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Fantasy मोहिनी

“मुझे कुछ देर आराम कर लेने दो राज। फिर इत्मीनान से बातें होंगी।” मोहिनी ने अपनी चमकीली आँखों से मुझे घूरते हुए कहा।

“यह असम्भव है।” मैं चीख पड़ा। “मुझे इस तरह की मानसिक यातनाओं में जकड़कर तुम आराम नहीं कर सकती।”

“राज!” मोहिनी के तेवर बदल गये। “मैं अपने आराम में किसी किस्म का दखल बर्दाश्त नहीं कर सकती। मुझे इस वक्त चैन की नींद की जरूरत है और तुम अपनी हद से आगे बढ़े जा रहे हो।”

“मेरा सुख-चैन बरबाद करके तुम्हें भी आराम करने का कोई हक नहीं पहुँचता।”

“राज! क्या तुम इस वक्त होश में नहीं हो?” मोहिनी ने मुझे बड़े कड़वे स्वर में सम्बोधित किया। इसके साथ ही वह उठकर बैठ गयी। उसके चेहरे पर मुझे किसी गहरे समुद्र का ऐसा ठहराव नज़र आ रहा था जिसकी तह के अन्दर हजारों रहस्य छिपे थे। उसकी आँखों में उभरने वाली सुर्खी भी किसी आने वाले तूफान का संकेत थी। मगर मैं उस समय अपने आपे में नहीं था। मैं मोहिनी के चेहरे पर क्रोध के लक्षणों को नजरंदाज करते हुए बोला –

“तुम्हें मुझसे यह वायदा करना पड़ेगा कि भविष्य में कभी भी डॉली को किसी मामले में तंग नहीं करोगी।”

“यह केवल एक ही सूरत में हो सकता है कि तुम डॉली को सख्ती से समझा दो कि वह मेरे और तुम्हारे बीच किसी तरह की रुकावट पैदा करने की मूर्खता न करे।”

“डॉली मेरी पत्नी है।” मैंने तिलमिलाकर कहा। “और उसका मुझ पर पूरा अधिकार है।”

“और मैं तुम्हारी आत्मा हूँ।” मोहिनी ने कहर ढाने वाली निगाहों से मुझे देखते हुए कहा। “तुम्हें इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि अगर मैंने तुम्हें दौलतमंद न बनाया होता तो तुम कभी डॉली को हासिल नहीं कर सकते थे।”

“तुम चाहो तो अपनी दौलत वापिस ले सकती हो।” मैं झल्लाकर बोला। “मैं गरीब ही सही, मगर खुश रहना चाहता हूँ।”

“मुझे कोई ऐतराज नहीं। बशर्ते कि दौलत के साथ-साथ तुम मुझे मेरी डॉली को वापिस कर दो।”

“यह असम्भव है।” मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया। “तुम डॉली को मुझसे कभी नहीं छीन सकती।”

“राज!” इस बार मोहिनी का स्वर बहुत जहरीला था। “शायद अभी तुम्हें कुछ और बताना होगा। तुम बार-बार माफी माँगते हो और फिर अपने वचन से फिर जानते हो। तुम यह क्यों भूल जाते हो कि किससे ऐसी बातें करते हो?”

“मैं जानता हूँ कि मैं किसी बला से ऐसी बातें नहीं करता मगर बर्दाश्त की भी एक हद होती है। तुमने मेरी जिन्दगी में मुझे सुख से अधिक दुख दिए हैं। मुझे यह सौदा मंजूर नहीं और मैं अपनी बर्बादी देख सकता हूँ लेकिन डॉली...।”

“राज!” मोहिनी ने गजबनाक लहजे में मेरी बात काटते हुए कहा। “मुझे इस बात पर मजबूर मत करो कि मैं तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिये फिर कोई तमाशा खड़ा करूँ। बेहतर है कि खामोश रहो और जैसा मैं कहती हूँ, करते जाओ। उसके बाद हर जिम्मेदारी मुझे पर छोड़ दो और ऐश की जिन्दगी बसर करो।”

मोहिनी का लहजा इस कदर खतरनाक था कि एक क्षण के लिये मैं गूँगा हो गया। लेकिन यह स्थिति अधिक देर तक नहीं रही। मोहिनी ने डॉली को पवित्रता को दागदार बनाने के लिये जो शर्मनाक ड्रामा स्टेज किया था, उसका एक-एक मंजर मेरे ज़हन में आँधियाँ चला गया था। मैं अपनी मौत गँवारा कर सकता था, बशर्ते कि डॉली फिर कभी ऐसी भयानक और शर्मनाक परिस्थितियों से दो-चार न हो। अतः मैंने तुरन्त ही एक फैसला कर लिया।

“मोहिनी, सुनो! मेरे ख्याल से यह फैसला कर ही दो कि तुम मुझे जान से मार डालो लेकिन मैं किसी कीमत पर भी तुम्हें भविष्य में डॉली के कामकाज में दखलअंदाजी की इजाजत नहीं दे सकता।”

“तुम और मुझे किसी बात से रोक सकोगे?” मोहिनी बेअख्तियार हँस दी। फिर दोबारा गंभीरता से बोली। “सुनो राज साहब! तुम्हारी हैसियत क्या है, यह तुम्हें मालूम है। तुम्हें मेरे हर हुक्म का पालन करना पड़ेगा। रहा डॉली का मामला, तो तुम्हारे लिये उचित यही है कि इस सिलसिले में तुम अपनी जुबान बन्द रखना। वरना एडवर्ड पार्क में जो कुछ हो चुका है, मुझे तुम्हें उससे भी अधिक घिनौने हालात में फँसाना पड़ सकता है।”

“यदि तुमने ऐसा किया तो मैं तुम्हारे गंदे दिमाग को किसी गंदे कीड़े की तरह मसल डालूँगा।”

क्रोध की अधिकता ने मेरे सोचने-समझने की शक्ति को बेकार कर दिया था। मैं बस अपने दिल का गुबार ही निकाल सकता था, जो मैं निकालता रहा। जो मन में आया कहता रहा। न जाने क्या-क्या बकता रहा।

मोहिनी आश्चर्यजनक नजरों से मेरे बदले हुए भावों को देख रही थी। जब तक मैं बोलता रहा, वह खामोश रही फिर जब मैं जब चुप हुआ तो उसने धीरे से कहा – “राज! मुझे तुमसे हमदर्दी है, मगर इसके बावजूद मैं तुम्हें होश में लाने के लिये मजबूर हूँ।”

मैं कोई जवाब देना चाहता था लेकिन सिर में अचानक होने वाली तेज चुभन ने मुझे तड़पा दिया। मोहिनी तेजी से उठकर खड़ी हो चुकी थी और अपने नुकीले पंजे मेरे सिर में चुभो रही थी, जिसकी चुभन हर पल बढ़ती गयी। मेरी आँखों के सामने अन्धेरा छाने लगा। स्टेयरिंग पर हाथ काँप रहे थे। मैंने चाहा कि गाड़ी रोक दूँ लेकिन कोई रहस्यमय शक्ति मुझे ड्राइविंग जारी रखने पर उकसा रही थी। सड़क पर ट्रैफिक की अच्छी खासी भीड़ थी।

अचानक मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे चौड़ी सड़क पर दौड़ने वाली मोटरें मेरी कार की धीमी गति का परिहास उड़ा रही थीं। मैंने किसी अनजानी भावना के हवाले होकर मूर्खता कर दी। न चाहते हुए भी अपनी गाड़ी की गति तेज और तेज कर दी।

और फिर वही हुआ जिसका अंदेशा था। मैं स्टेयरिंग से अपना नियंत्रण खो बैठा और सामने से आती एक कार से टकरा गया। फिजा में एक जोर के धमाके की आवाज बुलंद हुई और फिर मेरा दिलो-दिमाग अंधेरे में डूबता चला गया।

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घटनाओं का धुंधला-धुंधला अक्स मेरे मस्तिष्क को परेशान कर रहा था। मुझे होश नहीं था। केवल इतना याद था कि डॉली के सिलसिले में मेरी मोहिनी से तीखी बहस हुई थी। उसने मुझसे कहा था कि यदि मैंने अपनी जुबान बंद न रखी तो एडवर्ड पार्क में जो कुछ पेश आ चुका है, वह मुझे उससे कहीं अधिक घिनौने हालात में फँसा देगी। जवाब में मैंने उसे धमकी दी थी कि मैं उसका अस्तित्व किसी गंदे कीड़े की तरह कुचल डालूँगा। मोहिनी के तेवर अचानक खराब हो चुके थे और गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था। लेकिन उसके बाद क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं रहा।

मेरा जोड़-जोड़ फोड़े की तरह दुख रहा था। बिस्तर पर चित हुआ मैं घटनाओं की कड़ियाँ मिलाने की असफल चेष्टा कर रहा था। काफी समय तक मैं यूँ ही अंधेरे में हाथ-पाँव मारता रहा, फिर मैंने घबराकर आँखें खोल दीं। मेरी नज़र फिर उसी छत के पंखें पर पड़ी जो मेरे सिर के ऊपर तेजी से चल रहा था। मुझे भय लगने लगा था। मैं अचानक चीख पड़ता कि तभी डॉली की मीठी सुरीली आवाज ने मुझे चौंका दिया।

मैंने धीरे से गर्दन घुमाकर दाईं ओर देखा तो आँखों में ठंडक आ गयी। मेरी डॉली मेरे सामने खड़ी मुस्कराती नजरों से मुझे देख रही थी।

“भगवान की लाख-लाख कृपा है कि आप होश में आ गये।” उसकी निगाहों में चमक थी।

“डॉली! मैं इस समय कहाँ हूँ?” मैंने धीरे से पूछा।

“आप।” डॉली एक पल के लिये हिचकिचाई, फिर मेरे निकट बैठकर मेरा माथा अपनी नरम व कोमल उंगलियों से सहलाती हुई बोली। “आप इस समय अस्पताल में हैं।”

“मुझे बस इतना याद है कि मेरी गाड़ी...।”

“राज!” डॉली ने प्रेम भरे स्वर में मेरी ओर झाँकते हुए तेजी से कहा। “आपको मेरी सौगंध, कुछ मत सोचिए! डॉक्टर ने बात करने को मना किया है। भगवान ने चाहा तो आप एक दो-दिन में ठीक हो जाएँगे।”

मैं उस समय पूरी तरह अपने होश-ओ-हवास में था। इसलिए डॉली की आँखों में आँसुओं के कतरे तैरते देखकर मैं तड़प उठा। परन्तु इससे पहले कि मैं अपनी वफादार और पतिव्रता पत्नी से कुछ पूछ सकता, एक नर्स जो कदाचित मेरे सिरहाने पहले से मौजूद थी, मुस्कराते हुए मेरे सामने आ गयी।

“घबराइए नहीं मिस्टर राज! अब आप बहुत जल्दी ठीक हो जाएँगें।” नर्स ने बड़ी स्नेह-पूर्वक मुझे सम्बोधित किया। इसके बाद उसने मेरे दाएँ हाथ में इंजेक्शन लगाया और मुस्कराती नजरों से मुझे देखती हुई कमरे से बाहर चली गयी।

मेरी नज़र में डॉली का मासूम चेहरा बसा था। नर्स के जाने के बाद मैंने डॉली से बातें करनी चाही परन्तु मेरे मस्तिष्क पर बेहोशी सी छाने लगी। मेरी पलकें बोझिल हो रहीं थीं।

“डॉली!” मैं कठिनाई से इतना ही कह सका। नींद पूरी तरह मुझे अपने आगोश में ले चुकी थी। मैं एक बार फिर सो गया।

मुझे कई दिनों तक सिडेटिव की गोलियों और इंजेक्शन से बेहोशी जैसी हालत में रखा गया। जब मुझे होश आया तो मैं अपने घर पर था। कदाचित डॉली मुझे डॉक्टर से प्रार्थना करके घर ले आयी थी। जहाँ एक डॉक्टर और दो नर्स स्थाई तौर पर हर समय मेरे साथ मौजूद रहते। मेरी मानसिक स्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक ठीक हो चुकी थी। जबकि बेहोशी की दवाओं का हल्का-हल्का प्रभाव अभी शेष था। परन्तु मैं अपने-आपको पहले से बेहतर महसूस कर रहा था। बहरहाल दोबारा होश आने तक मैं कुछ देर तक खामोश पड़ा डॉली को देखता रहा, जो मेरे सिरहाने मौजूद थी। फिर मैंने उसे सम्बोधित करते हुए पूछा।

“मुझे घर कब लाया गया?”

