेरी स्थिति मझधार में फँसे हुए उस व्यक्ति से अलग न थी जिसे लहरों के थपेड़े किनारे तक भी पहुँचा सकते थे और उसे वही लहरें और अधिक तूफ़ान में भी ले जा सकते थे।

अगले पाँच दिन तक मैं आशा और निराशा की हालत में फँसा रहा परन्तु छठे दिन जब मुझे यह बताया गया कि मुझे आज डॉली की दायर की हुई अपील के सिलसिले में हाज़िर होना है तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

जब मैं जेल की गाड़ी में बैठकर अदालत पहुँचा तो मेरी पतिव्रता पत्नी वहाँ पहले से अपने वकील के साथ मौजूद थी। गाड़ी से उतरते समय उसने मुझे दूर से ही मुस्कुराकर दृष्टि से शुभागमन कहा तो मेरी सारी थकान दूर हो गयी।

अदालत में कल्लन खां भी मौजूद था। दोपहर के बाद हमारा केस पेश हुआ। पहले मेरे वकीलों ने जज को सम्बोधित करके उस केस की स्थिति बतायी, फिर पुलिस के गवाह पेश हुए और उसके बाद कल्लन खां को कटघरे में तलब किया गया। कल्लन खां को मैं पहले देख चुका था, परन्तु आज वह चेहरा मुझे वैसा नहीं दिखायी दिया जैसा पहली बार मैंने देखा था।

पहले की अपेक्षा उसका चेहरा आज भीगी बिल्ली बना हुआ था। पुलिस की ओर से वह बयान पेश किया गया जिसमें कल्लन खां ने लिखित तौर पर इस बात का इकरार किया था कि कमला और चरणदास दोनों को उसी ने क़त्ल किया था। एक प्रश्न के उत्तर में उसने अदालत को बताया कि उन दोनों हत्याओं के सिलसिले में उसने मेरा नाम पुरानी दुश्मनी के कारण लिया है। सरकारी वकील और मेरे वकील दोनों उससे देर तक जिरह करते रहे, लेकिन कल्लन खां अपने बयान पर कायम रहा।

संभवतः अदालत अपना फैसला उसी दिन सूना देती लेकिन समय समाप्त हो जाने के कारण कार्यवाही दूसरे दिन तक टल गयी। इसलिए मुझे वह रात भी जेल में काटनी पड़ी। कल्लन खां के अदालती बयान से यह बात साबित हो चुकी थी कि उसके बयान के पीछे मोहिनी की रहस्यमय शक्ति का हाथ है। इसलिए कि चरणदास की हत्या से पहले न तो मैंने कभी कल्लन खां का नाम सुना था और न ही उसकी सूरत देखी थी। अतः पुरानी दुश्मनी का सवाल ही पैदा नहीं होता था। और जेल की वह रात भी मैंने बड़ी बेचैनी से गुजारी। सुबह हुई तो मुझे दुबारा अदालत में ले जाया गया, जहाँ कल्लन खां के लिखित बयान को देखते हुए मुझे बाइज्ज़त तौर पर रिहा कर दिया गया और कल्लन खां के फैसले की तारीख पड़ गयी।

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मेरी रिहाई का हुक्म सुनते ही डॉली की ख़ुशी का ठिकाना न था। घर पहुँचकर मैंने स्नान किया और कपड़े बदले। उसके बाद मेरे ऑफिस वालों के आने-जाने का तांता बँध गया। मेरा दिल तो नहीं चाहता था कि मैं एक पल के लिये भी डॉली से अलग रहूँ, परन्तु सामाजिक तौर से मुझे उन लोगों से मिलना पड़ा। उसी शाम डॉली ने एक छोटी सी दावत की व्यवस्था की थी, इसलिए काफी रात तक हम दोनों उसी में उलझे रहे।

बड़ी कठिनाइयों के बाद मेहमान टले। डॉली से बात करने का अवसर ही नहीं मिल रहा था। आखिर काफी देर बाद वह समय आया जब मैं और डॉली तन्हा रह गये।

काफी रात तक हम दोनों एक-दूसरे से बातें करते रहे। वह तन्हाई की रातें, मिलने और बिछुड़ने का गम। परन्तु जल्दी ही मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व हमारी बातचीत का विषय बन गयी।

डॉली इस सिलसिले में मुझसे अधिक चिंतित थी। कहने लगी –

“राज, क्या मोहिनी इस समय आपके सिर पर मौजूद है?”

