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मोहिनी बड़ी देर तक मुझे समझाती रही और डॉली की वकालत करती रही परन्तु मैं अपनी हठ पर अड़ा रहा। शायद इसलिए कि मैं मोहिनी के अलावा और किसी के सम्बंध में सोचना भी नहीं चाह रहा था और उसका कारण भी उचित था। त्रिवेणी के जाप को पूरा होने में अब केवल तीन-चार दिन ही शेष रह गए थे।
जब मैंने डॉली की ओर कोई ध्यान नहीं दिया तो मोहिनी यह कहकर मेरे सिर से उतर गयी कि वह डॉली के सिर पर जा रही है ताकि हालात के संबंध में उसे समझा सके और उसके मस्तिष्क में मेरी जड़े मजबूत कर सके।
मैंने मोहिनी की इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। जब वह मेरे सिर से उतर गयी तो मैंने कुछ देर तक हालात के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के लिये अपने मस्तिष्क में विभिन्न योजनाएँ बनानी आरम्भ कर दी। फिर न जाने कब मेरी आँख लग गयी।
सुबह मैं हमेशा की तरह जाने को तैयार हुआ तो डॉली ने मेरा रास्ता रोक लिया। अपनी रात की बात की शर्मिंदगी जाहिर करके उसने मोहिनी की सलामती के सम्बन्ध में हमदर्दी प्रकट की तो मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया। मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और जल्दी वापिस आने का वायदा करके घर से निकल गया।
मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ चुकी थी लेकिन उसकी आँखों में नजर आने वाली उलझन कुछ अधिक ही दिखाई दे रही थी। मैं दिन भर मारा-मारा फिरता शाम को मरघट पर जाकर खड़ा हो गया। एक नजर त्रिवेणी पर पड़ी जो अभी तक बड़े आराम से अपने जाप में मग्न था। खून का घूँट पीता हुआ वापिस घर आ गया।
डॉली कल की अपेक्षा अधिक मेहरबान नजर आ रही थी। काफी रात तक वह मोहिनी के सम्बंध में बातें करती रही। सात दिन बाद मेरी बेचैनी व दहशत में जो बढ़ोतरी हुई उसे कह पाना मेरे बस की बात नहीं। बहरहाल उस दिन मेरे ऊपर एक अजीब बेचैनी, एक अजीब दीवानगी छाई रही। मोहिनी तो एक उदासी की सूरत बन गयी थी। दिन भर मैं उसे दिलासा देता रहा और बड़ी बेचैनी से रात की प्रतीक्षा करता रहा। किसी तरह रात आई और ग्यारह बजे तो मैं पंडित भगवान प्रसाद के घर की ओर चल पड़ा।
मैं लम्बे-लम्बे कदम उठाता पंडितों की बस्ती में दाखिल हुआ तो मोहिनी ने ठंडी आह भरकर कहा– “राज, आज की रात मुझ पर बहुत भारी है! मेरा दिल गवाही दे रहा है कि कुछ न कुछ होकर रहेगा।”
“धीरज से काम लो! भगवान ने चाहा तो त्रिवेणी अपने उद्देश्य में कभी भी सफल नहीं हो सकेगा।”
मोहिनी की बेचैन निगाहों ने मुझे देखा। फिर मेरे सिर पर चिपटकर पूर्णमासी के चाँद को घूरने लगी। मैं कदम बढ़ाता हुआ भगवान प्रसाद की हवेली में दाखिल हुआ। वह मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे देखकर बोला।
“आओ राज! मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था। तुम ठीक समय पर पहुँचे हो।”
“महाराज, क्या आपने मेरी वस्तु की व्यवस्था कर ली ?”