“दो दिन हो गये।” डॉली ने जल्दी से प्रेम भरे स्वर में कहा। “अब आप स्वस्थ हो चुके हैं। ईश्वर ने मेरे ऊपर बहुत बड़ी कृपा की।”

मैं कुछ क्षणों तक डॉली के चेहरे के भावों को देखता रहा। फिर बोला – “यह सब तुम्हारी प्रार्थनाओं का फल है डॉली। वरना एक्सीडेंट बहुत भयानक था।”

“उस एक्सीडेंट को भूल जाओ राज।” डॉली ने मेरी बात काटते हुए कहा। “ईश्वर को जो मंजूर था वह हो गया। हमें हर प्रकार से उसका शुक्र अदा करना चाहिए।”

मुझे यह महसूस हो रहा था कि डॉली कुछ परेशान सी थी। उसकी चिन्ता का कारण क्या था यह जानने के लिये मैं बैचेन था। एक ही करवट लेटे-लेटे मेरा जोड़-जोड़ दुखने लगा था। इसलिए जब मैंने दूसरी करवट लेने के लिये दायाँ हाथ हिलाने की चेष्टा की तो यह देखकर मैं तड़प उठा कि मेरा बायाँ हाथ जो दुर्घटना के कारण कुचल गया था, यदि उसे कोहनी काटकर अलग न किया गया तो बाकी शरीर में भी इंफेक्शन हो जाने का खतरा था।

डॉली का विचार और उसकी दिलायी कसम अगर मुझे याद न होती तो मैं निश्चित ही आत्महत्या कर बैठता। परन्तु मुझे अपनी डॉली की खातिर जिन्दा रहना पड़ा। दो-चार दिन मैं भीतर-भीतर ही सुलगता रहा फिर गुजरते वक्त के साथ हालात सामान्य होने लगे। मोहिनी ने मुझे बहुत बुरी हालत में पहुँचा दिया था। इस बार उसने मेरी बहस की मुझे बड़ी खौफनाक सजा दी थी। मैं अपने एक हाथ से महरूम हो गया। मेरा वह हाथ जिसे अब मोहिनी की करिश्माई शक्तियाँ भी वापस नहीं ला सकती थी। मैं ठीक तो हो गया, परन्तु कुछ ऐसा लगता था जैसे मेरे दिल का चिराग बुझ गया हो। मुझ पर अवसाद के दौरे पड़ते रहे। डॉक्टर और दोनों नर्स बराबर मेरी सेवा कर रहे थे। कुछ दिनों बाद मुझे उठकर चलने-फिरने की अनुमति भी मिल गयी। डॉली दिन-रात मेरे साथ साये की तरह रहती और मुझे प्रसन्न करने की हर प्रकार से चेष्टा करती रहती थी।

फिर एक शाम मैं अपने घर के बाहर लॉन में बैठा डॉली से बातें कर रहा था कि डॉक्टर अजीत वहाँ पहुँचा। अजीत मेरा फैमिली डॉक्टर था और स्थाई तौर पर मेरे ही घर के गेस्ट रूम में रहता था।

“मिस्टर राज!” वह मेरे पास आकर बोला। “मेरा ख्याल है कि अब आप पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं।”

“यह सब तुम्हारी मेहनत और काबिलियत का नतीजा है डॉक्टर।” मैंने उत्तर दिया।

डॉक्टर कुछ समय तक बैठा इधर-उधर की बातें करता रहा, फिर उसने मुझसे बहुत धीरज से कहा।

“मुझे दुख है मिस्टर राज कि मैं अधिक दिनों तक आपको पुलिस के झंझटों से बचा नहीं पाऊँगा।”
 
“क्या मतलब?” मैंने चौंककर पूछा फिर डॉली की ओर देखा तो उसके चेहरे पर भी चिन्ता और दुख के मिले-जुले भाव मौजूद थे। मैंने पूछा तो डॉली ने दुखी स्वर में कहा।

“राज! मैंने आज तक डॉक्टर के सुझाव पर आपको हकीकत से वाकिफ नहीं कराया। मगर अब सच को ज्यादा दिनों छुपा पाना सम्भव नहीं है। जिस गाड़ी से आपका एक्सीडेंट हुआ था, उसमें बैठे तीनों लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी थी। पुलिस ने केस रजिस्टर कर लिया है। अब तक आपकी गंभीर हालत का हवाला देकर मैंने पुलिस को रोक रखा था और उसे आपसे पूछताछ नहीं करने दी। मगर अब आपके ठीक हो जाने के बाद यह सम्भव नहीं है।”

“हूँ!” मैंने संजीदगी से हुंकार भरी।

“एस. पी. तौफिक आज यहाँ आ रहा है।” अजीत के खामोश होते ही डॉली ने कहा –

“अभी कुछ देर पहले उसका फोन आया था। मैंने उसे इजाजत दे दी।”

मैंने एक नज़र डॉली के चेहरे पर डाली फिर ठण्डी आह भरकर खामोश हो गया। थोड़ी देर बाद एस. पी. तौफिक वहाँ पहुँचा। उसके साथ एक मातहत इंस्पेक्टर मौजूद था। ड्राइंग-रूम में मेरी दोनों से मुलाकात हुई। डॉक्टर अजीत और डॉली उस वक्त भी मेरे साथ थे।

उस समय मेरे ज़हन में मोहिनी का ख्याल अचानक उभर आया। मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व ने मुझे कहीं का नहीं रखा था। मैंने मोहिनी को देखना चाहा मगर कामयाब न हो सका। वह उस समय मेरे सिर पर मौजूद नहीं थी।

एस. पी. ने मुझ पर क्रास क्वेशचनिंग की झड़ी लगा दी थी। मैं सावधानी पूर्वक जवाब देता रहा परन्तु वह मेरे जबाव से संतुष्ट न लगा। कुछ देर बाद उसने निर्णयात्मक स्वर में कहा।

“मिस्टर राज! आपने जो बातें बतायीं, मैं उन पर विश्वास करने को तैयार नहीं। हो सकता है कि आपके किसी वकील ने आपको विश्वास दिलाया हो कि मोहिनी जैसी किसी प्रेतात्मा की कहानी सुनाकर आप खुद को बचा लोगे। परन्तु मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि अदालत में यह कहानी नहीं चलेगी। वहाँ आपकी इस कहानी को सिरे से ही बेहूदा और बकवास करार दिया जाएगा।”

“मैं आपको या अदालत को उसका काम करने से नहीं रोक सकता जनाब, परन्तु मोहिनी के बारे में मैंने आपको जो कुछ भी बताया है, मेरा यकीन करें, वह अक्षरशः सच है।” मैंने व्याकुल होकर पहलू बदला।

एस. पी. एकाएक उठकर खड़ा हो गया।

“साजिद!” वह अपने मातहत इंस्पेक्टर से बोला। “इन साहबान को हिरासत में ले लो।”

इंस्पेक्टर जो अब तक खामोशी से हमारी बातचीत सुन रहा था, अचानक यूँ फट पड़ा जैसे अपना मानसिक संतुलन खो बैठा हो। उसने एस. पी. तौफिक मनोहर लाल को कड़ी नजरों से घूरते हुए कहा – “मुझे अफसोस है श्रीमान कि मैं इस षड्यंत्र में आपका साथी नहीं बन सकता”

“व्हाट...!” एस. पी. चिंहुक पड़ा। फिर अपने मातहत इंस्पेक्टर को घूरता हुआ बिफरकर बोला। “यह क्या हरकत है इंस्पेक्टर? तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया? जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो?”

“मुझे पता है कि मैं इस समय अपने एक ऑफिसर से बात कर रहा हूँ, जो पन्द्रह महीने पहले भी इज्जतदार बेगुनाह आदमी को फँसा चुका है।”

इंस्पेक्टर ने उससे ज्यादा बिफरे स्वर में जवाब दिया। “तब तुम अपनी ऊँची पहुँच के कारण बच गये थे, परन्तु इस बार मैं खुद तुम्हारे खिलाफ गवाही दूँगा कि तुमने मेरी मौजूदगी में राज का केस रफा-दफा करने के लिये उससे पचास हजार की रिश्वत माँगी थी, जिसे देने से इंकार करने पर तुमने उसे गिरफ्तार कर लिया।”

अकेले मनोहर लाल ही नहीं, खुद मैं, डॉली और अजीत भी भौंचक्के से होकर इंस्पेक्टर को देखने लगे। मनोहर लाल ने मुझसे रिश्वत की कोई बात नहीं की थी। एस. पी. का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। उसने कच्चा चबा जाने वाली नजरों से इंस्पेक्टर को घूरा।

“तुम्हारी यह हिमाकत तुम्हें बहुत महँगी पड़ेगी इंस्पेक्टर।” मनोहर लाल आपे से बाहर होकर बोला। उसकी वह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। फिर वह एक झटके से उठा और इंस्पेक्टर को बेहद कड़ी नजरों से घूरता हुआ बाहर चला गया। जब वह दोबारा अंदर आया तो उसके साथ तीन सशस्त्र पुलिसवाले थे, जो उसके एस्कार्ट के साथ ही आए थे और जो बाहर गाड़ी में मौजूद थे। इंस्पेक्टर ने बचाव करने के लिये रिवॉल्वर निकाल लिया लेकन इसके पहले कि वह मनोहर लाल पर फायर करता, सशस्त्र पुलिस ने उसे गिरफ्त में ले लिया।

फिर मुझे भी गिरफ्तार कर लिया गया। डॉली मेरी गिरफ्तारी पर फूट-फूटकर रोने लगी। डॉक्टर अजीत पहले की तरह चुपचाप खड़ा मौके की नजाकत पर गौर कर रहा था। मैंने डॉली को उचित शब्दों में सब्र करने का सुझाव दिया और खामोशी से बाहर आकर पुलिस जीप में बैठ गया। मुझे खुद भी आश्चर्य था कि इंस्पेक्टर ने मुझे बचाने के लिये मनोहर लाल पर एक ऐसा आरोप लगाने की कोशिश क्यों की थी जो सरासर झूठा था। खासतौर पर तब जबकि वह मेरा कोई जानने वाला भी नहीं था। बहरहाल उन हालात ने मुझे बौखलाकर रख दिया था। मनोहर लाल रास्ते भर मुझे कड़ी और खतरनाक नजरों से घूरता रहा। पुलिस हैडक्वार्टर पर पहुँचकर उसने रिपोर्ट दर्ज की फिर उसी समय हमें एक मजिस्ट्रेट के सामने पहुँचाया गया, जहाँ हमारे बयान लिये गये। मजिस्ट्रेट के सामने भी मैंने वही बयान दिया जो पहले एस. पी. को दे चुका था। मजिस्ट्रेट ने मुझे यूँ देखा जैसे मेरे दिमाग के दुरुस्त होने पर उसे संदेह हो।

“मेरे ख्याल से तुम पहले भी किसी केस में मोहिनी की रूहानी ताकतों के दखल का बयान दे चुके हो?”

“जी हाँ जनाब! परन्तु उस केस में मेरी पत्नी की अपील पर अदालत ने मुझे बाइज्जत बरी किया था।”

“क्या तुम मोहिनी के वजूद को सिद्ध कर सकते हो?”

“यदि यह बात मेरे वश में होती तो मुझे इतनी मुसीबत का सामना ही क्यों करना पड़ता मीलार्ड।” मैंने अपनी बेबसी जताई। “मुझे वाकई कुछ भी याद नहीं कि वह एक्सीडेंट कैसे हुआ, क्यों हुआ?”

“क्या मतलब?” मजिस्ट्रेट कठोर स्वर में बोला। “क्या तुम यह कहना चाहते हो कि तुम पर जो आरोप लगे हैं वह सब गलत हैं?”