“नहीं!” मैंने गंभीरतापूर्वक कहा। “दिमाग का तकाजा तो यही है कि हम मोहिनी के आने के बाद भी उससे झगड़ा मोल ने लें और उस समय तक खामोश रहें जब तक उससे छुटकारा मिलने की सूरत नज़र न आये।”

“राज, मैं भी तुमसे यही कहना चाहती थी!” डॉली ने प्रेमपूर्वक कहा। “लेकिन भगवान ने चाहा तो अब तुम्हें इस मुसीबत से जल्दी छुटकारा मिल जाएगा।”

“भगवान तुम्हारी जुबान को मुबारक करे। परन्तु क्या तुमने इसका कोई हल निकाल लिया है? मेरा मतलब है, तुम्हारे मन में क्या कोई युक्ति आ गयी है?”

“नहीं! परन्तु मैंने एक महात्मा का पता लगा लिया है जो शोलापुर में रहते हैं। अब आप आ गये हैं तो उन महात्मा से मिलने जाऊँगी। भगवान ने चाहा तो यह परेशानी भी दूर हो जाएगी।”

काफी देर तक हमारे बीच इसी विषय में बातें होती रहीं। मैंने यह बात डॉली को अच्छी तरह समझा दी थी कि मोहिनी के आ जाने के बाद वह स्वयं को काबू में रखे और कोई ऐसी हरकत न कर बैठे जिससे मोहिनी क्रोधित हो उठे और फिर हम किसी नयी मुसीबत में फँस जाएँ।”

डॉली ने मुझसे वायदा कर लिया था कि वह कोई ऐसी हरकत नहीं करेगी। उसके बाद हम कुछ देर तक जागते रहे, फिर न जाने कब बेसुध हो गये।

दूसरे दिन जब मेरी आँख खुली तो दिन खूब चढ़ आया था। काफी दिनों के बाद मुझे आरामदेह बिस्तर मिला था। मुझे समय का एहसास ही न हो सका। डॉली ने मुझे जगाना उचित नहीं समझा था। बिस्तर से निकलकर मैंने जल्दी-जल्दी मुँह-हाथ धोये, कपड़े बदले। फिर नाश्ते की टेबल पर आ गया जहाँ डॉली अपनी मोहक सुन्दरता के साथ पहले से उपस्थित थी।

नाश्ता करके मैं उठा ही था कि मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद है। मैंने गौर किया तो अंदाजा ठीक निकला। मैं अपने ख्यालों में देख रहा था, मोहिनी हाथ-पाँव फैलाए मेरे सिर पर सो रही है। उसके चेहरे पर थकान के लक्षण दूर से नज़र आ रहे थे। सोने का भाव बता रहा था कि मानो वह कई रातों के बाद थककर बेखबर भरी नींद सो रही है। मुझे मोहिनी के चेहरे पर थकान के चिन्ह बिल्कुल साफ़ दिख रहे थे। उसके चेहरे पर सदा छायी रहने वाली लाली के बजाय आज कुछ पीलापन महसूस हो रहा था। अभी मैं मोहिनी को अपने सिर पर महसूस कर ही रहा था कि डॉली ने पूछा –

“सब कुशल तो है? यह आप बुत बने क्या सोच रहे हैं?”

“शी...!” मैंने डॉली को चुप रहने का संकेत किया। फिर संकेत द्वारा बताया कि मोहिनी मेरे सिर पर सो रही है।

डॉली के चेहरे की रंगत एक क्षण के लिये बदल गयी। उसके होंठों पर कुछ कहने के लिये खिंचाव-सा पैदा हुआ। मैं समझ रहा था कि उस समय अचानक मोहिनी के मेरे सिर पर आने की खबर सुनकर वह चिंतित हो उठी है। बहरहाल इस विचार से कि वह कुछ कहीं कह न बैठे, मैंने एक बार फिर उसे स्वयं पर काबू रखने का संकेत किया। फिर तनिक ऊँची आवाज़ में बोला –

“मैं ऑफिस जा रहा हूँ। दो-तीन घंटे में वापिस लौट आऊँगा।”
 
“शोलापुर के बारे में क्या सोचा है आपने?”