“हाँ! मेरे साथ आओ।”
मैं भगवान प्रसाद के आदेश पर उठकर उसके साथ हो लिया। वह मुझे साथ लेकर एक दूसरे कमरे में दाखिल हुआ जहाँ न जाने क्या-क्या उल्लम-गल्लम भरा हुआ था। उस कमरे में दाखिल होते ही मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मैं असंख्य भूत-प्रेत आत्माओं के बीच आ गया हूँ। प्रकाश में वहाँ कोई ऐसी वस्तु नजर आ रही थी जिससे मैं भयभीत होता, परन्तु कुछ न कुछ ऐसा जरूर था जिसने मेरे बदन के सारे रोगों को लाकर खड़ा कर दिया था।
भगवान प्रसाद ने कमरे में दाखिल होकर कोरी मिट्टी की एक हांडी बीच में रखी हुई मेज उठाई। फिर मेरे निकट आ गया। मैंने हांडी पर उचटती नजर डाली। उसका मुँह मिट्टी के कोरे ढकने से बंद था और चारो ओर से सूखे हुए आटे से बंद था।
जब मैंने डॉली की ओर कोई ध्यान नहीं दिया तो मोहिनी यह कहकर मेरे सिर से उतर गयी कि वह डॉली के सिर पर जा रही है ताकि हालात के संबंध में उसे समझा सके और उसके मस्तिष्क में मेरी जड़े मजबूत कर सके।
मैंने मोहिनी की इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। जब वह मेरे सिर से उतर गयी तो मैंने कुछ देर तक हालात के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के लिये अपने मस्तिष्क में विभिन्न योजनाएँ बनानी आरम्भ कर दी। फिर न जाने कब मेरी आँख लग गयी।
सुबह मैं हमेशा की तरह जाने को तैयार हुआ तो डॉली ने मेरा रास्ता रोक लिया। अपनी रात की बात की शर्मिंदगी जाहिर करके उसने मोहिनी की सलामती के सम्बन्ध में हमदर्दी प्रकट की तो मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया। मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और जल्दी वापिस आने का वायदा करके घर से निकल गया।
मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ चुकी थी लेकिन उसकी आँखों में नजर आने वाली उलझन कुछ अधिक ही दिखाई दे रही थी। मैं दिन भर मारा-मारा फिरता शाम को मरघट पर जाकर खड़ा हो गया। एक नजर त्रिवेणी पर पड़ी जो अभी तक बड़े आराम से अपने जाप में मग्न था। खून का घूँट पीता हुआ वापिस घर आ गया।
डॉली कल की अपेक्षा अधिक मेहरबान नजर आ रही थी। काफी रात तक वह मोहिनी के सम्बंध में बातें करती रही। सात दिन बाद मेरी बेचैनी व दहशत में जो बढ़ोतरी हुई उसे कह पाना मेरे बस की बात नहीं। बहरहाल उस दिन मेरे ऊपर एक अजीब बेचैनी, एक अजीब दीवानगी छाई रही। मोहिनी तो एक उदासी की सूरत बन गयी थी। दिन भर मैं उसे दिलासा देता रहा और बड़ी बेचैनी से रात की प्रतीक्षा करता रहा। किसी तरह रात आई और ग्यारह बजे तो मैं पंडित भगवान प्रसाद के घर की ओर चल पड़ा।
मैं लम्बे-लम्बे कदम उठाता पंडितों की बस्ती में दाखिल हुआ तो मोहिनी ने ठंडी आह भरकर कहा– “राज, आज की रात मुझ पर बहुत भारी है! मेरा दिल गवाही दे रहा है कि कुछ न कुछ होकर रहेगा।”
“धीरज से काम लो! भगवान ने चाहा तो त्रिवेणी अपने उद्देश्य में कभी भी सफल नहीं हो सकेगा।”
मोहिनी की बेचैन निगाहों ने मुझे देखा। फिर मेरे सिर पर चिपटकर पूर्णमासी के चाँद को घूरने लगी। मैं कदम बढ़ाता हुआ भगवान प्रसाद की हवेली में दाखिल हुआ। वह मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे देखकर बोला।
“आओ राज! मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था। तुम ठीक समय पर पहुँचे हो।”
“महाराज, क्या आपने मेरी वस्तु की व्यवस्था कर ली ?”
“हाँ! मेरे साथ आओ।”
मैं भगवान प्रसाद के आदेश पर उठकर उसके साथ हो लिया। वह मुझे साथ लेकर एक दूसरे कमरे में दाखिल हुआ जहाँ न जाने क्या-क्या उल्लम-गल्लम भरा हुआ था। उस कमरे में दाखिल होते ही मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मैं असंख्य भूत-प्रेत आत्माओं के बीच आ गया हूँ। प्रकाश में वहाँ कोई ऐसी वस्तु नजर आ रही थी जिससे मैं भयभीत होता, परन्तु कुछ न कुछ ऐसा जरूर था जिसने मेरे बदन के सारे रोगों को लाकर खड़ा कर दिया था।
भगवान प्रसाद ने कमरे में दाखिल होकर कोरी मिट्टी की एक हांडी बीच में रखी हुई मेज उठाई। फिर मेरे निकट आ गया। मैंने हांडी पर उचटती नजर डाली। उसका मुँह मिट्टी के कोरे ढकने से बंद था और चारो ओर से सूखे हुए आटे से बंद था।