“मुझे नहीं पता कि सच क्या है और झूठ क्या है...!” मेरी बेबसी मेरे लहजे में उतर आयी। “लेकिन यदि मेरे खिलाफ अदालत के पास पर्याप्त साक्ष्य है तो मैं सचमुच सजा का हकदार हूँ।”

“हूँ...!” जज ने संजीदगी से हुंकार भरी, फिर मुझे घूरता हुआ बोला। “तुम्हारे उलझे हुए और बेसिर-पैर के जवाब तुम्हारी कहानी खुद कह रहे हैं।” उसने अपने सामने रखे कागज पर लिखना शुरू कर दिया।

मैं खामोश खड़ा सारी अदालती कार्यवाही को देखता रहा। जज ने मेरी जमानत अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद एस. पी. के खिलाफ जाने वाले उसके मातहत इंस्पेक्टर साजिद और उसे गिरफ्तार करने वाले तीनों पुलिसवालों के बयान हुए। उन्होंने अपने बयान में क्या कहा, मुझे नहीं मालूम। क्योंकि तब मैं अदालत कक्ष में नहीं था।

उसके बाद मुझे और इंस्पेक्टर साजिद को ले जाकर लॉकअप में बंद कर दिया गया।

मैं पूरी रात जागता रहा। पिछले दिनों की कड़वी यादें मस्तिष्क को डंक मारती रहीं। काश मैं आत्महत्या कर सकता। काश डॉली मेरी पत्नी न होती। परन्तु भाग्य में जो लिखा था वह तो होना ही था। मैंने निर्णय कर लिया कि अब कुदरत की ओर से ऐसी व्यवस्था हो चुकी थी।

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पूरे एक सप्ताह तक मुझे और इंस्पेक्टर साजिद को हवालात में रहना पड़ा। इस बीच मुझे फिर कई बार इंटरोगेट किया गया। मुझसे कई सवाल पूछे गये परन्तु हर बार मैं यही कहता कि मुझे कुछ याद नहीं। मैंने कुछ ऐसा नाटक करने की कोशिश की जैसे मेरी याद्दाश्त खराब हो गयी हो। इंस्पेक्टर साजिद लगातार अपने बयान पर अड़ा रहा कि मनोहर लाल ने मुझसे पचास हजार की रिश्वत माँगते हुए मुझे धमकी दी थी कि यदि वह रकम उसे न मिली तो वह मुझे जेल में सड़ा देगा। इंस्पेक्टर के पास ऐसा क्या प्रमाण था जो वह एक जिम्मेदार अधिकारी पर रिश्वतखोरी का आरोप लगा रहा था। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी।

एक हफ्ते के बाद अदालत में फिर हमारी पेशी हुई। जहाँ मामले ने एक अजीबो-गरीब रूप धारण कर लिया। पहली पेशी पर मनोहर लाल का बयान हुआ। दूसरी पर डॉक्टर अजीत को पेश होना पड़ा। डॉक्टर ने अपने बयान में केवल इतना कहा कि मुझे मनोहर लाल ने अस्पताल में दाखिल कराया था। बहुत घायल अवस्था में ऐसा मालूम होता था जैसे वास्तव में कोई खतरनाक एक्सीडेंट हो, परन्तु और बात भी सम्भव हो सकती है। किसी दुर्घटना के सम्बन्ध में वह भी कुछ नहीं जानता था।

डॉली को अदालत में तलब किया गया तो उसने भी यही बयान दिया कि किसी दुर्घटना का समाचार उसे एस. पी. मनोहर लाल की ओर से मिला था, जिसे सुनकर वह अस्पताल में आयी थी। दुर्घटना के सम्बन्ध में उसे कुछ भी नहीं पता था।

दो महीने तक अदालत में विचित्र दलीलें पेश होती रहीं, एस. पी. मनोहर लाल ने घटनास्थल के फोटोग्राफ अदालत में पेश किए, जिसमें मेरी गाड़ी चकनाचूर नज़र आ रही थी। गाड़ी की नम्बर प्लेट भी नज़र नहीं आ रही थी। दूसरी गाड़ी के जो तीनों सवार एक्सीडेंट में मारे गये थे, उनके घरवालों ने बयान दिया कि उन्होंने मुझे घटनास्थल पर नहीं देखा था, परन्तु मेरी गाड़ी घटनास्थल पर अवश्य मौजूद थी। उस पर वही नम्बरप्लेट मौजूद थी जिसे अदालत में प्रस्तुत किया गया था। मेरे वकील केदारनाथ ने पुलिस की ओर से पेश किए जाने वाले गवाहों से लम्बी जिरह की। एक वकील की हैसियत से पेशे का तकाजा भी यही था कि वह मुझे दूध की मक्खी की तरह उस जुर्म से अलग करता, जो मेरे द्वारा हो चुका था।

सबसे अन्त में इंस्पेक्टर साजिद को अदालत के सामने पेश किया गया। उस पर दो आरोप लगाए गये थे। एक तो यह कि उसने अपने अधिकारी की हुक्म नहीं थी और उस पर रिवाल्वर ताना था। दूसरा उसने यह सब एक ऐसे मुजरिम की तरफदारी में किया था, जो लापरवाही से ड्राइविंग करके तीन-तीन लोगों की मौत का जिम्मेदार था।

जिस समय इंस्पेक्टर को उसके द्वारा किए गये जुर्म पढ़कर सुनाए जा रहे थे, वह गवाहों वाले कटघरे में सीना ताने खड़ा था। कुछ इस तरह जैसे कि उसने कुछ किया ही न हो। बाद में जब उसने अदालत को सम्बोधित करते हुए अपना पिछला बयान दोहराया और मेरी बेगुनाही के साथ-साथ मनोहर लाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया तो वहाँ मौजूद लोग भौंचक्के रह गये।

मनोहर लाल के चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे। वह अपनी जगह चुपचाप खड़ा होंठों को काट रहा था। इंस्पेक्टर साजिद का बयान समाप्त हुआ तो कुछ देर के लिये अदालत में सन्नाटा छा गया। फिर केदारनाथ ने उससे कुछ प्रश्न पूछे, जिसका जवाब उसे लगातार मिलता रहा। केदारनाथ के बाद सरकारी वकील ने उस पर जिरह की लेकिन इंस्पेक्टर साजिद टस से मस न हुआ। वह चट्टान की तरह अपने बयान पर कायम रहा और मुस्करा-मुस्कराकर पूरे आत्मविश्वास से हर सवाल का जवाब देता रहा।

“तुम्हारे पास इस बात का क्या प्रमाण है कि मनोहर लाल ने मुल्जिम राज को एक्सीडेंट के केस में फँसाने की कोशिश? जबकि यह बात सिद्ध हो चुकी है कि एक्सीडेंट मुजरिम की कार से हुआ है। मौका-ए-वारदात के सारे फोटोग्राफ्स अदालत में पेश किए जा चुके हैं।”

सरकारी वकील ने प्रश्न किया तो साजिद ने उसे मुस्कुराते हुए दृष्टि से देखा। फिर गंभीर होते हुए कहा – “मीलार्ड! मेरे पास ऐसे बहुत सबूत मौजूद हैं जो न सिर्फ मेरे बयान को सच्चा साबित कर देंगें, बल्कि अदालत में यह बात साफ हो जाएगी कि मनोहर लाल ने महज रिश्वत के कारण ही राज को झूठा फँसाने की कोशिश की और अब बचने के लिये साक्ष्यों तथा घटनाओं को अपनी मर्जी से तोड़-मरोड़कर अदालत को भी गुमराह करने का प्रयास किया है। लेकिन मीलार्ड इससे पहले कि मैं अपना सबूत पेश करूँ अदालत से मेरी एक गुजारिश है। मैं जो कुछ कहूँ उसकी तस्दीक बिना समय गँवाए तुरन्त की जाए। क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो मेरे आला-अधिकारी मनोहर लाल अपने प्रभाव से उन सबूतों को मिटा सकते हैं।”

“अपना सबूत पेश करो। अगर अदालत ने उसे महत्व का समझा तो उसकी जाँच में निश्चय ही किसी तरह की देर नहीं की जाएगी।”

अदालत में मौजूद हर व्यक्ति की दृष्टि इंस्पेक्टर साजिद पर ही जमी थी। जज के विश्वास दिलाने के बाद इंस्पेक्टर साजिद ने एक नज़र मनोहर लाल पर डाली, फिर उसने बयान शुरू किया।

“मीलार्ड! घटना वाले दिन मनोहर लाल और मैं दोनों साथ-साथ थे। दुर्घटना कुँवर राज की गाड़ी से नहीं बल्कि निरंजन लाल नामक एक व्यक्ति की कार से हुई थी जो घटनास्थल पर ही मर गया था। घटनाओं से ज्ञात होता है कि निरंजन लाल उन तीन मरने वालों में शामिल था, जो राज की कार से एक्सीडेंट में मारे गये थे, परन्तु यह बात सच नहीं है। बल्कि सच यह है कि निरन्जन लाल की कार से एक्सीडेंट हुआ। निरंजन लाल अपनी और दूसरी कार में बैठने वाले अपने दोस्तों की मौत का कारण बना। मनोहर लाल दुर्घटना का समाचार मिलने पर मुझे अपने साथ ले गया। इंस्पेक्टर साजिद ने विस्तार से सब कुछ बताते हुए कहा। “निरंजन लाल चूँकि एस. पी. साहब का दोस्त था इसलिए उसे खामोशी से चिता की आग के हवाले कर दिया गया। कुँवर राज सिंह और निरंजन लाल की गाड़ियाँ एक ही मॉडल की थी इसलिए मनोहर लाल ने अपनी पिछली जानकारी के अनुसार मिस्टर राज को फाँसने का घिनौना षड्यंत्र रचा। राज को गाड़ी समेत बुलाकर उसकी नम्बर प्लेट निरंजन लाल की कार में लगा दी और उसकी कार को अपने गैराज में छिप दिया। एस. पी. साहब का ख्याल था कि राज को सजा मिलने के बाद उनकी कार बेंच दी जाएगी। राज को दुर्घटना का मुजरिम करार देने की खातिर मनोहर लाल ने उन्हें किराए के गुण्डों से इस हद मार लगवाई कि उन्हें अपना एक हाथ भी गँवाना पड़ा। फिर बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल में दाखिल करा दिया गया।

मनोहर लाल ने यह तमाम ड्रामा इस खूबसूरती से स्टेज किया कि किसी को तनिक भी संदेह न हो सका। मुझे इस बात की धमकी दी गयी कि यदि मैंने जुबान खोलने की चेष्टा की तो मुझे भी किसी झूठे मुकदमे में फँसा दिया जाएगा। मैं खामोश रहा मगर जब एस. पी. मनोहर लाल ने पचास हजार की रकम इस निर्दोष राज से तलब की तो मैं चुप न रह सका।

इंस्पेक्टर के बयान से वहाँ मौजूद लोगों में कानाफूसी शुरू हो गयी। मनोहर लाल गुस्से में खड़ा दाँत पीस रहा था। सरकारी वकील ने एक उचटती हुई नज़र मनोहर लाल पर डाली फिर इंस्पेक्टर साजिद को सम्बोधित करते हुए पूछा –

“क्या तुम विश्वास के साथ कह सकते हो कि मुजरिम की कार इस वक्त भी ठीक हालत में मनोहर लाल के गैराज में मौजूद होगी?”

“मीलार्ड!” साजिद ने सीधे जज से कहा। “मैंने इतने दिनों तक अपनी जुबान इसलिए बंद रखी थी कि मनोहर लाल ने दुर्घटना के दूसरे ही दिन राज की कार को अपने गैराज से हटाकर किसी दूसरी जगह रखवा दिया था। जिस दिन मनोहर लाल ने राज को गिरफ्तार किया, उस दिन मुखबिर ने मुझे खबर दी थी कि कार को निरंजन लाल के गैराज में पहुँचा दिया गया है। यदि मेरे पास पहुँची खबर गलत नहीं है तो वह कार आज भी निरंजन लाल की कोठी से बरामद की जा सकती है। मैं अदालत से अपील करूँगा कि कार्यवाही समाप्त होने से पहले निरंजन लाल की कोठी की तलाशी ली जाए। वरना मनोहर लाल यकीनन महत्वपूर्ण सबूत को भी मिटा देगा।”
 
मैं पुलिस की हिरासत में खड़ा हैरत से पलकें झपका रहा था। इंस्पेक्टर का बयान मेरे लिये अविश्वसनीय था। इसलिए कि यह बात मुझे अच्छी तरह याद थी कि वह भयानक दुर्घटना मेरी ही कार से हुई थी, परन्तु मैंने उस अवसर पर अपनी जुबान बन्द ही रखी। जज ने कुछ देर अपना काम करने के बाद अदालत बर्खास्त कर दी और मेरे वकील की प्रार्थना पर स्वयं पुलिस फोर्स के साथ निरंजन लाल कोठी पर गया, जहाँ गैराज से एक ऐसी कार बरामद हो गयी जो रंग और मॉडल के हिसाब से मेरी कार जैसी थी लेकिन उस पर जो नम्बर प्लेट मौजूद थी, वह निरंजन लाल की कार की थी। जज ने कार को जाँच के लिये दूसरे एस. पी. के हवाले किया और मुकदमे की कार्यवाही अगली पेशी तक के लिये समाप्त कर दी।

पद्रह दिन तक मुझे किसी बात का पता न चल सका। सोलहवें दिन जब मुकदमा फिर पेश हुआ तो मुझे बाइज्जत बरी कर दिया गया। एस. पी. मनोहर लाल को अपनी पोजीशन का नाजायज इस्तेमाल और धोखा देने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया। इंस्पेक्टर साजिद को अदालत की ओर से इनाम का भागी करार दिया गया।

डॉली ने मेरी रिहाई का समाचार सुना तो खुशी से बेताब होकर भरी अदालत में ही मुझसे लिपट गयी। मैंने इंस्पेक्टर का शुक्रिया अदा किया फिर हैरान व परेशान अदालत से बाहर निकल गया।

डॉली को मुकदमे की कार्यवाही से अधिक मेरी रिहाई की खुशी थी लेकिन मैं गंभीरता से सोच रहा था कि आखिर यह सब कैसे संभव हो गया। वह कौन सी शक्ति थी जिसने असंभव को सम्भव कर दिया था।

क्या मोहिनी?