“चली जाना, इतनी जल्दी भी क्या है?”

“मैं चाहती हूँ कि आज रात की ही गाड़ी से चली जाऊँ।” डॉली ने गंभीरता के साथ कहा। “नौकर को साथ लेकर जाऊँगी। दो-एक रोज का सफ़र तो है।”

“नौकर की बजाय यदि तुम मैनेजर को ले जाओ तो अधिक उचित रहेगा। वह तजुर्बेकार आदमी है।” मैंने अपना सुझाव पेश किया।

“ठीक है! आप ऑफिस जा रहे हैं तो रात की गाड़ी के लिये दो सीट बुक करवा दीजिये।”

“हाँ, ठीक है!” मैं डॉली को उत्तर देता हुआ बाहर आ गया जहाँ ड्राइवर गाड़ी लिये तैयार खड़ा था।

रास्ते भर मैं मोहिनी के विचार में उलझा रहा। ऑफिस पहुँचकर मैंने मैनेजर को अपने कमरे में बुलाया और उसे आदेश दिया कि उसे डॉली के साथ शोलापुर तक जाना है।

उसे भला क्या आपत्ति हो सकती थी। मेरे आदेश पर वह सीट बुक कराने के लिये स्टेशन चला गया और मैं ऑफिस वर्क में बिजी हो गया।

मुझे फाइलों में सिर खपाते हुए अधिक समय नहीं गुजरा था कि मोहिनी करवट लेकर जाग गयी। फिर एक लम्बी जम्हाई लेती हुई उठ बैठी। इस बात का अनुमान लगाते हुए मुझे तनिक भी देर न लगी कि अब भी उसके चेहरे पर थकान के निशान थे। थोड़ी देर तक वह कुछ खामोश सी मेरे सिर पर बैठी रही, फिर एक मादक अंगड़ाई लेकर खड़ी हो गयी और मेरे सिर पर चहलकदमी करने लगी। मैं खामोश बैठा उसकी एक-एक हरकत का जायजा ले रहा था। उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव न जाने मुझे आज क्यों बेहद दिलकश नज़र आ रहे थे। संभव है उसका कारण यह रहा हो कि मैंने बहुत दिनों बाद आज उसे इत्मीनान से देखा था। कुछ देर तक मोहिनी जैसे किसी गहरी चिन्ता में गर्क डुबी रही फिर मुझे सम्बोधित करके बोली –

“मिस्टर राज, कहिए अब क्या हाल है? तुमने मेरा धन्यवाद अदा नहीं किया। जानते हो तुम्हें जेल से मुक्ति दिलाने के लिये मुझे कई रात जागना पड़ा।”

“मैं वास्तव में कृतज्ञ हूँ मोहिनी।” मैंने जल्दी से कहा। “यदि तुम मेरी सहायता न करती तो न जाने कब तक मुझे उस गंदे जेलखाने में रहना पड़ता। तुमने जो कुछ भी मेरे साथ किया, उसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता।”

“छोड़ो भी मिस्टर राज! मैंने जो कुछ भी किया है वह मित्र की हैसियत से किया है और मित्रता का हिसाब हमेशा दिल में हुआ करता है।” मोहिनी ने रहस्यमय मुस्कराहट अपने होठों पर बिखेरते हुए कहा। “आखिर तुमने भी तो मेरे लिये इतनी मुसीबतें झेलीं हैं।”

“परन्तु तुम इतने दिनों तक कहाँ गायब थी मोहिनी?” मैंने जानबूझकर उसकी बात को उड़ाते हुए पूछा।

“अब तुम यह भी पूछ रहे हो।” मोहिनी बड़ी अदा से बोली। “क्या तुम्हें इस बात पर आश्चर्य नहीं है कि कल्लन खां ने कमला की हत्या के आरोप को भी अपने सिर पर ले लिया है।”

“मुझे पता है, यह सब तुम्हारी रहस्यमय शक्ति का चमत्कार है।”

“हाँ! मैं उस समय कल्लन खां के सिर पर मौजूद थी जब वह अपना बयान दे रहा था।”

“क्या अब वह अपने बयान से मुकर नहीं सकता।” मैंने सोचकर पूछा। “प्रकट है कि जब तुम उसके सिर पर होगी तो उसका मस्तिष्क अपनी इच्छा के अनुसार काम नहीं करेगा।”
 
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