अचानक मेरे मस्तिष्क में मोहिनी का नाम उभरा। मोहिनी, जो चमत्कारिक और हैरतअंगेज शक्तियों की स्वामी थी। उसके लिये कुछ भी असंभव नहीं था। दुर्घटना से पहले उसने मुझसे कहा था – राज! तुम्हें होश में लाने के लिये न जाने कितने तमाशे और दिखाने पड़े।

मोहिनी का विचार आते ही घटनाओं की उलझी हुई कड़ियाँ अपने आप जुड़ती चली गयीं। मुझे विश्वास था कि यह सब मोहिनी की रहस्यमय शक्तियों का किया-धरा है। उसी ने मुझे पहले एक दुर्घटना में फँसाया फिर उसी के कारण ही मुझे अपने एक हाथ से हाथ धोना पड़ा और अब उसकी ही रहस्यमय शक्तियों का परिणाम था कि मैं किसी निश्चित सजा से छुटकारा पाकर वापस अपने घर आ रहा था। मोहिनी के मनहूस अस्तित्व ने मुझे कहीं का न रखा था। मैंने कल्पना की दुनिया में एक बार फिर मोहिनी को देखना चाहा, परन्तु वह मेरे सिर पर नहीं थी। वह जरूर अभी तक साजिद के सिर पर अपना कब्जा जमाए हुए थी। मैं घर पहुँचकर आराम करने के लिये अपने कमरे में चला गया। दो दिन तक कोई उल्लेखनीय बात नहीं हुई। केवल इसलिए कि मेरे मुकदमे की कार्यवाही और मनोहर लाल की गिरफ्तारी का समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में मोटी-मोटी हैडलाइन में छप रहे थे। मेरे ऑफिस के लोग और दूसरे परिचित सुबह से शाम तक मेरी कुशलता को पूछने आते रहते, परन्तु डॉली मेरी हिदायत पर उन्हें बड़ी खूबसूरती से टालती रहती। मैं अपना कटा हुआ हाथ लेकर लोगों के सामने जाने से कतराने लगा था। तीसरे दिन भी मैं रोज की तरह नित्य-क्रिया से फारिग होकर अपने बिस्तर पर लेटा अखबार देख रहा था कि डॉली मुस्कराती हुई मेरे पास आयी। उसके हाथ में बादामी रंग का कोई लिफाफा मौजूद था। चेहरा ताजे गुलाब की तरह खिला हुआ था।

“कोई खास बात है?” मैंने अखबार से नज़र हटाकर पूछा। “बहुत खुश नज़र आ रही हो।”

“हाँ राज! भगवान ने मेरी सुन ली।”

“क्या बात है?”

“आप बताइए ऐसी क्या बात हो सकती है?” डॉली ने मेरे बराबर में बैठकर बड़े प्यार से पूछा।

“क्या पुलिस ने मेरी गाड़ी वापिस कर दी?” मैंने पूछा।

“जी नहीं! इससे ज्यादा खुशी की बात है।”

“चलो, मैं ही हार मान लेता हूँ! तुम्हीं बता दो।” मैंने डॉली के खूबसूरत बालों को सहलाते हुए कहा।

“राज! डैडी हमें लेने आ रहे हैं।”

“क्या…? उन्होंने तुम्हारी और मेरी भूलें माफ कर दी है?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ!” डॉली ने मेरे सीने पर अपना सिर रखते हुए कहा। “डैडी ने समाचार-पत्र में हमारे हालात पढ़कर हमें क्षमा कर दिया है। उन्होंने हमें तैयार रहने को लिखा है। परसों वह बम्बई पहुँच रहे हैं। अब हमारी चिन्ताओं के दिन समाप्त हो जाएँगें।”

“तुम्हारे मुँह में घी शक्कर...।” मैंने धीरे से कहा फिर अपने कटे हुए बाजू की तरफ हसरत भरी निगाहों से देखने लगा।

डॉली मेरे चेहरे के भावों को भाँपकर बोली – “राज! भगवान के लिये इन बातों को भूल जाइए। जब मैं आपका बाजू मौजूद हूँ तो फिर चिन्ता क्यों?”

“डॉली! मेरी अच्छी डॉली।” मैंने डॉली के स्वर में सच्ची प्रेमिका की झलक देखी तो बेअख्तियार उसे निबटाकर प्यार करने लगा। मैं उसकी खुशियों में बराबर का भागीदार होने का इजहार करना चाहता था।

दिन भर डॉली आवश्यक सामान पैक करने में व्यस्त रही। वह बेहद खुश थी। मैं देख रहा था, वह आवश्यकता से अधिक सामान बाँध रही है। इससे साफ प्रकट था कि वह कम से कम दो-चार महीने के लिये अपने मायके में रहने का इरादा रखती है। वरना इतने सामान की भला क्या जरूरत थी। बम्बई से मेरा दिल उचाट हो चुका था। इसलिए मैंने डॉली से कोई प्रश्न नहीं किया। मुझे खुशी थी कि डॉली के डैडी की नाराजगी खत्म हो चुकी है। अब कम से कम डॉली के लिये मेरे बाद कोई सहारा पैदा हो गया था। मुझे विश्वास था कि मैं अब कुछ चैन की साँस ले सकूँगा। निजी तौर पर मुझे डॉली के माता-पिता की खुशी या नाराजगी का कोई ख्याल न था।

डॉली चूँकि दिन भर की थकी-माँदी थी इसलिए रात का खाना खाते ही सो गयी। मैं अपनी आदत के अनुसार शाम को किसी बिस्तर पर लेटकर किसी किताब के कुछ पन्ने पलटने लगा। कभी-कभार मैं नजरें घुमाकर डॉली को भी देख लेता था, जिसके चेहरे पर आज सोते में भी भरपूर सुख और शांति के भाव उजागर थे।

काफी समय तक मैं किताब के पृष्ठ पलटता रहा, फिर अचानक मुझे मोहिनी का ख्याल आया। मोहिनी ने अब तक मेरे साथ जो कुछ किया था, उसकी एक-एक याद मेरे मस्तिष्क में सुरक्षित थी। उसने मुझे बेहिसाब दौलत दी थी। मुझे जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया था। मेरे ऐश-ओ-आराम के लिये दुनिया का हर सामान एकत्रित किया था। आज मेरे पास मोहिनी का दिया सब कुछ मौजूद था। इसके बावजूद मैं उससे अत्यंत नफरत करने पर मजबूर था। मेरा मस्तिष्क मोहिनी के ख्यालों में उलझा रहा। मैंने तय कर लिया कि अब जबकि डॉली के डैडी ने डॉली को क्षमा कर दिया है और मेरी अनुपस्थित में अपने पिता के पास भी रह सकती है तो मैं मोहिनी की ज्यादतियों का इन्तकाम जरूर लूँगा। चाहे मुझे उसके बदले अपने जीवन से ही हाथ क्यों न धोना पड़े। मैं न जाने कब तक अपने विचारों में गुम रहा।

फिर अचानक मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी हो। मैंने कल्पना की दुनिया में अपने बिखरे हुए बालों पर नज़र डाली तो मेरा रक्त प्रवाह तीव्र हो गया। मोहिनी मेरे सिर पर दोबारा आ गयी थी। उसके चेहरे पर थकान के लक्षण मौजूद थे। उसकी कमल जैसी आँखों में पहली बार मैंने चिन्ताओं की झलकियाँ देखी थी। वह मेरे सिर पर चित लेटी किसी सोच में डूबी थी। उसने अपने हाथों को अपने सिर के नीचे तकिया बना रखा था और शून्य में घूरे जा रही थी। कभी-कभी अपने होंठ भी काटने लगती। न जाने वह इस समय किस सोच में डूबी हुई थी। मैं घृणा भरी दृष्टि से उस नन्हीं, परन्तु भयानक युवती को घूरता रहा जो आश्चर्यजनक शक्तियों की मलिका थी। मुझे उसको चिन्ताओं में डूबा देखकर आश्चर्य हुआ। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि वह दुनिया की हर असम्भव बात पलक झपकते ही सम्भव बना सकती थी तो फिर यह सोच-विचार और चिन्ता किसलिए? आखिर वह कौन सी अनहोनी बात थी, जिसने मोहिनी को भी सोचने पर मजबूर कर दिया था। आज से पहले मैंने कभी उसे इस तरह बेचैन महसूस नहीं किया था। शायद वह किसी भीतरी चिन्ता में फँसी हुई थी। परन्तु मुझे क्या पड़ी थी जो उसके संबंध में सोचता। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और सोने की चेष्टा करने लगा। परंतु ठीक उसी दशा में जबकि मैं निद्रा में डूबने ही वाला था, मोहिनी के नुकीले पंजों की चुभन अपने सिर पर महसूस कर मैंने हड़बड़ाकर आँखें खोल दीं। मोहिनी मेरे सिर पर खड़ी मुझे अपनी खूंखार आँखों से घूर रही थी।
 
“राज?” मुझे अपनी ओर देखता पाकर उसने बड़ी गंभीरता से पूछा। “तुमने मुझे चिन्तित महसूस करके आँखें क्यों बंद कर ली थीं?”

“तुम और चिन्ता! बहुत खूब!” मैंने हिकारत से कहा। “क्या चिन्ता सवार हो गयी है तुम्हें...?”

“आश्चर्य है कि तुम अभी भी मुझसे नाराज हो। काश तुम जानते...।” मोहिनी अपना वाक्य अधूरा छोड़कर शून्य में निहारने लगी तो मैंने तेजी से पूछा –

“अब तुम मेरे पास क्या लेने आयी हो मोहिनी? अब तो मैं इस योग्य भी नहीं रहा कि किसी बेगुनाह का गला घोंटकर तुम्हारे लिये उसे पेश कर सकूँ।”

“क्यों?” मोहिनी के चेहरे पर अचानक मुस्कराहट फैल गयी। मुझे शोख निगाहों से देखकर वह बड़ी मासूमियत से बोली। “क्या तुम एक हाथ से किसी को खंजर या गोली नहीं मार सकते।”

“मोहिनी!” मैंने बिगड़े हुए तेवर से जवाब दिया। “तुमने देख लिया होगा कि मैं अपनी हठ का किस प्रकार पक्का हूँ। अब इस विचार को दिल से निकाल दो कि मैं तुम्हारे लिये कोई जुर्म करूँगा। हाथ जाने के बाद अब मुझे जिन्दगी से कोई लगाव नहीं है। बेहतर होगा कि तुम मेरे सिर से दफा हो जाओ।”

मोहिनी के चेहरे पर उभरने वाली मुस्कराहट तुरन्त समाप्त हो गयी। एक पल तक मुझे गहरी निगाहों से देखती रही, फिर किसी सोच में डूब गयी। मुझे मोहिनी के आज के हाव-भाव पर आश्चर्य हो रहा था। आज वह न जाने क्यों बार-बार सोच में डूब जाती थी?

कुछ क्षणों तक वह अपने ख्यालों में डूबी रही। फिर मेरी ओर देखते हुए कोमल स्वर में बोली। “राज! तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो। मुझे दुख है कि तुम्हारी मूर्खता ने मुझे सजा देने पर मजबूर कर दिया। परन्तु तुम्हें एक हाथ कट जाने पर दुख नहीं होना चाहिए। मैं तुम्हारा हाथ हूँ। तुम मुझे डॉली की तरह अपना क्यों नहीं समझते। मैं किसी विशेष अवसर पर तुम्हारे हाथ को फिर निकाल दूँगी। दोस्तों के हिसाब हमेशा दिल में रहने चाहिए।”

“बस करो मोहिनी!” मैं दाँत पीसकर बोला। “यदि कभी समय आया तो मैं तुम्हारे सारे हिसाब चुका दूँगा।”

“मुझे ख्याल है कि मेरे कारण तुम्हें एक हाथ खोना पड़ा, परन्तु तुम्हें यह सजा देना जरूरी था। मेरा विचार है कि तुम मेरे खिलाफ कोई कदम उठाओगे तो यह हाथ तुम्हें मेरी शक्तियों का परिचय देता रहेगा। हाथ चला गया तो गया। उसके बदले मैंने तुम्हें एक बड़ी मुसीबत से छुटकारा नहीं दिलाया? यदि मैं इंस्पेक्टर के सिर पर कब्जा करके उसे तुम्हारी हिमायत न खड़ा करती तो क्या होता? तुम्हें एक हाथ से चक्की पीसनी पड़ती। क्या मैंने तुम्हें इस सजा से छुटकारा दिलाकर दोस्ती का हक अदा नहीं किया? तुमने देखा नहीं कि मैंने तुम्हें बचाने के लिये घटनाओं का कैसा ताना-बाना बुना कि अदालत भी चकरा गयी? हालाँकि ऐसे मुकदमे में दोबारा गौर किया जाए तो सच सामने आने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। निरंजन लाल की मौत, उसके घरवालों की शहादतें, उस रात उसकी गाँठ में छिपी इत्यादि के बारे में सरलता-पूर्वक सच्ची बात मालूम की जा सकती है। परन्तु मैंने अदालत में एक जादू सा फैला दिया था। तुम मेरी वजह से बच गये।

“जहाँ तुमने इतने सारे उपकार किए हैं, वहीं एक उपकार और करो...।” मैंने कठोर शब्दों में कहा। “या तो तुम एक ही बार मुझे मौत के मुँह में डाल दो या सदा के लिये मेरा पीछा छोड़ दो।”

‘‘नहीं राज! ऐसी बात क्यों करते हो? अभी हमारी दोस्ती इतनी जल्दी समाप्त नहीं हो सकती। हाँ, एक वचन मैं तुम्हें जरूर दे सकती हूँ। वह यह कि भविष्य में मैं डॉली के सिलसिले में कोई किसी प्रकार की टाँग नहीं अड़ाऊँगी। तुम यही चाहते हो न?”

मैंने इस बार मोहिनी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। खामोशी से उसके चेहरे को ताकता रहा और इस बात का अन्दाजा लगाता रहा कि उसके हाव-भाव में मित्रता क्यों है? और उसकी बातों में सच्चाई कहाँ तक हो सकती है?

“तुमने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया राज!” मोहिनी ने आलथी-पालथी मारकर मेरे सिर पर लेटते हुए कहा। “क्या तुम्हें इस बात पर सन्देह है कि मैं बाद में अपने वचन से फिर जाऊँगी?” क्या मैंने कभी ऐसा किया है? हाँ, तुम जरूर मुझे भूल जाते हो। मुझे भी और अपने वादों को भी।”

“डॉली मेरी पत्नी है। उसने मेरे लिये बड़े-बड़े दु:ख सहे हैं। मैं नहीं चाहता कि अब वह कोई दु:ख उठाए।”

मेरे दिल ने भी यही सुझाव दिया था कि हालात को देखते हुए मैं मोहिनी के रहस्यमय आस्तित्व से समझौता कर लूँ। दूसरी स्थिति में अगर वह अपनी आन पर उतर आती है तो मुझे अन्धे कुएँ में आँख बन्द करके छलांग लगाने पर मजबूर कर सकती थी। उसकी आश्चर्यजनक शक्तियों के लिये कोई बात असंभव नहीं है। मैं उससे बहुत ज्यादा भयभीत हो गया था।

‘“मैं वचन देती हूँ कि डॉली अब किसी दुर्घटना में नहीं फँसेगी।” मोहिनी ने होंठों-होंठों में मुस्कराते हुए कहा। “और कुछ? कोई और इच्छा?”

“तुम डॉली के सम्बन्ध में टाँग अड़ाने की कोशिश नहीं करोगी?” मैंने गंभीरता से कहा।

“मुझे मंजूर है।” मोहिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाते हुए कहा।

“हो सकता है कि कभी वह तुम्हारे अस्तित्व को मेरे सिर पर महसूस करके आपे से बाहर हो जाए।”

“मैं उसकी किसी बात का बुरा नहीं मानूँगी।”

“सम्भव है वह मुझे तुम्हारे चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिये किसी प्रकार का भी कदम उठाये।”

“अब वह ऐसा नहीं करेगी।” मोहिनी ने बड़े विश्वास के साथ जवाब दिया। फिर मुस्करा कर बोली। “अभी उसे पता नहीं, परन्तु जिस दिन उसे यह बात मालूम हो गयी कि मेरी शक्ति ने उसके और उसके पिता के बीच खड़ी घृणा की दीवार को ढाया है तो वह मुझको अपना कृतज्ञ समझेगी।”

“तो क्या डॉली के पिता ने वह टेलीग्राम तुम्हारी ही इच्छा पर दिया था।”

“जी हाँ मिस्टर राज!” मोहिनी बड़े लगावट भरे अन्दाज में मुस्कराकर बोली। “यूँ भी बम्बई में तुम्हारा और डॉली का रहना अब ठीक नहीं है। उचित यही है कि तुम दोनों कुछ समय के लिये यहाँ से हट जाओ।”

अचानक मेरे मस्तिष्क में एक विचार ने बड़ी तीव्रता से सिर उभारा। मोहिनी मुझे बम्बई से दूर रहने का सुझाव क्यों दे रही है? क्या इसके पीछे कोई विशेष उद्देश्य है? क्या वह मुझे भविष्य में आने वाली किसी दुर्घटना से बचाना चाहती है, या फिर इस सुझाव के पीछे मोहिनी का कोई षड्यन्त्र छिपा है। मैं बड़ी गंभीरता से सोचने लगा कि मोहिनी अजब रहस्यमय और आश्चर्यजनक शक्तियों की स्वामी है, तो फिर आखिर वह कौन सा खतरा हो सकता है, जिससे निपटना उसके वश से बाहर है। दूसरी ओर यह विचार भी मुझे न जाने क्यों चिंतित कर रहा था कि मोहिनी ने अचानक डॉली तथा उसके मध्य कोई समझौता करने की स्कीम क्यों बना डाली? क्या उसमें कोई राज छिपा है?

कुछ समय तक मैं मस्तिष्क में गड्ड-मड्ड होने वाले प्रश्नों पर गौर करता रहा फिर, मैंने मोहिनी की तरफ देखा। वह अब मेरे सिर पर औंधी लेटी थी। उसने दोनों कोहनियाँ मेरे सिर पर टेक रखी थीं और अपनी हथेलियों पर ठोड़ी टिकाए मुझे मुस्कराती नजरों से देख रही थी। उसके बहुत सुन्दर गहरे नेत्रों में किसी षड्यन्त्र की बजाय मेरे लिये प्रेम का सागर हिलोरें मार रहा था। एक पल के लिये मैं हड़बड़ा गया, परन्तु फिर मैंने बड़ा सावधानी का प्रश्न किया।

“क्या बम्बई में मेरे और डॉली के लिये कोई खतरा पेश आने वाला है?”

“मेरे होते हुए तुम्हें या डॉली को कभी किसी प्रकार का कोई खतरा पेश नहीं आ सकता। जब तक मैं तुम दोनों पर मेहरबान हूँ, तुम्हें चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। तुम अनावश्यक बातें क्यों सोच रहे हो राज?”

“फिर तुम हमें बम्बई छोड़ने का सुझाव क्यों दे रही हो? क्या इसमें कोई विशेष योजना छिपी है।”

“हाँ!” मोहिनी गंभीरता से बोली। फिर उठकर दोबारा मेरे सिर पर यूँ टहलने लगी जैसे किसी दु:ख में फँसी हो। कोई चुभता हुआ गम जैसे उसे अन्दर ही अन्दर सता रहा हो।

मैं खामोशी से उसकी बेचैन दशा का अनुमान लगाता रहा। वह कुछ क्षणों तक चहलकदमी करती रही फिर पलटकर मुझसे बोली –

“राज! क्या तुम्हें इस बात से खुशी नहीं है कि डॉली के पिता ने तुम दोनों को सहृदय क्षमा कर दिया है और अब स्वयं वह तुम्हें और डॉली को लेने आ रहे हैं।”

“इससे अधिक प्रसन्नता मुझे इस बात की है कि डॉली खुश है।” मैंने जल्दी से कहा। “परन्तु मेरे बम्बई में रहने से क्या हर्ज है?”
 
मोहिनी ने मेरे प्रश्न पर मुझे यूँ घूरकर देखा जैसे मेरे विचारों को पढ़ने की चेष्टा कर रही हो। उस समय उसकी आँखों में एक रहस्यमय चुम्बकीय खिंचाव मौजूद था। उसने थोड़ी देर बाद कहा – “सुनो राज! तुम्हारे दिल में जो संदेह उभर रहे हैं, उन्हें अपने ज़हन से निकाल दो। मेरा नाम मोहिनी है। बहुत सारी रहस्यमय शक्तियाँ मिलकर भी मुझे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचा सकती। मुझे असंभव को संभव बनाना आता है। तुम यदि बम्बई में रहना चाहते हो तो बड़े शौक से रहो। मुझे किसी प्रकार की आपत्ति नहीं। जब समय आएगा तो मैं तुम्हें उन हालात से बेखबर कर दूँगी, जिसको देखते हुए मैंने तुम्हें बम्बई छोड़ने का सुझाव दिया था।” मोहिनी एक ही साँस में कह गयी। फिर बोली – “जब मैंने तुम्हें बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से छुटकारा दिलाया है, तो मेरे किसी आड़े समय पर तुम कैसे इंकार कर सकते हो?”

“क्या मतलब?” मैंने चौंकते हुए पूछा। “क्या तुम मुझे अपनी आवश्यकता हेतु यहाँ से हटाना चाहती हो?”

“हाँ! लेकिन विश्वास रखो, वह आवश्यकता इन्सानी खून की नहीं है।”

“फिर?” मैंने मोहिनी की आँखों में झाँकते हुए प्रश्न किया।

“राज! मैं समय से पहले तुम्हें पूरी बात विस्तारपूर्वक नहीं बताऊँगी। बस इतना समझ लो कि अगर उस अवसर पर तुम मेरे काम आ गये तो जीवन भर ऐश करोगे। मैं कभी तुम्हें किसी बात के लिये मजबूर नहीं करूँगी। तुम जो कहोगे वही करूँगी। यह मेरा वायदा है।”

मोहिनी की बातों का उद्देश्य मैं न जान सका। फिर भी इस बात का मुझे विश्वास था कि वह उस समय जो कुछ मुझसे कह रही है वह जरूर पूरा करेगी। मैं कुछ समय तक खाली-खाली नजरों से मोहिनी को ताकता रहा। सदा के विरूद्ध आज वह कुछ अधिक ही संयत नज़र आ रही थी।

मैंने कुछ सोचकर कहा – “क्या मैं डॉली को बता दूँ कि तुम दोबारा मेरे सिर पर आ गयी हो?”

“तुम जानो!” मोहिनी ने लापरवाही से उत्तर दिया। “वैसे मेरी मानो तो डॉली से कुछ न कहो। बम्बई से रवानगी के बाद यदि तुम अचानक डॉली को सब कुछ बता दो तो अधिक उचित रहेगा।”

मैंने मोहिनी के सुझाव पर चलते हुए डॉली को दूसरे दिन भी यह बात नहीं बतायी कि मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर सवार हो चुकी है। तीसरे दिन कार्यक्रम के अनुसार डॉली के माता-पिता बम्बई पहुँच गये। डॉली अपने माता-पिता को दोबारा पाकर खुशी से दीवानी हुई जा रही थी। मैंने भी उसके माता-पिता का अच्छी प्रकार स्वागत किया। मुझे इस बात का बड़ा अहसास था कि मैं अपना एक हाथ गँवा चुका हूँ। परन्तु उन लोगों को चूँकि वास्तविक घटना का ज्ञान नहीं था इसलिए मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

दो दिन तक घर में हंगामा रहा, तीसरे दिन हम अपनी विदाई यात्रा पर रवाना हो गये। मैंने यही सोचा था कि इस यात्रा में अवसर निकालकर डॉली को बता दूँगा कि उसकी खुशी का कारण मोहिनी बनी है, परन्तु मुझे अवसर न मिला। डॉली अधिकतर समय अपनी माँ के पास रही। उसके पिता से मैं बातचीत में व्यस्त रहता था। मेरे लिये हर्ष की बात थी कि डॉली के माता-पिता मुझे क्षमा कर चुके हैं। उनका बर्ताव ऐसा ही था जैसा एक सभ्य घराने के दामाद के साथ होता है।

डॉली के घर पहुँचकर जब मैंने डॉली को बताया कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी है तो वह उदास हो गयी। परन्तु जब मैंने उसे विस्तार-पूर्वक सारी बातें बतायीं तो उसके दिल का गुबार छँट गया। वह वास्तव में मोहिनी को अपना हमदर्द समझ रही थी। मैंने उसे विश्वास दिलाया था कि मोहिनी हमारे सम्बन्धों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। न ही भविष्य में कभी किसी बेगुनाह की हत्या पर मुझे मजबूर करेगी। डॉली ने एक पत्नी की हैसियत से मेरी बात पर विश्वास कर लिया, परन्तु मैं महसूस कर रहा था कि वह मोहिनी की मेरे सिर पर उपस्थति से कुछ अधिक प्रसन्न नहीं है।

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मुझे डॉली के घर आए दो महीने गुजर चुके थे। उस बीच में मोहिनी के भीतर मैं आश्चर्यजनक परिवर्तन महसूस कर रहा था। वह हर समय मेरे सिर पर लेटी किसी विचार में खोई रहती। कभी दो-एक दिन के लिये बिना कुछ कहे कहीं चली जाती। फिर दोबारा खामोशी से लौट आती। कोई चिन्ता जैसे उसे भीतर ही भीतर घुलाए दे रही थी। वह कुछ बीमार सी नज़र आने लगी थी। मैंने उससे पूछना चाहा परन्तु फिर यह ख्याल आया कि मुझे मोहिनी से अधिक मेल-जोल नहीं बढ़ाना चाहिए। परन्तु वह उदास-उदास रही और फिर मुझसे अपने दिल पर सब्र न हो सकता। मोहिनी ने मुझे न जाने कितने दु:खों में फँसाया था, परन्तु उसके उपकार मेरे ऊपर कम नहीं थे। दो महीने तक तो मैंने उससे कुछ नहीं कहा लेकिन एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया।

“मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे चेहरे का रंग दिन प्रतिदिन ढलता जा रहा है।”

मोहिनी मेरे प्रश्न पर गुलाब के फूल के समान खिल उठी। खुशी भरी नजरों से मेरी ओर देखती हुई बोली। “मुझे आश्चर्य है राज, तुम्हें मेरा विचार क्यों आ गया? मैं तो समझ रही थी कि तुम मुझे चिन्तित देखकर प्रसन्न होगे।”

“मोहिनी! तुमने बम्बई से चलते समय कहा था कि कदाचित तुम पर कोई मुसीबत टूट पड़ी है, परन्तु तुमने विस्तार से कुछ नहीं बताया था।” मैंने उससे पूछा।

“मुझे याद है।” मोहिनी एक ठण्डी आह भरकर बोली। “राज! मैं तुम्हें एक भेद की बात बताऊँ। तुमने आज मुझे दिल से पुकारा है। सुनो। संसार की समस्त शैतानी शक्तियाँ यदि मिलकर भी मुझे परेशान करना चाहे, तो मैं अकेले उनका मुकाबला कर सकती हूँ। परन्तु एक शक्ति ऐसी है जिसके आगे मेरा वश नहीं चलता।”

“वह भला कौन सी शक्ति है?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“तुम्हें अपने पुराने मित्र रामदयाल की माँ याद है। उसने तुम्हें एक सुझाव भी दिया था कि यदि तुम एक मन्त्र पढ़ डालो तो मुझे अपने अधिकार में कर सकते हो। परन्तु तुमने इंकार कर दिया था। सच पूछो तो मुझे तुम्हारी यही बात अच्छी लगी थी, इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे पास आ गयी। दूसरी स्थिति में मुझे अपने अधिकार में करने के लिये तुम्हें रामदयाल की माँ को बताया मंत्र जाप करना पड़ता जिसके लिये बड़ी साधना की आवश्यकता होती है। हर कोई राजष्य उसमें सफल नहीं हो सकता। बड़े-बड़े महा-पण्डित, पुजारी भी मुझे अधिकार में करने से घबराते हैं। यदि उनके जाप में तनिक भी भूल-चूक हो जाती है तो फिर वे मेरा राशन बन जाते हैं।”

मैं बड़ी खामोशी और आश्चर्य से मोहिनी की बात सुनता रहा, फिर जब वह खामोश हुई तो मैंने न जाने क्यों धड़कते हुए दिल से पूछा –

“मोहिनी! क्या आजकल कोई पण्डित, पुजारी या मौलवी तुम्हें वश में करने के लिये जाप कर रहा है?”

“हाँ!” मोहिनी ने भयभीत स्वर में कहा। “मुझे प्राप्त करने के लिये उसे एक सौ एक दिन तक उस मंत्र का जाप करना है जिसमें से सत्तर से अधिक दिन गुजर चुके हैं।”

“अभी तक उससे कोई भूल नहीं हुई?” मैंने तेजी से पूछा।

“नहीं!” मोहिनी ने कुछ विचार करते हुए जवाब दिया। फिर मेरी आँखों में आँखें डालकर बोली। “इसे संयोग ही समझो राज कि मैं उस पण्डित के इस विचार से तुरन्त आगाह हो सकी कि वह मुझे अपने अधिकार में करने के सपने देख रहा है। क्योंकि उन दिनों मैं इंस्पेक्टर साजिद के सिर पर मौजूद थी। मैं तुम्हें दुर्घटना के आरोप से बचाने में लगी हुई थी। बस उन्हीं दिनों वह अपने मण्डल में चला गया।”

“क्या अब तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती?”

“जब तक वह मण्डल के भीतर है, मैं कुछ नहीं बिगाड़ सकती। हाँ, यदि उससे कोई भूल हो जाए तो मैं पलक झपकते ही उसकी साँस बाहर निकाल सकती हूँ।”

“यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो गया तो?” मैंने कुछ बेचैन होकर प्रश्न किया।

“यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो गया तो राज, मुझे उसका गुलाम बन जाना पड़ेगा और फिर उस समय तक उसकी हर आज्ञा का पालन करना मेरा कर्तव्य होगा जब तक वह मर नहीं जाता।”

मोहिनी ने यह वाक्य कहते समय मुझे ऐसी हसरत भरी निगाहों में देखा कि मैं तड़प उठा। उसकी नजरों में प्रार्थना थी। एक ऐसी प्रार्थना जिसे मैं नजरअन्दाज नहीं कर सका। न जाने क्यों अब मुझे इस कल्पना से ही भय होने लगा कि मोहिनी मुझसे सदा के लिये जुदा हो जाएगी। उसने मेरे लिये न जाने कितनी कुर्बानियाँ दी थीं। अनगिनत उपकार किए थे। मुझे उससे एक लगाव हो गया था। एक ऐसा लगाव जिसे मैं कोई नाम नहीं दे सकता। केवल महसूस कर सकता था। उस समय मोहिनी के सिलसिले में मैंने उस भावुकता पर स्वयं भी आश्चर्यचकित था कि जो मोहिनी एक लम्बे समय से मेरे सिर पर सवार हो रही थी और उसने मुझे दुनिया के तमाम इन्सानों से अलग एक अजीबो-गरीब जिन्दगी गुजारने पर मजबूर कर दिया था। उसी के साथ उसने मेरे दिल पर कुछ दाग भी दिए थे, कुछ दु:ख भी पहुँचाए थे। परन्तु इन सबके बावजूद मुझे उससे एक दिली लगाव महसूस हो रहा था। वह मुझे उदास और दु:खी नज़र आयी तो मेरा जी उसे सीने से चिपटाने को चाहा। उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव अपने सिर पर महसूस करने के बाद पहली बार मुझे आभास हुआ जैसे मोहिनी के जिस्म में बड़ी कशिश है। जैसे मैंने उसके हसीन जिस्म का जायजा न लेकर कोई बड़ी गलती की हो।

मुझे यह भी विचार आ रहा था कि यदि मैं उस आड़े समय पर मोहिनी के काम आ गया और उसे बचाने में सफल हो गया तो वह नि:संदेह मेरी बेदाम कनीज बनकर रहेगी। मैं जो चाहूँगा वह करूँगा, वह मुझे मिल जाएगा। यूँ तो भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ मौजूद था, परन्तु और दौलत की हवस किस इन्सान को नहीं होती। इन्सानी फितरत यही है कि इन्सान चाहे जितना दौलतमन्द क्यों न हो जाए, उसे और दौलतमन्द बनने की इच्छा बेचैन किए रहती है। मेरी हालत भी उस समय कुछ वैसी ही थी इसलिए मैंने धड़कते हुए दिल से कहा –

“मोहिनी! क्या मैं तुम्हारे किसी काम आ सकता हूँ?”

“राज! मैं तुम पर कुर्बान हो जाऊँ। तुम इस समय जो सोच रहे हो, काश तुम पहले सोचते। काश तुमने मुझे डॉली के समान महसूस किया होता।” मोहिनी का स्वर जज्बात में डूबा हुआ था।

“मोहिनी मुझे बताओ, मैं तुम्हारे क्या काम आ सकता हूँ?” मैंने भी उसी तरह भावुकता भरे स्वर में पूछा।

“राज! मुझे विश्वास है, तुम यदि चाहो तो मुझे बचा सकते हो। इसके बदले में मैं तुम्हारी बांदी बनने को भी तैयार हूँ।”

“मैं तुम्हें हर मूल्य पर, हर कीमत पर उस पण्डित के गंदे षड्यन्त्रों से मुक्ति दिलाकर दम लूँगा।”
 
मैंने निर्णायात्मक स्वर में कहा तो मोहिनी खिल उठी। मुझे प्यार भरी नजरों से देखते हुए बोली – “मैंने तुम्हारा चुनाव करने में किसी प्रकार की गलती नहीं की राज। तुम बहुत अच्छे हो, परन्तु अब अपने दिल में मेरे लिये किसी प्रकार की बुराई मत लाना।”

“मुझे बताओ कि अब मुझे उस पण्डित के बच्चे के लिये क्या करना चाहिए?” मैंने भावुक होकर पूछा।

“इतनी शीघ्रता की आवश्यकता नहीं राज। कुछ दिनों तक और रुक जाओ। फिर मैं तुम्हें उस पण्डित के सम्बन्ध में सब कुछ विस्तारपूर्वक बताऊँगी।”

उस रात मैंने मोहिनी को जैसे एक युग के बाद चैन की नींद सोता हुआ पाया था। वह खर्राटे ले रही थी। वह कोई परी मालूम हो रही थी। नींद में उसके चेहरे पर अजीब मासूमियत थी। मैंने मोहिनी के अस्तित्व को देखा तो मुझे उस पर अनायास प्यार आ गया। मैं उसे सोते हुए देख रहा था। एक खूबसूरत नन्हीं सी युवती के लिये मेरे सीने में भविष्य के सुनहरे सपने थे। मेरे पास मोहिनी थी रहस्यमय शक्तियों की स्वामी।

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मुझे डॉली के घर आए हुए ढाई महीने गुजर चुके थे। डॉली के माता-पिता हर समय मेरी दवा में लगे रहते। मुझे यहाँ हर प्रकार का सुख और आराम प्राप्त था। परन्तु जब से मुझे यह मालूम हुआ था कि किसी पण्डित ने मोहिनी को अपने अधिकार में करने के लिये कोई जाप शुरू कर दिया है तो मुझे हर समय बेचैनी रहती। मैं अक्सर सोचता, मोहिनी यदि मुझे छोड़ने पर मजबूर हो गयी तो मेरा क्या होगा? मैं जो एक लम्बे समय से मोहिनी को अपने सिर पर सहन किए हुए था, क्या अब उसकी जुदाई को भी सहन कर सकूँगा? मोहिनी एक तरह से मेरा सहारा बन चुकी थी। यह सहारा मुझसे छीन गया तो मेरा क्या अंजाम होगा? लेकिन समय ने दूसरा रुख अपना लिया था। मोहिनी ने मेरे लिये अपने व्यवहारा में परिवर्तन कर दिया था। अब वह मेरे लिये हानिकारक न थी और मुझे उससे प्रेम सा हो चला था। उसने बहुत दिनों से मुझसे किसी प्रकार की कोई माँग नहीं की थी। वह हर समय चुपचाप लेटी अपनी सोचों में गुम रहती। उदास-उदास सी मोहिनी को देखकर मुझे उस पर दया आने लगती और उसे गहरी चिन्ता में डूबा देखकर मुझ पर उदासी छा जाती। मोहिनी के चेहरे पर अब पहले जैसी ताज़गी न रही थी। शायद इसलिए कि उसने डेढ़-दो महीने से खून का एक कतरा भी न चखा था। इन्सानी खून जो मोहिनी के रहस्यमय आस्तित्व को जीवित रखने का एकमात्र उपाय था। उसकी रंगत पीली पड़ती जा रही थी। वह हर समय बीमार-बीमार सी नज़र आती। उसकी शोख आँखों की विशेष चमक भी खत्म हो गयी थी। उसका हुस्न जो कभी अधखुले गुलाब के समान ताजा और खिला हुआ नज़र आता था। धीरे-धीरे बासी पंखुड़ियों की तरह मुरझाता जा रहा था।

एक दिन जब मैं डॉली के पिता की आलीशान कोठी के लॉन में बैठा हुआ कल्पना की दुनिया में मोहिनी की बेबसी पर विचार कर रहा था कि तभी अचानक एक ख्याल मेरे ज़हन में उभरा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मोहिनी जानबूझकर अपने जीवन का अन्त करने पर तुल गयी हो। हो सकता है वह भी मेरी तरह आने वाले क्षणों को महसूस करके भयभीत हो गयी हो और उसने गुलामों की सी जिंदगी के बदले मौत को गले लगाने की ठान ली हो। और जानबूझकर इन्सानी खून से मुँह मोड़ लिया हो। यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो मोहिनी मर जाएगी। उसका अस्तित्व सदा के लिये समाप्त हो जाएगा। उसका हुस्न, उसकी शोख-चंचल मुस्कुराहट, उसकी दिलकश मासूम बातें और उसकी रहस्यमय शक्ति सब धूल में मिल जाएगी और यह सब कुछ मेरे कारण होगा। मोहिनी ने मुझे बताया था कि उन दिनों वह इन्स्पेक्टर साजिद के सिर पर सवार थी और मुझे कार वाली दुर्घटना के संगीन आरोप से रिहा कराने में इस कदर व्यस्त थी की उसे ज्ञात न हो सका कि वह पण्डित कब अपने मण्डल में चला गया, जो अपना काम पूरा करके मोहिनी की रहस्यमय शक्ति को अपना गुलाम बनाना चाहता था।

अब मोहिनी की जुदाई मुझे किसी तरह मंजूर में न थी। उसी चिन्ता में फँसा था। कोई बात समझ में न आती थी। मैंने देखा कि वह उस समय भी मेरे सिर पर बेसुध पड़ी है और लम्बी-लम्बी साँसें ले रही है। यूँ जैसे वह वास्तव में अपने जीवन से निराश हो गयी हो। मैं उसे दीवानों की तरह देखता रहा। फिर अचानक मैंने सिर को जोर से झटका दिया। मुझे अपने इरादे में मायूसी नहीं हुई। मोहिनी यूँ चौंककर जागी जैसे कोई भयानक सपना देखकर डर गयी हो। उसके मुरझाए हुए गाल और मायूस नजरों में मुझे उसका जीवन घुटता हुआ महसूस हुआ। मेरी बेचैनी अब बढ़ गयी। मैंने उसे सम्बोधित करते हुए भावुकता भरे स्वर में कहा –

“मोहिनी! तुम मेरी जिन्दगी हो। मुझे तुम्हारी यह उदासी खाये जा रही है। मेरी जान, मेरे लिये जिन्दा रहो।”

“राज!” मोहिनी ने मुझे डबडबाये नेत्रों से देखा। फिर ठण्डे स्वर में बोली। “मैं जानती हूँ कि तुम मेरी सारी भूलों को भूल चुके हो। हाँ, अब तुम मुझसे सच्चा प्रेम करने लगे हो, इसीलिए तो मैं चाहती हूँ कि उस मनहूस घड़ी के आने से पहले मैं अपने अस्तित्व को समाप्त कर दूँ, जब कोई दूसरा मेरा स्वामी बन जाए और मैं तुम्हारे पास दो पल आने से भी मजबूर हो जाऊँ।”

“भगवान के लिये ऐसा मत कहो मोहिनी। अब बात वह नहीं रही जो पहले थी। यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं जिन्दा न रह सकूँगा।” मैंने तेजी से कहा। “मैं तुम्हारे जीवन और आजादी के लिये सब कुछ कर गुजरूँगा। तुम्हें यदि इन्सानी खून की आवश्यक्ता है तो मैं वह भी पूरी करने को तैयार हूँ। मैं उस पण्डित को नरक में भेज दूँगा। मिट्टी में मिला दूँगा, जो तुम्हें मुझसे छीन लेने के सपने देख रहा है। मुझे बताओ मोहिनी कि वह कहाँ बैठा अपना नापाक जाप पूरा कर रहा है। तुम्हारे लिये मैं मौत से भी टकराने को तैयार हूँ।”

“मुझे मालूम है राज!” मोहिनी के फीके होंठों पर एक चमक सी उभरी और फिर वह मेरी आँखों में आँखें डालकर बोली। “तुम्हें मेरी किस कदर चिन्ता है। काश ऐसा होता कि हम युगों तक एक-दूसरे के साथ-साथ रह सकते।”

“हम सदैव एक-दूसरे के लिये जिन्दा रहेंगे मोहिनी। तुम मुझे केवल उस मरदूद पण्डित का पता बता दो। उसके बाद मैं सब ठीक कर दूँगा।”

“राज! मुझे तुम्हारे ऊपर पूरा विश्वास है। इसके बावजूद मैं फिलहाल उस पण्डित के सम्बन्ध में कुछ नहीं बता सकती।”

“क्यों? क्या तुम्हें इस बात का पता नहीं कि वह किस जगह बैठा अपना मनहूस जाप कर रहा है।”

“मुझे सब कुछ पता है राज। परन्तु जब तक पंडित अपने मण्डल में है, तुम भी उसका बाल बाँका नहीं कर सकते। मैं जानबूझकर तुम्हें किसी खतरे में नहीं डालना चाहती।”

“फिर इसका कोई न कोई हल तो होगा?”

“सब्र से काम लो राज। अभी सत्रह-अट्ठारह दिन और बाकी है। इस बीच कुछ न कुछ उपाय तो करना ही होगा।” मोहिनी ने कुछ सोचते हुए कहा। फिर बोली। “तुम मेरा इतना ध्यान रखते हो, मेरे लिये इतना ही काफी है।”

मैं मोहिनी से बात कर रहा था कि तभी डॉली आ गयी। मैं अब डॉली की उपस्थिति में भी अक्सर मोहिनी से बातें कर लिया करता था। परन्तु उस समय चक्कर चूँकि दूसरा था इसलिए मैंने चुप्पी साध ली। डॉली उस समय सदा के विपरीत मुझे गंभीर नज़र आ रही थी। वरना वह जब से यहाँ आयी थी हर समय मुस्कराती रहती थी।

“क्या कोई विशेष बात है?” मैंने डॉली के निकट आने पर उसकी गंभीरता का कारण पूछा।

“राज! मैं आपसे इस समय एक विशेष विषय पर बात करना चाहती हूँ।”

“मुझे बताओ, आखिर बात क्या है?”

“डैडी को आजकल बड़ी चिन्ता है।” डॉली ने धीरे से कहा। “बहुत दिनों से वह एक ठेके के चक्कर में पड़े हुए हैं। हजारों रुपया उन लोगों को खिला चुके हैं, जिन्होंने वायदा किया था कि टेण्डर उनके नाम से खोल दिया जाएगा। परन्तु अब दूसरी पार्टी मुकाबले पर आ गयी है।”

“क्या तुम्हारे डैडी को यह घाटा मंजूर नहीं?”

“यह बात नहीं है।” डॉली ने तेजी से कहा। “दरअसल डैडी इस तरह के दूसरे धंधे अक्सर करते हैं। ठेकों में उनकी पुरानी दिलचस्पी रही है और पुस्तकें छापने का धन्धा उनका एक शौक भर है। इस मामले में डैडी और इस पार्टी के बीच बहुत दिनों से कम्पटीशन चल रहा है। इसलिए डैडी ने मामले को अपनी इज्जत का सवाल बना लिया।”

“तुम मुझसे क्या चाहती हो?” मैंने डॉली की बात का तात्पर्य न समझते हुए पूछा। कारोबारी मामला और फिर डॉली के पिता के अन्दरूनी मामलों में मैंने कभी हस्तक्षेप नहीं किया था, इसलिए तुरन्त मैं न समझ सका कि डॉली इस सिलसिले में मुझसे क्या चाहती है।

“राज! यह डैडी की इज्जत का सवाल है इसलिए मैं चाहती हूँ कि आप इस मामले में मोहिनी से सहायता लें।”

मोहिनी जो अब तक खामोश बैठी मेरी और डॉली की बातचीत सुन रही थी। एकदम उठकर खड़ी हो गयी। फिर इससे पहले कि मैं डॉली की बात का कोई उत्तर देता उसने सरगोशी की –

“राज! मैं मामले की जड़ तक पहुँच गयी हूँ। वास्तविकता क्या है, इसका ज्ञान डॉली और उसके पिता को भी नहीं है। तुम डॉली से कह दो कि टेण्डर उसी के पिता के नाम खुलेगा।”

मैंने डॉली को मोहिनी का उत्तर सुनाया तो वह खुशी से खिल उठी। मुझे भय हुआ कि वह समय से पहले अपने पिता से कुछ बता न दे इसलिए मैंने उसे समझा दिया। फिलहाल वह मोहिनी की बात को छिपाकर रखे और अपने पिता से केवल इतना कह दे कि मैं अपने एक परिचित के माध्यम से टेण्डर का मामला तय कर लूँगा।

डॉली पूरी तरह संतुष्ट होकर चली गयी तो मोहिनी ने मुझे विस्तारपूर्वक बताते हुए कहा – “जिस व्यक्ति ने तुम्हारे ससुर से मोटी रकम खाई है, यह सब उसी की बदमाशी है। दूसरी पार्टी को वही व्यक्ति मुकाबले पर लाया है।”

“फिर अब तुम क्या करोगी?”

“तुम मेरे मित्र हो राज। कुछ न कुछ तो करना ही होगा। तुम्हें मुझे केवल उस व्यक्ति के घर तक लेकर चलना होगा।” मोहिनी ने अन्तिम शब्द बड़ी उदासी से कहे ।फिर एक ठण्डी साँस भरकर बोली। “मैं तुम्हें कष्ट न देती राज, परन्तु कमजोरी के कारण मुझसे हिला भी नहीं जाता।”

मैंने मोहिनी के उजड़े हुए चेहरे को देखा तो मुझे एक धक्का-सा लगा, फिर मैं चुप-सा हो गया। उसी रात भोजन से निपटने के बाद मैं रोज के समान टहलने के बहाने कोठी से बाहर निकला और उस व्यक्ति के घर की ओर चल पड़ा जिसने डॉली के पिता से टेण्डर के सिलसिले में धोखेबाजी की थी। मोहिनी मेरा मार्गदर्शन कर रही थी। वह एक खूबसूरत बंगला-नुमा मकान था। मोहिनी के कहने पर मैं बेधड़क मकान के अन्दर दाखिल हो गया। मोहिनी ने मुझे बताया था कि वह व्यक्ति इस समय घर पर रहता है और उसकी पत्नी तथा बच्चे किसी प्रोग्राम में गये हैं। मैंने दरवाजे पर पहुँचकर घण्टी बजाई तो एक नाटे कद और दोहरे शरीर का व्यक्ति बाहर निकला। उस समय वह रेशमी ड्रेसिंग गाऊन में था। चेहरे से अत्यन्त धूर्त तथा मक्कार आदमी दिखता था। मुझे देखकर खुश्क स्वर में बोला –

“कौन हो तुम? और इतनी रात में यहाँ किसलिए आए हो?”

मैंने उसे ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा।

“किस सम्बन्ध में बात करना चाहते हो?”

मैंने डॉली के पिता का नाम बताते हुए कहा कि मैं उस सिलसिले में...। लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी करता बाकी काम को मैंने इस तरह अन्जाम दिया जैसे कोई कम्प्यूटर अपना काम करता है। मैं उस कम्प्यूटर के समान था जिसका बटन मोहिनी के हाथ में था। मैं तेजी से अपना काम करने लगा। मैंने उसे सम्भलने का अवसर नहीं दिया।

अगले ही क्षण मैंने उसकी छाती पर सवार होकर उसकी गर्दन पर अपना दबाव बढ़ाया और अपने इकलौते हाथ के घेरे को तंग करता चला गया। कुछ देर तक वह बिन पानी की मछली की तरह मेरे जिस्म के बोझ तले तड़पा फिर हाँथ-पाँव ढीले छोड़ दिए। उसकी उबली हुई खौफनाक आँखें इस बात की ओर संकेत कर रही थीं कि अब वह घड़ी, दो घड़ी का मेहमान है। उसकी साँसें उखड़ चुकी थीं। मैंने उसे दीवानगी के आलम और भयानक अन्दाज के साथ एक बार फिर चोट पहुँचाई, परन्तु फिर इस विचार से कि मैं इस समय अत्यन्त नाजुक स्थिति में फँस चुका हूँ, पकड़ा भी जा सकता हूँ, मेरा दिल धड़कने लगा।

मैं बौखलाकर वापसी के इरादे से पलटना ही चाहता था कि मोहिनी की सरगोशी मेरे कानों से टकराई – “राज! वह मर रहा है। मरने से पहले मत जाओ। मेरे लिये एक ठोकर मारकर इसका सिर फोड़ दो। इसका काम भी खत्म हो जाएगा और मैं तुम्हारे सहयोग से अपने अस्तित्व को बरकरार रख सकूँगी।”

मोहिनी का स्वर उभरा तो जैसे मेरा दिमाग दुरुस्त हुआ। मुझे विचार हुआ कि शायद मैंने मोहिनी के प्रेम की दीवानगी के आलम में यह सब कुछ किया है। इसलिए मैंने घृणा के साथ एक भरपूर ठोकर बेहोश व्यक्ति के सिर पर मारी। मोहिनी खड़ी अपनी जुबान होंठों पर फेर रही थी। ताजा और गाढ़ा-गाढ़ा खून देख्रकर उसकी आँखें चमक रही थीं। वह कहने लगी –

“राज अब तुम यहाँ से खिसक लो, वरना पकड़े जाओगे। सीधे घर जाना। क्या समझे?”

“लेकिन इसकी पत्नी तथा बच्चों का क्या होगा?” मैंने डरते-डरते पूछा।

“उनकी चिन्ता मत करो। मैं अभी जिन्दा हूँ।”

मृत व्यक्ति पर एक दृष्टि डालकर वापसी के इरादे से मैं घूमा तो मोहिनी ने मुझे फिर सम्बोधित करते हुए कहा – “सुनो राज! तुम घर जाकर उस ठेकेदार को फोन करके वहाँ भेजने की हिदायत करो, जिसने तुम्हारे ससुर के सम्बन्ध में टाँग फँसाने की चेष्टा की थी। शेष काम मैं कर लूँगी। तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं।”

मोहिनी के आदेश को याद करता हुआ मैं बाहर आ गया। रास्ते में एक बूथ से मैंने दूसरे ठेकेदार को फोन करके उसे बदली हुई आवाज में टेंडर पास करने वाले के घर पहुँचने को कहा फिर सीधा घर आ गया।
 
डॉली अपने माता-पिता के साथ दूसरे कमरे में मौजूद थी इसलिए मैं खामोशी से अपने बेडरूम में जाकर लेट गया। मेरा विचार था कि डॉली आयेगी तो उसे सारी बात बताऊँगा परन्तु न जाने कब मेरी आँख लग गयी और मैं बेखबर सो गया।

प्रात: काल उस समय मेरी आँख खुली जब डॉली ने झिंझोड़कर जगाया। उसके चेहरे पर उलझन और चिन्ता के मिले-जुले भाव नज़र आ रहे थे। हाथ में ताजा अखबार लिये वह मुझे विचित्र भयभीत दृष्टि से देख रही थी। रात जो कुछ हुआ मैं उसे भूल चुका था। यूँ भी मुझे जिस प्रकार जगाया गया था उसने मेरा सारा ध्यान डॉली की ओर कर दिया था।

मैंने आश्चर्य से पूछा – “क्या बात है? तुम कुछ विचित्र नज़र आ रही हो।”

“पहले यह बताइए राज कि मोहिनी इस समय आपके सिर पर मौजूद है या नहीं?”

डॉली ने मोहिनी का हवाला दिया तो रात वाली घटना मुझे अचानक याद आ गयी। मेरा दिल चाहा कि डॉली को सब कुछ बता दूँ, परन्तु दूसरे ही पल मुझे अहसास हुआ कि सम्भव है वह चिंतित हो जाए। मैंने अपना इरादा बदल दिया। कल्पना के झरोखों में झाँकते हुए मैंने सिर की ओर देखा तो मोहिनी को सोते हुए पाया। उसके चेहरे पर अब जैसे जीवन बरस रहा था। सूखे मुरझाये हुए गालों पर सुर्खी मौजूद थी। निश्चय ही यह सारी बातें इस बात का प्रमाण थी कि रात उसने अपने अस्तित्व को इन्सानी खून जी भरकर पिलाया है। मोहिनी के चेहरे पर प्रफुल्लता देखकर मुझे न जाने क्यों एक अजीब आत्मिक प्रसन्नता का अहसास हुआ, परन्तु मैंने उसे अपने चेहरे से जाहिर न होने दिया। बल्कि लगातार अपने चेहरे पर घबराहट के भाव लाते हुए बोला –

“मोहिनी मौजूद है, लेकिन आखिर बात क्या है? तुम इतनी चिंतित क्यों दिख रही हो?”

“राज! जिस व्यक्ति ने डैडी से लम्बी-लम्बी रकमें खाई थीं और जिस ठेकेदार ने टेण्डर के सिलसिले में बीच में आने की चेष्टा की थी, वह दोनों आश्चर्यजनक तौर पर दुर्घटना के शिकार हो गये। यह देखो।”

डॉली ने समाचार-पत्र मेरे सामने रख दिया। मैंने समाचार-पत्र उसके हाथों से लेकर पढ़ना शुरू कर दिया। पहले ही पृष्ठ पर बड़ी-बड़ी हैडिंग के साथ कातिल और मकतूल के बारे में ब्यौरे से छपा था। पुलिस की रिर्पोट के अनुसार ठेकेदार को रंगेहाथों घटनास्थल से गिरफ्तार किया गया था। हत्यारे का बयान बिल्कुल स्पष्ट था। उसने पुलिस को यही बयान दिया था कि मरने वाले ने उससे ठेका दिलाने के बहाने बड़ी-बड़ी रकमें खाई, फिर बात से वह मुकर गया, इसलिए क्रोध में आकर उसने उसकी हत्या कर दी। केस बिल्कुल साफ था, लेकिन पुलिस डिपार्टमेंट में यह बात छिपी हुई थी कि मरने वाले के जिस्म का सारा खून कैसे गायब हो गया। ठेकेदार ने इस सम्बन्ध में अनभिज्ञता प्रकट की थी।

अखबार पढ़कर मैंने डॉली की ओर देखा जो मुझे अब भी आश्चर्यचकित दृष्टि से देख रही थी। मुझे अपनी ओर देखता पाकर उसने जल्दी से कहा –“राज! क्या आपको इस घटना में मोहिनी का हाथ नज़र नहीं आ रहा है।”

“मुझे कुछ नहीं पता। बहरहाल अब तुम्हारे डैडी के लिये मैदान साफ हो गया है।” मैंने बात का विषय बदलते हुए पूछा। “उनका क्या विचार है इस सम्बन्ध में?”

“डैडी ने अपनी कोई राय प्रकट नहीं की, परन्तु मेरा अनुमान सही है कि आज कि अखबार पढ़कर उन्हें खुशी हुई है।”

“अवश्य हुई होगी।” मैंने कहा। “संसार की अजीब रीति है डॉली। एक का दु:ख, दूसरे की खुशी का कारण बनता है। यदि ऐसा न हो तो संसार का कोई राजष्य कभी हँसता-बोलता नज़र न आए।”

“आपका कहना ठीक है, परन्तु मुझे समाचार को पढ़कर दु:ख हुआ है। मैं इस सीमा तक बात बढ़ाना नहीं चाहती थी।”

मैं डॉली की बात का जवाब देने का इरादा कर ही रहा था कि उसके डैडी कमरे में दाखिल हुए। डॉली जल्दी से उठकर मुझसे अलग हो गयी। मैंने बड़े आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया।। कुछ देर तक बैठे हुए वे इधर-उधर की बातें करते रहे फिर बोले –

“बेटा! तुमने आज का अखबार देखा?”

“जी हाँ!” मैंने उनके चेहरे पर निगाहें जमाते हुए उत्तर दिया। “ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है। जो जैसा करता है वैसा ही भरता है।”

“डैडी!” डॉली ने बीच में बोलते हुए पूछा। “मरने वाले के बाल-बच्चों का अब क्या होगा?”

“बेटी! जो कुछ मुझसे हो सकेगा जरूर करूँगा।”

बाप-बेटी के मध्य काफी देर तक इस विषय पर बात होती रही। डॉली के पिता मरने वाले के घर वालों के विषय में अपनी हमदर्दी प्रकट कर रहे थे, परन्तु मैं देख रहा था कि उनका चेहरा प्रसन्नता से चमक रहा था। मरने वाले के बाल-बच्चों या मरने वाले की गिरफ्तारी से उन्हें कोई सरोकार नहीं था। उन्हें तो बस केवल इस बात से खुशी थी कि अब टेण्डर उन्हीं के नाम खुलेगा। उस ठेके पर डॉली के पिता को ढाई लाख की आमदनी होने की आशा थी।

कुछ देर बाद डॉली और उसके पिता उठकर चले गये तो मैंने सन्तोष की साँस ली। अखबार में घटना की पूरी खबर पढ़ लेने के बाद मुझे इत्मीनान हो गया कि अब मुझ पर किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता। मोहिनी की शक्ति वास्तव में असीमित थी। उसने खुबसूरती से अदालत पर अपना प्रभाव जमा लिया था। मैं मोहिनी के सम्बन्ध में सोचने लगा। वह बड़े ही सुन्दर ढंग से मेरे सिर पर सवार थी। उसके पतले-पतले और नाजुक होंठों पर जीवन की लहरें उठ रही थी। जिन गालों पर कल तबाही के बादल छाये हुई थे। वहाँ आज सुबह की लालिमा फैली नज़र आ रही थी। मैं कल्पना के झरोखों में न जाने कब तक मोहिनी को सोता हुआ देखता रहा और अपने भविष्य के सम्बन्ध में सोचता रहा।

मोहिनी ने मुझे वचन दिया था, यदि मैंने उसे पण्डित की गुलामी में जाने से बचा लिया तो वह सदा मेरी बांदी बनकर रहेगी। कभी मेरी आज्ञा से इंकार नहीं करेगी। आने वाले सुखदायी भविष्य के हसीन सपने मेरी आत्मा को ताजगी दे रहे थे। मैं अपने विचारों के संसार में गुम था कि मोहिनी एक तौबा शिकन अंगड़ाई लेकर उठ बैठी। मुझे अपनी ओर देखते पाया तो होंठों पर एक शोख मुस्कराहट बिखेरकर बोली –

“हैलो राज! रात कैसी गुजरी?”

“खूब नींद आयी।” मैंनें मुस्कराकर जवाब दिया। फिर उसे अखबार में प्रकाशित होने वाली घटनाओं के सम्बन्ध में बताने लगा।

मोहिनी घुटनों पर सिर टिकाए बैठी मेरी बातें सुनती रही। मैं चुप हुआ तो उसने इठलाते हुए कहा – “राज! तुम्हारी आज्ञा जो थी। इसलिए मैंने मामले को तुम्हारे ससुर के हक में कर दिया। परन्तु तुम्हारे यह ससुर साहब भी बहुत गहरे आदमी हैं जो कुछ ऊपर से नज़र आते हैं, वह अन्दर से नहीं हैं। कभी तुमने इनके सम्बन्ध में भी सोचा है।”

“क्या मतलब?” मैंने आश्चर्य के साथ पूछा।

“मतलब बिल्कुल साफ है राज।” मोहिनी ने व्यंग्यात्मक मुस्कराहट होंठों पर बिखेरते हुए कहा। “तुम्हें तो पता है कि तुम्हारे ससुर करोड़ों की जायदाद के मालिक हैं। चार-पाँच बैंकों में अकाउण्ट रखते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें लाख, दो लाख की हानि की भला क्या चिन्ता हो सकती है। परन्तु कल रात मुझे मालूम हुआ कि वास्तविक चक्कर क्या है। वास्तव में मामला कुछ और ही है।”’

“साफ-साफ बताओ क्या मामला है?” मैं बेचैनी से पूछा।

मोहिनी ने गंभीरता से कहना शुरू किया –

“मेरा विचार है, तुमसे कुछ छिपाना उचित नहीं। परन्तु हाँ, जो कुछ मैं तुमसे कहूँ, डॉली से उन बातों को मत कहना। वरना उसे दु:ख होगा। बात वास्तव में यह है कि तुम्हारे ससुर साहब को एक दूसरी औरत ने जो हसीन होने के साथ-साथ बड़ी चतुर है, तुम्हारे ससुर साहब को अपने नाज-नखरों के हसीन जाल में पूरी तरह फँसा रखा है और दोनों हाथों से उनकी दौलत लूट रही है। आपके ससुर साहब जो यह बिजनेस के सिलसिले का बहाना करके देर रात तक गायब रहते हैं यह सब बकवास है। वास्तविकता यह है कि रजनी ने उन्हें पूरी तरह अपने कब्जे में कर रखा है।”

“क्या रजनी उसी औरत का नाम है?” मैंने आश्चर्य के साथ पूछा।

मोहिनी की जुबानी यह नयी खबर सुनकर मेरी अक्ल दंग रह गयी। मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मेरे ससुर साहब, जो देखने में अत्यन्त सभ्य और समाज सेवक नज़र आते हें, भीतर से इस प्रकार गहरे और छुपे रूस्तम भी हो सकते हैं। मोहिनी मेरा सवाल सुनकर मुस्कराती हुई खड़ी हो गयी और कमर पर हाथ रखकर प्रेमिका के समान बोली –

“हाँ राज! रजनी उसी युवती का नाम है जो पिछले दो वर्ष से तुम्हारे ससुर की बाहें गरम किए हुए हैं। बड़ी ही हसीन और अच्छे जिस्म वाली है। तुम्हारे ससुर साहब के पास आने से पहले एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने रजनी को तुम्हारे ससुर साहब से मिलाया था। बाद में तुम्हारे ससुर साहब ने अपनी बेपनाह दौलत का प्रदर्शन किया तो रजनी पके हुए आम की तरह उनके आगोश में आ गयी। उन्होंने रजनी को छिपे तौर पर यही एक खूबसूरत बंगले में रखा हुआ है, जिसका ज्ञान मजिस्ट्रेट को नहीं है। जिस दिन भी उसे पता चल गया कि तुम्हारे ससुर ने दोस्ती की आड़ में शिकार खेला है, उसी दिन दोनों में ठन जाएगी। उनकी यह दुखती रग ठेकेदार के हाथ लगी गयी
 
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